अंग
830
राग बिलावल
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਅਨਿਕ ਭਗਤ ਅਨਿਕ ਜਨ ਤਾਰੇ ਸਿਮਰਹਿ ਅਨਿਕ ਮੁਨੀ ॥
ਅੰਧੁਲੇ ਟਿਕ ਨਿਰਧਨ ਧਨੁ ਪਾਇਓ ਪ੍ਰਭ ਨਾਨਕ ਅਨਿਕ ਗੁਨੀ ॥੨॥੨॥੧੨੭॥
ਅੰਧੁਲੇ ਟਿਕ ਨਿਰਧਨ ਧਨੁ ਪਾਇਓ ਪ੍ਰਭ ਨਾਨਕ ਅਨਿਕ ਗੁਨੀ ॥੨॥੨॥੧੨੭॥
अनिक भगत अनिक जन तारे सिमरहि अनिक मुनी ॥
अंधुले टिक निरधन धनु पाइओ प्रभ नानक अनिक गुनी ॥२॥२॥१२७॥
अंधुले टिक निरधन धनु पाइओ प्रभ नानक अनिक गुनी ॥२॥२॥१२७॥
हिन्दी अर्थ: हे मालिक ! (कह-) हे अनेकों गुणों के मालिक प्रभू ! (तेरा नाम) अंधे मनुष्य को। जैसे। छड़ी मिल जाती है। कंगाल को धन मिल जाता है। हे प्रभू ! अनेकों ही ऋषि-मुनि तेरा नाम सिमरते हैं। (सिमरन करने वाले) अनेकों ही भक्त अनेकों ही सेवक। हे प्रभू ! तूने (संसार-समुंद्र से) पार लंघा दिए हैं। 2। 2। 127।
ਰਾਗੁ ਬਿਲਾਵਲੁ ਮਹਲਾ ੫ ਘਰੁ ੧੩ ਪੜਤਾਲ
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ਮੋਹਨ ਨੀਦ ਨ ਆਵੈ ਹਾਵੈ ਹਾਰ ਕਜਰ ਬਸਤ੍ਰ ਅਭਰਨ ਕੀਨੇ ॥
ਉਡੀਨੀ ਉਡੀਨੀ ਉਡੀਨੀ ॥
ਕਬ ਘਰਿ ਆਵੈ ਰੀ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਸਰਨਿ ਸੁਹਾਗਨਿ ਚਰਨ ਸੀਸੁ ਧਰਿ ॥
ਲਾਲਨੁ ਮੋਹਿ ਮਿਲਾਵਹੁ ॥
ਕਬ ਘਰਿ ਆਵੈ ਰੀ ॥੧॥
ਸੁਨਹੁ ਸਹੇਰੀ ਮਿਲਨ ਬਾਤ ਕਹਉ ਸਗਰੋ ਅਹੰ ਮਿਟਾਵਹੁ ਤਉ ਘਰ ਹੀ ਲਾਲਨੁ ਪਾਵਹੁ ॥
ਤਬ ਰਸ ਮੰਗਲ ਗੁਨ ਗਾਵਹੁ ॥
ਆਨਦ ਰੂਪ ਧਿਆਵਹੁ ॥
ਨਾਨਕੁ ਦੁਆਰੈ ਆਇਓ ॥
ਤਉ ਮੈ ਲਾਲਨੁ ਪਾਇਓ ਰੀ ॥੨॥
ਮੋਹਨ ਰੂਪੁ ਦਿਖਾਵੈ ॥
ਅਬ ਮੋਹਿ ਨੀਦ ਸੁਹਾਵੈ ॥
ਸਭ ਮੇਰੀ ਤਿਖਾ ਬੁਝਾਨੀ ॥
ਅਬ ਮੈ ਸਹਜਿ ਸਮਾਨੀ ॥
ਮੀਠੀ ਪਿਰਹਿ ਕਹਾਨੀ ॥
ਮੋਹਨੁ ਲਾਲਨੁ ਪਾਇਓ ਰੀ ॥ ਰਹਾਉ ਦੂਜਾ ॥੧॥੧੨੮॥
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ਮੋਹਨ ਨੀਦ ਨ ਆਵੈ ਹਾਵੈ ਹਾਰ ਕਜਰ ਬਸਤ੍ਰ ਅਭਰਨ ਕੀਨੇ ॥
ਉਡੀਨੀ ਉਡੀਨੀ ਉਡੀਨੀ ॥
ਕਬ ਘਰਿ ਆਵੈ ਰੀ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਸਰਨਿ ਸੁਹਾਗਨਿ ਚਰਨ ਸੀਸੁ ਧਰਿ ॥
ਲਾਲਨੁ ਮੋਹਿ ਮਿਲਾਵਹੁ ॥
ਕਬ ਘਰਿ ਆਵੈ ਰੀ ॥੧॥
ਸੁਨਹੁ ਸਹੇਰੀ ਮਿਲਨ ਬਾਤ ਕਹਉ ਸਗਰੋ ਅਹੰ ਮਿਟਾਵਹੁ ਤਉ ਘਰ ਹੀ ਲਾਲਨੁ ਪਾਵਹੁ ॥
ਤਬ ਰਸ ਮੰਗਲ ਗੁਨ ਗਾਵਹੁ ॥
ਆਨਦ ਰੂਪ ਧਿਆਵਹੁ ॥
ਨਾਨਕੁ ਦੁਆਰੈ ਆਇਓ ॥
ਤਉ ਮੈ ਲਾਲਨੁ ਪਾਇਓ ਰੀ ॥੨॥
ਮੋਹਨ ਰੂਪੁ ਦਿਖਾਵੈ ॥
