अंग
835
राग बिलावल
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਹਰਿ ਹਰਿ ਉਸਤਤਿ ਕਰੈ ਦਿਨੁ ਰਾਤੀ ਰਖਿ ਰਖਿ ਚਰਣ ਹਰਿ ਤਾਲ ਪੂਰਈਆ ॥੫॥
ਹਰਿ ਕੈ ਰੰਗਿ ਰਤਾ ਮਨੁ ਗਾਵੈ ਰਸਿ ਰਸਾਲ ਰਸਿ ਸਬਦੁ ਰਵਈਆ ॥
ਨਿਜ ਘਰਿ ਧਾਰ ਚੁਐ ਅਤਿ ਨਿਰਮਲ ਜਿਨਿ ਪੀਆ ਤਿਨ ਹੀ ਸੁਖੁ ਲਹੀਆ ॥੬॥
ਮਨਹਠਿ ਕਰਮ ਕਰੈ ਅਭਿਮਾਨੀ ਜਿਉ ਬਾਲਕ ਬਾਲੂ ਘਰ ਉਸਰਈਆ ॥
ਆਵੈ ਲਹਰਿ ਸਮੁੰਦ ਸਾਗਰ ਕੀ ਖਿਨ ਮਹਿ ਭਿੰਨ ਭਿੰਨ ਢਹਿ ਪਈਆ ॥੭॥
ਹਰਿ ਸਰੁ ਸਾਗਰੁ ਹਰਿ ਹੈ ਆਪੇ ਇਹੁ ਜਗੁ ਹੈ ਸਭੁ ਖੇਲੁ ਖੇਲਈਆ ॥
ਜਿਉ ਜਲ ਤਰੰਗ ਜਲੁ ਜਲਹਿ ਸਮਾਵਹਿ ਨਾਨਕ ਆਪੇ ਆਪਿ ਰਮਈਆ ॥੮॥੩॥੬॥
ਹਰਿ ਕੈ ਰੰਗਿ ਰਤਾ ਮਨੁ ਗਾਵੈ ਰਸਿ ਰਸਾਲ ਰਸਿ ਸਬਦੁ ਰਵਈਆ ॥
ਨਿਜ ਘਰਿ ਧਾਰ ਚੁਐ ਅਤਿ ਨਿਰਮਲ ਜਿਨਿ ਪੀਆ ਤਿਨ ਹੀ ਸੁਖੁ ਲਹੀਆ ॥੬॥
ਮਨਹਠਿ ਕਰਮ ਕਰੈ ਅਭਿਮਾਨੀ ਜਿਉ ਬਾਲਕ ਬਾਲੂ ਘਰ ਉਸਰਈਆ ॥
ਆਵੈ ਲਹਰਿ ਸਮੁੰਦ ਸਾਗਰ ਕੀ ਖਿਨ ਮਹਿ ਭਿੰਨ ਭਿੰਨ ਢਹਿ ਪਈਆ ॥੭॥
ਹਰਿ ਸਰੁ ਸਾਗਰੁ ਹਰਿ ਹੈ ਆਪੇ ਇਹੁ ਜਗੁ ਹੈ ਸਭੁ ਖੇਲੁ ਖੇਲਈਆ ॥
ਜਿਉ ਜਲ ਤਰੰਗ ਜਲੁ ਜਲਹਿ ਸਮਾਵਹਿ ਨਾਨਕ ਆਪੇ ਆਪਿ ਰਮਈਆ ॥੮॥੩॥੬॥
हरि हरि उसतति करै दिनु राती रखि रखि चरण हरि ताल पूरईआ ॥५॥
हरि कै रंगि रता मनु गावै रसि रसाल रसि सबदु रवईआ ॥
निज घरि धार चुऐ अति निरमल जिनि पीआ तिन ही सुखु लहीआ ॥६॥
मनहठि करम करै अभिमानी जिउ बालक बालू घर उसरईआ ॥
आवै लहरि समुंद सागर की खिन महि भिंन भिंन ढहि पईआ ॥७॥
हरि सरु सागरु हरि है आपे इहु जगु है सभु खेलु खेलईआ ॥
जिउ जल तरंग जलु जलहि समावहि नानक आपे आपि रमईआ ॥८॥३॥६॥
हरि कै रंगि रता मनु गावै रसि रसाल रसि सबदु रवईआ ॥
निज घरि धार चुऐ अति निरमल जिनि पीआ तिन ही सुखु लहीआ ॥६॥
मनहठि करम करै अभिमानी जिउ बालक बालू घर उसरईआ ॥
आवै लहरि समुंद सागर की खिन महि भिंन भिंन ढहि पईआ ॥७॥
हरि सरु सागरु हरि है आपे इहु जगु है सभु खेलु खेलईआ ॥
जिउ जल तरंग जलु जलहि समावहि नानक आपे आपि रमईआ ॥८॥३॥६॥
हिन्दी अर्थ: वह मनुष्य दिन रात हर वक्त परमात्मा की सिफत-सालाह करता रहता है। प्रभू के चरणों को हर वक्त (हृदय में) बसा के (वह मनुष्य के जीवन की चाल को) ताल में चलाए रखता है (बेताला नहीं होता)। 