अंग
829
राग बिलावल
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਬਿਲਾਵਲੁ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਅਪਨੇ ਸੇਵਕ ਕਉ ਕਬਹੁ ਨ ਬਿਸਾਰਹੁ ॥
ਉਰਿ ਲਾਗਹੁ ਸੁਆਮੀ ਪ੍ਰਭ ਮੇਰੇ ਪੂਰਬ ਪ੍ਰੀਤਿ ਗੋਬਿੰਦ ਬੀਚਾਰਹੁ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਪਤਿਤ ਪਾਵਨ ਪ੍ਰਭ ਬਿਰਦੁ ਤੁਮੑਾਰੋ ਹਮਰੇ ਦੋਖ ਰਿਦੈ ਮਤ ਧਾਰਹੁ ॥
ਜੀਵਨ ਪ੍ਰਾਨ ਹਰਿ ਧਨੁ ਸੁਖੁ ਤੁਮ ਹੀ ਹਉਮੈ ਪਟਲੁ ਕ੍ਰਿਪਾ ਕਰਿ ਜਾਰਹੁ ॥੧॥
ਜਲ ਬਿਹੂਨ ਮੀਨ ਕਤ ਜੀਵਨ ਦੂਧ ਬਿਨਾ ਰਹਨੁ ਕਤ ਬਾਰੋ ॥
ਜਨ ਨਾਨਕ ਪਿਆਸ ਚਰਨ ਕਮਲਨੑ ਕੀ ਪੇਖਿ ਦਰਸੁ ਸੁਆਮੀ ਸੁਖ ਸਾਰੋ ॥੨॥੭॥੧੨੩॥
ਅਪਨੇ ਸੇਵਕ ਕਉ ਕਬਹੁ ਨ ਬਿਸਾਰਹੁ ॥
ਉਰਿ ਲਾਗਹੁ ਸੁਆਮੀ ਪ੍ਰਭ ਮੇਰੇ ਪੂਰਬ ਪ੍ਰੀਤਿ ਗੋਬਿੰਦ ਬੀਚਾਰਹੁ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਪਤਿਤ ਪਾਵਨ ਪ੍ਰਭ ਬਿਰਦੁ ਤੁਮੑਾਰੋ ਹਮਰੇ ਦੋਖ ਰਿਦੈ ਮਤ ਧਾਰਹੁ ॥
ਜੀਵਨ ਪ੍ਰਾਨ ਹਰਿ ਧਨੁ ਸੁਖੁ ਤੁਮ ਹੀ ਹਉਮੈ ਪਟਲੁ ਕ੍ਰਿਪਾ ਕਰਿ ਜਾਰਹੁ ॥੧॥
ਜਲ ਬਿਹੂਨ ਮੀਨ ਕਤ ਜੀਵਨ ਦੂਧ ਬਿਨਾ ਰਹਨੁ ਕਤ ਬਾਰੋ ॥
ਜਨ ਨਾਨਕ ਪਿਆਸ ਚਰਨ ਕਮਲਨੑ ਕੀ ਪੇਖਿ ਦਰਸੁ ਸੁਆਮੀ ਸੁਖ ਸਾਰੋ ॥੨॥੭॥੧੨੩॥
बिलावलु महला ५ ॥
अपने सेवक कउ कबहु न बिसारहु ॥
उरि लागहु सुआमी प्रभ मेरे पूरब प्रीति गोबिंद बीचारहु ॥१॥ रहाउ ॥
पतित पावन प्रभ बिरदु तुम॑ारो हमरे दोख रिदै मत धारहु ॥
जीवन प्रान हरि धनु सुखु तुम ही हउमै पटलु क्रिपा करि जारहु ॥१॥
जल बिहून मीन कत जीवन दूध बिना रहनु कत बारो ॥
जन नानक पिआस चरन कमलन॑ की पेखि दरसु सुआमी सुख सारो ॥२॥७॥१२३॥
अपने सेवक कउ कबहु न बिसारहु ॥
उरि लागहु सुआमी प्रभ मेरे पूरब प्रीति गोबिंद बीचारहु ॥१॥ रहाउ ॥
पतित पावन प्रभ बिरदु तुम॑ारो हमरे दोख रिदै मत धारहु ॥
जीवन प्रान हरि धनु सुखु तुम ही हउमै पटलु क्रिपा करि जारहु ॥१॥
जल बिहून मीन कत जीवन दूध बिना रहनु कत बारो ॥
जन नानक पिआस चरन कमलन॑ की पेखि दरसु सुआमी सुख सारो ॥२॥७॥१२३॥
हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला ५ ॥ हे मेरे मालिक प्रभू ! (मुझे) अपने सेवक को कभी ना भुलाना। मेरे हृदय में बसे रहो। हे मेरे गोबिंद ! मेरी पिछली प्रीति को याद रखो। 