अंग
822
राग बिलावल
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਦ੍ਰਿਸਟਿ ਨ ਆਵਹਿ ਅੰਧ ਅਗਿਆਨੀ ਸੋਇ ਰਹਿਓ ਮਦ ਮਾਵਤ ਹੇ ॥੩॥
ਜਾਲੁ ਪਸਾਰਿ ਚੋਗ ਬਿਸਥਾਰੀ ਪੰਖੀ ਜਿਉ ਫਾਹਾਵਤ ਹੇ ॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਬੰਧਨ ਕਾਟਨ ਕਉ ਮੈ ਸਤਿਗੁਰੁ ਪੁਰਖੁ ਧਿਆਵਤ ਹੇ ॥੪॥੨॥੮੮॥
ਜਾਲੁ ਪਸਾਰਿ ਚੋਗ ਬਿਸਥਾਰੀ ਪੰਖੀ ਜਿਉ ਫਾਹਾਵਤ ਹੇ ॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਬੰਧਨ ਕਾਟਨ ਕਉ ਮੈ ਸਤਿਗੁਰੁ ਪੁਰਖੁ ਧਿਆਵਤ ਹੇ ॥੪॥੨॥੮੮॥
द्रिसटि न आवहि अंध अगिआनी सोइ रहिओ मद मावत हे ॥३॥
जालु पसारि चोग बिसथारी पंखी जिउ फाहावत हे ॥
कहु नानक बंधन काटन कउ मै सतिगुरु पुरखु धिआवत हे ॥४॥२॥८८॥
जालु पसारि चोग बिसथारी पंखी जिउ फाहावत हे ॥
कहु नानक बंधन काटन कउ मै सतिगुरु पुरखु धिआवत हे ॥४॥२॥८८॥
हिन्दी अर्थ: तू विकारों के नशे में मस्त हो के आत्मिक जीवन की ओर से बेफिक्र हुआ पड़ा है। 3। हे भाई ! जैसे किसी पंछी को पकड़ने के लिए जाल बिखरा के उसके ऊपर दाने बिखेरे जाते हैं। वैसे ही तू ( भी दुनिया के पदार्थों की चोग के चक्कर में) फस रहा है। हे नानक ! कह- (हे भाई !) माया के बँधनों को काटने के लिए मैं तो गुरू महापुरुख को अपने हृदय में बसा रहा हूँ। 4। 2। 88।
ਬਿਲਾਵਲੁ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਹਰਿ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਅਪਾਰ ਅਮੋਲੀ ॥
ਪ੍ਰਾਨ ਪਿਆਰੋ ਮਨਹਿ ਅਧਾਰੋ ਚੀਤਿ ਚਿਤਵਉ ਜੈਸੇ ਪਾਨ ਤੰਬੋਲੀ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਸਹਜਿ ਸਮਾਇਓ ਗੁਰਹਿ ਬਤਾਇਓ ਰੰਗਿ ਰੰਗੀ ਮੇਰੇ ਤਨ ਕੀ ਚੋਲੀ ॥
ਪ੍ਰਿਅ ਮੁਖਿ ਲਾਗੋ ਜਉ ਵਡਭਾਗੋ ਸੁਹਾਗੁ ਹਮਾਰੋ ਕਤਹੁ ਨ ਡੋਲੀ ॥੧॥
ਰੂਪ ਨ ਧੂਪ ਨ ਗੰਧ ਨ ਦੀਪਾ ਓਤਿ ਪੋਤਿ ਅੰਗ ਅੰਗ ਸੰਗਿ ਮਉਲੀ ॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਪ੍ਰਿਅ ਰਵੀ ਸੁਹਾਗਨਿ ਅਤਿ ਨੀਕੀ ਮੇਰੀ ਬਨੀ ਖਟੋਲੀ ॥੨॥੩॥੮੯॥
ਹਰਿ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਅਪਾਰ ਅਮੋਲੀ ॥
ਪ੍ਰਾਨ ਪਿਆਰੋ ਮਨਹਿ ਅਧਾਰੋ ਚੀਤਿ ਚਿਤਵਉ ਜੈਸੇ ਪਾਨ ਤੰਬੋਲੀ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਸਹਜਿ ਸਮਾਇਓ ਗੁਰਹਿ ਬਤਾਇਓ ਰੰਗਿ ਰੰਗੀ ਮੇਰੇ ਤਨ ਕੀ ਚੋਲੀ ॥
ਪ੍ਰਿਅ ਮੁਖਿ ਲਾਗੋ ਜਉ ਵਡਭਾਗੋ ਸੁਹਾਗੁ ਹਮਾਰੋ ਕਤਹੁ ਨ ਡੋਲੀ ॥੧॥
