ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सलोक मः 4 ॥
हरि उतमु हरि प्रभु गाविआ करि नादु बिलावलु रागु ॥
उपदेसु गुरू सुणि मंनिआ धुरि मसतकि पूरा भागु ॥
सभ दिनसु रैणि गुण उचरै हरि हरि हरि उरि लिव लागु ॥
सभु तनु मनु हरिआ होइआ मनु खिड़िआ हरिआ बागु ॥
अगिआनु अंधेरा मिटि गइआ गुर चानणु गिआनु चरागु ॥
जनु नानकु जीवै देखि हरि इक निमख घड़ी मुखि लागु ॥1॥
बिलावलु तब ही कीजीऐ जब मुखि होवै नामु ॥
राग नाद सबदि सोहणे जा लागै सहजि धिआनु ॥
राग नाद छोडि हरि सेवीऐ ता दरगह पाईऐ मानु ॥
नानक गुरमुखि ब्रहमु बीचारीऐ चूकै मनि अभिमानु ॥2॥
तू हरि प्रभु आपि अगंमु है सभि तुधु उपाइआ ॥
तू आपे आपि वरतदा सभु जगतु सबाइआ ॥
तुधु आपे ताड़ी लाईऐ आपे गुण गाइआ ॥
हरि धिआवहु भगतहु दिनसु राति अंति लए छडाइआ ॥
जिनि सेविआ तिनि सुखु पाइआ हरि नामि समाइआ ॥1॥
दूजै भाइ बिलावलु न होवई मनमुखि थाइ न पाइ ॥
पाखंडि भगति न होवई पारब्रहमु न पाइआ जाइ ॥
मनहठि करम कमावणे थाइ न कोई पाइ ॥
नानक गुरमुखि आपु बीचारीऐ विचहु आपु गवाइ ॥
आपे आपि पारब्रहमु है पारब्रहमु वसिआ मनि आइ ॥
जंमणु मरणा कटिआ जोती जोति मिलाइ ॥1॥
बिलावलु करिहु तुम॑ पिआरिहो एकसु सिउ लिव लाइ ॥
जनम मरण दुखु कटीऐ सचे रहै समाइ ॥
सदा बिलावलु अनंदु है जे चलहि सतिगुर भाइ ॥
सतसंगती बहि भाउ करि सदा हरि के गुण गाइ ॥
नानक से जन सोहणे जि गुरमुखि मेलि मिलाइ ॥2॥
सभना जीआ विचि हरि आपि सो भगता का मितु हरि ॥
सभु कोई हरि कै वसि भगता कै अनंदु घरि ॥
हरि भगता का मेली सरबत सउ निसुल जन टंग धरि ॥
हरि सभना का है खसमु सो भगत जन चिति करि ॥
तुधु अपड़ि कोइ न सकै सभ झखि झखि पवै झड़ि ॥2॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। सूही, बिलावल, और गोंड राग का क्षेत्र। गुरु राम दास की ‘लावां’ इसी सूही राग में बँधी, सोलहवीं सदी के मध्य की।
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर वर्ष की आयु में गुरु-गद्दी सँभाली, 1552 में, और 1574 तक रहे। उनकी वाणी में बुढ़ापे, समाज की संरचना, और संगति की चिन्ताएँ बार-बार लौटती हैं। उन्होंने ही लंगर (साझा-भोजन) की व्यवस्था मज़बूत की, और देश-भर में बाईस मंजी (केन्द्र) स्थापित किए।
इस अंग पर 6 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “बिलावल की वार महला 4 सतिगुर प्रसादि ॥ श्लोक महला 4॥ (जिसके हृदय में पूर्ण भले संस्कारों का लेख उघड़ता है) उसने गुरू का शबद रूपी बिलावल राग उचार के सबसे श्रेष्ठ परमात्मा के गुण गाए ।”
एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।