अंग
833
राग बिलावल
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਸਾਚਾ ਨਾਮੁ ਸਾਚੈ ਸਬਦਿ ਜਾਨੈ ॥
ਆਪੈ ਆਪੁ ਮਿਲੈ ਚੂਕੈ ਅਭਿਮਾਨੈ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਨਾਮੁ ਸਦਾ ਸਦਾ ਵਖਾਨੈ ॥੫॥
ਸਤਿਗੁਰਿ ਸੇਵਿਐ ਦੂਜੀ ਦੁਰਮਤਿ ਜਾਈ ॥
ਅਉਗਣ ਕਾਟਿ ਪਾਪਾ ਮਤਿ ਖਾਈ ॥
ਕੰਚਨ ਕਾਇਆ ਜੋਤੀ ਜੋਤਿ ਸਮਾਈ ॥੬॥
ਸਤਿਗੁਰਿ ਮਿਲਿਐ ਵਡੀ ਵਡਿਆਈ ॥
ਦੁਖੁ ਕਾਟੈ ਹਿਰਦੈ ਨਾਮੁ ਵਸਾਈ ॥
ਨਾਮਿ ਰਤੇ ਸਦਾ ਸੁਖੁ ਪਾਈ ॥੭॥
ਗੁਰਮਤਿ ਮਾਨਿਆ ਕਰਣੀ ਸਾਰੁ ॥
ਗੁਰਮਤਿ ਮਾਨਿਆ ਮੋਖ ਦੁਆਰੁ ॥
ਨਾਨਕ ਗੁਰਮਤਿ ਮਾਨਿਆ ਪਰਵਾਰੈ ਸਾਧਾਰੁ ॥੮॥੧॥੩॥
ਆਪੈ ਆਪੁ ਮਿਲੈ ਚੂਕੈ ਅਭਿਮਾਨੈ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਨਾਮੁ ਸਦਾ ਸਦਾ ਵਖਾਨੈ ॥੫॥
ਸਤਿਗੁਰਿ ਸੇਵਿਐ ਦੂਜੀ ਦੁਰਮਤਿ ਜਾਈ ॥
ਅਉਗਣ ਕਾਟਿ ਪਾਪਾ ਮਤਿ ਖਾਈ ॥
ਕੰਚਨ ਕਾਇਆ ਜੋਤੀ ਜੋਤਿ ਸਮਾਈ ॥੬॥
ਸਤਿਗੁਰਿ ਮਿਲਿਐ ਵਡੀ ਵਡਿਆਈ ॥
ਦੁਖੁ ਕਾਟੈ ਹਿਰਦੈ ਨਾਮੁ ਵਸਾਈ ॥
ਨਾਮਿ ਰਤੇ ਸਦਾ ਸੁਖੁ ਪਾਈ ॥੭॥
ਗੁਰਮਤਿ ਮਾਨਿਆ ਕਰਣੀ ਸਾਰੁ ॥
ਗੁਰਮਤਿ ਮਾਨਿਆ ਮੋਖ ਦੁਆਰੁ ॥
ਨਾਨਕ ਗੁਰਮਤਿ ਮਾਨਿਆ ਪਰਵਾਰੈ ਸਾਧਾਰੁ ॥੮॥੧॥੩॥
साचा नामु साचै सबदि जानै ॥
आपै आपु मिलै चूकै अभिमानै ॥
गुरमुखि नामु सदा सदा वखानै ॥५॥
सतिगुरि सेविऐ दूजी दुरमति जाई ॥
अउगण काटि पापा मति खाई ॥
कंचन काइआ जोती जोति समाई ॥६॥
सतिगुरि मिलिऐ वडी वडिआई ॥
दुखु काटै हिरदै नामु वसाई ॥
नामि रते सदा सुखु पाई ॥७॥
गुरमति मानिआ करणी सारु ॥
गुरमति मानिआ मोख दुआरु ॥
नानक गुरमति मानिआ परवारै साधारु ॥८॥१॥३॥
आपै आपु मिलै चूकै अभिमानै ॥
गुरमुखि नामु सदा सदा वखानै ॥५॥
सतिगुरि सेविऐ दूजी दुरमति जाई ॥
अउगण काटि पापा मति खाई ॥
कंचन काइआ जोती जोति समाई ॥६॥
सतिगुरि मिलिऐ वडी वडिआई ॥
दुखु काटै हिरदै नामु वसाई ॥
नामि रते सदा सुखु पाई ॥७॥
गुरमति मानिआ करणी सारु ॥
गुरमति मानिआ मोख दुआरु ॥
नानक गुरमति मानिआ परवारै साधारु ॥८॥१॥३॥
हिन्दी अर्थ: हे भाई ! जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ के परमात्मा का नाम सदा ही जपता रहता है। उसका अपना आप परमात्मा के आपे में मिल जाता है। (उसके अंदर से) अहंकार समाप्त हो जाता है। जो मनुष्य सदा-स्थिर हरी की सिफत-सालाह के शबद के द्वारा सदा-स्थिर हरी-नाम के साथ गहरी सांझ डाल लेता है। 