अंग
832
राग बिलावल
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਬਿਲਾਵਲੁ ਮਹਲਾ ੧ ॥
ਮਨ ਕਾ ਕਹਿਆ ਮਨਸਾ ਕਰੈ ॥
ਇਹੁ ਮਨੁ ਪੁੰਨੁ ਪਾਪੁ ਉਚਰੈ ॥
ਮਾਇਆ ਮਦਿ ਮਾਤੇ ਤ੍ਰਿਪਤਿ ਨ ਆਵੈ ॥
ਤ੍ਰਿਪਤਿ ਮੁਕਤਿ ਮਨਿ ਸਾਚਾ ਭਾਵੈ ॥੧॥
ਤਨੁ ਧਨੁ ਕਲਤੁ ਸਭੁ ਦੇਖੁ ਅਭਿਮਾਨਾ ॥
ਬਿਨੁ ਨਾਵੈ ਕਿਛੁ ਸੰਗਿ ਨ ਜਾਨਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਕੀਚਹਿ ਰਸ ਭੋਗ ਖੁਸੀਆ ਮਨ ਕੇਰੀ ॥
ਧਨੁ ਲੋਕਾਂ ਤਨੁ ਭਸਮੈ ਢੇਰੀ ॥
ਖਾਕੂ ਖਾਕੁ ਰਲੈ ਸਭੁ ਫੈਲੁ ॥
ਬਿਨੁ ਸਬਦੈ ਨਹੀ ਉਤਰੈ ਮੈਲੁ ॥੨॥
ਗੀਤ ਰਾਗ ਘਨ ਤਾਲ ਸਿ ਕੂਰੇ ॥
ਤ੍ਰਿਹੁ ਗੁਣ ਉਪਜੈ ਬਿਨਸੈ ਦੂਰੇ ॥
ਦੂਜੀ ਦੁਰਮਤਿ ਦਰਦੁ ਨ ਜਾਇ ॥
ਛੂਟੈ ਗੁਰਮੁਖਿ ਦਾਰੂ ਗੁਣ ਗਾਇ ॥੩॥
ਧੋਤੀ ਊਜਲ ਤਿਲਕੁ ਗਲਿ ਮਾਲਾ ॥
ਅੰਤਰਿ ਕ੍ਰੋਧੁ ਪੜਹਿ ਨਾਟ ਸਾਲਾ ॥
ਨਾਮੁ ਵਿਸਾਰਿ ਮਾਇਆ ਮਦੁ ਪੀਆ ॥
ਬਿਨੁ ਗੁਰ ਭਗਤਿ ਨਾਹੀ ਸੁਖੁ ਥੀਆ ॥੪॥
ਸੂਕਰ ਸੁਆਨ ਗਰਧਭ ਮੰਜਾਰਾ ॥
ਪਸੂ ਮਲੇਛ ਨੀਚ ਚੰਡਾਲਾ ॥
ਗੁਰ ਤੇ ਮੁਹੁ ਫੇਰੇ ਤਿਨੑ ਜੋਨਿ ਭਵਾਈਐ ॥
ਬੰਧਨਿ ਬਾਧਿਆ ਆਈਐ ਜਾਈਐ ॥੫॥
ਗੁਰ ਸੇਵਾ ਤੇ ਲਹੈ ਪਦਾਰਥੁ ॥
ਹਿਰਦੈ ਨਾਮੁ ਸਦਾ ਕਿਰਤਾਰਥੁ ॥
ਸਾਚੀ ਦਰਗਹ ਪੂਛ ਨ ਹੋਇ ॥
ਮਾਨੇ ਹੁਕਮੁ ਸੀਝੈ ਦਰਿ ਸੋਇ ॥੬॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਮਿਲੈ ਤ ਤਿਸ ਕਉ ਜਾਣੈ ॥
ਰਹੈ ਰਜਾਈ ਹੁਕਮੁ ਪਛਾਣੈ ॥
ਹੁਕਮੁ ਪਛਾਣਿ ਸਚੈ ਦਰਿ ਵਾਸੁ ॥
ਕਾਲ ਬਿਕਾਲ ਸਬਦਿ ਭਏ ਨਾਸੁ ॥੭॥
ਰਹੈ ਅਤੀਤੁ ਜਾਣੈ ਸਭੁ ਤਿਸ ਕਾ ॥
ਤਨੁ ਮਨੁ ਅਰਪੈ ਹੈ ਇਹੁ ਜਿਸ ਕਾ ॥
ਨਾ ਓਹੁ ਆਵੈ ਨਾ ਓਹੁ ਜਾਇ ॥
ਨਾਨਕ ਸਾਚੇ ਸਾਚਿ ਸਮਾਇ ॥੮॥੨॥
ਮਨ ਕਾ ਕਹਿਆ ਮਨਸਾ ਕਰੈ ॥
ਇਹੁ ਮਨੁ ਪੁੰਨੁ ਪਾਪੁ ਉਚਰੈ ॥
ਮਾਇਆ ਮਦਿ ਮਾਤੇ ਤ੍ਰਿਪਤਿ ਨ ਆਵੈ ॥
ਤ੍ਰਿਪਤਿ ਮੁਕਤਿ ਮਨਿ ਸਾਚਾ ਭਾਵੈ ॥੧॥
ਤਨੁ ਧਨੁ ਕਲਤੁ ਸਭੁ ਦੇਖੁ ਅਭਿਮਾਨਾ ॥
ਬਿਨੁ ਨਾਵੈ ਕਿਛੁ ਸੰਗਿ ਨ ਜਾਨਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਕੀਚਹਿ ਰਸ ਭੋਗ ਖੁਸੀਆ ਮਨ ਕੇਰੀ ॥
ਧਨੁ ਲੋਕਾਂ ਤਨੁ ਭਸਮੈ ਢੇਰੀ ॥
ਖਾਕੂ ਖਾਕੁ ਰਲੈ ਸਭੁ ਫੈਲੁ ॥
ਬਿਨੁ ਸਬਦੈ ਨਹੀ ਉਤਰੈ ਮੈਲੁ ॥੨॥
ਗੀਤ ਰਾਗ ਘਨ ਤਾਲ ਸਿ ਕੂਰੇ ॥
ਤ੍ਰਿਹੁ ਗੁਣ ਉਪਜੈ ਬਿਨਸੈ ਦੂਰੇ ॥
ਦੂਜੀ ਦੁਰਮਤਿ ਦਰਦੁ ਨ ਜਾਇ ॥
ਛੂਟੈ ਗੁਰਮੁਖਿ ਦਾਰੂ ਗੁਣ ਗਾਇ ॥੩॥
ਧੋਤੀ ਊਜਲ ਤਿਲਕੁ ਗਲਿ ਮਾਲਾ ॥
ਅੰਤਰਿ ਕ੍ਰੋਧੁ ਪੜਹਿ ਨਾਟ ਸਾਲਾ ॥
ਨਾਮੁ ਵਿਸਾਰਿ ਮਾਇਆ ਮਦੁ ਪੀਆ ॥
ਬਿਨੁ ਗੁਰ ਭਗਤਿ ਨਾਹੀ ਸੁਖੁ ਥੀਆ ॥੪॥
ਸੂਕਰ ਸੁਆਨ ਗਰਧਭ ਮੰਜਾਰਾ ॥
ਪਸੂ ਮਲੇਛ ਨੀਚ ਚੰਡਾਲਾ ॥
ਗੁਰ ਤੇ ਮੁਹੁ ਫੇਰੇ ਤਿਨੑ ਜੋਨਿ ਭਵਾਈਐ ॥
ਬੰਧਨਿ ਬਾਧਿਆ ਆਈਐ ਜਾਈਐ ॥੫॥
ਗੁਰ ਸੇਵਾ ਤੇ ਲਹੈ ਪਦਾਰਥੁ ॥
ਹਿਰਦੈ ਨਾਮੁ ਸਦਾ ਕਿਰਤਾਰਥੁ ॥
ਸਾਚੀ ਦਰਗਹ ਪੂਛ ਨ ਹੋਇ ॥
