अंग
825
राग बिलावल
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ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਪੂਰਨ ਪ੍ਰਭ ਦਾਤੇ ਨਿਰਮਲ ਜਸੁ ਨਾਨਕ ਦਾਸ ਕਹੇ ॥੨॥੧੭॥੧੦੩॥
करि किरपा पूरन प्रभ दाते निरमल जसु नानक दास कहे ॥२॥१७॥१०३॥
हिन्दी अर्थ: हे सर्व-व्यापक दातार प्रभू ! मेहर कर। ता कि तेरा दास नानक पवित्र करने वाली तेरी सिफत-सालाह करता रहे। 2। 17। 103।
ਬਿਲਾਵਲੁ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਸੁਲਹੀ ਤੇ ਨਾਰਾਇਣ ਰਾਖੁ ॥
ਸੁਲਹੀ ਕਾ ਹਾਥੁ ਕਹੀ ਨ ਪਹੁਚੈ ਸੁਲਹੀ ਹੋਇ ਮੂਆ ਨਾਪਾਕੁ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਕਾਢਿ ਕੁਠਾਰੁ ਖਸਮਿ ਸਿਰੁ ਕਾਟਿਆ ਖਿਨ ਮਹਿ ਹੋਇ ਗਇਆ ਹੈ ਖਾਕੁ ॥
ਮੰਦਾ ਚਿਤਵਤ ਚਿਤਵਤ ਪਚਿਆ ਜਿਨਿ ਰਚਿਆ ਤਿਨਿ ਦੀਨਾ ਧਾਕੁ ॥੧॥
ਪੁਤ੍ਰ ਮੀਤ ਧਨੁ ਕਿਛੂ ਨ ਰਹਿਓ ਸੁ ਛੋਡਿ ਗਇਆ ਸਭ ਭਾਈ ਸਾਕੁ ॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਤਿਸੁ ਪ੍ਰਭ ਬਲਿਹਾਰੀ ਜਿਨਿ ਜਨ ਕਾ ਕੀਨੋ ਪੂਰਨ ਵਾਕੁ ॥੨॥੧੮॥੧੦੪॥
ਸੁਲਹੀ ਤੇ ਨਾਰਾਇਣ ਰਾਖੁ ॥
ਸੁਲਹੀ ਕਾ ਹਾਥੁ ਕਹੀ ਨ ਪਹੁਚੈ ਸੁਲਹੀ ਹੋਇ ਮੂਆ ਨਾਪਾਕੁ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਕਾਢਿ ਕੁਠਾਰੁ ਖਸਮਿ ਸਿਰੁ ਕਾਟਿਆ ਖਿਨ ਮਹਿ ਹੋਇ ਗਇਆ ਹੈ ਖਾਕੁ ॥
ਮੰਦਾ ਚਿਤਵਤ ਚਿਤਵਤ ਪਚਿਆ ਜਿਨਿ ਰਚਿਆ ਤਿਨਿ ਦੀਨਾ ਧਾਕੁ ॥੧॥
ਪੁਤ੍ਰ ਮੀਤ ਧਨੁ ਕਿਛੂ ਨ ਰਹਿਓ ਸੁ ਛੋਡਿ ਗਇਆ ਸਭ ਭਾਈ ਸਾਕੁ ॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਤਿਸੁ ਪ੍ਰਭ ਬਲਿਹਾਰੀ ਜਿਨਿ ਜਨ ਕਾ ਕੀਨੋ ਪੂਰਨ ਵਾਕੁ ॥੨॥੧੮॥੧੦੪॥
बिलावलु महला ५ ॥
सुलही ते नाराइण राखु ॥
सुलही का हाथु कही न पहुचै सुलही होइ मूआ नापाकु ॥१॥ रहाउ ॥
काढि कुठारु खसमि सिरु काटिआ खिन महि होइ गइआ है खाकु ॥
मंदा चितवत चितवत पचिआ जिनि रचिआ तिनि दीना धाकु ॥१॥
पुत्र मीत धनु किछू न रहिओ सु छोडि गइआ सभ भाई साकु ॥
कहु नानक तिसु प्रभ बलिहारी जिनि जन का कीनो पूरन वाकु ॥२॥१८॥१०४॥
सुलही ते नाराइण राखु ॥
सुलही का हाथु कही न पहुचै सुलही होइ मूआ नापाकु ॥१॥ रहाउ ॥
काढि कुठारु खसमि सिरु काटिआ खिन महि होइ गइआ है खाकु ॥
मंदा चितवत चितवत पचिआ जिनि रचिआ तिनि दीना धाकु ॥१॥
पुत्र मीत धनु किछू न रहिओ सु छोडि गइआ सभ भाई साकु ॥
कहु नानक तिसु प्रभ बलिहारी जिनि जन का कीनो पूरन वाकु ॥२॥१८॥१०४॥
हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला ५ ॥ (हे प्रभू मुझ सेवक की तो तेरे पास ही अरजोई थी कि) हे प्रभू ! (हमें) सूलही (खान) से बचा ले। और सूलही का (जुल्म भरा) हाथ (हम पर) कहीं भी ना पहुँच सके। (हे भाई ! प्रभू ने स्वयं मेहर की है) सूलही (खान) मलीन बुद्धि हो के मरा है। 1। रहाउ। हे भाई ! पति प्रभू ने (मौत रूपी) कुहाड़ा निकाल के (सूलही का) सिर कलम कर दिया है। (जिसके कारण वह) एक पल में ही राख की ढेरी हो गया है। औरों का नुकसान करना सोचते सोचते (सूलही खुद) जल मरा है। जिस प्रभू ने उसको पैदा किया था। उसने (ही उसको परलोक की ओर) धकेल दिया है। 1। हे भाई ! सारे संबंधी (कुटंब) छोड़ के (सूलही इस दुनिया से) चला गया है। उसके लिए तो ना कोई पुत्र रह गया। ना कोई मित्र रह गया। ना धन रह गया। उसकी बाबत तो कुछ भी ना रहा। हे नानक ! कह-मैं उस प्रभू से कुर्बान जाता हूँ। जिसने अपने सेवक की अरदास सुनी है (और। सेवक को सूलही से बचाया है)। 2। 18। 104।
ਬਿਲਾਵਲੁ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਪੂਰੇ ਗੁਰ ਕੀ ਪੂਰੀ ਸੇਵ ॥
ਆਪੇ ਆਪਿ ਵਰਤੈ ਸੁਆਮੀ ਕਾਰਜੁ ਰਾਸਿ ਕੀਆ ਗੁਰਦੇਵ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਆਦਿ ਮਧਿ ਪ੍ਰਭੁ ਅੰਤਿ ਸੁਆਮੀ ਅਪਨਾ ਥਾਟੁ ਬਨਾਇਓ ਆਪਿ ॥
ਅਪਨੇ ਸੇਵਕ ਕੀ ਆਪੇ ਰਾਖੈ ਪ੍ਰਭ ਮੇਰੇ ਕੋ ਵਡ ਪਰਤਾਪੁ ॥੧॥
ਪਾਰਬ੍ਰਹਮ ਪਰਮੇਸੁਰ ਸਤਿਗੁਰ ਵਸਿ ਕੀਨੑੇ ਜਿਨਿ ਸਗਲੇ ਜੰਤ ॥
ਚਰਨ ਕਮਲ ਨਾਨਕ ਸਰਣਾਈ ਰਾਮ ਨਾਮ ਜਪਿ ਨਿਰਮਲ ਮੰਤ ॥੨॥੧੯॥੧੦੫॥
ਪੂਰੇ ਗੁਰ ਕੀ ਪੂਰੀ ਸੇਵ ॥
ਆਪੇ ਆਪਿ ਵਰਤੈ ਸੁਆਮੀ ਕਾਰਜੁ ਰਾਸਿ ਕੀਆ ਗੁਰਦੇਵ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਆਦਿ ਮਧਿ ਪ੍ਰਭੁ ਅੰਤਿ ਸੁਆਮੀ ਅਪਨਾ ਥਾਟੁ ਬਨਾਇਓ ਆਪਿ ॥
ਅਪਨੇ ਸੇਵਕ ਕੀ ਆਪੇ ਰਾਖੈ ਪ੍ਰਭ ਮੇਰੇ ਕੋ ਵਡ ਪਰਤਾਪੁ ॥੧॥
ਪਾਰਬ੍ਰਹਮ ਪਰਮੇਸੁਰ ਸਤਿਗੁਰ ਵਸਿ ਕੀਨੑੇ ਜਿਨਿ ਸਗਲੇ ਜੰਤ ॥
ਚਰਨ ਕਮਲ ਨਾਨਕ ਸਰਣਾਈ ਰਾਮ ਨਾਮ ਜਪਿ ਨਿਰਮਲ ਮੰਤ ॥੨॥੧੯॥੧੦੫॥
बिलावलु महला ५ ॥
पूरे गुर की पूरी सेव ॥
आपे आपि वरतै सुआमी कारजु रासि कीआ गुरदेव ॥१॥ रहाउ ॥
आदि मधि प्रभु अंति सुआमी अपना थाटु बनाइओ आपि ॥
अपने सेवक की आपे राखै प्रभ मेरे को वड परतापु ॥१॥
पारब्रहम परमेसुर सतिगुर वसि कीन॑े जिनि सगले जंत ॥
चरन कमल नानक सरणाई राम नाम जपि निरमल मंत ॥२॥१९॥१०५॥
पूरे गुर की पूरी सेव ॥
आपे आपि वरतै सुआमी कारजु रासि कीआ गुरदेव ॥१॥ रहाउ ॥
आदि मधि प्रभु अंति सुआमी अपना थाटु बनाइओ आपि ॥
अपने सेवक की आपे राखै प्रभ मेरे को वड परतापु ॥१॥
पारब्रहम परमेसुर सतिगुर वसि कीन॑े जिनि सगले जंत ॥
