अध्याय 27 · द्रोण-वध (अश्वत्थामा-छल)

महाभारत · द्रोण पर्व
अश्वत्थामा नामक हाथी के मारे जाने का अर्धसत्य, युधिष्ठिर का वह वचन जिससे द्रोण ने शस्त्र त्याग दिए, और धृष्टद्युम्न के हाथों आचार्य का अन्त।

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मशालों से जगमगाते रात्रि-रणक्षेत्र में नीले वर्ण का धनुर्धर रथ से बाण साधता है; पीछे विशाल सज्जित हाथी है।

रात अपने गहरे-से-गहरे पहर में थी जब घटोत्कच इन्द्र के दिए हुए उस अमोघ शक्ति-अस्त्र से बिंधकर पर्वत की तरह धरती पर आ गिरा, और कर्ण ने उस वज्र-सी शक्ति को, जो वर्षों से अर्जुन के लिए सँजोकर रखी गई थी, एक ही राक्षस पर चुका दिया। पाण्डव-शिविर में शोक की लहर दौड़ी, पर वासुदेव की आँखों में अश्रु नहीं, हर्ष चमक उठा, क्योंकि वे जानते थे कि अर्जुन की मृत्यु का काँटा अब टल गया। उसी रात के अन्धकार में, जब सूर्य लौटा और पन्द्रहवें दिन का प्रकाश रणभूमि पर फैला, वह घटना घटी जिसने महाभारत के सत्य और असत्य की सीमा-रेखा को सदा के लिए धुँधला कर दिया। इसी कथा-धारा में हम आपको ले चलते हैं उस मोड़ तक जहाँ अश्वत्थामा नामक एक हाथी के मारे जाने का अर्धसत्य आचार्य द्रोण के कानों तक पहुँचा, जहाँ युधिष्ठिर के एक वचन से द्रोण ने अपने शस्त्र त्याग दिए, और जहाँ धृष्टद्युम्न के हाथों उस वृद्ध गुरु का अन्त हुआ।

घटोत्कच का अन्त और वह रात जो टल गई

संजय ने अन्धे राजा धृतराष्ट्र से कहा कि उस रात के युद्ध में हिडिम्बा-पुत्र घटोत्कच ने ऐसी माया रची कि कौरव-सेना त्राहि-त्राहि कर उठी। आकाश में लाल बादलों का-सा एक पुंज छा गया, जिससे बिजली, जलती मशालें और सहस्र नगाड़ों के समान गर्जना फूटने लगी। उसमें से स्वर्ण-पंख वाले बाण, भाले, गदाएँ, फरसे, शतघ्नी (एक बार में सौ को मारने वाला अस्त्र), लोहे के चक्र और पर्वत-शिलाएँ बरसने लगीं। कर्ण अपनी बाण-वर्षा से उस भयानक वर्षा को रोक न सका। आपके पुत्र की सेना “भागो! सब नष्ट हो गया! इन्द्र-समेत देवता पाण्डवों के लिए हमें मार रहे हैं!” चिल्लाती हुई तितर-बितर होने लगी।

जलती हुई शक्ति घटोत्कच की छाती भेदती है; नीचे कृष्ण और योद्धा उसे आकाश में गिरते देखते हैं।

तब कौरव पुकार उठे, “हे कर्ण, वासव की दी हुई उस शक्ति से इस राक्षस को अभी मार डालिए, अन्यथा इन्द्र-समान ये सब राजा आज रात ही नष्ट हो जाएँगे।” कर्ण के मन में द्वन्द्व था, क्योंकि वह शक्ति उसने अर्जुन के लिए सँजो रखी थी। पर सेना को डूबता देख, क्रोधित सिंह की भाँति, उसने वही अमोघ अस्त्र, जो स्वयं शक्र ने उसके कवच-कुण्डलों के बदले दिया था, घटोत्कच पर चला दिया। वह तेजोमय अस्त्र राक्षस की माया को नष्ट करता हुआ उसकी छाती को बेधकर आकाश में किसी नक्षत्र-मण्डल में जा समाया। मरते समय घटोत्कच ने अपने विशाल शरीर को और बड़ा करके कौरव-सेना के एक भाग पर गिरकर पूरी एक अक्षौहिणी सेना को कुचल डाला, और अन्तिम साँस तक पाण्डवों का हित किया।

समझने की कुंजी (वंश): घटोत्कच भीमसेन और राक्षसी हिडिम्बा का पुत्र था, अतः उसे ‘हिडिम्बापुत्र’ और ‘भीमसेन-पुत्र’ कहा जाता है। कर्ण को ‘वैकर्तन’, ‘सूतपुत्र’, ‘राधेय’ और ‘वृष’ नामों से पुकारा जाता है; ‘वैकर्तन’ इसलिए कि उसने अपने जन्मजात कवच-कुण्डल (वि+कर्तन अर्थात काटकर) इन्द्र को दे दिए थे।

घटोत्कच के फूल-सजे शव के पास कृष्ण अर्जुन को गले लगाते हैं; पास भीम और वृद्ध राजा शोकमग्न हैं।

घटोत्कच के गिरते ही पाण्डव शोक से रो पड़े, पर वासुदेव हर्ष से सिंह-गर्जना करते हुए अर्जुन को बार-बार गले लगाने लगे। दुखी अर्जुन ने पूछा कि शोक के इस अवसर पर आप ऐसे प्रसन्न क्यों हैं। कृष्ण ने कहा, “हे धनंजय, कर्ण का वह अमोघ अस्त्र अब चुक गया। जब तक वह शक्ति उसके पास थी, इस संसार में कोई उसके सामने टिक न सकता था। सौभाग्य से उसके कवच-कुण्डल पहले ही ले लिए गए थे, और अब यह शक्ति भी घटोत्कच पर व्यर्थ हो गई। अब कर्ण मनुष्य-मात्र रह गया है। उसके वध का एक ही अवसर आएगा, जब उसके रथ का पहिया धरती में धँस जाएगा; उसी क्षण आप उसे मारिएगा। उससे पहले मैं आपको संकेत दे दूँगा। मैंने आपके हित के लिए ही, अनेक उपायों से, जरासन्ध, चेदिराज शिशुपाल और निषादपुत्र एकलव्य को मारा है; हिडिम्ब, किर्मीर, बक, अलायुध और अब घटोत्कच भी इसी क्रम में मारे गए।”

एक उप-कथा: यह संवाद महाभारत की गहरी नैतिक पेच को खोलता है। श्रीकृष्ण स्वयं स्वीकार करते हैं कि उन्होंने ‘अनेक उपायों’ (अर्थात छल और युक्ति) से अपने पक्ष के शत्रुओं को मारा है। घटोत्कच का बलिदान कोई दुर्घटना नहीं था; कृष्ण जानते थे कि कर्ण की अमोघ शक्ति किसी एक पर अवश्य चलेगी, और उन्होंने भीम के पुत्र को ही उस अस्त्र का लक्ष्य बनने दिया, ताकि अर्जुन बच जाए। हर्ष और शोक का यह मिश्रण, अपने ही भतीजे की मृत्यु पर कृष्ण का प्रसन्न होना, इस युद्ध की उस कठोर नीति का चेहरा है जिसे व्यास छिपाते नहीं।

कृष्ण उंगली उठाकर पास बैठे योद्धा को समझाते हैं; पीछे आकाश में जलती शक्ति राक्षस की ओर लपकती है।

सार: कर्ण ने अर्जुन के लिए रखी अमोघ शक्ति घटोत्कच पर चलाकर उसे मार डाला; कृष्ण ने इसे हर्ष का कारण बताया, क्योंकि अब कर्ण के पास अर्जुन को मारने का अचूक अस्त्र शेष न रहा।

पन्द्रहवें दिन का संग्राम और द्रोण का प्रलयंकर पराक्रम

दुर्योधन रथ पर बैठे वृद्ध द्रोण की ओर हाथ बढ़ाकर रोष जताता है, चारों ओर शव बिखरे पड़े हैं।

रात बीती और पन्द्रहवें दिन का सूर्य उगा, जो द्रोण के सेनापतित्व का पाँचवाँ दिन था। उस दिन भी आचार्य द्रोण ने पांचालों में वैसा ही संहार मचाया जैसा प्राचीन काल में इन्द्र ने दानवों में मचाया था। पांचाल और सृंजय गरजते हुए द्रोण को चारों ओर से घेरते, और वे उन्हें बाणों तथा भालों से काट गिराते। आचार्य के अस्त्र चारों दिशाओं को ढक रहे थे; पाण्डव-सेना भयभीत होकर विजय से निराश हो उठी। वे आपस में कहने लगे, “क्या द्रोण हम सबको वैसे ही न भस्म कर देंगे जैसे वसन्त में दावानल तिनकों के ढेर को? उनकी ओर आँख उठाने में भी कोई समर्थ नहीं, और धर्म जानने वाला अर्जुन उनसे लड़ेगा भी नहीं।”

दुःशासन ने धृष्टद्युम्न से भिड़कर देखा, पर पृषतपुत्र की बाण-वर्षा से उसका रथ, सारथि और ध्वज अदृश्य हो गए, और वह आचार्य के सामने टिक न सका। तब धृष्टद्युम्न द्रोण की ओर बढ़ा। हृदिक-पुत्र कृतवर्मा अपने तीन सहोदर भाइयों के साथ उसे रोकने आया, पर नकुल और सहदेव, उन जुड़वाँ वीरों ने, धृष्टद्युम्न की रक्षा करते हुए उन चारों को रोक लिया। यह विशेष बात ध्यान देने योग्य है कि ये सातों योद्धा, स्वर्ग को लक्ष्य बनाकर, पूर्णतः धर्म-युद्ध की रीति से लड़े। किसी ने कँटीले, विषैले, दो-मुँहे या टेढ़े जाने वाले अनुचित बाणों का प्रयोग नहीं किया; सबने सीधे और उचित अस्त्र ही चलाए, क्योंकि सब यश और कल्याण के लोक चाहते थे।

