अंग
826
राग बिलावल
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਨਾਨਕ ਸਰਣਿ ਪਰਿਓ ਦੁਖ ਭੰਜਨ ਅੰਤਰਿ ਬਾਹਰਿ ਪੇਖਿ ਹਜੂਰੇ ॥੨॥੨੨॥੧੦੮॥
नानक सरणि परिओ दुख भंजन अंतरि बाहरि पेखि हजूरे ॥२॥२२॥१०८॥
हिन्दी अर्थ: वह मनुष्य सारे दुखों के नाश करने वाले प्रभू की शरण पड़ा रहता है। और अंदर-बाहर हर जगह प्रभू को अपने अंग-संग बसता देखता है। 2। 22। 108।
ਬਿਲਾਵਲੁ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਦਰਸਨੁ ਦੇਖਤ ਦੋਖ ਨਸੇ ॥
ਕਬਹੁ ਨ ਹੋਵਹੁ ਦ੍ਰਿਸਟਿ ਅਗੋਚਰ ਜੀਅ ਕੈ ਸੰਗਿ ਬਸੇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਪ੍ਰੀਤਮ ਪ੍ਰਾਨ ਅਧਾਰ ਸੁਆਮੀ ॥
ਪੂਰਿ ਰਹੇ ਪ੍ਰਭ ਅੰਤਰਜਾਮੀ ॥੧॥
ਕਿਆ ਗੁਣ ਤੇਰੇ ਸਾਰਿ ਸਮੑਾਰੀ ॥
ਸਾਸਿ ਸਾਸਿ ਪ੍ਰਭ ਤੁਝਹਿ ਚਿਤਾਰੀ ॥੨॥
ਕਿਰਪਾ ਨਿਧਿ ਪ੍ਰਭ ਦੀਨ ਦਇਆਲਾ ॥
ਜੀਅ ਜੰਤ ਕੀ ਕਰਹੁ ਪ੍ਰਤਿਪਾਲਾ ॥੩॥
ਆਠ ਪਹਰ ਤੇਰਾ ਨਾਮੁ ਜਨੁ ਜਾਪੇ ॥
ਨਾਨਕ ਪ੍ਰੀਤਿ ਲਾਈ ਪ੍ਰਭਿ ਆਪੇ ॥੪॥੨੩॥੧੦੯॥
ਦਰਸਨੁ ਦੇਖਤ ਦੋਖ ਨਸੇ ॥
ਕਬਹੁ ਨ ਹੋਵਹੁ ਦ੍ਰਿਸਟਿ ਅਗੋਚਰ ਜੀਅ ਕੈ ਸੰਗਿ ਬਸੇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਪ੍ਰੀਤਮ ਪ੍ਰਾਨ ਅਧਾਰ ਸੁਆਮੀ ॥
ਪੂਰਿ ਰਹੇ ਪ੍ਰਭ ਅੰਤਰਜਾਮੀ ॥੧॥
ਕਿਆ ਗੁਣ ਤੇਰੇ ਸਾਰਿ ਸਮੑਾਰੀ ॥
ਸਾਸਿ ਸਾਸਿ ਪ੍ਰਭ ਤੁਝਹਿ ਚਿਤਾਰੀ ॥੨॥
ਕਿਰਪਾ ਨਿਧਿ ਪ੍ਰਭ ਦੀਨ ਦਇਆਲਾ ॥
ਜੀਅ ਜੰਤ ਕੀ ਕਰਹੁ ਪ੍ਰਤਿਪਾਲਾ ॥੩॥
ਆਠ ਪਹਰ ਤੇਰਾ ਨਾਮੁ ਜਨੁ ਜਾਪੇ ॥
ਨਾਨਕ ਪ੍ਰੀਤਿ ਲਾਈ ਪ੍ਰਭਿ ਆਪੇ ॥੪॥੨੩॥੧੦੯॥
बिलावलु महला ५ ॥
दरसनु देखत दोख नसे ॥
कबहु न होवहु द्रिसटि अगोचर जीअ कै संगि बसे ॥१॥ रहाउ ॥
प्रीतम प्रान अधार सुआमी ॥
पूरि रहे प्रभ अंतरजामी ॥१॥
किआ गुण तेरे सारि सम॑ारी ॥
सासि सासि प्रभ तुझहि चितारी ॥२॥
किरपा निधि प्रभ दीन दइआला ॥
जीअ जंत की करहु प्रतिपाला ॥३॥
आठ पहर तेरा नामु जनु जापे ॥
नानक प्रीति लाई प्रभि आपे ॥४॥२३॥१०९॥
दरसनु देखत दोख नसे ॥
कबहु न होवहु द्रिसटि अगोचर जीअ कै संगि बसे ॥१॥ रहाउ ॥
प्रीतम प्रान अधार सुआमी ॥
पूरि रहे प्रभ अंतरजामी ॥१॥
किआ गुण तेरे सारि सम॑ारी ॥
सासि सासि प्रभ तुझहि चितारी ॥२॥
किरपा निधि प्रभ दीन दइआला ॥
जीअ जंत की करहु प्रतिपाला ॥३॥
आठ पहर तेरा नामु जनु जापे ॥
नानक प्रीति लाई प्रभि आपे ॥४॥२३॥१०९॥
हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला ५ ॥ (हे प्रभू तेरे) दर्शन करते हुए (जीवों के) सारे विकार दूर हो जाते हैं। (हे प्रभू ! मेहर कर) कभी भी मेरी नजर से परे ना हो। सदा मेरे प्राणों के साथ बसता रह। 1। रहाउ। हे मेरे प्रीतम प्रभू ! हे जीवों की जिंद के आसरे ! हे स्वामी ! तू सबके दिल की जानने वाला है और सबमें व्यापक है। 1। (हे प्रभू ! तू बेअंत गुणों का मालिक है) मैं तेरे कौन-कौन से गुण याद कर कर के अपने हृदय में बसाऊँ। हे प्रभू ! (कृपा कर) मैं अपनी हरेक सांस के साथ तुझे ही याद करता रहूँ। 2। हे कृपा के खजाने ! हे गरीबों पर दया करने वाले प्रभू ! सारे जीवों की तू स्वयं ही पालना करता है। 3। हे प्रभू ! तेरा सेवक आठों पहर तेरा नाम जपता रहता है। (पर) हे नानक ! (वही मनुष्य सदा नाम जपता है। जिसको) प्रभू ने स्वयं ही यह लगन लगाई है। 4। 23। 109।
ਬਿਲਾਵਲੁ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਤਨੁ ਧਨੁ ਜੋਬਨੁ ਚਲਤ ਗਇਆ ॥
ਰਾਮ ਨਾਮ ਕਾ ਭਜਨੁ ਨ ਕੀਨੋ ਕਰਤ ਬਿਕਾਰ ਨਿਸਿ ਭੋਰੁ ਭਇਆ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਅਨਿਕ ਪ੍ਰਕਾਰ ਭੋਜਨ ਨਿਤ ਖਾਤੇ ਮੁਖ ਦੰਤਾ ਘਸਿ ਖੀਨ ਖਇਆ ॥
ਮੇਰੀ ਮੇਰੀ ਕਰਿ ਕਰਿ ਮੂਠਉ ਪਾਪ ਕਰਤ ਨਹ ਪਰੀ ਦਇਆ ॥੧॥
ਮਹਾ ਬਿਕਾਰ ਘੋਰ ਦੁਖ ਸਾਗਰ ਤਿਸੁ ਮਹਿ ਪ੍ਰਾਣੀ ਗਲਤੁ ਪਇਆ ॥
ਸਰਨਿ ਪਰੇ ਨਾਨਕ ਸੁਆਮੀ ਕੀ ਬਾਹ ਪਕਰਿ ਪ੍ਰਭਿ ਕਾਢਿ ਲਇਆ ॥੨॥੨੪॥੧੧੦॥
ਤਨੁ ਧਨੁ ਜੋਬਨੁ ਚਲਤ ਗਇਆ ॥
ਰਾਮ ਨਾਮ ਕਾ ਭਜਨੁ ਨ ਕੀਨੋ ਕਰਤ ਬਿਕਾਰ ਨਿਸਿ ਭੋਰੁ ਭਇਆ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਅਨਿਕ ਪ੍ਰਕਾਰ ਭੋਜਨ ਨਿਤ ਖਾਤੇ ਮੁਖ ਦੰਤਾ ਘਸਿ ਖੀਨ ਖਇਆ ॥
ਮੇਰੀ ਮੇਰੀ ਕਰਿ ਕਰਿ ਮੂਠਉ ਪਾਪ ਕਰਤ ਨਹ ਪਰੀ ਦਇਆ ॥੧॥
ਮਹਾ ਬਿਕਾਰ ਘੋਰ ਦੁਖ ਸਾਗਰ ਤਿਸੁ ਮਹਿ ਪ੍ਰਾਣੀ ਗਲਤੁ ਪਇਆ ॥
ਸਰਨਿ ਪਰੇ ਨਾਨਕ ਸੁਆਮੀ ਕੀ ਬਾਹ ਪਕਰਿ ਪ੍ਰਭਿ ਕਾਢਿ ਲਇਆ ॥੨॥੨੪॥੧੧੦॥
बिलावलु महला ५ ॥
तनु धनु जोबनु चलत गइआ ॥
राम नाम का भजनु न कीनो करत बिकार निसि भोरु भइआ ॥१॥ रहाउ ॥
अनिक प्रकार भोजन नित खाते मुख दंता घसि खीन खइआ ॥
मेरी मेरी करि करि मूठउ पाप करत नह परी दइआ ॥१॥
महा बिकार घोर दुख सागर तिसु महि प्राणी गलतु पइआ ॥
सरनि परे नानक सुआमी की बाह पकरि प्रभि काढि लइआ ॥२॥२४॥११०॥
तनु धनु जोबनु चलत गइआ ॥
राम नाम का भजनु न कीनो करत बिकार निसि भोरु भइआ ॥१॥ रहाउ ॥
अनिक प्रकार भोजन नित खाते मुख दंता घसि खीन खइआ ॥
