अंग
821
राग बिलावल
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ਤ੍ਰਿਪਤਿ ਅਘਾਏ ਪੇਖਿ ਪ੍ਰਭ ਦਰਸਨੁ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਹਰਿ ਰਸੁ ਭੋਜਨੁ ਖਾਤ ॥
ਚਰਨ ਸਰਨ ਨਾਨਕ ਪ੍ਰਭ ਤੇਰੀ ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਸੰਤਸੰਗਿ ਮਿਲਾਤ ॥੨॥੪॥੮੪॥
ਚਰਨ ਸਰਨ ਨਾਨਕ ਪ੍ਰਭ ਤੇਰੀ ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਸੰਤਸੰਗਿ ਮਿਲਾਤ ॥੨॥੪॥੮੪॥
त्रिपति अघाए पेखि प्रभ दरसनु अंम्रित हरि रसु भोजनु खात ॥
चरन सरन नानक प्रभ तेरी करि किरपा संतसंगि मिलात ॥२॥४॥८४॥
चरन सरन नानक प्रभ तेरी करि किरपा संतसंगि मिलात ॥२॥४॥८४॥
हिन्दी अर्थ: हे भाई ! संत जन प्रभू के दर्शन करके (माया की तृष्ण की ओर से) पूरी तौर पर तृप्त रहते हैं। संत जन सदा आत्मिक जीवन देने वाला नाम हरी-नाम का स्वादिष्ट भोजन खाते हैं। हे नानक ! (कह-) हे प्रभू ! जो मनुष्य तेरे चरणों की शरण में आते हैं। तू कृपा करके उनको संत जनों की संगति में मिला देता है। 2। 4। 84।
ਬਿਲਾਵਲੁ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਰਾਖਿ ਲੀਏ ਅਪਨੇ ਜਨ ਆਪ ॥
ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਹਰਿ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਦੀਨੋ ਬਿਨਸਿ ਗਏ ਸਭ ਸੋਗ ਸੰਤਾਪ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਗੁਣ ਗੋਵਿੰਦ ਗਾਵਹੁ ਸਭਿ ਹਰਿ ਜਨ ਰਾਗ ਰਤਨ ਰਸਨਾ ਆਲਾਪ ॥
ਕੋਟਿ ਜਨਮ ਕੀ ਤ੍ਰਿਸਨਾ ਨਿਵਰੀ ਰਾਮ ਰਸਾਇਣਿ ਆਤਮ ਧ੍ਰਾਪ ॥੧॥
ਚਰਣ ਗਹੇ ਸਰਣਿ ਸੁਖਦਾਤੇ ਗੁਰ ਕੈ ਬਚਨਿ ਜਪੇ ਹਰਿ ਜਾਪ ॥
ਸਾਗਰ ਤਰੇ ਭਰਮ ਭੈ ਬਿਨਸੇ ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਠਾਕੁਰ ਪਰਤਾਪ ॥੨॥੫॥੮੫॥
ਰਾਖਿ ਲੀਏ ਅਪਨੇ ਜਨ ਆਪ ॥
ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਹਰਿ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਦੀਨੋ ਬਿਨਸਿ ਗਏ ਸਭ ਸੋਗ ਸੰਤਾਪ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਗੁਣ ਗੋਵਿੰਦ ਗਾਵਹੁ ਸਭਿ ਹਰਿ ਜਨ ਰਾਗ ਰਤਨ ਰਸਨਾ ਆਲਾਪ ॥
ਕੋਟਿ ਜਨਮ ਕੀ ਤ੍ਰਿਸਨਾ ਨਿਵਰੀ ਰਾਮ ਰਸਾਇਣਿ ਆਤਮ ਧ੍ਰਾਪ ॥੧॥
ਚਰਣ ਗਹੇ ਸਰਣਿ ਸੁਖਦਾਤੇ ਗੁਰ ਕੈ ਬਚਨਿ ਜਪੇ ਹਰਿ ਜਾਪ ॥
ਸਾਗਰ ਤਰੇ ਭਰਮ ਭੈ ਬਿਨਸੇ ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਠਾਕੁਰ ਪਰਤਾਪ ॥੨॥੫॥੮੫॥
बिलावलु महला ५ ॥
राखि लीए अपने जन आप ॥
करि किरपा हरि हरि नामु दीनो बिनसि गए सभ सोग संताप ॥१॥ रहाउ ॥