ਮਾਨੇ ਹੁਕਮੁ ਸੀਝੈ ਦਰਿ ਸੋਇ ॥੬॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਮਿਲੈ ਤ ਤਿਸ ਕਉ ਜਾਣੈ ॥
ਰਹੈ ਰਜਾਈ ਹੁਕਮੁ ਪਛਾਣੈ ॥
ਹੁਕਮੁ ਪਛਾਣਿ ਸਚੈ ਦਰਿ ਵਾਸੁ ॥
ਕਾਲ ਬਿਕਾਲ ਸਬਦਿ ਭਏ ਨਾਸੁ ॥੭॥
ਰਹੈ ਅਤੀਤੁ ਜਾਣੈ ਸਭੁ ਤਿਸ ਕਾ ॥
ਤਨੁ ਮਨੁ ਅਰਪੈ ਹੈ ਇਹੁ ਜਿਸ ਕਾ ॥
ਨਾ ਓਹੁ ਆਵੈ ਨਾ ਓਹੁ ਜਾਇ ॥
ਨਾਨਕ ਸਾਚੇ ਸਾਚਿ ਸਮਾਇ ॥੮॥੨॥
बिलावलु महला १ ॥
मन का कहिआ मनसा करै ॥
इहु मनु पुंनु पापु उचरै ॥
माइआ मदि माते त्रिपति न आवै ॥
त्रिपति मुकति मनि साचा भावै ॥१॥
तनु धनु कलतु सभु देखु अभिमाना ॥
बिनु नावै किछु संगि न जाना ॥१॥ रहाउ ॥
कीचहि रस भोग खुसीआ मन केरी ॥
धनु लोकां तनु भसमै ढेरी ॥
खाकू खाकु रलै सभु फैलु ॥
बिनु सबदै नही उतरै मैलु ॥२॥
गीत राग घन ताल सि कूरे ॥
त्रिहु गुण उपजै बिनसै दूरे ॥
दूजी दुरमति दरदु न जाइ ॥
छूटै गुरमुखि दारू गुण गाइ ॥३॥
धोती ऊजल तिलकु गलि माला ॥
अंतरि क्रोधु पड़हि नाट साला ॥
नामु विसारि माइआ मदु पीआ ॥
बिनु गुर भगति नाही सुखु थीआ ॥४॥
सूकर सुआन गरधभ मंजारा ॥
पसू मलेछ नीच चंडाला ॥
गुर ते मुहु फेरे तिन॑ जोनि भवाईऐ ॥
बंधनि बाधिआ आईऐ जाईऐ ॥५॥
गुर सेवा ते लहै पदारथु ॥
हिरदै नामु सदा किरतारथु ॥
साची दरगह पूछ न होइ ॥
माने हुकमु सीझै दरि सोइ ॥६॥
सतिगुरु मिलै त तिस कउ जाणै ॥
रहै रजाई हुकमु पछाणै ॥
हुकमु पछाणि सचै दरि वासु ॥
काल बिकाल सबदि भए नासु ॥७॥
रहै अतीतु जाणै सभु तिस का ॥
तनु मनु अरपै है इहु जिस का ॥
ना ओहु आवै ना ओहु जाइ ॥
नानक साचे साचि समाइ ॥८॥२॥
मन का कहिआ मनसा करै ॥
इहु मनु पुंनु पापु उचरै ॥
माइआ मदि माते त्रिपति न आवै ॥
त्रिपति मुकति मनि साचा भावै ॥१॥
तनु धनु कलतु सभु देखु अभिमाना ॥
बिनु नावै किछु संगि न जाना ॥१॥ रहाउ ॥
कीचहि रस भोग खुसीआ मन केरी ॥
धनु लोकां तनु भसमै ढेरी ॥
खाकू खाकु रलै सभु फैलु ॥
बिनु सबदै नही उतरै मैलु ॥२॥
गीत राग घन ताल सि कूरे ॥
त्रिहु गुण उपजै बिनसै दूरे ॥
दूजी दुरमति दरदु न जाइ ॥
छूटै गुरमुखि दारू गुण गाइ ॥३॥
धोती ऊजल तिलकु गलि माला ॥
अंतरि क्रोधु पड़हि नाट साला ॥
नामु विसारि माइआ मदु पीआ ॥
बिनु गुर भगति नाही सुखु थीआ ॥४॥
सूकर सुआन गरधभ मंजारा ॥
पसू मलेछ नीच चंडाला ॥
गुर ते मुहु फेरे तिन॑ जोनि भवाईऐ ॥