चरन कमल नानक सरणाई राम नाम जपि निरमल मंत ॥२॥१९॥१०५॥
हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला ५ ॥ हे भाई ! पूरे गुरू का आसरा (जिंदगी को) कामयाब (बना देता है)। (शरण आए सिख का) हरेक काम गुरू ने (सदा) सफल किया है। (गुरू की कृपा से ये विश्वास बन जाता है कि) मालिक-प्रभू हर जगह खुद ही खुद मौजूद है। 1। रहाउ। (हे भाई ! गुरू ये श्रद्धा पैदा करता है कि) जिस प्रभू ने अपना ये जगत-खेल बनाया है वह मालिक प्रभू (इस खेल के) आरम्भ में। अब और आखिर में सदा कायम रहने वाला है। (गुरू से ये निश्चय मिलता है कि) उस परमात्मा की बड़ी ताकत है। अपने सेवक की वह स्वयं ही लाज (सदा) रखता आया हैं1। हे नानक ! जिस पारब्रहम परमेश्वर ने सारे जीव-जंतु अपने वश में रखे हुए हैं। उसके सुंदर चरणों की शरण पड़े रहना चाहिए। गुरू की शरण पड़े रहना चाहिए। (गुरू की शरण पड़ के) प्रभू का नाम-मंत्र जपने से पवित्र जीवन वाले बन जाते हैं। 2। 19। 105।
ਬਿਲਾਵਲੁ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਤਾਪ ਪਾਪ ਤੇ ਰਾਖੇ ਆਪ ॥
ਸੀਤਲ ਭਏ ਗੁਰ ਚਰਨੀ ਲਾਗੇ ਰਾਮ ਨਾਮ ਹਿਰਦੇ ਮਹਿ ਜਾਪ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਹਸਤ ਪ੍ਰਭਿ ਦੀਨੇ ਜਗਤ ਉਧਾਰ ਨਵ ਖੰਡ ਪ੍ਰਤਾਪ ॥
ਦੁਖ ਬਿਨਸੇ ਸੁਖ ਅਨਦ ਪ੍ਰਵੇਸਾ ਤ੍ਰਿਸਨ ਬੁਝੀ ਮਨ ਤਨ ਸਚੁ ਧ੍ਰਾਪ ॥੧॥
ਅਨਾਥ ਕੋ ਨਾਥੁ ਸਰਣਿ ਸਮਰਥਾ ਸਗਲ ਸ੍ਰਿਸਟਿ ਕੋ ਮਾਈ ਬਾਪੁ ॥
ਭਗਤਿ ਵਛਲ ਭੈ ਭੰਜਨ ਸੁਆਮੀ ਗੁਣ ਗਾਵਤ ਨਾਨਕ ਆਲਾਪ ॥੨॥੨੦॥੧੦੬॥
ਤਾਪ ਪਾਪ ਤੇ ਰਾਖੇ ਆਪ ॥
ਸੀਤਲ ਭਏ ਗੁਰ ਚਰਨੀ ਲਾਗੇ ਰਾਮ ਨਾਮ ਹਿਰਦੇ ਮਹਿ ਜਾਪ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਹਸਤ ਪ੍ਰਭਿ ਦੀਨੇ ਜਗਤ ਉਧਾਰ ਨਵ ਖੰਡ ਪ੍ਰਤਾਪ ॥
ਦੁਖ ਬਿਨਸੇ ਸੁਖ ਅਨਦ ਪ੍ਰਵੇਸਾ ਤ੍ਰਿਸਨ ਬੁਝੀ ਮਨ ਤਨ ਸਚੁ ਧ੍ਰਾਪ ॥੧॥
ਅਨਾਥ ਕੋ ਨਾਥੁ ਸਰਣਿ ਸਮਰਥਾ ਸਗਲ ਸ੍ਰਿਸਟਿ ਕੋ ਮਾਈ ਬਾਪੁ ॥
ਭਗਤਿ ਵਛਲ ਭੈ ਭੰਜਨ ਸੁਆਮੀ ਗੁਣ ਗਾਵਤ ਨਾਨਕ ਆਲਾਪ ॥੨॥੨੦॥੧੦੬॥
बिलावलु महला ५ ॥
ताप पाप ते राखे आप ॥
सीतल भए गुर चरनी लागे राम नाम हिरदे महि जाप ॥१॥ रहाउ ॥
करि किरपा हसत प्रभि दीने जगत उधार नव खंड प्रताप ॥
दुख बिनसे सुख अनद प्रवेसा त्रिसन बुझी मन तन सचु ध्राप ॥१॥
अनाथ को नाथु सरणि समरथा सगल स्रिसटि को माई बापु ॥
भगति वछल भै भंजन सुआमी गुण गावत नानक आलाप ॥२॥२०॥१०६॥
ताप पाप ते राखे आप ॥
सीतल भए गुर चरनी लागे राम नाम हिरदे महि जाप ॥१॥ रहाउ ॥
करि किरपा हसत प्रभि दीने जगत उधार नव खंड प्रताप ॥
