अंग
820
राग बिलावल
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਭਗਤ ਜਨਾ ਕੀ ਬੇਨਤੀ ਸੁਣੀ ਪ੍ਰਭਿ ਆਪਿ ॥
ਰੋਗ ਮਿਟਾਇ ਜੀਵਾਲਿਅਨੁ ਜਾ ਕਾ ਵਡ ਪਰਤਾਪੁ ॥੧॥
ਦੋਖ ਹਮਾਰੇ ਬਖਸਿਅਨੁ ਅਪਣੀ ਕਲ ਧਾਰੀ ॥
ਮਨ ਬਾਂਛਤ ਫਲ ਦਿਤਿਅਨੁ ਨਾਨਕ ਬਲਿਹਾਰੀ ॥੨॥੧੬॥੮੦॥
ਰੋਗ ਮਿਟਾਇ ਜੀਵਾਲਿਅਨੁ ਜਾ ਕਾ ਵਡ ਪਰਤਾਪੁ ॥੧॥
ਦੋਖ ਹਮਾਰੇ ਬਖਸਿਅਨੁ ਅਪਣੀ ਕਲ ਧਾਰੀ ॥
ਮਨ ਬਾਂਛਤ ਫਲ ਦਿਤਿਅਨੁ ਨਾਨਕ ਬਲਿਹਾਰੀ ॥੨॥੧੬॥੮੦॥
भगत जना की बेनती सुणी प्रभि आपि ॥
रोग मिटाइ जीवालिअनु जा का वड परतापु ॥१॥
दोख हमारे बखसिअनु अपणी कल धारी ॥
मन बांछत फल दितिअनु नानक बलिहारी ॥२॥१६॥८०॥
रोग मिटाइ जीवालिअनु जा का वड परतापु ॥१॥
दोख हमारे बखसिअनु अपणी कल धारी ॥
मन बांछत फल दितिअनु नानक बलिहारी ॥२॥१६॥८०॥
हिन्दी अर्थ: हे भाई ! जिस प्रभू का (सबसे) बड़ा तेज-प्रताप है उस ने अपने भक्तों की आरजू (सदा) सुनी है (उनके अंदर से) रोग मिटा के उनको आत्मिक जीवन की दाति बख्शी है। 1। हे भाई ! उस प्रभू-पिता ने हम बच्चों के ऐब सदा माफ कर दिए हैं। और हमारे अंदर अपने नाम की ताकत भरी है। हे नानक ! प्रभू पिता ने हम बच्चों को सदा मन-मांगे फल दिए हैं। उस प्रभू से सदा सदके जाना चाहिए। 2। 16। 80।
ਰਾਗੁ ਬਿਲਾਵਲੁ ਮਹਲਾ ੫ ਚਉਪਦੇ ਦੁਪਦੇ ਘਰੁ ੬
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ਮੇਰੇ ਮੋਹਨ ਸ੍ਰਵਨੀ ਇਹ ਨ ਸੁਨਾਏ ॥ ਸਾਕਤ ਗੀਤ ਨਾਦ ਧੁਨਿ ਗਾਵਤ ਬੋਲਤ ਬੋਲ ਅਜਾਏ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਸੇਵਤ ਸੇਵਿ ਸੇਵਿ ਸਾਧ ਸੇਵਉ ਸਦਾ ਕਰਉ ਕਿਰਤਾਏ ॥
ਅਭੈ ਦਾਨੁ ਪਾਵਉ ਪੁਰਖ ਦਾਤੇ ਮਿਲਿ ਸੰਗਤਿ ਹਰਿ ਗੁਣ ਗਾਏ ॥੧॥
ਰਸਨਾ ਅਗਹ ਅਗਹ ਗੁਨ ਰਾਤੀ ਨੈਨ ਦਰਸ ਰੰਗੁ ਲਾਏ ॥
ਹੋਹੁ ਕ੍ਰਿਪਾਲ ਦੀਨ ਦੁਖ ਭੰਜਨ ਮੋਹਿ ਚਰਣ ਰਿਦੈ ਵਸਾਏ ॥੨॥
ਸਭਹੂ ਤਲੈ ਤਲੈ ਸਭ ਊਪਰਿ ਏਹ ਦ੍ਰਿਸਟਿ ਦ੍ਰਿਸਟਾਏ ॥
ਅਭਿਮਾਨੁ ਖੋਇ ਖੋਇ ਖੋਇ ਖੋਈ ਹਉ ਮੋ ਕਉ ਸਤਿਗੁਰ ਮੰਤ੍ਰੁ ਦ੍ਰਿੜਾਏ ॥੩॥
ਅਤੁਲੁ ਅਤੁਲੁ ਅਤੁਲੁ ਨਹ ਤੁਲੀਐ ਭਗਤਿ ਵਛਲੁ ਕਿਰਪਾਏ ॥
ਜੋ ਜੋ ਸਰਣਿ ਪਰਿਓ ਗੁਰ ਨਾਨਕ ਅਭੈ ਦਾਨੁ ਸੁਖ ਪਾਏ ॥੪॥੧॥੮੧॥
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ਮੇਰੇ ਮੋਹਨ ਸ੍ਰਵਨੀ ਇਹ ਨ ਸੁਨਾਏ ॥ ਸਾਕਤ ਗੀਤ ਨਾਦ ਧੁਨਿ ਗਾਵਤ ਬੋਲਤ ਬੋਲ ਅਜਾਏ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਸੇਵਤ ਸੇਵਿ ਸੇਵਿ ਸਾਧ ਸੇਵਉ ਸਦਾ ਕਰਉ ਕਿਰਤਾਏ ॥
