गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।
हिन्दी अर्थ: अपने मन के पीछे चलने वाले (ऐसे मनुष्य) अपना मानस जनम व्यर्थ गवा के आत्मिक मौत मरे रहते हैं। जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ता है। वह (अपने अंदर से) भटकना खत्म कर लेता है। वह अपने हृदय-घर में ही सदा-स्थिर-प्रभू का ठिकाना ढूँढ लेता है (उसे तिथियों आदि का आसरा ले के तीर्थों आदि पर भटकने की आवश्यक्ता नहीं पड़ती)। 9। हे भाई ! पूरन-प्रभू खुद ही (जो कुछ) करता है वही होता है (विषोश तिथियों को बढ़िया उक्तम जान के भटकते ना फिरो। बल्कि) बल्कि ये तिथियाँ ये वार मननाने तो माया का मोह पैदा करने का कारण बनते हैं। मेर-तेर पैदा करते हैं। गुरू की शरण आए बिना मनुष्य (आत्मिक जीवन की ओर से) पूरी तौर पर अंधा हुआ रहता है। (गुरू का आसरा छोड़ के) मूर्ख मनुष्य ही तिथियों और वार मनाते फिरते हैं। हे नानक ! गुरू की शरण पड़ कर (जो मनुष्य) समझता है। उसको (आत्मिक जीवन की) सूझ आ जाती है। वह मनुष्य सदा सिर्फ परमात्मा के नाम नही लीन रहता है। 10। 2।
बिलावलु महला 1 छंत दखणी ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ मुंध नवेलड़ीआ गोइलि आई राम ॥ मटुकी डारि धरी हरि लिव लाई राम ॥ लिव लाइ हरि सिउ रही गोइलि सहजि सबदि सीगारीआ ॥ कर जोड़ि गुर पहि करि बिनंती मिलहु साचि पिआरीआ ॥ धन भाइ भगती देखि प्रीतम काम क्रोधु निवारिआ ॥ नानक मुंध नवेल सुंदरि देखि पिरु साधारिआ ॥1॥ सचि नवेलड़ीए जोबनि बाली राम ॥ आउ न जाउ कही अपने सह नाली राम ॥ नाह अपने संगि दासी मै भगति हरि की भावए ॥ अगाधि बोधि अकथु कथीऐ सहजि प्रभ गुण गावए ॥ राम नाम रसाल रसीआ रवै साचि पिआरीआ ॥ गुरि सबदु दीआ दानु कीआ नानका वीचारीआ ॥2॥ स्रीधर मोहिअड़ी पिर संगि सूती राम ॥ गुर कै भाइ चलो साचि संगूती राम ॥ धन साचि संगूती हरि संगि सूती संगि सखी सहेलीआ ॥ इक भाइ इक मनि नामु वसिआ सतिगुरू हम मेलीआ ॥ दिनु रैणि घड़ी न चसा विसरै सासि सासि निरंजनो ॥ सबदि जोति जगाइ दीपकु नानका भउ भंजनो ॥3॥ जोति सबाइड़ीए त्रिभवण सारे राम ॥ घटि घटि रवि रहिआ अलख अपारे राम ॥ अलख अपार अपारु साचा आपु मारि मिलाईऐ ॥ हउमै ममता लोभु जालहु सबदि मैलु चुकाईऐ ॥ दरि जाइ दरसनु करी भाणै तारि तारणहारिआ ॥ हरि नामु अंम्रितु चाखि त्रिपती नानका उर धारिआ ॥4॥1॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।
हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला 1 छंत दखणी सतिगुर प्रसादि ॥ थोड़े दिनों के बसेरे वाले इस जगत में आ के जो जीव-स्त्री विकारों से बची रहती है। जिसने परमात्मा (के चरणों) में सुरति जोड़ी हुई है और शरीर का मोह त्याग दिया है। जो प्रभू चरणों में प्रीति जोड़ के इस जगत में जीवन बिताती है। वह आत्मिक अडोलता में टिक के सतिगुरू के शबद की बरकति से अपना जीवन सुंदर बना लेती है। वह (सदा दोनों) हाथ जोड़ के गुरू के पास विनती करती रहती है (कि। हे गुरू ! मुझे) मिल (ताकि मैं आपकी कृपा से) सदा-स्थिर प्रभू के नाम में जुड़ के उसको प्यार कर सकूँ। ऐसी जीव-स्त्री प्रीतम-प्रभू की भक्ति के द्वारा प्रीतम प्रभू के प्रेम में टिक के उसका दर्शन करके काम-क्रोध (आदि विकारों को अपने अंदर से) दूर कर लेती है। हे नानक ! पवित्र और सुंदर जीवन वाली वह जीव-स्त्री प्रभू-पति के दीदार करके (उसकी याद को) अपने हृदय का आसरा बना लेती है। 1। हे सदा-स्थिर प्रभू में जुड़ के विकारों से बची हुई जीव स्त्री ! जवानी में भी भोले स्वभाव वाली (बनी रह; अहंकार छोड़ के) अपने पति-प्रभू (के चरणों) में टिकी रह (देखना। उसका पल्ला छोड़ के) किसी और जजगह ना भटकती फिरना। वही दासी (सौभाग्य है जो) अपने पति की संगति में रहती है। (हे सखिए !) मुझे भी प्रभू-पति की भक्ति प्यारी लगती है। (जो जीव-स्त्री) आत्मिक अडोलता में टिक के प्रभू के गुण गाती है (वह दासी अपने पति-प्रभू की संगति में शोभा पाती है)। (सो। सहेली ! गुरू के बख्शे) ज्ञान से (गुणों के) अथाह (समुद्र-) प्रभू में (डुबकी लगा के) उस प्रभू के गुणगान करने चाहिए। वह प्रभू ऐसे स्वरूप वाला है जिसका बयान नहीं हो सकता। रसों के श्रोत। रसों के मालिक प्रभू उस जीव-स्त्री को अपने चरणों में जोड़ता है जो उसके सदा-स्थिर नाम में प्यार डालती है। हे नानक ! जिस सौभाग्यवती जीव-स्त्री को गुरू ने परमात्मा की सिफतसालाह का शबद दिया। जिसको यह ऊँची दाति बख्शी। वह उच्च विचार के मालिक बन जाती है। 