अंग
823
राग बिलावल
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਐਸੋ ਹਰਿ ਰਸੁ ਬਰਨਿ ਨ ਸਾਕਉ ਗੁਰਿ ਪੂਰੈ ਮੇਰੀ ਉਲਟਿ ਧਰੀ ॥੧॥
ਪੇਖਿਓ ਮੋਹਨੁ ਸਭ ਕੈ ਸੰਗੇ ਊਨ ਨ ਕਾਹੂ ਸਗਲ ਭਰੀ ॥
ਪੂਰਨ ਪੂਰਿ ਰਹਿਓ ਕਿਰਪਾ ਨਿਧਿ ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਮੇਰੀ ਪੂਰੀ ਪਰੀ ॥੨॥੭॥੯੩॥
ਪੇਖਿਓ ਮੋਹਨੁ ਸਭ ਕੈ ਸੰਗੇ ਊਨ ਨ ਕਾਹੂ ਸਗਲ ਭਰੀ ॥
ਪੂਰਨ ਪੂਰਿ ਰਹਿਓ ਕਿਰਪਾ ਨਿਧਿ ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਮੇਰੀ ਪੂਰੀ ਪਰੀ ॥੨॥੭॥੯੩॥
ऐसो हरि रसु बरनि न साकउ गुरि पूरै मेरी उलटि धरी ॥१॥
पेखिओ मोहनु सभ कै संगे ऊन न काहू सगल भरी ॥
पूरन पूरि रहिओ किरपा निधि कहु नानक मेरी पूरी परी ॥२॥७॥९३॥
पेखिओ मोहनु सभ कै संगे ऊन न काहू सगल भरी ॥
पूरन पूरि रहिओ किरपा निधि कहु नानक मेरी पूरी परी ॥२॥७॥९३॥
हिन्दी अर्थ: हरी-नाम का स्वाद मुझे ऐसा आया कि मैं वह बयान नहीं कर सकता। गुरू ने मेरी बिरती माया की तरफ से पलट दी। 1। हे भाई ! (गुरू की कृपा से) सुंदर प्रभू को मैंने सबमें बसता देख लिया है। कोई भी जगह उस प्रभू से वंचित नहीं दिखती। सारी ही सृष्टि प्रभू की जीवन-रौंअ से भरपूर दिखाई दे रही है। कृपा के खजाने परमात्मा हर जगह पूर्ण तौर पर व्यापक दिख रहे हैं। हे नानक ! कह- (हे भाई ! गुरू की मेहर से) मेरी मेहनत सफल हो गई है। 2। 7। 93।
ਬਿਲਾਵਲੁ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਮਨ ਕਿਆ ਕਹਤਾ ਹਉ ਕਿਆ ਕਹਤਾ ॥
ਜਾਨ ਪ੍ਰਬੀਨ ਠਾਕੁਰ ਪ੍ਰਭ ਮੇਰੇ ਤਿਸੁ ਆਗੈ ਕਿਆ ਕਹਤਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਅਨਬੋਲੇ ਕਉ ਤੁਹੀ ਪਛਾਨਹਿ ਜੋ ਜੀਅਨ ਮਹਿ ਹੋਤਾ ॥
ਰੇ ਮਨ ਕਾਇ ਕਹਾ ਲਉ ਡਹਕਹਿ ਜਉ ਪੇਖਤ ਹੀ ਸੰਗਿ ਸੁਨਤਾ ॥੧॥
ਐਸੋ ਜਾਨਿ ਭਏ ਮਨਿ ਆਨਦ ਆਨ ਨ ਬੀਓ ਕਰਤਾ ॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਗੁਰ ਭਏ ਦਇਆਰਾ ਹਰਿ ਰੰਗੁ ਨ ਕਬਹੂ ਲਹਤਾ ॥੨॥੮॥੯੪॥
ਮਨ ਕਿਆ ਕਹਤਾ ਹਉ ਕਿਆ ਕਹਤਾ ॥
ਜਾਨ ਪ੍ਰਬੀਨ ਠਾਕੁਰ ਪ੍ਰਭ ਮੇਰੇ ਤਿਸੁ ਆਗੈ ਕਿਆ ਕਹਤਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਅਨਬੋਲੇ ਕਉ ਤੁਹੀ ਪਛਾਨਹਿ ਜੋ ਜੀਅਨ ਮਹਿ ਹੋਤਾ ॥
ਰੇ ਮਨ ਕਾਇ ਕਹਾ ਲਉ ਡਹਕਹਿ ਜਉ ਪੇਖਤ ਹੀ ਸੰਗਿ ਸੁਨਤਾ ॥੧॥
ਐਸੋ ਜਾਨਿ ਭਏ ਮਨਿ ਆਨਦ ਆਨ ਨ ਬੀਓ ਕਰਤਾ ॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਗੁਰ ਭਏ ਦਇਆਰਾ ਹਰਿ ਰੰਗੁ ਨ ਕਬਹੂ ਲਹਤਾ ॥੨॥੮॥੯੪॥
बिलावलु महला ५ ॥
मन किआ कहता हउ किआ कहता ॥
