अंग
838
राग बिलावल
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਕਰਿ ਦਇਆ ਲੇਹੁ ਲੜਿ ਲਾਇ ॥
ਨਾਨਕਾ ਨਾਮੁ ਧਿਆਇ ॥੧॥
ਦੀਨਾ ਨਾਥ ਦਇਆਲ ਮੇਰੇ ਸੁਆਮੀ ਦੀਨਾ ਨਾਥ ਦਇਆਲ ॥
ਜਾਚਉ ਸੰਤ ਰਵਾਲ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਸੰਸਾਰੁ ਬਿਖਿਆ ਕੂਪ ॥
ਤਮ ਅਗਿਆਨ ਮੋਹਤ ਘੂਪ ॥
ਗਹਿ ਭੁਜਾ ਪ੍ਰਭ ਜੀ ਲੇਹੁ ॥
ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਅਪੁਨਾ ਦੇਹੁ ॥
ਪ੍ਰਭ ਤੁਝ ਬਿਨਾ ਨਹੀ ਠਾਉ ॥
ਨਾਨਕਾ ਬਲਿ ਬਲਿ ਜਾਉ ॥੨॥
ਲੋਭਿ ਮੋਹਿ ਬਾਧੀ ਦੇਹ ॥
ਬਿਨੁ ਭਜਨ ਹੋਵਤ ਖੇਹ ॥
ਜਮਦੂਤ ਮਹਾ ਭਇਆਨ ॥
ਚਿਤ ਗੁਪਤ ਕਰਮਹਿ ਜਾਨ ॥
ਦਿਨੁ ਰੈਨਿ ਸਾਖਿ ਸੁਨਾਇ ॥
ਨਾਨਕਾ ਹਰਿ ਸਰਨਾਇ ॥੩॥
ਭੈ ਭੰਜਨਾ ਮੁਰਾਰਿ ॥
ਕਰਿ ਦਇਆ ਪਤਿਤ ਉਧਾਰਿ ॥
ਮੇਰੇ ਦੋਖ ਗਨੇ ਨ ਜਾਹਿ ॥
ਹਰਿ ਬਿਨਾ ਕਤਹਿ ਸਮਾਹਿ ॥
ਗਹਿ ਓਟ ਚਿਤਵੀ ਨਾਥ ॥
ਨਾਨਕਾ ਦੇ ਰਖੁ ਹਾਥ ॥੪॥
ਹਰਿ ਗੁਣ ਨਿਧੇ ਗੋਪਾਲ ॥
ਸਰਬ ਘਟ ਪ੍ਰਤਿਪਾਲ ॥
ਮਨਿ ਪ੍ਰੀਤਿ ਦਰਸਨ ਪਿਆਸ ॥
ਗੋਬਿੰਦ ਪੂਰਨ ਆਸ ॥
ਇਕ ਨਿਮਖ ਰਹਨੁ ਨ ਜਾਇ ॥
ਵਡ ਭਾਗਿ ਨਾਨਕ ਪਾਇ ॥੫॥
ਪ੍ਰਭ ਤੁਝ ਬਿਨਾ ਨਹੀ ਹੋਰ ॥
ਮਨਿ ਪ੍ਰੀਤਿ ਚੰਦ ਚਕੋਰ ॥
ਜਿਉ ਮੀਨ ਜਲ ਸਿਉ ਹੇਤੁ ॥
ਅਲਿ ਕਮਲ ਭਿੰਨੁ ਨ ਭੇਤੁ ॥
ਜਿਉ ਚਕਵੀ ਸੂਰਜ ਆਸ ॥
ਨਾਨਕ ਚਰਨ ਪਿਆਸ ॥੬॥
ਜਿਉ ਤਰੁਨਿ ਭਰਤ ਪਰਾਨ ॥
ਜਿਉ ਲੋਭੀਐ ਧਨੁ ਦਾਨੁ ॥
ਜਿਉ ਦੂਧ ਜਲਹਿ ਸੰਜੋਗੁ ॥
ਜਿਉ ਮਹਾ ਖੁਧਿਆਰਥ ਭੋਗੁ ॥
ਜਿਉ ਮਾਤ ਪੂਤਹਿ ਹੇਤੁ ॥
ਹਰਿ ਸਿਮਰਿ ਨਾਨਕ ਨੇਤ ॥੭॥
ਜਿਉ ਦੀਪ ਪਤਨ ਪਤੰਗ ॥
ਜਿਉ ਚੋਰੁ ਹਿਰਤ ਨਿਸੰਗ ॥
ਮੈਗਲਹਿ ਕਾਮੈ ਬੰਧੁ ॥
ਜਿਉ ਗ੍ਰਸਤ ਬਿਖਈ ਧੰਧੁ ॥
ਜਿਉ ਜੂਆਰ ਬਿਸਨੁ ਨ ਜਾਇ ॥
ਹਰਿ ਨਾਨਕ ਇਹੁ ਮਨੁ ਲਾਇ ॥੮॥
ਕੁਰੰਕ ਨਾਦੈ ਨੇਹੁ ॥
ਚਾਤ੍ਰਿਕੁ ਚਾਹਤ ਮੇਹੁ ॥
ਜਨ ਜੀਵਨਾ ਸਤਸੰਗਿ ॥
ਗੋਬਿਦੁ ਭਜਨਾ ਰੰਗਿ ॥
ਰਸਨਾ ਬਖਾਨੈ ਨਾਮੁ ॥
ਨਾਨਕ ਦਰਸਨ ਦਾਨੁ ॥੯॥
ਗੁਨ ਗਾਇ ਸੁਨਿ ਲਿਖਿ ਦੇਇ ॥
ਸੋ ਸਰਬ ਫਲ ਹਰਿ ਲੇਇ ॥
ਕੁਲ ਸਮੂਹ ਕਰਤ ਉਧਾਰੁ ॥
ਸੰਸਾਰੁ ਉਤਰਸਿ ਪਾਰਿ ॥
ਹਰਿ ਚਰਨ ਬੋਹਿਥ ਤਾਹਿ ॥
ਮਿਲਿ ਸਾਧਸੰਗਿ ਜਸੁ ਗਾਹਿ ॥
ਹਰਿ ਪੈਜ ਰਖੈ ਮੁਰਾਰਿ ॥
ਹਰਿ ਨਾਨਕ ਸਰਨਿ ਦੁਆਰਿ ॥੧੦॥੨॥
ਨਾਨਕਾ ਨਾਮੁ ਧਿਆਇ ॥੧॥
ਦੀਨਾ ਨਾਥ ਦਇਆਲ ਮੇਰੇ ਸੁਆਮੀ ਦੀਨਾ ਨਾਥ ਦਇਆਲ ॥
ਜਾਚਉ ਸੰਤ ਰਵਾਲ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਸੰਸਾਰੁ ਬਿਖਿਆ ਕੂਪ ॥
ਤਮ ਅਗਿਆਨ ਮੋਹਤ ਘੂਪ ॥
ਗਹਿ ਭੁਜਾ ਪ੍ਰਭ ਜੀ ਲੇਹੁ ॥
ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਅਪੁਨਾ ਦੇਹੁ ॥
ਪ੍ਰਭ ਤੁਝ ਬਿਨਾ ਨਹੀ ਠਾਉ ॥