मेरी मेरी करि करि मूठउ पाप करत नह परी दइआ ॥१॥
महा बिकार घोर दुख सागर तिसु महि प्राणी गलतु पइआ ॥
सरनि परे नानक सुआमी की बाह पकरि प्रभि काढि लइआ ॥२॥२४॥११०॥
हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला ५ ॥ (हे भाई ! मनुष्य का यह) शरीर। धन। जवानी (हरेक ही) आहिस्ता-आहिस्ता (मनुष्य का) साथ छोड़ते जाते हैं। (पर इनके मोह में फंसा हुआ मनुष्य) परमात्मा के नाम का भजन नहीं करता। बुरे काम करते करते काले केसों वाली उम्र से सफेद बालों वाली उम्र आ जाती है। 1। रहाउ। हे भाई ! कई किस्मों के खाने नित्य खाते हुए मुँह के दाँत भी घिस के कमजोर हो जाते हैं। और आखिर गिर जाते हैं। ममता के पँजे में फंस के मनुष्य (आत्मिक जीवन की राशि पूँजी) लुटा लेता है। बुरे काम करते हुए इसके अंदर दया-तरस भी नहीं रह जाती। 1। (हे भाई ! यह संसार) बड़े विकारों और भारे दुखों का समुंद्र है (भजन से टूटा हुआ) मनुष्य इस (समुंद्र) में डूबा रहता है। हे नानक ! जो मनुष्य मालिक प्रभू की शरण आ पड़े। उन्हे प्रभू ने बाँह पकड़ के (इस संसार-समुंद्र में से) निकाल लिया। (ये उसका आदि कदीमी बिरद भरा स्वभाव है)। 2। 24। 110।
ਬਿਲਾਵਲੁ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਆਪਨਾ ਪ੍ਰਭੁ ਆਇਆ ਚੀਤਿ ॥
ਦੁਸਮਨ ਦੁਸਟ ਰਹੇ ਝਖ ਮਾਰਤ ਕੁਸਲੁ ਭਇਆ ਮੇਰੇ ਭਾਈ ਮੀਤ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਗਈ ਬਿਆਧਿ ਉਪਾਧਿ ਸਭ ਨਾਸੀ ਅੰਗੀਕਾਰੁ ਕੀਓ ਕਰਤਾਰਿ ॥
ਸਾਂਤਿ ਸੂਖ ਅਰੁ ਅਨਦ ਘਨੇਰੇ ਪ੍ਰੀਤਮ ਨਾਮੁ ਰਿਦੈ ਉਰ ਹਾਰਿ ॥੧॥
ਜੀਉ ਪਿੰਡੁ ਧਨੁ ਰਾਸਿ ਪ੍ਰਭ ਤੇਰੀ ਤੂੰ ਸਮਰਥੁ ਸੁਆਮੀ ਮੇਰਾ ॥
ਦਾਸ ਅਪੁਨੇ ਕਉ ਰਾਖਨਹਾਰਾ ਨਾਨਕ ਦਾਸ ਸਦਾ ਹੈ ਚੇਰਾ ॥੨॥੨੫॥੧੧੧॥
ਆਪਨਾ ਪ੍ਰਭੁ ਆਇਆ ਚੀਤਿ ॥
ਦੁਸਮਨ ਦੁਸਟ ਰਹੇ ਝਖ ਮਾਰਤ ਕੁਸਲੁ ਭਇਆ ਮੇਰੇ ਭਾਈ ਮੀਤ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਗਈ ਬਿਆਧਿ ਉਪਾਧਿ ਸਭ ਨਾਸੀ ਅੰਗੀਕਾਰੁ ਕੀਓ ਕਰਤਾਰਿ ॥
ਸਾਂਤਿ ਸੂਖ ਅਰੁ ਅਨਦ ਘਨੇਰੇ ਪ੍ਰੀਤਮ ਨਾਮੁ ਰਿਦੈ ਉਰ ਹਾਰਿ ॥੧॥
ਜੀਉ ਪਿੰਡੁ ਧਨੁ ਰਾਸਿ ਪ੍ਰਭ ਤੇਰੀ ਤੂੰ ਸਮਰਥੁ ਸੁਆਮੀ ਮੇਰਾ ॥
ਦਾਸ ਅਪੁਨੇ ਕਉ ਰਾਖਨਹਾਰਾ ਨਾਨਕ ਦਾਸ ਸਦਾ ਹੈ ਚੇਰਾ ॥੨॥੨੫॥੧੧੧॥
बिलावलु महला ५ ॥
आपना प्रभु आइआ चीति ॥
दुसमन दुसट रहे झख मारत कुसलु भइआ मेरे भाई मीत ॥१॥ रहाउ ॥
