अंग
824
राग बिलावल
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਕਹਾ ਕਰੈ ਕੋਈ ਬੇਚਾਰਾ ਪ੍ਰਭ ਮੇਰੇ ਕਾ ਬਡ ਪਰਤਾਪੁ ॥੧॥
ਸਿਮਰਿ ਸਿਮਰਿ ਸਿਮਰਿ ਸੁਖੁ ਪਾਇਆ ਚਰਨ ਕਮਲ ਰਖੁ ਮਨ ਮਾਹੀ ॥
ਤਾ ਕੀ ਸਰਨਿ ਪਰਿਓ ਨਾਨਕ ਦਾਸੁ ਜਾ ਤੇ ਊਪਰਿ ਕੋ ਨਾਹੀ ॥੨॥੧੨॥੯੮॥
ਸਿਮਰਿ ਸਿਮਰਿ ਸਿਮਰਿ ਸੁਖੁ ਪਾਇਆ ਚਰਨ ਕਮਲ ਰਖੁ ਮਨ ਮਾਹੀ ॥
ਤਾ ਕੀ ਸਰਨਿ ਪਰਿਓ ਨਾਨਕ ਦਾਸੁ ਜਾ ਤੇ ਊਪਰਿ ਕੋ ਨਾਹੀ ॥੨॥੧੨॥੯੮॥
कहा करै कोई बेचारा प्रभ मेरे का बड परतापु ॥१॥
सिमरि सिमरि सिमरि सुखु पाइआ चरन कमल रखु मन माही ॥
ता की सरनि परिओ नानक दासु जा ते ऊपरि को नाही ॥२॥१२॥९८॥
सिमरि सिमरि सिमरि सुखु पाइआ चरन कमल रखु मन माही ॥
ता की सरनि परिओ नानक दासु जा ते ऊपरि को नाही ॥२॥१२॥९८॥
हिन्दी अर्थ: मेरे प्रभू की बड़ी ताकत है। अब (इनमें से) कोई भी मेरा कुछ बिगाड़ नहीं सकता। 1। (हे भाई ! गुरू की किरपा से परमात्मा के सोहणे चरण) मेरे मन में आसरा बन गए हैं। उसका नाम (हर वक्त) सिमर-सिमर के मैंने आत्मिक आनंद प्राप्त किया है। हे भाई ! (प्रभू का) दास नानक उस (प्रभू) की शरण पड़ गया है जिससे बड़ा और कोई नहीं। 2। 12। 98।
ਬਿਲਾਵਲੁ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਸਦਾ ਸਦਾ ਜਪੀਐ ਪ੍ਰਭ ਨਾਮ ॥
ਜਰਾ ਮਰਾ ਕਛੁ ਦੂਖੁ ਨ ਬਿਆਪੈ ਆਗੈ ਦਰਗਹ ਪੂਰਨ ਕਾਮ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਆਪੁ ਤਿਆਗਿ ਪਰੀਐ ਨਿਤ ਸਰਨੀ ਗੁਰ ਤੇ ਪਾਈਐ ਏਹੁ ਨਿਧਾਨੁ ॥
ਜਨਮ ਮਰਣ ਕੀ ਕਟੀਐ ਫਾਸੀ ਸਾਚੀ ਦਰਗਹ ਕਾ ਨੀਸਾਨੁ ॥੧॥
ਜੋ ਤੁਮੑ ਕਰਹੁ ਸੋਈ ਭਲ ਮਾਨਉ ਮਨ ਤੇ ਛੂਟੈ ਸਗਲ ਗੁਮਾਨੁ ॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਤਾ ਕੀ ਸਰਣਾਈ ਜਾ ਕਾ ਕੀਆ ਸਗਲ ਜਹਾਨੁ ॥੨॥੧੩॥੯੯॥
ਸਦਾ ਸਦਾ ਜਪੀਐ ਪ੍ਰਭ ਨਾਮ ॥
ਜਰਾ ਮਰਾ ਕਛੁ ਦੂਖੁ ਨ ਬਿਆਪੈ ਆਗੈ ਦਰਗਹ ਪੂਰਨ ਕਾਮ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਆਪੁ ਤਿਆਗਿ ਪਰੀਐ ਨਿਤ ਸਰਨੀ ਗੁਰ ਤੇ ਪਾਈਐ ਏਹੁ ਨਿਧਾਨੁ ॥
ਜਨਮ ਮਰਣ ਕੀ ਕਟੀਐ ਫਾਸੀ ਸਾਚੀ ਦਰਗਹ ਕਾ ਨੀਸਾਨੁ ॥੧॥
ਜੋ ਤੁਮੑ ਕਰਹੁ ਸੋਈ ਭਲ ਮਾਨਉ ਮਨ ਤੇ ਛੂਟੈ ਸਗਲ ਗੁਮਾਨੁ ॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਤਾ ਕੀ ਸਰਣਾਈ ਜਾ ਕਾ ਕੀਆ ਸਗਲ ਜਹਾਨੁ ॥੨॥੧੩॥੯੯॥
बिलावलु महला ५ ॥
सदा सदा जपीऐ प्रभ नाम ॥
जरा मरा कछु दूखु न बिआपै आगै दरगह पूरन काम ॥१॥ रहाउ ॥
