अंग
841
राग बिलावल
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਬਿਲਾਵਲੁ ਮਹਲਾ ੩ ਵਾਰ ਸਤ ਘਰੁ ੧੦
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ਆਦਿਤ ਵਾਰਿ ਆਦਿ ਪੁਰਖੁ ਹੈ ਸੋਈ ॥
ਆਪੇ ਵਰਤੈ ਅਵਰੁ ਨ ਕੋਈ ॥
ਓਤਿ ਪੋਤਿ ਜਗੁ ਰਹਿਆ ਪਰੋਈ ॥
ਆਪੇ ਕਰਤਾ ਕਰੈ ਸੁ ਹੋਈ ॥
ਨਾਮਿ ਰਤੇ ਸਦਾ ਸੁਖੁ ਹੋਈ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਵਿਰਲਾ ਬੂਝੈ ਕੋਈ ॥੧॥
ਹਿਰਦੈ ਜਪਨੀ ਜਪਉ ਗੁਣਤਾਸਾ ॥
ਹਰਿ ਅਗਮ ਅਗੋਚਰੁ ਅਪਰੰਪਰ ਸੁਆਮੀ ਜਨ ਪਗਿ ਲਗਿ ਧਿਆਵਉ ਹੋਇ ਦਾਸਨਿ ਦਾਸਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਸੋਮਵਾਰਿ ਸਚਿ ਰਹਿਆ ਸਮਾਇ ॥
ਤਿਸ ਕੀ ਕੀਮਤਿ ਕਹੀ ਨ ਜਾਇ ॥
ਆਖਿ ਆਖਿ ਰਹੇ ਸਭਿ ਲਿਵ ਲਾਇ ॥
ਜਿਸੁ ਦੇਵੈ ਤਿਸੁ ਪਲੈ ਪਾਇ ॥
ਅਗਮ ਅਗੋਚਰੁ ਲਖਿਆ ਨ ਜਾਇ ॥
ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦਿ ਹਰਿ ਰਹਿਆ ਸਮਾਇ ॥੨॥
ਮੰਗਲਿ ਮਾਇਆ ਮੋਹੁ ਉਪਾਇਆ ॥
ਆਪੇ ਸਿਰਿ ਸਿਰਿ ਧੰਧੈ ਲਾਇਆ ॥
ਆਪਿ ਬੁਝਾਏ ਸੋਈ ਬੂਝੈ ॥
ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦਿ ਦਰੁ ਘਰੁ ਸੂਝੈ ॥
ਪ੍ਰੇਮ ਭਗਤਿ ਕਰੇ ਲਿਵ ਲਾਇ ॥
ਹਉਮੈ ਮਮਤਾ ਸਬਦਿ ਜਲਾਇ ॥੩॥
ਬੁਧਵਾਰਿ ਆਪੇ ਬੁਧਿ ਸਾਰੁ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਕਰਣੀ ਸਬਦੁ ਵੀਚਾਰੁ ॥
ਨਾਮਿ ਰਤੇ ਮਨੁ ਨਿਰਮਲੁ ਹੋਇ ॥
ਹਰਿ ਗੁਣ ਗਾਵੈ ਹਉਮੈ ਮਲੁ ਖੋਇ ॥
ਦਰਿ ਸਚੈ ਸਦ ਸੋਭਾ ਪਾਏ ॥
ਨਾਮਿ ਰਤੇ ਗੁਰ ਸਬਦਿ ਸੁਹਾਏ ॥੪॥
ਲਾਹਾ ਨਾਮੁ ਪਾਏ ਗੁਰ ਦੁਆਰਿ ॥
ਆਪੇ ਦੇਵੈ ਦੇਵਣਹਾਰੁ ॥
ਜੋ ਦੇਵੈ ਤਿਸ ਕਉ ਬਲਿ ਜਾਈਐ ॥
ਗੁਰ ਪਰਸਾਦੀ ਆਪੁ ਗਵਾਈਐ ॥
ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਰਖਹੁ ਉਰ ਧਾਰਿ ॥
ਦੇਵਣਹਾਰੇ ਕਉ ਜੈਕਾਰੁ ॥੫॥
ਵੀਰਵਾਰਿ ਵੀਰ ਭਰਮਿ ਭੁਲਾਏ ॥
ਪ੍ਰੇਤ ਭੂਤ ਸਭਿ ਦੂਜੈ ਲਾਏ ॥
ਆਪਿ ਉਪਾਏ ਕਰਿ ਵੇਖੈ ਵੇਕਾ ॥
ਸਭਨਾ ਕਰਤੇ ਤੇਰੀ ਟੇਕਾ ॥
ਜੀਅ ਜੰਤ ਤੇਰੀ ਸਰਣਾਈ ॥
ਸੋ ਮਿਲੈ ਜਿਸੁ ਲੈਹਿ ਮਿਲਾਈ ॥੬॥
ਸੁਕ੍ਰਵਾਰਿ ਪ੍ਰਭੁ ਰਹਿਆ ਸਮਾਈ ॥
ਆਪਿ ਉਪਾਇ ਸਭ ਕੀਮਤਿ ਪਾਈ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਹੋਵੈ ਸੁ ਕਰੈ ਬੀਚਾਰੁ ॥
ਸਚੁ ਸੰਜਮੁ ਕਰਣੀ ਹੈ ਕਾਰ ॥
ਵਰਤੁ ਨੇਮੁ ਨਿਤਾਪ੍ਰਤਿ ਪੂਜਾ ॥ ਬਿਨੁ ਬੂਝੇ ਸਭੁ ਭਾਉ ਹੈ ਦੂਜਾ ॥੭॥
ਛਨਿਛਰਵਾਰਿ ਸਉਣ ਸਾਸਤ ਬੀਚਾਰੁ ॥
ਹਉਮੈ ਮੇਰਾ ਭਰਮੈ ਸੰਸਾਰੁ ॥
ਮਨਮੁਖੁ ਅੰਧਾ ਦੂਜੈ ਭਾਇ ॥
ਜਮ ਦਰਿ ਬਾਧਾ ਚੋਟਾ ਖਾਇ ॥
ਗੁਰ ਪਰਸਾਦੀ ਸਦਾ ਸੁਖੁ ਪਾਏ ॥
ਸਚੁ ਕਰਣੀ ਸਾਚਿ ਲਿਵ ਲਾਏ ॥੮॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਸੇਵਹਿ ਸੇ ਵਡਭਾਗੀ ॥
ਹਉਮੈ ਮਾਰਿ ਸਚਿ ਲਿਵ ਲਾਗੀ ॥
ਤੇਰੈ ਰੰਗਿ ਰਾਤੇ ਸਹਜਿ ਸੁਭਾਇ ॥