1। रहाउ। हे प्रभू ! तेरा मूल कदीमी बिरद भरा स्वभाव है कि तू विकारों में गिरे हुओं को पवित्र कर देता है। हे प्रभू ! मेरे ऐब (भी) अपने हृदय में ना रखना। हे हरी ! तू ही मेरी जिंद जान है। तू ही मेरा धन है। तू ही मेरा सुख है। मेहर करके (मेरे अंदर से) अहंकार का पर्दा जला दे। 1। हे मेरे मालिक-प्रभू ! पानी के बिना मछली कभी जीवित नहीं रह सकती। दूध के बिना बच्चा नहीं रह सकता। (वैसे ही तेरे) दास नानक को तेरे सुंदर चरणों के दर्शनों की प्यास है। दर्शन करके (तेरे सेवक को) सारे ही सुख प्राप्त हो जाते हैं। 2। 7। 123।
ਬਿਲਾਵਲੁ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਆਗੈ ਪਾਛੈ ਕੁਸਲੁ ਭਇਆ ॥
ਗੁਰਿ ਪੂਰੈ ਪੂਰੀ ਸਭ ਰਾਖੀ ਪਾਰਬ੍ਰਹਮਿ ਪ੍ਰਭਿ ਕੀਨੀ ਮਇਆ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਮਨਿ ਤਨਿ ਰਵਿ ਰਹਿਆ ਹਰਿ ਪ੍ਰੀਤਮੁ ਦੂਖ ਦਰਦ ਸਗਲਾ ਮਿਟਿ ਗਇਆ ॥
ਸਾਂਤਿ ਸਹਜ ਆਨਦ ਗੁਣ ਗਾਏ ਦੂਤ ਦੁਸਟ ਸਭਿ ਹੋਏ ਖਇਆ ॥੧॥
ਗੁਨੁ ਅਵਗੁਨੁ ਪ੍ਰਭਿ ਕਛੁ ਨ ਬੀਚਾਰਿਓ ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਅਪੁਨਾ ਕਰਿ ਲਇਆ ॥
ਅਤੁਲ ਬਡਾਈ ਅਚੁਤ ਅਬਿਨਾਸੀ ਨਾਨਕੁ ਉਚਰੈ ਹਰਿ ਕੀ ਜਇਆ ॥੨॥੮॥੧੨੪॥
ਆਗੈ ਪਾਛੈ ਕੁਸਲੁ ਭਇਆ ॥
ਗੁਰਿ ਪੂਰੈ ਪੂਰੀ ਸਭ ਰਾਖੀ ਪਾਰਬ੍ਰਹਮਿ ਪ੍ਰਭਿ ਕੀਨੀ ਮਇਆ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਮਨਿ ਤਨਿ ਰਵਿ ਰਹਿਆ ਹਰਿ ਪ੍ਰੀਤਮੁ ਦੂਖ ਦਰਦ ਸਗਲਾ ਮਿਟਿ ਗਇਆ ॥
ਸਾਂਤਿ ਸਹਜ ਆਨਦ ਗੁਣ ਗਾਏ ਦੂਤ ਦੁਸਟ ਸਭਿ ਹੋਏ ਖਇਆ ॥੧॥
ਗੁਨੁ ਅਵਗੁਨੁ ਪ੍ਰਭਿ ਕਛੁ ਨ ਬੀਚਾਰਿਓ ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਅਪੁਨਾ ਕਰਿ ਲਇਆ ॥
ਅਤੁਲ ਬਡਾਈ ਅਚੁਤ ਅਬਿਨਾਸੀ ਨਾਨਕੁ ਉਚਰੈ ਹਰਿ ਕੀ ਜਇਆ ॥੨॥੮॥੧੨੪॥
बिलावलु महला ५ ॥
आगै पाछै कुसलु भइआ ॥
गुरि पूरै पूरी सभ राखी पारब्रहमि प्रभि कीनी मइआ ॥१॥ रहाउ ॥
मनि तनि रवि रहिआ हरि प्रीतमु दूख दरद सगला मिटि गइआ ॥
सांति सहज आनद गुण गाए दूत दुसट सभि होए खइआ ॥१॥
गुनु अवगुनु प्रभि कछु न बीचारिओ करि किरपा अपुना करि लइआ ॥
अतुल बडाई अचुत अबिनासी नानकु उचरै हरि की जइआ ॥२॥८॥१२४॥
आगै पाछै कुसलु भइआ ॥
गुरि पूरै पूरी सभ राखी पारब्रहमि प्रभि कीनी मइआ ॥१॥ रहाउ ॥
मनि तनि रवि रहिआ हरि प्रीतमु दूख दरद सगला मिटि गइआ ॥
सांति सहज आनद गुण गाए दूत दुसट सभि होए खइआ ॥१॥
गुनु अवगुनु प्रभि कछु न बीचारिओ करि किरपा अपुना करि लइआ ॥
