अंग
831
राग बिलावल
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਜੋਗ ਜਗ ਨਿਹਫਲ ਤਿਹ ਮਾਨਉ ਜੋ ਪ੍ਰਭ ਜਸੁ ਬਿਸਰਾਵੈ ॥੧॥
ਮਾਨ ਮੋਹ ਦੋਨੋ ਕਉ ਪਰਹਰਿ ਗੋਬਿੰਦ ਕੇ ਗੁਨ ਗਾਵੈ ॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਇਹ ਬਿਧਿ ਕੋ ਪ੍ਰਾਨੀ ਜੀਵਨ ਮੁਕਤਿ ਕਹਾਵੈ ॥੨॥੨॥
ਮਾਨ ਮੋਹ ਦੋਨੋ ਕਉ ਪਰਹਰਿ ਗੋਬਿੰਦ ਕੇ ਗੁਨ ਗਾਵੈ ॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਇਹ ਬਿਧਿ ਕੋ ਪ੍ਰਾਨੀ ਜੀਵਨ ਮੁਕਤਿ ਕਹਾਵੈ ॥੨॥੨॥
जोग जग निहफल तिह मानउ जो प्रभ जसु बिसरावै ॥१॥
मान मोह दोनो कउ परहरि गोबिंद के गुन गावै ॥
कहु नानक इह बिधि को प्रानी जीवन मुकति कहावै ॥२॥२॥
मान मोह दोनो कउ परहरि गोबिंद के गुन गावै ॥
कहु नानक इह बिधि को प्रानी जीवन मुकति कहावै ॥२॥२॥
हिन्दी अर्थ: जो मनुष्य परमात्मा की सिफत सालाह भुला देता है मैं समझता हूँ कि उसके योग-साधना और यज्ञ (आदि कर्मकाण्ड सब) व्यर्थ हैं। 1। हे नानक ! कह- जो मनुष्य अहंकार और माया का मोह छोड़ के परमात्मा की सिफत-सालाह के गीत गाता रहता है। जो मनुष्य इस किस्म का जीवन व्यतीत करने वाला है। वह जीवन-मुक्त कहलवाता है (वह मनुष्य उस श्रेणी में से गिना जाता है। जो इस जिंदगी में विकारों की पकड़ से बचे रहते हैं)। 2।
ਬਿਲਾਵਲੁ ਮਹਲਾ ੯ ॥
ਜਾ ਮੈ ਭਜਨੁ ਰਾਮ ਕੋ ਨਾਹੀ ॥
ਤਿਹ ਨਰ ਜਨਮੁ ਅਕਾਰਥੁ ਖੋਇਆ ਯਹ ਰਾਖਹੁ ਮਨ ਮਾਹੀ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਤੀਰਥ ਕਰੈ ਬ੍ਰਤ ਫੁਨਿ ਰਾਖੈ ਨਹ ਮਨੂਆ ਬਸਿ ਜਾ ਕੋ ॥
ਨਿਹਫਲ ਧਰਮੁ ਤਾਹਿ ਤੁਮ ਮਾਨਹੁ ਸਾਚੁ ਕਹਤ ਮੈ ਯਾ ਕਉ ॥੧॥
ਜੈਸੇ ਪਾਹਨੁ ਜਲ ਮਹਿ ਰਾਖਿਓ ਭੇਦੈ ਨਾਹਿ ਤਿਹ ਪਾਨੀ ॥
ਤੈਸੇ ਹੀ ਤੁਮ ਤਾਹਿ ਪਛਾਨਹੁ ਭਗਤਿ ਹੀਨ ਜੋ ਪ੍ਰਾਨੀ ॥੨॥
ਕਲ ਮੈ ਮੁਕਤਿ ਨਾਮ ਤੇ ਪਾਵਤ ਗੁਰੁ ਯਹ ਭੇਦੁ ਬਤਾਵੈ ॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਸੋਈ ਨਰੁ ਗਰੂਆ ਜੋ ਪ੍ਰਭ ਕੇ ਗੁਨ ਗਾਵੈ ॥੩॥੩॥
ਜਾ ਮੈ ਭਜਨੁ ਰਾਮ ਕੋ ਨਾਹੀ ॥
ਤਿਹ ਨਰ ਜਨਮੁ ਅਕਾਰਥੁ ਖੋਇਆ ਯਹ ਰਾਖਹੁ ਮਨ ਮਾਹੀ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਤੀਰਥ ਕਰੈ ਬ੍ਰਤ ਫੁਨਿ ਰਾਖੈ ਨਹ ਮਨੂਆ ਬਸਿ ਜਾ ਕੋ ॥
ਨਿਹਫਲ ਧਰਮੁ ਤਾਹਿ ਤੁਮ ਮਾਨਹੁ ਸਾਚੁ ਕਹਤ ਮੈ ਯਾ ਕਉ ॥੧॥
ਜੈਸੇ ਪਾਹਨੁ ਜਲ ਮਹਿ ਰਾਖਿਓ ਭੇਦੈ ਨਾਹਿ ਤਿਹ ਪਾਨੀ ॥
ਤੈਸੇ ਹੀ ਤੁਮ ਤਾਹਿ ਪਛਾਨਹੁ ਭਗਤਿ ਹੀਨ ਜੋ ਪ੍ਰਾਨੀ ॥੨॥
ਕਲ ਮੈ ਮੁਕਤਿ ਨਾਮ ਤੇ ਪਾਵਤ ਗੁਰੁ ਯਹ ਭੇਦੁ ਬਤਾਵੈ ॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਸੋਈ ਨਰੁ ਗਰੂਆ ਜੋ ਪ੍ਰਭ ਕੇ ਗੁਨ ਗਾਵੈ ॥੩॥੩॥