ਅਭੈ ਦਾਨੁ ਪਾਵਉ ਪੁਰਖ ਦਾਤੇ ਮਿਲਿ ਸੰਗਤਿ ਹਰਿ ਗੁਣ ਗਾਏ ॥੧॥
ਰਸਨਾ ਅਗਹ ਅਗਹ ਗੁਨ ਰਾਤੀ ਨੈਨ ਦਰਸ ਰੰਗੁ ਲਾਏ ॥
ਹੋਹੁ ਕ੍ਰਿਪਾਲ ਦੀਨ ਦੁਖ ਭੰਜਨ ਮੋਹਿ ਚਰਣ ਰਿਦੈ ਵਸਾਏ ॥੨॥
ਸਭਹੂ ਤਲੈ ਤਲੈ ਸਭ ਊਪਰਿ ਏਹ ਦ੍ਰਿਸਟਿ ਦ੍ਰਿਸਟਾਏ ॥
ਅਭਿਮਾਨੁ ਖੋਇ ਖੋਇ ਖੋਇ ਖੋਈ ਹਉ ਮੋ ਕਉ ਸਤਿਗੁਰ ਮੰਤ੍ਰੁ ਦ੍ਰਿੜਾਏ ॥੩॥
ਅਤੁਲੁ ਅਤੁਲੁ ਅਤੁਲੁ ਨਹ ਤੁਲੀਐ ਭਗਤਿ ਵਛਲੁ ਕਿਰਪਾਏ ॥
ਜੋ ਜੋ ਸਰਣਿ ਪਰਿਓ ਗੁਰ ਨਾਨਕ ਅਭੈ ਦਾਨੁ ਸੁਖ ਪਾਏ ॥੪॥੧॥੮੧॥
रागु बिलावलु महला ५ चउपदे दुपदे घरु ६
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
मेरे मोहन स्रवनी इह न सुनाए ॥ साकत गीत नाद धुनि गावत बोलत बोल अजाए ॥१॥ रहाउ ॥
सेवत सेवि सेवि साध सेवउ सदा करउ किरताए ॥
अभै दानु पावउ पुरख दाते मिलि संगति हरि गुण गाए ॥१॥
रसना अगह अगह गुन राती नैन दरस रंगु लाए ॥
होहु क्रिपाल दीन दुख भंजन मोहि चरण रिदै वसाए ॥२॥
सभहू तलै तलै सभ ऊपरि एह द्रिसटि द्रिसटाए ॥
अभिमानु खोइ खोइ खोइ खोई हउ मो कउ सतिगुर मंत्रु द्रिड़ाए ॥३॥
अतुलु अतुलु अतुलु नह तुलीऐ भगति वछलु किरपाए ॥
जो जो सरणि परिओ गुर नानक अभै दानु सुख पाए ॥४॥१॥८१॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
मेरे मोहन स्रवनी इह न सुनाए ॥ साकत गीत नाद धुनि गावत बोलत बोल अजाए ॥१॥ रहाउ ॥
सेवत सेवि सेवि साध सेवउ सदा करउ किरताए ॥
अभै दानु पावउ पुरख दाते मिलि संगति हरि गुण गाए ॥१॥
रसना अगह अगह गुन राती नैन दरस रंगु लाए ॥
होहु क्रिपाल दीन दुख भंजन मोहि चरण रिदै वसाए ॥२॥
सभहू तलै तलै सभ ऊपरि एह द्रिसटि द्रिसटाए ॥
अभिमानु खोइ खोइ खोइ खोई हउ मो कउ सतिगुर मंत्रु द्रिड़ाए ॥३॥
अतुलु अतुलु अतुलु नह तुलीऐ भगति वछलु किरपाए ॥
जो जो सरणि परिओ गुर नानक अभै दानु सुख पाए ॥४॥१॥८१॥
हिन्दी अर्थ: रागु बिलावलु महला ५ चउपदे दुपदे घरु ६ ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ हे मेरे मोहन ! ऐसे बोल मेरे कानों में ना पड़ें। परमात्मा से टूटे हुए मनुष्य (जो गंदे) गीतों नादों धुनियों के बोल बोलते हैं और गाते हैं वह (आत्मिक जीवन के लिए) व्यर्थ हैं।