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ਆਦਿਤ ਵਾਰਿ ਆਦਿ ਪੁਰਖੁ ਹੈ ਸੋਈ ॥
ਆਪੇ ਵਰਤੈ ਅਵਰੁ ਨ ਕੋਈ ॥
ਓਤਿ ਪੋਤਿ ਜਗੁ ਰਹਿਆ ਪਰੋਈ ॥
ਆਪੇ ਕਰਤਾ ਕਰੈ ਸੁ ਹੋਈ ॥
ਨਾਮਿ ਰਤੇ ਸਦਾ ਸੁਖੁ ਹੋਈ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਵਿਰਲਾ ਬੂਝੈ ਕੋਈ ॥੧॥
ਹਿਰਦੈ ਜਪਨੀ ਜਪਉ ਗੁਣਤਾਸਾ ॥
ਹਰਿ ਅਗਮ ਅਗੋਚਰੁ ਅਪਰੰਪਰ ਸੁਆਮੀ ਜਨ ਪਗਿ ਲਗਿ ਧਿਆਵਉ ਹੋਇ ਦਾਸਨਿ ਦਾਸਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਸੋਮਵਾਰਿ ਸਚਿ ਰਹਿਆ ਸਮਾਇ ॥
ਤਿਸ ਕੀ ਕੀਮਤਿ ਕਹੀ ਨ ਜਾਇ ॥
ਆਖਿ ਆਖਿ ਰਹੇ ਸਭਿ ਲਿਵ ਲਾਇ ॥
ਜਿਸੁ ਦੇਵੈ ਤਿਸੁ ਪਲੈ ਪਾਇ ॥
ਅਗਮ ਅਗੋਚਰੁ ਲਖਿਆ ਨ ਜਾਇ ॥
ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦਿ ਹਰਿ ਰਹਿਆ ਸਮਾਇ ॥੨॥
ਮੰਗਲਿ ਮਾਇਆ ਮੋਹੁ ਉਪਾਇਆ ॥
ਆਪੇ ਸਿਰਿ ਸਿਰਿ ਧੰਧੈ ਲਾਇਆ ॥
ਆਪਿ ਬੁਝਾਏ ਸੋਈ ਬੂਝੈ ॥
ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦਿ ਦਰੁ ਘਰੁ ਸੂਝੈ ॥
ਪ੍ਰੇਮ ਭਗਤਿ ਕਰੇ ਲਿਵ ਲਾਇ ॥
ਹਉਮੈ ਮਮਤਾ ਸਬਦਿ ਜਲਾਇ ॥੩॥
ਬੁਧਵਾਰਿ ਆਪੇ ਬੁਧਿ ਸਾਰੁ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਕਰਣੀ ਸਬਦੁ ਵੀਚਾਰੁ ॥
ਨਾਮਿ ਰਤੇ ਮਨੁ ਨਿਰਮਲੁ ਹੋਇ ॥
ਹਰਿ ਗੁਣ ਗਾਵੈ ਹਉਮੈ ਮਲੁ ਖੋਇ ॥
ਦਰਿ ਸਚੈ ਸਦ ਸੋਭਾ ਪਾਏ ॥
ਨਾਮਿ ਰਤੇ ਗੁਰ ਸਬਦਿ ਸੁਹਾਏ ॥੪॥
ਲਾਹਾ ਨਾਮੁ ਪਾਏ ਗੁਰ ਦੁਆਰਿ ॥
ਆਪੇ ਦੇਵੈ ਦੇਵਣਹਾਰੁ ॥
ਜੋ ਦੇਵੈ ਤਿਸ ਕਉ ਬਲਿ ਜਾਈਐ ॥
ਗੁਰ ਪਰਸਾਦੀ ਆਪੁ ਗਵਾਈਐ ॥
ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਰਖਹੁ ਉਰ ਧਾਰਿ ॥
ਦੇਵਣਹਾਰੇ ਕਉ ਜੈਕਾਰੁ ॥੫॥
ਵੀਰਵਾਰਿ ਵੀਰ ਭਰਮਿ ਭੁਲਾਏ ॥
ਪ੍ਰੇਤ ਭੂਤ ਸਭਿ ਦੂਜੈ ਲਾਏ ॥
ਆਪਿ ਉਪਾਏ ਕਰਿ ਵੇਖੈ ਵੇਕਾ ॥
ਸਭਨਾ ਕਰਤੇ ਤੇਰੀ ਟੇਕਾ ॥
ਜੀਅ ਜੰਤ ਤੇਰੀ ਸਰਣਾਈ ॥
ਸੋ ਮਿਲੈ ਜਿਸੁ ਲੈਹਿ ਮਿਲਾਈ ॥੬॥
ਸੁਕ੍ਰਵਾਰਿ ਪ੍ਰਭੁ ਰਹਿਆ ਸਮਾਈ ॥
ਆਪਿ ਉਪਾਇ ਸਭ ਕੀਮਤਿ ਪਾਈ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਹੋਵੈ ਸੁ ਕਰੈ ਬੀਚਾਰੁ ॥
ਸਚੁ ਸੰਜਮੁ ਕਰਣੀ ਹੈ ਕਾਰ ॥
ਵਰਤੁ ਨੇਮੁ ਨਿਤਾਪ੍ਰਤਿ ਪੂਜਾ ॥ ਬਿਨੁ ਬੂਝੇ ਸਭੁ ਭਾਉ ਹੈ ਦੂਜਾ ॥੭॥
ਛਨਿਛਰਵਾਰਿ ਸਉਣ ਸਾਸਤ ਬੀਚਾਰੁ ॥
ਹਉਮੈ ਮੇਰਾ ਭਰਮੈ ਸੰਸਾਰੁ ॥
ਮਨਮੁਖੁ ਅੰਧਾ ਦੂਜੈ ਭਾਇ ॥
ਜਮ ਦਰਿ ਬਾਧਾ ਚੋਟਾ ਖਾਇ ॥
ਗੁਰ ਪਰਸਾਦੀ ਸਦਾ ਸੁਖੁ ਪਾਏ ॥
ਸਚੁ ਕਰਣੀ ਸਾਚਿ ਲਿਵ ਲਾਏ ॥੮॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਸੇਵਹਿ ਸੇ ਵਡਭਾਗੀ ॥
ਹਉਮੈ ਮਾਰਿ ਸਚਿ ਲਿਵ ਲਾਗੀ ॥
ਤੇਰੈ ਰੰਗਿ ਰਾਤੇ ਸਹਜਿ ਸੁਭਾਇ ॥
बिलावलु महला ३ वार सत घरु १०
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
