Lulla Family

अंग 849

अंग
849
राग बिलावल
राग: बिलावल · रचयिता: Guru Amar Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
बिलावलु की वार महला 4
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सलोक मः 4 ॥
हरि उतमु हरि प्रभु गाविआ करि नादु बिलावलु रागु ॥
उपदेसु गुरू सुणि मंनिआ धुरि मसतकि पूरा भागु ॥
सभ दिनसु रैणि गुण उचरै हरि हरि हरि उरि लिव लागु ॥
सभु तनु मनु हरिआ होइआ मनु खिड़िआ हरिआ बागु ॥
अगिआनु अंधेरा मिटि गइआ गुर चानणु गिआनु चरागु ॥
जनु नानकु जीवै देखि हरि इक निमख घड़ी मुखि लागु ॥1॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: बिलावल की वार महला 4 सतिगुर प्रसादि ॥ श्लोक महला 4॥ (जिसके हृदय में पूर्ण भले संस्कारों का लेख उघड़ता है) उसने गुरू का शबद रूपी बिलावल राग उचार के सबसे श्रेष्ठ परमात्मा के गुण गाए हैं। हे भाई ! (पिछले किए कर्मों के मुताबिक) जिस मनुष्य के माथे पर धुर से ही पूर्ण भाग्य हैं। उसने सतिगुरू का उपदेश सुन के हृदय में बसाया है। वह मनुष्य सारा दिन और सारी रात (आठों पहर) परमात्मा के गुण गाता है (क्योंकि उसके) हृदय में परमात्मा की याद की लगन लगी रहती है। उसका सारा तन सारा मन हरा-भरा हो जाता है (आत्मिक जीवन के रस से भर जाता है)। उसका मन (ऐसे) खिल जाता है (जैसे) हरा-भरा बाग़ होता है। गुरू की दी हुई आत्मिक जीवन की सूझ (उसके अंदर। मानो) दीया रौशन कर देती है (जिसकी बरकति से उसके अंदर से) आत्मिक जीवन की बे-समझी (का) अंधेरा मिट जाता है। हे हरी ! (आपका) दास नानक (ऐसे गुरमुख मनुष्य को) देख के आत्मिक जीवन हासिल करता है (और। चाहता है कि) चाहे एक पल भर ही उसके दर्शन हों। 1।
मः 3 ॥
बिलावलु तब ही कीजीऐ जब मुखि होवै नामु ॥
राग नाद सबदि सोहणे जा लागै सहजि धिआनु ॥
राग नाद छोडि हरि सेवीऐ ता दरगह पाईऐ मानु ॥
नानक गुरमुखि ब्रहमु बीचारीऐ चूकै मनि अभिमानु ॥2॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: महला 3॥ हे भाई ! पूर्ण आत्मिक आनंद तब ही पाया जा सकता है। जब परमात्मा का नाम (मनुष्य के) मुँह में टिकता है। हे भाई ! राग और नाद (भी) गुरू के शबद द्वारा तब ही सुंदर लगते हैं जब (शबद की बरकति से मनुष्य की) सुरति आत्मिक अडोलता में टिकी रहती है। हे भाई ! (सांसारिक) राग-रंग (का रस) छोड़ के परमात्मा की भक्ति करनी चाहिए। तब ही परमात्मा की हजूरी में आदर मिलता है। हे नानक ! (कह-) अगर गुरू के सन्मुख हो के परमात्मा की याद मन में टिकाएं। तो मन में (ठहरा हुआ) अहंकार दूर हो जाता है। 2।
पउड़ी ॥
तू हरि प्रभु आपि अगंमु है सभि तुधु उपाइआ ॥
तू आपे आपि वरतदा सभु जगतु सबाइआ ॥
तुधु आपे ताड़ी लाईऐ आपे गुण गाइआ ॥
हरि धिआवहु भगतहु दिनसु राति अंति लए छडाइआ ॥
जिनि सेविआ तिनि सुखु पाइआ हरि नामि समाइआ ॥1॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ हे हरी ! आप खुद ही (सब जीवों का) मालिक है। सारे जीव आपके ही पैदा किए हुए हैं। पर आप जीवों की पहुँच से परे है। (यह जो) सारा जगत (दिखाई दे रहा) है (इस में हर जगह) आप खुद ही खुद व्यापक है ! (सारे जीवों में व्यापक हो के) समाधि भी आप खुद ही लगा रहा है। और (अपने) गुण भी आप खुद ही गा रहा है। हे संत जनो ! दिन-रात (हर समय) परमात्मा का ध्यान धरा करो। वह परमात्मा ही अंत में बचाता है। जिस (भी) मनुष्य ने उसकी सेवा-भक्ति की। उसने ही सुख प्राप्त किया। (क्योंकि वह सदा) परमात्मा के नाम में लीन रहता है। 1।
सलोक मः 3 ॥
दूजै भाइ बिलावलु न होवई मनमुखि थाइ न पाइ ॥
पाखंडि भगति न होवई पारब्रहमु न पाइआ जाइ ॥
मनहठि करम कमावणे थाइ न कोई पाइ ॥
नानक गुरमुखि आपु बीचारीऐ विचहु आपु गवाइ ॥
आपे आपि पारब्रहमु है पारब्रहमु वसिआ मनि आइ ॥
