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अंग 841

अंग
841
राग बिलावल
राग: बिलावल · रचयिता: Guru Amar Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
बिलावलु महला 3 वार सत घरु 10
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
आदित वारि आदि पुरखु है सोई ॥
आपे वरतै अवरु न कोई ॥
ओति पोति जगु रहिआ परोई ॥
आपे करता करै सु होई ॥
नामि रते सदा सुखु होई ॥
गुरमुखि विरला बूझै कोई ॥1॥
हिरदै जपनी जपउ गुणतासा ॥
हरि अगम अगोचरु अपरंपर सुआमी जन पगि लगि धिआवउ होइ दासनि दासा ॥1॥ रहाउ ॥
सोमवारि सचि रहिआ समाइ ॥
तिस की कीमति कही न जाइ ॥
आखि आखि रहे सभि लिव लाइ ॥
जिसु देवै तिसु पलै पाइ ॥
अगम अगोचरु लखिआ न जाइ ॥
गुर कै सबदि हरि रहिआ समाइ ॥2॥
मंगलि माइआ मोहु उपाइआ ॥
आपे सिरि सिरि धंधै लाइआ ॥
आपि बुझाए सोई बूझै ॥
गुर कै सबदि दरु घरु सूझै ॥
प्रेम भगति करे लिव लाइ ॥
हउमै ममता सबदि जलाइ ॥3॥
बुधवारि आपे बुधि सारु ॥
गुरमुखि करणी सबदु वीचारु ॥
नामि रते मनु निरमलु होइ ॥
हरि गुण गावै हउमै मलु खोइ ॥
दरि सचै सद सोभा पाए ॥
नामि रते गुर सबदि सुहाए ॥4॥
लाहा नामु पाए गुर दुआरि ॥
आपे देवै देवणहारु ॥
जो देवै तिस कउ बलि जाईऐ ॥
गुर परसादी आपु गवाईऐ ॥
नानक नामु रखहु उर धारि ॥
देवणहारे कउ जैकारु ॥5॥
वीरवारि वीर भरमि भुलाए ॥
प्रेत भूत सभि दूजै लाए ॥
आपि उपाए करि वेखै वेका ॥
सभना करते तेरी टेका ॥
जीअ जंत तेरी सरणाई ॥
सो मिलै जिसु लैहि मिलाई ॥6॥
सुक्रवारि प्रभु रहिआ समाई ॥
आपि उपाइ सभ कीमति पाई ॥
गुरमुखि होवै सु करै बीचारु ॥
सचु संजमु करणी है कार ॥
वरतु नेमु निताप्रति पूजा ॥ बिनु बूझे सभु भाउ है दूजा ॥7॥
छनिछरवारि सउण सासत बीचारु ॥
हउमै मेरा भरमै संसारु ॥
मनमुखु अंधा दूजै भाइ ॥
जम दरि बाधा चोटा खाइ ॥
गुर परसादी सदा सुखु पाए ॥
सचु करणी साचि लिव लाए ॥8॥
सतिगुरु सेवहि से वडभागी ॥
हउमै मारि सचि लिव लागी ॥
तेरै रंगि राते सहजि सुभाइ ॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला 3 वार सत घरु 10 सतिगुर प्रसादि ॥ हे भाई ! ऐतवार के द्वारा। (यह समझ की सारे जगत का) मूल वह अकाल-पुरख स्वयं ही सर्व व्यापक है (सब जगह) मौजूद है (उसके बिना) और कोई नहीं। वह परमात्मा सारे जगत को ताने-पेटे की तरह (अपनी रज़ा में) परो रहा है। (जगत में) वही कुछ होता है जो करतार स्वयं ही करता है। उसके नाम में रंगे हुए मनुष्य को सदा आत्मिक आनंद मिलता है। पर कोई दुलर्भ (विरला) मनुष्य (इस बात को) समझता है। 1। हे भाई ! मैं (अपने) हृदय में गुणों के खजाने (परमात्मा के नाम) को जपता हूँ (यही है मेरी) माला। परमात्मा अपहुँच है। परे से परे है। सबका मालिक है। उस तक ज्ञान इन्द्रियों की पहुँच नहीं हो सकती। मैं तो संत जनों के चरणों में लग के संत जनों का दासों का दास बन के उसको सिमरता हूँ। 1। रहाउ। हे भाई ! (जो मनुष्य गुरू के शबद के द्वारा) सदा-थिर परमात्मा (की याद) में लीन हुआ रहता है (उसका आत्मिक जीवन इतना ऊँचा हो जाता है कि) उसका मूल्य नहीं आँका जा सकता। (अपने उद्यम से सुरति जोड़ने वाले और सिफत-सालाह करने वाले मनुष्य) सिफतें कह कह के और सुरति जोड़-जोड़ के ही थक जाते हैं। (पर यह सिमरन और याद की दाति) जिस (मनुष्य) को (परमात्मा स्वयं) देता है। उसको (ही) मिलती है। हे भाई ! परमात्मा अपहुँच है। ज्ञान-इन्द्रियों की पहुँच से परे है। उसका सही स्वरूप बयान नहीं किया जा सकता। गुरू के शबद द्वारा (ही मनुष्य) परमात्मा में लीन रह सकता है। 2। हे भाई ! (परमात्मा ने) माया का मोह (स्वयं ही) पैदा किया है। खुद ही (इस मोह को) हरेक (जीव के) सिर पर (स्थापित करके हरेक को माया के) धंधे में लगाया हुआ है। जिस मनुष्य को (परमात्मा) स्वयं समझ बख्शता है। वही (इस मोह की खेल को) समझता है। गुरू के शबद की बरकति से उसको (परमात्मा का) दर-घर दिख जाता है। वह मनुष्य सुरति जोड़ के प्रेम से परमात्मा की भक्ति करता है। (और। इस तरह) शबद की बरकति से (अपने अंदर से) अहंकार और (माया की) ममता को जला देता है। 