आपु तिआगि परीऐ नित सरनी गुर ते पाईऐ एहु निधानु ॥
जनम मरण की कटीऐ फासी साची दरगह का नीसानु ॥१॥
जो तुम॑ करहु सोई भल मानउ मन ते छूटै सगल गुमानु ॥
कहु नानक ता की सरणाई जा का कीआ सगल जहानु ॥२॥१३॥९९॥
सदा सदा जपीऐ प्रभ नाम ॥
जरा मरा कछु दूखु न बिआपै आगै दरगह पूरन काम ॥१॥ रहाउ ॥
आपु तिआगि परीऐ नित सरनी गुर ते पाईऐ एहु निधानु ॥
जनम मरण की कटीऐ फासी साची दरगह का नीसानु ॥१॥
जो तुम॑ करहु सोई भल मानउ मन ते छूटै सगल गुमानु ॥
कहु नानक ता की सरणाई जा का कीआ सगल जहानु ॥२॥१३॥९९॥
हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला ५ ॥ हे भाई ! सदा ही परमात्मा का नाम जपना चाहिए। (नाम जपने की बरकति से ऐसी उच्च आत्मिक अवस्था बन जाती है। जिसको) बुढ़ापा। मौत अथवा दुख कुछ भी छू नहीं सकते। आगे भी परमात्मा की हजूरी में भी सफलता ही मिलती है। 1। रहाउ। (पर। हे भाई !) ये (नाम-) खजाना गुरू से (ही) मिलता है। स्वैभाव त्याग के सदा (गुरू की) शरण पड़ना चाहिए। ये नाम सदा-स्थिर प्रभू की हजूरी में पहुँचने के लिए परवाना है। (नाम की सहायता से) जनम-मरन की फाही (भी) काटी जाती है। 1। (हे भाई ! अगर मुझे तेरा नाम मिल जाए। तो) जो कुछ तू करता है। वह मैं भला समझने लग जाऊँगा। (तेरे नाम की बरकति से) मन से सारा अहंकार समाप्त हो जाता है। हे नानक ! कह (-हे भाई !) उस परमात्मा की शरण पड़े रहना चाहिए। जिसका पैदा किया हुआ सारा जहान है। 2। 13। 99।
ਬਿਲਾਵਲੁ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਮਨ ਤਨ ਅੰਤਰਿ ਪ੍ਰਭੁ ਆਹੀ ॥
ਹਰਿ ਗੁਨ ਗਾਵਤ ਪਰਉਪਕਾਰ ਨਿਤ ਤਿਸੁ ਰਸਨਾ ਕਾ ਮੋਲੁ ਕਿਛੁ ਨਾਹੀ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਕੁਲ ਸਮੂਹ ਉਧਰੇ ਖਿਨ ਭੀਤਰਿ ਜਨਮ ਜਨਮ ਕੀ ਮਲੁ ਲਾਹੀ ॥
ਸਿਮਰਿ ਸਿਮਰਿ ਸੁਆਮੀ ਪ੍ਰਭੁ ਅਪਨਾ ਅਨਦ ਸੇਤੀ ਬਿਖਿਆ ਬਨੁ ਗਾਹੀ ॥੧॥
ਚਰਨ ਪ੍ਰਭੂ ਕੇ ਬੋਹਿਥੁ ਪਾਏ ਭਵ ਸਾਗਰੁ ਪਾਰਿ ਪਰਾਹੀ ॥
ਸੰਤ ਸੇਵਕ ਭਗਤ ਹਰਿ ਤਾ ਕੇ ਨਾਨਕ ਮਨੁ ਲਾਗਾ ਹੈ ਤਾਹੀ ॥੨॥੧੪॥੧੦੦॥
ਮਨ ਤਨ ਅੰਤਰਿ ਪ੍ਰਭੁ ਆਹੀ ॥
ਹਰਿ ਗੁਨ ਗਾਵਤ ਪਰਉਪਕਾਰ ਨਿਤ ਤਿਸੁ ਰਸਨਾ ਕਾ ਮੋਲੁ ਕਿਛੁ ਨਾਹੀ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਕੁਲ ਸਮੂਹ ਉਧਰੇ ਖਿਨ ਭੀਤਰਿ ਜਨਮ ਜਨਮ ਕੀ ਮਲੁ ਲਾਹੀ ॥
ਸਿਮਰਿ ਸਿਮਰਿ ਸੁਆਮੀ ਪ੍ਰਭੁ ਅਪਨਾ ਅਨਦ ਸੇਤੀ ਬਿਖਿਆ ਬਨੁ ਗਾਹੀ ॥੧॥