दुख बिनसे सुख अनद प्रवेसा त्रिसन बुझी मन तन सचु ध्राप ॥१॥
अनाथ को नाथु सरणि समरथा सगल स्रिसटि को माई बापु ॥
भगति वछल भै भंजन सुआमी गुण गावत नानक आलाप ॥२॥२०॥१०६॥
हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला ५ ॥ हे भाई ! परमात्मा स्वयं उनको सारे दुख-कलेशों व विकारों से बचा लेता है उनके हृदय ठंडे-ठार हो जाते हैं ; जो मनुष्य गुरू के चरणों में लगते हैं और परमात्मा का नाम हृदय में जपते हैं। । 1। रहाउ। (हे भाई ! जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ कर परमात्मा का नाम जपते हैं) प्रभू ने सदा मेहर कर के अपने हाथ (उनके सिर पर) रखे हैं। वह प्रभू सारे जगत को पार लंघाने वाला है। उसका तेज सारे संसार में चमक रहा है। (सिमरन करने वाले मनुष्यों के) सारे दुख नाश हो जाते हैं। उनके हृदय में सुख-आनंद आ बसते हैं। सदा स्थिर हरी-नाम जप के उनकी तृष्णा मिट जाती है। उनका मन तृप्त हो जाता है। उनका शरीर (इन्द्रियाँ) संतुष्ट हो जाते हैं। 1। हे नानक ! परमात्मा निखस्मों का खसम है। शरण आए हुओं की सहायता करने योग्य है। सारी सृष्टि का माता-पिता है। वह मालिक-प्रभू भक्ति को प्यार करने वाला है। सारे डर दूर करने वाला है। उसके गुण गा-गा के उसका नाम जपा कर। 2। 20। 106।
ਬਿਲਾਵਲੁ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਜਿਸ ਤੇ ਉਪਜਿਆ ਤਿਸਹਿ ਪਛਾਨੁ ॥
ਪਾਰਬ੍ਰਹਮੁ ਪਰਮੇਸਰੁ ਧਿਆਇਆ ਕੁਸਲ ਖੇਮ ਹੋਏ ਕਲਿਆਨ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਗੁਰੁ ਪੂਰਾ ਭੇਟਿਓ ਬਡ ਭਾਗੀ ਅੰਤਰਜਾਮੀ ਸੁਘੜੁ ਸੁਜਾਨੁ ॥
ਹਾਥ ਦੇਇ ਰਾਖੇ ਕਰਿ ਅਪਨੇ ਬਡ ਸਮਰਥੁ ਨਿਮਾਣਿਆ ਕੋ ਮਾਨੁ ॥੧॥
ਭ੍ਰਮ ਭੈ ਬਿਨਸਿ ਗਏ ਖਿਨ ਭੀਤਰਿ ਅੰਧਕਾਰ ਪ੍ਰਗਟੇ ਚਾਨਾਣੁ ॥
ਸਾਸਿ ਸਾਸਿ ਆਰਾਧੈ ਨਾਨਕੁ ਸਦਾ ਸਦਾ ਜਾਈਐ ਕੁਰਬਾਣੁ ॥੨॥੨੧॥੧੦੭॥
ਜਿਸ ਤੇ ਉਪਜਿਆ ਤਿਸਹਿ ਪਛਾਨੁ ॥
ਪਾਰਬ੍ਰਹਮੁ ਪਰਮੇਸਰੁ ਧਿਆਇਆ ਕੁਸਲ ਖੇਮ ਹੋਏ ਕਲਿਆਨ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਗੁਰੁ ਪੂਰਾ ਭੇਟਿਓ ਬਡ ਭਾਗੀ ਅੰਤਰਜਾਮੀ ਸੁਘੜੁ ਸੁਜਾਨੁ ॥
ਹਾਥ ਦੇਇ ਰਾਖੇ ਕਰਿ ਅਪਨੇ ਬਡ ਸਮਰਥੁ ਨਿਮਾਣਿਆ ਕੋ ਮਾਨੁ ॥੧॥
ਭ੍ਰਮ ਭੈ ਬਿਨਸਿ ਗਏ ਖਿਨ ਭੀਤਰਿ ਅੰਧਕਾਰ ਪ੍ਰਗਟੇ ਚਾਨਾਣੁ ॥
ਸਾਸਿ ਸਾਸਿ ਆਰਾਧੈ ਨਾਨਕੁ ਸਦਾ ਸਦਾ ਜਾਈਐ ਕੁਰਬਾਣੁ ॥੨॥੨੧॥੧੦੭॥
बिलावलु महला ५ ॥
जिस ते उपजिआ तिसहि पछानु ॥
पारब्रहमु परमेसरु धिआइआ कुसल खेम होए कलिआन ॥१॥ रहाउ ॥
गुरु पूरा भेटिओ बड भागी अंतरजामी सुघड़ु सुजानु ॥
