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अंग 811

अंग
811
राग बिलावल
राग: बिलावल · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
जगत उधारन साध प्रभ तिन॑ लागहु पाल ॥
मो कउ दीजै दानु प्रभ संतन पग राल ॥2॥
उकति सिआनप कछु नही नाही कछु घाल ॥
भ्रम भै राखहु मोह ते काटहु जम जाल ॥3॥
बिनउ करउ करुणापते पिता प्रतिपाल ॥
गुण गावउ तेरे साधसंगि नानक सुख साल ॥4॥11॥41॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: हे भाई ! परमात्मा की भक्ति करने वाले गुरमुख मनुष्य दुनिया (के लोगों) को (विकारों से) बचाने की स्मर्था वाले होते हैं। (अगर विकारों से बचने की आवश्यक्ता है तो) उनकी शरण पड़े रहो। हे प्रभू ! मुझे (भी) अपने संतजनों की चरणों की धूड़ का दान दे। 2। हे प्रभू ! मेरे पल्ले दलील करने की स्मर्था नहीं। मेरे अंदर कोई समझदारी नहीं। मैंने किसी सेवा की मेहनत नहीं की। (मेरी तो आपके ही दर पर आरजू है – हे प्रभू !) मुझे भटकनों से। डरों से। मोह से बचा ले (ये भटकन। ये डर। ये मोह सब जम के जाल। जम के वश में डालने वाले हैं। मेरा यह) जमों का जाल काट दे। 3। हे तरस के श्रोत ! हे रक्षा करने के समर्थ प्रभू ! मैं (आपके आगे) विनती करता हूँ। हे नानक ! (कह- हे प्रभू ! मेहर कर) साध-संगति में टिक के मैं आपके गुण गाता रहूँ। (हे प्रभू !) आपकी साध-संगति सुखों का घर है। 4। 11। 41।
बिलावलु महला 5 ॥
कीता लोड़हि सो करहि तुझ बिनु कछु नाहि ॥
परतापु तुम॑ारा देखि कै जमदूत छडि जाहि ॥1॥
तुम॑री क्रिपा ते छूटीऐ बिनसै अहंमेव ॥
सरब कला समरथ प्रभ पूरे गुरदेव ॥1॥ रहाउ ॥
खोजत खोजत खोजिआ नामै बिनु कूरु ॥
जीवन सुखु सभु साधसंगि प्रभ मनसा पूरु ॥2॥
जितु जितु लावहु तितु तितु लगहि सिआनप सभ जाली ॥
जत कत तुम॑ भरपूर हहु मेरे दीन दइआली ॥3॥
सभु किछु तुम ते मागना वडभागी पाए ॥
नानक की अरदासि प्रभ जीवा गुन गाए ॥4॥12॥42॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला 5 ॥ हे प्रभू ! जो कुछ आप करना चाहता है। वही आप करता है। आपकी प्रेरणा के बिना (जीवों से) कुछ नहीं हैं सकता। आपका तेज-प्रताप देख के जमदूत (भी जीव को) छोड़ जाते हैं। 1। आपकी मेहर से (ही विकारों से) बच सकते हैं। (आपकी कृपा से ही) (जीवों का) अहंकार दूर हैं सकता है। हे सारी ताकतों के मालिक प्रभू ! हे सब कुछ कर सकने वाले प्रभू ! हे गुणों से भरपूर प्रभू ! हे सबसे बड़े देवते प्रभू ! 1। रहाउ। हे प्रभू ! तलाश करते-करते (आखिर मैंने ये बात) जान ली है कि (आपके) नाम के बिना (और सब कुछ) नाशवंत है। जिंदगी का सारा सुख साध-संगति में (ही प्राप्त होता है)। हे प्रभू ! (मुझे भी साध-संगति में टिकाए रख। मेरी ये) तमन्ना पूरी कर। 2। हे प्रभू ! जिस जिस काम में आप (जीवों को) लगाता है। उसी उसी में (जीव) लगते हैं। (इस वास्ते) हे प्रभू ! मैंने अपनी सारी चतुराई खत्म कर दी है। (और। आपकी रजा में चलने की चाहत रखता हूँ)। हे दीनों पर दया करने वाले प्रभू ! आप (सारे जगत में) हर जगह मौजूद है (आपसे कोई आकी नहीं हैं सकता)। 3। हे प्रभू ! (हम जीव) सब कुछ आपसे ही माँग सकते हैं। (जो) भाग्यशाली (मनुष्य माँगता है। वह) प्राप्त कर लेता है। हे प्रभू ! (आपके दास) नानक की (आपके दर पर) अरदास है (मेहर कर। मैं नानक) आपके गुण गा गा के आत्मिक जीवन हासिल कर लूँ। 4। 12। 42।
बिलावलु महला 5 ॥
साधसंगति कै बासबै कलमल सभि नसना ॥
प्रभ सेती रंगि रातिआ ता ते गरभि न ग्रसना ॥1॥
नामु कहत गोविंद का सूची भई रसना ॥
मन तन निरमल होई है गुर का जपु जपना ॥1॥ रहाउ ॥
हरि रसु चाखत ध्रापिआ मनि रसु लै हसना ॥
बुधि प्रगास प्रगट भई उलटि कमलु बिगसना ॥2॥
सीतल सांति संतोखु होइ सभ बूझी त्रिसना ॥
दह दिस धावत मिटि गए निरमल थानि बसना ॥3॥
राखनहारै राखिआ भए भ्रम भसना ॥