ਨਾਨਕਾ ਬਲਿ ਬਲਿ ਜਾਉ ॥੨॥
ਲੋਭਿ ਮੋਹਿ ਬਾਧੀ ਦੇਹ ॥
ਬਿਨੁ ਭਜਨ ਹੋਵਤ ਖੇਹ ॥
ਜਮਦੂਤ ਮਹਾ ਭਇਆਨ ॥
ਚਿਤ ਗੁਪਤ ਕਰਮਹਿ ਜਾਨ ॥
ਦਿਨੁ ਰੈਨਿ ਸਾਖਿ ਸੁਨਾਇ ॥
ਨਾਨਕਾ ਹਰਿ ਸਰਨਾਇ ॥੩॥
ਭੈ ਭੰਜਨਾ ਮੁਰਾਰਿ ॥
ਕਰਿ ਦਇਆ ਪਤਿਤ ਉਧਾਰਿ ॥
ਮੇਰੇ ਦੋਖ ਗਨੇ ਨ ਜਾਹਿ ॥
ਹਰਿ ਬਿਨਾ ਕਤਹਿ ਸਮਾਹਿ ॥
ਗਹਿ ਓਟ ਚਿਤਵੀ ਨਾਥ ॥
ਨਾਨਕਾ ਦੇ ਰਖੁ ਹਾਥ ॥੪॥
ਹਰਿ ਗੁਣ ਨਿਧੇ ਗੋਪਾਲ ॥
ਸਰਬ ਘਟ ਪ੍ਰਤਿਪਾਲ ॥
ਮਨਿ ਪ੍ਰੀਤਿ ਦਰਸਨ ਪਿਆਸ ॥
ਗੋਬਿੰਦ ਪੂਰਨ ਆਸ ॥
ਇਕ ਨਿਮਖ ਰਹਨੁ ਨ ਜਾਇ ॥
ਵਡ ਭਾਗਿ ਨਾਨਕ ਪਾਇ ॥੫॥
ਪ੍ਰਭ ਤੁਝ ਬਿਨਾ ਨਹੀ ਹੋਰ ॥
ਮਨਿ ਪ੍ਰੀਤਿ ਚੰਦ ਚਕੋਰ ॥
ਜਿਉ ਮੀਨ ਜਲ ਸਿਉ ਹੇਤੁ ॥
ਅਲਿ ਕਮਲ ਭਿੰਨੁ ਨ ਭੇਤੁ ॥
ਜਿਉ ਚਕਵੀ ਸੂਰਜ ਆਸ ॥
ਨਾਨਕ ਚਰਨ ਪਿਆਸ ॥੬॥
ਜਿਉ ਤਰੁਨਿ ਭਰਤ ਪਰਾਨ ॥
ਜਿਉ ਲੋਭੀਐ ਧਨੁ ਦਾਨੁ ॥
ਜਿਉ ਦੂਧ ਜਲਹਿ ਸੰਜੋਗੁ ॥
ਜਿਉ ਮਹਾ ਖੁਧਿਆਰਥ ਭੋਗੁ ॥
ਜਿਉ ਮਾਤ ਪੂਤਹਿ ਹੇਤੁ ॥
ਹਰਿ ਸਿਮਰਿ ਨਾਨਕ ਨੇਤ ॥੭॥
ਜਿਉ ਦੀਪ ਪਤਨ ਪਤੰਗ ॥
ਜਿਉ ਚੋਰੁ ਹਿਰਤ ਨਿਸੰਗ ॥
ਮੈਗਲਹਿ ਕਾਮੈ ਬੰਧੁ ॥
ਜਿਉ ਗ੍ਰਸਤ ਬਿਖਈ ਧੰਧੁ ॥
ਜਿਉ ਜੂਆਰ ਬਿਸਨੁ ਨ ਜਾਇ ॥
ਹਰਿ ਨਾਨਕ ਇਹੁ ਮਨੁ ਲਾਇ ॥੮॥
ਕੁਰੰਕ ਨਾਦੈ ਨੇਹੁ ॥
ਚਾਤ੍ਰਿਕੁ ਚਾਹਤ ਮੇਹੁ ॥
ਜਨ ਜੀਵਨਾ ਸਤਸੰਗਿ ॥
ਗੋਬਿਦੁ ਭਜਨਾ ਰੰਗਿ ॥
ਰਸਨਾ ਬਖਾਨੈ ਨਾਮੁ ॥
ਨਾਨਕ ਦਰਸਨ ਦਾਨੁ ॥੯॥
ਗੁਨ ਗਾਇ ਸੁਨਿ ਲਿਖਿ ਦੇਇ ॥
ਸੋ ਸਰਬ ਫਲ ਹਰਿ ਲੇਇ ॥
ਕੁਲ ਸਮੂਹ ਕਰਤ ਉਧਾਰੁ ॥
ਸੰਸਾਰੁ ਉਤਰਸਿ ਪਾਰਿ ॥
ਹਰਿ ਚਰਨ ਬੋਹਿਥ ਤਾਹਿ ॥
ਮਿਲਿ ਸਾਧਸੰਗਿ ਜਸੁ ਗਾਹਿ ॥
ਹਰਿ ਪੈਜ ਰਖੈ ਮੁਰਾਰਿ ॥
ਹਰਿ ਨਾਨਕ ਸਰਨਿ ਦੁਆਰਿ ॥੧੦॥੨॥
करि दइआ लेहु लड़ि लाइ ॥
नानका नामु धिआइ ॥१॥
दीना नाथ दइआल मेरे सुआमी दीना नाथ दइआल ॥
जाचउ संत रवाल ॥१॥ रहाउ ॥
संसारु बिखिआ कूप ॥
तम अगिआन मोहत घूप ॥
गहि भुजा प्रभ जी लेहु ॥
हरि नामु अपुना देहु ॥
प्रभ तुझ बिना नही ठाउ ॥
नानका बलि बलि जाउ ॥२॥
लोभि मोहि बाधी देह ॥
बिनु भजन होवत खेह ॥
जमदूत महा भइआन ॥
चित गुपत करमहि जान ॥
दिनु रैनि साखि सुनाइ ॥
नानका हरि सरनाइ ॥३॥
भै भंजना मुरारि ॥
करि दइआ पतित उधारि ॥
मेरे दोख गने न जाहि ॥
हरि बिना कतहि समाहि ॥
गहि ओट चितवी नाथ ॥
नानका दे रखु हाथ ॥४॥
हरि गुण निधे गोपाल ॥
सरब घट प्रतिपाल ॥
मनि प्रीति दरसन पिआस ॥
गोबिंद पूरन आस ॥
इक निमख रहनु न जाइ ॥
वड भागि नानक पाइ ॥५॥
प्रभ तुझ बिना नही होर ॥
मनि प्रीति चंद चकोर ॥