गुण गोविंद गावहु सभि हरि जन राग रतन रसना आलाप ॥
कोटि जनम की त्रिसना निवरी राम रसाइणि आतम ध्राप ॥१॥
चरण गहे सरणि सुखदाते गुर कै बचनि जपे हरि जाप ॥
सागर तरे भरम भै बिनसे कहु नानक ठाकुर परताप ॥२॥५॥८५॥
राखि लीए अपने जन आप ॥
करि किरपा हरि हरि नामु दीनो बिनसि गए सभ सोग संताप ॥१॥ रहाउ ॥
गुण गोविंद गावहु सभि हरि जन राग रतन रसना आलाप ॥
कोटि जनम की त्रिसना निवरी राम रसाइणि आतम ध्राप ॥१॥
चरण गहे सरणि सुखदाते गुर कै बचनि जपे हरि जाप ॥
सागर तरे भरम भै बिनसे कहु नानक ठाकुर परताप ॥२॥५॥८५॥
हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला ५ ॥ हे भाई ! परमात्मा ने सदा अपने सेवकों की रक्षा की है। मेहर करके (अपने सेवकों को) अपने नाम की दाति देता आया है (जिनको नाम की दाति बख्शता है उनकी) सारी चिंता-फिक्रें व दुख-कलेश नाश हो जाते हैं। 1। रहाउ। हे संत जनो ! सारे (मिल के) प्रभू के गुण गाते रहा करो। जीभ से सुंदर रागों में उसके गुणों का उच्चारण करते रहा करो। (जो मनुष्य प्रभू के गुणों का उच्चारण करते हैं। उनकी) करोड़ों जन्मों की (माया की) तृष्णा दूर हो जाती है। सब रसों से श्रेष्ठ राम-रस की बरकति से उनका मन तृप्त हो जाता है। 1। हे भाई ! जो मनुष्य सुखों के दाता प्रभू के चरण पकड़ के रखते हैं। सुखदाते प्रभू की शरण पड़े रहते हैं। गुरू के उपदेश के द्वारा प्रभू के नाम का जाप जपते रहते हैं। वह संसार-समुंद्र से पार लांघ जाते हैं। हे नानक ! कह- यह सारी महानता मालिक प्रभू की ही है। 2। 5। 85।
ਬਿਲਾਵਲੁ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਤਾਪੁ ਲਾਹਿਆ ਗੁਰ ਸਿਰਜਨਹਾਰਿ ॥
ਸਤਿਗੁਰ ਅਪਨੇ ਕਉ ਬਲਿ ਜਾਈ ਜਿਨਿ ਪੈਜ ਰਖੀ ਸਾਰੈ ਸੰਸਾਰਿ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਕਰੁ ਮਸਤਕਿ ਧਾਰਿ ਬਾਲਿਕੁ ਰਖਿ ਲੀਨੋ ॥
ਪ੍ਰਭਿ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਨਾਮੁ ਮਹਾ ਰਸੁ ਦੀਨੋ ॥੧॥
ਦਾਸ ਕੀ ਲਾਜ ਰਖੈ ਮਿਹਰਵਾਨੁ ॥
ਗੁਰੁ ਨਾਨਕੁ ਬੋਲੈ ਦਰਗਹ ਪਰਵਾਨੁ ॥੨॥੬॥੮੬॥
ਤਾਪੁ ਲਾਹਿਆ ਗੁਰ ਸਿਰਜਨਹਾਰਿ ॥
ਸਤਿਗੁਰ ਅਪਨੇ ਕਉ ਬਲਿ ਜਾਈ ਜਿਨਿ ਪੈਜ ਰਖੀ ਸਾਰੈ ਸੰਸਾਰਿ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਕਰੁ ਮਸਤਕਿ ਧਾਰਿ ਬਾਲਿਕੁ ਰਖਿ ਲੀਨੋ ॥
ਪ੍ਰਭਿ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਨਾਮੁ ਮਹਾ ਰਸੁ ਦੀਨੋ ॥੧॥
ਦਾਸ ਕੀ ਲਾਜ ਰਖੈ ਮਿਹਰਵਾਨੁ ॥
ਗੁਰੁ ਨਾਨਕੁ ਬੋਲੈ ਦਰਗਹ ਪਰਵਾਨੁ ॥੨॥੬॥੮੬॥