तभी दुर्योधन रक्त-पान करने वाले बाण बरसाता हुआ धृष्टद्युम्न की ओर दौड़ा, पर सात्यकि ने उसका मार्ग रोक लिया। बचपन के साथी कुरुवंशी दुर्योधन और मधुवंशी सात्यकि एक-दूसरे को देखकर बार-बार मुस्कराए। दुर्योधन ने मन-ही-मन अपने को धिक्कारते हुए कहा, “धिक्कार है इस क्रोध को, धिक्कार है क्षत्रिय-रीति को! जो आप कभी मुझे प्राणों से प्रिय थे, और मैं आपको, आज हम धन के लोभ और क्रोध से प्रेरित होकर एक-दूसरे पर शस्त्र चला रहे हैं। काल की गति सचमुच दुर्निवार है।” सात्यकि ने हँसकर उत्तर दिया, “हे राजन, यह न तो वह सभा है, न गुरुगृह, जहाँ हम बचपन में साथ खेला करते थे। क्षत्रिय की यही रीति है कि उसे अपने गुरुजनों से भी लड़ना पड़ता है। यदि मैं आपको प्रिय हूँ, तो बिना विलम्ब मुझे मार डालिए; मैं मित्रों के इस महान विनाश को देखना नहीं चाहता।”

दुर्योधन ने उसे बाणों से बेधा, पर सात्यकि ने उसके सब बाण और धनुष काट डाले, और इतनी पीड़ा पहुँचाई कि दुर्योधन को दूसरे रथ की शरण लेनी पड़ी। उसे संकट में देख कर्ण उसे बचाने दौड़ा, पर भीमसेन ने कर्ण को रोक लिया। कर्ण ने भीम का धनुष, बाण और सारथि काट डाले, तो भीम ने गदा से कर्ण के धनुष, ध्वज, सारथि और रथ का एक पहिया तोड़ दिया। फिर भी कर्ण एक पहिये के उस रथ पर मेरु-समान अचल खड़ा रहा, मानो सात दिव्य घोड़ों से खिंचने वाला सूर्य का एक-पहिया रथ हो।

समझने की कुंजी (अवधारणा): ‘धर्म-युद्ध’ का अर्थ है युद्ध की उन मर्यादाओं का पालन जो शास्त्र में नियत हैं, जैसे विषैले या कँटीले बाणों का त्याग, और शरणागत पर वार न करना। महाभारत इस दिन के द्वन्द्वों को ‘धर्म-युद्ध’ कहकर आगे आने वाले अधर्म, अर्थात अर्धसत्य द्वारा द्रोण-वध, के साथ गहरा विरोधाभास खड़ा करता है।

सार: पन्द्रहवें दिन द्रोण ने पांचालों में भयानक संहार मचाया; अनेक धर्म-युद्ध के द्वन्द्व छिड़े, और सात्यकि-दुर्योधन तथा कर्ण-भीम के संग्राम में पाण्डव-पक्ष भारी पड़ा।

पाण्डवों की निराशा और कृष्ण का कठोर परामर्श

जब संग्राम घनघोर हो उठा, तब धर्मराज युधिष्ठिर ने पांचाल और मत्स्य योद्धाओं को सम्बोधित कर कहा, “जो हमारे प्राण और सिर हैं, वे महाबली योद्धा धार्तराष्ट्रों से जूझ रहे हैं; आप लोग मूर्च्छित-से क्यों खड़े हैं? उधर बढ़िए जहाँ हमारे रथी लड़ रहे हैं। भय त्यागकर क्षत्रिय-धर्म का पालन कीजिए; जीतेंगे तो यज्ञ करेंगे, और मरे तो देवताओं के समान होकर स्वर्ग पाएँगे।” यह सुनकर वीर योद्धा द्रोण की ओर बढ़े। भीमसेन ने अर्जुन से पुकारकर कहा, “हे अर्जुन, शीघ्र कुरुओं को द्रोण के पास से हटा दीजिए; गुरु यदि अपने रक्षकों से रहित हो जाएँ, तो पांचाल सहज ही उन्हें मार सकेंगे।” अर्जुन कौरवों पर टूट पड़े, और द्रोण धृष्टद्युम्न के नेतृत्व वाले पांचालों पर।

रात्रि शिविर में कृष्ण चिंतित युधिष्ठिर को समझाते हैं, चारों ओर पांडव भाई गंभीर मुद्रा में बैठे हैं।

द्रोण ने फिर पांचालों में ऐसा प्रलय मचाया कि पाण्डव विजय से निराश हो उठे। तब महान बुद्धिमान केशव ने अर्जुन से वे वचन कहे जो इस सम्पूर्ण कथा की धुरी हैं, “यह धनुर्धरों में श्रेष्ठ द्रोण बल से कभी नहीं जीते जा सकते; वासव-सहित देवता भी इन्हें युद्ध में नहीं हरा सकते। परन्तु जब ये शस्त्र त्याग देंगे, तब मनुष्य भी इन्हें मार सकेगा। हे पाण्डवो, अब धर्म को एक ओर रखकर विजय का कोई उपाय अपनाइए, ताकि स्वर्ण-रथ वाले द्रोण हम सबका संहार न कर दें। मेरा विचार है, अपने पुत्र अश्वत्थामा के मारे जाने का समाचार पाकर ही ये युद्ध से विरत होंगे। अतः कोई इन्हें कह दे कि अश्वत्थामा युद्ध में मारा गया।”

कुन्तीपुत्र अर्जुन ने इस परामर्श को स्वीकार नहीं किया। शेष सब ने इसे माना, और युधिष्ठिर ने भी बड़ी कठिनाई से इसे स्वीकार किया। तभी महाबाहु भीमसेन ने अपनी ही सेना में खड़े मालवराज इन्द्रवर्मा के अश्वत्थामा नामक एक विशाल और भयानक हाथी को गदा से मार डाला। फिर कुछ संकोच के साथ द्रोण के पास जाकर भीम ऊँचे स्वर में पुकारने लगा, “अश्वत्थामा मारा गया!” सत्य को मन में छिपाए रखकर उसने असत्य कहा। ये अत्यन्त अप्रिय वचन सुनकर द्रोण के अंग जल में बालू की भाँति गलने लगे, पर अपने पुत्र के पराक्रम को स्मरण करके उन्होंने उस समाचार को झूठा मान लिया, और मन को सँभालकर सोचा कि अश्वत्थामा शत्रुओं से अजेय है।

एक उप-कथा: ध्यान दीजिए कि कृष्ण का यह वाक्य कितना दो-धारी है। वे यह नहीं कहते कि द्रोण को कोई सीधा झूठ बोले; वे एक ‘उपाय’ सुझाते हैं और धर्म को ‘एक ओर रख देने’ की बात स्पष्ट शब्दों में कहते हैं। भीम ने अश्वत्थामा नामक हाथी को मारकर एक तकनीकी सत्य गढ़ा, ताकि वचन झूठा न लगे, पर उसका आशय पूर्णतः कपटपूर्ण था। यह अर्धसत्य का वह बीज है जो आगे चलकर युधिष्ठिर के मुख से फूटेगा और आचार्य के प्राण ले लेगा।

रक्तरंजित रणभूमि में घायल हाथी चिंघाड़ता है और योद्धा शवों के बीच एक-दूसरे पर टूट पड़ते हैं।

समाचार को झूठा मानकर द्रोण ने धृष्टद्युम्न पर, जो उनके वधकर्ता रूप में नियत था, सहस्र तीखे बाण बरसाए। तब बीस हज़ार पांचाल रथियों ने आचार्य को बाणों से ढक दिया। पर द्रोण ने ब्रह्मास्त्र का आह्वान कर धुआँरहित अग्नि की भाँति देदीप्यमान होकर बीस हज़ार पांचाल योद्धाओं को मार गिराया। उन्होंने वसुदान का सिर काटा, पाँच सौ मत्स्यों, छह हज़ार हाथियों और दस हज़ार घोड़ों का संहार किया। पृथ्वी रक्त और माँस से कीचड़मय हो उठी।

समझने की कुंजी (संख्या-आधुनिक-समतुल्य): बीस हज़ार रथी, छह हज़ार हाथी और दस हज़ार घोड़े का इस एक प्रसंग में संहार, संख्या के परिमाण में आज के किसी सम्पूर्ण सैन्य-स्कन्ध (डिवीज़न) के लगभग बराबर बैठता है। महाभारत की ये संख्याएँ युद्ध के औद्योगिक-स्तर के विनाश का बोध कराती हैं, जहाँ एक ही योद्धा एक दिन में हज़ारों को काट डालता है।

सार: कृष्ण ने द्रोण को रोकने के लिए अश्वत्थामा-वध का झूठ फैलाने का उपाय सुझाया; भीम ने उसी नाम के हाथी को मारकर वचन कहा, पर द्रोण ने उसे न मानकर और भी प्रचण्ड संहार मचाया।

ऋषियों का आगमन और शस्त्र-त्याग का आह्वान

द्रोण को क्षत्रिय-वंश के संहार के लिए रणभूमि पर खड़ा देखकर महान ऋषि वहाँ प्रकट हुए, जिनमें विश्वामित्र, जमदग्नि, भारद्वाज, गौतम, वसिष्ठ, कश्यप, अत्रि, गर्ग, मरीचि, भृगु और अंगिरस के वंशज, वालखिल्य तथा अनेक सूक्ष्म-रूप ऋषि थे, और अग्नि उनके अग्रभाग में थे। वे द्रोण को ब्रह्मलोक ले जाने की इच्छा से आए, और उस युद्ध-आभूषण आचार्य से बोले, “हे द्रोण, आप अधर्म से युद्ध कर रहे हैं; आपकी मृत्यु का समय आ गया है। शस्त्र त्यागकर हमें यहाँ खड़ा देखिए। अब इस प्रकार के अति-क्रूर कर्म आपको शोभा नहीं देते। आप वेद और वेदांगों के ज्ञाता, सत्यनिष्ठ ब्राह्मण हैं; ऐसे कर्म आपके योग्य नहीं। आपने ब्रह्मास्त्र से उन मनुष्यों को भी भस्म किया है जो अस्त्र-विद्या नहीं जानते। यह कर्म धर्म नहीं। शस्त्र त्याग दीजिए, भ्रम का परदा हटा दीजिए, और सनातन मार्ग पर आइए; मनुष्य-लोक में आपके रहने का काल अब पूरा हो चुका।”

ऋषियों के और भीम के वचन सुनकर, तथा सामने धृष्टद्युम्न को देखकर, द्रोण युद्ध में अत्यन्त उदास हो उठे। शोक से जलते हुए उन्होंने कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर से पूछा कि उनका पुत्र अश्वत्थामा सचमुच मारा गया या नहीं। आचार्य को दृढ़ विश्वास था कि युधिष्ठिर तीनों लोकों के राज्य के लिए भी असत्य नहीं बोलेंगे; इसी कारण उन्होंने और किसी से नहीं, बस युधिष्ठिर से ही पूछा, क्योंकि बचपन से ही वे युधिष्ठिर से सत्य की आशा रखते आए थे।

सांझ के शिविर में दीप के पास कृष्ण दोनों हाथों के संकेत से शोकमग्न युधिष्ठिर को समझाते हैं।