नामु निधान नानक सुखी पेखि साध दरसना ॥4॥13॥43॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला 5 ॥ हे भाई ! गुरू की संगति में टिके रहने से सारे पाप दूर हो जाते हैं। (साध-संगत की बरकति से) परमात्मा से (सांझ बनने से) परमात्मा के प्रेम-रंग में रंग जाते हैं। जिसके कारण जनम-मरण के चक्कर में नहीं फसते। 1। हे भाई ! परमात्मा का नाम जपने से (मनुष्य की) जीभ पवित्र हो जाती है। गुरू का (बताया हुआ हरी नाम का) जाप-जपने से मन पवित्र हो जाता है। शरीर पवित्र हो जाता है। 1। रहाउ। (हे भाई ! गुरू की शरण पड़ कर) परमात्मा के नाम का रस चखने से (माया की लालच से) तृप्त हो जाते हैं। परमात्मा का नाम-रस मन में बसा के सदा खिले रहा जाता है। बुद्धि में (सही जीवन मार्ग का) प्रकाश हो जाता है। बुद्धि उज्जवल हो जाती है। हृदय-कमल (माया के मोह की ओर से) पलट के सदा खिला रहता है। 2। (हे भाई ! गुरू की शरण पड़ कर परमात्मा के नाम का जाप करने से मनुष्य का मन) ठंडा-ठार हो जाता है। (मन में) शांति और संतोख पैदा हो जाते हैं। माया वाली सारी तृष्णा समाप्त हो जाती है। (माया की खातिर) दसों दिशाओं में (सारे जगत में) दौड़-भाग मिट जाती है। (प्रभू के चरणों में) पवित्र स्थल पर निवास हो जाता है। 3। हे नानक ! रक्षा करने में समर्थ प्रभू ने जिस मनुष्य की (विकारों से) रक्षा की। उसकी सारी ही भटकनें (जल के) राख हो गई। गुरू का दर्शन करके उस मनुष्य ने परमात्मा का नाम प्राप्त कर लिया (जो मानो। दुनिया के सारे ही) खजाने (हैं)। (और नाम की बरकति से वह सदा के लिए) सुखी हो गया। 4। 13। 43।
बिलावलु महला 5 ॥
पाणी पखा पीसु दास कै तब होहि निहालु ॥
राज मिलख सिकदारीआ अगनी महि जालु ॥1॥
संत जना का छोहरा तिसु चरणी लागि ॥
माइआधारी छत्रपति तिन॑ छोडउ तिआगि ॥1॥ रहाउ ॥
संतन का दाना रूखा सो सरब निधान ॥
ग्रिहि साकत छतीह प्रकार ते बिखू समान ॥2॥
भगत जना का लूगरा ओढि नगन न होई ॥
साकत सिरपाउ रेसमी पहिरत पति खोई ॥3॥
साकत सिउ मुखि जोरिऐ अध वीचहु टूटै ॥
हरि जन की सेवा जो करे इत ऊतहि छूटै ॥4॥
सभ किछु तुम॑ ही ते होआ आपि बणत बणाई ॥
दरसनु भेटत साध का नानक गुण गाई ॥5॥14॥44॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला 5 ॥ हे भाई ! प्रभू के भगत के घर में पानी (ढोया कर)। पंखा (फेरा कर)। (आटा) पीसा) कर। तब ही आप आनंद भोगेगा। दुनियाँ की हकूमतें। जमीनों की मल्कियत। सरदारियाँ – इन को आग में जला के (इन का लालच छोड़ दे)। 1। हे भाई ! जो गुरमुख मनुष्यों का नौकर हो। उसके चरणों में लगा कर। (हे भाई !) मैं तो (जो) बड़े-बड़े धनाढ राजे (हों) उनका साथ छोड़ने को तैयार होऊँगा (पर संतजनों के सेवकों के चरणों में रहना पसंद करूँगा)। 1। हे भाई ! गुरमुखों के घर की रूखी रोटी (अगर मिले तो उसको दुनिया के) सारे खजाने (समझ)। पर परमात्मा से टूटे हुए मनुष्य के घर में (यदि) कई किस्म के भोजन (मिलें। तो) उसे जहर जैसा समझ। 2। हे भाई ! प्रभू की भक्ति करने वाले मनुष्यों से अगर फटा हुआ कपड़े का टुकड़ा भी मिल जाए। तो उसे पहन के नंगा होने का डर नहीं रहता। प्रभू से टूटे हुए मनुष्य से अगर रेशमी सिरोपा भी मिले। उसके पहनने से अपनी इज्जत गवा लेते हैं। 3। हे भाई ! परमात्मा से टूटे हुए मनुष्य से मेल-जोल रखने से वह मेल-जोल (सिरे नहीं चढ़ता) अध-बीच में ही टूट जाता है। जो मनुष्य प्रभू की भक्ति करने वाले बंदों की सेवा करता है। वह इस लोक में भी और परलोक में भी (झगड़ों-बखेड़ों से) बचा रहता है। 4। (पर। हे प्रभू ! जीवों के भी क्या वश। जीवों का) हरेक काम आपकी प्रेरणा से ही होता है। तूने स्वयं ही ये सारी खेल रची हुई है। हे नानक ! (अरदास कर। और कह- हे प्रभू ! मेहर कर) मैं गुरू के दर्शन करके (गुरू की संगति में रह के सदा) आपके गुण गाता रहूँ। 5। 14। 44।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। सूही, बिलावल, और गोंड राग का क्षेत्र। गुरु राम दास की ‘लावां’ इसी सूही राग में बँधी, सोलहवीं सदी के मध्य की।

अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।

इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे भाई ! परमात्मा की भक्ति करने वाले गुरमुख मनुष्य दुनिया (के लोगों) को (विकारों से) बचाने की स्मर्था वाले होते हैं।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।