Lulla Family

अंग 854

अंग
854
राग बिलावल
राग: बिलावल · रचयिता: Guru Amar Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
जन नानक कै वलि होआ मेरा सुआमी हरि सजण पुरखु सुजानु ॥
पउदी भिति देखि कै सभि आइ पए सतिगुर की पैरी लाहिओनु सभना किअहु मनहु गुमानु ॥10॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: हे नानक ! (कह-) सब के दिल की जानने वाला सब का मित्र सबमें व्यापक प्रभू अपने सेवक के पक्ष में रहता है। हे भाई ! (गुरू के दर से) आत्मिक खुराक मिलती देख के सारे लोग गुरू के चरणों में आ लगे। गुरू ने सबके मन से अहंकार दूर कर दिया। 10।
सलोक मः 1 ॥
कोई वाहे को लुणै को पाए खलिहानि ॥
नानक एव न जापई कोई खाइ निदानि ॥1॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3॥ हे नानक ! कोई मनुष्य हल चलाता है। कोई (और) मनुष्य (उस पकी हुई फसल को) काटता है। कोई (और) मनुष्य (उस कटी हुई फसल को) खलिहान में लाता है; पर आखिर में (उस अन्न को) खाता कोई और है। सो। इसी तरह (परमात्मा की रजा को) समझा नहीं जा सकता (कि कब क्या कुछ घटित होगा)। 1।
मः 1 ॥
जिसु मनि वसिआ तरिआ सोइ ॥
नानक जो भावै सो होइ ॥2॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: महला 1- जिस मनुष्य के मन में परमात्मा आ बसता है वह (संसार-समुंद्र से) पार लांघ जाता है हे नानक ! (उसको समझ आ जाती है कि जगत में) वही कुछ होता है जो (परमात्मा को) अच्छा लगता है। 2।
पउड़ी ॥
पारब्रहमि दइआलि सागरु तारिआ ॥
गुरि पूरै मिहरवानि भरमु भउ मारिआ ॥
काम क्रोधु बिकरालु दूत सभि हारिआ ॥
अंम्रित नामु निधानु कंठि उरि धारिआ ॥
नानक साधू संगि जनमु मरणु सवारिआ ॥11॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ हे भाई ! दयालु पारब्रहम ने उसको संसार-समुंद्र से पार लंघा लिया। पूरे मेहरवान गुरू ने (जिस मनुष्य के मन की) भटकना और सहम समाप्त कर दिए। भयानक क्रोध और काम (आदि) सारे (उसके) वैरी (उस पर प्रभाव डालने से) हार गए। (उस मनुष्य ने) सारे सुखों का खजाना (परमात्मा का) आत्मिक जीवन देने वाला नाम (अपने) गले में (अपने) हृदय में (सदा के लिए) टिका लिया हे नानक ! (और इस तरह) गुरू की संगति में (रह के उसने अपना) सारा जीवन संवार लिया। 11।
सलोक मः 3 ॥
जिन॑ी नामु विसारिआ कूड़े कहण कहंनि॑ ॥
पंच चोर तिना घरु मुहनि॑ हउमै अंदरि संनि॑ ॥
साकत मुठे दुरमती हरि रसु न जाणंनि॑ ॥
जिन॑ी अंम्रितु भरमि लुटाइआ बिखु सिउ रचहि रचंनि॑ ॥
दुसटा सेती पिरहड़ी जन सिउ वादु करंनि॑ ॥
नानक साकत नरक महि जमि बधे दुख सहंनि॑ ॥
पइऐ किरति कमावदे जिव राखहि तिवै रहंनि॑ ॥1॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3॥ हे भाई ! जिन मनुष्यों ने (परमात्मा का) नाम भुला दिया। वह सदा नाशवंत पदार्थों की ही बातें करते रहते हैं। (कामादिक) पाँचों चोर उनका (हृदय-) घर लूटते रहते हैं। उनके अंदर अहंकार (की) सेंध लगी रहती है। वह परमात्मा से टूटे हुए खोटी मति वाले मनुष्य (इन विकारों के हाथों ही) लूटे जाते हैं। प्रभू के नाम का स्वाद वे नहीं जानते-पहचानते। हे भाई ! जिन मनुष्यों ने आत्मिक जीवन देने वाला नाम-रस (मन की) भटकना में (ही) हुटा दिया। वे (आत्मिक जीवन का नाश करने वाली माया) जहर से ही प्यार डाले रखते हैं। बुरे मनुष्यों से उनका प्यार होता है। परमात्मा के सेवकों के साथ वे झगड़ते रहते हैं। हे नानक ! परमात्मा से टूटे हुए मनुष्य आत्मिक मौत (के बंधनों) में बंधे हुए मनुष्य (मानो) नरकों में पड़े रहते हैं (सदा) दुख ही सहते रहते हैं। (पर। हे प्रभू ! जीवों के भी क्या वश।) जैसे आप (इनको) रखता है वैसे ही रहते हैं। और। पूर्बले किए कर्मों के अनुसार (अब भी वैसे ही) कर्म किए जा रहे हैं। 1।
मः 3 ॥
जिन॑ी सतिगुरु सेविआ ताणु निताणे तिसु ॥
सासि गिरासि सदा मनि वसै जमु जोहि न सकै तिसु ॥
हिरदै हरि हरि नाम रसु कवला सेवकि तिसु ॥
हरि दासा का दासु होइ परम पदारथु तिसु ॥
नानक मनि तनि जिसु प्रभु वसै हउ सद कुरबाणै तिसु ॥