बंधनि बाधिआ आईऐ जाईऐ ॥५॥
गुर सेवा ते लहै पदारथु ॥
हिरदै नामु सदा किरतारथु ॥
साची दरगह पूछ न होइ ॥
माने हुकमु सीझै दरि सोइ ॥६॥
सतिगुरु मिलै त तिस कउ जाणै ॥
रहै रजाई हुकमु पछाणै ॥
हुकमु पछाणि सचै दरि वासु ॥
काल बिकाल सबदि भए नासु ॥७॥
रहै अतीतु जाणै सभु तिस का ॥
तनु मनु अरपै है इहु जिस का ॥
ना ओहु आवै ना ओहु जाइ ॥
नानक साचे साचि समाइ ॥८॥२॥
हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला १ ॥ (प्रभू नाम से टूटे हुए मनुष्य की) बुद्धि (भी) मन के कहे में चलती है। और ये मन निरी यही बातें सोचता है कि (शास्त्रों की मर्यादा के अनुसार) पुन्न क्या है और पाप क्या है। माया के नशे में मस्त मनुष्य का (माया से ) पेट नहीं भरता। माया से तृप्ति और माया के मोह से खलासी तभी होती है जब मनुष्य को सदा-स्थिर रहने वाला प्रभू मन में प्यारा लगने लग जाता है। 1। हे अभिमानी जीव ! देख। ये शरीर। ये धन। ये स्त्री- ये सब (सदा साथ निभने वाले नहीं हैं) परमात्मा के नाम के बिना कोई चीज (जीव के) साथ नहीं जाती । 1। रहाउ। मयावी रसों के भोग किए जाते हैं। मन की मौजें माणी जाती हैं। (पर मौत आने पर) धन (और) लोगों का बन जाता है और ये शरीर मिट्टी की ढेरी हो जाता है। यह सारा ही पसारा (अंत में) ख़ाक में ही मिल जाता है (मन पर विषय-विकारों की मैल इकट्ठी होती जाती है। वह) मैल गुरू के शबद के बिना नहीं उतरती। 2। (प्रभू के नाम से टूट के) मनुष्य अनेकों किस्मों के गीत राग व ताल आदि में मन परचाता है पर ये सब झूठे उद्यम हैं (क्योंकि नाम के बिना जीव) तीन गुणों के असर तले पैदा होता मरता रहता है और (प्रभू-चरणों से) विछुड़ा रहता है। (इन गीतों-रागों की सहायता से जीव की) और चाहत (ज्यादा से ज्यादा मिलने के लालच। झाक) व दुमर्ति दूर नहीं होती। आत्मिक रोग नहीं जाता। (इस दूसरी झाक व दुमर्ति से। आत्मिक रोग से वह मनुष्य) खलासी पा लेता है जो गुरू के सन्मुख हो के परमात्मा के गुण गाता है (ये सिफत-सालाह ही इन रोगों का) दारू है। जो मनुष्य सफेद धोती पहनते हैं (माथे पर) तिलक लगाते हैं। गले में माला डालते हैं और (वेद आदि के मंत्र) पढ़ते हैं पर उनके अंदर क्रोध प्रबल है उनका उद्यम यूँ ही है जैसे किसी नाट्य-घर में (नाट्य-विद्या की सिखलाई कर करा रहे हैं)। जिन मनुष्यों ने परमात्मा का नाम भुला के माया (के मोह) की शराब पी हुई हो। (उनको सुख नहीं हो सकता)। गुरू के बिना प्रभू की भगती नहीं हो सकती। और भगती के बिना आत्मिक आनंद नहीं मिलता। 