जान प्रबीन ठाकुर प्रभ मेरे तिसु आगै किआ कहता ॥१॥ रहाउ ॥
अनबोले कउ तुही पछानहि जो जीअन महि होता ॥
रे मन काइ कहा लउ डहकहि जउ पेखत ही संगि सुनता ॥१॥
ऐसो जानि भए मनि आनद आन न बीओ करता ॥
कहु नानक गुर भए दइआरा हरि रंगु न कबहू लहता ॥२॥८॥९४॥
मन किआ कहता हउ किआ कहता ॥
जान प्रबीन ठाकुर प्रभ मेरे तिसु आगै किआ कहता ॥१॥ रहाउ ॥
अनबोले कउ तुही पछानहि जो जीअन महि होता ॥
रे मन काइ कहा लउ डहकहि जउ पेखत ही संगि सुनता ॥१॥
ऐसो जानि भए मनि आनद आन न बीओ करता ॥
कहु नानक गुर भए दइआरा हरि रंगु न कबहू लहता ॥२॥८॥९४॥
हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला ५ ॥ हे मन ! तू क्या कह रहा है। हे जीव ! तू क्या कहता है। मेरे ठाकुर प्रभू जी तो सब जीवों के दिलों की जानने वाले और समझने वाले हैं। हे जीव ! उसके आगे कोई (ठॅगी-फरेब की) बात नहीं कही जा सकती। 1। रहाउ। हे प्रभू ! जो हम जीवों के दिलों में होता है। उसको बताए बिना तू खुद ही (पहले ही) पहचान लेता है। हे मन ! तू क्यों ठॅगी करता है। कब तक ठॅगी किए जाएगा। परमात्मा तो तेरे साथ (बसता हुआ तेरे कर्म) देख रहा है। और। सुन भी रहा है। 1। हे भाई ! यह जान के कि। परमात्मा के बिना और दूसरा कुछ भी करने के योग्य नहीं। (जानने वाले के) मन में हिलौरे पैदा हो जाते हैं। हे नानक ! कह- जिस मनुष्य पर गुरू मेहरवान होता है (उसके दिल में से) परमात्मा का प्रेम-रंग कभी नहीं उतरता। 2। 8। 94।
ਬਿਲਾਵਲੁ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਨਿੰਦਕੁ ਐਸੇ ਹੀ ਝਰਿ ਪਰੀਐ ॥
ਇਹ ਨੀਸਾਨੀ ਸੁਨਹੁ ਤੁਮ ਭਾਈ ਜਿਉ ਕਾਲਰ ਭੀਤਿ ਗਿਰੀਐ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਜਉ ਦੇਖੈ ਛਿਦ੍ਰੁ ਤਉ ਨਿੰਦਕੁ ਉਮਾਹੈ ਭਲੋ ਦੇਖਿ ਦੁਖ ਭਰੀਐ ॥
ਆਠ ਪਹਰ ਚਿਤਵੈ ਨਹੀ ਪਹੁਚੈ ਬੁਰਾ ਚਿਤਵਤ ਚਿਤਵਤ ਮਰੀਐ ॥੧॥
ਨਿੰਦਕੁ ਪ੍ਰਭੂ ਭੁਲਾਇਆ ਕਾਲੁ ਨੇਰੈ ਆਇਆ ਹਰਿ ਜਨ ਸਿਉ ਬਾਦੁ ਉਠਰੀਐ ॥
ਨਾਨਕ ਕਾ ਰਾਖਾ ਆਪਿ ਪ੍ਰਭੁ ਸੁਆਮੀ ਕਿਆ ਮਾਨਸ ਬਪੁਰੇ ਕਰੀਐ ॥੨॥੯॥੯੫॥
ਨਿੰਦਕੁ ਐਸੇ ਹੀ ਝਰਿ ਪਰੀਐ ॥
ਇਹ ਨੀਸਾਨੀ ਸੁਨਹੁ ਤੁਮ ਭਾਈ ਜਿਉ ਕਾਲਰ ਭੀਤਿ ਗਿਰੀਐ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਜਉ ਦੇਖੈ ਛਿਦ੍ਰੁ ਤਉ ਨਿੰਦਕੁ ਉਮਾਹੈ ਭਲੋ ਦੇਖਿ ਦੁਖ ਭਰੀਐ ॥
ਆਠ ਪਹਰ ਚਿਤਵੈ ਨਹੀ ਪਹੁਚੈ ਬੁਰਾ ਚਿਤਵਤ ਚਿਤਵਤ ਮਰੀਐ ॥੧॥
ਨਿੰਦਕੁ ਪ੍ਰਭੂ ਭੁਲਾਇਆ ਕਾਲੁ ਨੇਰੈ ਆਇਆ ਹਰਿ ਜਨ ਸਿਉ ਬਾਦੁ ਉਠਰੀਐ ॥
ਨਾਨਕ ਕਾ ਰਾਖਾ ਆਪਿ ਪ੍ਰਭੁ ਸੁਆਮੀ ਕਿਆ ਮਾਨਸ ਬਪੁਰੇ ਕਰੀਐ ॥੨॥੯॥੯੫॥