आदित वारि आदि पुरखु है सोई ॥
आपे वरतै अवरु न कोई ॥
ओति पोति जगु रहिआ परोई ॥
आपे करता करै सु होई ॥
नामि रते सदा सुखु होई ॥
गुरमुखि विरला बूझै कोई ॥१॥
हिरदै जपनी जपउ गुणतासा ॥
हरि अगम अगोचरु अपरंपर सुआमी जन पगि लगि धिआवउ होइ दासनि दासा ॥१॥ रहाउ ॥
सोमवारि सचि रहिआ समाइ ॥
तिस की कीमति कही न जाइ ॥
आखि आखि रहे सभि लिव लाइ ॥
जिसु देवै तिसु पलै पाइ ॥
अगम अगोचरु लखिआ न जाइ ॥
गुर कै सबदि हरि रहिआ समाइ ॥२॥
मंगलि माइआ मोहु उपाइआ ॥
आपे सिरि सिरि धंधै लाइआ ॥
आपि बुझाए सोई बूझै ॥
गुर कै सबदि दरु घरु सूझै ॥
प्रेम भगति करे लिव लाइ ॥
हउमै ममता सबदि जलाइ ॥३॥
बुधवारि आपे बुधि सारु ॥
गुरमुखि करणी सबदु वीचारु ॥
नामि रते मनु निरमलु होइ ॥
हरि गुण गावै हउमै मलु खोइ ॥
दरि सचै सद सोभा पाए ॥
नामि रते गुर सबदि सुहाए ॥४॥
लाहा नामु पाए गुर दुआरि ॥
आपे देवै देवणहारु ॥
जो देवै तिस कउ बलि जाईऐ ॥
गुर परसादी आपु गवाईऐ ॥
नानक नामु रखहु उर धारि ॥
देवणहारे कउ जैकारु ॥५॥
वीरवारि वीर भरमि भुलाए ॥
प्रेत भूत सभि दूजै लाए ॥
आपि उपाए करि वेखै वेका ॥
सभना करते तेरी टेका ॥
जीअ जंत तेरी सरणाई ॥
सो मिलै जिसु लैहि मिलाई ॥६॥
सुक्रवारि प्रभु रहिआ समाई ॥
आपि उपाइ सभ कीमति पाई ॥
गुरमुखि होवै सु करै बीचारु ॥
सचु संजमु करणी है कार ॥
वरतु नेमु निताप्रति पूजा ॥ बिनु बूझे सभु भाउ है दूजा ॥७॥
छनिछरवारि सउण सासत बीचारु ॥
हउमै मेरा भरमै संसारु ॥
मनमुखु अंधा दूजै भाइ ॥
जम दरि बाधा चोटा खाइ ॥
गुर परसादी सदा सुखु पाए ॥
सचु करणी साचि लिव लाए ॥८॥
सतिगुरु सेवहि से वडभागी ॥
हउमै मारि सचि लिव लागी ॥
तेरै रंगि राते सहजि सुभाइ ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
आदित वारि आदि पुरखु है सोई ॥
आपे वरतै अवरु न कोई ॥
ओति पोति जगु रहिआ परोई ॥
आपे करता करै सु होई ॥
नामि रते सदा सुखु होई ॥
गुरमुखि विरला बूझै कोई ॥१॥
हिरदै जपनी जपउ गुणतासा ॥
हरि अगम अगोचरु अपरंपर सुआमी जन पगि लगि धिआवउ होइ दासनि दासा ॥१॥ रहाउ ॥
सोमवारि सचि रहिआ समाइ ॥
तिस की कीमति कही न जाइ ॥
आखि आखि रहे सभि लिव लाइ ॥
जिसु देवै तिसु पलै पाइ ॥
अगम अगोचरु लखिआ न जाइ ॥
गुर कै सबदि हरि रहिआ समाइ ॥२॥
मंगलि माइआ मोहु उपाइआ ॥
आपे सिरि सिरि धंधै लाइआ ॥