जिउ मीन जल सिउ हेतु ॥
अलि कमल भिंनु न भेतु ॥
जिउ चकवी सूरज आस ॥
नानक चरन पिआस ॥६॥
जिउ तरुनि भरत परान ॥
जिउ लोभीऐ धनु दानु ॥
जिउ दूध जलहि संजोगु ॥
जिउ महा खुधिआरथ भोगु ॥
जिउ मात पूतहि हेतु ॥
हरि सिमरि नानक नेत ॥७॥
जिउ दीप पतन पतंग ॥
जिउ चोरु हिरत निसंग ॥
मैगलहि कामै बंधु ॥
जिउ ग्रसत बिखई धंधु ॥
जिउ जूआर बिसनु न जाइ ॥
हरि नानक इहु मनु लाइ ॥८॥
कुरंक नादै नेहु ॥
चात्रिकु चाहत मेहु ॥
जन जीवना सतसंगि ॥
गोबिदु भजना रंगि ॥
रसना बखानै नामु ॥
नानक दरसन दानु ॥९॥
गुन गाइ सुनि लिखि देइ ॥
सो सरब फल हरि लेइ ॥
कुल समूह करत उधारु ॥
संसारु उतरसि पारि ॥
हरि चरन बोहिथ ताहि ॥
मिलि साधसंगि जसु गाहि ॥
हरि पैज रखै मुरारि ॥
हरि नानक सरनि दुआरि ॥१०॥२॥
नानका नामु धिआइ ॥१॥
दीना नाथ दइआल मेरे सुआमी दीना नाथ दइआल ॥
जाचउ संत रवाल ॥१॥ रहाउ ॥
संसारु बिखिआ कूप ॥
तम अगिआन मोहत घूप ॥
गहि भुजा प्रभ जी लेहु ॥
हरि नामु अपुना देहु ॥
प्रभ तुझ बिना नही ठाउ ॥
नानका बलि बलि जाउ ॥२॥
लोभि मोहि बाधी देह ॥
बिनु भजन होवत खेह ॥
जमदूत महा भइआन ॥
चित गुपत करमहि जान ॥
दिनु रैनि साखि सुनाइ ॥
नानका हरि सरनाइ ॥३॥
भै भंजना मुरारि ॥
करि दइआ पतित उधारि ॥
मेरे दोख गने न जाहि ॥
हरि बिना कतहि समाहि ॥
गहि ओट चितवी नाथ ॥
नानका दे रखु हाथ ॥४॥
हरि गुण निधे गोपाल ॥
सरब घट प्रतिपाल ॥
मनि प्रीति दरसन पिआस ॥
गोबिंद पूरन आस ॥
इक निमख रहनु न जाइ ॥
वड भागि नानक पाइ ॥५॥
प्रभ तुझ बिना नही होर ॥
मनि प्रीति चंद चकोर ॥
जिउ मीन जल सिउ हेतु ॥
अलि कमल भिंनु न भेतु ॥
जिउ चकवी सूरज आस ॥
नानक चरन पिआस ॥६॥
जिउ तरुनि भरत परान ॥
जिउ लोभीऐ धनु दानु ॥
जिउ दूध जलहि संजोगु ॥
जिउ महा खुधिआरथ भोगु ॥
जिउ मात पूतहि हेतु ॥
हरि सिमरि नानक नेत ॥७॥
जिउ दीप पतन पतंग ॥
जिउ चोरु हिरत निसंग ॥
मैगलहि कामै बंधु ॥
जिउ ग्रसत बिखई धंधु ॥
जिउ जूआर बिसनु न जाइ ॥
हरि नानक इहु मनु लाइ ॥८॥
कुरंक नादै नेहु ॥
चात्रिकु चाहत मेहु ॥
जन जीवना सतसंगि ॥
गोबिदु भजना रंगि ॥
रसना बखानै नामु ॥
नानक दरसन दानु ॥९॥
