भगति वछलु हरि नामु है गुरमुखि हरि लीना राम ॥ बिनु हरि नाम न जीवदे जिउ जल बिनु मीना राम ॥ सफल जनमु हरि पाइआ नानक प्रभि कीना राम ॥4॥1॥3॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।
हिन्दी अर्थ: वह मनुष्य गुरू की शरण पड़ करउस परमात्मा में लीन रहता है जिसका नाम है ‘भक्ति को प्यार करने वाला’। हे भाई ! जैसे मछली पानी के बिना नहीं रह सकती। वैसे ही (परमात्मा में लीन रहने वाले मनुष्य) परमात्मा (की याद) के बिना नहीं जी सकते। हे नानक ! (गुरू के द्वारा जिस मनुष्य ने) प्रभू का मिलाप हासिल कर लिया। प्रभू ने उसकी जिंदगी कामयाब बना दी। 4। 1। 3।
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।
हिन्दी अर्थ: सलोक। हे भाई ! (असल) मित्र परमात्मा को ढूँढ लो। (जिसके) मन में वह आ बसता है। वह मनुष्य भाग्यशाली हो जाता है। हे नानक ! (जिस मनुष्य को) पूरे गुरू ने परमात्मा के दर्शन करवा दिए उसकी सुरति परमात्मा में जुड़ गई। 1।
छंत ॥ मेरा हरि प्रभु रावणि आईआ हउमै बिखु झागे राम ॥ गुरमति आपु मिटाइआ हरि हरि लिव लागे राम ॥ अंतरि कमलु परगासिआ गुर गिआनी जागे राम ॥ जन नानक हरि प्रभु पाइआ पूरै वडभागे राम ॥1॥ हरि प्रभु हरि मनि भाइआ हरि नामि वधाई राम ॥ गुरि पूरै प्रभु पाइआ हरि हरि लिव लाई राम ॥ अगिआनु अंधेरा कटिआ जोति परगटिआई राम ॥ जन नानक नामु अधारु है हरि नामि समाई राम ॥2॥ धन हरि प्रभि पिआरै रावीआ जां हरि प्रभ भाई राम ॥ अखी प्रेम कसाईआ जिउ बिलक मसाई राम ॥ गुरि पूरै हरि मेलिआ हरि रसि आघाई राम ॥ जन नानक नामि विगसिआ हरि हरि लिव लाई राम ॥3॥ हम मूरख मुगध मिलाइआ हरि किरपा धारी राम ॥ धनु धंनु गुरू साबासि है जिनि हउमै मारी राम ॥ जिन॑ वडभागीआ वडभागु है हरि हरि उर धारी राम ॥ जन नानक नामु सलाहि तू नामे बलिहारी राम ॥4॥2॥4॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।
हिन्दी अर्थ: छंद ॥ हे सहेलिए ! (जो जीव-स्त्री) आत्मिक मौत लाने वाले अहंकार के जहर (से भरे हुए समुंद्र) को मुश्किल से पार करके प्रभू-पति को मिलने के लिए (गुरू की शरण) आती है। गुरू की मति पर चल क रवह (अपने अंदर से) स्वै भाव मिटाती है। (और। फिर) उसकी लगन परमात्मा में लग जाती है। गुरू से मिली आत्मिक जीवन की सूझ से वह (विकारों के हमलों की ओर से सदा) सचेत रहती हैं। उसके अंदर हृदय-कमल-पुष्प् खिल उठता है। हे दास नानक ! पूर्ण सौभाग्य से ही परमात्मा मिलता है। 1। हे भाई ! (पूरे गुरू के द्वारा जिस मनुष्य के) मन में हरी-प्रभू प्यारा लगने लग जाता है। हरी-नाम की बरकति से (उसके अंदर) चढ़दीकला (उत्साह भरी आत्मिक अवस्था) बनी रहती है। पूरे गुरू के माध्यम से जिसे प्रभू मिल गया। वह हर वक्त परमात्मा में सुरति जोड़े रखता है। (उसके अंदर से) आत्मिक जीवन की ओर से बेसमझी (का) अंधकार मिट जाता है। (उसके अंदर) ईश्वरीय ज्योति जाग पड़ती है। हे दास नानक ! (कह-) उस मनुष्य के लिए परमात्मा का नाम (जिंदगी का) आसरा बन जाता है। परमात्मा के नाम में उसकी लीनता बनी रहती है। 2। हे भाई ! जब कोई (जीव-स्त्री) प्रभू का अच्छी लगी। (तब) प्यारे प्रभू ने (उस) जीव-स्त्री को अपने साथ मिला लिया। (उस जीव-स्त्री की) आँखें प्यार में ऐसे आकर्षित हुई। जैसे बिल्ली (की आँखे) चूहे की और (खिच जाती हैं)। हे दास नानक ! पूरे गुरू ने (जिस जीव-स्त्री को) परमात्मा के साथ मिला दिया। (वह जीव-स्त्री) हरी-नाम-रस के स्वाद की बरकति से (माया की तृष्णा की ओर से) तृप्त हो गई। हरी-नाम के कारण उसका हृदय-कमल खिल उठता है। वह सदा परमात्मा में सुरति जोड़े रखता है। 