हाथ देइ राखे करि अपने बड समरथु निमाणिआ को मानु ॥१॥
भ्रम भै बिनसि गए खिन भीतरि अंधकार प्रगटे चानाणु ॥
सासि सासि आराधै नानकु सदा सदा जाईऐ कुरबाणु ॥२॥२१॥१०७॥
जिस ते उपजिआ तिसहि पछानु ॥
पारब्रहमु परमेसरु धिआइआ कुसल खेम होए कलिआन ॥१॥ रहाउ ॥
गुरु पूरा भेटिओ बड भागी अंतरजामी सुघड़ु सुजानु ॥
हाथ देइ राखे करि अपने बड समरथु निमाणिआ को मानु ॥१॥
भ्रम भै बिनसि गए खिन भीतरि अंधकार प्रगटे चानाणु ॥
सासि सासि आराधै नानकु सदा सदा जाईऐ कुरबाणु ॥२॥२१॥१०७॥
हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला ५ ॥ हे भाई ! जिस परमात्मा से तू पैदा हुआ है। उसके साथ ही (सदा) सांझ डाले रख। जिस मनुष्य ने उस पारब्रहम परमेश्वर का नाम सिमरा है उसके अंदर शांति सुख व आनंद बने रहते हैं। 1। रहाउ। हे भाई ! जिन भाग्यशाली लोगों को पूरा गुरू मिल जाता है। उन्हें हाथ दे के अपने बना के वह परमात्मा (सब प्रकार के डरों-भ्रमों से) बचाए रखता है। जो हरेक के दिल की जानने वाला है। सोहणा है। समझदार है। जो बड़ी ताकत का मालिक है और जो निमाणों को आदर-मान देने वाला है। 1। (हे भाई ! जो मनुष्य परमात्मा का नाम सिमरता है। उसके) सारे डर-भ्रम छिन में नाश हो जाते हैं। (उसके अंदर से मोह का) अंधकार दूर हो के (आत्मिक जीवन की) रौशनी हो जाती है। नानक (तो) हरेक सांस के साथ (उसी परमात्मा को) सिमरता है। (हे भाई ! उस परमात्मा से) सदा सदके जाना चाहिए। 2। 21। 107।
ਬਿਲਾਵਲੁ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਦੋਵੈ ਥਾਵ ਰਖੇ ਗੁਰ ਸੂਰੇ ॥
ਹਲਤ ਪਲਤ ਪਾਰਬ੍ਰਹਮਿ ਸਵਾਰੇ ਕਾਰਜ ਹੋਏ ਸਗਲੇ ਪੂਰੇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਹਰਿ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਜਪਤ ਸੁਖ ਸਹਜੇ ਮਜਨੁ ਹੋਵਤ ਸਾਧੂ ਧੂਰੇ ॥
ਆਵਣ ਜਾਣ ਰਹੇ ਥਿਤਿ ਪਾਈ ਜਨਮ ਮਰਣ ਕੇ ਮਿਟੇ ਬਿਸੂਰੇ ॥੧॥
ਭ੍ਰਮ ਭੈ ਤਰੇ ਛੁਟੇ ਭੈ ਜਮ ਕੇ ਘਟਿ ਘਟਿ ਏਕੁ ਰਹਿਆ ਭਰਪੂਰੇ ॥
ਦੋਵੈ ਥਾਵ ਰਖੇ ਗੁਰ ਸੂਰੇ ॥
ਹਲਤ ਪਲਤ ਪਾਰਬ੍ਰਹਮਿ ਸਵਾਰੇ ਕਾਰਜ ਹੋਏ ਸਗਲੇ ਪੂਰੇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਹਰਿ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਜਪਤ ਸੁਖ ਸਹਜੇ ਮਜਨੁ ਹੋਵਤ ਸਾਧੂ ਧੂਰੇ ॥
ਆਵਣ ਜਾਣ ਰਹੇ ਥਿਤਿ ਪਾਈ ਜਨਮ ਮਰਣ ਕੇ ਮਿਟੇ ਬਿਸੂਰੇ ॥੧॥
ਭ੍ਰਮ ਭੈ ਤਰੇ ਛੁਟੇ ਭੈ ਜਮ ਕੇ ਘਟਿ ਘਟਿ ਏਕੁ ਰਹਿਆ ਭਰਪੂਰੇ ॥
बिलावलु महला ५ ॥
दोवै थाव रखे गुर सूरे ॥