गुन गाइ सुनि लिखि देइ ॥
सो सरब फल हरि लेइ ॥
कुल समूह करत उधारु ॥
संसारु उतरसि पारि ॥
हरि चरन बोहिथ ताहि ॥
मिलि साधसंगि जसु गाहि ॥
हरि पैज रखै मुरारि ॥
हरि नानक सरनि दुआरि ॥१०॥२॥
हिन्दी अर्थ: मेहर करके मुझे अपने लड़ लगा ले की नानक ! प्रभू तेरा नाम सिमरा करे । 1। हे गरीबों के पति ! हे दया के श्रोत ! हे मेरे स्वामी ! हे दीनों के नाथ ! हे दयालु ! मैं तेरे संत जनों के चरणों की धूड़ माँगता हूँ। 1। रहाउ। यह जगत माया (के मोह) का कूँआ है। आत्मिक जीवन के प्रति अज्ञानता का घोर-अंधकार (मुझे) मोह रहा है। (मेरी) बाँह पकड़ के (मुझे) बचा ले हे प्रभू ! मुझे अपना नाम बख्श। तेरे बिना मेरा और कोई आसरा नहीं। हे नानक ! (प्रभू के दर पर आस कर। और। कह-) हे प्रभू ! मैं (तेरे नाम से) सदके जाता हूं। कुर्बान जाता हूँ। । 2। मेरा शरीर लोभ में मोह में फंसा हुआ है। (तेरा) भजन किए बिना मिट्टी हुआ जा रहा है। (मुझे) जमदूत बड़े ही डरावने (लग रहे हैं)। चित्रगुप्त (मेरे) कर्मों को जानते हैं। दिन और रात (ये भी मेरे कर्मों की) गवाही दे के (यही कह रहे हैं कि मैं कुकर्मी हूँ) हे नानक ! (कह-) हे हरी ! मैं तेरी शरण आया हूँ। । 3। हे नानक ! (कह-) हे सारे डरों को नाश करने वाले प्रभू ! मेहर करके (मुझ) विकारी को (विकारों से) बचा ले। मेरे विकार गिने नहीं जा सकते (अनगिनत हैं)। हे हरी ! तेरे बिना किसी और के दर पर भी ये बख्शे नहीं जा सकते। हे नाथ ! मैंने तेरा ही आसरा सोचा है। (मेरी बाँह) पकड़ ले। (अपना) हाथ दे के मेरी रक्षा कर। 4। हे हरी ! हे गुणों के खजाने ! हे धरती के रक्षक ! हे सब शरीरों के पालनहार ! (मेरे) मन में (तेरी) प्रीति (बनी रहे। तेरे) दर्शनों की चाहत (बनी रहे। हे गोबिंद ! (मेरे मन की) आस पूरी कर। तेरे दर्शन के बिना मुझसे) एक पल भर के लिए भी रहा नहीं जा सकता। बहुत भाग्यों से ही कोई तेरा मिलाप प्राप्त करता है। 