4। उन्हें सूअर-कुत्ते-गधे-बिल्ले- पशू-मलेछ-नीच-चण्डाल आदिक की जूनों में घुमाया जाता है। जिन लोगों ने अपना मुँह गुरू से मोड़ा हुआ है माया के मोह के बंधन में बंधा हुआ मनुष्य जनम-मरण के चक्कर में पड़ा रहता है। 5। गुरू की बताई हुई सेवा के द्वारा ही मनुष्य नाम-सरमाया प्राप्त करता है। जिस मनुष्य के हृदय में परमात्मा का नाम सदा बसता है वह (जीवन-यात्रा में) सफल हो गया है। परमात्मा की दरगाह में उससे लेखा नहीं मांगा जाता (क्योंकि उसके जिंमें कुछ भी बकाया नहीं निकलता)। जो मनुष्य परमात्मा की रजा को (सिर माथे) मानता है वह परमात्मा के दर पर कामयाब हो जाता है। 6। जब मनुष्य को गुरू मिल जाता है तो यह उस परमात्मा के साथ गहरी सांझ बना लेता है। परमात्मा की रजा को समझता है और रज़ा में (राज़ी) रहता है। सदा-स्थिर प्रभू की रजा को समझ के उसके दर पर जगह हासिल कर लेता है। गुरू के शबद के द्वारा उसके जनम-मरण (के चक्र) खत्म हो जाते हैं। 7। (सिमरन की बरकति से) जो मनुष्य (अंतरात्मे माया के मोह की ओर से) उपराम रहता है वह हरेक चीज को परमात्मा की (दी हुई) ही समझता है। जिस परमात्मा ने ये शरीर और मन दिया है उसके हवाले करता है। हे नानक ! वह मनुष्य जनम मरण के चक्कर से बच जाता है। वह सदा-सदा कायम रहने वाले परमात्मा में लीन रहता है। 8। 2।
ਬਿਲਾਵਲੁ ਮਹਲਾ ੩ ਅਸਟਪਦੀ ਘਰੁ ੧੦
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ਜਗੁ ਕਊਆ ਮੁਖਿ ਚੁੰਚ ਗਿਆਨੁ ॥
ਅੰਤਰਿ ਲੋਭੁ ਝੂਠੁ ਅਭਿਮਾਨੁ ॥
ਬਿਨੁ ਨਾਵੈ ਪਾਜੁ ਲਹਗੁ ਨਿਦਾਨਿ ॥੧॥
ਸਤਿਗੁਰ ਸੇਵਿ ਨਾਮੁ ਵਸੈ ਮਨਿ ਚੀਤਿ ॥
ਗੁਰੁ ਭੇਟੇ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਚੇਤਾਵੈ ਬਿਨੁ ਨਾਵੈ ਹੋਰ ਝੂਠੁ ਪਰੀਤਿ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਗੁਰਿ ਕਹਿਆ ਸਾ ਕਾਰ ਕਮਾਵਹੁ ॥
ਸਬਦੁ ਚੀਨਿੑ ਸਹਜ ਘਰਿ ਆਵਹੁ ॥
ਸਾਚੈ ਨਾਇ ਵਡਾਈ ਪਾਵਹੁ ॥੨॥
ਆਪਿ ਨ ਬੂਝੈ ਲੋਕ ਬੁਝਾਵੈ ॥
ਮਨ ਕਾ ਅੰਧਾ ਅੰਧੁ ਕਮਾਵੈ ॥