2। (वह जीव-स्त्री) माया के पति प्रभू के प्यार-वश में हो जाती है वह जीव-स्त्री पति-प्रभू के चरणों में जुड़ी रहती है। (हे भाई ! जिस जीव-स्त्री की) जीवन-चाल गुरू के अनुसार रहती है जो जीव-स्त्री सदा कायम रहने वाले परमात्मा (की याद) में लीन रहती है। हे भाई ! सत्संगी सहेलियों के साथ मिल के जो जीव-स्त्री सदा-स्थिर प्रभू (की याद) में लीन होती है। प्रभू-पति के चरणों में जुड़ती है। परमात्मा के प्यार में एकाग्र-मन टिकने के कारण (उसके अंदर परमात्मा का) नाम आ बसता है (उसके अंदर ये श्रद्धा बन जाती है कि) गुरू ने (मुझे) प्रभू के चरणों में मिलाया है। (उस जीव-स्त्री को) दिन-रात घड़ी-पल (किसी वक्त भी परमात्मा की याद) नहीं भूलती। (वह जीव-स्त्री) हरेक सांस के साथ निरंजन-प्रभू (को याद रखती है)। हे नानक ! (कह- हे भाई !) गुरू के शबद के द्वारा (अपने अंदर ईश्वरीय) ज्योति जगा के दीया जला के (वह जीव-स्त्री अपने अंदर से हरेक) डर-सहम नाश कर लेती है। 3। हे सहेलीए ! (परमात्मा की) ज्योति हर जगह (पसरी हुई) है। वह प्रभू सारे जगत की संभाल करता है। वह अदृष्य और बेअंत प्रभू हरेक शरीर में मौजूद है। हे सहेली ! वह परमात्मा अदृष्य है बेअंत है। बेअंत है। वह सदा कायम रहने वाला है। स्वै भाव मार के (ही उसको) मिला जा सकता है। हे सहेली ! (अपने अंदर से) अहंकार। माया जोड़ने की कसक और लालच जला दे (सहेलिए ! अहंकार ममता लोभ आदि की) मैल गुरू के शबद से ही समाप्त की जा सकती है। (सो। हे सहेलिए ! गुरू के शबद में जुड़ के परमात्मा की) रजा में (चल के जीवन व्यतीत कर। और अरदास किया कर-) हे तारणहार प्रभू ! (मुझे विकारों के समुंद्र से) पार लंघा ले (इस तरह। हे सहेलिए ! गुरू के) दर पर जा के (परमात्मा के) दर्शन कर लेगी। हे नानक ! (कह- हे सहेली ! जो जीव-स्त्री प्रभू का नाम अपने) हृदय में बसाती है वह आत्मिक जीवन देने वाला हरी-नाम जल चख के (माया की तृष्णा से) तृप्त हो जाती है। 4। 1।
बिलावलु महला 1 ॥ मै मनि चाउ घणा साचि विगासी राम ॥ मोही प्रेम पिरे प्रभि अबिनासी राम ॥ अविगतो हरि नाथु नाथह तिसै भावै सो थीऐ ॥ किरपालु सदा दइआलु दाता जीआ अंदरि तूं जीऐ ॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।
हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला 1 ॥ हे सहेली ! अविनाशी प्यारे प्रभू ने (मेरे मन को अपने) प्रेम (की खींच से) मस्त कर रखा है। सदा स्थिर रहने वाले परमात्मा (के नाम) में (टिक के) मेरा मन खिला रहता है। मेरे मन में बहुत चाव बना रहता है। हे सहेली ! वह परमात्मा इन आँखों से नहीं दिखता। पर वह परमात्मा (बड़े-बड़े) नाथों का (भी) नाथ है। (जगत में) वह ही होता है। जो उस परमात्मा को ही अच्छा लगता है। अटल परमात्मा नाथों का नाथ है, जो उसे भाता है, वही होता है। हे प्रभू ! आप मेहर का समुंद्र है। आप सदा ही दया का श्रोत है। आप ही सब दातें देने वाला है। आप ही सब जीवों के अंदर का प्राण है।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। सूही, बिलावल, और गोंड राग का क्षेत्र। गुरु राम दास की ‘लावां’ इसी सूही राग में बँधी, सोलहवीं सदी के मध्य की।
नानक का स्वर साफ़ है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पन्द्रहवीं सदी के अंतिम दशकों में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पहली बड़ी यात्रा पर थे। वो जो शब्द लाए, वो आज भी इसी ग्रंथ में पढ़े जाते हैं।
इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “अपने मन के पीछे चलने वाले (ऐसे मनुष्य) अपना मानस जनम व्यर्थ गवा के आत्मिक मौत मरे रहते हैं।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।