हलत पलत पारब्रहमि सवारे कारज होए सगले पूरे ॥१॥ रहाउ ॥
हरि हरि नामु जपत सुख सहजे मजनु होवत साधू धूरे ॥
आवण जाण रहे थिति पाई जनम मरण के मिटे बिसूरे ॥१॥
भ्रम भै तरे छुटे भै जम के घटि घटि एकु रहिआ भरपूरे ॥
दोवै थाव रखे गुर सूरे ॥
हलत पलत पारब्रहमि सवारे कारज होए सगले पूरे ॥१॥ रहाउ ॥
हरि हरि नामु जपत सुख सहजे मजनु होवत साधू धूरे ॥
आवण जाण रहे थिति पाई जनम मरण के मिटे बिसूरे ॥१॥
भ्रम भै तरे छुटे भै जम के घटि घटि एकु रहिआ भरपूरे ॥
हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला ५ ॥ (हे भाई ! जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ कर परमात्मा का नाम जपते हैं) सूरमा गुरू (उसका ये लोक और परलोक) दोनों ही (बिगड़ने से) बचा लेता है। परमात्मा ने (सदा ही ऐसे मनुष्य के) यह लोक और परलोक सुंदर बना दिए। उस मनुष्य के सारे ही काम सफल हो जाते हैं1। रहाउ। (हे भाई ! जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ कर) परमात्मा का नाम जपने से आनंद प्राप्त होता है। आत्मिक अडोलता में टिके रहा जाता है। गुरू के चरणों की धूड़ का स्नान प्राप्त होता है। जनम मरण के चक्कर समाप्त हो जाते हैं। (प्रभू चरणों में) टिकाव प्राप्त होता है। जनम से मरने तक के सारे चिंता-फिक्र समाप्त हो जाते हैं। 1। हे नानक ! (जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ कर हरी-नाम जपता है। वह संसार-समुंद्र के सारे) डरों-भ्रमों से पार लांघ जाता है। जमदूतों के बारे में भी उसके डर समाप्त हो जाते हैं। उस मनुष्य को परमात्मा हरेक शरीर में व्यापक दिखता है।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 825 है, राग बिलावल का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।
M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।
Greater Kailash के बाज़ार में सर्दियों की धूप, और कोई पुराना दोस्त मिल जाए।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 35 पंक्तियों का है, 6 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 825” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: बिलावल राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 826 →, पीछे का: ← अंग 824।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।