ਚਰਨ ਪ੍ਰਭੂ ਕੇ ਬੋਹਿਥੁ ਪਾਏ ਭਵ ਸਾਗਰੁ ਪਾਰਿ ਪਰਾਹੀ ॥
ਸੰਤ ਸੇਵਕ ਭਗਤ ਹਰਿ ਤਾ ਕੇ ਨਾਨਕ ਮਨੁ ਲਾਗਾ ਹੈ ਤਾਹੀ ॥੨॥੧੪॥੧੦੦॥
बिलावलु महला ५ ॥
मन तन अंतरि प्रभु आही ॥
हरि गुन गावत परउपकार नित तिसु रसना का मोलु किछु नाही ॥१॥ रहाउ ॥
कुल समूह उधरे खिन भीतरि जनम जनम की मलु लाही ॥
सिमरि सिमरि सुआमी प्रभु अपना अनद सेती बिखिआ बनु गाही ॥१॥
चरन प्रभू के बोहिथु पाए भव सागरु पारि पराही ॥
संत सेवक भगत हरि ता के नानक मनु लागा है ताही ॥२॥१४॥१००॥
मन तन अंतरि प्रभु आही ॥
हरि गुन गावत परउपकार नित तिसु रसना का मोलु किछु नाही ॥१॥ रहाउ ॥
कुल समूह उधरे खिन भीतरि जनम जनम की मलु लाही ॥
सिमरि सिमरि सुआमी प्रभु अपना अनद सेती बिखिआ बनु गाही ॥१॥
चरन प्रभू के बोहिथु पाए भव सागरु पारि पराही ॥
संत सेवक भगत हरि ता के नानक मनु लागा है ताही ॥२॥१४॥१००॥
हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला ५ ॥ हे भाई ! जिस मनुष्य के मन में तन में (हृदय में) (सदा) प्रभू बसता है। प्रभू के गुण गाते हुए। दूसरे की भलाई की बातें हमेशा करते हुए। उस मनुष्य की जीभ अमल्य हो जाती है। 1। रहाउ। हे भाई ! अपने मालिक प्रभू का नाम सदा सिमर के (सिमरन करने वाले संत-भगत) माया (के संसार-) जंगल से बड़े ही मजे पार लांघ जाते हैं। वे अपनी जन्मों-जन्मों के किए कर्मों की मैल उतार लेते हैं। उनकी सारी कुलें भी छिन में (संसार-जंगल में से) बच के निकल जाती हैं। 1। हे भाई ! जो मनुष्य परमात्मा के चरणों का जहाज़ प्राप्त कर लेते हैं। वे संसार-समुंद्र से पार लांघ जाते हैं। हे नानक ! वही मनुष्य उस प्रभू के संत हैं। भगत हैं। सेवक हैं। उनका मन उस प्रभू में ही सदा टिका रहता है। 2। 14। 100।
ਬਿਲਾਵਲੁ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਧੀਰਉ ਦੇਖਿ ਤੁਮੑਾਰੈ ਰੰਗਾ ॥
ਤੁਹੀ ਸੁਆਮੀ ਅੰਤਰਜਾਮੀ ਤੂਹੀ ਵਸਹਿ ਸਾਧ ਕੈ ਸੰਗਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਖਿਨ ਮਹਿ ਥਾਪਿ ਨਿਵਾਜੇ ਠਾਕੁਰ ਨੀਚ ਕੀਟ ਤੇ ਕਰਹਿ ਰਾਜੰਗਾ ॥੧॥
ਕਬਹੂ ਨ ਬਿਸਰੈ ਹੀਏ ਮੋਰੇ ਤੇ ਨਾਨਕ ਦਾਸ ਇਹੀ ਦਾਨੁ ਮੰਗਾ ॥੨॥੧੫॥੧੦੧॥
ਧੀਰਉ ਦੇਖਿ ਤੁਮੑਾਰੈ ਰੰਗਾ ॥