5। हे नानक ! (कह-) हे प्रभू ! तेरे बिना (मेरा कोई) और (आसरा) नहीं। (मेरे) मन में (तेरे चरणों की) प्रीति है (जैसे) चकोर को चाँद से प्यार है। जैसे मछली को पानी से प्यार है। (जैसे) भौंरे का कमल पुष्प् से कोई फर्क नहीं रह जाता। जैसे चकवी को सूर्य (उदय) की उम्मीद लगी रहती है (इसी तरह। हे प्रभू ! नानक को तेरे) चरणों की चाहत है। 6। हे नानक ! (कह- हे भाई !) जैसे जवान स्त्री को (अपना) पति बहुत प्यारा होता है। जैसे लालची मनुष्य को धन-प्राप्ति (से खुशी मिलती है)। जैसे दूध का पानी से मिलाप हो जाता है। जैसे बहुत भूखे को भोजन (तृप्त कर देता है)। जैसे माँ का पुत्र से प्यार होता है। वैसे ही सदा परमात्मा को (प्यार से। स्नेह से) सिमरा कर। 7। हे नानक ! (कह- हे भाई !) जैसे (प्रेम में बँधे हुए) पतंगे दीए पर गिरते हैं। जैसे चोर शर्म त्याग के चोरी करता है। जैसे हाथी का काम-वासना के साथ मेल है। जैसे (विषियों का) धंधा विषयी मनुष्य को ग्रसे रखता है। जैसे जुआरी की (जूआ खेलने की) बुरी आदत दूर नहीं होती। वैसे ही (अपने) इस मन को (प्रभू-चरणों में प्यार से। स्नेह से) जोड़े रख। 8। जैसे हिरन का घंडेखेड़े की आवाज़ से प्यार होता है। जैसे पपीहा (हर वक्त) वर्षा माँगता है। वैसे ही। हे नानक ! (परमात्मा के) सेवक का (सुखी) जीवन साध-संगति में (ही होता) है। सेवक प्यार से परमात्मा (के नाम) को जपता है। (अपनी) जीभ से (परमात्मा का) नाम उचारता रहता है और (परमात्मा के) दर्शनों की दाति (माँगता रहता है)। 9। जो मनुष्य (परमात्मा के) गुण गा गा के। सुन के। लिख के (यह दाति औरों को भी) देता है। वह मनुष्य सारे फल देने वाले प्रभू का मिलाप प्राप्त कर लेता है। वह मनुष्य (अपनी) सारी कुलों का (ही) पार-उतारा करवा लेता है। वह मनुष्य संसार-समुंद्र से पार लांघ जाता है। हे नानक ! जो मनुष्य गुरू की संगति में मिल के परमात्मा की सिफत-सालाह के गीत गाते रहते हैं। (संसार-समुंद्र से पार लांघने के लिए) परमात्मा के चरण उनके लिए जहाज़ (का काम देते) हैं। मुरारी प्रभू उनकी लाज रखता है। वे हरी की शरण पड़े रहते हैं। वे हरी के दर पर टिके रहते हैं। 10। 2।
ਬਿਲਾਵਲੁ ਮਹਲਾ ੧ ਥਿਤੀ ਘਰੁ ੧੦ ਜਤਿ