अतुल बडाई अचुत अबिनासी नानकु उचरै हरि की जइआ ॥२॥८॥१२४॥
हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला ५ ॥ उस मनुष्य के लिए इस लोक में और परलोक में सुख बना रहता है। हे भाई ! जिस मनुष्य पर पारब्रहम ने प्रभू ने मेहर कर दी। (दूत-दुष्ट के मुकाबले में) पूरे गुरू ने (जिस मनुष्य की) इज्जत अच्छी तरह बचा ली।1। रहाउ। (हे भाई ! जिस मनुष्य की इज्जत पूरा गुरू बचाता है। उसके) मन में हृदय में प्रीतम हरी। हर वक्त बसा रहता है। उसके सारे दुख-दर्द मिट जाते हैं। वह (हर वक्त प्रभू के) गुण गाता रहता है (जिसकी बरकति से उसके अंदर) शांति और अडोलता के आनंद बने रहते हैं। (कामादिक) सारे (उसके) दोखी वैरी नाश हो जाते हैं। 1। (हे भाई ! पूरा गुरू जिस मनुष्य की इज्जत बचाता है) परमात्मा उसका कोई गुण-अवगुण नहीं पड़तालता। मेहर करके उसको प्रभू अपना (सेवक) बना लेता है। हे भाई ! अटॅल और अविनाशी परमात्मा की ताकत बेमिसाल है। नानक सदा उसी प्रभू की जै-जैकार उचारता रहता है। 2। 8। 128।
ਬਿਲਾਵਲੁ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਬਿਨੁ ਭੈ ਭਗਤੀ ਤਰਨੁ ਕੈਸੇ ॥
ਕਰਹੁ ਅਨੁਗ੍ਰਹੁ ਪਤਿਤ ਉਧਾਰਨ ਰਾਖੁ ਸੁਆਮੀ ਆਪ ਭਰੋਸੇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਸਿਮਰਨੁ ਨਹੀ ਆਵਤ ਫਿਰਤ ਮਦ ਮਾਵਤ ਬਿਖਿਆ ਰਾਤਾ ਸੁਆਨ ਜੈਸੇ ॥
ਅਉਧ ਬਿਹਾਵਤ ਅਧਿਕ ਮੋਹਾਵਤ ਪਾਪ ਕਮਾਵਤ ਬੁਡੇ ਐਸੇ ॥੧॥
ਸਰਨਿ ਦੁਖ ਭੰਜਨ ਪੁਰਖ ਨਿਰੰਜਨ ਸਾਧੂ ਸੰਗਤਿ ਰਵਣੁ ਜੈਸੇ ॥
ਕੇਸਵ ਕਲੇਸ ਨਾਸ ਅਘ ਖੰਡਨ ਨਾਨਕ ਜੀਵਤ ਦਰਸ ਦਿਸੇ ॥੨॥੯॥੧੨੫॥
ਬਿਨੁ ਭੈ ਭਗਤੀ ਤਰਨੁ ਕੈਸੇ ॥
ਕਰਹੁ ਅਨੁਗ੍ਰਹੁ ਪਤਿਤ ਉਧਾਰਨ ਰਾਖੁ ਸੁਆਮੀ ਆਪ ਭਰੋਸੇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਸਿਮਰਨੁ ਨਹੀ ਆਵਤ ਫਿਰਤ ਮਦ ਮਾਵਤ ਬਿਖਿਆ ਰਾਤਾ ਸੁਆਨ ਜੈਸੇ ॥
ਅਉਧ ਬਿਹਾਵਤ ਅਧਿਕ ਮੋਹਾਵਤ ਪਾਪ ਕਮਾਵਤ ਬੁਡੇ ਐਸੇ ॥੧॥
ਸਰਨਿ ਦੁਖ ਭੰਜਨ ਪੁਰਖ ਨਿਰੰਜਨ ਸਾਧੂ ਸੰਗਤਿ ਰਵਣੁ ਜੈਸੇ ॥
ਕੇਸਵ ਕਲੇਸ ਨਾਸ ਅਘ ਖੰਡਨ ਨਾਨਕ ਜੀਵਤ ਦਰਸ ਦਿਸੇ ॥੨॥੯॥੧੨੫॥
बिलावलु महला ५ ॥
बिनु भै भगती तरनु कैसे ॥
करहु अनुग्रहु पतित उधारन राखु सुआमी आप भरोसे ॥१॥ रहाउ ॥
सिमरनु नही आवत फिरत मद मावत बिखिआ राता सुआन जैसे ॥
अउध बिहावत अधिक मोहावत पाप कमावत बुडे ऐसे ॥१॥