1। रहाउ। हे सर्व-व्यापक दातार ! मैं सदा ही हर वक्त गुरू की शरण पड़ा रहूँ। मैं सदा यही काम करता रहूँ। हे हरी ! (मेहर कर) गुरू की संगति में मिल के। तेरे गुण गा के मैं (तेरे दर से) निर्भयता की दाति प्राप्त करूँ।1। मेरी आँखें तेरे दर्शन कर-करके मेरी जीभ तुझ अपहुँच के गुणों में रति रहे। हे दीनों के दुख दूर करने वाले ! (मुझ पर) दयावान हो। अपने चरण मेरे हृदय में बसाए रख। 2। हे मोहन ! मेरी निगाह में ऐसी ज्योति पैदा कर कि मैं अपने आप को सबसे नीच समझूँ और सबको अपने से ऊँचा जानूँ। हे मोहन ! मेरे दिल में गुरू का उपदेश पक्का कर दे। ता कि मैं सदा के लिए अपने अंदर से अहंकार दूर कर दूँ। 3। हे मोहन ! तू अतुल है। तू अतुल है। तू अतुल है। (तेरे बड़प्पन को) तोला नहीं जा सकता। तू भक्ति को प्यार करने वाला है। तू सबके ऊपर कृपा करता है। हे नानक ! (मोहन-प्रभू की कृपा से) जो जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ता है। वह निर्भयता की दाति हासिल कर लेता है। वह सदा आत्मिक आनंद पाता है। 4। 1। 81।
ਬਿਲਾਵਲੁ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਪ੍ਰਭ ਜੀ ਤੂ ਮੇਰੇ ਪ੍ਰਾਨ ਅਧਾਰੈ ॥
ਨਮਸਕਾਰ ਡੰਡਉਤਿ ਬੰਦਨਾ ਅਨਿਕ ਬਾਰ ਜਾਉ ਬਾਰੈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਊਠਤ ਬੈਠਤ ਸੋਵਤ ਜਾਗਤ ਇਹੁ ਮਨੁ ਤੁਝਹਿ ਚਿਤਾਰੈ ॥
ਸੂਖ ਦੂਖ ਇਸੁ ਮਨ ਕੀ ਬਿਰਥਾ ਤੁਝ ਹੀ ਆਗੈ ਸਾਰੈ ॥੧॥
ਤੂ ਮੇਰੀ ਓਟ ਬਲ ਬੁਧਿ ਧਨੁ ਤੁਮ ਹੀ ਤੁਮਹਿ ਮੇਰੈ ਪਰਵਾਰੈ ॥
ਜੋ ਤੁਮ ਕਰਹੁ ਸੋਈ ਭਲ ਹਮਰੈ ਪੇਖਿ ਨਾਨਕ ਸੁਖ ਚਰਨਾਰੈ ॥੨॥੨॥੮੨॥
ਪ੍ਰਭ ਜੀ ਤੂ ਮੇਰੇ ਪ੍ਰਾਨ ਅਧਾਰੈ ॥
ਨਮਸਕਾਰ ਡੰਡਉਤਿ ਬੰਦਨਾ ਅਨਿਕ ਬਾਰ ਜਾਉ ਬਾਰੈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਊਠਤ ਬੈਠਤ ਸੋਵਤ ਜਾਗਤ ਇਹੁ ਮਨੁ ਤੁਝਹਿ ਚਿਤਾਰੈ ॥
ਸੂਖ ਦੂਖ ਇਸੁ ਮਨ ਕੀ ਬਿਰਥਾ ਤੁਝ ਹੀ ਆਗੈ ਸਾਰੈ ॥੧॥
ਤੂ ਮੇਰੀ ਓਟ ਬਲ ਬੁਧਿ ਧਨੁ ਤੁਮ ਹੀ ਤੁਮਹਿ ਮੇਰੈ ਪਰਵਾਰੈ ॥
ਜੋ ਤੁਮ ਕਰਹੁ ਸੋਈ ਭਲ ਹਮਰੈ ਪੇਖਿ ਨਾਨਕ ਸੁਖ ਚਰਨਾਰੈ ॥੨॥੨॥੮੨॥
बिलावलु महला ५ ॥
प्रभ जी तू मेरे प्रान अधारै ॥
नमसकार डंडउति बंदना अनिक बार जाउ बारै ॥१॥ रहाउ ॥
ऊठत बैठत सोवत जागत इहु मनु तुझहि चितारै ॥
सूख दूख इसु मन की बिरथा तुझ ही आगै सारै ॥१॥