इसी बीच, यह जानकर कि क्रोधित द्रोण आधे दिन भी लड़ें तो पाण्डव-सेना का सर्वनाश हो जाएगा, गोविन्द अत्यन्त व्यथित हुए। उन्होंने युधिष्ठिर से कहा, “यदि द्रोण आधा दिन भी क्रोध में लड़े, तो आपकी सेना नष्ट हो जाएगी। हमें द्रोण से बचाइए। ऐसी स्थिति में असत्य ही सत्य से उत्तम है। जीवन-रक्षा के लिए असत्य बोलने से कोई पाप नहीं लगता। स्त्रियों के विषय में, विवाह में, राजा की रक्षा में, या ब्राह्मण को बचाने में कहा गया असत्य पाप नहीं माना जाता।”

समझने की कुंजी (अवधारणा): ‘ब्रह्मास्त्र’ वह परम दिव्य अस्त्र है जिसे ब्रह्मा से सम्बद्ध माना जाता है और जो लक्षित को सर्वथा भस्म कर सकता है। ऋषि द्रोण को यही दोष देते हैं कि उन्होंने ऐसा दिव्य अस्त्र साधारण और निरस्त्र मनुष्यों पर भी चलाया, जो ब्राह्मण-धर्म के विरुद्ध है। यहाँ कृष्ण द्वारा गिनाए गए असत्य के पाँच क्षम्य प्रसंग (जीवन-रक्षा, स्त्री, विवाह, राजा, ब्राह्मण) धर्मशास्त्र की एक सुविदित मर्यादा है, जिसे वे युधिष्ठिर के सामने ढाल की तरह रखते हैं।

तभी भीमसेन ने राजा से कहा, “जैसे ही मैंने द्रोण-वध का उपाय सुना, मैंने मालवराज इन्द्रवर्मा के, इन्द्र के हाथी-समान विशाल गज को मारकर द्रोण से कहा कि अश्वत्थामा मारा गया, युद्ध बन्द कीजिए। पर आचार्य ने विश्वास नहीं किया। अब, हे राजन, आप गोविन्द की सलाह मानकर द्रोण से कहिए कि शरद्वत-कन्या का पुत्र अश्वत्थामा अब नहीं रहा। आपके कहे को वे अवश्य मानेंगे, क्योंकि तीनों लोकों में आप सत्यवादी प्रसिद्ध हैं।”

सार: ऋषियों ने द्रोण को अधर्म-युद्ध छोड़ शस्त्र त्यागने को कहा; शोकाकुल द्रोण ने सत्य की आशा से केवल युधिष्ठिर से पुत्र की मृत्यु के विषय में पूछा, और कृष्ण-भीम ने युधिष्ठिर को असत्य कहने के लिए प्रेरित किया।

युधिष्ठिर का वह वचन और रथ का धरती छू लेना

युधिष्ठिर हाथ हृदय पर रखे संकोच से वृद्ध द्रोण को उत्तर देते हैं, पीछे कृष्ण और योद्धा खड़े हैं।

भीम के वचन सुनकर, कृष्ण के परामर्श से, और नियति की अनिवार्यता से प्रेरित होकर, युधिष्ठिर ने वह कहने का निश्चय किया जो वे चाहते थे। असत्य बोलने से डरते हुए, पर विजय की तीव्र अभिलाषा से, युधिष्ठिर ने स्पष्ट स्वर में कहा कि अश्वत्थामा मारा गया, और अस्फुट स्वर में, अत्यन्त धीमे, उस नाम के पीछे “हाथी” शब्द जोड़ दिया, “जिसके लिए आप शस्त्र उठाते हैं, जिसे देखकर आप जीते हैं, वही आपका प्रिय पुत्र अश्वत्थामा मारा गया है। प्राणहीन होकर वह युवा सिंह की भाँति नंगी धरती पर पड़ा है।” आचार्य ने केवल पहला, स्पष्ट भाग सुना; “हाथी” शब्द उनके कानों तक न पहुँचा।

इससे पहले युधिष्ठिर का रथ धरती से चार अंगुल ऊपर चला करता था, उनके सत्य के बल से। पर जैसे ही उन्होंने यह अर्धसत्य कहा, उनका रथ और घोड़े धरती को छूने लगे। सत्य की वह अदृश्य महिमा, जो उन्हें भूमि से ऊपर उठाए रखती थी, इस एक वचन से उतर गई।

एक उप-कथा: रथ का धरती से चार अंगुल ऊपर चलना युधिष्ठिर के अखण्ड सत्य का प्रतीक था, और उसका भूमि छू लेना इस कथा का गूढ़तम क्षण है। यह केवल एक चमत्कार का लोप भर नहीं; यह नैतिक ऊँचाई से एक मनुष्य के उतरने का दृश्य है। युधिष्ठिर ने तकनीकी रूप से सत्य ही कहा, क्योंकि हाथी का नाम भी अश्वत्थामा था; फिर भी आशय कपट का था। महाभारत इस सूक्ष्म भेद को नहीं छिपाता, कि शब्दों का सत्य और हृदय का सत्य एक नहीं होते, और धर्मराज तक इस सीमा पर डगमगा गए।

युधिष्ठिर के वे वचन सुनकर महारथी द्रोण पुत्र की कल्पित मृत्यु के शोक से निराशा में डूब गए। ऋषियों के वचनों से वे स्वयं को उच्च-आत्मा पाण्डवों के विरुद्ध एक बड़ा अपराधी मानने लगे। अब पुत्र की मृत्यु का समाचार सुनकर वे पूर्णतः निरुत्साह और चिन्ता से भर गए; और सामने धृष्टद्युम्न को देखकर वह शत्रुनाशक आचार्य पहले की भाँति युद्ध न कर सके।

सार: युधिष्ठिर ने स्पष्ट स्वर में अश्वत्थामा की मृत्यु कही और अस्फुट स्वर में “हाथी” जोड़ दिया; उसी क्षण उनका सदा धरती से ऊपर रहने वाला रथ भूमि को छू गया, और द्रोण शोक में डूबकर निस्तेज हो गए।

धृष्टद्युम्न का आक्रमण और द्रोण की अन्तिम वीरता

स्वर्ण-कवचधारी योद्धा रणभूमि में आगे की ओर संकेत करता है; पीछे रथ पर श्वेत-दाढ़ी द्रोण और नीचे कृष्ण हैं।

शोक से अधीर और मानो इन्द्रियों से रहित द्रोण को देखकर पांचाल-राजकुमार धृष्टद्युम्न उन पर टूट पड़ा। यह वही वीर था जिसे राजा द्रुपद ने द्रोण के वध के लिए एक महायज्ञ से, अग्नि से, प्राप्त किया था। उसने विजय देने वाला, मेघ-गर्जना-सा टंकार करता हुआ दिव्य धनुष उठाया और उस पर विषधर सर्प-समान, अग्नि के तेज वाला एक बाण चढ़ाया। उस बाण को धनुष के घेरे में देखकर सेना ने उसे संसार का अन्तिम क्षण समझा। द्रोण ने भी समझ लिया कि उनकी देह का अन्तिम पहर आ गया।

आचार्य ने सावधानी से उस बाण को रोकने का यत्न किया, पर अब उनके दिव्य अस्त्र उनके आह्वान पर प्रकट न हुए। चार दिन और एक रात तक निरन्तर बाण चलाते रहने पर भी उनके बाण समाप्त नहीं हुए थे, पर पाँचवें दिन के तीसरे प्रहर में वे चुक गए। बाणों का समाप्त होना, पुत्र-शोक, और दिव्य अस्त्रों का प्रकट न होना, इन सब से, तथा ऋषियों के कहे अनुसार, द्रोण ने शस्त्र त्यागने की इच्छा की। फिर भी, अंगिरा के दिए एक दिव्य धनुष और ब्राह्मण-शाप-समान बाण लेकर वे धृष्टद्युम्न से लड़ते रहे। उन्होंने पृषतपुत्र का धनुष, ध्वज और सारथि काट डाले। धृष्टद्युम्न ने दूसरा धनुष लेकर द्रोण की छाती बेधी, पर आचार्य ने फिर उसका धनुष काट दिया, और गदा-तलवार छोड़कर उसके सब अस्त्र छिन्न कर दिए।

तब धृष्टद्युम्न ने ब्रह्मास्त्र का आह्वान कर अपने घोड़ों को द्रोण के घोड़ों से मिला दिया; पवन-वेग वाले वे लाल और कपोत-वर्ण के घोड़े वर्षा के बादलों-से सुन्दर लगने लगे। आचार्य ने रथ के जोड़ काट डाले, और धृष्टद्युम्न रथहीन, घोड़ाहीन, सारथिहीन होकर गदा लेकर खड़ा हुआ; द्रोण ने वह गदा भी काट दी। तब पांचाल-राजकुमार ने सौ चन्द्रमाओं से सजी चमकती ढाल और निर्मल तलवार उठाई, और उस वृद्ध गुरु का अन्त करने को कृतसंकल्प हुआ। वह कभी रथ की पेटी में छिपता, कभी रथ की धुरी पर चढ़ता, कभी द्रोण के लाल घोड़ों के पीछे जा खड़ा होता; उसने इक्कीस प्रकार की गतियाँ और भारत, कौशिक तथा सात्वत नामक तलवार-कौशल दिखाए, जिन्हें देख देवता तक विस्मित हो उठे।

द्रोण ने सहस्र बाण चलाकर धृष्टद्युम्न की तलवार और ढाल काट डाली। फिर उन्होंने अपने उस शिष्य पर, जो उन्हें पुत्र-समान प्रिय था, वेगवान बाण चढ़ाया; पर सात्यकि ने दस बाणों से वह काटकर, दुर्योधन और कर्ण के देखते-देखते, मरणासन्न धृष्टद्युम्न को बचा लिया। कृष्ण और अर्जुन ने “वाह! वाह!” पुकारकर सात्यकि की सराहना की, जो द्रोण, कर्ण और कृप के बाणों की सीमा में निर्भय विचर रहा था।

समझने की कुंजी (वंश): धृष्टद्युम्न को ‘पृषतपुत्र’ और ‘पांचाल-राजकुमार’ कहा जाता है; वह राजा द्रुपद का पुत्र था, जो पृषत के वंश में जन्मा। द्रोण और द्रुपद की पुरानी शत्रुता ही इस वध की जड़ है: अपमानित द्रुपद ने यज्ञ से ऐसा पुत्र पाया था जो द्रोण को मारे, और ऐसी कन्या (द्रौपदी) जो कुरुवंश का अन्त लाए।