सरनि दुख भंजन पुरख निरंजन साधू संगति रवणु जैसे ॥
केसव कलेस नास अघ खंडन नानक जीवत दरस दिसे ॥२॥९॥१२५॥
बिनु भै भगती तरनु कैसे ॥
करहु अनुग्रहु पतित उधारन राखु सुआमी आप भरोसे ॥१॥ रहाउ ॥
सिमरनु नही आवत फिरत मद मावत बिखिआ राता सुआन जैसे ॥
अउध बिहावत अधिक मोहावत पाप कमावत बुडे ऐसे ॥१॥
सरनि दुख भंजन पुरख निरंजन साधू संगति रवणु जैसे ॥
केसव कलेस नास अघ खंडन नानक जीवत दरस दिसे ॥२॥९॥१२५॥
हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला ५ ॥ हे भाई ! परमात्मा का डर-अदब मन में बसाए बिना। भक्ति किए बिना संसार-समुंद्र से पार उतारा नहीं हो सकता। हे विकारियों को विकारों से बचाने वाले स्वामी ! (मेरे पर) मेहर कर। मुझे (इन विकारों से) बचाए रख। मैं तेरे ही आसरे हूँ। 1। रहाउ। (हे प्रभू ! तेरी मेहर के बिना जीव को तेरा) सिमरन करने की जाच नहीं आती। माया के नशे में मस्त भटकता है। माया (के रंग) में रंगा हुआ जीव इस तरह फिरता है जैसे (पागल हुआ) कुक्ता। हे प्रभू ! ज्यों-ज्यों उम्र बीतती है। जीव (विकारों के हाथों से) बहुत ज्यादा लूटे जाते हैं। बस ! यूँ ही पाप करते-करते संसार-समुंद्र में डूबते जाते हैं। 1। हे नानक ! (कह-) हे दुखों के नाश करने वाले ! हे सर्व-व्यापक ! हे माया के प्रभाव से परे रहने वाले ! (मेहर कर। ता कि) जैसे भी हो सके (तेरा दास) साध-संगति में (टिक के तेरा) सिमरन करता रहे। हे केशव ! हे कलेशों का नाश करने वाले ! हे पापों का नाश करने वाले ! (तेरा दास) नानक तेरे दर्शन करके ही आत्मिक जीवन हासिल करता है। 2। 9। 125।
ਰਾਗੁ ਬਿਲਾਵਲੁ ਮਹਲਾ ੫ ਦੁਪਦੇ ਘਰੁ ੯
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ਆਪਹਿ ਮੇਲਿ ਲਏ ॥
ਜਬ ਤੇ ਸਰਨਿ ਤੁਮਾਰੀ ਆਏ ਤਬ ਤੇ ਦੋਖ ਗਏ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਤਜਿ ਅਭਿਮਾਨੁ ਅਰੁ ਚਿੰਤ ਬਿਰਾਨੀ ਸਾਧਹ ਸਰਨ ਪਏ ॥
ਜਪਿ ਜਪਿ ਨਾਮੁ ਤੁਮੑਾਰੋ ਪ੍ਰੀਤਮ ਤਨ ਤੇ ਰੋਗ ਖਏ ॥੧॥
ਮਹਾ ਮੁਗਧ ਅਜਾਨ ਅਗਿਆਨੀ ਰਾਖੇ ਧਾਰਿ ਦਏ ॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਗੁਰੁ ਪੂਰਾ ਭੇਟਿਓ ਆਵਨ ਜਾਨ ਰਹੇ ॥੨॥੧॥੧੨੬॥
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ਆਪਹਿ ਮੇਲਿ ਲਏ ॥