गई बिआधि उपाधि सभ नासी अंगीकारु कीओ करतारि ॥
सांति सूख अरु अनद घनेरे प्रीतम नामु रिदै उर हारि ॥१॥
जीउ पिंडु धनु रासि प्रभ तेरी तूं समरथु सुआमी मेरा ॥
दास अपुने कउ राखनहारा नानक दास सदा है चेरा ॥२॥२५॥१११॥
आपना प्रभु आइआ चीति ॥
दुसमन दुसट रहे झख मारत कुसलु भइआ मेरे भाई मीत ॥१॥ रहाउ ॥
गई बिआधि उपाधि सभ नासी अंगीकारु कीओ करतारि ॥
सांति सूख अरु अनद घनेरे प्रीतम नामु रिदै उर हारि ॥१॥
जीउ पिंडु धनु रासि प्रभ तेरी तूं समरथु सुआमी मेरा ॥
दास अपुने कउ राखनहारा नानक दास सदा है चेरा ॥२॥२५॥१११॥
हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला ५ ॥ हे मेरे वीर ! हे मेरे मित्र ! जिस मनुष्य के चिक्त में प्यारा प्रभू आ बसता है। बुरे लोग और वैरी उसको नुकसान पहुँचाने का यत्न करते थक जाते हैं (उसका कुछ भी बिगाड़ नहीं सकते। उसके हृदय में सदा) आनंद बना रहता है। 1। रहाउ। हे मित्र ! करतार ने (जब भी किसी की) सहायता की। उसका हरेक रोग दूर हो गया। (उसके साथ किसी का भी किया हुआ) कोई छल कामयाब नही हुआ। प्रीतम प्रभू का नाम हृदय में बसाने की बरकति से उस मनुष्य के अंदर शांति सुख और अनेकों आनंद पैदा हो गए। 1। हे प्रभू ! मेरे ये प्राण। मेरा ये शरीर। मेरा यह धन- सब कुछ तेरा ही दिया हुआ सरमाया है। तू मेरा स्वामी सब ताकतों का मालिक है। तू अपनें सेवक को (उपाधियों-व्याधियों से सदा) बचाने वाला है। हे नानक ! (कह- हे प्रभू !) मैं भी तेरा ही दास हूँ। तेरा ही गुलाम हूँ (मुझे तेरा ही भरोसा है)। 2। 25। 111।
ਬਿਲਾਵਲੁ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਗੋਬਿਦੁ ਸਿਮਰਿ ਹੋਆ ਕਲਿਆਣੁ ॥
ਮਿਟੀ ਉਪਾਧਿ ਭਇਆ ਸੁਖੁ ਸਾਚਾ ਅੰਤਰਜਾਮੀ ਸਿਮਰਿਆ ਜਾਣੁ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਜਿਸ ਕੇ ਜੀਅ ਤਿਨਿ ਕੀਏ ਸੁਖਾਲੇ ਭਗਤ ਜਨਾ ਕਉ ਸਾਚਾ ਤਾਣੁ ॥
ਦਾਸ ਅਪੁਨੇ ਕੀ ਆਪੇ ਰਾਖੀ ਭੈ ਭੰਜਨ ਊਪਰਿ ਕਰਤੇ ਮਾਣੁ ॥੧॥
ਭਈ ਮਿਤ੍ਰਾਈ ਮਿਟੀ ਬੁਰਾਈ ਦ੍ਰੁਸਟ ਦੂਤ ਹਰਿ ਕਾਢੇ ਛਾਣਿ ॥
ਸੂਖ ਸਹਜ ਆਨੰਦ ਘਨੇਰੇ ਨਾਨਕ ਜੀਵੈ ਹਰਿ ਗੁਣਹ ਵਖਾਣਿ ॥੨॥੨੬॥੧੧੨॥
ਗੋਬਿਦੁ ਸਿਮਰਿ ਹੋਆ ਕਲਿਆਣੁ ॥
ਮਿਟੀ ਉਪਾਧਿ ਭਇਆ ਸੁਖੁ ਸਾਚਾ ਅੰਤਰਜਾਮੀ ਸਿਮਰਿਆ ਜਾਣੁ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਜਿਸ ਕੇ ਜੀਅ ਤਿਨਿ ਕੀਏ ਸੁਖਾਲੇ ਭਗਤ ਜਨਾ ਕਉ ਸਾਚਾ ਤਾਣੁ ॥