ਰੂਪ ਨ ਧੂਪ ਨ ਗੰਧ ਨ ਦੀਪਾ ਓਤਿ ਪੋਤਿ ਅੰਗ ਅੰਗ ਸੰਗਿ ਮਉਲੀ ॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਪ੍ਰਿਅ ਰਵੀ ਸੁਹਾਗਨਿ ਅਤਿ ਨੀਕੀ ਮੇਰੀ ਬਨੀ ਖਟੋਲੀ ॥੨॥੩॥੮੯॥
बिलावलु महला ५ ॥
हरि हरि नामु अपार अमोली ॥
प्रान पिआरो मनहि अधारो चीति चितवउ जैसे पान तंबोली ॥१॥ रहाउ ॥
सहजि समाइओ गुरहि बताइओ रंगि रंगी मेरे तन की चोली ॥
प्रिअ मुखि लागो जउ वडभागो सुहागु हमारो कतहु न डोली ॥१॥
रूप न धूप न गंध न दीपा ओति पोति अंग अंग संगि मउली ॥
कहु नानक प्रिअ रवी सुहागनि अति नीकी मेरी बनी खटोली ॥२॥३॥८९॥
हरि हरि नामु अपार अमोली ॥
प्रान पिआरो मनहि अधारो चीति चितवउ जैसे पान तंबोली ॥१॥ रहाउ ॥
सहजि समाइओ गुरहि बताइओ रंगि रंगी मेरे तन की चोली ॥
प्रिअ मुखि लागो जउ वडभागो सुहागु हमारो कतहु न डोली ॥१॥
रूप न धूप न गंध न दीपा ओति पोति अंग अंग संगि मउली ॥
कहु नानक प्रिअ रवी सुहागनि अति नीकी मेरी बनी खटोली ॥२॥३॥८९॥
हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला ५ ॥ (हे सहेली !) बेअंत हरी का नाम किसी दुनियावी पदार्थ के बदले में नहीं मिल सकता। वह हरी का नाम मेरी जिंद का प्यारा बन गया है। मेरे मन का सहारा बन गया है। जैसे कोई पान बेचने वाली (अपने) पानों का ख्याल रखती है। वैसे ही मैं हरी-नाम को अपने चिक्त में चितारती रहती हूँ। 1। रहाउ। (हे सखी !) जब गुरू ने मुझे (भेद) बता दिया। तो मैं आत्मिक अडोलता में लीन हो गई। अब मेरी शरीर चोली प्रभू के प्रेम रंग में रंगी गई है। जब से (गुरू की कृपा से) मेरे अहो भाग्य जाग उठे हैं तब से मुझे प्यारे के दर्शन हो रहे हैं। अब मेरा ये सोहाग (मेरे सिर से) दूर नहीं होएगा। 1। (हे सखी !) ना कोई सुंदर पदार्थ। ना कोई धूप। ना सुगंधियाँ। ना दीए (-कोई भी ऐसे पदार्थ मैंने अपने पति देव के आगे भेटा नहीं किए। गुरू की कृपा से ही) मेरा स्वै प्रभू-पति के साथ एक-मेक हो गया है। उसके साथ मिल के मेरा मन खिल उठा है। हे नानक ! कह- (हे सहेली !) प्यारे प्रभू ने मुझे सुहागिन बना के अपने साथ मिला लिया है। अब मेरी हृदय-सेज बहुत ही सुंदर बन गई है। 2। 3। 89।
ਬਿਲਾਵਲੁ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਗੋਬਿੰਦ ਗੋਬਿੰਦ ਗੋਬਿੰਦ ਮਈ ॥
ਜਬ ਤੇ ਭੇਟੇ ਸਾਧ ਦਇਆਰਾ ਤਬ ਤੇ ਦੁਰਮਤਿ ਦੂਰਿ ਭਈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਪੂਰਨ ਪੂਰਿ ਰਹਿਓ ਸੰਪੂਰਨ ਸੀਤਲ ਸਾਂਤਿ ਦਇਆਲ ਦਈ ॥