आपि बुझाए सोई बूझै ॥
गुर कै सबदि दरु घरु सूझै ॥
प्रेम भगति करे लिव लाइ ॥
हउमै ममता सबदि जलाइ ॥३॥
बुधवारि आपे बुधि सारु ॥
गुरमुखि करणी सबदु वीचारु ॥
नामि रते मनु निरमलु होइ ॥
हरि गुण गावै हउमै मलु खोइ ॥
दरि सचै सद सोभा पाए ॥
नामि रते गुर सबदि सुहाए ॥४॥
लाहा नामु पाए गुर दुआरि ॥
आपे देवै देवणहारु ॥
जो देवै तिस कउ बलि जाईऐ ॥
गुर परसादी आपु गवाईऐ ॥
नानक नामु रखहु उर धारि ॥
देवणहारे कउ जैकारु ॥५॥
वीरवारि वीर भरमि भुलाए ॥
प्रेत भूत सभि दूजै लाए ॥
आपि उपाए करि वेखै वेका ॥
सभना करते तेरी टेका ॥
जीअ जंत तेरी सरणाई ॥
सो मिलै जिसु लैहि मिलाई ॥६॥
सुक्रवारि प्रभु रहिआ समाई ॥
आपि उपाइ सभ कीमति पाई ॥
गुरमुखि होवै सु करै बीचारु ॥
सचु संजमु करणी है कार ॥
वरतु नेमु निताप्रति पूजा ॥ बिनु बूझे सभु भाउ है दूजा ॥७॥
छनिछरवारि सउण सासत बीचारु ॥
हउमै मेरा भरमै संसारु ॥
मनमुखु अंधा दूजै भाइ ॥
जम दरि बाधा चोटा खाइ ॥
गुर परसादी सदा सुखु पाए ॥
सचु करणी साचि लिव लाए ॥८॥
सतिगुरु सेवहि से वडभागी ॥
हउमै मारि सचि लिव लागी ॥
तेरै रंगि राते सहजि सुभाइ ॥
हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला ३ वार सत घरु १० ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ हे भाई ! ऐतवार के द्वारा। (यह समझ की सारे जगत का) मूल वह अकाल-पुरख स्वयं ही सर्व व्यापक है (सब जगह) मौजूद है (उसके बिना) और कोई नहीं। वह परमात्मा सारे जगत को ताने-पेटे की तरह (अपनी रज़ा में) परो रहा है। (जगत में) वही कुछ होता है जो करतार स्वयं ही करता है। उसके नाम में रंगे हुए मनुष्य को सदा आत्मिक आनंद मिलता है। पर कोई दुलर्भ (विरला) मनुष्य (इस बात को) समझता है। 1। हे भाई ! मैं (अपने) हृदय में गुणों के खजाने (परमात्मा के नाम) को जपता हूँ (यही है मेरी) माला। परमात्मा अपहुँच है। परे से परे है। सबका मालिक है। उस तक ज्ञान इन्द्रियों की पहुँच नहीं हो सकती। मैं तो संत जनों के चरणों में लग के संत जनों का दासों का दास बन के उसको सिमरता हूँ। 