5। हे भाई ! यदि गुरू की शरण पड़े रहें। तो (अंदर से) माया के मोह वाली खोटी मति दूर हो जाती है। (अंदर से) सारे अवगुण काटे जाते हैं। पापों वाली मति खत्म हो जाती है। (विकारों से बचे रहने के कारण) शरीर सोने जैसा शुद्ध हो रहता है। (मनुष्य की) जिंद परमात्मा की ज्योति में मिली रहती है। 6। हे भाई ! अगर गुरू मिल जाए। तो (लोक-परलोक में) बड़ा सम्मान मिलता है। (गुरू मनुष्य का) हरेक दुख काट देता है। (मनुष्य के) हृदय में (परमात्मा का) नाम बसा देता है। (परमात्मा के) नाम में रंगीज़ के (मनुष्य) सदा आत्मिक आनंद पाता है। 7। हे भाई ! गुरू की शिक्षा में पतीजने से (मनुष्य का) आचरण अच्छा बन जाता है। गुरू की मति में मन मानने से विकारों की तरफ़ से मुक्ति पाने का रास्ता मिल जाता है। हे नानक ! गुरू की शिक्षा में पतीजने से (मनुष्य) अपने सारे परिवार को भी (हरी-नाम का) आसरा देने के काबिल बन जाता है। 8। 1। 3।
ਬਿਲਾਵਲੁ ਮਹਲਾ ੪ ਅਸਟਪਦੀਆ ਘਰੁ ੧੧
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ਆਪੈ ਆਪੁ ਖਾਇ ਹਉ ਮੇਟੈ ਅਨਦਿਨੁ ਹਰਿ ਰਸ ਗੀਤ ਗਵਈਆ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਪਰਚੈ ਕੰਚਨ ਕਾਇਆ ਨਿਰਭਉ ਜੋਤੀ ਜੋਤਿ ਮਿਲਈਆ ॥੧॥
ਮੈ ਹਰਿ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਅਧਾਰੁ ਰਮਈਆ ॥
ਖਿਨੁ ਪਲੁ ਰਹਿ ਨ ਸਕਉ ਬਿਨੁ ਨਾਵੈ ਗੁਰਮੁਖਿ ਹਰਿ ਹਰਿ ਪਾਠ ਪੜਈਆ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਏਕੁ ਗਿਰਹੁ ਦਸ ਦੁਆਰ ਹੈ ਜਾ ਕੇ ਅਹਿਨਿਸਿ ਤਸਕਰ ਪੰਚ ਚੋਰ ਲਗਈਆ ॥
ਧਰਮੁ ਅਰਥੁ ਸਭੁ ਹਿਰਿ ਲੇ ਜਾਵਹਿ ਮਨਮੁਖ ਅੰਧੁਲੇ ਖਬਰਿ ਨ ਪਈਆ ॥੨॥
ਕੰਚਨ ਕੋਟੁ ਬਹੁ ਮਾਣਕਿ ਭਰਿਆ ਜਾਗੇ ਗਿਆਨ ਤਤਿ ਲਿਵ ਲਈਆ ॥
ਤਸਕਰ ਹੇਰੂ ਆਇ ਲੁਕਾਨੇ ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦਿ ਪਕੜਿ ਬੰਧਿ ਪਈਆ ॥੩॥
ਹਰਿ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਪੋਤੁ ਬੋਹਿਥਾ ਖੇਵਟੁ ਸਬਦੁ ਗੁਰੁ ਪਾਰਿ ਲੰਘਈਆ ॥
ਜਮੁ ਜਾਗਾਤੀ ਨੇੜਿ ਨ ਆਵੈ ਨਾ ਕੋ ਤਸਕਰੁ ਚੋਰੁ ਲਗਈਆ ॥੪॥
ਹਰਿ ਗੁਣ ਗਾਵੈ ਸਦਾ ਦਿਨੁ ਰਾਤੀ ਮੈ ਹਰਿ ਜਸੁ ਕਹਤੇ ਅੰਤੁ ਨ ਲਹੀਆ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਮਨੂਆ ਇਕਤੁ ਘਰਿ ਆਵੈ ਮਿਲਉ ਗੋੁਪਾਲ ਨੀਸਾਨੁ ਬਜਈਆ ॥੫॥
ਨੈਨੀ ਦੇਖਿ ਦਰਸੁ ਮਨੁ ਤ੍ਰਿਪਤੈ ਸ੍ਰਵਨ ਬਾਣੀ ਗੁਰ ਸਬਦੁ ਸੁਣਈਆ ॥
ਸੁਨਿ ਸੁਨਿ ਆਤਮ ਦੇਵ ਹੈ ਭੀਨੇ ਰਸਿ ਰਸਿ ਰਾਮ ਗੋਪਾਲ ਰਵਈਆ ॥੬॥