ਅਬ ਮੋਹਿ ਨੀਦ ਸੁਹਾਵੈ ॥
ਸਭ ਮੇਰੀ ਤਿਖਾ ਬੁਝਾਨੀ ॥
ਅਬ ਮੈ ਸਹਜਿ ਸਮਾਨੀ ॥
ਮੀਠੀ ਪਿਰਹਿ ਕਹਾਨੀ ॥
ਮੋਹਨੁ ਲਾਲਨੁ ਪਾਇਓ ਰੀ ॥ ਰਹਾਉ ਦੂਜਾ ॥੧॥੧੨੮॥
रागु बिलावलु महला ५ घरु १३ पड़ताल
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
मोहन नीद न आवै हावै हार कजर बसत्र अभरन कीने ॥
उडीनी उडीनी उडीनी ॥
कब घरि आवै री ॥१॥ रहाउ ॥
सरनि सुहागनि चरन सीसु धरि ॥
लालनु मोहि मिलावहु ॥
कब घरि आवै री ॥१॥
सुनहु सहेरी मिलन बात कहउ सगरो अहं मिटावहु तउ घर ही लालनु पावहु ॥
तब रस मंगल गुन गावहु ॥
आनद रूप धिआवहु ॥
नानकु दुआरै आइओ ॥
तउ मै लालनु पाइओ री ॥२॥
मोहन रूपु दिखावै ॥
अब मोहि नीद सुहावै ॥
सभ मेरी तिखा बुझानी ॥
अब मै सहजि समानी ॥
मीठी पिरहि कहानी ॥
मोहनु लालनु पाइओ री ॥ रहाउ दूजा ॥१॥१२८॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
मोहन नीद न आवै हावै हार कजर बसत्र अभरन कीने ॥
उडीनी उडीनी उडीनी ॥
कब घरि आवै री ॥१॥ रहाउ ॥
सरनि सुहागनि चरन सीसु धरि ॥
लालनु मोहि मिलावहु ॥
कब घरि आवै री ॥१॥
सुनहु सहेरी मिलन बात कहउ सगरो अहं मिटावहु तउ घर ही लालनु पावहु ॥
तब रस मंगल गुन गावहु ॥
आनद रूप धिआवहु ॥
नानकु दुआरै आइओ ॥
तउ मै लालनु पाइओ री ॥२॥
मोहन रूपु दिखावै ॥
अब मोहि नीद सुहावै ॥
सभ मेरी तिखा बुझानी ॥
अब मै सहजि समानी ॥
मीठी पिरहि कहानी ॥
मोहनु लालनु पाइओ री ॥ रहाउ दूजा ॥१॥१२८॥
हिन्दी अर्थ: रागु बिलावलु महला ५ घरु १३ पड़ताल ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ हे मोहन प्रभू ! (जैसे पति से विछुड़ी हुई स्त्री चाहे जैसे भी) हार। काजल। कपड़े। गहने पहनती है (पर विछोड़े के कारण) आहें भरती (उसे) नींद नहीं आती। (पति के इन्तजार में वह) हर वक्त उदास रहती है। (और सहेली से पूछती है-) हे बहन ! (मेरा पति) कब घर आएगा। (इसी तरह। हे मोहन ! तुझसे विछुड़ के मुझे शांति नहीं आती)। 1। रहाउ। हे मोहन प्रभू ! मैं गुरमुख सोहागिन की शरण पड़ती हूँ। उसके चरणों पे (अपना) सिर धर के (पूछती हूँ-) हे बहन ! मुझे सोहाना लाल मिला दे (बता। वह) कब मेरे हृदय-घर में आएगा। 