बिलावलु महला ५ ॥
निंदकु ऐसे ही झरि परीऐ ॥
इह नीसानी सुनहु तुम भाई जिउ कालर भीति गिरीऐ ॥१॥ रहाउ ॥
जउ देखै छिद्रु तउ निंदकु उमाहै भलो देखि दुख भरीऐ ॥
आठ पहर चितवै नही पहुचै बुरा चितवत चितवत मरीऐ ॥१॥
निंदकु प्रभू भुलाइआ कालु नेरै आइआ हरि जन सिउ बादु उठरीऐ ॥
नानक का राखा आपि प्रभु सुआमी किआ मानस बपुरे करीऐ ॥२॥९॥९५॥
निंदकु ऐसे ही झरि परीऐ ॥
इह नीसानी सुनहु तुम भाई जिउ कालर भीति गिरीऐ ॥१॥ रहाउ ॥
जउ देखै छिद्रु तउ निंदकु उमाहै भलो देखि दुख भरीऐ ॥
आठ पहर चितवै नही पहुचै बुरा चितवत चितवत मरीऐ ॥१॥
निंदकु प्रभू भुलाइआ कालु नेरै आइआ हरि जन सिउ बादु उठरीऐ ॥
नानक का राखा आपि प्रभु सुआमी किआ मानस बपुरे करीऐ ॥२॥९॥९५॥
हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला ५ ॥ निंदक भी इसी तरह आत्मिक उच्चता से गिर जाता है (निंदा उसके आत्मिक जीवन को। मानो। कल्लर लगा हुआ है)। हे भाई ! सुन। कॅलर की दीवार (किर किर के) गिर जाती है। यही निशानी निंदक के जीवन की है। 1। रहाउ। हे भाई ! जब (कोई) निंदक (किसी मनुष्य में कोई) खामी देखता है तब वह खुश होता है। पर किसी के गुण देख के निंदक दुखी होता है। आठों पहर (हर वक्त) निंदक किसी के साथ बुराई करने की सोचें सोचता रहता है। बुराई कर सकने तक पहुँच तो सकता नहीं। बुराई की बिउंत सोचते-सोचते ही आत्मिक मौत मर जाता है। 2। हे भाई ! निंदक को ज्यों-ज्यों प्रभू (निंदा वाले) गलत रास्ते पर डालता है। त्यों त्यों निंदक की मुकम्मल आत्मिक मौत नजदीक आती जाती है। वह निंदक संत जनों से वैर लिए रहता है। पर। हे नानक ! संतजनों का रखवाला मालिक-प्रभू खुद ही है। बिचारे जीव उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकते। 2। 9। 95।
ਬਿਲਾਵਲੁ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਐਸੇ ਕਾਹੇ ਭੂਲਿ ਪਰੇ ॥
ਕਰਹਿ ਕਰਾਵਹਿ ਮੂਕਰਿ ਪਾਵਹਿ ਪੇਖਤ ਸੁਨਤ ਸਦਾ ਸੰਗਿ ਹਰੇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਕਾਚ ਬਿਹਾਝਨ ਕੰਚਨ ਛਾਡਨ ਬੈਰੀ ਸੰਗਿ ਹੇਤੁ ਸਾਜਨ ਤਿਆਗਿ ਖਰੇ ॥
ਹੋਵਨੁ ਕਉਰਾ ਅਨਹੋਵਨੁ ਮੀਠਾ ਬਿਖਿਆ ਮਹਿ ਲਪਟਾਇ ਜਰੇ ॥੧॥
ਅੰਧ ਕੂਪ ਮਹਿ ਪਰਿਓ ਪਰਾਨੀ ਭਰਮ ਗੁਬਾਰ ਮੋਹ ਬੰਧਿ ਪਰੇ ॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਪ੍ਰਭ ਹੋਤ ਦਇਆਰਾ ਗੁਰੁ ਭੇਟੈ ਕਾਢੈ ਬਾਹ ਫਰੇ ॥੨॥੧੦॥੯੬॥
ਐਸੇ ਕਾਹੇ ਭੂਲਿ ਪਰੇ ॥