ਤ੍ਰੈ ਗੁਣ ਮਾਇਆ ਮੋਹਿ ਵਿਆਪੇ ਤੁਰੀਆ ਗੁਣੁ ਹੈ ਗੁਰਮੁਖਿ ਲਹੀਆ ॥
ਏਕ ਦ੍ਰਿਸਟਿ ਸਭ ਸਮ ਕਰਿ ਜਾਣੈ ਨਦਰੀ ਆਵੈ ਸਭੁ ਬ੍ਰਹਮੁ ਪਸਰਈਆ ॥੭॥
ਰਾਮ ਨਾਮੁ ਹੈ ਜੋਤਿ ਸਬਾਈ ਗੁਰਮੁਖਿ ਆਪੇ ਅਲਖੁ ਲਖਈਆ ॥
ਨਾਨਕ ਦੀਨ ਦਇਆਲ ਭਏ ਹੈ ਭਗਤਿ ਭਾਇ ਹਰਿ ਨਾਮਿ ਸਮਈਆ ॥੮॥੧॥੪॥
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ਆਪੈ ਆਪੁ ਖਾਇ ਹਉ ਮੇਟੈ ਅਨਦਿਨੁ ਹਰਿ ਰਸ ਗੀਤ ਗਵਈਆ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਪਰਚੈ ਕੰਚਨ ਕਾਇਆ ਨਿਰਭਉ ਜੋਤੀ ਜੋਤਿ ਮਿਲਈਆ ॥੧॥
ਮੈ ਹਰਿ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਅਧਾਰੁ ਰਮਈਆ ॥
ਖਿਨੁ ਪਲੁ ਰਹਿ ਨ ਸਕਉ ਬਿਨੁ ਨਾਵੈ ਗੁਰਮੁਖਿ ਹਰਿ ਹਰਿ ਪਾਠ ਪੜਈਆ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਏਕੁ ਗਿਰਹੁ ਦਸ ਦੁਆਰ ਹੈ ਜਾ ਕੇ ਅਹਿਨਿਸਿ ਤਸਕਰ ਪੰਚ ਚੋਰ ਲਗਈਆ ॥
ਧਰਮੁ ਅਰਥੁ ਸਭੁ ਹਿਰਿ ਲੇ ਜਾਵਹਿ ਮਨਮੁਖ ਅੰਧੁਲੇ ਖਬਰਿ ਨ ਪਈਆ ॥੨॥
ਕੰਚਨ ਕੋਟੁ ਬਹੁ ਮਾਣਕਿ ਭਰਿਆ ਜਾਗੇ ਗਿਆਨ ਤਤਿ ਲਿਵ ਲਈਆ ॥
ਤਸਕਰ ਹੇਰੂ ਆਇ ਲੁਕਾਨੇ ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦਿ ਪਕੜਿ ਬੰਧਿ ਪਈਆ ॥੩॥
ਹਰਿ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਪੋਤੁ ਬੋਹਿਥਾ ਖੇਵਟੁ ਸਬਦੁ ਗੁਰੁ ਪਾਰਿ ਲੰਘਈਆ ॥
ਜਮੁ ਜਾਗਾਤੀ ਨੇੜਿ ਨ ਆਵੈ ਨਾ ਕੋ ਤਸਕਰੁ ਚੋਰੁ ਲਗਈਆ ॥੪॥
ਹਰਿ ਗੁਣ ਗਾਵੈ ਸਦਾ ਦਿਨੁ ਰਾਤੀ ਮੈ ਹਰਿ ਜਸੁ ਕਹਤੇ ਅੰਤੁ ਨ ਲਹੀਆ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਮਨੂਆ ਇਕਤੁ ਘਰਿ ਆਵੈ ਮਿਲਉ ਗੋੁਪਾਲ ਨੀਸਾਨੁ ਬਜਈਆ ॥੫॥
ਨੈਨੀ ਦੇਖਿ ਦਰਸੁ ਮਨੁ ਤ੍ਰਿਪਤੈ ਸ੍ਰਵਨ ਬਾਣੀ ਗੁਰ ਸਬਦੁ ਸੁਣਈਆ ॥
ਸੁਨਿ ਸੁਨਿ ਆਤਮ ਦੇਵ ਹੈ ਭੀਨੇ ਰਸਿ ਰਸਿ ਰਾਮ ਗੋਪਾਲ ਰਵਈਆ ॥੬॥
ਤ੍ਰੈ ਗੁਣ ਮਾਇਆ ਮੋਹਿ ਵਿਆਪੇ ਤੁਰੀਆ ਗੁਣੁ ਹੈ ਗੁਰਮੁਖਿ ਲਹੀਆ ॥
ਏਕ ਦ੍ਰਿਸਟਿ ਸਭ ਸਮ ਕਰਿ ਜਾਣੈ ਨਦਰੀ ਆਵੈ ਸਭੁ ਬ੍ਰਹਮੁ ਪਸਰਈਆ ॥੭॥
ਰਾਮ ਨਾਮੁ ਹੈ ਜੋਤਿ ਸਬਾਈ ਗੁਰਮੁਖਿ ਆਪੇ ਅਲਖੁ ਲਖਈਆ ॥
ਨਾਨਕ ਦੀਨ ਦਇਆਲ ਭਏ ਹੈ ਭਗਤਿ ਭਾਇ ਹਰਿ ਨਾਮਿ ਸਮਈਆ ॥੮॥੧॥੪॥
बिलावलु महला ४ असटपदीआ घरु ११
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
आपै आपु खाइ हउ मेटै अनदिनु हरि रस गीत गवईआ ॥
गुरमुखि परचै कंचन काइआ निरभउ जोती जोति मिलईआ ॥१॥
मै हरि हरि नामु अधारु रमईआ ॥
खिनु पलु रहि न सकउ बिनु नावै गुरमुखि हरि हरि पाठ पड़ईआ ॥१॥ रहाउ ॥
एकु गिरहु दस दुआर है जा के अहिनिसि तसकर पंच चोर लगईआ ॥
धरमु अरथु सभु हिरि ले जावहि मनमुख अंधुले खबरि न पईआ ॥२॥