1। (सोहागिन कहती है-) हे सहेली ! सुन। मैं तुझे मोहन-प्रभू मिलन की बात सुनाती हूँ। तू (अपने अंदर से) सारा अहंकार दूर कर दे। तब तू अपने हृदय-घर में उस सोहणे लाल को पा लेगी। (हृदय-घर में उसके दर्शन करके) फिर तू खुशी-आनंद पैदा करने वाले हरी-गुण गाया करना जो सिर्फ आनंद ही आनंद रूप है। हे बहन ! नानक (भी उस गुरू के) दर पर आ गया है। (गुरू के दर पर आ के) मैंने (नानक के हृदय-घर में ही) सोहणा लाल पा लिया है। 2। हे बहन ! (अब) मोहन प्रभू मुझे दर्शन दे रहे हैं। अब (माया के मोह की ओर से पैदा हुई) उपरामता मुझे मीठी लग रही है। मेरी सारी माया की तृष्णा मिट गई है। अब मैं आत्मिक अडोलता में टिक गई हूँ। प्रभू-पति की सिफत-सालाह की बातें मुझे प्यारी लग रही हैं। हे बहन ! अब मैंने सोहणा लाल मोहन पा लिया है। रहाउ दूजा। 1। 128।
ਬਿਲਾਵਲੁ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਮੋਰੀ ਅਹੰ ਜਾਇ ਦਰਸਨ ਪਾਵਤ ਹੇ ॥
ਰਾਚਹੁ ਨਾਥ ਹੀ ਸਹਾਈ ਸੰਤਨਾ ॥
ਅਬ ਚਰਨ ਗਹੇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਆਹੇ ਮਨ ਅਵਰੁ ਨ ਭਾਵੈ ਚਰਨਾਵੈ ਚਰਨਾਵੈ ਉਲਝਿਓ ਅਲਿ ਮਕਰੰਦ ਕਮਲ ਜਿਉ ॥
ਅਨ ਰਸ ਨਹੀ ਚਾਹੈ ਏਕੈ ਹਰਿ ਲਾਹੈ ॥੧॥
ਅਨ ਤੇ ਟੂਟੀਐ ਰਿਖ ਤੇ ਛੂਟੀਐ ॥
ਮਨ ਹਰਿ ਰਸ ਘੂਟੀਐ ਸੰਗਿ ਸਾਧੂ ਉਲਟੀਐ ॥
ਅਨ ਨਾਹੀ ਨਾਹੀ ਰੇ ॥
ਨਾਨਕ ਪ੍ਰੀਤਿ ਚਰਨ ਚਰਨ ਹੇ ॥੨॥੨॥੧੨੯॥
ਮੋਰੀ ਅਹੰ ਜਾਇ ਦਰਸਨ ਪਾਵਤ ਹੇ ॥
ਰਾਚਹੁ ਨਾਥ ਹੀ ਸਹਾਈ ਸੰਤਨਾ ॥
ਅਬ ਚਰਨ ਗਹੇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਆਹੇ ਮਨ ਅਵਰੁ ਨ ਭਾਵੈ ਚਰਨਾਵੈ ਚਰਨਾਵੈ ਉਲਝਿਓ ਅਲਿ ਮਕਰੰਦ ਕਮਲ ਜਿਉ ॥
ਅਨ ਰਸ ਨਹੀ ਚਾਹੈ ਏਕੈ ਹਰਿ ਲਾਹੈ ॥੧॥
ਅਨ ਤੇ ਟੂਟੀਐ ਰਿਖ ਤੇ ਛੂਟੀਐ ॥
ਮਨ ਹਰਿ ਰਸ ਘੂਟੀਐ ਸੰਗਿ ਸਾਧੂ ਉਲਟੀਐ ॥
ਅਨ ਨਾਹੀ ਨਾਹੀ ਰੇ ॥
ਨਾਨਕ ਪ੍ਰੀਤਿ ਚਰਨ ਚਰਨ ਹੇ ॥੨॥੨॥੧੨੯॥
बिलावलु महला ५ ॥
मोरी अहं जाइ दरसन पावत हे ॥
राचहु नाथ ही सहाई संतना ॥
अब चरन गहे ॥१॥ रहाउ ॥
आहे मन अवरु न भावै चरनावै चरनावै उलझिओ अलि मकरंद कमल जिउ ॥
अन रस नही चाहै एकै हरि लाहै ॥१॥
अन ते टूटीऐ रिख ते छूटीऐ ॥