बिलावलु महला ५ ॥
तापु लाहिआ गुर सिरजनहारि ॥
सतिगुर अपने कउ बलि जाई जिनि पैज रखी सारै संसारि ॥१॥ रहाउ ॥
करु मसतकि धारि बालिकु रखि लीनो ॥
प्रभि अंम्रित नामु महा रसु दीनो ॥१॥
दास की लाज रखै मिहरवानु ॥
गुरु नानकु बोलै दरगह परवानु ॥२॥६॥८६॥
तापु लाहिआ गुर सिरजनहारि ॥
सतिगुर अपने कउ बलि जाई जिनि पैज रखी सारै संसारि ॥१॥ रहाउ ॥
करु मसतकि धारि बालिकु रखि लीनो ॥
प्रभि अंम्रित नामु महा रसु दीनो ॥१॥
दास की लाज रखै मिहरवानु ॥
गुरु नानकु बोलै दरगह परवानु ॥२॥६॥८६॥
हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला ५ ॥ हे भाई ! गुरू ने करतार ने (खुद बालक हरिगोबिंद का) ताप उतारा है। मैं अपने गुरू से सदा सदके जाता हूँ। जिसने सारे संसार में (मेरी) इज्जत रख ली है (नहीं तो। भ्रमित लोग तो। सीतला देवी आदि की पूजा के लिए खूब प्रेरणा करते रहे)। 1। रहाउ। हे भाई ! प्रभू ने अपना हाथ (बालक के) सिर पर रख कर बालक को (ताप से) बचा लिया (सिर्फ ताप से ही नहीं बचाया। ईश्वर को छोड़ के किसी और की पूजा से बचा के) प्रभू ने आत्मिक जीवन देने वाला और सबसे श्रेष्ठ रस वाला अपना नाम भी दिया है। 1। मेहरवान प्रभू अपने सेवक की इज्जत (अवश्य) रखता है (सो। (हे भाई ! याद रख) गुरू नानक (वही कुछ) कहता है (जो परमात्मा की) दरगाह में परवान है (और। हे भाई ! दुख-कलेश के वक्त घबरा के और-और के आसरे ना ढूँढते फिरो)। 2। 6। 86।
ਰਾਗੁ ਬਿਲਾਵਲੁ ਮਹਲਾ ੫ ਚਉਪਦੇ ਦੁਪਦੇ ਘਰੁ ੭
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ਸਤਿਗੁਰ ਸਬਦਿ ਉਜਾਰੋ ਦੀਪਾ ॥
ਬਿਨਸਿਓ ਅੰਧਕਾਰ ਤਿਹ ਮੰਦਰਿ ਰਤਨ ਕੋਠੜੀ ਖੁਲੑੀ ਅਨੂਪਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਬਿਸਮਨ ਬਿਸਮ ਭਏ ਜਉ ਪੇਖਿਓ ਕਹਨੁ ਨ ਜਾਇ ਵਡਿਆਈ ॥
ਮਗਨ ਭਏ ਊਹਾ ਸੰਗਿ ਮਾਤੇ ਓਤਿ ਪੋਤਿ ਲਪਟਾਈ ॥੧॥
ਆਲ ਜਾਲ ਨਹੀ ਕਛੂ ਜੰਜਾਰਾ ਅਹੰਬੁਧਿ ਨਹੀ ਭੋਰਾ ॥
ਊਚਨ ਊਚਾ ਬੀਚੁ ਨ ਖੀਚਾ ਹਉ ਤੇਰਾ ਤੂੰ ਮੋਰਾ ॥੨॥
ਏਕੰਕਾਰੁ ਏਕੁ ਪਾਸਾਰਾ ਏਕੈ ਅਪਰ ਅਪਾਰਾ ॥
ਏਕੁ ਬਿਸਥੀਰਨੁ ਏਕੁ ਸੰਪੂਰਨੁ ਏਕੈ ਪ੍ਰਾਨ ਅਧਾਰਾ ॥੩॥
ਨਿਰਮਲ ਨਿਰਮਲ ਸੂਚਾ ਸੂਚੋ ਸੂਚਾ ਸੂਚੋ ਸੂਚਾ ॥
ਅੰਤ ਨ ਅੰਤਾ ਸਦਾ ਬੇਅੰਤਾ ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਊਚੋ ਊਚਾ ॥੪॥੧॥੮੭॥
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ਸਤਿਗੁਰ ਸਬਦਿ ਉਜਾਰੋ ਦੀਪਾ ॥