ਜਬ ਤੇ ਸਰਨਿ ਤੁਮਾਰੀ ਆਏ ਤਬ ਤੇ ਦੋਖ ਗਏ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਤਜਿ ਅਭਿਮਾਨੁ ਅਰੁ ਚਿੰਤ ਬਿਰਾਨੀ ਸਾਧਹ ਸਰਨ ਪਏ ॥
ਜਪਿ ਜਪਿ ਨਾਮੁ ਤੁਮੑਾਰੋ ਪ੍ਰੀਤਮ ਤਨ ਤੇ ਰੋਗ ਖਏ ॥੧॥
ਮਹਾ ਮੁਗਧ ਅਜਾਨ ਅਗਿਆਨੀ ਰਾਖੇ ਧਾਰਿ ਦਏ ॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਗੁਰੁ ਪੂਰਾ ਭੇਟਿਓ ਆਵਨ ਜਾਨ ਰਹੇ ॥੨॥੧॥੧੨੬॥
रागु बिलावलु महला ५ दुपदे घरु ९
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
आपहि मेलि लए ॥
जब ते सरनि तुमारी आए तब ते दोख गए ॥१॥ रहाउ ॥
तजि अभिमानु अरु चिंत बिरानी साधह सरन पए ॥
जपि जपि नामु तुम॑ारो प्रीतम तन ते रोग खए ॥१॥
महा मुगध अजान अगिआनी राखे धारि दए ॥
कहु नानक गुरु पूरा भेटिओ आवन जान रहे ॥२॥१॥१२६॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
आपहि मेलि लए ॥
जब ते सरनि तुमारी आए तब ते दोख गए ॥१॥ रहाउ ॥
तजि अभिमानु अरु चिंत बिरानी साधह सरन पए ॥
जपि जपि नामु तुम॑ारो प्रीतम तन ते रोग खए ॥१॥
महा मुगध अजान अगिआनी राखे धारि दए ॥
कहु नानक गुरु पूरा भेटिओ आवन जान रहे ॥२॥१॥१२६॥
हिन्दी अर्थ: रागु बिलावलु महला ५ दुपदे घरु ९ ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ हे प्रभू ! तू स्वयं ही उनको अपने चरणों में मिला लेता है। जब से (जो मनुष्य) तेरी शरण आते हैं। तब से (उनके सारे) पाप दूर हो जाते हैं। 1। रहाउ। (हे प्रभू ! जिन्हें तू अपने चरणों में जोड़ता है। वह मनुष्य) अहंकार छोड़ के बेगानी आस का ख्याल छोड़ के संत जनों की शरण आ पड़ते हैं। और। हे प्रीतम ! सदा तेरा नाम जप-जप के उनके शरीर में से सारे रोग नाश हो जाते हैं। 1। (हे प्रभू ! जो मनुष्य तेरी कृपा से संत-जनों की शरण पड़ते हैं। उन) बड़े-बड़े मूर्खों अंजान व अज्ञानियों को भी तू दया करके (विकारों। रोगों से) बचा लेता है। हे नानक ! कह- (हे भाई ! जिन मनुष्यों को) पूरा गुरू मिल जाता है। (उनके) जनम-मरण के चक्कर समाप्त हो जाते हैं। 2। 1। 126।
ਬਿਲਾਵਲੁ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਜੀਵਉ ਨਾਮੁ ਸੁਨੀ ॥
ਜਉ ਸੁਪ੍ਰਸੰਨ ਭਏ ਗੁਰ ਪੂਰੇ ਤਬ ਮੇਰੀ ਆਸ ਪੁਨੀ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਪੀਰ ਗਈ ਬਾਧੀ ਮਨਿ ਧੀਰਾ ਮੋਹਿਓ ਅਨਦ ਧੁਨੀ ॥