मन हरि रस घूटीऐ संगि साधू उलटीऐ ॥
अन नाही नाही रे ॥
नानक प्रीति चरन चरन हे ॥२॥२॥१२९॥
मोरी अहं जाइ दरसन पावत हे ॥
राचहु नाथ ही सहाई संतना ॥
अब चरन गहे ॥१॥ रहाउ ॥
आहे मन अवरु न भावै चरनावै चरनावै उलझिओ अलि मकरंद कमल जिउ ॥
अन रस नही चाहै एकै हरि लाहै ॥१॥
अन ते टूटीऐ रिख ते छूटीऐ ॥
मन हरि रस घूटीऐ संगि साधू उलटीऐ ॥
अन नाही नाही रे ॥
नानक प्रीति चरन चरन हे ॥२॥२॥१२९॥
हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला ५ ॥ पति-प्रभू के दर्शन करने से अब मेरा अहंकार दूर हो गया है। हे भाई ! संतों के सहायक पति-प्रभू के चरणों में सदा जुड़े रहो। मैंने तो अब उसी के ही चरण पकड़ लिए हैं।1। रहाउ। (हे भाई ! प्रभू के दर्शन की बरकति से) मेरे मन को और कुछ अच्छा नहीं लगता। (प्रभू के दर्शनों को ही) तड़पता रहता है। जैसे भौंरा कमल-पुष्प के मकरंद पर ही लिपटा रहता है। वैसे ही मेरा मन प्रभू के चरणों की ओर ही बार-बार पलटता है। मेरा मन और (पदार्थों के) स्वाद को नहीं ढूँढता। एक परमात्मा को ही तलाशता है। 1। (हे भाई ! प्रभू के दर्शन की बरकति से) और (पदार्थों के मोह) संबंध तोड़ लेते हैं। इन्द्रियों की पकड़ से निजात पा लेते हैं। हे मन ! गुरू की संगति में रह के परमात्मा का नाम-रस चूसते हैं। और (माया के मोह से बिरती) पलट जाती है। हे नानक ! (कह-) हे भाई ! (दर्शन की बरकति से) और मोह बिल्कुल ही नहीं भाते। (अगर कोई मोह अच्छा लगता है तो वह है) हर वक्त प्रभू के चरणों से ही प्यार बना रहता है। 2। 2। 129।
ਰਾਗੁ ਬਿਲਾਵਲੁ ਮਹਲਾ ੯ ਦੁਪਦੇ
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ਦੁਖ ਹਰਤਾ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਪਛਾਨੋ ॥
ਅਜਾਮਲੁ ਗਨਿਕਾ ਜਿਹ ਸਿਮਰਤ ਮੁਕਤ ਭਏ ਜੀਅ ਜਾਨੋ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਗਜ ਕੀ ਤ੍ਰਾਸ ਮਿਟੀ ਛਿਨਹੂ ਮਹਿ ਜਬ ਹੀ ਰਾਮੁ ਬਖਾਨੋ ॥
ਨਾਰਦ ਕਹਤ ਸੁਨਤ ਧ੍ਰੂਅ ਬਾਰਿਕ ਭਜਨ ਮਾਹਿ ਲਪਟਾਨੋ ॥੧॥
ਅਚਲ ਅਮਰ ਨਿਰਭੈ ਪਦੁ ਪਾਇਓ ਜਗਤ ਜਾਹਿ ਹੈਰਾਨੋ ॥
