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अंग 828

अंग
828
राग बिलावल
राग: बिलावल · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
तुम॑ समरथा कारन करन ॥
ढाकन ढाकि गोबिद गुर मेरे मोहि अपराधी सरन चरन ॥1॥ रहाउ ॥
जो जो कीनो सो तुम॑ जानिओ पेखिओ ठउर नाही कछु ढीठ मुकरन ॥
बड परतापु सुनिओ प्रभ तुम॑रो कोटि अघा तेरो नाम हरन ॥1॥
हमरो सहाउ सदा सद भूलन तुम॑रो बिरदु पतित उधरन ॥
करुणा मै किरपाल क्रिपा निधि जीवन पद नानक हरि दरसन ॥2॥2॥118॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: आप सब ताकतों का मालिक है। आप जगत का रचनहार है। हे मेरे गोबिंद ! हे मेरे सबसे बड़े (मालिक) ! मेरा पर्दा ढक ले। मैं पापी आपके चरणों में (आपकी) शरण आया हूँ। 1। रहाउ। जो कुछ मैं नित्य करता रहता हूँ। हे प्रभू ! वह आप सब कुछ जानता है और देखता है। (इन करतूतों से) मुझ ढीठ के मुकरने की कोई गुंजायश नहीं। (फिर भी मैं किए भी जाता हूँ। और छुपाता भी हूँ)। हे प्रभू ! मैंने सुना है कि आप बहुत बड़ी समर्था वाला है। आपका नाम करोड़ों पाप दूर कर सकता है (मुझे भी अपना नाम बख्श)। 1। हे प्रभू ! हम जीवों का सवभाव ही है नित्य भूलें करते रहना। आपका मूल कदीमी स्वभाव (बिरद) है विकारियों को विकार से बचाना। हे तरस के श्रोत (करुणामय) ! हे कृपालु ! हे कृपा निधि (खजाने) ! नानक को अपने दर्शन दे। आपके दर्शन उच्च आत्मिक जीवन का दर्जा बख्शने वाले हैं। 2। 2। 118।
बिलावलु महला 5 ॥
ऐसी किरपा मोहि करहु ॥
संतह चरण हमारो माथा नैन दरसु तनि धूरि परहु ॥1॥ रहाउ ॥
गुर को सबदु मेरै हीअरै बासै हरि नामा मन संगि धरहु ॥
तसकर पंच निवारहु ठाकुर सगलो भरमा होमि जरहु ॥1॥
जो तुम॑ करहु सोई भल मानै भावनु दुबिधा दूरि टरहु ॥
नानक के प्रभ तुम ही दाते संतसंगि ले मोहि उधरहु ॥2॥3॥119॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला 5 ॥ हे प्रभू ! मेरे पर मेहर कर कि संतों के चरणों पर मेरा माथा (सिर) पड़ा रहे। मेरी आँखों में संत जनों के दर्शन टिके रहें। मेरे शरीर पर संतों के चरणों की धूड़ पड़ी रहे। 1। रहाउ। (हे प्रभू ! मेरे पर यह मेहर करो-) गुरू का शबद मेरे हृदय में (सदा) बसता रहे। हे हरी ! अपना नाम मेरे मन में टिकाए रख। हे ठाकुर ! (मेरे अंदर से कामादिक) पाँचों चोर निकाल दे। मेरी सारी भटकना आग में जला दे। 1। (हे प्रभू मेरे ऊपर यह मेहर कर-) जो कुछ आप करता है। उसी को (मेरा मन) ठीक मान ले। (हे प्रभू ! मेरे अंदर से) भेद-भाव भरी तेर-मेर निकाल दे। हे प्रभू ! आप ही नानक को सब दातें देने वाला है। (नानक की यह आरजू है कि) संतों की संगति में रख के मुझे (नानक को कामादिक तस्करों से) बचा ले। 2। 3। 119।
बिलावलु महला 5 ॥
ऐसी दीखिआ जन सिउ मंगा ॥
तुम॑रो धिआनु तुम॑ारो रंगा ॥
तुम॑री सेवा तुम॑ारे अंगा ॥1॥ रहाउ ॥
जन की टहल संभाखनु जन सिउ ऊठनु बैठनु जन कै संगा ॥
जन चर रज मुखि माथै लागी आसा पूरन अनंत तरंगा ॥1॥
जन पारब्रहम जा की निरमल महिमा जन के चरन तीरथ कोटि गंगा ॥