तू मेरी ओट बल बुधि धनु तुम ही तुमहि मेरै परवारै ॥
जो तुम करहु सोई भल हमरै पेखि नानक सुख चरनारै ॥२॥२॥८२॥
प्रभ जी तू मेरे प्रान अधारै ॥
नमसकार डंडउति बंदना अनिक बार जाउ बारै ॥१॥ रहाउ ॥
ऊठत बैठत सोवत जागत इहु मनु तुझहि चितारै ॥
सूख दूख इसु मन की बिरथा तुझ ही आगै सारै ॥१॥
तू मेरी ओट बल बुधि धनु तुम ही तुमहि मेरै परवारै ॥
जो तुम करहु सोई भल हमरै पेखि नानक सुख चरनारै ॥२॥२॥८२॥
हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला ५ ॥ हे प्रभू ! तू (ही) मेरी जिंद का सहारा है। हे प्रभू ! मैं तेरे ही आगे नमस्कार करता हूँ। दण्डवत् करके नमस्कार करता हूँ। मैं अनेकों बार तुझसे सदके जाता हूँ। 1। रहाउ। हे प्रभू ! उठते। बैठते। सोते। जागते (हर वक्त) मेरा ये मन तुझे ही याद करता रहता है। मेरा ये मन अपना सुख अपना दुख अपनी हरेक पीड़ा तेरे ही आगे रखता है। 1। हे प्रभू ! तू ही मेरा सहारा है। तू ही मेरा माण है। तू ही मेरा ताण (बल) है। तू ही मेरी बुद्धि है। तू ही मेरी समृद्धि (धन) है। और तू ही मेरे वास्ते मेरा परिवार है। हे नानक ! (कह- हे प्रभू !) जो कुछ तू करता है मेरे वास्ते वही भलाई है। तेरे चरणों के दर्शन करके मुझे आत्मिक आनंद प्राप्त होता है। 2। 2। 82।
ਬਿਲਾਵਲੁ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਸੁਨੀਅਤ ਪ੍ਰਭ ਤਉ ਸਗਲ ਉਧਾਰਨ ॥
ਮੋਹ ਮਗਨ ਪਤਿਤ ਸੰਗਿ ਪ੍ਰਾਨੀ ਐਸੇ ਮਨਹਿ ਬਿਸਾਰਨ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਸੰਚਿ ਬਿਖਿਆ ਲੇ ਗ੍ਰਾਹਜੁ ਕੀਨੀ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਮਨ ਤੇ ਡਾਰਨ ॥
ਕਾਮ ਕ੍ਰੋਧ ਲੋਭ ਰਤੁ ਨਿੰਦਾ ਸਤੁ ਸੰਤੋਖੁ ਬਿਦਾਰਨ ॥੧॥
ਇਨ ਤੇ ਕਾਢਿ ਲੇਹੁ ਮੇਰੇ ਸੁਆਮੀ ਹਾਰਿ ਪਰੇ ਤੁਮੑ ਸਾਰਨ ॥
ਨਾਨਕ ਕੀ ਬੇਨੰਤੀ ਪ੍ਰਭ ਪਹਿ ਸਾਧਸੰਗਿ ਰੰਕ ਤਾਰਨ ॥੨॥੩॥੮੩॥
ਸੁਨੀਅਤ ਪ੍ਰਭ ਤਉ ਸਗਲ ਉਧਾਰਨ ॥
ਮੋਹ ਮਗਨ ਪਤਿਤ ਸੰਗਿ ਪ੍ਰਾਨੀ ਐਸੇ ਮਨਹਿ ਬਿਸਾਰਨ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਸੰਚਿ ਬਿਖਿਆ ਲੇ ਗ੍ਰਾਹਜੁ ਕੀਨੀ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਮਨ ਤੇ ਡਾਰਨ ॥
ਕਾਮ ਕ੍ਰੋਧ ਲੋਭ ਰਤੁ ਨਿੰਦਾ ਸਤੁ ਸੰਤੋਖੁ ਬਿਦਾਰਨ ॥੧॥
ਇਨ ਤੇ ਕਾਢਿ ਲੇਹੁ ਮੇਰੇ ਸੁਆਮੀ ਹਾਰਿ ਪਰੇ ਤੁਮੑ ਸਾਰਨ ॥