ਦਰੁ ਘਰੁ ਮਹਲੁ ਠਉਰੁ ਕੈਸੇ ਪਾਵੈ ॥੩॥
ਹਰਿ ਜੀਉ ਸੇਵੀਐ ਅੰਤਰਜਾਮੀ ॥
ਘਟ ਘਟ ਅੰਤਰਿ ਜਿਸ ਕੀ ਜੋਤਿ ਸਮਾਨੀ ॥
ਤਿਸੁ ਨਾਲਿ ਕਿਆ ਚਲੈ ਪਹਨਾਮੀ ॥੪॥
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ਜਗੁ ਕਊਆ ਮੁਖਿ ਚੁੰਚ ਗਿਆਨੁ ॥
ਅੰਤਰਿ ਲੋਭੁ ਝੂਠੁ ਅਭਿਮਾਨੁ ॥
ਬਿਨੁ ਨਾਵੈ ਪਾਜੁ ਲਹਗੁ ਨਿਦਾਨਿ ॥੧॥
ਸਤਿਗੁਰ ਸੇਵਿ ਨਾਮੁ ਵਸੈ ਮਨਿ ਚੀਤਿ ॥
ਗੁਰੁ ਭੇਟੇ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਚੇਤਾਵੈ ਬਿਨੁ ਨਾਵੈ ਹੋਰ ਝੂਠੁ ਪਰੀਤਿ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਗੁਰਿ ਕਹਿਆ ਸਾ ਕਾਰ ਕਮਾਵਹੁ ॥
ਸਬਦੁ ਚੀਨਿੑ ਸਹਜ ਘਰਿ ਆਵਹੁ ॥
ਸਾਚੈ ਨਾਇ ਵਡਾਈ ਪਾਵਹੁ ॥੨॥
ਆਪਿ ਨ ਬੂਝੈ ਲੋਕ ਬੁਝਾਵੈ ॥
ਮਨ ਕਾ ਅੰਧਾ ਅੰਧੁ ਕਮਾਵੈ ॥
ਦਰੁ ਘਰੁ ਮਹਲੁ ਠਉਰੁ ਕੈਸੇ ਪਾਵੈ ॥੩॥
ਹਰਿ ਜੀਉ ਸੇਵੀਐ ਅੰਤਰਜਾਮੀ ॥
ਘਟ ਘਟ ਅੰਤਰਿ ਜਿਸ ਕੀ ਜੋਤਿ ਸਮਾਨੀ ॥
ਤਿਸੁ ਨਾਲਿ ਕਿਆ ਚਲੈ ਪਹਨਾਮੀ ॥੪॥
बिलावलु महला ३ असटपदी घरु १०
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
जगु कऊआ मुखि चुंच गिआनु ॥
अंतरि लोभु झूठु अभिमानु ॥
बिनु नावै पाजु लहगु निदानि ॥१॥
सतिगुर सेवि नामु वसै मनि चीति ॥
गुरु भेटे हरि नामु चेतावै बिनु नावै होर झूठु परीति ॥१॥ रहाउ ॥
गुरि कहिआ सा कार कमावहु ॥
सबदु चीनि॑ सहज घरि आवहु ॥
साचै नाइ वडाई पावहु ॥२॥
आपि न बूझै लोक बुझावै ॥
मन का अंधा अंधु कमावै ॥
दरु घरु महलु ठउरु कैसे पावै ॥३॥
हरि जीउ सेवीऐ अंतरजामी ॥
घट घट अंतरि जिस की जोति समानी ॥
तिसु नालि किआ चलै पहनामी ॥४॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
जगु कऊआ मुखि चुंच गिआनु ॥
अंतरि लोभु झूठु अभिमानु ॥
बिनु नावै पाजु लहगु निदानि ॥१॥
सतिगुर सेवि नामु वसै मनि चीति ॥
गुरु भेटे हरि नामु चेतावै बिनु नावै होर झूठु परीति ॥१॥ रहाउ ॥
गुरि कहिआ सा कार कमावहु ॥
सबदु चीनि॑ सहज घरि आवहु ॥
साचै नाइ वडाई पावहु ॥२॥
आपि न बूझै लोक बुझावै ॥
मन का अंधा अंधु कमावै ॥
दरु घरु महलु ठउरु कैसे पावै ॥३॥
हरि जीउ सेवीऐ अंतरजामी ॥
घट घट अंतरि जिस की जोति समानी ॥
तिसु नालि किआ चलै पहनामी ॥४॥
हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला ३ असटपदी घरु १० ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ हे भाई ! माया-ग्रसित मनुष्य कौए (की तरह काँ-काँ करने वाले) हैं। (सिर्फ) मुँह से (ही) बातों-बातों से आत्मिक जीवन की सूझ (बताते रहते हैं। जैसे कि कौआ अपनी चोंच से ‘कां कां’ करता है)। (पर उस चोंच ज्ञानी के) मन में लोभ (टिका रहता) है। अहंकार (टिका रहता) है। हे भाई ! नाम से टूटे रह के यह धार्मिक दिखावा आखिर बेपर्दा हो ही जाता है। 1। हे भाई ! गुरू की शरण पड़ने से (परमात्मा का) नाम (मनुष्य के) मन में चिक्त में आ बसता है। (जिस मनुष्य को) गुरू मिल जाता है। उसको (गुरू। परमात्मा का) नाम जपाता है। हे भाई ! (परमात्मा के) नाम (के प्यार) के बिना और प्यार झूठे हैं। 1। रहाउ। हे भाई ! वह काम किया करो जो गुरू ने बताया है (वह काम है नाम का सिमरन)। परमात्मा की सिफत-सालाह की बाणी से गहरी सांझ डाल के आत्मिक अडोलता के घर में टिका करो। सदा-स्थिर प्रभू के नाम में जुड़ के (लोक-परलोक की) महिमा हासिल करोगे। 2। हे भाई ! (जो मनुष्य आत्मिक जीवन के बारे में) खुद (तो कुछ) समझते नहीं। पर लोगों को समझाते रहते हैं। उनका अपना आपा (आत्मिक जीवन की ओर से) बिल्कुल कोरा है (अंधा है। इस वास्ते आत्मिक जीवन के रास्ते में वह अंधों की तरह ठोकरें खाता रहता है) अंधों वाले काम करता रहता है। हे भाई ! ऐसा मनुष्य परमात्मा का दर-घर। परमात्मा का महल। परमात्मा का ठिकाना बिल्कुल नहीं पा सकता। 3। हे भाई ! उस परमात्मा की सेवा-भक्ति करनी चाहिए। जो सबके दिल की जानने वाला है। जिस परमात्मा की ज्योति हरेक शरीर में मौजूद है। उससे कोई लुका-छुपा नहीं चल सकता। 4।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 832 है, राग बिलावल का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)।
गुरु नानक की वाणी, observational, direct, बिना ornament।
दिल्ली के winter-fog में सुबह 5 बजे driver को waiting करवाना।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 51 पंक्तियों का है, 2 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 832” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: बिलावल राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 833 →, पीछे का: ← अंग 831।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।