जिन॑ कउ पूरबि लिखिआ रसु संत जना सिउ तिसु ॥2॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: महला 3॥ हे भाई ! जो जो दुर्बल (शक्तिहीन) मनुष्य (भी) गुरू की बताई हुई (सिमरन की) कार करता है। उसको (आत्मिक) बल मिल जाता है। हरेक सांस के साथ हरेक ग्रास के साथ हर वक्त (परमात्मा उसके) मन में आ बसता है। आत्मिक मौत उसके जनदीक नहीं फटकती। उसको अपने हृदय में परमात्मा के नाम का स्वाद आता रहता है। माया उसकी दासी बन जाती है (उसके ऊपर अपना प्रभाव नहीं डाल सकती)। वह मनुष्य प्रभू के सेवकों का सेवक बना रहता है। उसको सबसे श्रेष्ठ पदार्थ (हरी-नाम) प्राप्त हो जाता है। हे नानक ! (कह-) मैं उस मनुष्य से सदके जाता हूँ जिसके मन में जिसके हृदय में परमात्मा (का नाम) टिका रहता है। पर। हे भाई ! उस-उस मनुष्य का प्यार संत जनों के साथ बनता है जिस-जिस के भाग्यों में पिछले किए कर्मों के अनुसार (सिमरन के) लेख लिखे होते हैं। 2।
पउड़ी ॥
जो बोले पूरा सतिगुरू सो परमेसरि सुणिआ ॥
सोई वरतिआ जगत महि घटि घटि मुखि भणिआ ॥
बहुतु वडिआईआ साहिबै नह जाही गणीआ ॥
सचु सहजु अनदु सतिगुरू पासि सची गुर मणीआ ॥
नानक संत सवारे पारब्रहमि सचे जिउ बणिआ ॥12॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ हे भाई ! पूरा गुरू जो (सिफत सालाह का) बचन बोलता है। परमात्मा उसकी ओर ध्यान देता है। गुरू के वह वचन सारे संसार पर प्रभाव डालते हैं। हरेक हृदय में (प्रभाव डालते हैं। हरेक मनुष्य अपने) मुँह से उचारता है। (हे भाई ! गुरू बताता है कि) मालिक प्रभू में बेअंत गुण हैं जो गिने नहीं जा सकते। हे भाई ! प्रभू का सदा-स्थिर नाम। आत्मिक अडोलता। आत्मिक आनंद (ये) गुरू के पास (ही हैं। गुरू से ही ये दातें मिलती हैं)। गुरू का उपदेश सदा कायम रहने वाला रत्न है। हे नानक ! परमात्मा अपने सेवकों के जीवन स्वयं सुंदर बनाता है। संत जन सदा कामय रहने वाले परमात्मा जैसे बन जाते हैं। 12।
सलोक मः 3 ॥
अपणा आपु न पछाणई हरि प्रभु जाता दूरि ॥
गुर की सेवा विसरी किउ मनु रहै हजूरि ॥
मनमुखि जनमु गवाइआ झूठै लालचि कूरि ॥
नानक बखसि मिलाइअनु सचै सबदि हदूरि ॥1॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3॥ (हे भाई ! अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य) अपने आत्मिक जीवन को (कभी) परखता नहीं। वह परमात्मा को (कहीं) दूर बसता समझता है। उसको गुरू द्वारा बताए हुए काम (सदा) भूले रहते हैं। (इस वास्ते उसका) मन (परमात्मा की) हजूरी में (कभी) नहीं टिकता। हे नानक ! अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य ने झूठे लालच में (लग के) माया के मोह में (फस के ही अपना) जीवन गवा लिया होता है। जो मनुष्य सिफत-सालाह वाले गुरू शबद के द्वारा (परमात्मा की) हजूरी में टिके रहते हैं। उनको परमात्मा ने मेहर करके (अपने चरणों में) मिला लिया होता है। 1।
मः 3 ॥
हरि प्रभु सचा सोहिला गुरमुखि नामु गोविंदु ॥
अनदिनु नामु सलाहणा हरि जपिआ मनि आनंदु ॥
वडभागी हरि पाइआ पूरनु परमानंदु ॥
जन नानक नामु सलाहिआ बहुड़ि न मनि तनि भंगु ॥2॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: महला 3॥ हे भाई ! हरी प्रभू गोविंद सदा कायम रहने वाला है। (उसकी) सिफत-सालाह का गीत (उसका) नाम गुरू की शरण पड़ने से (मिलता है)। (जिस मनुष्य को हरी-नाम मिलता है। वह) हर वक्त ही नाम सिमरता रहता है। और परमात्मा का नाम सिमरते हुए (उसके) मन में आत्मिक आनंद बना रहता है। पर। हे भाई ! परम-आनंद का मालिक पूर्ण प्रभू परमात्मा बहुत भाग्यों से ही मिलता है। हे नानक ! (कह- जिन) दासों ने (परमात्मा का) नाम सिमरा। उनके मन में उनके तन में फिर कभी (परमातमा से) दूरी पैदा नहीं होती। 2।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। सूही, बिलावल, और गोंड राग का क्षेत्र। गुरु राम दास की ‘लावां’ इसी सूही राग में बँधी, सोलहवीं सदी के मध्य की।

अमरदास जी ने एक ऐसी उम्र में गुरु-गद्दी पायी जब अधिकांश लोग रिटायर हो जाते हैं। उनकी रचनाओं में एक बड़े आदमी की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध उनका सीधा रुख़ बाद की सिख-परम्परा का foundational-वाक्य बना।

इस अंग पर 9 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे नानक ! (कह-) सब के दिल की जानने वाला सब का मित्र सबमें व्यापक प्रभू अपने सेवक के पक्ष में रहता है।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।