अंग
843
राग बिलावल
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਮਨਮੁਖ ਮੁਏ ਅਪਣਾ ਜਨਮੁ ਖੋਇ ॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਸੇਵੇ ਭਰਮੁ ਚੁਕਾਏ ॥
ਘਰ ਹੀ ਅੰਦਰਿ ਸਚੁ ਮਹਲੁ ਪਾਏ ॥੯॥
ਆਪੇ ਪੂਰਾ ਕਰੇ ਸੁ ਹੋਇ ॥
ਏਹਿ ਥਿਤੀ ਵਾਰ ਦੂਜਾ ਦੋਇ ॥
ਸਤਿਗੁਰ ਬਾਝਹੁ ਅੰਧੁ ਗੁਬਾਰੁ ॥
ਥਿਤੀ ਵਾਰ ਸੇਵਹਿ ਮੁਗਧ ਗਵਾਰ ॥
ਨਾਨਕ ਗੁਰਮੁਖਿ ਬੂਝੈ ਸੋਝੀ ਪਾਇ ॥
ਇਕਤੁ ਨਾਮਿ ਸਦਾ ਰਹਿਆ ਸਮਾਇ ॥੧੦॥੨॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਸੇਵੇ ਭਰਮੁ ਚੁਕਾਏ ॥
ਘਰ ਹੀ ਅੰਦਰਿ ਸਚੁ ਮਹਲੁ ਪਾਏ ॥੯॥
ਆਪੇ ਪੂਰਾ ਕਰੇ ਸੁ ਹੋਇ ॥
ਏਹਿ ਥਿਤੀ ਵਾਰ ਦੂਜਾ ਦੋਇ ॥
ਸਤਿਗੁਰ ਬਾਝਹੁ ਅੰਧੁ ਗੁਬਾਰੁ ॥
ਥਿਤੀ ਵਾਰ ਸੇਵਹਿ ਮੁਗਧ ਗਵਾਰ ॥
ਨਾਨਕ ਗੁਰਮੁਖਿ ਬੂਝੈ ਸੋਝੀ ਪਾਇ ॥
ਇਕਤੁ ਨਾਮਿ ਸਦਾ ਰਹਿਆ ਸਮਾਇ ॥੧੦॥੨॥
मनमुख मुए अपणा जनमु खोइ ॥
सतिगुरु सेवे भरमु चुकाए ॥
घर ही अंदरि सचु महलु पाए ॥९॥
आपे पूरा करे सु होइ ॥
एहि थिती वार दूजा दोइ ॥
सतिगुर बाझहु अंधु गुबारु ॥
थिती वार सेवहि मुगध गवार ॥
नानक गुरमुखि बूझै सोझी पाइ ॥
इकतु नामि सदा रहिआ समाइ ॥१०॥२॥
सतिगुरु सेवे भरमु चुकाए ॥
घर ही अंदरि सचु महलु पाए ॥९॥
आपे पूरा करे सु होइ ॥
एहि थिती वार दूजा दोइ ॥
सतिगुर बाझहु अंधु गुबारु ॥
थिती वार सेवहि मुगध गवार ॥
नानक गुरमुखि बूझै सोझी पाइ ॥
इकतु नामि सदा रहिआ समाइ ॥१०॥२॥
हिन्दी अर्थ: अपने मन के पीछे चलने वाले (ऐसे मनुष्य) अपना मानस जनम व्यर्थ गवा के आत्मिक मौत मरे रहते हैं। जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ता है। वह (अपने अंदर से) भटकना खत्म कर लेता है। वह अपने हृदय-घर में ही सदा-स्थिर-प्रभू का ठिकाना ढूँढ लेता है (उसे तिथियों आदि का आसरा ले के तीर्थों आदि पर भटकने की आवश्यक्ता नहीं पड़ती)। 