3। हे भाई ! (परमात्मा) स्वयं ही (मनुष्य को) गुरू की शरण में रख के श्रेष्ठ बुद्धि। ऊँचा आचरण। सिफत सालाह और (अपने गुणों की) विचार (बख्शता है। इस तरह उसके) नाम में रंगे हुए मनुष्य का मन पवित्र हो जाता है। (मनुष्य अपने अंदर से) अहंकार की मैल दूर करके परमात्मा के गुण गाता रहता है। और सदा-स्थिर प्रभू के दर पर सदा शोभा कमाता है। हे भाई ! गुरू के शबद के द्वारा परमात्मा के नाम में रंगे हुए मनुष्य सुंदर आत्मिक जीवन वाले बन जाते हैं। 4। हे भाई ! गुरू के दर पे (रह के मनुष्य परमात्मा का) नाम-लाभ कमा लेता है। (पर ये दाति है। और यह दाति) देने की समर्था वाला प्रभू स्वयं ही देता है। सो। जो प्रभू (यह दाति) देता है उससे (सदा) सदके जाना चाहिए। गुरू की कृपा से (अपने अंदर से) स्वै भाव (अहंकार) दूर करना चाहिए। हे नानक ! (कह- हे भाई !) परमात्मा का नाम अपने दिल में बसाए रखो। और। उस सब कुछ दे सकने वाले प्रभू की सिफत सालाह हमेशा करते रहो। 5। हे भाई ! (बावन) वीरों को (भी परमात्मा ने) भटकना में डाल के (माया के मोह में) भुलाए रखा। सारे भूत-प्रेत भी माया के मोह में लगाए हुए हैं। परमात्मा ने खुद (ही ये सारे) पैदा किए। (इनको) अलग-अलग किस्मों के बना के (सबकी) संभाल (भी) करता है। हे करतार ! सब जीवों को आपका ही आसरा है। सारे जीव-जंतु आपकी ही शरण में हैं। वह मनुष्य (ही आपको) मिलता है जिसको आप खुद (अपने साथ) मिलाता है। 6। हे भाई ! (सारी सृष्टि में) परमात्मा व्यापक है। (सृष्टि को) खुद (ही) पैदा करके सारी सृष्टि की कद्र भी खुद ही जानता है। जो मनुष्य गुरू के सन्मुख होता है। वह मनुष्य (परमात्मा के गुणों को) अपने मन में बसाता है। सदा-स्थिर हरी-नाम का सिमरन। और इन्द्रियों को विकारों से बचाए रखने का उद्यम- यह उस मनुष्य का नित्य का कर्तव्य। नित्य की कार हो जाती है। पर। व्रत रखना। कर्म-काण्ड के हरेक नियम निबाहने। रोजाना देव-पूजा- आत्मिक जीवन की सूझ के बिना ये सारा उद्यम माया का प्यार (ही पैदा करने वाला) है। 7। हे भाई ! (परमात्मा का सिमरन छोड़ के) शोनक का ज्योतिष शास्त्र (आदि) विचारते रहना- (इसके कारण) जगत ममता और अहंकार में भटकता रहता है। आत्मिक जीवन से अंधा। अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य माया के मोह में फंसा रहता है। (ऐसा मनुष्य) जमराज के दर में बँधा हुआ (विकारों की) चोटें खाता रहता है। वह मनुष्य गुरू की कृपा से सदा आत्मिक आनंद पाता है जो सदा-स्थिर हरी-नाम-सिमरन को (अपना रोजाना) का कर्तव्य बनाता है और सदा-स्थिर प्रभू में सुरति जोड़े रखता है। 8। हे भाई ! वह मनुष्य बहुत भाग्यशाली होते हैं जो गुरू की शरण पड़ते हैं। (अपने अंदर से) अहंकार को समाप्त करके (उनकी) सुरति सदा कायम रहने वाले परमात्मा में लग जाती है। हे प्रभू ! (गुरू की शरण आने वाले मनुष्य) आपके प्यार-रंग में टिके रहते हैं।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। सूही, बिलावल, और गोंड राग का क्षेत्र। गुरु राम दास की ‘लावां’ इसी सूही राग में बँधी, सोलहवीं सदी के मध्य की।

गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर वर्ष की आयु में गुरु-गद्दी सँभाली, 1552 में, और 1574 तक रहे। उनकी वाणी में बुढ़ापे, समाज की संरचना, और संगति की चिन्ताएँ बार-बार लौटती हैं। उन्होंने ही लंगर (साझा-भोजन) की व्यवस्था मज़बूत की, और देश-भर में बाईस मंजी (केन्द्र) स्थापित किए।

इस अंग पर एक ही शबद है, और उसकी पहली पंक्तियाँ यह कहती हैं: “बिलावलु महला 3 वार सत घरु 10 सतिगुर प्रसादि ॥ हे भाई ! ऐतवार के द्वारा।”

एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
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