ਬਿਨਸਿਓ ਅੰਧਕਾਰ ਤਿਹ ਮੰਦਰਿ ਰਤਨ ਕੋਠੜੀ ਖੁਲੑੀ ਅਨੂਪਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਬਿਸਮਨ ਬਿਸਮ ਭਏ ਜਉ ਪੇਖਿਓ ਕਹਨੁ ਨ ਜਾਇ ਵਡਿਆਈ ॥
ਮਗਨ ਭਏ ਊਹਾ ਸੰਗਿ ਮਾਤੇ ਓਤਿ ਪੋਤਿ ਲਪਟਾਈ ॥੧॥
ਆਲ ਜਾਲ ਨਹੀ ਕਛੂ ਜੰਜਾਰਾ ਅਹੰਬੁਧਿ ਨਹੀ ਭੋਰਾ ॥
ਊਚਨ ਊਚਾ ਬੀਚੁ ਨ ਖੀਚਾ ਹਉ ਤੇਰਾ ਤੂੰ ਮੋਰਾ ॥੨॥
ਏਕੰਕਾਰੁ ਏਕੁ ਪਾਸਾਰਾ ਏਕੈ ਅਪਰ ਅਪਾਰਾ ॥
ਏਕੁ ਬਿਸਥੀਰਨੁ ਏਕੁ ਸੰਪੂਰਨੁ ਏਕੈ ਪ੍ਰਾਨ ਅਧਾਰਾ ॥੩॥
ਨਿਰਮਲ ਨਿਰਮਲ ਸੂਚਾ ਸੂਚੋ ਸੂਚਾ ਸੂਚੋ ਸੂਚਾ ॥
ਅੰਤ ਨ ਅੰਤਾ ਸਦਾ ਬੇਅੰਤਾ ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਊਚੋ ਊਚਾ ॥੪॥੧॥੮੭॥
रागु बिलावलु महला ५ चउपदे दुपदे घरु ७
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सतिगुर सबदि उजारो दीपा ॥
बिनसिओ अंधकार तिह मंदरि रतन कोठड़ी खुल॑ी अनूपा ॥१॥ रहाउ ॥
बिसमन बिसम भए जउ पेखिओ कहनु न जाइ वडिआई ॥
मगन भए ऊहा संगि माते ओति पोति लपटाई ॥१॥
आल जाल नही कछू जंजारा अहंबुधि नही भोरा ॥
ऊचन ऊचा बीचु न खीचा हउ तेरा तूं मोरा ॥२॥
एकंकारु एकु पासारा एकै अपर अपारा ॥
एकु बिसथीरनु एकु संपूरनु एकै प्रान अधारा ॥३॥
निरमल निरमल सूचा सूचो सूचा सूचो सूचा ॥
अंत न अंता सदा बेअंता कहु नानक ऊचो ऊचा ॥४॥१॥८७॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सतिगुर सबदि उजारो दीपा ॥
बिनसिओ अंधकार तिह मंदरि रतन कोठड़ी खुल॑ी अनूपा ॥१॥ रहाउ ॥
बिसमन बिसम भए जउ पेखिओ कहनु न जाइ वडिआई ॥
मगन भए ऊहा संगि माते ओति पोति लपटाई ॥१॥
आल जाल नही कछू जंजारा अहंबुधि नही भोरा ॥
ऊचन ऊचा बीचु न खीचा हउ तेरा तूं मोरा ॥२॥
एकंकारु एकु पासारा एकै अपर अपारा ॥
एकु बिसथीरनु एकु संपूरनु एकै प्रान अधारा ॥३॥
निरमल निरमल सूचा सूचो सूचा सूचो सूचा ॥
अंत न अंता सदा बेअंता कहु नानक ऊचो ऊचा ॥४॥१॥८७॥
हिन्दी अर्थ: रागु बिलावलु महला ५ चउपदे दुपदे घरु ७ ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ हे भाई ! जिस मन-मन्द्रिर में गुरू के शबद-दीप से (आत्मिक जीवन का) प्रकाश हो जाता है। उस मन-मन्दिर में आत्मिक गुण-रत्नों की बहुत ही सुंदर कोठड़ी खुल जाती है (जिसकी बरकति से नीच जीवन वाले) अंधकार का वहाँ से नाश हो जाता है। 1। रहाउ। (गुरू शबद-दीपक की रौशनी में) जब (अंदर बस रहे) प्रभू के दर्शन होते हैं तब मेर-तेर वाली सारी सुधें भूल जाती हैं। पर उस अवस्था की महानता बयान नहीं की जा सकती। जैसे ताने-पेटे के उने हुए धागे आपस में मिले होते हैं। वैसे ही उस प्रभू में ही सुरति डूब जाती है। उस प्रभू के चरणों में ही मस्त हो जाते हैं। उसके चरणों से ही चिपके रहते हैं। 