ਕਰਹਿ ਕਰਾਵਹਿ ਮੂਕਰਿ ਪਾਵਹਿ ਪੇਖਤ ਸੁਨਤ ਸਦਾ ਸੰਗਿ ਹਰੇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਕਾਚ ਬਿਹਾਝਨ ਕੰਚਨ ਛਾਡਨ ਬੈਰੀ ਸੰਗਿ ਹੇਤੁ ਸਾਜਨ ਤਿਆਗਿ ਖਰੇ ॥
ਹੋਵਨੁ ਕਉਰਾ ਅਨਹੋਵਨੁ ਮੀਠਾ ਬਿਖਿਆ ਮਹਿ ਲਪਟਾਇ ਜਰੇ ॥੧॥
ਅੰਧ ਕੂਪ ਮਹਿ ਪਰਿਓ ਪਰਾਨੀ ਭਰਮ ਗੁਬਾਰ ਮੋਹ ਬੰਧਿ ਪਰੇ ॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਪ੍ਰਭ ਹੋਤ ਦਇਆਰਾ ਗੁਰੁ ਭੇਟੈ ਕਾਢੈ ਬਾਹ ਫਰੇ ॥੨॥੧੦॥੯੬॥
बिलावलु महला ५ ॥
ऐसे काहे भूलि परे ॥
करहि करावहि मूकरि पावहि पेखत सुनत सदा संगि हरे ॥१॥ रहाउ ॥
काच बिहाझन कंचन छाडन बैरी संगि हेतु साजन तिआगि खरे ॥
होवनु कउरा अनहोवनु मीठा बिखिआ महि लपटाइ जरे ॥१॥
अंध कूप महि परिओ परानी भरम गुबार मोह बंधि परे ॥
कहु नानक प्रभ होत दइआरा गुरु भेटै काढै बाह फरे ॥२॥१०॥९६॥
ऐसे काहे भूलि परे ॥
करहि करावहि मूकरि पावहि पेखत सुनत सदा संगि हरे ॥१॥ रहाउ ॥
काच बिहाझन कंचन छाडन बैरी संगि हेतु साजन तिआगि खरे ॥
होवनु कउरा अनहोवनु मीठा बिखिआ महि लपटाइ जरे ॥१॥
अंध कूप महि परिओ परानी भरम गुबार मोह बंधि परे ॥
कहु नानक प्रभ होत दइआरा गुरु भेटै काढै बाह फरे ॥२॥१०॥९६॥
हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला ५ ॥ (हे भाई ! पता नहीं जीव) क्यों इस तरह गलत राह पर पड़े रहते हैं। (जीव सारे बुरे कर्म) करते कराते भी हैं। (फिर) मुकर भी जाते हैं (कि हमने नहीं किए)। पर परमात्मा सदा सब जीवों के साथ बसता (सबकी करतूतें) देखता-सुनता है। 1। रहाउ। हे भाई ! काँच का व्यापार करना। सोना छोड़ देना। सच्चे मित्र त्याग के वैरी से प्यार- (ये हैं जीवों की करतूतें)। परमात्मा (का नाम) कड़वा लगना। माया का मोह मीठा लगना (- यह है जीवों का नित्य का स्वभाव। माया के मोह में फस के सदा खिजते रहते हैं)। 1। हे भाई ! जीव (सदा) मोह के अंधे (अंधेरे) कूएं में पड़े रहते हैं। (जीवों को सदा) भटकना लगी रहती है। मोह के अंधेरे जकड़ में फसे रहते हैं (पता नहीं ये क्यों इस तरह गलत रास्ते पर पड़े रहते हैं)। हे नानक ! कह- जिस मनुष्य पर प्रभू दयावान होता है। उसे गुरू मिल जाता है (और। उस गुरू की) बाँह पकड़ के (उसको अंधेरे कूएं में से) निकाल लेता है। 2। 10। 96।
ਬਿਲਾਵਲੁ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਮਨ ਤਨ ਰਸਨਾ ਹਰਿ ਚੀਨੑਾ ॥