5। हे भाई ! प्रभू के (प्रेम-) रंग में रंगा हुआ (जिस मनुष्य का) मन (सिफत-सालाह के गीत) गाता रहता है। रसों के श्रोत प्रभू के प्यार में स्वाद से (जो मनुष्य) गुरू के शबद को जपता रहता है। उस मनुष्य के हृदय में (आत्मिक जीवन देने वाले नाम-जल की) बड़ी ही पवित्र धारा टपकती रहती है। जिस मनुष्य ने (यह नाम-जल) पीया उसने ही आत्मिक आनंद प्राप्त किया। 6। (जो मनुष्य अपने) मन के हठ से (मिथे हुए धार्मिक) कर्म करता रहता है। उसको (अपने धर्मी होने का) गुमान हो जाता है। (उसके ये उद्यम फिर यूँ ही हैं) जैसे बच्चे रेत के घर उसारते हैं। समुंद्र के पानी की लहर आती है। और वे घर एक पल में तिनका-तिनका हो के ढह जाते हैं। 7। हे भाई ! ये सारा जगत (परमात्मा ने) एक तमाशा रचा हुआ है। वह स्वयं ही (जीवन का) सरावर है। समुंद्र है (सारे जीव उस समुंद्र की लहरें हैं)। हे नानक ! जैसे (समुंद्र के) पानी की लहरें (समुंद्र का) पानी (ही हैं) पानी में ही मिल जाती हैं (इस तरह) वह सुंदर राम (हर जगह) स्वयं ही स्वयं है। 8। 3।
ਬਿਲਾਵਲੁ ਮਹਲਾ ੪ ॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਪਰਚੈ ਮਨਿ ਮੁੰਦ੍ਰਾ ਪਾਈ ਗੁਰ ਕਾ ਸਬਦੁ ਤਨਿ ਭਸਮ ਦ੍ਰਿੜਈਆ ॥
ਅਮਰ ਪਿੰਡ ਭਏ ਸਾਧੂ ਸੰਗਿ ਜਨਮ ਮਰਣ ਦੋਊ ਮਿਟਿ ਗਈਆ ॥੧॥
ਮੇਰੇ ਮਨ ਸਾਧਸੰਗਤਿ ਮਿਲਿ ਰਹੀਆ ॥
ਕ੍ਰਿਪਾ ਕਰਹੁ ਮਧਸੂਦਨ ਮਾਧਉ ਮੈ ਖਿਨੁ ਖਿਨੁ ਸਾਧੂ ਚਰਣ ਪਖਈਆ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਤਜੈ ਗਿਰਸਤੁ ਭਇਆ ਬਨ ਵਾਸੀ ਇਕੁ ਖਿਨੁ ਮਨੂਆ ਟਿਕੈ ਨ ਟਿਕਈਆ ॥
ਧਾਵਤੁ ਧਾਇ ਤਦੇ ਘਰਿ ਆਵੈ ਹਰਿ ਹਰਿ ਸਾਧੂ ਸਰਣਿ ਪਵਈਆ ॥੨॥
ਧੀਆ ਪੂਤ ਛੋਡਿ ਸੰਨਿਆਸੀ ਆਸਾ ਆਸ ਮਨਿ ਬਹੁਤੁ ਕਰਈਆ ॥
ਆਸਾ ਆਸ ਕਰੈ ਨਹੀ ਬੂਝੈ ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦਿ ਨਿਰਾਸ ਸੁਖੁ ਲਹੀਆ ॥੩॥
ਉਪਜੀ ਤਰਕ ਦਿਗੰਬਰੁ ਹੋਆ ਮਨੁ ਦਹ ਦਿਸ ਚਲਿ ਚਲਿ ਗਵਨੁ ਕਰਈਆ ॥
ਪ੍ਰਭਵਨੁ ਕਰੈ ਬੂਝੈ ਨਹੀ ਤ੍ਰਿਸਨਾ ਮਿਲਿ ਸੰਗਿ ਸਾਧ ਦਇਆ ਘਰੁ ਲਹੀਆ ॥੪॥
ਆਸਣ ਸਿਧ ਸਿਖਹਿ ਬਹੁਤੇਰੇ ਮਨਿ ਮਾਗਹਿ ਰਿਧਿ ਸਿਧਿ ਚੇਟਕ ਚੇਟਕਈਆ ॥
ਤ੍ਰਿਪਤਿ ਸੰਤੋਖੁ ਮਨਿ ਸਾਂਤਿ ਨ ਆਵੈ ਮਿਲਿ ਸਾਧੂ ਤ੍ਰਿਪਤਿ ਹਰਿ ਨਾਮਿ ਸਿਧਿ ਪਈਆ ॥੫॥
ਅੰਡਜ ਜੇਰਜ ਸੇਤਜ ਉਤਭੁਜ ਸਭਿ ਵਰਨ ਰੂਪ ਜੀਅ ਜੰਤ ਉਪਈਆ ॥
ਸਾਧੂ ਸਰਣਿ ਪਰੈ ਸੋ ਉਬਰੈ ਖਤ੍ਰੀ ਬ੍ਰਾਹਮਣੁ ਸੂਦੁ ਵੈਸੁ ਚੰਡਾਲੁ ਚੰਡਈਆ ॥੬॥