सार: शोक से निस्तेज द्रोण पर द्रुपद-पुत्र धृष्टद्युम्न ने आक्रमण किया; आचार्य के अस्त्र चुक गए, पर उन्होंने अन्तिम वीरता दिखाई, और सात्यकि ने मरणासन्न धृष्टद्युम्न को बचा लिया।

भीम के कठोर वचन और द्रोण का योग में लीन होना

सात्यकि के पराक्रम से क्रुद्ध होकर दुर्योधन, कर्ण, कृप और अन्य योद्धा उसे घेरने लगे, पर युधिष्ठिर, नकुल, सहदेव और भीम ने उसकी रक्षा की। तभी धर्मराज युधिष्ठिर ने पुकारा, “हे महारथियो, पूरी शक्ति से कुम्भज (द्रोण) पर टूट पड़िए! पृषतपुत्र उनसे जूझ रहा है, और मुझे लगता है कि वह आज द्रोण को गिरा देगा। सब मिलकर लड़िए।” यह सुनकर सृंजय योद्धा द्रोण पर टूट पड़े, और मृत्यु को निश्चित जानकर भी आचार्य ने उनका सामना किया।

उस समय अनेक अपशकुन हुए: पृथ्वी काँप उठी, प्रचण्ड वायु बहने लगी, सूर्य से निकलते-से उल्का-पिण्ड गिरे, रथ कर्कश शब्द करने लगे, और घोड़े आँसू बहाने लगे। द्रोण का तेज मानो उतर गया; उनकी बायीं आँख और बायाँ हाथ फड़कने लगे। सामने धृष्टद्युम्न को देखकर और ऋषियों के स्वर्गगमन-वचन को स्मरण करके वे निरुत्साह हो गए, और धर्मपूर्वक लड़ते हुए ही प्राण त्यागने की इच्छा करने लगे। फिर भी, क्षत्रिय-संहार के लिए उन्होंने ब्रह्मास्त्र का सहारा लिया, और चौबीस हज़ार क्षत्रियों तथा एक लाख और योद्धाओं को यम के लोक भेज दिया।

तब भीमसेन ने द्रोण के रथ को थामकर धीमे, पर तीखे स्वर में कहा, “यदि अपने वर्ण के कर्मों से असन्तुष्ट, पर शस्त्र-विद्या में निपुण नीच ब्राह्मण युद्ध न करते, तो क्षत्रिय-वंश इस प्रकार नष्ट न होता। सब प्राणियों के प्रति अहिंसा परम धर्म कही गई है, और ब्राह्मण उसी धर्म की जड़ है। आप ब्रह्म के परम ज्ञाता होकर भी, केवल एक पुत्र के लिए, धन के लोभ से, इन सब योद्धाओं का संहार कर रहे हैं। जिसके लिए आपने शस्त्र उठाए, जिसके लिए आप जीते हैं, वह आपकी पीठ-पीछे, आपके अनजाने, रणभूमि में मारा जा चुका है। यह धर्मराज युधिष्ठिर ने आपको बताया है; इसमें सन्देह न कीजिए।”

शोकग्रस्त द्रोण धनुष त्यागकर रथ के आसन पर पालथी मारे बैठे हैं, चारों ओर सांझ का रणक्षेत्र फैला है।

भीम के इन वचनों से द्रोण ने अपना धनुष नीचे रख दिया। फिर शेष सब शस्त्र भी त्यागने की इच्छा से वह सात्त्विक-आत्मा आचार्य ऊँचे स्वर में बोले, “हे कर्ण, हे कर्ण! हे महान धनुर्धर! हे कृप! हे दुर्योधन! मैं आप सब से बार-बार कहता हूँ, सावधानी से युद्ध कीजिए, पाण्डवों से अपनी रक्षा कीजिए। रही मेरी बात, मैं शस्त्र त्याग रहा हूँ।” यह कहकर वे ऊँचे स्वर में अश्वत्थामा का नाम पुकारने लगे। शस्त्र त्यागकर, रथ के मंच पर बैठकर, उन्होंने अपने को योग में लगा दिया और सब प्राणियों को अभय दे दिया।

द्रोण ने मुख कुछ नीचे झुकाया, छाती आगे की, आँखें मूँदीं, सत्त्वगुण में स्थित होकर हृदय को ध्यान में लगाया, और ‘ॐ’ अक्षर का, जो ब्रह्म का प्रतीक है, स्मरण करते हुए, उस परम, सनातन, अविनाशी देवाधिदेव विष्णु में चित्त लीन कर दिया। सूर्य-समान तेजस्वी भारद्वाजपुत्र उस स्वर्ग की ओर चल पड़े जिसे पुण्यात्मा भी कठिनाई से पाते हैं। उस समय आकाश में मानो दो सूर्य दिखाई दिए, और सम्पूर्ण आकाश एक समान प्रकाश से जगमगा उठा।

समझने की कुंजी (अवधारणा): ‘योग’ से यहाँ अभिप्राय वह ध्यान-समाधि है जिसमें योगी अपने प्राणों को इच्छापूर्वक देह से ऊपर उठाकर परब्रह्म में लीन कर देता है। द्रोण का ‘प्राय’ में बैठना (आमरण-संकल्प से स्थिर होना) और ‘ॐ’ का स्मरण यह दर्शाता है कि उन्होंने शस्त्र-त्याग के साथ ही स्वेच्छा से देह छोड़ी; उनका वध और उनकी आत्मा का स्वर्गगमन एक ही क्षण के दो रूप हैं।

सार: भीम के कठोर वचनों और पुत्र-शोक से द्रोण ने धनुष नीचे रखकर शस्त्र त्याग दिए, अश्वत्थामा का नाम पुकारते हुए रथ पर योग में स्थित हो गए, और उनकी आत्मा ब्रह्म में लीन होने को चल पड़ी।

धृष्टद्युम्न के हाथों आचार्य का शीश और अर्जुन का विलाप

यही अवसर देखकर धृष्टद्युम्न ने अपनी सारी शक्ति बटोरी। बाण-सहित अपना भयानक धनुष रथ पर रखकर, तलवार उठाकर, वह रथ से कूदकर द्रोण की ओर लपका। मनुष्य और अन्य सब प्राणी “हाय! हाय! धिक्! धिक्!” पुकार उठे, यह देखकर कि द्रोण धृष्टद्युम्न के वश में आ गए। उधर द्रोण, शस्त्र त्यागकर, परम शान्त अवस्था में, उच्च तप वाले उस आचार्य ने अपना हृदय उस पुरातन परम पुरुष विष्णु में स्थिर कर रखा था।

धृष्टद्युम्न तलवार उठाए बैठे द्रोण के केश पकड़ता है; रथ से कृष्ण और अर्जुन रोकने के लिए हाथ बढ़ाते हैं।

सब वीर “द्रोण को मत मारो! ये वध के योग्य नहीं!” चिल्लाते रहे, पर धृष्टद्युम्न ने सब की अवहेलना कर दी। धनंजय अर्जुन रथ से कूदकर, भुजाएँ ऊपर उठाए, बार-बार पुकारते हुए दौड़े, “हे पृषतपुत्र, गुरु को जीवित ले आइए, मत मारिए! ये मारे जाने योग्य नहीं!” करुणा से द्रवित होकर अर्जुन ने बार-बार यही दुहराया। पर कौरवों और अर्जुन, सब की पुकार की उपेक्षा करते हुए, धृष्टद्युम्न ने प्राणहीन-से बैठे द्रोण का सिर बायें हाथ से पकड़कर खींचा, और तलवार से उसे धड़ से अलग कर दिया; आचार्य उस समय निःशब्द रहे।

श्यामवर्ण, कानों तक झूलते श्वेत केश वाले, पचासी वर्ष के उस वृद्ध ने, जो केवल आपके पुत्र दुर्योधन के लिए सोलह वर्ष के युवक की भाँति रणभूमि में विचरता रहा, अब अपना अन्त पाया। द्रोण का रक्त-रंजित शीश काटकर धृष्टद्युम्न हर्ष से सिंह-गर्जना करता, तलवार घुमाता हुआ रथ से धरती पर कूद पड़ा; रक्त से लथपथ वह सूर्य-सा लाल और अत्यन्त भयंकर दीख रहा था। फिर उसने आचार्य का वह विशाल सिर आपकी सेना के योद्धाओं के आगे फेंक दिया। उसे देखकर आपके सैनिक मन में पलायन ठानकर चारों दिशाओं में भाग खड़े हुए।

आकाश में प्रकाशमय ऋषियों का मंडल प्रकट होता है; नीचे कृष्ण, युधिष्ठिर और योद्धा हाथ जोड़े निहारते हैं।

संजय ने कहा कि केवल पाँच ही मनुष्य द्रोण की उस योग-महिमा को देख सके जब वे परम लोक को जा रहे थे: स्वयं संजय, अर्जुन, द्रोणपुत्र अश्वत्थामा, वासुदेव कृष्ण, और धर्मराज युधिष्ठिर। और कोई न देख सका कि वह शत्रुनाशक आचार्य, बाणों से बिंधी और रक्त से सनी देह को त्यागकर, ऋषियों के संग, ब्रह्म के उस परम लोक को चले गए जो देवताओं तक के लिए दुर्लभ है। संजय ने यह सत्य व्यास-पुत्र कृष्ण द्वैपायन की कृपा से ही देखा।

एक उप-कथा: यहाँ महाभारत की नैतिक जटिलता अपने चरम पर है। द्रोण निरस्त्र, ध्यान में लीन, और अभय-दान दे चुके थे; धृष्टद्युम्न ने एक योगस्थ, शस्त्रहीन वृद्ध का वध किया, इसीलिए सब ने उसे धिक्कारा और अर्जुन ने उसे रोकना चाहा। फिर भी कथा यह भी कहती है कि द्रोण ने स्वयं देह त्याग दी थी, और धृष्टद्युम्न द्रुपद के उस वैर का साधन-मात्र था जिसके लिए वह जन्मा था। कौन वध का कर्ता है, और कौन निमित्त, इस प्रश्न को व्यास खुला छोड़ देते हैं। ध्यान दीजिए कि भीम ने पहले धृष्टद्युम्न से प्रतिज्ञा भी की कि कर्ण और दुर्योधन के मारे जाने पर वह उसे विजयी मानकर पुनः गले लगाएगा।