9। हे भाई ! पूरन-प्रभू खुद ही (जो कुछ) करता है वही होता है (विषोश तिथियों को बढ़िया उक्तम जान के भटकते ना फिरो। बल्कि) बल्कि ये तिथियाँ ये वार मननाने तो माया का मोह पैदा करने का कारण बनते हैं। मेर-तेर पैदा करते हैं। गुरू की शरण आए बिना मनुष्य (आत्मिक जीवन की ओर से) पूरी तौर पर अंधा हुआ रहता है। (गुरू का आसरा छोड़ के) मूर्ख मनुष्य ही तिथियों और वार मनाते फिरते हैं। हे नानक ! गुरू की शरण पड़ कर (जो मनुष्य) समझता है। उसको (आत्मिक जीवन की) सूझ आ जाती है। वह मनुष्य सदा सिर्फ परमात्मा के नाम नही लीन रहता है। 10। 2।
ਬਿਲਾਵਲੁ ਮਹਲਾ ੧ ਛੰਤ ਦਖਣੀ
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ਮੁੰਧ ਨਵੇਲੜੀਆ ਗੋਇਲਿ ਆਈ ਰਾਮ ॥
ਮਟੁਕੀ ਡਾਰਿ ਧਰੀ ਹਰਿ ਲਿਵ ਲਾਈ ਰਾਮ ॥
ਲਿਵ ਲਾਇ ਹਰਿ ਸਿਉ ਰਹੀ ਗੋਇਲਿ ਸਹਜਿ ਸਬਦਿ ਸੀਗਾਰੀਆ ॥
ਕਰ ਜੋੜਿ ਗੁਰ ਪਹਿ ਕਰਿ ਬਿਨੰਤੀ ਮਿਲਹੁ ਸਾਚਿ ਪਿਆਰੀਆ ॥
ਧਨ ਭਾਇ ਭਗਤੀ ਦੇਖਿ ਪ੍ਰੀਤਮ ਕਾਮ ਕ੍ਰੋਧੁ ਨਿਵਾਰਿਆ ॥
ਨਾਨਕ ਮੁੰਧ ਨਵੇਲ ਸੁੰਦਰਿ ਦੇਖਿ ਪਿਰੁ ਸਾਧਾਰਿਆ ॥੧॥
ਸਚਿ ਨਵੇਲੜੀਏ ਜੋਬਨਿ ਬਾਲੀ ਰਾਮ ॥
ਆਉ ਨ ਜਾਉ ਕਹੀ ਅਪਨੇ ਸਹ ਨਾਲੀ ਰਾਮ ॥
ਨਾਹ ਅਪਨੇ ਸੰਗਿ ਦਾਸੀ ਮੈ ਭਗਤਿ ਹਰਿ ਕੀ ਭਾਵਏ ॥
ਅਗਾਧਿ ਬੋਧਿ ਅਕਥੁ ਕਥੀਐ ਸਹਜਿ ਪ੍ਰਭ ਗੁਣ ਗਾਵਏ ॥
ਰਾਮ ਨਾਮ ਰਸਾਲ ਰਸੀਆ ਰਵੈ ਸਾਚਿ ਪਿਆਰੀਆ ॥
ਗੁਰਿ ਸਬਦੁ ਦੀਆ ਦਾਨੁ ਕੀਆ ਨਾਨਕਾ ਵੀਚਾਰੀਆ ॥੨॥
ਸ੍ਰੀਧਰ ਮੋਹਿਅੜੀ ਪਿਰ ਸੰਗਿ ਸੂਤੀ ਰਾਮ ॥
ਗੁਰ ਕੈ ਭਾਇ ਚਲੋ ਸਾਚਿ ਸੰਗੂਤੀ ਰਾਮ ॥
ਧਨ ਸਾਚਿ ਸੰਗੂਤੀ ਹਰਿ ਸੰਗਿ ਸੂਤੀ ਸੰਗਿ ਸਖੀ ਸਹੇਲੀਆ ॥
ਇਕ ਭਾਇ ਇਕ ਮਨਿ ਨਾਮੁ ਵਸਿਆ ਸਤਿਗੁਰੂ ਹਮ ਮੇਲੀਆ ॥
ਦਿਨੁ ਰੈਣਿ ਘੜੀ ਨ ਚਸਾ ਵਿਸਰੈ ਸਾਸਿ ਸਾਸਿ ਨਿਰੰਜਨੋ ॥
ਸਬਦਿ ਜੋਤਿ ਜਗਾਇ ਦੀਪਕੁ ਨਾਨਕਾ ਭਉ ਭੰਜਨੋ ॥੩॥
ਜੋਤਿ ਸਬਾਇੜੀਏ ਤ੍ਰਿਭਵਣ ਸਾਰੇ ਰਾਮ ॥
ਘਟਿ ਘਟਿ ਰਵਿ ਰਹਿਆ ਅਲਖ ਅਪਾਰੇ ਰਾਮ ॥
ਅਲਖ ਅਪਾਰ ਅਪਾਰੁ ਸਾਚਾ ਆਪੁ ਮਾਰਿ ਮਿਲਾਈਐ ॥
ਹਉਮੈ ਮਮਤਾ ਲੋਭੁ ਜਾਲਹੁ ਸਬਦਿ ਮੈਲੁ ਚੁਕਾਈਐ ॥
ਦਰਿ ਜਾਇ ਦਰਸਨੁ ਕਰੀ ਭਾਣੈ ਤਾਰਿ ਤਾਰਣਹਾਰਿਆ ॥
ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਚਾਖਿ ਤ੍ਰਿਪਤੀ ਨਾਨਕਾ ਉਰ ਧਾਰਿਆ ॥੪॥੧॥
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ਮੁੰਧ ਨਵੇਲੜੀਆ ਗੋਇਲਿ ਆਈ ਰਾਮ ॥
ਮਟੁਕੀ ਡਾਰਿ ਧਰੀ ਹਰਿ ਲਿਵ ਲਾਈ ਰਾਮ ॥
ਲਿਵ ਲਾਇ ਹਰਿ ਸਿਉ ਰਹੀ ਗੋਇਲਿ ਸਹਜਿ ਸਬਦਿ ਸੀਗਾਰੀਆ ॥
ਕਰ ਜੋੜਿ ਗੁਰ ਪਹਿ ਕਰਿ ਬਿਨੰਤੀ ਮਿਲਹੁ ਸਾਚਿ ਪਿਆਰੀਆ ॥