ਨਾਨਕ ਕਹਤ ਭਗਤ ਰਛਕ ਹਰਿ ਨਿਕਟਿ ਤਾਹਿ ਤੁਮ ਮਾਨੋ ॥੨॥੧॥
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ਦੁਖ ਹਰਤਾ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਪਛਾਨੋ ॥
ਅਜਾਮਲੁ ਗਨਿਕਾ ਜਿਹ ਸਿਮਰਤ ਮੁਕਤ ਭਏ ਜੀਅ ਜਾਨੋ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਗਜ ਕੀ ਤ੍ਰਾਸ ਮਿਟੀ ਛਿਨਹੂ ਮਹਿ ਜਬ ਹੀ ਰਾਮੁ ਬਖਾਨੋ ॥
ਨਾਰਦ ਕਹਤ ਸੁਨਤ ਧ੍ਰੂਅ ਬਾਰਿਕ ਭਜਨ ਮਾਹਿ ਲਪਟਾਨੋ ॥੧॥
ਅਚਲ ਅਮਰ ਨਿਰਭੈ ਪਦੁ ਪਾਇਓ ਜਗਤ ਜਾਹਿ ਹੈਰਾਨੋ ॥
ਨਾਨਕ ਕਹਤ ਭਗਤ ਰਛਕ ਹਰਿ ਨਿਕਟਿ ਤਾਹਿ ਤੁਮ ਮਾਨੋ ॥੨॥੧॥
रागु बिलावलु महला ९ दुपदे
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
दुख हरता हरि नामु पछानो ॥
अजामलु गनिका जिह सिमरत मुकत भए जीअ जानो ॥१॥ रहाउ ॥
गज की त्रास मिटी छिनहू महि जब ही रामु बखानो ॥
नारद कहत सुनत ध्रूअ बारिक भजन माहि लपटानो ॥१॥
अचल अमर निरभै पदु पाइओ जगत जाहि हैरानो ॥
नानक कहत भगत रछक हरि निकटि ताहि तुम मानो ॥२॥१॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
दुख हरता हरि नामु पछानो ॥
अजामलु गनिका जिह सिमरत मुकत भए जीअ जानो ॥१॥ रहाउ ॥
गज की त्रास मिटी छिनहू महि जब ही रामु बखानो ॥
नारद कहत सुनत ध्रूअ बारिक भजन माहि लपटानो ॥१॥
अचल अमर निरभै पदु पाइओ जगत जाहि हैरानो ॥
नानक कहत भगत रछक हरि निकटि ताहि तुम मानो ॥२॥१॥
हिन्दी अर्थ: रागु बिलावलु महला ९ दुपदे ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ हे भाई ! परमात्मा के नाम के साथ सांझ डाले रख। ये नाम सारे दुखों का नाश करने वाला है। इस नाम को सिमरते-सिमरते अजामल विकारों से हट गया। गनिका विकारों से मुक्त हो गई। तू भी अपने दिल में उस हरी-नाम के साथ जान-पहचान बनाए रख। 1। रहाउ। हे भाई ! जब गज ने परमात्मा का नाम उचारा। उसकी बिपदा भी एक पल में दूर हो गई। नारद का दिया हुआ उपदेश सुनते ही बालक ध्रुव परमात्मा के भजन में मस्त हो गया। 1। (हरी-नाम के भजन की बरकति से ध्रुव ने) ऐसा आत्मिक दर्जा प्राप्त कर लिया जो सदा के लिए अटल और अमर हो गया। उसको देख के दुनिया हैरान हो रही है। नानक कहता है- हे भाई ! तू भी उस परमात्मा को सदा अपने अंग-संग बसता समझ। वह परमात्मा अपने भक्तों की रक्षा करने वाला है। 2। 1।