1। रहाउ। हे भाई ! (जो मनुष्य गुरू के शबद के द्वारा) सदा-थिर परमात्मा (की याद) में लीन हुआ रहता है (उसका आत्मिक जीवन इतना ऊँचा हो जाता है कि) उसका मूल्य नहीं आँका जा सकता। (अपने उद्यम से सुरति जोड़ने वाले और सिफत-सालाह करने वाले मनुष्य) सिफतें कह कह के और सुरति जोड़-जोड़ के ही थक जाते हैं। (पर यह सिमरन और याद की दाति) जिस (मनुष्य) को (परमात्मा स्वयं) देता है। उसको (ही) मिलती है। हे भाई ! परमात्मा अपहुँच है। ज्ञान-इन्द्रियों की पहुँच से परे है। उसका सही स्वरूप बयान नहीं किया जा सकता। गुरू के शबद द्वारा (ही मनुष्य) परमात्मा में लीन रह सकता है। 2। हे भाई ! (परमात्मा ने) माया का मोह (स्वयं ही) पैदा किया है। खुद ही (इस मोह को) हरेक (जीव के) सिर पर (स्थापित करके हरेक को माया के) धंधे में लगाया हुआ है। जिस मनुष्य को (परमात्मा) स्वयं समझ बख्शता है। वही (इस मोह की खेल को) समझता है। गुरू के शबद की बरकति से उसको (परमात्मा का) दर-घर दिख जाता है। वह मनुष्य सुरति जोड़ के प्रेम से परमात्मा की भक्ति करता है। (और। इस तरह) शबद की बरकति से (अपने अंदर से) अहंकार और (माया की) ममता को जला देता है। 3। हे भाई ! (परमात्मा) स्वयं ही (मनुष्य को) गुरू की शरण में रख के श्रेष्ठ बुद्धि। ऊँचा आचरण। सिफत सालाह और (अपने गुणों की) विचार (बख्शता है। इस तरह उसके) नाम में रंगे हुए मनुष्य का मन पवित्र हो जाता है। (मनुष्य अपने अंदर से) अहंकार की मैल दूर करके परमात्मा के गुण गाता रहता है। और सदा-स्थिर प्रभू के दर पर सदा शोभा कमाता है। हे भाई ! गुरू के शबद के द्वारा परमात्मा के नाम में रंगे हुए मनुष्य सुंदर आत्मिक जीवन वाले बन जाते हैं। 4। हे भाई ! गुरू के दर पे (रह के मनुष्य परमात्मा का) नाम-लाभ कमा लेता है। (पर ये दाति है। और यह दाति) देने की समर्था वाला प्रभू स्वयं ही देता है। सो। जो प्रभू (यह दाति) देता है उससे (सदा) सदके जाना चाहिए। गुरू की कृपा से (अपने अंदर से) स्वै भाव (अहंकार) दूर करना चाहिए। हे नानक ! (कह- हे भाई !) परमात्मा का नाम अपने दिल में बसाए रखो। और। उस सब कुछ दे सकने वाले प्रभू की सिफत सालाह हमेशा करते रहो। 5। हे भाई ! (बावन) वीरों को (भी परमात्मा ने) भटकना में डाल के (माया के मोह में) भुलाए रखा। सारे भूत-प्रेत भी माया के मोह में लगाए हुए हैं। परमात्मा ने खुद (ही ये सारे) पैदा किए। (इनको) अलग-अलग किस्मों के बना के (सबकी) संभाल (भी) करता है। हे करतार ! सब जीवों को तेरा ही आसरा है। सारे जीव-जंतु तेरी ही शरण में हैं। वह मनुष्य (ही तुझे) मिलता है जिसको तू खुद (अपने साथ) मिलाता है। 