द्रोण के गिरते ही कुरु, पाण्डव और सृंजय सब निरुत्साह होकर भागने लगे, और सेना बिखर गई। बहुत मारे गए, बहुत घायल हुए; आपके योद्धा तो मानो प्राणहीन हो गए। पराजय और भविष्य के भय से कुरु दोनों लोकों से वंचित-से, आत्म-नियन्त्रण खोकर भागे। सहस्र शीशविहीन धड़ों से ढकी रणभूमि पर राजा द्रोण का शरीर ढूँढ़ते रहे, पर पा न सके। विजयी पाण्डव बाणों और शंखों से सिंह-गर्जना करने लगे। भीमसेन ने धृष्टद्युम्न को गले लगाकर कहा, “हे पृषतपुत्र, मैं आपको तब फिर गले लगाऊँगा, विजय-माला पहने हुए, जब वह सूतपुत्र कर्ण और वह दुर्योधन भी रणभूमि में मारे जाएँगे।” फिर उसने हर्ष से भुजाएँ ठोंकीं, जिसके भयंकर शब्द से आपके सैनिक क्षत्रिय-धर्म भूलकर और भी भाग खड़े हुए।

समझने की कुंजी (स्थान): ‘ब्रह्मलोक’ अथवा ‘ब्रह्म का परम लोक’ वह सर्वोच्च गति है जिसे योग और तप से प्राप्त किया जाता है, और जो साधारण स्वर्ग से भी ऊपर है। द्रोण का इस लोक को जाना उनकी ब्राह्मणता, तप और अन्त-समय की योग-समाधि का फल बताया गया है, यद्यपि उनकी देह का अन्त छल से हुआ।

सार: अर्जुन और सब के मना करने पर भी धृष्टद्युम्न ने योगस्थ, निरस्त्र द्रोण का शीश काट डाला; आचार्य की आत्मा ब्रह्मलोक को गई, और सेनापति के गिरते ही कौरव-सेना भयभीत होकर बिखर गई।

कौरव-सेना का पलायन और अश्वत्थामा को सत्य का ज्ञात होना

द्रोण के पतन पर कौरव, अपने नायक से रहित, टूटे और पराजित होकर शोक में निस्तेज हो उठे। आँखों में आँसू और हृदय में भय लिए वे दुर्योधन के चारों ओर ऐसे सिमट आए जैसे हिरण्याक्ष के वध के बाद भयभीत दैत्य। भूख-प्यास से व्याकुल और सूर्य से झुलसे आपके योद्धा हतोत्साह हो गए। भारद्वाजपुत्र का गिरना उन्हें सूर्य के धरती पर गिर जाने, समुद्र के सूख जाने, या मेरु के उखड़ जाने जैसा लगा, और कौरव भय से भागने लगे, मानो भय ही उन्हें और तेज़ दौड़ा रहा हो।

गान्धारराज शकुनि अपने दल समेत और भी अधिक वेग से भागा। सूतपुत्र कर्ण भी अपनी विशाल सेना को लेकर पलायन कर गया। मद्रराज शल्य, शरद्वत-पुत्र कृप (“हाय! हाय!” कहते हुए), कृतवर्मा, उलूक, दुःशासन, और दस हज़ार रथ तथा तीन हज़ार हाथी लेकर वृषसेन, सब द्रोण के पतन को देख भाग खड़े हुए। दुर्योधन भी शेष संशप्तकों को साथ लेकर भागा; सुशर्मा भी भागा। केशविहीन, कवच ढीले किए, अस्त्र-वस्त्र फेंकते हुए योद्धा ऐसे भागे कि दो भी एक साथ दौड़ते न दिखाई दिए। “कुरुसेना पूर्णतः नष्ट हो गई,” यही सबका विश्वास हो गया।

उस भागती सेना के बीच केवल द्रोणपुत्र अश्वत्थामा ही, धारा के विरुद्ध तैरते विशाल मगर की भाँति, शत्रुओं पर टूट पड़ा। शिखण्डी, प्रभद्रक, पांचाल, चेदि और कैकेय योद्धाओं से उसका घोर युद्ध हुआ। अनेक दुर्जय योद्धाओं को मारकर, मतवाले हाथी की चाल से, उसने सेना को भागते देखा। दुर्योधन के पास जाकर उसने पूछा, “हे भारत, सेना भय से क्यों भाग रही है? आप इसे रोकते क्यों नहीं? आप भी अपनी सहज दशा में नहीं दिखते। किस सिंह-समान महारथी के मारे जाने पर आपकी सेना इस दशा को पहुँची? कर्ण आदि भी रणभूमि में नहीं ठहरे। क्या आपके सैनिकों पर कोई विपत्ति आ पड़ी है?”

द्रोणपुत्र के ये वचन सुनकर दुर्योधन वह कटु समाचार देने में असमर्थ रहा; वह डूबती नौका की भाँति शोक के समुद्र में धँस गया और आँखों से अश्रु बहाने लगा। लज्जा से भरकर उसने शरद्वत-पुत्र कृप से कहा कि वही बताए कि सेना क्यों भाग रही है। तब कृप ने बार-बार वेदना अनुभव करते हुए अश्वत्थामा को बताया कि उसके पिता का वध कैसे हुआ।

कृप ने कहा, “हम द्रोण को आगे रखकर केवल पांचालों से लड़ रहे थे। आपके पिता ने क्रोध से ब्रह्मास्त्र का आह्वान कर सहस्रों शत्रुओं को मारा; एक हज़ार वीर और दो हज़ार हाथी यम के लोक भेजे। श्यामवर्ण, कानों तक झूलते श्वेत केश वाले, पचासी वर्ष के द्रोण सोलह वर्ष के युवक-से लड़े। तब मधुसूदन कृष्ण ने पाण्डवों की विजय चाहकर कहा कि यह अस्त्र-श्रेष्ठ द्रोण वृत्र के संहारक इन्द्र से भी नहीं जीते जा सकते; अतः धर्म को एक ओर रखकर विजय की चिन्ता कीजिए, और अश्वत्थामा के मारे जाने का झूठ इन्हें कोई सुना दे। अर्जुन ने इसे न माना, पर शेष सब ने, और कठिनाई से युधिष्ठिर ने भी, इसे स्वीकार किया। भीम ने कुछ संकोच से कहा कि अश्वत्थामा मारा गया, पर आपके पिता ने विश्वास न किया। तब आपके पिता ने, जो आपसे इतना स्नेह करते थे, युधिष्ठिर से पूछा कि क्या उनका पुत्र सचमुच मारा गया। असत्य के भय और विजय की अभिलाषा के बीच, मालवराज इन्द्रवर्मा के अश्वत्थामा नामक उस पर्वत-सरीखे हाथी को, जिसे भीम ने मारा था, मन में रखकर, युधिष्ठिर ने द्रोण से कहा कि अश्वत्थामा मारा गया, और धीमे स्वर में ‘हाथी’ शब्द जोड़ दिया। पुत्र की मृत्यु सुनकर द्रोण विलाप करने लगे, अपने दिव्य अस्त्रों को रोककर पहले की भाँति न लड़े, और अन्ततः सब अस्त्र त्यागकर रणभूमि में ‘प्राय’ में बैठ गए। तब पृषतपुत्र ने सबकी और अर्जुन की चेतावनियों की अवहेलना कर, बायें हाथ से उनका सिर पकड़कर काट डाला। इसी कारण सेना भाग रही है, और हम भी।”

अपने पिता के इस अधर्म-वध का समाचार सुनकर अश्वत्थामा पैरों से कुचले गए सर्प की भाँति प्रचण्ड क्रोध से भर उठा। बड़ी मात्रा में ईंधन पाए अग्नि की तरह वह दहक उठा; उसने हाथ मसले, दाँत पीसे, साँप-सी फुफकार छोड़ी, और उसकी आँखें रक्त-समान लाल हो गईं।

समझने की कुंजी (वंश): अश्वत्थामा द्रोण और कृपी (शरद्वत-कन्या) का पुत्र था, इसीलिए उसे ‘शरद्वत-कन्या का पुत्र’ और ‘द्रोणपुत्र’ कहा जाता है। शरद्वत-पुत्र कृप उसके मामा थे। द्रोण ने अपने इस एकमात्र पुत्र को परशुराम से पाई समस्त दिव्य अस्त्र-विद्या दी थी; अब वही अश्वत्थामा पिता के वध का प्रतिशोध लेने को उठ खड़ा हुआ।

सार: सेनापति के पतन पर कौरव-सेना भाग खड़ी हुई; केवल अश्वत्थामा डटा रहा, और कृप से पिता के अर्धसत्य-जनित, अधर्म-वध का पूरा वृत्तान्त सुनकर वह प्रतिशोध की प्रचण्ड ज्वाला में जल उठा।

पाँचवें दिन की दोपहर: द्रोण का अबाध्य प्रकोप

संजय धृतराष्ट्र को सुना रहे थे। महाराज, उस दिन रणभूमि में आचार्य द्रोण ऐसे दहक रहे थे जैसे प्रलय के अन्त में स्वयं संहारक मूर्ति। साढ़े पचासी वर्ष की आयु, साँवला रंग, कानों तक झूलते सफ़ेद केश, और फिर भी सोलह वर्ष के तरुण की चपलता से वे रथ पर घूम रहे थे। चार दिन और एक रात तक उन्होंने निरन्तर बाण बरसाए थे, पर उनका तरकश रीता न हुआ था। पाँचवें दिन के तीसरे प्रहर में ही जाकर उनके बाण घटने लगे।

क्रुद्ध द्रोण रथ पर से भुजा फैलाकर आदेश देते हैं, सामने हाथ जोड़े योद्धा और सैनिक खड़े हैं।

आचार्य ने ब्रह्मास्त्र (ब्रह्मा का दिव्य अस्त्र) का आवाहन किया। उस एक अस्त्र से उन्होंने सहस्रों योद्धा और हाथी यमलोक भेज दिए। संजय ने गिनकर कहा, चौबीस हज़ार क्षत्रिय उन्होंने काट डाले, और फिर दस गुना दस हज़ार को अपने तीक्ष्ण बाणों से यमालय पहुँचाया। पाण्डव, केकय, मत्स्य और पाञ्चाल जो भी उनके रथ के समीप आता, नष्ट हो जाता। वे ऐसे चमक रहे थे जैसे मध्याह्न का सूर्य, जिस पर कोई आँख नहीं टिका सकता।

तब मधु के वंशज श्रीकृष्ण ने, जो पाण्डुपुत्र की विजय चाहते थे, युधिष्ठिर से एक भारी बात कही। उन्होंने कहा, आचार्य द्रोण समस्त शस्त्रधारियों में परम हैं। यदि ये क्रोध में भरकर आधा दिन भी और लड़ते रहे, तो हम सत्य कहते हैं, आपकी समूची सेना का अन्त हो जाएगा। इसलिए हमें द्रोण से बचाइए। ऐसी विकट घड़ी में असत्य भी सत्य से ऊपर ठहरता है। किसी का प्राण बचाने के लिए असत्य बोलने से मनुष्य पाप से नहीं बँधता। स्त्री के विषय में, विवाह में, राजा की रक्षा में, अथवा ब्राह्मण को उबारने में बोला गया असत्य, पाप नहीं माना गया।