ਤੁਹੀ ਸੁਆਮੀ ਅੰਤਰਜਾਮੀ ਤੂਹੀ ਵਸਹਿ ਸਾਧ ਕੈ ਸੰਗਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਖਿਨ ਮਹਿ ਥਾਪਿ ਨਿਵਾਜੇ ਠਾਕੁਰ ਨੀਚ ਕੀਟ ਤੇ ਕਰਹਿ ਰਾਜੰਗਾ ॥੧॥
ਕਬਹੂ ਨ ਬਿਸਰੈ ਹੀਏ ਮੋਰੇ ਤੇ ਨਾਨਕ ਦਾਸ ਇਹੀ ਦਾਨੁ ਮੰਗਾ ॥੨॥੧੫॥੧੦੧॥
बिलावलु महला ५ ॥
धीरउ देखि तुम॑ारै रंगा ॥
तुही सुआमी अंतरजामी तूही वसहि साध कै संगा ॥१॥ रहाउ ॥
खिन महि थापि निवाजे ठाकुर नीच कीट ते करहि राजंगा ॥१॥
कबहू न बिसरै हीए मोरे ते नानक दास इही दानु मंगा ॥२॥१५॥१०१॥
धीरउ देखि तुम॑ारै रंगा ॥
तुही सुआमी अंतरजामी तूही वसहि साध कै संगा ॥१॥ रहाउ ॥
खिन महि थापि निवाजे ठाकुर नीच कीट ते करहि राजंगा ॥१॥
कबहू न बिसरै हीए मोरे ते नानक दास इही दानु मंगा ॥२॥१५॥१०१॥
हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला ५ ॥ हे प्रभू ! तेरे चोज-तमाशे देख-देख के मुझे (भी) हौसला बन रहा है (कि तू मेरी भी सहायता करेगा)। तू ही (हमारा) मालिक है। तू ही हमारे दिलों की जानने वाला है। तू ही (हरेक) साधु-जन के साथ बसता है। 1। रहाउ। हे मालिक ! तू नीच कीड़ों (जैसे नाचीज़ बंदों) को राजा बना देता है। तू एक छिन में ही (नीच लोगों को) थापणा दे के आदर-सम्मान वाले बना देता है। 1। हे दास नानक ! (कह-हे प्रभू ! मेहर कर। तेरा नाम) मेरे हृदय में से कभी ना भूले। (तेरे दर से) मैं ख़ैर माँगता हूँ। 2। 15। 101।
ਬਿਲਾਵਲੁ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਅਚੁਤ ਪੂਜਾ ਜੋਗ ਗੋਪਾਲ ॥
ਮਨੁ ਤਨੁ ਅਰਪਿ ਰਖਉ ਹਰਿ ਆਗੈ ਸਰਬ ਜੀਆ ਕਾ ਹੈ ਪ੍ਰਤਿਪਾਲ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਸਰਨਿ ਸਮ੍ਰਥ ਅਕਥ ਸੁਖਦਾਤਾ ਕਿਰਪਾ ਸਿੰਧੁ ਬਡੋ ਦਇਆਲ ॥
ਕੰਠਿ ਲਾਇ ਰਾਖੈ ਅਪਨੇ ਕਉ ਤਿਸ ਨੋ ਲਗੈ ਨ ਤਾਤੀ ਬਾਲ ॥੧॥
ਦਾਮੋਦਰ ਦਇਆਲ ਸੁਆਮੀ ਸਰਬਸੁ ਸੰਤ ਜਨਾ ਧਨ ਮਾਲ ॥
ਨਾਨਕ ਜਾਚਿਕ ਦਰਸੁ ਪ੍ਰਭ ਮਾਗੈ ਸੰਤ ਜਨਾ ਕੀ ਮਿਲੈ ਰਵਾਲ ॥੨॥੧੬॥੧੦੨॥
ਅਚੁਤ ਪੂਜਾ ਜੋਗ ਗੋਪਾਲ ॥
ਮਨੁ ਤਨੁ ਅਰਪਿ ਰਖਉ ਹਰਿ ਆਗੈ ਸਰਬ ਜੀਆ ਕਾ ਹੈ ਪ੍ਰਤਿਪਾਲ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਸਰਨਿ ਸਮ੍ਰਥ ਅਕਥ ਸੁਖਦਾਤਾ ਕਿਰਪਾ ਸਿੰਧੁ ਬਡੋ ਦਇਆਲ ॥
ਕੰਠਿ ਲਾਇ ਰਾਖੈ ਅਪਨੇ ਕਉ ਤਿਸ ਨੋ ਲਗੈ ਨ ਤਾਤੀ ਬਾਲ ॥੧॥
ਦਾਮੋਦਰ ਦਇਆਲ ਸੁਆਮੀ ਸਰਬਸੁ ਸੰਤ ਜਨਾ ਧਨ ਮਾਲ ॥
ਨਾਨਕ ਜਾਚਿਕ ਦਰਸੁ ਪ੍ਰਭ ਮਾਗੈ ਸੰਤ ਜਨਾ ਕੀ ਮਿਲੈ ਰਵਾਲ ॥੨॥੧੬॥੧੦੨॥
बिलावलु महला ५ ॥