ਉਪਜਿਓ ਚਾਉ ਮਿਲਨ ਪ੍ਰਭ ਪ੍ਰੀਤਮ ਰਹਨੁ ਨ ਜਾਇ ਖਿਨੀ ॥੧॥
ਜੀਵਉ ਨਾਮੁ ਸੁਨੀ ॥
ਜਉ ਸੁਪ੍ਰਸੰਨ ਭਏ ਗੁਰ ਪੂਰੇ ਤਬ ਮੇਰੀ ਆਸ ਪੁਨੀ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਪੀਰ ਗਈ ਬਾਧੀ ਮਨਿ ਧੀਰਾ ਮੋਹਿਓ ਅਨਦ ਧੁਨੀ ॥
ਉਪਜਿਓ ਚਾਉ ਮਿਲਨ ਪ੍ਰਭ ਪ੍ਰੀਤਮ ਰਹਨੁ ਨ ਜਾਇ ਖਿਨੀ ॥੧॥
बिलावलु महला ५ ॥
जीवउ नामु सुनी ॥
जउ सुप्रसंन भए गुर पूरे तब मेरी आस पुनी ॥१॥ रहाउ ॥
पीर गई बाधी मनि धीरा मोहिओ अनद धुनी ॥
उपजिओ चाउ मिलन प्रभ प्रीतम रहनु न जाइ खिनी ॥१॥
जीवउ नामु सुनी ॥
जउ सुप्रसंन भए गुर पूरे तब मेरी आस पुनी ॥१॥ रहाउ ॥
पीर गई बाधी मनि धीरा मोहिओ अनद धुनी ॥
उपजिओ चाउ मिलन प्रभ प्रीतम रहनु न जाइ खिनी ॥१॥
हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला ५ ॥ (हे भाई ! परमात्मा का) नाम सुन के मेरे अंदर आत्मिक जीवन पैदा हो जाता है (पर प्रभू का नाम सिमरने की) मेरी आशा तब पूरी होती है जब पूरा गुरू (मेरे ऊपर) बहुत प्रसन्न होता है। 1। रहाउ। (हे भाई ! गुरू की कृपा से जब मैं नाम जपता हूँ। मेरे अंदर से) पीड़ा दूर हो जाती है। मेरे में हौंसला बन जाता है। मैं (अपने अंदर पैदा हुए) आत्मिक आनंद की रौंअ से मस्त हो जाता हूँ। मेरे अंदर प्रीतम प्रभू को मिलने का चाव पैदा हो जाता है। (वह चाव इतना तीव्र हो जाता है कि प्रभू के मिलाप के बिना) एक छिन भी रहा नहीं जा सकता। 1।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 829 है, राग बिलावल का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।
M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।
दिल्ली के Sunday-morning के bhajan-मण्डली, घर में dadiji सुन रहीं।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 34 पंक्तियों का है, 5 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 829” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: बिलावल राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 830 →, पीछे का: ← अंग 828।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।