1। (हे भाई ! गुरू के शबद-दीपक से जब मन-मन्दिर में प्रकाश होता है। तब उस अवस्था में) गृहस्त के मोह के जाल और झमेले महिसूस ही नहीं होते। अंदर कहीं रक्ती भर भी ‘मैं मैं’ करने वाली बुद्धि नहीं रह जाती। तब मन-मन्दिर में वह महान ऊँचा परमात्मा ही बसता दिखाई देता है। उससे कोई पर्दा नहीं रह जाता। (उस वक्त उसे यही कहते हैं-हे प्रभू !) मैं तेरा (दास) हूँ। तू मेरा (मालिक) है। 2। (हे भाई ! गुरू के शबद-दीपक से जब मन-मन्दिर में आत्मिक जीवन का प्रकाश होता है। तब बाहर जगत में भी) एक ही सर्व-व्यापक बेअंत परमात्मा स्वयं ही स्वयं पसरा हुआ दिखाई देता है। वह स्वयं ही बिखरा हुआ (उसका विस्तार) और व्यापक प्रतीत होता है। वही जीवों की जिंदगी का आसरा दिखता है। 3। हे नानक ! कह- (जब मन-मन्दिर में गुर-शबद-दीपक का प्रकाश होता है तब ये स्पष्ट रूप से दिखाई दे जाता है कि) परमात्मा महान पवित्र है। महान स्वच्छ है। उसका कभी अंत नहीं पड़ सकता। वह सदा ही बेअंत है। और ऊँचों से ऊँचा है (उस जैसा ऊँचा और कोई नहीं)। 4। 1। 87।
ਬਿਲਾਵਲੁ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਬਿਨੁ ਹਰਿ ਕਾਮਿ ਨ ਆਵਤ ਹੇ ॥
ਜਾ ਸਿਉ ਰਾਚਿ ਮਾਚਿ ਤੁਮੑ ਲਾਗੇ ਓਹ ਮੋਹਨੀ ਮੋਹਾਵਤ ਹੇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਕਨਿਕ ਕਾਮਿਨੀ ਸੇਜ ਸੋਹਨੀ ਛੋਡਿ ਖਿਨੈ ਮਹਿ ਜਾਵਤ ਹੇ ॥
ਉਰਝਿ ਰਹਿਓ ਇੰਦ੍ਰੀ ਰਸ ਪ੍ਰੇਰਿਓ ਬਿਖੈ ਠਗਉਰੀ ਖਾਵਤ ਹੇ ॥੧॥
ਤ੍ਰਿਣ ਕੋ ਮੰਦਰੁ ਸਾਜਿ ਸਵਾਰਿਓ ਪਾਵਕੁ ਤਲੈ ਜਰਾਵਤ ਹੇ ॥
ਐਸੇ ਗੜ ਮਹਿ ਐਠਿ ਹਠੀਲੋ ਫੂਲਿ ਫੂਲਿ ਕਿਆ ਪਾਵਤ ਹੇ ॥੨॥
ਪੰਚ ਦੂਤ ਮੂਡ ਪਰਿ ਠਾਢੇ ਕੇਸ ਗਹੇ ਫੇਰਾਵਤ ਹੇ ॥
ਬਿਨੁ ਹਰਿ ਕਾਮਿ ਨ ਆਵਤ ਹੇ ॥
ਜਾ ਸਿਉ ਰਾਚਿ ਮਾਚਿ ਤੁਮੑ ਲਾਗੇ ਓਹ ਮੋਹਨੀ ਮੋਹਾਵਤ ਹੇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਕਨਿਕ ਕਾਮਿਨੀ ਸੇਜ ਸੋਹਨੀ ਛੋਡਿ ਖਿਨੈ ਮਹਿ ਜਾਵਤ ਹੇ ॥
ਉਰਝਿ ਰਹਿਓ ਇੰਦ੍ਰੀ ਰਸ ਪ੍ਰੇਰਿਓ ਬਿਖੈ ਠਗਉਰੀ ਖਾਵਤ ਹੇ ॥੧॥
ਤ੍ਰਿਣ ਕੋ ਮੰਦਰੁ ਸਾਜਿ ਸਵਾਰਿਓ ਪਾਵਕੁ ਤਲੈ ਜਰਾਵਤ ਹੇ ॥
ਐਸੇ ਗੜ ਮਹਿ ਐਠਿ ਹਠੀਲੋ ਫੂਲਿ ਫੂਲਿ ਕਿਆ ਪਾਵਤ ਹੇ ॥੨॥
ਪੰਚ ਦੂਤ ਮੂਡ ਪਰਿ ਠਾਢੇ ਕੇਸ ਗਹੇ ਫੇਰਾਵਤ ਹੇ ॥
बिलावलु महला ५ ॥
बिनु हरि कामि न आवत हे ॥
जा सिउ राचि माचि तुम॑ लागे ओह मोहनी मोहावत हे ॥१॥ रहाउ ॥
कनिक कामिनी सेज सोहनी छोडि खिनै महि जावत हे ॥