ਕਾਮ ਕ੍ਰੋਧ ਤ੍ਰਿਸਨਾ ਅਹੰਕਾਰਾ ਤਨ ਤੇ ਹੋਏ ਸਗਲ ਖਈ ॥੧॥
ਸਤੁ ਸੰਤੋਖੁ ਦਇਆ ਧਰਮੁ ਸੁਚਿ ਸੰਤਨ ਤੇ ਇਹੁ ਮੰਤੁ ਲਈ ॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਜਿਨਿ ਮਨਹੁ ਪਛਾਨਿਆ ਤਿਨ ਕਉ ਸਗਲੀ ਸੋਝ ਪਈ ॥੨॥੪॥੯੦॥
ਗੋਬਿੰਦ ਗੋਬਿੰਦ ਗੋਬਿੰਦ ਮਈ ॥
ਜਬ ਤੇ ਭੇਟੇ ਸਾਧ ਦਇਆਰਾ ਤਬ ਤੇ ਦੁਰਮਤਿ ਦੂਰਿ ਭਈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਪੂਰਨ ਪੂਰਿ ਰਹਿਓ ਸੰਪੂਰਨ ਸੀਤਲ ਸਾਂਤਿ ਦਇਆਲ ਦਈ ॥
ਕਾਮ ਕ੍ਰੋਧ ਤ੍ਰਿਸਨਾ ਅਹੰਕਾਰਾ ਤਨ ਤੇ ਹੋਏ ਸਗਲ ਖਈ ॥੧॥
ਸਤੁ ਸੰਤੋਖੁ ਦਇਆ ਧਰਮੁ ਸੁਚਿ ਸੰਤਨ ਤੇ ਇਹੁ ਮੰਤੁ ਲਈ ॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਜਿਨਿ ਮਨਹੁ ਪਛਾਨਿਆ ਤਿਨ ਕਉ ਸਗਲੀ ਸੋਝ ਪਈ ॥੨॥੪॥੯੦॥
बिलावलु महला ५ ॥
गोबिंद गोबिंद गोबिंद मई ॥
जब ते भेटे साध दइआरा तब ते दुरमति दूरि भई ॥१॥ रहाउ ॥
पूरन पूरि रहिओ संपूरन सीतल सांति दइआल दई ॥
काम क्रोध त्रिसना अहंकारा तन ते होए सगल खई ॥१॥
सतु संतोखु दइआ धरमु सुचि संतन ते इहु मंतु लई ॥
कहु नानक जिनि मनहु पछानिआ तिन कउ सगली सोझ पई ॥२॥४॥९०॥
गोबिंद गोबिंद गोबिंद मई ॥
जब ते भेटे साध दइआरा तब ते दुरमति दूरि भई ॥१॥ रहाउ ॥
पूरन पूरि रहिओ संपूरन सीतल सांति दइआल दई ॥
काम क्रोध त्रिसना अहंकारा तन ते होए सगल खई ॥१॥
सतु संतोखु दइआ धरमु सुचि संतन ते इहु मंतु लई ॥
कहु नानक जिनि मनहु पछानिआ तिन कउ सगली सोझ पई ॥२॥४॥९०॥
हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला ५ ॥ सदा गोबिंद का नाम सिमर-सिमर के वह गोबिंद का ही रूप हो जाता है। हे भाई ! जब से (किसी मनुष्य को) दया का श्रोत गुरू मिल जाता है। तब से (उसके अंदर से) खोटी मति दूर हो जाती है। 1। रहाउ। (हे भाई ! जब किसी मनुष्य को गुरू मिल जाता है तब उसे निश्चय हो जाता है कि) दया और शांति का पुँज सारे गुणों से भरपूर प्यारा प्रभू हर जगह व्यापक है। (सिमरन की बरकति से) उसके शरीर में से काम-क्रोध-तृष्णा-अहंकार आदि सारे विकार नाश हो जाते हैं। 1। (हे भाई ! जब किसी मनुष्य को गुरू मिल जाता है। वह) सेवा। संतोख। दया। धर्म। पवित्र जीवन (अपने अंदर पैदा करने का) यह उपदेश संतजनों से ग्रहण करता है। हे नानक ! कह- जिस जिस मनुष्य ने अपने मन के द्वारा (गुरू के साथ) सांझ बनाई। उन्हें (ऊँचे आत्मिक जीवन की) सारी समझ आ गई। 2। 4। 90।