ਨਾਮਾ ਜੈਦੇਉ ਕੰਬੀਰੁ ਤ੍ਰਿਲੋਚਨੁ ਅਉਜਾਤਿ ਰਵਿਦਾਸੁ ਚਮਿਆਰੁ ਚਮਈਆ ॥
ਜੋ ਜੋ ਮਿਲੈ ਸਾਧੂ ਜਨ ਸੰਗਤਿ ਧਨੁ ਧੰਨਾ ਜਟੁ ਸੈਣੁ ਮਿਲਿਆ ਹਰਿ ਦਈਆ ॥੭॥
ਸੰਤ ਜਨਾ ਕੀ ਹਰਿ ਪੈਜ ਰਖਾਈ ਭਗਤਿ ਵਛਲੁ ਅੰਗੀਕਾਰੁ ਕਰਈਆ ॥
ਨਾਨਕ ਸਰਣਿ ਪਰੇ ਜਗਜੀਵਨ ਹਰਿ ਹਰਿ ਕਿਰਪਾ ਧਾਰਿ ਰਖਈਆ ॥੮॥੪॥੭॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਪਰਚੈ ਮਨਿ ਮੁੰਦ੍ਰਾ ਪਾਈ ਗੁਰ ਕਾ ਸਬਦੁ ਤਨਿ ਭਸਮ ਦ੍ਰਿੜਈਆ ॥
ਅਮਰ ਪਿੰਡ ਭਏ ਸਾਧੂ ਸੰਗਿ ਜਨਮ ਮਰਣ ਦੋਊ ਮਿਟਿ ਗਈਆ ॥੧॥
ਮੇਰੇ ਮਨ ਸਾਧਸੰਗਤਿ ਮਿਲਿ ਰਹੀਆ ॥
ਕ੍ਰਿਪਾ ਕਰਹੁ ਮਧਸੂਦਨ ਮਾਧਉ ਮੈ ਖਿਨੁ ਖਿਨੁ ਸਾਧੂ ਚਰਣ ਪਖਈਆ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਤਜੈ ਗਿਰਸਤੁ ਭਇਆ ਬਨ ਵਾਸੀ ਇਕੁ ਖਿਨੁ ਮਨੂਆ ਟਿਕੈ ਨ ਟਿਕਈਆ ॥
ਧਾਵਤੁ ਧਾਇ ਤਦੇ ਘਰਿ ਆਵੈ ਹਰਿ ਹਰਿ ਸਾਧੂ ਸਰਣਿ ਪਵਈਆ ॥੨॥
ਧੀਆ ਪੂਤ ਛੋਡਿ ਸੰਨਿਆਸੀ ਆਸਾ ਆਸ ਮਨਿ ਬਹੁਤੁ ਕਰਈਆ ॥
ਆਸਾ ਆਸ ਕਰੈ ਨਹੀ ਬੂਝੈ ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦਿ ਨਿਰਾਸ ਸੁਖੁ ਲਹੀਆ ॥੩॥
ਉਪਜੀ ਤਰਕ ਦਿਗੰਬਰੁ ਹੋਆ ਮਨੁ ਦਹ ਦਿਸ ਚਲਿ ਚਲਿ ਗਵਨੁ ਕਰਈਆ ॥
ਪ੍ਰਭਵਨੁ ਕਰੈ ਬੂਝੈ ਨਹੀ ਤ੍ਰਿਸਨਾ ਮਿਲਿ ਸੰਗਿ ਸਾਧ ਦਇਆ ਘਰੁ ਲਹੀਆ ॥੪॥
ਆਸਣ ਸਿਧ ਸਿਖਹਿ ਬਹੁਤੇਰੇ ਮਨਿ ਮਾਗਹਿ ਰਿਧਿ ਸਿਧਿ ਚੇਟਕ ਚੇਟਕਈਆ ॥
ਤ੍ਰਿਪਤਿ ਸੰਤੋਖੁ ਮਨਿ ਸਾਂਤਿ ਨ ਆਵੈ ਮਿਲਿ ਸਾਧੂ ਤ੍ਰਿਪਤਿ ਹਰਿ ਨਾਮਿ ਸਿਧਿ ਪਈਆ ॥੫॥
ਅੰਡਜ ਜੇਰਜ ਸੇਤਜ ਉਤਭੁਜ ਸਭਿ ਵਰਨ ਰੂਪ ਜੀਅ ਜੰਤ ਉਪਈਆ ॥
ਸਾਧੂ ਸਰਣਿ ਪਰੈ ਸੋ ਉਬਰੈ ਖਤ੍ਰੀ ਬ੍ਰਾਹਮਣੁ ਸੂਦੁ ਵੈਸੁ ਚੰਡਾਲੁ ਚੰਡਈਆ ॥੬॥
ਨਾਮਾ ਜੈਦੇਉ ਕੰਬੀਰੁ ਤ੍ਰਿਲੋਚਨੁ ਅਉਜਾਤਿ ਰਵਿਦਾਸੁ ਚਮਿਆਰੁ ਚਮਈਆ ॥
ਜੋ ਜੋ ਮਿਲੈ ਸਾਧੂ ਜਨ ਸੰਗਤਿ ਧਨੁ ਧੰਨਾ ਜਟੁ ਸੈਣੁ ਮਿਲਿਆ ਹਰਿ ਦਈਆ ॥੭॥
ਸੰਤ ਜਨਾ ਕੀ ਹਰਿ ਪੈਜ ਰਖਾਈ ਭਗਤਿ ਵਛਲੁ ਅੰਗੀਕਾਰੁ ਕਰਈਆ ॥
ਨਾਨਕ ਸਰਣਿ ਪਰੇ ਜਗਜੀਵਨ ਹਰਿ ਹਰਿ ਕਿਰਪਾ ਧਾਰਿ ਰਖਈਆ ॥੮॥੪॥੭॥
बिलावलु महला ४ ॥
सतिगुरु परचै मनि मुंद्रा पाई गुर का सबदु तनि भसम द्रिड़ईआ ॥
अमर पिंड भए साधू संगि जनम मरण दोऊ मिटि गईआ ॥१॥
मेरे मन साधसंगति मिलि रहीआ ॥
क्रिपा करहु मधसूदन माधउ मै खिनु खिनु साधू चरण पखईआ ॥१॥ रहाउ ॥
तजै गिरसतु भइआ बन वासी इकु खिनु मनूआ टिकै न टिकईआ ॥
धावतु धाइ तदे घरि आवै हरि हरि साधू सरणि पवईआ ॥२॥
धीआ पूत छोडि संनिआसी आसा आस मनि बहुतु करईआ ॥
आसा आस करै नही बूझै गुर कै सबदि निरास सुखु लहीआ ॥३॥