ਧਨ ਭਾਇ ਭਗਤੀ ਦੇਖਿ ਪ੍ਰੀਤਮ ਕਾਮ ਕ੍ਰੋਧੁ ਨਿਵਾਰਿਆ ॥
ਨਾਨਕ ਮੁੰਧ ਨਵੇਲ ਸੁੰਦਰਿ ਦੇਖਿ ਪਿਰੁ ਸਾਧਾਰਿਆ ॥੧॥
ਸਚਿ ਨਵੇਲੜੀਏ ਜੋਬਨਿ ਬਾਲੀ ਰਾਮ ॥
ਆਉ ਨ ਜਾਉ ਕਹੀ ਅਪਨੇ ਸਹ ਨਾਲੀ ਰਾਮ ॥
ਨਾਹ ਅਪਨੇ ਸੰਗਿ ਦਾਸੀ ਮੈ ਭਗਤਿ ਹਰਿ ਕੀ ਭਾਵਏ ॥
ਅਗਾਧਿ ਬੋਧਿ ਅਕਥੁ ਕਥੀਐ ਸਹਜਿ ਪ੍ਰਭ ਗੁਣ ਗਾਵਏ ॥
ਰਾਮ ਨਾਮ ਰਸਾਲ ਰਸੀਆ ਰਵੈ ਸਾਚਿ ਪਿਆਰੀਆ ॥
ਗੁਰਿ ਸਬਦੁ ਦੀਆ ਦਾਨੁ ਕੀਆ ਨਾਨਕਾ ਵੀਚਾਰੀਆ ॥੨॥
ਸ੍ਰੀਧਰ ਮੋਹਿਅੜੀ ਪਿਰ ਸੰਗਿ ਸੂਤੀ ਰਾਮ ॥
ਗੁਰ ਕੈ ਭਾਇ ਚਲੋ ਸਾਚਿ ਸੰਗੂਤੀ ਰਾਮ ॥
ਧਨ ਸਾਚਿ ਸੰਗੂਤੀ ਹਰਿ ਸੰਗਿ ਸੂਤੀ ਸੰਗਿ ਸਖੀ ਸਹੇਲੀਆ ॥
ਇਕ ਭਾਇ ਇਕ ਮਨਿ ਨਾਮੁ ਵਸਿਆ ਸਤਿਗੁਰੂ ਹਮ ਮੇਲੀਆ ॥
ਦਿਨੁ ਰੈਣਿ ਘੜੀ ਨ ਚਸਾ ਵਿਸਰੈ ਸਾਸਿ ਸਾਸਿ ਨਿਰੰਜਨੋ ॥
ਸਬਦਿ ਜੋਤਿ ਜਗਾਇ ਦੀਪਕੁ ਨਾਨਕਾ ਭਉ ਭੰਜਨੋ ॥੩॥
ਜੋਤਿ ਸਬਾਇੜੀਏ ਤ੍ਰਿਭਵਣ ਸਾਰੇ ਰਾਮ ॥
ਘਟਿ ਘਟਿ ਰਵਿ ਰਹਿਆ ਅਲਖ ਅਪਾਰੇ ਰਾਮ ॥
ਅਲਖ ਅਪਾਰ ਅਪਾਰੁ ਸਾਚਾ ਆਪੁ ਮਾਰਿ ਮਿਲਾਈਐ ॥
ਹਉਮੈ ਮਮਤਾ ਲੋਭੁ ਜਾਲਹੁ ਸਬਦਿ ਮੈਲੁ ਚੁਕਾਈਐ ॥
ਦਰਿ ਜਾਇ ਦਰਸਨੁ ਕਰੀ ਭਾਣੈ ਤਾਰਿ ਤਾਰਣਹਾਰਿਆ ॥
ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਚਾਖਿ ਤ੍ਰਿਪਤੀ ਨਾਨਕਾ ਉਰ ਧਾਰਿਆ ॥੪॥੧॥
बिलावलु महला १ छंत दखणी
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
मुंध नवेलड़ीआ गोइलि आई राम ॥
मटुकी डारि धरी हरि लिव लाई राम ॥
लिव लाइ हरि सिउ रही गोइलि सहजि सबदि सीगारीआ ॥
कर जोड़ि गुर पहि करि बिनंती मिलहु साचि पिआरीआ ॥
धन भाइ भगती देखि प्रीतम काम क्रोधु निवारिआ ॥
नानक मुंध नवेल सुंदरि देखि पिरु साधारिआ ॥१॥
सचि नवेलड़ीए जोबनि बाली राम ॥
आउ न जाउ कही अपने सह नाली राम ॥
नाह अपने संगि दासी मै भगति हरि की भावए ॥
अगाधि बोधि अकथु कथीऐ सहजि प्रभ गुण गावए ॥
राम नाम रसाल रसीआ रवै साचि पिआरीआ ॥
गुरि सबदु दीआ दानु कीआ नानका वीचारीआ ॥२॥
स्रीधर मोहिअड़ी पिर संगि सूती राम ॥
गुर कै भाइ चलो साचि संगूती राम ॥
धन साचि संगूती हरि संगि सूती संगि सखी सहेलीआ ॥
इक भाइ इक मनि नामु वसिआ सतिगुरू हम मेलीआ ॥
दिनु रैणि घड़ी न चसा विसरै सासि सासि निरंजनो ॥
सबदि जोति जगाइ दीपकु नानका भउ भंजनो ॥३॥