अचुत पूजा जोग गोपाल ॥
मनु तनु अरपि रखउ हरि आगै सरब जीआ का है प्रतिपाल ॥१॥ रहाउ ॥
सरनि सम्रथ अकथ सुखदाता किरपा सिंधु बडो दइआल ॥
कंठि लाइ राखै अपने कउ तिस नो लगै न ताती बाल ॥१॥
दामोदर दइआल सुआमी सरबसु संत जना धन माल ॥
नानक जाचिक दरसु प्रभ मागै संत जना की मिलै रवाल ॥२॥१६॥१०२॥
अचुत पूजा जोग गोपाल ॥
मनु तनु अरपि रखउ हरि आगै सरब जीआ का है प्रतिपाल ॥१॥ रहाउ ॥
सरनि सम्रथ अकथ सुखदाता किरपा सिंधु बडो दइआल ॥
कंठि लाइ राखै अपने कउ तिस नो लगै न ताती बाल ॥१॥
दामोदर दइआल सुआमी सरबसु संत जना धन माल ॥
नानक जाचिक दरसु प्रभ मागै संत जना की मिलै रवाल ॥२॥१६॥१०२॥
हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला ५ ॥ हे भाई ! धरती का रखवाला और अबिनाशी प्रभू ही पूजा का हकदार है। मैं अपना मन और अपना तन भेटा करके उस प्रभू के आगे (ही) रखता हूँ। वह प्रभू सारे जीवों को पालने वाला है। 1। रहाउ। हे भाई ! प्रभू शरण पड़े जीव की रक्षा करने के समर्थ है। उसके स्वरूप का बयान नहीं किया जा सकता। वह सारे सुखों को देने वाला है। कृपा का समुंद्र है। बड़ा ही दयालु है। वह प्रभू अपने (सेवक) को अपने गले से लगा के रखता है। (फिर) उस (सेवक) को कोई दुख-कलेश रक्ती भर भी छू नहीं सकता। 1। हे भाई ! परमात्मा दया का घर है। सबका मालिक है। संतजनों के वास्ते वही धन माल है और सब कुछ है। उस प्रभू (के दर) का मंगता नानक उसके दर्शन की खैर माँगता है (और अरजोई करता है कि उसके) संत जनों के चरणों की धूल मिल जाएं2। 16। 102।
ਬਿਲਾਵਲੁ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਸਿਮਰਤ ਨਾਮੁ ਕੋਟਿ ਜਤਨ ਭਏ ॥
ਸਾਧਸੰਗਿ ਮਿਲਿ ਹਰਿ ਗੁਨ ਗਾਏ ਜਮਦੂਤਨ ਕਉ ਤ੍ਰਾਸ ਅਹੇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਜੇਤੇ ਪੁਨਹਚਰਨ ਸੇ ਕੀਨੑੇ ਮਨਿ ਤਨਿ ਪ੍ਰਭ ਕੇ ਚਰਣ ਗਹੇ ॥
ਆਵਣ ਜਾਣੁ ਭਰਮੁ ਭਉ ਨਾਠਾ ਜਨਮ ਜਨਮ ਕੇ ਕਿਲਵਿਖ ਦਹੇ ॥੧॥
ਨਿਰਭਉ ਹੋਇ ਭਜਹੁ ਜਗਦੀਸੈ ਏਹੁ ਪਦਾਰਥੁ ਵਡਭਾਗਿ ਲਹੇ ॥
ਸਿਮਰਤ ਨਾਮੁ ਕੋਟਿ ਜਤਨ ਭਏ ॥
ਸਾਧਸੰਗਿ ਮਿਲਿ ਹਰਿ ਗੁਨ ਗਾਏ ਜਮਦੂਤਨ ਕਉ ਤ੍ਰਾਸ ਅਹੇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਜੇਤੇ ਪੁਨਹਚਰਨ ਸੇ ਕੀਨੑੇ ਮਨਿ ਤਨਿ ਪ੍ਰਭ ਕੇ ਚਰਣ ਗਹੇ ॥
ਆਵਣ ਜਾਣੁ ਭਰਮੁ ਭਉ ਨਾਠਾ ਜਨਮ ਜਨਮ ਕੇ ਕਿਲਵਿਖ ਦਹੇ ॥੧॥