3। हे भाई ! परमात्मा ने (मेरे पर) मेहर की है। और मुझ मूर्ख को अंजान को (गुरू के द्वारा अपने चरणों में) जोड़ लिया है। (मेरा) गुरू सराहनीय है। गुरू को साबाश है। जिसने (मेरे अंदर से) अहंकार को दूर कर दिया है। हे भाई ! जिन बहुत भाग्यशालियों की किस्मत जागती है। वह परमात्मा को अपने हृदय में बसाती हैं। हे दास नानक ! (आप भी) परमात्मा का नाम सराहा कर। नाम से सदके हुआ कर। 4। 2। 4।
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।
हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला 5 छंत सतिगुर प्रसादि ॥ हे सहेलिए ! प्यारे प्रभू की सिफत सालाह का गीत गाने से (मन में) खुशी का रंग-ढंग बन जाता है। उस कभी ना मरने वाले पति-प्रभू (का नाम) सुनने से मन में चाव पैदा हो जाता है। (जब) बहुत किस्मत से (किसी जीव-स्त्री के) मन में परमात्मा-पति का प्यार पैदा होता है। (तब वह उतावली हो-हो पड़ती है उस) सारे गुणों के मालिक प्रभू-पति को कब मिला जा सकेगा। (उसके आगे यह उक्तर मिलता है- अगर) आत्मिक अडोलता में लीन रहें तो परमात्मा पति मिल जाता है। (वह भाग्यशाली जीव-स्त्री बार-बार पूछती है-) हे सहेलिए ! मुझे बुद्धि दे कि किस तरीके से प्रभू-पति मिल सकता है (हे सहेलिए ! बता) मैं दिन-रात खड़ी हुई आपकी सेवा करूँगी। नानक (भी) विनती करता है- (हे प्रभू ! मेरे ऊपर) मेहर कर। (मुझे अपने) पल्ले से लगाए रख। 1। हे भाई ! (परमात्मा का नाम किमती रत्न है। जो मनुष्य यह) हरी-नाम का व्यापर करता है (उसके अंदर) धीरज पैदा हो जाता है। पर। ये नाम-रत्न (कोई दुर्लभ) खोज करने वाला मनुष्य तलाश करके संत-जनों से ही हासिल करता है। जिस भाग्यशाली मनुष्य को प्यारे संत-जन मिल जाते हैं। (वही) मेहर करके (उसको) अकथ प्रभू की सिफत सालाह की बातें सुनाते हैं। हे भाई ! (संत-जनों की संगति में रह के) सुरति जोड़ के। मन लगा के प्रभू-चरणों से प्यार डाल के (परमात्मा का) नाम सिमरा कर। प्रभू के दर पर (दोनों) हाथ जोड़ के अरदास किया कर। (जो मनुष्य नित्य अरदास करता रहता है। उसको मानस जीवन की) कमाई (के तौर पर) परमात्मा की सिफत-सालाह (की दाति) मिलती है। हे अपहुँच और अथाह प्रभू ! नानक (आपके दर पर) विनती करता है- मैं आपका दास हूँ। आप मेरा मालिक है (मुझे अपनी सिफत-सालाह की दाति बख्श)। 2।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। सूही, बिलावल, और गोंड राग का क्षेत्र। गुरु राम दास की ‘लावां’ इसी सूही राग में बँधी, सोलहवीं सदी के मध्य की।
गुरु रामदास जी 1574 में गुरु-गद्दी पर बैठे और 1581 तक रहे। उन्हीं ने अमृतसर शहर बसाया, हरमंदिर साहिब की नींव रखी। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य प्रेम की तस्वीरें बार-बार लौटती हैं। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्रीय शब्द-समूह है, उन्हीं की रचना है।
इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “वह मनुष्य गुरू की शरण पड़ करउस परमात्मा में लीन रहता है जिसका नाम है ‘भक्ति को प्यार करने वाला’।”
एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।