ਭਏ ਅਨੰਦਾ ਮਿਟੇ ਅੰਦੇਸੇ ਸਰਬ ਸੂਖ ਮੋ ਕਉ ਗੁਰਿ ਦੀਨੑਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਇਆਨਪ ਤੇ ਸਭ ਭਈ ਸਿਆਨਪ ਪ੍ਰਭੁ ਮੇਰਾ ਦਾਨਾ ਬੀਨਾ ॥
ਹਾਥ ਦੇਇ ਰਾਖੈ ਅਪਨੇ ਕਉ ਕਾਹੂ ਨ ਕਰਤੇ ਕਛੁ ਖੀਨਾ ॥੧॥
ਬਲਿ ਜਾਵਉ ਦਰਸਨ ਸਾਧੂ ਕੈ ਜਿਹ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਲੀਨਾ ॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਠਾਕੁਰ ਭਾਰੋਸੈ ਕਹੂ ਨ ਮਾਨਿਓ ਮਨਿ ਛੀਨਾ ॥੨॥੧੧॥੯੭॥
ਮਨ ਤਨ ਰਸਨਾ ਹਰਿ ਚੀਨੑਾ ॥
ਭਏ ਅਨੰਦਾ ਮਿਟੇ ਅੰਦੇਸੇ ਸਰਬ ਸੂਖ ਮੋ ਕਉ ਗੁਰਿ ਦੀਨੑਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਇਆਨਪ ਤੇ ਸਭ ਭਈ ਸਿਆਨਪ ਪ੍ਰਭੁ ਮੇਰਾ ਦਾਨਾ ਬੀਨਾ ॥
ਹਾਥ ਦੇਇ ਰਾਖੈ ਅਪਨੇ ਕਉ ਕਾਹੂ ਨ ਕਰਤੇ ਕਛੁ ਖੀਨਾ ॥੧॥
ਬਲਿ ਜਾਵਉ ਦਰਸਨ ਸਾਧੂ ਕੈ ਜਿਹ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਲੀਨਾ ॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਠਾਕੁਰ ਭਾਰੋਸੈ ਕਹੂ ਨ ਮਾਨਿਓ ਮਨਿ ਛੀਨਾ ॥੨॥੧੧॥੯੭॥
बिलावलु महला ५ ॥
मन तन रसना हरि चीन॑ा ॥
भए अनंदा मिटे अंदेसे सरब सूख मो कउ गुरि दीन॑ा ॥१॥ रहाउ ॥
इआनप ते सभ भई सिआनप प्रभु मेरा दाना बीना ॥
हाथ देइ राखै अपने कउ काहू न करते कछु खीना ॥१॥
बलि जावउ दरसन साधू कै जिह प्रसादि हरि नामु लीना ॥
कहु नानक ठाकुर भारोसै कहू न मानिओ मनि छीना ॥२॥११॥९७॥
मन तन रसना हरि चीन॑ा ॥
भए अनंदा मिटे अंदेसे सरब सूख मो कउ गुरि दीन॑ा ॥१॥ रहाउ ॥
इआनप ते सभ भई सिआनप प्रभु मेरा दाना बीना ॥
हाथ देइ राखै अपने कउ काहू न करते कछु खीना ॥१॥
बलि जावउ दरसन साधू कै जिह प्रसादि हरि नामु लीना ॥
कहु नानक ठाकुर भारोसै कहू न मानिओ मनि छीना ॥२॥११॥९७॥
हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला ५ ॥ (हे भाई ! मेरे) गुरू ने मुझे सारे (ही) सुख दे दिए हैं। मेरे फिक्र-अंदेशे मिट गए हैं। मेरे अंदर आनंद ही आनंद बन गया है (क्योंकि गुरू की कृपा से) मेरे मन मेरे तन मेरी जीभ ने परमात्मा के साथ सांझ डाल ली है। 1। रहाउ। हे भाई ! बेसमझी की जगह मेरे अंदर अब समझदारी पैदा हो गई है (क्योंकि गुरू की कृपा से मुझे विश्वास हो गया है कि) परमात्मा (सब दिलों की) जानने वाला है (सबके किए काम) देखने वाला है। (मुझे निश्चय हो गया है कि) परमात्मा अपने सेवकों को आप हाथ दे के बचा लेता है। कोई भी मनुष्य (सेवक का) कुछ बिगाड़ नहीं सकता। 1। हे भाई ! मैं गुरू के दर्शनों से सदके जाता हूँ। क्योंकि उस गुरू की कृपा से (ही) मैं परमात्मा का नाम जप सका हूँ। हे नानक ! कह- (अब) परमात्मा के भरोसे पर किसी और (के आसरे) को एक पल के लिए भी अपने मन में नहीं मानता। 2। 11। 97।