बिलावलु महला ९ ॥
जा मै भजनु राम को नाही ॥
तिह नर जनमु अकारथु खोइआ यह राखहु मन माही ॥१॥ रहाउ ॥
तीरथ करै ब्रत फुनि राखै नह मनूआ बसि जा को ॥
निहफल धरमु ताहि तुम मानहु साचु कहत मै या कउ ॥१॥
जैसे पाहनु जल महि राखिओ भेदै नाहि तिह पानी ॥
तैसे ही तुम ताहि पछानहु भगति हीन जो प्रानी ॥२॥
कल मै मुकति नाम ते पावत गुरु यह भेदु बतावै ॥
कहु नानक सोई नरु गरूआ जो प्रभ के गुन गावै ॥३॥३॥
जा मै भजनु राम को नाही ॥
तिह नर जनमु अकारथु खोइआ यह राखहु मन माही ॥१॥ रहाउ ॥
तीरथ करै ब्रत फुनि राखै नह मनूआ बसि जा को ॥
निहफल धरमु ताहि तुम मानहु साचु कहत मै या कउ ॥१॥
जैसे पाहनु जल महि राखिओ भेदै नाहि तिह पानी ॥
तैसे ही तुम ताहि पछानहु भगति हीन जो प्रानी ॥२॥
कल मै मुकति नाम ते पावत गुरु यह भेदु बतावै ॥
कहु नानक सोई नरु गरूआ जो प्रभ के गुन गावै ॥३॥३॥
हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला ९ ॥ जिस मनुष्य के अंदर परमात्मा के नाम का भजन नहीं है हे भाई ! ये बात अच्छी तरह याद रखो कि, उस मनुष्य ने अपनी जिंदगी व्यर्थ ही गवा ली है। 1। रहाउ। हे भाई ! जिस मनुष्य का मन अपने बस में नहीं। वह चाहे तीर्थों पर स्नान करता है। वर्त भी रखता है। पर तुम (ये तीर्थ वर्त आदि वाला) उसका धर्म व्यर्थ समझो। मैं ऐसे मनुष्य को भी यह सच्ची बात कह देता हूँ। 1। हे भाई ! जैसे पत्थर पानी में रखा हुआ हो। उसको पानी भेद नहीं सकता। (पानी उस पर असर नहीं कर सकता)। ऐसा ही तुम उस मनुष्य को समझ लो जो प्रभू-भक्ती से वंचित है। 2। हे भाई ! गुरू जिंदगी का यह राज बताता है कि मानस जीवन में इन्सान परमात्मा के नाम के द्वारा ही विकारों से खलासी प्राप्त कर सकता है। हे नानक ! कह- वही मनुष्य आदरणीय हैं जो परमात्मा के गुण गाते रहते हैं। 3। 3।
ਬਿਲਾਵਲੁ ਅਸਟਪਦੀਆ ਮਹਲਾ ੧ ਘਰੁ ੧੦
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ਨਿਕਟਿ ਵਸੈ ਦੇਖੈ ਸਭੁ ਸੋਈ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਵਿਰਲਾ ਬੂਝੈ ਕੋਈ ॥
ਵਿਣੁ ਭੈ ਪਇਐ ਭਗਤਿ ਨ ਹੋਈ ॥
ਸਬਦਿ ਰਤੇ ਸਦਾ ਸੁਖੁ ਹੋਈ ॥੧॥
ਐਸਾ ਗਿਆਨੁ ਪਦਾਰਥੁ ਨਾਮੁ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਪਾਵਸਿ ਰਸਿ ਰਸਿ ਮਾਨੁ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਗਿਆਨੁ ਗਿਆਨੁ ਕਥੈ ਸਭੁ ਕੋਈ ॥