ਨਾਨਕ ਕੀ ਬੇਨੰਤੀ ਪ੍ਰਭ ਪਹਿ ਸਾਧਸੰਗਿ ਰੰਕ ਤਾਰਨ ॥੨॥੩॥੮੩॥
बिलावलु महला ५ ॥
सुनीअत प्रभ तउ सगल उधारन ॥
मोह मगन पतित संगि प्रानी ऐसे मनहि बिसारन ॥१॥ रहाउ ॥
संचि बिखिआ ले ग्राहजु कीनी अंम्रितु मन ते डारन ॥
काम क्रोध लोभ रतु निंदा सतु संतोखु बिदारन ॥१॥
इन ते काढि लेहु मेरे सुआमी हारि परे तुम॑ सारन ॥
नानक की बेनंती प्रभ पहि साधसंगि रंक तारन ॥२॥३॥८३॥
सुनीअत प्रभ तउ सगल उधारन ॥
मोह मगन पतित संगि प्रानी ऐसे मनहि बिसारन ॥१॥ रहाउ ॥
संचि बिखिआ ले ग्राहजु कीनी अंम्रितु मन ते डारन ॥
काम क्रोध लोभ रतु निंदा सतु संतोखु बिदारन ॥१॥
इन ते काढि लेहु मेरे सुआमी हारि परे तुम॑ सारन ॥
नानक की बेनंती प्रभ पहि साधसंगि रंक तारन ॥२॥३॥८३॥
हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला ५ ॥ हे प्रभू ! तेरी बाबत सुना जाता है कि तू सारे जीवों को विकारों से बचाने वाला है। (तू उनको भी बचा लेता है। जो) मोह में डूबे हुए विकारों में गिरे हुए प्राणियों के साथ उठना-बैठना रखते हैं और बड़ी बेपरवाही से तुझे मन से भुलाए रखते हैं। 1। रहाउ। हे प्रभू ! (तेरे पैदा किए हुए जीव) माया इकट्ठी करके ही इसको ग्रहण करने योग्य बनाते हैं। पर आत्मिक जीवन देने वाला तेरा नाम-जल अपने मन से परे फेंक देते हैं। (ऐसे) जीव काम-क्रोध-लोभ-निंदा (आदि विकारों) में मस्त रहते हैं और सेवा-संतोख आदि गुण को कतरा-कतरा कर रहे हैं (हे प्रभू ! मेहर कर। इनको विकारों से बचा ले)। 1। हे मेरे मालिक प्रभू ! इन विकारों से हमें बचा ले (हमारी इनके आगे पेश नहीं जाती) हार के तेरी शरण आ पड़े हैं। हे प्रभू ! (तेरे दर के सेवक) नानक की (तेरे आगे) आरजू है कि आत्मिक जीवन से बिल्कुल वंचित लोगों को भी साध-संगति में ला के (संसार-समुंद्र से) पार लंघा लेता है। 2। 3। 83।
ਬਿਲਾਵਲੁ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਸੰਤਨ ਕੈ ਸੁਨੀਅਤ ਪ੍ਰਭ ਕੀ ਬਾਤ ॥
ਕਥਾ ਕੀਰਤਨੁ ਆਨੰਦ ਮੰਗਲ ਧੁਨਿ ਪੂਰਿ ਰਹੀ ਦਿਨਸੁ ਅਰੁ ਰਾਤਿ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਅਪਨੇ ਪ੍ਰਭਿ ਕੀਨੇ ਨਾਮ ਅਪੁਨੇ ਕੀ ਕੀਨੀ ਦਾਤਿ ॥