समझने की कुंजी (अवधारणा): यहीं महाभारत अपनी नैतिक गहराई दिखाता है। श्रीकृष्ण स्वयं पाँच अपवाद गिनाते हैं जहाँ असत्य क्षम्य है। यह नियम-भंग का नरम बहाना नहीं, उस संकट का प्रत्यक्ष चित्र है जिसमें धर्म की परिभाषा ही काँप जाती है। पाठ इसे छिपाता नहीं, सामने रखता है कि विजय किस मूल्य पर खरीदी गई।

अश्वत्थामा नामक हाथी और भीम का छल

भीम विशाल गदा से हाथी का वध करता है; पास रथ पर कृष्ण संकेत करते हैं और वृद्ध योद्धा बैठा है।

तभी भीमसेन ने महाराज युधिष्ठिर को सम्बोधित करके कहा, जैसे ही मैंने सुना कि महात्मा द्रोण किस उपाय से वध्य हैं, मैंने अपना पराक्रम दिखाकर एक विशाल हाथी मार डाला। वह हाथी इन्द्र के ऐरावत-सा विशाल था और मालव-अधिपति इन्द्रवर्मा का था, जो आपकी ही सेना में खड़ा था। उस हाथी का नाम अश्वत्थामा था। तब मैं द्रोण के पास गया और उनसे कह आया, हे ब्राह्मण, अश्वत्थामा मारा गया, अब युद्ध बन्द कीजिए। परन्तु आचार्य ने मेरी बात पर विश्वास नहीं किया।

भीम ने आगे कहा, हे राजन, आप विजय चाहते हैं तो गोविन्द की सम्मति मान लीजिए। आचार्य से कह दीजिए कि शरद्वान् की पुत्री का पुत्र अब नहीं रहा। आपके कहे को वे ब्राह्मणश्रेष्ठ कभी असत्य न मानेंगे, क्योंकि तीनों लोकों में आप सत्यवादी विख्यात हैं।

भीम के इन वचनों से, और कृष्ण की सम्मति से, और होनहार की अनिवार्यता से प्रेरित होकर, युधिष्ठिर ने मन बनाया। असत्य बोलने से वे डर रहे थे, पर विजय की इच्छा प्रबल थी। उन्होंने स्पष्ट स्वर में कहा कि अश्वत्थामा मारा गया, और फिर धीमे, अस्पष्ट स्वर में जोड़ दिया, हाथी। द्रोण से उन्होंने कहा, जिसके लिए आप शस्त्र उठाते हैं, जिसे देखकर आप जीते हैं, वह आपका प्रिय पुत्र अश्वत्थामा मारा गया है। प्राणहीन होकर वह नंगी धरती पर पड़ा है, जैसे कोई सिंहशावक।

युधिष्ठिर के रथ तले धरती चटकती है और आकाश में उल्का लपकती है; सामने वृद्ध योद्धा शस्त्र त्यागे बैठा है।

समझने की कुंजी (अवधारणा): कथा कहती है कि इस असत्य से पहले युधिष्ठिर का रथ धरती से चार अंगुल ऊपर चलता था, यह उनके सत्य का प्रतीक था। उस आधे-सत्य के क्षण के बाद उनका रथ और घोड़े धरती छू गए। एक छोटा-सा छल, और धर्मराज की वह अलौकिक उठान सदा के लिए चली गई। यही महाभारत का तराज़ू है।

द्रोण ने यह सुना तो पुत्र की कल्पित मृत्यु के शोक से व्याकुल होकर निराशा में डूब गए। ऋषियों के वचन भी उन्हें स्मरण आ रहे थे, जिनके अनुसार वे स्वयं को उन महात्मा पाण्डवों के विरुद्ध एक भारी अपराधी मानने लगे थे। पुत्र की मृत्यु सुनकर वे पूरी तरह उदास और चिन्ता से भर गए। और जब उन्होंने धृष्टद्युम्न को सामने देखा, तो वे आचार्य पहले की भाँति युद्ध न कर सके।

द्रोण और धृष्टद्युम्न: रथहीन योद्धा की तलवारबाज़ी

द्रोण को इस प्रकार चिन्ता में डूबा और शोक से लगभग संज्ञाहीन देखकर, पाञ्चालराज के पुत्र धृष्टद्युम्न उन पर टूट पड़े। इस वीर को द्रुपद ने एक महायज्ञ में हवि के भोक्ता अग्नि से इसी प्रयोजन के लिए प्राप्त किया था कि वह द्रोण का संहारक बने। उन्होंने एक विजयदायी, भयंकर धनुष उठाया जिसकी टंकार मेघगर्जन-सी थी, और उस पर विषैले सर्प-सा एक प्रचण्ड बाण चढ़ाया।

रथारूढ़ द्रोण बाणों की झड़ी बरसाते हैं; सामने ढाल लिए योद्धा झुककर वार से बचता है।

उस ज्वलित बाण को सन्धान करते देख आचार्य ने सोचा कि अब उनकी देह का अन्तिम क्षण आ पहुँचा। उन्होंने उस बाण को व्यर्थ करना चाहा, पर हाय, उनके दिव्यास्त्र अब उनके पुकारने पर प्रकट न हुए। तब आंगिरस का दिया हुआ एक और दिव्य धनुष और ब्राह्मण के शाप जैसे बाण लेकर वे फिर लड़ने लगे। उन्होंने धृष्टद्युम्न को बाणों की घनी वर्षा से ढक दिया, उसके बाण, ध्वजा और धनुष के सौ-सौ टुकड़े कर डाले, और उसके सारथि को भी बेध डाला।

धृष्टद्युम्न मुस्कुराकर दूसरा धनुष उठाते और द्रोण की छाती के बीचोंबीच तीखा बाण मारते। द्रोण ने फिर उसका धनुष काट दिया, फिर उसके सारे शस्त्र और धनुष काट डाले, केवल गदा और तलवार बचने दी। उन्होंने प्राण लेने वाले नौ तीखे बाणों से क्रुद्ध पाञ्चाल को बेध दिया। धृष्टद्युम्न ने ब्रह्मास्त्र का आवाहन कर अपने और शत्रु के घोड़ों को आपस में मिला दिया। वे लाल और कपोत-वर्ण के घोड़े ऐसे लगते थे जैसे वर्षा-ऋतु में बिजली से भरे गरजते बादल।

द्रोण ने धृष्टद्युम्न के रथ की धुरी, पहिये और जोड़ काट डाले। धनुषहीन, रथहीन, अश्वहीन और सारथिहीन होकर वीर धृष्टद्युम्न ने गदा पकड़ी, पर उसे भी द्रोण ने उछलते ही बाणों से काट गिराया। तब उस नरश्रेष्ठ ने एक निर्मल तलवार और सौ चन्द्रों से सजी चमकीली ढाल उठाई।

अब रथहीन धृष्टद्युम्न तलवार और ढाल लेकर अद्भुत युद्ध-कौशल दिखाने लगे। वे कभी रथ के पिटारे में छिपते, कभी रथ-दण्ड पर सवार होते, कभी द्रोण के लाल घोड़ों की जाँघों के नीचे चले जाते। उन्होंने इक्कीस प्रकार की प्रसिद्ध गतियाँ दिखाईं, चक्कर काटना, तलवार ऊपर घुमाना, बग़ल से वार करना, आगे झपटना, ऊँची छलाँग लगाना, पार्श्व पर प्रहार करना, पीछे हटना, और फिर शत्रु से जूझना। उन्होंने भारत, कौशिक और सात्वत नामक व्यूह-कौशल दिखाए। देवता और योद्धा यह देखकर विस्मित रह गए।

द्रोण ने सहस्र बाण चलाकर धृष्टद्युम्न की तलवार और सौ-चन्द्र वाली ढाल काट दी। पास से किए ऐसे युद्ध में द्रोण बित्ता-भर लम्बे बाण चलाते थे, जो केवल समीप के युद्ध में काम आते हैं और जो कृप, पार्थ, अश्वत्थामा, कर्ण, प्रद्युम्न, युयुधान और अभिमन्यु के सिवा किसी के पास न थे। तब आचार्य ने अपने प्रिय शिष्य को, जो उन्हें अपने पुत्र-सा था, मारने की इच्छा से धनुष पर वेगवान बाण चढ़ाया। पर उस बाण को सात्यकि ने आपके पुत्र और महात्मा कर्ण के देखते-देखते दस बाणों से काट दिया, और मृत्यु के मुख में जाते धृष्टद्युम्न को उबार लिया।

सार: द्रोण ने अकेले ही धृष्टद्युम्न को बार-बार निःशस्त्र किया, पर शोक उनके भीतर बैठ चुका था। सात्यकि ने पाञ्चाल-राजकुमार को बचाकर अन्तिम संघर्ष को कुछ क्षण और टाल दिया। केशव और धनंजय ने सात्यकि का कौशल देखकर उच्च स्वर में सराहा, उत्तम, उत्तम।

सात्यकि का घेराव और द्रोण का अन्तिम संकल्प

सात्यकि के पराक्रम से क्रुद्ध होकर दुर्योधन आदि ने सिनि-पौत्र को चारों ओर से घेर लिया। कृप, कर्ण और आपके पुत्रों ने उन पर तीखे बाण बरसाए। तब युधिष्ठिर, माद्री के दोनों पुत्र और महाबली भीमसेन सात्यकि की रक्षा के लिए उन्हें घेरकर खड़े हो गए। सात्यकि ने अकेले ही उन सब रथियों के विरुद्ध अपने दिव्यास्त्रों से वह भयानक बाण-वर्षा रोक दी। रणभूमि क्रूर दृश्यों से भर गई, कटी भुजाएँ, सिर, धनुष, छत्र और चँवर ढेरों में पड़े थे।

तब धर्मराज युधिष्ठिर ने अपने योद्धाओं को आज्ञा दी, हे महारथियो, अपना समूचा बल लगाकर कुम्भज (घड़े से उत्पन्न द्रोण) पर टूट पड़ो। वहाँ वीर धृष्टद्युम्न द्रोण से जूझ रहा है। जिस रूप में वह दिख रहा है, उससे लगता है कि वह आज क्रोध में भरकर द्रोण को गिरा देगा। सब मिलकर कुम्भज से युद्ध करो। आज्ञा पाकर सृंजय-महारथी द्रोण पर झपटे।