जोति सबाइड़ीए त्रिभवण सारे राम ॥
घटि घटि रवि रहिआ अलख अपारे राम ॥
अलख अपार अपारु साचा आपु मारि मिलाईऐ ॥
हउमै ममता लोभु जालहु सबदि मैलु चुकाईऐ ॥
दरि जाइ दरसनु करी भाणै तारि तारणहारिआ ॥
हरि नामु अंम्रितु चाखि त्रिपती नानका उर धारिआ ॥४॥१॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
मुंध नवेलड़ीआ गोइलि आई राम ॥
मटुकी डारि धरी हरि लिव लाई राम ॥
लिव लाइ हरि सिउ रही गोइलि सहजि सबदि सीगारीआ ॥
कर जोड़ि गुर पहि करि बिनंती मिलहु साचि पिआरीआ ॥
धन भाइ भगती देखि प्रीतम काम क्रोधु निवारिआ ॥
नानक मुंध नवेल सुंदरि देखि पिरु साधारिआ ॥१॥
सचि नवेलड़ीए जोबनि बाली राम ॥
आउ न जाउ कही अपने सह नाली राम ॥
नाह अपने संगि दासी मै भगति हरि की भावए ॥
अगाधि बोधि अकथु कथीऐ सहजि प्रभ गुण गावए ॥
राम नाम रसाल रसीआ रवै साचि पिआरीआ ॥
गुरि सबदु दीआ दानु कीआ नानका वीचारीआ ॥२॥
स्रीधर मोहिअड़ी पिर संगि सूती राम ॥
गुर कै भाइ चलो साचि संगूती राम ॥
धन साचि संगूती हरि संगि सूती संगि सखी सहेलीआ ॥
इक भाइ इक मनि नामु वसिआ सतिगुरू हम मेलीआ ॥
दिनु रैणि घड़ी न चसा विसरै सासि सासि निरंजनो ॥
सबदि जोति जगाइ दीपकु नानका भउ भंजनो ॥३॥
जोति सबाइड़ीए त्रिभवण सारे राम ॥
घटि घटि रवि रहिआ अलख अपारे राम ॥
अलख अपार अपारु साचा आपु मारि मिलाईऐ ॥
हउमै ममता लोभु जालहु सबदि मैलु चुकाईऐ ॥
दरि जाइ दरसनु करी भाणै तारि तारणहारिआ ॥
हरि नामु अंम्रितु चाखि त्रिपती नानका उर धारिआ ॥४॥१॥
हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला १ छंत दखणी ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ थोड़े दिनों के बसेरे वाले इस जगत में आ के जो जीव-स्त्री विकारों से बची रहती है। जिसने परमात्मा (के चरणों) में सुरति जोड़ी हुई है और शरीर का मोह त्याग दिया है। जो प्रभू चरणों में प्रीति जोड़ के इस जगत में जीवन बिताती है। वह आत्मिक अडोलता में टिक के