ਆਠ ਪਹਰ ਗੁਨ ਗਾਵਤ ਪ੍ਰਭ ਕੇ ਕਾਮ ਕ੍ਰੋਧ ਇਸੁ ਤਨ ਤੇ ਜਾਤ ॥੧॥
ਸੰਤਨ ਕੈ ਸੁਨੀਅਤ ਪ੍ਰਭ ਕੀ ਬਾਤ ॥
ਕਥਾ ਕੀਰਤਨੁ ਆਨੰਦ ਮੰਗਲ ਧੁਨਿ ਪੂਰਿ ਰਹੀ ਦਿਨਸੁ ਅਰੁ ਰਾਤਿ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਅਪਨੇ ਪ੍ਰਭਿ ਕੀਨੇ ਨਾਮ ਅਪੁਨੇ ਕੀ ਕੀਨੀ ਦਾਤਿ ॥
ਆਠ ਪਹਰ ਗੁਨ ਗਾਵਤ ਪ੍ਰਭ ਕੇ ਕਾਮ ਕ੍ਰੋਧ ਇਸੁ ਤਨ ਤੇ ਜਾਤ ॥੧॥
बिलावलु महला ५ ॥
संतन कै सुनीअत प्रभ की बात ॥
कथा कीरतनु आनंद मंगल धुनि पूरि रही दिनसु अरु राति ॥१॥ रहाउ ॥
करि किरपा अपने प्रभि कीने नाम अपुने की कीनी दाति ॥
आठ पहर गुन गावत प्रभ के काम क्रोध इसु तन ते जात ॥१॥
संतन कै सुनीअत प्रभ की बात ॥
कथा कीरतनु आनंद मंगल धुनि पूरि रही दिनसु अरु राति ॥१॥ रहाउ ॥
करि किरपा अपने प्रभि कीने नाम अपुने की कीनी दाति ॥
आठ पहर गुन गावत प्रभ के काम क्रोध इसु तन ते जात ॥१॥
हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला ५ ॥ हे भाई ! साध-संगत में प्रभू की सिफत-सालाह की कथा-वार्ता (सदा) सुनी जाती है। वहाँ दिन-रात हर वक्त प्रभू की कथा-कहानियाँ होती हैं। कीर्तन होता है। आत्मिक आनंद हिल्लौरे पैदा करने वाली धुनि सदा चली रहती है। 1। रहाउ। हे भाई ! संतजनों को प्रभू ने मेहर करके अपने सेवक बना लिया होता है। उनको अपने नाम की दाति बख्शी होती है। आठों पहर प्रभू के गुण गाते-गाते (उनके) इस शरीर में से काम-क्रोध (आदि विकार) दूर हो जाते हैं। 1।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 820 है, राग बिलावल का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।
M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।
Faridabad-Delhi border के पास सर्दियों की धुंध में सुबह का सूरज।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 34 पंक्तियों का है, 5 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 820” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: बिलावल राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 821 →, पीछे का: ← अंग 819।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।