उरझि रहिओ इंद्री रस प्रेरिओ बिखै ठगउरी खावत हे ॥१॥
त्रिण को मंदरु साजि सवारिओ पावकु तलै जरावत हे ॥
ऐसे गड़ महि ऐठि हठीलो फूलि फूलि किआ पावत हे ॥२॥
पंच दूत मूड परि ठाढे केस गहे फेरावत हे ॥
बिनु हरि कामि न आवत हे ॥
जा सिउ राचि माचि तुम॑ लागे ओह मोहनी मोहावत हे ॥१॥ रहाउ ॥
कनिक कामिनी सेज सोहनी छोडि खिनै महि जावत हे ॥
उरझि रहिओ इंद्री रस प्रेरिओ बिखै ठगउरी खावत हे ॥१॥
त्रिण को मंदरु साजि सवारिओ पावकु तलै जरावत हे ॥
ऐसे गड़ महि ऐठि हठीलो फूलि फूलि किआ पावत हे ॥२॥
पंच दूत मूड परि ठाढे केस गहे फेरावत हे ॥
हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला ५ ॥ हे भाई ! परमात्मा के नाम के बिना (कोई और चीज तेरे आत्मिक जीवन के) काम नहीं आ सकती। जिस मन-मोहनी माया के साथ तू रचा-मिचा रहता है। वह तो तुझे ठॅग रही है। 1। रहाउ। हे भाई ! सोना (धन-पदार्थ)। स्त्री की सुंदर सेज- ये तो एक छिन में छोड़ के मनुष्य यहाँ से चल पड़ता है। काम-वासना के स्वादों से प्रेरित हुआ तू काम-वासना में फंसा पड़ा है। और विषौ-विकारों की ठॅग-बूटी खा रहा है (जिसके कारण तू आत्मिक जीवन की ओर से बेहोश पड़ा है)। 1। हे भाई ! तीलियों का घर बना-सँवार के तू उसके नीचे आग जला रहा है (इस शरीर में कामादिक विकारों के शोले भड़का के आत्मिक जीवन को राख किए जा रहा है। विकारों में जल रहे) इस शरीर-किले में अकड़ के जिद्दी हुआ बैठा तू गुमान कर-कर के हासिल तो कुछ भी नहीं कर रहा। 2। हे अंधे-अज्ञानी ! कामादिक पाँचों वैरी तेरे सिर पर खड़े हुए तुझे ज़लील कर रहे हैं। पर तुझे वे दिखाई नहीं देते।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 821 है, राग बिलावल का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।
M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।
Dwarka के नए-बसे sector में पहली बार आए परिवार का घर देखना।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 36 पंक्तियों का है, 5 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 821” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: बिलावल राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 822 →, पीछे का: ← अंग 820।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।