ਨਿਰਭਉ ਹੋਇ ਭਜਹੁ ਜਗਦੀਸੈ ਏਹੁ ਪਦਾਰਥੁ ਵਡਭਾਗਿ ਲਹੇ ॥
बिलावलु महला ५ ॥
सिमरत नामु कोटि जतन भए ॥
साधसंगि मिलि हरि गुन गाए जमदूतन कउ त्रास अहे ॥१॥ रहाउ ॥
जेते पुनहचरन से कीन॑े मनि तनि प्रभ के चरण गहे ॥
आवण जाणु भरमु भउ नाठा जनम जनम के किलविख दहे ॥१॥
निरभउ होइ भजहु जगदीसै एहु पदारथु वडभागि लहे ॥
सिमरत नामु कोटि जतन भए ॥
साधसंगि मिलि हरि गुन गाए जमदूतन कउ त्रास अहे ॥१॥ रहाउ ॥
जेते पुनहचरन से कीन॑े मनि तनि प्रभ के चरण गहे ॥
आवण जाणु भरमु भउ नाठा जनम जनम के किलविख दहे ॥१॥
निरभउ होइ भजहु जगदीसै एहु पदारथु वडभागि लहे ॥
हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला ५ ॥ हे भाई ! परमात्मा का नाम सिमरने से (तीर्थ। कर्म-काण्ड आदि) करोड़ों ही उद्यम (मानों अपने आप) हो जाते हैं। (जिस मनुष्य ने) गुरू की संगति में मिल के प्रभू के गुण गाने शुरू कर दिए। जमदूतों को (उसके नजदीक जाने से) डर आने लग पड़ा। 1। रहाउ। हे भाई ! जिस मनुष्य ने प्रभू के चरण अपने मन में अपने दिल में बसा लिए। उसने (पिछले कर्मों के संस्कारों को मिटाने के लिए। मानो) सारे ही प्रायश्चित कर्म कर लिए। उसके जनम-मरण का चक्कर समाप्त हो गया। उसका हरेक भ्रम डर दूर हो गया। उसके अनेकों जन्मों के किए पाप जल गए। 1। (इसलिए। हे भाई !) निडर हो के (कर्मकाण्ड का भ्रम उतार के) जगत के मालिक प्रभू का नाम जपा करो। ये नाम-पदार्थ बड़ी किस्मत से मिलता है।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 824 है, राग बिलावल का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।
M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।
दिल्ली-यूनिवर्सिटी के North Campus में exam-season की tension।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 35 पंक्तियों का है, 6 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 824” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: बिलावल राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 825 →, पीछे का: ← अंग 823।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।