ਦਾਸ ਅਪੁਨੇ ਕੀ ਆਪੇ ਰਾਖੀ ਭੈ ਭੰਜਨ ਊਪਰਿ ਕਰਤੇ ਮਾਣੁ ॥੧॥
ਭਈ ਮਿਤ੍ਰਾਈ ਮਿਟੀ ਬੁਰਾਈ ਦ੍ਰੁਸਟ ਦੂਤ ਹਰਿ ਕਾਢੇ ਛਾਣਿ ॥
ਸੂਖ ਸਹਜ ਆਨੰਦ ਘਨੇਰੇ ਨਾਨਕ ਜੀਵੈ ਹਰਿ ਗੁਣਹ ਵਖਾਣਿ ॥੨॥੨੬॥੧੧੨॥
बिलावलु महला ५ ॥
गोबिदु सिमरि होआ कलिआणु ॥
मिटी उपाधि भइआ सुखु साचा अंतरजामी सिमरिआ जाणु ॥१॥ रहाउ ॥
जिस के जीअ तिनि कीए सुखाले भगत जना कउ साचा ताणु ॥
दास अपुने की आपे राखी भै भंजन ऊपरि करते माणु ॥१॥
भई मित्राई मिटी बुराई द्रुसट दूत हरि काढे छाणि ॥
सूख सहज आनंद घनेरे नानक जीवै हरि गुणह वखाणि ॥२॥२६॥११२॥
गोबिदु सिमरि होआ कलिआणु ॥
मिटी उपाधि भइआ सुखु साचा अंतरजामी सिमरिआ जाणु ॥१॥ रहाउ ॥
जिस के जीअ तिनि कीए सुखाले भगत जना कउ साचा ताणु ॥
दास अपुने की आपे राखी भै भंजन ऊपरि करते माणु ॥१॥
भई मित्राई मिटी बुराई द्रुसट दूत हरि काढे छाणि ॥
सूख सहज आनंद घनेरे नानक जीवै हरि गुणह वखाणि ॥२॥२६॥११२॥
हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला ५ ॥ गोबिंद का नाम सिमर के (उसके अंदर) सुख ही सुख बन गया। हे भाई ! जिस मनुष्य ने हरेक दिल की जानने वाले सुजान प्रभू का नाम सिमरा। उस पर किसी की चोट कारगर ना हो सकी। उसके अंदर सदा कायम रहने वाला सुख पैदा हो गया। 1। रहाउ। हे भाई ! जिस प्रभू के ये सारे जीव-जंतु हैं (इनको) सुखी भी उसने खुद ही किया है (सुखी करने वाला भी स्वयं ही है)। प्रभू की भक्ति करने वालों को यही सदा कायम रहने वाला सहारा है। हे भाई ! प्रभू अपने सेवकों की इज्जत स्वयं ही रखता है। भक्त उस प्रभू पर ही भरोसा रखते हैं। जो सारे डरों का नाश करने वाला है। 1। (हे भाई ! जो मनुष्य प्रभू का नाम सिमरता है। प्रभू उसका) बुरा चितवने वाले वैरियों को चुन के निकाल देता है (उनकी बल्कि सेवक से) प्यार की सांझ बन जाती है (उनके अंदर से उस सेवक की बाबत) वैर भाव मिट जाता है। हे नानक ! सेवक के हृदय में सुख आत्मिक अडोलता और बहुत सारा आनंद बना रहता है। सेवक परमात्मा के गुण उचार-उचार के आत्मिक जीवन प्राप्त करता रहता है। 2। 26। 112।
ਬਿਲਾਵਲੁ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਪਾਰਬ੍ਰਹਮ ਪ੍ਰਭ ਭਏ ਕ੍ਰਿਪਾਲ ॥