द्रोण भी, यह जानते हुए कि अब वे मरेंगे, उन योद्धाओं पर वेग से टूट पड़े। जब वे आगे बढ़े, तो धरती काँप उठी, भयंकर पवन चले, सूर्य से निकलते-से उल्कापिण्ड गिरे। आचार्य के अस्त्र जैसे ज्वलित होने लगे, रथ कर्कश आवाज़ें करने लगे, घोड़े आँसू बहाने लगे। द्रोण का बायाँ नेत्र और बायाँ हाथ फड़कने लगा। ऋषियों के स्वर्ग-प्रयाण-सम्बन्धी वचन स्मरण कर वे उदास हो गए और निश्चय कर लिया कि अब वे यथोचित युद्ध करके ही प्राण त्यागेंगे।

द्रोण ने उस दिन चौबीस हज़ार क्षत्रिय और फिर एक लाख योद्धा अपने तीखे बाणों से यमालय भेज दिए। क्षत्रिय-वंश के उच्छेद के लिए उन्होंने पुनः ब्रह्मास्त्र का सहारा लिया। तब भीम ने रथहीन, शस्त्रहीन धृष्टद्युम्न को अपने रथ पर उठा लिया और कहा, आपके सिवा कोई दूसरा पुरुष आचार्य से जूझने का साहस नहीं कर सकता। शीघ्र उन्हें मारिए। उनके वध का भार आप ही पर है।

भीम के कहने पर धृष्टद्युम्न ने एक सुदृढ़, नूतन धनुष उठाया और द्रोण पर बाण बरसाने लगे। दोनों योद्धाओं ने ब्रह्मास्त्र और अनेक दिव्यास्त्रों का आवाहन किया। द्रोण ने पाञ्चाल का धनुष फिर काट दिया और उसके मर्मस्थलों को अनेक बाणों से बेध दिया।

भीम के कठोर वचन और ऋषियों का धर्मोपदेश

क्रुद्ध योद्धा वृद्ध द्रोण के सामने उंगली उठाकर आरोप लगाता है; पीछे कृष्ण रथ पर बैठे दिखते हैं।

तब अत्यन्त क्रुद्ध भीम ने द्रोण के रथ को थामकर धीरे से कहे ये कठोर वचन। यदि अपने धर्म से असन्तुष्ट, पर शस्त्र-विद्या में निपुण ब्राह्मण-अधम युद्ध न करते, तो क्षत्रिय-वंश का यों उच्छेद न होता। समस्त प्राणियों के प्रति अहिंसा परम धर्म कही गई है, और ब्राह्मण उसी धर्म की जड़ है। आप तो ब्रह्म के परम ज्ञाता हैं। पुत्र और पत्नी के लिए धन की इच्छा से, मात्र एक पुत्र के लिए, इन सब म्लेच्छों और योद्धाओं को मारते हुए क्या आपको लज्जा नहीं आती? जिसके लिए आपने शस्त्र उठाए, जिसके लिए आप जीते हैं, वह आज आपकी पीठ पीछे, आपकी जानकारी के बिना, रणभूमि में प्राणहीन पड़ा है। धर्मराज युधिष्ठिर ने आपको यही बताया है। इसमें सन्देह करना आपको शोभा नहीं देता।

भीम के इन वचनों से द्रोण ने धनुष नीचे रख दिया। समस्त शस्त्र त्यागने को उद्यत होकर सद्धर्मा भारद्वाज-पुत्र ने ऊँचे स्वर में पुकारा, हे कर्ण, हे कर्ण, हे महाधनुर्धर, हे कृप, हे दुर्योधन, मैं आप सब से बार-बार कहता हूँ, युद्ध में सावधानी से अपना पराक्रम दिखाइए। पाण्डवों से आपको कोई क्षति न हो। रही मेरी बात, मैं अपने शस्त्र त्याग रहा हूँ। यह कहकर उन्होंने ऊँचे स्वर में अश्वत्थामा का नाम पुकारा।

शस्त्र त्यागकर वे रथ की वेदी पर बैठ गए और योग में लीन हो गए, समस्त प्राणियों को अभय देते हुए। तभी ऋषिगण उनके सामने प्रकट हुए और बोले, आप अधर्म से युद्ध कर रहे हैं। आपके इस लोक में रहने का काल अब पूरा हुआ। आपने ब्रह्मास्त्र से उन मनुष्यों को भी जलाया जो शस्त्र-विद्या नहीं जानते थे। हे द्विज, यह कर्म धर्म्य नहीं। बिना विलम्ब शस्त्र त्याग दीजिए। ऐसा पापकर्म न कीजिए।

वृद्ध द्रोण रथ से हाथ बढ़ाकर सामने बैठे युधिष्ठिर से प्रश्न करते हैं, पास कृष्ण शांत भाव से देखते हैं।

ऋषियों के और भीम के ये वचन सुनकर, और सामने धृष्टद्युम्न को देखकर, द्रोण अत्यन्त खिन्न हो गए। शोक से जलते हुए उन्होंने कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर से पूछा कि उनका पुत्र अश्वत्थामा मारा गया या नहीं। द्रोण का दृढ़ विश्वास था कि युधिष्ठिर तीनों लोकों के राज्य के लिए भी असत्य न बोलेंगे। इसी कारण उन्होंने युधिष्ठिर से ही पूछा, किसी और से नहीं। बचपन से ही उन्होंने युधिष्ठिर से सत्य की आशा रखी थी।

एक उप-कथा: इसी क्षण कृष्ण ने युधिष्ठिर से वह बात दुहराई कि द्रोण आधा दिन भी और लड़े तो पाण्डव-सेना समाप्त हो जाएगी, और प्राण बचाने के लिए कहा गया असत्य पाप नहीं होता। ध्यान रहे, द्रोण ने प्रश्न जान-बूझकर युधिष्ठिर से ही किया, क्योंकि वही एक व्यक्ति था जिसके मुख से वे झूठ की कल्पना नहीं कर सकते थे। आधे-सत्य की मार इसी विश्वास पर पड़ी।

युधिष्ठिर ने, असत्य के दुष्परिणाम भली-भाँति जानते हुए भी, विजय की इच्छा और मृत्यु के भय से, वही बात फिर कही। उन्होंने अश्वत्थामा के नाम के बाद हाथी शब्द अस्पष्ट जोड़ दिया। युधिष्ठिर के मुख से यह सुनकर महारथी द्रोण पुत्र की कल्पित मृत्यु से शोकाकुल होकर निराशा के वश हो गए।

योग में लीन आचार्य और धृष्टद्युम्न का खड्ग

द्रोण को इस प्रकार चिन्ता में डूबा और शोक से लगभग संज्ञाहीन देखकर धृष्टद्युम्न ने अपनी समस्त शक्ति बटोरी। रथ पर अपना भयंकर धनुष, जिस पर बाण चढ़ा था, रखकर उन्होंने तलवार उठाई और रथ से कूदकर द्रोण की ओर वेग से दौड़े। द्रोण को धृष्टद्युम्न के वश में आता देख समस्त प्राणी, मनुष्य और अन्य, हाहाकार कर उठे। चारों ओर से हाय और धिक्कार के स्वर उठे।

ध्यानस्थ द्रोण के मस्तक से ज्योति निकलकर आकाश की ओर उठती है; कृष्ण और योद्धा यह दृश्य देखते हैं।

आचार्य उस समय शस्त्र त्यागकर परम शान्त अवस्था में थे। वे महातेजस्वी, परम तपस्वी, अपने हृदय को उस सनातन और प्राचीन पुरुष विष्णु में स्थिर कर चुके थे। मुख कुछ झुकाकर, वक्ष आगे किए, नेत्र मूँदकर, सत्त्वगुण में स्थित होकर, ओंकार का स्मरण करते हुए वे योग में लीन थे। ऐसे ही ध्यान में डूबे उच्च तपोमय द्रोण उस स्वर्ग की ओर चल पड़े जो पुण्यवानों को भी दुर्लभ है।

हमें ऐसा प्रतीत हुआ कि आकाश में दो सूर्य हो गए हैं। समूचा गगन प्रकाश से भर गया, जब सूर्य-तेज भारद्वाज वहाँ से लोप हुए। देवताओं के आनन्द-स्वर सुनाई दिए। जब द्रोण ब्रह्मलोक को गए, तब धृष्टद्युम्न इस सब से अनजान उनके पास खड़े रहे। महाराज, मनुष्यों में केवल पाँच ने योग में लीन द्रोण को परम धाम जाते देखा, मैंने (संजय), धनंजय, अश्वत्थामा, वासुदेव और धर्मराज युधिष्ठिर ने। और किसी ने वह तेज न देखा। आचार्य का वह शरीर बाणों से बिंधा और रक्त से नहाया, शस्त्र त्यागे हुए, धरती पर शान्त पड़ा था।

धृष्टद्युम्न द्रोण का कटा शीश ऊँचा उठाए खड़ा है; रथ पर कृष्ण और योद्धा हाथ उठाकर स्तब्ध रह जाते हैं।

तब प्रिषत-पुत्र, यद्यपि सब उन्हें धिक्कार रहे थे, प्राणहीन द्रोण के सिर पर दृष्टि डालकर उसे घसीटने लगे। फिर अपनी तलवार से उन्होंने शत्रु के धड़ से वह सिर काट लिया, वह शत्रु तो उस समय निःशब्द था। भारद्वाज-पुत्र को मारकर धृष्टद्युम्न महान हर्ष से भर गए और तलवार घुमाते हुए सिंहनाद करने लगे।

सिर कटने से पूर्व महाबाहु धनंजय ने पुकारा था, हे द्रुपद-पुत्र, आचार्य को जीवित ले आइए, इन्हें मत मारिए, इनका वध नहीं होना चाहिए। सारी सेना भी ऐसा ही पुकार उठी थी। अर्जुन तो विशेष करुणा से द्रवित होकर बार-बार चिल्लाए। पर अर्जुन की और सब राजाओं की पुकार की उपेक्षा कर धृष्टद्युम्न ने द्रोण को रथ की वेदी पर ही मार डाला। द्रोण के रक्त से सना धृष्टद्युम्न रथ से कूदकर धरती पर आ गया, सूर्य-सा लाल, अत्यन्त भयंकर। फिर उसने भारद्वाज-पुत्र का वह विशाल सिर आपकी सेना के योद्धाओं के सामने फेंक दिया।