ਬਿਲਾਵਲੁ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਕਿਆ ਹਮ ਜੀਅ ਜੰਤ ਬੇਚਾਰੇ ਬਰਨਿ ਨ ਸਾਕਹ ਏਕ ਰੋਮਾਈ ॥
ਬ੍ਰਹਮ ਮਹੇਸ ਸਿਧ ਮੁਨਿ ਇੰਦ੍ਰਾ ਬੇਅੰਤ ਠਾਕੁਰ ਤੇਰੀ ਗਤਿ ਨਹੀ ਪਾਈ ॥੧॥
ਕਿਆ ਕਥੀਐ ਕਿਛੁ ਕਥਨੁ ਨ ਜਾਈ ॥
ਜਹ ਜਹ ਦੇਖਾ ਤਹ ਰਹਿਆ ਸਮਾਈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਜਹ ਮਹਾ ਭਇਆਨ ਦੂਖ ਜਮ ਸੁਨੀਐ ਤਹ ਮੇਰੇ ਪ੍ਰਭ ਤੂਹੈ ਸਹਾਈ ॥
ਸਰਨਿ ਪਰਿਓ ਹਰਿ ਚਰਨ ਗਹੇ ਪ੍ਰਭ ਗੁਰਿ ਨਾਨਕ ਕਉ ਬੂਝ ਬੁਝਾਈ ॥੨॥੫॥੯੧॥
ਕਿਆ ਹਮ ਜੀਅ ਜੰਤ ਬੇਚਾਰੇ ਬਰਨਿ ਨ ਸਾਕਹ ਏਕ ਰੋਮਾਈ ॥
ਬ੍ਰਹਮ ਮਹੇਸ ਸਿਧ ਮੁਨਿ ਇੰਦ੍ਰਾ ਬੇਅੰਤ ਠਾਕੁਰ ਤੇਰੀ ਗਤਿ ਨਹੀ ਪਾਈ ॥੧॥
ਕਿਆ ਕਥੀਐ ਕਿਛੁ ਕਥਨੁ ਨ ਜਾਈ ॥
ਜਹ ਜਹ ਦੇਖਾ ਤਹ ਰਹਿਆ ਸਮਾਈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਜਹ ਮਹਾ ਭਇਆਨ ਦੂਖ ਜਮ ਸੁਨੀਐ ਤਹ ਮੇਰੇ ਪ੍ਰਭ ਤੂਹੈ ਸਹਾਈ ॥
ਸਰਨਿ ਪਰਿਓ ਹਰਿ ਚਰਨ ਗਹੇ ਪ੍ਰਭ ਗੁਰਿ ਨਾਨਕ ਕਉ ਬੂਝ ਬੁਝਾਈ ॥੨॥੫॥੯੧॥
बिलावलु महला ५ ॥
किआ हम जीअ जंत बेचारे बरनि न साकह एक रोमाई ॥
ब्रहम महेस सिध मुनि इंद्रा बेअंत ठाकुर तेरी गति नही पाई ॥१॥
किआ कथीऐ किछु कथनु न जाई ॥
जह जह देखा तह रहिआ समाई ॥१॥ रहाउ ॥
जह महा भइआन दूख जम सुनीऐ तह मेरे प्रभ तूहै सहाई ॥
सरनि परिओ हरि चरन गहे प्रभ गुरि नानक कउ बूझ बुझाई ॥२॥५॥९१॥
किआ हम जीअ जंत बेचारे बरनि न साकह एक रोमाई ॥
ब्रहम महेस सिध मुनि इंद्रा बेअंत ठाकुर तेरी गति नही पाई ॥१॥
किआ कथीऐ किछु कथनु न जाई ॥
जह जह देखा तह रहिआ समाई ॥१॥ रहाउ ॥
जह महा भइआन दूख जम सुनीऐ तह मेरे प्रभ तूहै सहाई ॥
सरनि परिओ हरि चरन गहे प्रभ गुरि नानक कउ बूझ बुझाई ॥२॥५॥९१॥
हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला ५ ॥ हे मेरे मालिक ! (हम जीव तेरे पैदा किए हुए हैं) हम बिचारे जीवों की कोई बिसात ही नहीं कि तेरी बाबत एक रोम जितना भी कुछ कह सकें। (हम साधारण जीव तो किसी गिनती में ही नहीं) ब्रहमा। शिव। सिद्ध। मुनी। इन्द्र (आदि जैसे) बेअंत ये समझ नहीं सके कि तू कैसा है। 1। हे भाई ! (परमात्मा कैसा है। – ये बात) क्या बताएं। बताई नहीं जा सकती। मैं तो जिधर देखता हूँ। उधर परमात्मा ही सब जगह मौजूद है। 1। रहाउ। हे मेरे प्रभू ! जहाँ ये सुना जाता है कि जमों के बड़े ही भयानक दुख मिलते हैं। वहीं तू ही (बचाने के लिए) मददगार है- गुरू ने (मुझे) नानक को यह समझ दी है। तभी मैं नानक तेरी शरण आ पड़ा हूँ। तेरे चरण पकड़ लिए हैं। 2। 5। 91।