ਕਾਰਜ ਸਗਲ ਸਵਾਰੇ ਸਤਿਗੁਰ ਜਪਿ ਜਪਿ ਸਾਧੂ ਭਏ ਨਿਹਾਲ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਅੰਗੀਕਾਰੁ ਕੀਆ ਪ੍ਰਭਿ ਅਪਨੈ ਦੋਖੀ ਸਗਲੇ ਭਏ ਰਵਾਲ ॥
ਕੰਠਿ ਲਾਇ ਰਾਖੇ ਜਨ ਅਪਨੇ ਉਧਰਿ ਲੀਏ ਲਾਇ ਅਪਨੈ ਪਾਲ ॥੧॥
ਪਾਰਬ੍ਰਹਮ ਪ੍ਰਭ ਭਏ ਕ੍ਰਿਪਾਲ ॥
ਕਾਰਜ ਸਗਲ ਸਵਾਰੇ ਸਤਿਗੁਰ ਜਪਿ ਜਪਿ ਸਾਧੂ ਭਏ ਨਿਹਾਲ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਅੰਗੀਕਾਰੁ ਕੀਆ ਪ੍ਰਭਿ ਅਪਨੈ ਦੋਖੀ ਸਗਲੇ ਭਏ ਰਵਾਲ ॥
ਕੰਠਿ ਲਾਇ ਰਾਖੇ ਜਨ ਅਪਨੇ ਉਧਰਿ ਲੀਏ ਲਾਇ ਅਪਨੈ ਪਾਲ ॥੧॥
बिलावलु महला ५ ॥
पारब्रहम प्रभ भए क्रिपाल ॥
कारज सगल सवारे सतिगुर जपि जपि साधू भए निहाल ॥१॥ रहाउ ॥
अंगीकारु कीआ प्रभि अपनै दोखी सगले भए रवाल ॥
कंठि लाइ राखे जन अपने उधरि लीए लाइ अपनै पाल ॥१॥
पारब्रहम प्रभ भए क्रिपाल ॥
कारज सगल सवारे सतिगुर जपि जपि साधू भए निहाल ॥१॥ रहाउ ॥
अंगीकारु कीआ प्रभि अपनै दोखी सगले भए रवाल ॥
कंठि लाइ राखे जन अपने उधरि लीए लाइ अपनै पाल ॥१॥
हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला ५ ॥ हे भाई ! जिन मनुष्यों पर परमात्मा दयावान होता है। गुरू उनके सारे काम सिरे चढ़ा देता है। वह मनुष्य गुरू की ओट हर वक्त चितार के सदा प्रसन्न रहते हैं। 1। रहाउ। हे भाई ! प्रभू ने (जिन अपने सेवकों की) सहायता की। उनके सारे वैरी नाश हो गए (अर्थात। वैर-भाव चितवने से हट गए)। प्रभू ने अपने सेवकों को (सदा) अपने गले से लगा के (उनकी) सहायता की। उनको अपने लड़ लगा के (दोखियों से) बचाया। 1।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 826 है, राग बिलावल का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।
M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।
Chittaranjan Park के Bengali-दुर्गा-puja के बीच पंडाल में किसी quiet pause में।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 38 पंक्तियों का है, 6 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 826” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: बिलावल राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 827 →, पीछे का: ← अंग 825।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।