ਬਿਲਾਵਲੁ ਮਹਲਾ ੯ ॥
ਹਰਿ ਕੇ ਨਾਮ ਬਿਨਾ ਦੁਖੁ ਪਾਵੈ ॥
ਭਗਤਿ ਬਿਨਾ ਸਹਸਾ ਨਹ ਚੂਕੈ ਗੁਰੁ ਇਹੁ ਭੇਦੁ ਬਤਾਵੈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਕਹਾ ਭਇਓ ਤੀਰਥ ਬ੍ਰਤ ਕੀਏ ਰਾਮ ਸਰਨਿ ਨਹੀ ਆਵੈ ॥
ਹਰਿ ਕੇ ਨਾਮ ਬਿਨਾ ਦੁਖੁ ਪਾਵੈ ॥
ਭਗਤਿ ਬਿਨਾ ਸਹਸਾ ਨਹ ਚੂਕੈ ਗੁਰੁ ਇਹੁ ਭੇਦੁ ਬਤਾਵੈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਕਹਾ ਭਇਓ ਤੀਰਥ ਬ੍ਰਤ ਕੀਏ ਰਾਮ ਸਰਨਿ ਨਹੀ ਆਵੈ ॥
बिलावलु महला ९ ॥
हरि के नाम बिना दुखु पावै ॥
भगति बिना सहसा नह चूकै गुरु इहु भेदु बतावै ॥१॥ रहाउ ॥
कहा भइओ तीरथ ब्रत कीए राम सरनि नही आवै ॥
हरि के नाम बिना दुखु पावै ॥
भगति बिना सहसा नह चूकै गुरु इहु भेदु बतावै ॥१॥ रहाउ ॥
कहा भइओ तीरथ ब्रत कीए राम सरनि नही आवै ॥
हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला ९ ॥ परमात्मा का नाम (सिमरन) के बिना दुख सहता रहता है। हे भाई ! गुरू (जीवन-मार्ग की) यह गहरी बात बताता है कि परमात्मा की भक्ति किए बिना मनुष्य का सहम खत्म नहीं होता।1। रहाउ। हे भाई ! अगर मनुष्य परमात्मा की शरण नहीं पड़ता। तो उसका तीर्थ-यात्रा करने का कोई लाभ नहीं। वर्त रखने का कोई फायदा नहीं।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 830 है, राग बिलावल का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।
M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।
New Friends Colony के पाँच-मंज़िला flat की terrace पर रात की हवा।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 43 पंक्तियों का है, 5 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 830” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: बिलावल राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 831 →, पीछे का: ← अंग 829।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।