उपजी तरक दिगंबरु होआ मनु दह दिस चलि चलि गवनु करईआ ॥
प्रभवनु करै बूझै नही त्रिसना मिलि संगि साध दइआ घरु लहीआ ॥४॥
आसण सिध सिखहि बहुतेरे मनि मागहि रिधि सिधि चेटक चेटकईआ ॥
त्रिपति संतोखु मनि सांति न आवै मिलि साधू त्रिपति हरि नामि सिधि पईआ ॥५॥
अंडज जेरज सेतज उतभुज सभि वरन रूप जीअ जंत उपईआ ॥
साधू सरणि परै सो उबरै खत्री ब्राहमणु सूदु वैसु चंडालु चंडईआ ॥६॥
नामा जैदेउ कंबीरु त्रिलोचनु अउजाति रविदासु चमिआरु चमईआ ॥
जो जो मिलै साधू जन संगति धनु धंना जटु सैणु मिलिआ हरि दईआ ॥७॥
संत जना की हरि पैज रखाई भगति वछलु अंगीकारु करईआ ॥
नानक सरणि परे जगजीवन हरि हरि किरपा धारि रखईआ ॥८॥४॥७॥
सतिगुरु परचै मनि मुंद्रा पाई गुर का सबदु तनि भसम द्रिड़ईआ ॥
अमर पिंड भए साधू संगि जनम मरण दोऊ मिटि गईआ ॥१॥
मेरे मन साधसंगति मिलि रहीआ ॥
क्रिपा करहु मधसूदन माधउ मै खिनु खिनु साधू चरण पखईआ ॥१॥ रहाउ ॥
तजै गिरसतु भइआ बन वासी इकु खिनु मनूआ टिकै न टिकईआ ॥
धावतु धाइ तदे घरि आवै हरि हरि साधू सरणि पवईआ ॥२॥
धीआ पूत छोडि संनिआसी आसा आस मनि बहुतु करईआ ॥
आसा आस करै नही बूझै गुर कै सबदि निरास सुखु लहीआ ॥३॥
उपजी तरक दिगंबरु होआ मनु दह दिस चलि चलि गवनु करईआ ॥
प्रभवनु करै बूझै नही त्रिसना मिलि संगि साध दइआ घरु लहीआ ॥४॥
आसण सिध सिखहि बहुतेरे मनि मागहि रिधि सिधि चेटक चेटकईआ ॥
त्रिपति संतोखु मनि सांति न आवै मिलि साधू त्रिपति हरि नामि सिधि पईआ ॥५॥
अंडज जेरज सेतज उतभुज सभि वरन रूप जीअ जंत उपईआ ॥
साधू सरणि परै सो उबरै खत्री ब्राहमणु सूदु वैसु चंडालु चंडईआ ॥६॥
नामा जैदेउ कंबीरु त्रिलोचनु अउजाति रविदासु चमिआरु चमईआ ॥
जो जो मिलै साधू जन संगति धनु धंना जटु सैणु मिलिआ हरि दईआ ॥७॥
संत जना की हरि पैज रखाई भगति वछलु अंगीकारु करईआ ॥
नानक सरणि परे जगजीवन हरि हरि किरपा धारि रखईआ ॥८॥४॥७॥
हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला ४ ॥ हे भाई ! (जिन मनुष्यों पर) गुरू प्रसन्न हो जाता है (गुरू की यह प्रसन्नता उनके अपने) मन में (जोगियों वाली) मुंद्रे डाली हुई है। गुरू का शबद (जो उन्होंने अपने हृदय में) दृढ़ करके बसाया हुआ है (ये उन्होंने अपने) शरीर पर (जैसे) राख मली हुई है। (इस तरह) गुरू की संगति में रह के वे जनम-मरण के चक्कर से बच गए हैं। उनके जनम और मौत दोनों ही समाप्त हो गए हैं। 1। हे मेरे मन ! गुरू की संगति में मिल के रहना चाहिए (और आरजू करते रहना चाहिए कि) हे मधुसूदन ! हे माधव ! (मेरे पर) मेहर कर। मैं हर वक्त गुरू के चरण धोता रहूँ (हर वक्त गुरू की शरण पड़ा रहूँ)। 1। रहाउ। पर। हे भाई ! (जो मनुष्य) गृहस्त छोड़ जाता है और जंगल का वासी बनता है (इस तरह उसका) मन (तो) टिकाएं तो भी एक छिन-पल के लिए भी नहीं टिकता। हे भाई ! ये भटकता मन भटक-भटक के तब ही ठहराव में आता है। जब मनुष्य परमात्मा की गुरू की शरण पड़ता है। 2। हे भाई ! (जो मनुष्य) पुत्री-पुत्रों (परिवार) को छोड़ के सन्यासी जा बनता है (वह तो फिर भी अपने) मन में अनेकों आशाएं बनाता रहता है। नित्य आशाएं बुनता है (इस तरह सही आत्मिक जीवन को) नहीं समझता। पर। हाँ ! गुरू के शबद के द्वारा दुनियाँ की आशाओं से ऊपर उठ कर मनुष्य आत्मिक आनंद भोग सकता है। 3। हे भाई ! (कोई मनुष्य ऐसा है जिसके मन में दुनिया के प्रति) नफरत पैदा होती है। वह नांगा साधू बन जाता है। (फिर भी उसका) मन दसों दिशाओं में दौड़-दौड़ के भटकता फिरता है। (वह मनुष्य धरती पर) रटन करता फिरता है। (उसकी माया की) तृष्णा (फिर भी) नहीं मिटती। हाँ। गुरू की संगति में मिल के मनुष्य दया के श्रोत परमात्मा को पा लेता है। 4। हे भाई ! (जो साधनों में) पहॅुंचे हुए जोगी अनेकों आसन सीखते हैं (शीर्ष आसन। पदम् आसन आदि)। पर वह भी अपने मन में करामाती ताकतों व नाटक-चेटक (करामाती प्रदर्शन) ही माँगते रहते हैं (जिससे वे आम जनता पर अपना प्रभाव डाल सकें)। (उनके) मन में माया की ओर से तृप्ति नहीं होती। उन्हें संतोष नहीं प्राप्त होता। मन में शांति नहीं आती। हाँ। गुरू को मिल के परमात्मा के नाम से मनुष्य तृप्ति हासिल कर लेता है। आत्मिक जीवन की सफलता प्राप्त कर लेता है। 