अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।
हिन्दी अर्थ: हे भाई ! सेवक-भावना से गुरू की शरण पड़ने पर ही परमात्मा का नाम-धन मिलता है; पर वह (निंदक) अभागे वहाँ से (गुरू के दर से) ये धन नहीं ले जा सकते (और। गुरू के दर के बिना) किसी और जगह किसी और देश में ये नाम-धन है ही नहीं। 8।
सलोक मः 3 ॥ गुरमुखि संसा मूलि न होवई चिंता विचहु जाइ ॥ जो किछु होइ सु सहजे होइ कहणा किछू न जाइ ॥ नानक तिन का आखिआ आपि सुणे जि लइअनु पंनै पाइ ॥1॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3॥ हे भाई ! जो मनुष्य गुरू के सन्मुख रहते हैं। उनको (किसी किस्म का) तौखला बिल्कुल ही नहीं होता। उनके अंदर से चिंता दूर हो जाती है। (उनको ये निष्चय हो जाता है कि संसार में) जो कुछ हो रहा है वह परमात्मा की रजा में हो रहा है। उस पर कोई एतराज नहीं किया जा सकता। हे नानक ! जिन मनुष्यों को परमात्मा अपने लड़ लगा लेता है उनकी आरजू (परमात्मा सदा) स्वयं सुनता है। 1।
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।
हिन्दी अर्थ: महला 3॥ हे भाई ! जिस मनुष्य के हृदय में परमात्मा का पवित्र नाम बसता है वह आत्मिक मौत को समाप्त करके मन के मायावी फुरने को मन में ही दबा देता है। वह मनुष्य (माया के हमलों की ओर से) हर वक्त सचेत रहता है। कभी वह (गफ़लत की नींद में) नहीं सोता। आत्मिक अडोलता में टिक के परमातमा नाम-अमृत (उसकी) खुराक होता है। वह मनुष्य (सदा) मीठा बोलता है। (सतिगुरू की) आत्मिक जीवन देने वाली बाणी के द्वारा वह हर वक्त परमात्मा के गुण गाता रहता है। ऐसे मनुष्य सदा परमात्मा के चरणों में टिके रहते हैं। उनका जीवन सुंदर बन जाता है। हे नानक ! (कह- हे भाई !) ऐसे मनुष्यों को मिल के मैं भी आत्मिक आनंद पाता हूँ। 2।
पउड़ी ॥ हरि धनु रतन जवेहरी सो गुरि हरि धनु हरि पासहु देवाइआ ॥ जे किसै किहु दिसि आवै ता कोई किहु मंगि लए अकै कोई किहु देवाए एहु हरि धनु जोरि कीतै किसै नालि न जाइ वंडाइआ ॥ जिस नो सतिगुर नालि हरि सरधा लाए तिसु हरि धन की वंड हथि आवै जिस नो करतै धुरि लिखि पाइआ ॥ इसु हरि धन का कोई सरीकु नाही किसै का खतु नाही किसै कै सीव बंनै रोलु नाही जे को हरि धन की बखीली करे तिस का मुहु हरि चहु कुंडा विचि काला कराइआ ॥ हरि के दिते नालि किसै जोरु बखीली न चलई दिहु दिहु नित नित चड़ै सवाइआ ॥9॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।
हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ हे भाई ! परमात्मा का नाम-धन हीरे-जवाहरात हैं। यह हरी-नाम-धन (जिसको) परमात्मा के पास से दिलवाया है गुरू ने (ही) दिलवाया है। अगर किसी मनुष्य को (गुरू के बिना किसी और के पास) कुछ और दिख जाए तो (उससे कोई) कुछ भी मांग ले। अथवा। कोई कुछ दिला दे। पर यह नाम-धन पक्का करके (भी) किसी के साथ बांटा नहीं जा सकता (ये तो परमात्मा की मेहर से गुरू के द्वारा ही मिलता है)। हे भाई ! परमात्मा ने धुर से ही जिस मनुष्य के माथे पर लेख लिख दिए हैं। परमात्मा उस मनुष्य की गुरू में श्रद्धा बनाता है। और (गुरू के द्वारा) उस मनुष्य को नाम-धन का हिस्सा मिलता है। हे भाई ! ये नाम-धन (ऐसी जयदाद है कि) इसका कोई शरीक नहीं बन सकता (इसके ऊपर) कोई अपना हक नहीं बना सकता। किसी के पास इसकी मलकियत का पट्टा भी नहीं हो सकता। (जैसे जिमींदारों का ज़मीन की) हदबंदी का झगड़ा (हो सकता है।) इस हरी-नाम-धन का ऐसा कोई झगड़ा भी नहीं उठ सकता। (किसी गुरमुखि को देख के) अगर कोई मनुष्य इस नाम-धन की (खातिर) ईष्या करता है। उसको बल्कि हर तरफ से धिक्कारें ही पड़ती हैं। (हे भाई ! यह नाम-धन परमात्मा खुद ही गुरू के द्वारा देता हैं। और) अगर परमात्मा किसी को यह नाम-धन दे दे तो किसी और का ज़ोर नहीं चल सकता। किसी की ईष्या कुछ बिगाड़ नहीं सकती (यह एक ऐसी दाति है कि) यह हर रोज सदा बढ़ती ही जाती है। 9।