ਬਿਲਾਵਲੁ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਅਗਮ ਰੂਪ ਅਬਿਨਾਸੀ ਕਰਤਾ ਪਤਿਤ ਪਵਿਤ ਇਕ ਨਿਮਖ ਜਪਾਈਐ ॥
ਅਚਰਜੁ ਸੁਨਿਓ ਪਰਾਪਤਿ ਭੇਟੁਲੇ ਸੰਤ ਚਰਨ ਚਰਨ ਮਨੁ ਲਾਈਐ ॥੧॥
ਕਿਤੁ ਬਿਧੀਐ ਕਿਤੁ ਸੰਜਮਿ ਪਾਈਐ ॥
ਕਹੁ ਸੁਰਜਨ ਕਿਤੁ ਜੁਗਤੀ ਧਿਆਈਐ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਜੋ ਮਾਨੁਖੁ ਮਾਨੁਖ ਕੀ ਸੇਵਾ ਓਹੁ ਤਿਸ ਕੀ ਲਈ ਲਈ ਫੁਨਿ ਜਾਈਐ ॥
ਨਾਨਕ ਸਰਨਿ ਸਰਣਿ ਸੁਖ ਸਾਗਰ ਮੋਹਿ ਟੇਕ ਤੇਰੋ ਇਕ ਨਾਈਐ ॥੨॥੬॥੯੨॥
ਅਗਮ ਰੂਪ ਅਬਿਨਾਸੀ ਕਰਤਾ ਪਤਿਤ ਪਵਿਤ ਇਕ ਨਿਮਖ ਜਪਾਈਐ ॥
ਅਚਰਜੁ ਸੁਨਿਓ ਪਰਾਪਤਿ ਭੇਟੁਲੇ ਸੰਤ ਚਰਨ ਚਰਨ ਮਨੁ ਲਾਈਐ ॥੧॥
ਕਿਤੁ ਬਿਧੀਐ ਕਿਤੁ ਸੰਜਮਿ ਪਾਈਐ ॥
ਕਹੁ ਸੁਰਜਨ ਕਿਤੁ ਜੁਗਤੀ ਧਿਆਈਐ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਜੋ ਮਾਨੁਖੁ ਮਾਨੁਖ ਕੀ ਸੇਵਾ ਓਹੁ ਤਿਸ ਕੀ ਲਈ ਲਈ ਫੁਨਿ ਜਾਈਐ ॥
ਨਾਨਕ ਸਰਨਿ ਸਰਣਿ ਸੁਖ ਸਾਗਰ ਮੋਹਿ ਟੇਕ ਤੇਰੋ ਇਕ ਨਾਈਐ ॥੨॥੬॥੯੨॥
बिलावलु महला ५ ॥
अगम रूप अबिनासी करता पतित पवित इक निमख जपाईऐ ॥
अचरजु सुनिओ परापति भेटुले संत चरन चरन मनु लाईऐ ॥१॥
कितु बिधीऐ कितु संजमि पाईऐ ॥
कहु सुरजन कितु जुगती धिआईऐ ॥१॥ रहाउ ॥
जो मानुखु मानुख की सेवा ओहु तिस की लई लई फुनि जाईऐ ॥
नानक सरनि सरणि सुख सागर मोहि टेक तेरो इक नाईऐ ॥२॥६॥९२॥
अगम रूप अबिनासी करता पतित पवित इक निमख जपाईऐ ॥
अचरजु सुनिओ परापति भेटुले संत चरन चरन मनु लाईऐ ॥१॥
कितु बिधीऐ कितु संजमि पाईऐ ॥
कहु सुरजन कितु जुगती धिआईऐ ॥१॥ रहाउ ॥
जो मानुखु मानुख की सेवा ओहु तिस की लई लई फुनि जाईऐ ॥
नानक सरनि सरणि सुख सागर मोहि टेक तेरो इक नाईऐ ॥२॥६॥९२॥
हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला ५ ॥ हे भाई ! विकारियों को पवित्र करने वाले। अपहुँच हस्ती वाले नाश-रहित करतार को हर पल जपते रहना चाहिए। ये सुनते हैं कि वह आश्चर्य है आश्चर्य है। (उससे) मिलाप हो जाता है अगर संतजनों के चरणों से मिलाप प्राप्त हो जाए। (तो संतजनों के) चरणों में मन जोड़ना चाहिए। 1। किस बिधि से। किस संजम से वह मिल सकता है। हे भले पुरुष ! (मुझे) बताओ कि परमात्मा को किस तरीके से सिमरना चाहिए। 1। रहाउ हे नानक ! (कह- हे प्रभू !) जो मनुष्य किसी और मनुष्य की (कोई) सेवा करता है वह उसकी की हुई सेवा को सदा ही बार-बार याद करता रहता है; पर हे प्रभू ! तू सुखों का समुंद्र है (तू अनेकों ही सुख बख्शता है इस वास्ते) मैं सदा तेरी ही शरण तेरी ही शरण पड़ा रहूँगा। मुझे सिर्फ तेरे नाम का ही सहारा है। 2। 6। 92।