जंमणु मरणा कटिआ जोती जोति मिलाइ ॥1॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3॥ हे भाई ! माया के मोह में (टिके रहने से) आत्मिक आनंद नहीं मिलता। अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य (परमात्मा की निगाहों में) कबूल नहीं होता (क्योंकि) अंदर से और व बाहर से और रहने से परमात्मा की भगती नहीं हो सकती। इस तरह परमात्मा नहीं मिल सकता। (अंदर प्रभू से प्यार ना हो तो निरे) मन के हठ से किए कर्म से कोई मनुष्य (परमात्मा की हजूरी में) परवान नहीं होता। हे नानक ! (कह- हे भाई !) अंदर से स्वै-भाव दूर करके गुरू की शरण पड़ के अपना आत्मिक जीवन पड़तालना (आत्म-चिंतन। आत्मावलोचन करना) चाहिए। (इस तरह वह) परमात्मा (जो हर जगह) स्वयं ही स्वयं है मन में आ बसता है। परमात्मा की ज्योति में (अपनी) सुरति जोड़ने से जनम-मरण के चक्कर खत्म हो जाते हैं। 1।
मः 3 ॥
बिलावलु करिहु तुम॑ पिआरिहो एकसु सिउ लिव लाइ ॥
जनम मरण दुखु कटीऐ सचे रहै समाइ ॥
सदा बिलावलु अनंदु है जे चलहि सतिगुर भाइ ॥
सतसंगती बहि भाउ करि सदा हरि के गुण गाइ ॥
नानक से जन सोहणे जि गुरमुखि मेलि मिलाइ ॥2॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: महला 3॥ हे प्यारे सज्जनो ! एक (परमात्मा) से सुरति जोड़ के आप आत्मिक आनंद भोगते रहो। (जो मनुष्य एक परमात्मा में सुरति जोड़ता है। उसका) सारी उम्र का दुख काटा जाता है। (क्योंकि) वह सदा-स्थिर रहने वाले प्रभू में (सदा) लीन रहता है। गुरू के हुकम अनुसार जीवन व्यतीत करते रहें (तो उनके अंदर) सदा आत्मिक आनंद बना रहता है। अगर (मनुष्य) सत्संगति में बैठ के प्यार से सदा परमात्मा की सिफत-सालाह करता है हे नानक ! (कह- हे भाई !) जो मनुष्य गुरू के सन्मुख रहके प्रभू की याद में टिके रहते हैं। वह सुंदर आत्मिक जीवन वाले बन जाते हैं। 1।
पउड़ी ॥
सभना जीआ विचि हरि आपि सो भगता का मितु हरि ॥
सभु कोई हरि कै वसि भगता कै अनंदु घरि ॥
हरि भगता का मेली सरबत सउ निसुल जन टंग धरि ॥
हरि सभना का है खसमु सो भगत जन चिति करि ॥
तुधु अपड़ि कोइ न सकै सभ झखि झखि पवै झड़ि ॥2॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी। हे भाई ! जो परमात्मा खुद सब जीवों में मौजूद है वह ही भक्तों का मित्र है। भक्तों के हृदय-घर में सदा आनंद बना रहता है (क्योंकि वह जानते हैं कि) हरेक जीव परमात्मा के वश में है (और वह परमात्मा उनका मित्र है)। परमात्मा हर जगह अपने भक्तों का साथी-मददगार है (इस वास्ते उसके) भक्त लात पर लात रख के बेफिक्र हो के सोते हैं (निष्चिंत जीवन व्यतीत करते हैं)। जो परमात्मा सब जीवों का पति है। उसको भक्त-जन (सदा अपने) हृदय में बसाए रखते हैं। हे प्रभू ! सारी दुनिया खप-खप के थक जाती है। कोई आपके गुणों का अंत नहीं पा सकता। 2।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। सूही, बिलावल, और गोंड राग का क्षेत्र। गुरु राम दास की ‘लावां’ इसी सूही राग में बँधी, सोलहवीं सदी के मध्य की।

गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर वर्ष की आयु में गुरु-गद्दी सँभाली, 1552 में, और 1574 तक रहे। उनकी वाणी में बुढ़ापे, समाज की संरचना, और संगति की चिन्ताएँ बार-बार लौटती हैं। उन्होंने ही लंगर (साझा-भोजन) की व्यवस्था मज़बूत की, और देश-भर में बाईस मंजी (केन्द्र) स्थापित किए।

इस अंग पर 6 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “बिलावल की वार महला 4 सतिगुर प्रसादि ॥ श्लोक महला 4॥ (जिसके हृदय में पूर्ण भले संस्कारों का लेख उघड़ता है) उसने गुरू का शबद रूपी बिलावल राग उचार के सबसे श्रेष्ठ परमात्मा के गुण गाए ।”

एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।