ਬਿਲਾਵਲੁ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਗੁਰਿ ਪੂਰੈ ਮੇਰੀ ਰਾਖਿ ਲਈ ॥
ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਨਾਮੁ ਰਿਦੇ ਮਹਿ ਦੀਨੋ ਜਨਮ ਜਨਮ ਕੀ ਮੈਲੁ ਗਈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਨਿਵਰੇ ਦੂਤ ਦੁਸਟ ਬੈਰਾਈ ਗੁਰ ਪੂਰੇ ਕਾ ਜਪਿਆ ਜਾਪੁ ॥
ਗੁਰਿ ਪੂਰੈ ਮੇਰੀ ਰਾਖਿ ਲਈ ॥
ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਨਾਮੁ ਰਿਦੇ ਮਹਿ ਦੀਨੋ ਜਨਮ ਜਨਮ ਕੀ ਮੈਲੁ ਗਈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਨਿਵਰੇ ਦੂਤ ਦੁਸਟ ਬੈਰਾਈ ਗੁਰ ਪੂਰੇ ਕਾ ਜਪਿਆ ਜਾਪੁ ॥
बिलावलु महला ५ ॥
गुरि पूरै मेरी राखि लई ॥
अंम्रित नामु रिदे महि दीनो जनम जनम की मैलु गई ॥१॥ रहाउ ॥
निवरे दूत दुसट बैराई गुर पूरे का जपिआ जापु ॥
गुरि पूरै मेरी राखि लई ॥
अंम्रित नामु रिदे महि दीनो जनम जनम की मैलु गई ॥१॥ रहाउ ॥
निवरे दूत दुसट बैराई गुर पूरे का जपिआ जापु ॥
हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला ५ ॥ (हे भाई ! विकारों से मुकाबले में) पूरे गुरू ने मेरी इज्जत रख ली है। गुरू ने आत्मिक जीवन देने वाला नाम-जल हरी-नाम मेरे हृदय में बसा दिया है। (उस नाम की बरकति से) अनेकों जन्मों के किए कर्मों की मैल मेरे मन में से दूर हो गई है। 1। रहाउ। हे भाई ! पूरे गुरू का बताया हुआ हरी-नाम का जाप जब से मैंने जपना शुरू किया है। (कामादिक) सारे वैरी दुर्जन भाग गए हैं।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 823 है, राग बिलावल का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।
M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।
Vasant Vihar के market में Sunday सुबह की धीमी-धीमी activity।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 35 पंक्तियों का है, 6 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 823” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: बिलावल राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 824 →, पीछे का: ← अंग 822।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।