सतिगुरू के शबद की बरकति से अपना जीवन सुंदर बना लेती है। वह (सदा दोनों) हाथ जोड़ के गुरू के पास विनती करती रहती है (कि। हे गुरू ! मुझे) मिल (ताकि मैं तेरी कृपा से) सदा-स्थिर प्रभू के नाम में जुड़ के उसको प्यार कर सकूँ। ऐसी जीव-स्त्री प्रीतम-प्रभू की भक्ति के द्वारा प्रीतम प्रभू के प्रेम में टिक के उसका दर्शन करके काम-क्रोध (आदि विकारों को अपने अंदर से) दूर कर लेती है। हे नानक ! पवित्र और सुंदर जीवन वाली वह जीव-स्त्री प्रभू-पति के दीदार करके (उसकी याद को) अपने हृदय का आसरा बना लेती है। 1। हे सदा-स्थिर प्रभू में जुड़ के विकारों से बची हुई जीव स्त्री ! जवानी में भी भोले स्वभाव वाली (बनी रह; अहंकार छोड़ के) अपने पति-प्रभू (के चरणों) में टिकी रह (देखना। उसका पल्ला छोड़ के) किसी और जजगह ना भटकती फिरना। वही दासी (सौभाग्य है जो) अपने पति की संगति में रहती है। (हे सखिए !) मुझे भी प्रभू-पति की भक्ति प्यारी लगती है। (जो जीव-स्त्री) आत्मिक अडोलता में टिक के प्रभू के गुण गाती है (वह दासी अपने पति-प्रभू की संगति में शोभा पाती है)। (सो। सहेली ! गुरू के बख्शे) ज्ञान से (गुणों के) अथाह (समुद्र-) प्रभू में (डुबकी लगा के) उस प्रभू के गुणगान करने चाहिए। वह प्रभू ऐसे स्वरूप वाला है जिसका बयान नहीं हो सकता। रसों के श्रोत। रसों के मालिक प्रभू उस जीव-स्त्री को अपने चरणों में जोड़ता है जो उसके सदा-स्थिर नाम में प्यार डालती है। हे नानक ! जिस सौभाग्यवती जीव-स्त्री को गुरू ने परमात्मा की सिफतसालाह का शबद दिया। जिसको यह ऊँची दाति बख्शी। वह उच्च विचार के मालिक बन जाती है। 