ਕਥਿ ਕਥਿ ਬਾਦੁ ਕਰੇ ਦੁਖੁ ਹੋਈ ॥
ਕਥਿ ਕਹਣੈ ਤੇ ਰਹੈ ਨ ਕੋਈ ॥
ਬਿਨੁ ਰਸ ਰਾਤੇ ਮੁਕਤਿ ਨ ਹੋਈ ॥੨॥
ਗਿਆਨੁ ਧਿਆਨੁ ਸਭੁ ਗੁਰ ਤੇ ਹੋਈ ॥
ਸਾਚੀ ਰਹਤ ਸਾਚਾ ਮਨਿ ਸੋਈ ॥
ਮਨਮੁਖ ਕਥਨੀ ਹੈ ਪਰੁ ਰਹਤ ਨ ਹੋਈ ॥
ਨਾਵਹੁ ਭੂਲੇ ਥਾਉ ਨ ਕੋਈ ॥੩॥
ਮਨੁ ਮਾਇਆ ਬੰਧਿਓ ਸਰ ਜਾਲਿ ॥
ਘਟਿ ਘਟਿ ਬਿਆਪਿ ਰਹਿਓ ਬਿਖੁ ਨਾਲਿ ॥
ਜੋ ਆਂਜੈ ਸੋ ਦੀਸੈ ਕਾਲਿ ॥
ਕਾਰਜੁ ਸੀਧੋ ਰਿਦੈ ਸਮੑਾਲਿ ॥੪॥
ਸੋ ਗਿਆਨੀ ਜਿਨਿ ਸਬਦਿ ਲਿਵ ਲਾਈ ॥
ਮਨਮੁਖਿ ਹਉਮੈ ਪਤਿ ਗਵਾਈ ॥
ਆਪੇ ਕਰਤੈ ਭਗਤਿ ਕਰਾਈ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਆਪੇ ਦੇ ਵਡਿਆਈ ॥੫॥
ਰੈਣਿ ਅੰਧਾਰੀ ਨਿਰਮਲ ਜੋਤਿ ॥
ਨਾਮ ਬਿਨਾ ਝੂਠੇ ਕੁਚਲ ਕਛੋਤਿ ॥
ਬੇਦੁ ਪੁਕਾਰੈ ਭਗਤਿ ਸਰੋਤਿ ॥
ਸੁਣਿ ਸੁਣਿ ਮਾਨੈ ਵੇਖੈ ਜੋਤਿ ॥੬॥
ਸਾਸਤ੍ਰ ਸਿਮ੍ਰਿਤਿ ਨਾਮੁ ਦ੍ਰਿੜਾਮੰ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਾਂਤਿ ਊਤਮ ਕਰਾਮੰ ॥
ਮਨਮੁਖਿ ਜੋਨੀ ਦੂਖ ਸਹਾਮੰ ॥
ਬੰਧਨ ਤੂਟੇ ਇਕੁ ਨਾਮੁ ਵਸਾਮੰ ॥੭॥
ਮੰਨੇ ਨਾਮੁ ਸਚੀ ਪਤਿ ਪੂਜਾ ॥
ਕਿਸੁ ਵੇਖਾ ਨਾਹੀ ਕੋ ਦੂਜਾ ॥
ਦੇਖਿ ਕਹਉ ਭਾਵੈ ਮਨਿ ਸੋਇ ॥
ਨਾਨਕੁ ਕਹੈ ਅਵਰੁ ਨਹੀ ਕੋਇ ॥੮॥੧॥
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ਨਿਕਟਿ ਵਸੈ ਦੇਖੈ ਸਭੁ ਸੋਈ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਵਿਰਲਾ ਬੂਝੈ ਕੋਈ ॥
ਵਿਣੁ ਭੈ ਪਇਐ ਭਗਤਿ ਨ ਹੋਈ ॥
ਸਬਦਿ ਰਤੇ ਸਦਾ ਸੁਖੁ ਹੋਈ ॥੧॥
ਐਸਾ ਗਿਆਨੁ ਪਦਾਰਥੁ ਨਾਮੁ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਪਾਵਸਿ ਰਸਿ ਰਸਿ ਮਾਨੁ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਗਿਆਨੁ ਗਿਆਨੁ ਕਥੈ ਸਭੁ ਕੋਈ ॥
ਕਥਿ ਕਥਿ ਬਾਦੁ ਕਰੇ ਦੁਖੁ ਹੋਈ ॥
ਕਥਿ ਕਹਣੈ ਤੇ ਰਹੈ ਨ ਕੋਈ ॥
ਬਿਨੁ ਰਸ ਰਾਤੇ ਮੁਕਤਿ ਨ ਹੋਈ ॥੨॥
ਗਿਆਨੁ ਧਿਆਨੁ ਸਭੁ ਗੁਰ ਤੇ ਹੋਈ ॥
ਸਾਚੀ ਰਹਤ ਸਾਚਾ ਮਨਿ ਸੋਈ ॥
ਮਨਮੁਖ ਕਥਨੀ ਹੈ ਪਰੁ ਰਹਤ ਨ ਹੋਈ ॥
ਨਾਵਹੁ ਭੂਲੇ ਥਾਉ ਨ ਕੋਈ ॥੩॥
ਮਨੁ ਮਾਇਆ ਬੰਧਿਓ ਸਰ ਜਾਲਿ ॥
ਘਟਿ ਘਟਿ ਬਿਆਪਿ ਰਹਿਓ ਬਿਖੁ ਨਾਲਿ ॥
ਜੋ ਆਂਜੈ ਸੋ ਦੀਸੈ ਕਾਲਿ ॥
ਕਾਰਜੁ ਸੀਧੋ ਰਿਦੈ ਸਮੑਾਲਿ ॥੪॥
ਸੋ ਗਿਆਨੀ ਜਿਨਿ ਸਬਦਿ ਲਿਵ ਲਾਈ ॥
ਮਨਮੁਖਿ ਹਉਮੈ ਪਤਿ ਗਵਾਈ ॥
ਆਪੇ ਕਰਤੈ ਭਗਤਿ ਕਰਾਈ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਆਪੇ ਦੇ ਵਡਿਆਈ ॥੫॥
ਰੈਣਿ ਅੰਧਾਰੀ ਨਿਰਮਲ ਜੋਤਿ ॥
ਨਾਮ ਬਿਨਾ ਝੂਠੇ ਕੁਚਲ ਕਛੋਤਿ ॥
ਬੇਦੁ ਪੁਕਾਰੈ ਭਗਤਿ ਸਰੋਤਿ ॥
ਸੁਣਿ ਸੁਣਿ ਮਾਨੈ ਵੇਖੈ ਜੋਤਿ ॥੬॥
ਸਾਸਤ੍ਰ ਸਿਮ੍ਰਿਤਿ ਨਾਮੁ ਦ੍ਰਿੜਾਮੰ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਾਂਤਿ ਊਤਮ ਕਰਾਮੰ ॥
ਮਨਮੁਖਿ ਜੋਨੀ ਦੂਖ ਸਹਾਮੰ ॥
ਬੰਧਨ ਤੂਟੇ ਇਕੁ ਨਾਮੁ ਵਸਾਮੰ ॥੭॥