जन की धूरि कीओ मजनु नानक जनम जनम के हरे कलंगा ॥2॥4॥120॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला 5 ॥ (हे प्रभू ! आपके) सेवकों से मैं ये शिक्षा मांगता हूँ कि आपके ही चरणों का ध्यान। आपका ही प्रेम (मेरे अंदर बना रहे) आपकी ही सेवा भक्ति करता रहूँ। आपके ही चरणों से जुड़ा रहूँ। 1। रहाउ। (हे प्रभू ! आपके सेवकों से मैं यह दान माँगता हूँ कि आपके) सेवकों की मैं टहल करता रहूँ। आपके सेवकों के साथ ही मेरा बोल-चाल रहे। मेरा मेल-जोल भी आपके ही सेवकों के साथ रहे। आपके सेवकों की धूड़ मेरे मुँह माथे पर लगती रहे- ये चरण-धूड़ (माया की) अनेकों लहरें पैदा करने वाली आशाओं को शांत कर देती है। 1। हे नानक ! परमात्मा के सेवक ऐसे है कि उनकी शोभा दाग़हीन होती है। सेवकों के चरण। गंगा आदि करोड़ों तीर्थों के तुल्य हैं। जिस मनुष्य ने प्रभू के सेवकों की चरण-धूड़ में स्नान कर लिया। उसके अनेकों जन्मों के (किए हुए) पाप दूर हो जाते हैं। 2। 4। 120।
बिलावलु महला 5 ॥
जिउ भावै तिउ मोहि प्रतिपाल ॥
पारब्रहम परमेसर सतिगुर हम बारिक तुम॑ पिता किरपाल ॥1॥ रहाउ ॥
मोहि निरगुण गुणु नाही कोई पहुचि न साकउ तुम॑री घाल ॥
तुमरी गति मिति तुम ही जानहु जीउ पिंडु सभु तुमरो माल ॥1॥
अंतरजामी पुरख सुआमी अनबोलत ही जानहु हाल ॥
तनु मनु सीतलु होइ हमारो नानक प्रभ जीउ नदरि निहाल ॥2॥5॥121॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला 5 ॥ हे प्रभू ! जैसे हो सके। वैसे (अवगुणों से) मेरी रक्षा कर। हे पारब्रहम ! हे परमेश्वर ! हे सतिगुरू ! हम (जीव) आपके हैं। आप हमारे पालनहार पिता हैं। 1। रहाउ। हे प्रभू ! मुझ गुण-हीन में कोई भी गुण नहीं। मैं उस मेहनत की कद्र नहीं जान सकता (जो आप हम जीवों के लिए कर रहा है)। हे प्रभू ! आप कैसा है और कितना बड़ा है- ये बात आप खुद ही जानता है। (हम जीवों का यह) शरीर और प्राण आपके ही दिए हुए सरमाया हैं। 1। हे हरेक के दिल की जानने वाले ! हे सर्व व्यापक मालिक ! बिना हमारे बोले ही आप हमारा हाल जानता है। हे नानक ! (कह-) हे प्रभू जी ! मेहर की निगाह से मेरी ओर देख। ताकि मेरा तन मेरा मन शीतल हो जाए। 2। 5। 121।
बिलावलु महला 5 ॥
राखु सदा प्रभ अपनै साथ ॥
तू हमरो प्रीतमु मनमोहनु तुझ बिनु जीवनु सगल अकाथ ॥1॥ रहाउ ॥
रंक ते राउ करत खिन भीतरि प्रभु मेरो अनाथ को नाथ ॥
जलत अगनि महि जन आपि उधारे करि अपुने दे राखे हाथ ॥1॥
सीतल सुखु पाइओ मन त्रिपते हरि सिमरत स्रम सगले लाथ ॥
निधि निधान नानक हरि सेवा अवर सिआनप सगल अकाथ ॥2॥6॥122॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला 5 ॥ हे प्रभू ! हमें आप सदा अपने चरणों में टिकाए रख। आप हमारा प्यारा है। आप हमारे मन को आकर्षित करने वाला है। आपसे विछुड़ के (हम जीवों की) सारी ही जिंदगी व्यर्थ है। 1। रहाउ। हे भाई ! मेरा प्रभू निखसमियों का खसम है (जिनका कोई मालिक नहीं उनका मालिक है)। एक छिन में कंगाल को राजा बना देता है। (तृष्णा की) आग में जलते को सेवक बना के खुद बचा लेता है। अपने बना के हाथ दे के। उनकी रक्षा करता है। 1। हे भाई ! परमात्मा का नाम सिमरते हुए शांति देने वाला आनंद मिल जाता है। मन (माया की तृष्णा की तरफ से) तृप्त हो जाता है। (माया की) सारी भटकनें खत्म हो जाती हैं। हे नानक ! परमात्मा की सेवा-भक्ति ही सारे खजानों का खजाना है। (माया की खातिर की हुई) और सारी चतुराई (भी प्रभू की सेवा भक्ति के सामने) व्यर्थ हैं। 2। 6। 122।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। सूही, बिलावल, और गोंड राग का क्षेत्र। गुरु राम दास की ‘लावां’ इसी सूही राग में बँधी, सोलहवीं सदी के मध्य की।

अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।

इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे।

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
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