ਬਿਲਾਵਲੁ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਸੰਤ ਸਰਣਿ ਸੰਤ ਟਹਲ ਕਰੀ ॥
ਧੰਧੁ ਬੰਧੁ ਅਰੁ ਸਗਲ ਜੰਜਾਰੋ ਅਵਰ ਕਾਜ ਤੇ ਛੂਟਿ ਪਰੀ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਸੂਖ ਸਹਜ ਅਰੁ ਘਨੋ ਅਨੰਦਾ ਗੁਰ ਤੇ ਪਾਇਓ ਨਾਮੁ ਹਰੀ ॥
ਸੰਤ ਸਰਣਿ ਸੰਤ ਟਹਲ ਕਰੀ ॥
ਧੰਧੁ ਬੰਧੁ ਅਰੁ ਸਗਲ ਜੰਜਾਰੋ ਅਵਰ ਕਾਜ ਤੇ ਛੂਟਿ ਪਰੀ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਸੂਖ ਸਹਜ ਅਰੁ ਘਨੋ ਅਨੰਦਾ ਗੁਰ ਤੇ ਪਾਇਓ ਨਾਮੁ ਹਰੀ ॥
बिलावलु महला ५ ॥
संत सरणि संत टहल करी ॥
धंधु बंधु अरु सगल जंजारो अवर काज ते छूटि परी ॥१॥ रहाउ ॥
सूख सहज अरु घनो अनंदा गुर ते पाइओ नामु हरी ॥
संत सरणि संत टहल करी ॥
धंधु बंधु अरु सगल जंजारो अवर काज ते छूटि परी ॥१॥ रहाउ ॥
सूख सहज अरु घनो अनंदा गुर ते पाइओ नामु हरी ॥
हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला ५ ॥ हे भाई ! जब मैं गुरू की शरण आ पड़ा। जब मैं गुरू की सेवा करने लग पड़ा। (मेरे अंदर से) धंधा। बंधन और सारा जंजाल (समाप्त हो गए)। मेरी बिरती और और काम से मुक्त हो गई। 2। हे भाई ! गुरू से मैंने परमात्मा का नाम प्राप्त हासिल कर लिया (जिसकी बरकति से) आत्मिक अडोलता का सुख और आनंद (मेरे अंदर उत्पन्न हो गया)।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 822 है, राग बिलावल का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।
M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।
Noida के office-tower की 15वीं मंज़िल से शाम का Delhi-view।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 35 पंक्तियों का है, 6 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 822” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: बिलावल राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 823 →, पीछे का: ← अंग 821।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।