ਮੰਨੇ ਨਾਮੁ ਸਚੀ ਪਤਿ ਪੂਜਾ ॥
ਕਿਸੁ ਵੇਖਾ ਨਾਹੀ ਕੋ ਦੂਜਾ ॥
ਦੇਖਿ ਕਹਉ ਭਾਵੈ ਮਨਿ ਸੋਇ ॥
ਨਾਨਕੁ ਕਹੈ ਅਵਰੁ ਨਹੀ ਕੋਇ ॥੮॥੧॥
बिलावलु असटपदीआ महला १ घरु १०
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
निकटि वसै देखै सभु सोई ॥
गुरमुखि विरला बूझै कोई ॥
विणु भै पइऐ भगति न होई ॥
सबदि रते सदा सुखु होई ॥१॥
ऐसा गिआनु पदारथु नामु ॥
गुरमुखि पावसि रसि रसि मानु ॥१॥ रहाउ ॥
गिआनु गिआनु कथै सभु कोई ॥
कथि कथि बादु करे दुखु होई ॥
कथि कहणै ते रहै न कोई ॥
बिनु रस राते मुकति न होई ॥२॥
गिआनु धिआनु सभु गुर ते होई ॥
साची रहत साचा मनि सोई ॥
मनमुख कथनी है परु रहत न होई ॥
नावहु भूले थाउ न कोई ॥३॥
मनु माइआ बंधिओ सर जालि ॥
घटि घटि बिआपि रहिओ बिखु नालि ॥
जो आंजै सो दीसै कालि ॥
कारजु सीधो रिदै सम॑ालि ॥४॥
सो गिआनी जिनि सबदि लिव लाई ॥
मनमुखि हउमै पति गवाई ॥
आपे करतै भगति कराई ॥
गुरमुखि आपे दे वडिआई ॥५॥
रैणि अंधारी निरमल जोति ॥
नाम बिना झूठे कुचल कछोति ॥
बेदु पुकारै भगति सरोति ॥
सुणि सुणि मानै वेखै जोति ॥६॥
सासत्र सिम्रिति नामु द्रिड़ामं ॥
गुरमुखि सांति ऊतम करामं ॥
मनमुखि जोनी दूख सहामं ॥
बंधन तूटे इकु नामु वसामं ॥७॥
मंने नामु सची पति पूजा ॥
किसु वेखा नाही को दूजा ॥
देखि कहउ भावै मनि सोइ ॥
नानकु कहै अवरु नही कोइ ॥८॥१॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
निकटि वसै देखै सभु सोई ॥
गुरमुखि विरला बूझै कोई ॥
विणु भै पइऐ भगति न होई ॥
सबदि रते सदा सुखु होई ॥१॥
ऐसा गिआनु पदारथु नामु ॥
गुरमुखि पावसि रसि रसि मानु ॥१॥ रहाउ ॥
गिआनु गिआनु कथै सभु कोई ॥
कथि कथि बादु करे दुखु होई ॥
कथि कहणै ते रहै न कोई ॥
बिनु रस राते मुकति न होई ॥२॥
गिआनु धिआनु सभु गुर ते होई ॥
साची रहत साचा मनि सोई ॥
मनमुख कथनी है परु रहत न होई ॥
नावहु भूले थाउ न कोई ॥३॥
मनु माइआ बंधिओ सर जालि ॥
घटि घटि बिआपि रहिओ बिखु नालि ॥
जो आंजै सो दीसै कालि ॥
कारजु सीधो रिदै सम॑ालि ॥४॥
सो गिआनी जिनि सबदि लिव लाई ॥
मनमुखि हउमै पति गवाई ॥
आपे करतै भगति कराई ॥
गुरमुखि आपे दे वडिआई ॥५॥
रैणि अंधारी निरमल जोति ॥
नाम बिना झूठे कुचल कछोति ॥
बेदु पुकारै भगति सरोति ॥
सुणि सुणि मानै वेखै जोति ॥६॥
सासत्र सिम्रिति नामु द्रिड़ामं ॥
गुरमुखि सांति ऊतम करामं ॥