6। हे भाई ! (सारी सृष्टि में) परमात्मा व्यापक है। (सृष्टि को) खुद (ही) पैदा करके सारी सृष्टि की कद्र भी खुद ही जानता है। जो मनुष्य गुरू के सन्मुख होता है। वह मनुष्य (परमात्मा के गुणों को) अपने मन में बसाता है। सदा-स्थिर हरी-नाम का सिमरन। और इन्द्रियों को विकारों से बचाए रखने का उद्यम- यह उस मनुष्य का नित्य का कर्तव्य। नित्य की कार हो जाती है। पर। व्रत रखना। कर्म-काण्ड के हरेक नियम निबाहने। रोजाना देव-पूजा- आत्मिक जीवन की सूझ के बिना ये सारा उद्यम माया का प्यार (ही पैदा करने वाला) है। 7। हे भाई ! (परमात्मा का सिमरन छोड़ के) शोनक का ज्योतिष शास्त्र (आदि) विचारते रहना- (इसके कारण) जगत ममता और अहंकार में भटकता रहता है। आत्मिक जीवन से अंधा। अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य माया के मोह में फंसा रहता है। (ऐसा मनुष्य) जमराज के दर में बँधा हुआ (विकारों की) चोटें खाता रहता है। वह मनुष्य गुरू की कृपा से सदा आत्मिक आनंद पाता है जो सदा-स्थिर हरी-नाम-सिमरन को (अपना रोजाना) का कर्तव्य बनाता है और सदा-स्थिर प्रभू में सुरति जोड़े रखता है।। 8। हे भाई ! वह मनुष्य बहुत भाग्यशाली होते हैं जो गुरू की शरण पड़ते हैं। (अपने अंदर से) अहंकार को समाप्त करके (उनकी) सुरति सदा कायम रहने वाले परमात्मा में लग जाती है। हे प्रभू ! (गुरू की शरण आने वाले मनुष्य) तेरे प्यार-रंग में टिके रहते हैं।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 841 है, राग बिलावल का हिस्सा। मुख्य रचयिता: Guru Amar Daas Ji।
Civil Services के interview के बाद का wait, घर का माहौल।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 54 पंक्तियों का है, 1 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 841” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: बिलावल राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 842 →, पीछे का: ← अंग 840।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।