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3॥ हे प्रभू ! (विकारों में) जल रहे संसार को अपनी मेहर से बचा लें। जिस भी तरीके से ये बच सकता है उसी तरह बचा ले। सदा-स्थिर प्रभू की सिफत सालाह की बाणी मन में बसा के (जिस मनुष्य को) सतिगुरू ने (सिमरन का) आत्मिक आनंद दिखा दिया। हे नानक ! उसको यह समझ आ जाती है कि परमात्मा के बिना कोई और ये बख्शिश करने वाला नहीं। 1।
मः 3 ॥ हउमै माइआ मोहणी दूजै लगै जाइ ॥ ना इह मारी न मरै ना इह हटि विकाइ ॥ गुर कै सबदि परजालीऐ ता इह विचहु जाइ ॥ तनु मनु होवै उजला नामु वसै मनि आइ ॥ नानक माइआ का मारणु सबदु है गुरमुखि पाइआ जाइ ॥2॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।
हिन्दी अर्थ: महला 3॥ हे भाई ! माया का अहंकार (सारे संसार को) अपने वश में करने की समर्थता रखने (की मानसिकता) वाला है। (इसके असर तले जीव परमात्मा को बिसार के) और (के मोह) में फसता है। ये अहंकार ना (किसी और से) मारा जा सकता है। ना ही ये खुद मरता है। ना ही यह किसी दुकान पर बेचा जा सकता है। जब इसको गुरू के शबद द्वारा अच्छी तरह जलाया जाता है। तब ही यह (जीव के) अंदर से समाप्त होता है। (हे भाई ! जिस मनुष्य के अंदर से माया का अहंकार खत्म हो जाता है उसका) तन (उसका) मन पवित्र हो जाता है। उसके मन में परमात्मा का नाम आ बसता है। हे नानक ! गुरू का शबद ही माया के प्रभाव को (असर को) खत्म करने का एक मात्र) वसीला है। और। ये शबद गुरू की शरण पड़ने पर ही मिलता है। 2।
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।
हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ (जो) इज्जत गुरू (अमरदास जी) की (हुई। वह) गुरू (अंगद देव जी) ने परमात्मा की हजूरी से (मिला) हुकम समझ के परवाना समझ के (उनको) दी। पुत्रों ने। भतीजों ने। और साक-संबन्धियों ने अच्छी तरह परख के देख लिया था (गुरू ने) सबका गुमान दूर कर दिया। हे भाई ! परमात्मा ने (गुरू के माध्यम से) सारे संसार को (नाम की) बख्शिश की है; जहाँ भी कोई देखता है वहाँ ही प्यारा गुरू (नाम की दाति देने के लिए मौजूद) है। जो मनुष्य गुरू को मिल के पतीजता है वह इस लोक में और परलोक में कामयाब हो जाता है। पर जो मनुष्य गुरू की तरफ से मुँह मोड़ता है। वह भटकता फिरता है। उसका हृदय-स्थल (विकारों से) गंदा बना रहता है।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। सूही, बिलावल, और गोंड राग का क्षेत्र। गुरु राम दास की ‘लावां’ इसी सूही राग में बँधी, सोलहवीं सदी के मध्य की।
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर वर्ष की आयु में गुरु-गद्दी सँभाली, 1552 में, और 1574 तक रहे। उनकी वाणी में बुढ़ापे, समाज की संरचना, और संगति की चिन्ताएँ बार-बार लौटती हैं। उन्होंने ही लंगर (साझा-भोजन) की व्यवस्था मज़बूत की, और देश-भर में बाईस मंजी (केन्द्र) स्थापित किए।
इस अंग पर 7 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे भाई ! सेवक-भावना से गुरू की शरण पड़ने पर ही परमात्मा का नाम-धन मिलता है; पर वह (निंदक) अभागे वहाँ से (गुरू के दर से) ये धन नहीं ले जा सकते (और।”
एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।