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ਏਕਮ ਏਕੰਕਾਰੁ ਨਿਰਾਲਾ ॥
ਅਮਰੁ ਅਜੋਨੀ ਜਾਤਿ ਨ ਜਾਲਾ ॥
ਅਗਮ ਅਗੋਚਰੁ ਰੂਪੁ ਨ ਰੇਖਿਆ ॥
ਖੋਜਤ ਖੋਜਤ ਘਟਿ ਘਟਿ ਦੇਖਿਆ ॥
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ਏਕਮ ਏਕੰਕਾਰੁ ਨਿਰਾਲਾ ॥
ਅਮਰੁ ਅਜੋਨੀ ਜਾਤਿ ਨ ਜਾਲਾ ॥
ਅਗਮ ਅਗੋਚਰੁ ਰੂਪੁ ਨ ਰੇਖਿਆ ॥
ਖੋਜਤ ਖੋਜਤ ਘਟਿ ਘਟਿ ਦੇਖਿਆ ॥
बिलावलु महला १ थिती घरु १० जति
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
एकम एकंकारु निराला ॥
अमरु अजोनी जाति न जाला ॥
अगम अगोचरु रूपु न रेखिआ ॥
खोजत खोजत घटि घटि देखिआ ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
एकम एकंकारु निराला ॥
अमरु अजोनी जाति न जाला ॥
अगम अगोचरु रूपु न रेखिआ ॥
खोजत खोजत घटि घटि देखिआ ॥
हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला १ थिती घरु १० जति ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ परमात्मा एक है (उसके बराबर का और कोई नहीं)। उसका कोई खास घर नहीं। वह कभी मरता नहीं। वह जूनियों में नहीं आता। उसकी कोई खास जाति नहीं। उसको (माया आदि का) कोई बंधन नहीं (व्यापता)। वह एक परमात्मा अपहुँच है। (मनुष्य के) ज्ञान-इन्द्रियों की उस तक पहुँच नहीं हो सकती। (क्योंकि) उसकी कोई खास शक्ल नहीं। कोई खास निशान (चिन्ह) नहीं। पर तलारश करते-करते उसे हरेक शरीर में देखा जा सकता है।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 838 है, राग बिलावल का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।
M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।
दिल्ली का summer-shaadi, मंडप के बीच bride-groom, और परिवार की उम्मीदें।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 66 पंक्तियों का है, 2 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 838” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: बिलावल राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 839 →, पीछे का: ← अंग 837।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।