मनमुखि जोनी दूख सहामं ॥
बंधन तूटे इकु नामु वसामं ॥७॥
मंने नामु सची पति पूजा ॥
किसु वेखा नाही को दूजा ॥
देखि कहउ भावै मनि सोइ ॥
नानकु कहै अवरु नही कोइ ॥८॥१॥
हिन्दी अर्थ: बिलावलु असटपदीआ महला १ घरु १० ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ परमात्मा (हरेक जीव के) नजदीक बसता है। वह स्वयं ही हरेक की संभाल करता है। पर यह भेद कोई विरला बंदा ही समझता है जो गुरू के सन्मुख रह के नाम जपता है। जब तक (यह) डर पैदा ना हो (कि वह हर वक्त नजदीक से देख रहा है) परमात्मा की भक्ति नहीं हो सकती। जो बंदे गुरू के शबद के द्वारा (नाम-रंग में) रंगे जाते हैं उनको सदा आत्मिक आनंद मिलता है। 1। परमात्मा का नाम एक ऐसा श्रेष्ठ पदार्थ है जो परमात्मा के साथ गहरी सांझ पैदा कर देता है। जो मनुष्य गुरू के सन्मुख हो के (ये पदार्थ) हासिल करता है। वह (इसके) रस में भीग के (लोक-परलोक में) आदर पाता है। 1। रहाउ। (ज़बानी ज़बानी तो) हर कोई कहता है (कि मुझे परमात्मा का) ज्ञान (प्राप्त हो गया है। ) ज्ञान (मिल गया है)। (ज्यों-ज्यों ज्ञान-ज्ञान) कह के चर्चा करता है (उस चर्चा में से) कलेश ही पैदा होता है। चर्चा करके (ऐसी आदत पड़ जाती है कि) चर्चा करने से जीव हटता भी नहीं। (पर चर्चा से कोई आत्मिक आनंद नहीं मिलता। क्योंकि) परमात्मा के नाम-रस में रंगे जाए बिना विकारों से खलासी नहीं मिलती। 2। परमात्मा के साथ गहरी सांझ और उसमें सुरति का टिकाव- ये सब कुछ गुरू से ही मिलता है। (जिसको मिलता है उसकी) रहनी पवित्र हो जाती है उसके मन में वह सदा-स्थिर प्रभू बस जाता है। अपने मन के पीछे चलने वाला बंदा (निरे ज्ञान की बातें) ही करता है। पर उसकी रहनी (पवित्र) नहीं होती। परमात्मा के नाम से टूटे हुए को (माया की भटकना से बचाने के लिए) कोई आसरा नहीं मिलता। 3। माया ने (जीवों के) मन को (मोह के) तीरों के जाल में बाँधा हुआ है। (चाहे परमात्मा) हरेक शरीर में मौजूद है। पर (माया के मोह का) जहर भी हरेक के अंदर ही है। (इस वास्ते) जो भी (जगत में) पैदा होता है वह आत्मिक मौत के वश में दिख रहा है। परमात्मा को हृदय में याद करने से ही (मनुष्य जीवन में) करने योग्य काम सिरे चढ़ते हैं। 