2। (वह जीव-स्त्री) माया के पति प्रभू के प्यार-वश में हो जाती है वह जीव-स्त्री पति-प्रभू के चरणों में जुड़ी रहती है। (हे भाई ! जिस जीव-स्त्री की) जीवन-चाल गुरू के अनुसार रहती है जो जीव-स्त्री सदा कायम रहने वाले परमात्मा (की याद) में लीन रहती है। हे भाई ! सत्संगी सहेलियों के साथ मिल के जो जीव-स्त्री सदा-स्थिर प्रभू (की याद) में लीन होती है। प्रभू-पति के चरणों में जुड़ती है। परमात्मा के प्यार में एकाग्र-मन टिकने के कारण (उसके अंदर परमात्मा का) नाम आ बसता है (उसके अंदर ये श्रद्धा बन जाती है कि) गुरू ने (मुझे) प्रभू के चरणों में मिलाया है। (उस जीव-स्त्री को) दिन-रात घड़ी-पल (किसी वक्त भी परमात्मा की याद) नहीं भूलती। (वह जीव-स्त्री) हरेक सांस के साथ निरंजन-प्रभू (को याद रखती है)। हे नानक ! (कह- हे भाई !) गुरू के शबद के द्वारा (अपने अंदर ईश्वरीय) ज्योति जगा के दीया जला के (वह जीव-स्त्री अपने अंदर से हरेक) डर-सहम नाश कर लेती है। 3। हे सहेलीए ! (परमात्मा की) ज्योति हर जगह (पसरी हुई) है। वह प्रभू सारे जगत की संभाल करता है। वह अदृष्य और बेअंत प्रभू हरेक शरीर में मौजूद है। हे सहेली ! वह परमात्मा अदृष्य है बेअंत है। बेअंत है। वह सदा कायम रहने वाला है। स्वै भाव मार के (ही उसको) मिला जा सकता है। हे सहेली ! (अपने अंदर से) अहंकार। माया जोड़ने की कसक और लालच जला दे (सहेलिए ! अहंकार ममता लोभ आदि की) मैल गुरू के शबद से ही समाप्त की जा सकती है। (सो। हे सहेलिए ! गुरू के शबद में जुड़ के परमात्मा की) रजा में (चल के जीवन व्यतीत कर। और अरदास किया कर-) हे तारणहार प्रभू ! (मुझे विकारों के समुंद्र से) पार लंघा ले (इस तरह। हे सहेलिए ! गुरू के) दर पर जा के (परमात्मा के) दर्शन कर लेगी। हे नानक ! (कह- हे सहेली ! जो जीव-स्त्री प्रभू का नाम अपने) हृदय में बसाती है वह आत्मिक जीवन देने वाला हरी-नाम जल चख के (माया की तृष्णा से) तृप्त हो जाती है। 4। 1।
ਬਿਲਾਵਲੁ ਮਹਲਾ ੧ ॥
ਮੈ ਮਨਿ ਚਾਉ ਘਣਾ ਸਾਚਿ ਵਿਗਾਸੀ ਰਾਮ ॥
ਮੋਹੀ ਪ੍ਰੇਮ ਪਿਰੇ ਪ੍ਰਭਿ ਅਬਿਨਾਸੀ ਰਾਮ ॥
ਅਵਿਗਤੋ ਹਰਿ ਨਾਥੁ ਨਾਥਹ ਤਿਸੈ ਭਾਵੈ ਸੋ ਥੀਐ ॥
ਕਿਰਪਾਲੁ ਸਦਾ ਦਇਆਲੁ ਦਾਤਾ ਜੀਆ ਅੰਦਰਿ ਤੂੰ ਜੀਐ ॥
ਮੈ ਮਨਿ ਚਾਉ ਘਣਾ ਸਾਚਿ ਵਿਗਾਸੀ ਰਾਮ ॥