कंचन कोटु बहु माणकि भरिआ जागे गिआन तति लिव लईआ ॥
तसकर हेरू आइ लुकाने गुर कै सबदि पकड़ि बंधि पईआ ॥३॥
हरि हरि नामु पोतु बोहिथा खेवटु सबदु गुरु पारि लंघईआ ॥
जमु जागाती नेड़ि न आवै ना को तसकरु चोरु लगईआ ॥४॥
हरि गुण गावै सदा दिनु राती मै हरि जसु कहते अंतु न लहीआ ॥
गुरमुखि मनूआ इकतु घरि आवै मिलउ गोुपाल नीसानु बजईआ ॥५॥
नैनी देखि दरसु मनु त्रिपतै स्रवन बाणी गुर सबदु सुणईआ ॥
सुनि सुनि आतम देव है भीने रसि रसि राम गोपाल रवईआ ॥६॥
त्रै गुण माइआ मोहि विआपे तुरीआ गुणु है गुरमुखि लहीआ ॥
एक द्रिसटि सभ सम करि जाणै नदरी आवै सभु ब्रहमु पसरईआ ॥७॥
राम नामु है जोति सबाई गुरमुखि आपे अलखु लखईआ ॥
नानक दीन दइआल भए है भगति भाइ हरि नामि समईआ ॥८॥१॥४॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
आपै आपु खाइ हउ मेटै अनदिनु हरि रस गीत गवईआ ॥
गुरमुखि परचै कंचन काइआ निरभउ जोती जोति मिलईआ ॥१॥
मै हरि हरि नामु अधारु रमईआ ॥
खिनु पलु रहि न सकउ बिनु नावै गुरमुखि हरि हरि पाठ पड़ईआ ॥१॥ रहाउ ॥
एकु गिरहु दस दुआर है जा के अहिनिसि तसकर पंच चोर लगईआ ॥
धरमु अरथु सभु हिरि ले जावहि मनमुख अंधुले खबरि न पईआ ॥२॥
कंचन कोटु बहु माणकि भरिआ जागे गिआन तति लिव लईआ ॥
तसकर हेरू आइ लुकाने गुर कै सबदि पकड़ि बंधि पईआ ॥३॥
हरि हरि नामु पोतु बोहिथा खेवटु सबदु गुरु पारि लंघईआ ॥
जमु जागाती नेड़ि न आवै ना को तसकरु चोरु लगईआ ॥४॥
हरि गुण गावै सदा दिनु राती मै हरि जसु कहते अंतु न लहीआ ॥
गुरमुखि मनूआ इकतु घरि आवै मिलउ गोुपाल नीसानु बजईआ ॥५॥
नैनी देखि दरसु मनु त्रिपतै स्रवन बाणी गुर सबदु सुणईआ ॥
सुनि सुनि आतम देव है भीने रसि रसि राम गोपाल रवईआ ॥६॥
त्रै गुण माइआ मोहि विआपे तुरीआ गुणु है गुरमुखि लहीआ ॥
एक द्रिसटि सभ सम करि जाणै नदरी आवै सभु ब्रहमु पसरईआ ॥७॥
राम नामु है जोति सबाई गुरमुखि आपे अलखु लखईआ ॥
नानक दीन दइआल भए है भगति भाइ हरि नामि समईआ ॥८॥१॥४॥
हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला ४ असटपदीआ घरु ११ ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ हे भाई ! जो मनुष्य हर वक्त हरी-नाम रस के गीत गाता रहता है। जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ के (हरी-नाम में) पसीजा रहता है। वह मनुष्य (परमात्मा के) स्वै में अपना स्वै विलीन कर के (अपने अंदर से) अहंकार मिटा लेता है। (विकारों से बचे रहने के कारण) उसका शरीर सोने जैसा शुद्ध हो जाता है। उसकी जिंद निर्भय प्रभू की ज्योति में लीन रहती है। 1। हे भाई ! सोहाने राम का हरी-नाम मेरे वास्ते (मेरी जिंदगी का) आसरा (बन गया) है। (अब) मैं उसके नाम के बिना एक छिन एक पल भी नहीं रह सकता। गुरू की शरण पड़ कर (मैं तो) हरी-नाम का पाठ (ही) पढ़ता रहता हूँ। 1। रहाउ। हे भाई ! (मनुष्य का ये शरीर) एक ऐसा घर है जिसके दस दरवाजे हैं। (इन दरवाजों से) दिन-रात- (काम क्रोध लोभ मोह अहंकार) पाँच चोर सेंध लगाए रखते हैं। (इसके अंदर से) आत्मिक जीवन वाला सारा धन चुरा के ले जाते हैं। (आत्मिक जीवन द्वारा) अंधे हो चुके मन के मुरीद मनुष्य को (अपने लूटे जाने का) पता नहीं लगता। 2। हे भाई ! (यह मानव शरीर। जैसे) सोने का किला (उच्च आत्मिक गुणों के) मोतियों से भरा हुआ है। (इन हीरों को चुराने के लिए लूटने के लिए कामादिक) चोर डाकू आ के (इसमें) छुपे रहते हैं। जो मनुष्य आत्मिक जीवन के श्रोत प्रभू में सुरति जोड़ के सचेत रहते हैं। वह मनुष्य गुरू के शबद के द्वारा (इन चोर-डाकूओं को) पकड़ के बाँध लेते हैं। 3। हे भाई ! परमात्मा का नाम जहाज है जहाज़। (उस जहाज़ का) मल्लाह (गुरू का) शबद है। (जो मनुष्य इस जहाज़ का आसरा लेता है। उसको) गुरू (विकारों भरे संसार-समुंद्र से) पार लंघा लेता है। जमराज मूसलिया (भी उसके) नजदीक नहीं आता। (कामादिक) कोई चोर भी सेंध नहीं लगा सकता। 4। हे भाई ! (मेरा मन अब) सदा दिन रात परमात्मा के गुण गाता रहता है। मैं प्रभू की सिफत-सालाह करते-करते (सिफत का) अंत नहीं पा सकता। गुरू की शरण पड़ कर (मेरा यह) मन प्रभू के चरणों में ही टिका रहता है। मैं लोक लाज दूर करके जगत पालक प्रभू को मिला रहता हूँ। 5। हे भाई ! आँखों से (हर जगह प्रभू के) दर्शन करके (मेरा) मन (और वासना से) तृप्त रहता है। (मेरे) कान गुरू की बाणी गुरू के शबद को (ही) सुनते रहते हैं। (प्रभू की सिफत सालाह) सुन-सुन के (मेरी) जिंद (नाम-रस में) भीगी रहती है। (मैं) बड़े आनंद से राम-गोपाल के गुण गाता रहता हूँ। 