5। हे भाई ! अण्डों में से पैदा होने वाले। जियोर में से पैदा होने वाले। पसीने में से पैदा होने वाले। धरती में से फूटने वाले- ये सारे अनेकों रूप-रंगों के जीव-जंतु परमात्मा के पैदा किए हुए हैं। (इनमें से जो जीव) गुरू की शरण आ पड़ता है। वह (संसार-समुंद्र में से) बच निकलता है। चाहे वह खत्री है चाहे ब्राहमण है। चाहे शूद्र है। चाहे वैश्य है। चाहे महा चण्डाल है। 6। हे भाई ! नामदेव। जैदेव। कबीर। त्रिलोचन। नीच जाति वाला रविदास। धन्ना जाट। सैण (नाई) – जो जो भी संत जनों की संगति में मिलता आया है। वह भाग्यशाली बन गया। वह दया के श्रोत परमात्मा को मिल गया। 7। हे नानक ! (कह- हे भाई !) परमात्मा भगती से प्यार करने वाला है। अपने संतजनों की सदा लाज रखता आया है। संत जनों का पक्ष करता आया है। जो मनुष्य जगत के जीवन प्रभू की शरण पड़ते हैं। मेहर करके (प्रभू) उनकी रक्षा करता है। 8। 4।
ਬਿਲਾਵਲੁ ਮਹਲਾ ੪ ॥
ਅੰਤਰਿ ਪਿਆਸ ਉਠੀ ਪ੍ਰਭ ਕੇਰੀ ਸੁਣਿ ਗੁਰ ਬਚਨ ਮਨਿ ਤੀਰ ਲਗਈਆ ॥
ਅੰਤਰਿ ਪਿਆਸ ਉਠੀ ਪ੍ਰਭ ਕੇਰੀ ਸੁਣਿ ਗੁਰ ਬਚਨ ਮਨਿ ਤੀਰ ਲਗਈਆ ॥
बिलावलु महला ४ ॥
अंतरि पिआस उठी प्रभ केरी सुणि गुर बचन मनि तीर लगईआ ॥
अंतरि पिआस उठी प्रभ केरी सुणि गुर बचन मनि तीर लगईआ ॥
हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला ४ ॥ हे भाई ! गुरू के बचन सुन के (ऐसे हुआ है जैसे मेरे) मन में (बिरह के) तीर लग गए हैं। मेरे अंदर प्रभू के दर्शन की तमन्ना पैदा हो गई है।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 835 है, राग बिलावल का हिस्सा। मुख्य रचयिता: Guru Raam Daas Ji।
Karwa Chauth की रात, चाँद का इंतज़ार, और बीच में हाथों की मेहंदी।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 28 पंक्तियों का है, 3 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 835” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: बिलावल राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 836 →, पीछे का: ← अंग 834।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।