ਮੋਹੀ ਪ੍ਰੇਮ ਪਿਰੇ ਪ੍ਰਭਿ ਅਬਿਨਾਸੀ ਰਾਮ ॥
ਅਵਿਗਤੋ ਹਰਿ ਨਾਥੁ ਨਾਥਹ ਤਿਸੈ ਭਾਵੈ ਸੋ ਥੀਐ ॥
ਕਿਰਪਾਲੁ ਸਦਾ ਦਇਆਲੁ ਦਾਤਾ ਜੀਆ ਅੰਦਰਿ ਤੂੰ ਜੀਐ ॥
बिलावलु महला १ ॥
मै मनि चाउ घणा साचि विगासी राम ॥
मोही प्रेम पिरे प्रभि अबिनासी राम ॥
अविगतो हरि नाथु नाथह तिसै भावै सो थीऐ ॥
किरपालु सदा दइआलु दाता जीआ अंदरि तूं जीऐ ॥
मै मनि चाउ घणा साचि विगासी राम ॥
मोही प्रेम पिरे प्रभि अबिनासी राम ॥
अविगतो हरि नाथु नाथह तिसै भावै सो थीऐ ॥
किरपालु सदा दइआलु दाता जीआ अंदरि तूं जीऐ ॥
हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला १ ॥ हे सहेली ! अविनाशी प्यारे प्रभू ने (मेरे मन को अपने) प्रेम (की खींच से) मस्त कर रखा है। सदा स्थिर रहने वाले परमात्मा (के नाम) में (टिक के) मेरा मन खिला रहता है। मेरे मन में बहुत चाव बना रहता है। हे सहेली ! वह परमात्मा इन आँखों से नहीं दिखता। पर वह परमात्मा (बड़े-बड़े) नाथों का (भी) नाथ है। (जगत में) वह ही होता है। जो उस परमात्मा को ही अच्छा लगता है। अटल परमात्मा नाथों का नाथ है, जो उसे भाता है, वही होता है। हे प्रभू ! तू मेहर का समुंद्र है। तू सदा ही दया का श्रोत है। तू ही सब दातें देने वाला है। तू ही सब जीवों के अंदर का प्राण है।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 843 है, राग बिलावल का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)।
गुरु नानक की वाणी, observational, direct, बिना ornament।
दिल्ली-NCR की office-canteen की 1 बजे की दोपहर।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 40 पंक्तियों का है, 3 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 843” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: बिलावल राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 844 →, पीछे का: ← अंग 842।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।