6। हे भाई ! माया के तीन गुणों के असर तले रहने वाले जीव (सदा) माया के मोह में फसे रहते हैं। गुरू के सन्मुख रहने वाला मनुष्य (वह) चौथा पद प्राप्त कर लेता है (जहाँ माया का प्रभाव नहीं पड़ सकता)। (गुरू के सन्मुख रहने वाला मनुष्य) एक (प्यार-भरी) निगाह से सारी दुनिया को एक जैसा जानता है। उसको (यह प्रत्यक्ष) दिखाई देता है (कि) हर जगह परमात्मा ही पसरा हुआ है। 7। हे भाई ! गुरू के सन्मुख रहने वाला मनुष्य (ये) समझ लेता है कि अलख प्रभू स्वयं ही स्वयं (हर जगह मौजूद) है। हर जगह परमात्मा का ही नाम है। सारी दुनिया में परमात्मा की ही ज्योति है। हे नानक ! दीनों पर दया करने वाले प्रभू जी जिन पर मेहरवान होते हैं। वह मनुष्य भक्ति-भावना से परमात्मा के नाम में लीन रहते हैं। 8। 1।
ਬਿਲਾਵਲੁ ਮਹਲਾ ੪ ॥
ਹਰਿ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਸੀਤਲ ਜਲੁ ਧਿਆਵਹੁ ਹਰਿ ਚੰਦਨ ਵਾਸੁ ਸੁਗੰਧ ਗੰਧਈਆ ॥
ਹਰਿ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਸੀਤਲ ਜਲੁ ਧਿਆਵਹੁ ਹਰਿ ਚੰਦਨ ਵਾਸੁ ਸੁਗੰਧ ਗੰਧਈਆ ॥
बिलावलु महला ४ ॥
हरि हरि नामु सीतल जलु धिआवहु हरि चंदन वासु सुगंध गंधईआ ॥
हरि हरि नामु सीतल जलु धिआवहु हरि चंदन वासु सुगंध गंधईआ ॥
हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला ४ ॥ हे प्रभू ! प्रभू का नाम सिमरा करो। ये नाम ठंडक पहुँचाने वाला जल है। ये नाम चंदन की सुगंधि है जो (सारी बनस्पति को) सुगन्धित कर देती है।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 833 है, राग बिलावल का हिस्सा। मुख्य रचयिता: Guru Raam Daas Ji।
Diwali की पहली रात, अकेले बालकनी में पटाख़ों के बीच एक specific shift।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 34 पंक्तियों का है, 3 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 833” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: बिलावल राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 834 →, पीछे का: ← अंग 832।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।