4। वही मनुष्य ज्ञान-वान (कहलवा सकता) है जिसने गुरू के शबद के माध्यम से प्रभू के चरणों में सुरति जोड़ी है। अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य अहंकार के अधीन रह के अपनी इज्जत गवाता है। (पर जीव के भी क्या वश।) परमात्मा स्वयं ही अपनी भक्ति (जीवों से) करवाता है। स्वयं ही (जीव को) गुरू के सन्मुख करके वडिआई (सम्मान) देता है। 5। (सिमरन के बिना मनुष्य की उम्र) एक अंधेरी रात है। परमात्मा की ज्योति के प्रकट होने के साथ ही ये रौशन हो सकती है। नाम से टूटे हुए बंदे झूठे हैं गंदे हैं और बुरी छूत वाले हैं। (भाव। औरों को भी गलत रास्ते पर डाल देते हैं)। वेद आदि हरेक धर्म-पुस्तक भगती की शिक्षा ही पुकार-पुकार के बताता है। जो जो जीव इस शिक्षा को सुन-सुन के श्रद्धा (मन में) बसाता है वह ईश्वरीय ज्योति को (हर जगह) देखता है। 6। स्मृतियाँ-शास्त्र आदि धर्म-पुस्तकें भी नाम-सिमरन की ताकीद करते हैं। जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ कर सिमरते हैं उनके अंदर शांति पैदा होती है। उनकी रहणी श्रेष्ठ हो जाती है। अपने मन के पीछे चलने वाले बंदेजनम-मरण का दुख सहते हैं। ये बँधन तब ही टूटते हैं जब परमात्मा के नाम को दिल में बसाया जाए। 7। जो बंदा उसके नाम को (अपने हृदय में) दृढ़ करता है उसको सच्ची इज्जत मिलती है। उसका आदर होता है। परमात्मा के बिना कोई और (उस जैसा) नहीं। मैं हर जगह उसी को देखता हूँ वही मुझे अपने मन में प्यारा लगता है। नानक कहता है- उसे (हर जगह) देख के मैं उसकी सिफत सालाह करता हूँ। उसके बिना उस जैसा कोई और नहीं।8। 1।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 831 है, राग बिलावल का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)।
गुरु नानक की वाणी, observational, direct, बिना ornament।
Jor Bagh metro station से Khan Market की 10-मिनट की walk में मन का थमना।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 48 पंक्तियों का है, 3 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 831” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: बिलावल राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 832 →, पीछे का: ← अंग 830।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।