समझने की कुंजी (संख्या): द्रोण साढ़े पचासी वर्ष के थे, फिर भी सोलह वर्ष के तरुण-से युद्ध करते थे। केवल पाँच साक्षी थे उनके योग-प्रयाण के। आधुनिक समतुल्य में, यह वह दृश्य है जहाँ एक राष्ट्र का सेनापति, अपनी पूरी सामर्थ्य रहते हुए, एक मनोवैज्ञानिक आघात (पुत्र-मृत्यु के समाचार) से अस्त्र रख देता है, और तभी मारा जाता है। युद्ध-नीति और छल की रेखा यहीं धुँधली पड़ती है।

कौरव-सेना का पलायन और सेनापतियों का भागना

आपके सैनिक भारद्वाज-पुत्र का सिर देखकर मन में पलायन का निश्चय कर सब दिशाओं में भाग चले। इधर द्रोण आकाश में चढ़कर नक्षत्र-पथ में प्रविष्ट हो गए। महाराज, सत्यवती-पुत्र कृष्ण द्वैपायन की कृपा से ऋषियों के अनुग्रह से मैंने द्रोण की मृत्यु का यथार्थ देखा। मैंने उस तेजस्वी को आकाश पर चढ़कर धूमरहित ज्वलित अग्नि-खण्ड-सा जाते देखा।

द्रोण के गिरते ही कौरव, पाण्डव और सृंजय, सब उदास होकर तेज़ी से भाग चले। सेना टूट गई। बहुत मारे गए, बहुत बाणों से घायल हुए। द्रोण के पतन पर आपके योद्धा तो जैसे प्राणहीन हो गए। पराजय पाकर, भविष्य के भय से भरकर, कौरवों ने स्वयं को दोनों लोकों से वंचित माना। उन्होंने सारा आत्म-संयम खो दिया। हज़ारों कबन्धों से ढकी रणभूमि में राजा भारद्वाज-पुत्र का शव खोजते रहे, पर पा न सके।

पाण्डव विजय पाकर और भविष्य के महान यश की आशा से बाणों, शंखों और सिंहनादों से उच्च स्वर करने लगे। तब भीमसेन और प्रिषत-पुत्र धृष्टद्युम्न पाण्डव-सेना के बीच एक-दूसरे का आलिंगन करते देखे गए। भीम ने धृष्टद्युम्न से कहा, हे प्रिषत-पुत्र, मैं आपको विजयी होकर तब फिर आलिंगन करूँगा जब वह सूतपुत्र-अधम और वह दूसरा अधम दुर्योधन युद्ध में मारे जाएँगे। यह कहकर भीम ने हर्ष में भरकर भुजाओं पर ताल ठोकी, जिससे धरती काँप उठी।

द्रोण के गिरने पर कौरव-सेना नायकहीन, टूटी और पराजित होकर शोक से शक्तिहीन हो गई। धूल से ढके, भय से काँपते, सूखे कण्ठ से वे ऐसे लगते थे जैसे प्राचीन काल में हिरण्याक्ष के गिरने पर दैत्य। आपके पुत्र दुर्योधन उनके बीच ठहर न सके।

गान्धार-नरेश शकुनि, सोने के रथ वाले द्रोण को मरा देख, अपने दल समेत और भी अधिक वेग से भागे। सूतपुत्र कर्ण भी भयभीत होकर अपना विशाल दल लिए भागे। मद्रराज शल्य चारों ओर शून्य दृष्टि डालते रथ, हाथी और घोड़ों से भरे अपने दल समेत भागे। शरद्वान्-पुत्र कृप हाय-हाय करते हाथियों और पैदल के बचे-खुचे दल समेत भागे। कृतवर्मा अपने भोज, कलिंग, अरट्ट और बाह्लीक योद्धाओं के अवशेष से घिरे तेज़ घोड़ों पर भागे। उलूक भयभीत होकर बड़े पैदल-दल समेत भागे। दुःशासन अपने गज-दल से घिरे चिन्तित होकर भागे।

वृषसेन दस हज़ार रथ और तीन हज़ार हाथी लेकर वेग से भागे। महारथी दुर्योधन हाथियों, घोड़ों, रथों और पैदलों से घिरे, उन संशप्तकों के अवशेष समेत, जिन्हें अर्जुन ने अभी नहीं मारा था, भागे। सुशर्मा भी द्रोण को मरा देख भागे। हाथी, रथ और घोड़ों पर सवार समस्त कौरव-योद्धा सोने के रथ वाले द्रोण को मारा देख रणभूमि से भागे। बिखरे केश, ढीले कवच, ऐसी दशा में वे भागे कि दो व्यक्ति भी साथ दौड़ते दिखाई न देते थे। कुरु-सेना पूरी तरह नष्ट हो गई, यही सबका विश्वास था।

सार: आचार्य का सिर धरती पर गिरते ही कौरव-शिविर का सारा मनोबल बिखर गया। हर बड़ा सेनापति, शकुनि, कर्ण, शल्य, कृप, कृतवर्मा, उलूक, दुःशासन, वृषसेन, दुर्योधन, सुशर्मा, अपना दल लेकर भागा। पाण्डव-पक्ष में भीम और धृष्टद्युम्न का विजय-आलिंगन हुआ, पर भीम ने स्पष्ट कहा कि उत्सव तभी पूरा होगा जब कर्ण और दुर्योधन भी मारे जाएँगे।

अश्वत्थामा का शोक और रोष: दुर्योधन के सामने प्रतिज्ञा

जब सब सेनाएँ वेग से भाग रही थीं, केवल द्रोण-पुत्र अश्वत्थामा, धारा के विरुद्ध चढ़ते विशाल नक्र (घड़ियाल) की भाँति, शत्रुओं पर टूट पड़े। शिखण्डी, प्रभद्रक, पाञ्चाल, चेदि और केकयों के बीच उनका घोर युद्ध हुआ। फिर मतवाले हाथी-सी चाल वाले उस वीर ने देखा कि कौरव-सेना भागने पर तुली है। वे दुर्योधन के पास पहुँचे और बोले, हे भारत, सेना भयभीत-सी क्यों भाग रही है? आप इसे रोकते क्यों नहीं? आप भी अपने स्वभाव में नहीं जान पड़ते। उस सिंह-सरीखे महारथी के वध से क्या आपकी सेना इस दशा को पहुँची है? क्या आपके सैनिकों पर कोई विपत्ति आ पड़ी, हे भारत?

अश्वत्थामा के ये वचन सुनकर दुर्योधन वह कटु समाचार दे न सके। शोक के समुद्र में डूबती नौका-से वे आँसुओं से नहा गए। लज्जित होकर राजा ने शरद्वान्-पुत्र से कहा, आप ही बताइए कि सेना क्यों भाग रही है। तब कृप ने बार-बार वेदना अनुभव करते हुए द्रोण-पुत्र को बताया कि उनके पिता किस प्रकार मारे गए।

कृप ने कहा, हमने द्रोण को आगे रखकर पाञ्चालों से युद्ध आरम्भ किया। आपके पिता ने क्रोध में भरकर ब्रह्मास्त्र का आवाहन किया और सहस्रों शत्रु मारे। एक हज़ार वीर और दो हज़ार हाथी उन्होंने यमालय भेजे। पर जब शत्रु लौटने लगे, तब मधुसूदन ने पाण्डवों से कहा, यह शस्त्रधारियों में परम है, इन्द्र भी इसे रणभूमि में नहीं जीत सकता। हे पाण्डवो, धर्म एक ओर रखकर विजय की रक्षा करो, अन्यथा सोने के रथ वाले द्रोण आप सबको मार डालेंगे। मेरा विचार है, अश्वत्थामा के गिरने पर ये युद्ध न करेंगे। कोई इन्हें झूठ कह दे कि अश्वत्थामा मारा गया।

कृप ने आगे कहा, यह सुनकर कुन्तीपुत्र धनंजय ने इसे स्वीकार नहीं किया। पर सबने, और कठिनाई से युधिष्ठिर ने भी, इसे माना। तब भीमसेन ने कुछ लज्जित होकर आपके पिता से कहा, अश्वत्थामा मारा गया। पर आपके पिता ने विश्वास न किया। समाचार को असत्य समझकर, आपके प्रति स्नेहवश आपके पिता ने युधिष्ठिर से पूछा कि आप सचमुच मरे या नहीं।

असत्य के भय से, पर विजय के अभिलाषी युधिष्ठिर ने मालव-अधिपति इन्द्रवर्मा के उस विशाल हाथी को, जो पर्वत-सा बड़ा और अश्वत्थामा नामक था और भीम के हाथों मारा गया था, स्मरण कर द्रोण से कहा, हे ब्राह्मणश्रेष्ठ, जिसके लिए आप शस्त्र चलाते हैं, जिसे देखकर आप जीते हैं, वह आपका प्रिय पुत्र अश्वत्थामा मारा गया, सिंहशावक-सा वह नंगी धरती पर पड़ा है। असत्य के दुष्परिणाम जानते हुए भी राजा ने अश्वत्थामा के बाद हाथी शब्द अस्पष्ट जोड़ा।

पुत्र के पतन की बात सुनकर द्रोण शोक से विलाप करने लगे। दिव्यास्त्रों को रोककर वे पहले की भाँति न लड़े। उन्हें चिन्ता में, लगभग संज्ञाहीन देखकर क्रूरकर्मा पाञ्चाल-पुत्र उन पर टूट पड़ा। अपने नियत संहारक को सामने देख, मनुष्य और वस्तुओं के समस्त सत्य के ज्ञाता द्रोण ने दिव्यास्त्र त्यागकर रणभूमि में प्राय (प्रायोपवेश, मरण-व्रत) धारण किया। तब प्रिषत-पुत्र ने बाएँ हाथ से द्रोण का सिर पकड़कर, समस्त वीरों की ऊँची मनाही की उपेक्षा कर, वह सिर काट डाला। द्रोण का वध न हो, चारों ओर यही स्वर उठा। अर्जुन भी रथ से कूदकर भुजाएँ उठाए दौड़े, हे धर्मज्ञ, आचार्य को मत मारो, इन्हें जीवित लाओ। पर कौरवों और अर्जुन की मनाही के बावजूद धृष्टद्युम्न ने आपके पितातुल्य आचार्य को मार डाला। इसी से भयभीत होकर सेना भाग रही है, और हम भी अत्यन्त खिन्न होकर यही कर रहे हैं।

अपने पिता के वध की बात सुनकर द्रोण-पुत्र, पैर से कुचले सर्प-से, प्रचण्ड क्रोध से भर गए। बहुत-से ईंधन से बढ़ी अग्नि-से वे दहक उठे। हाथ मलते, दाँत पीसते, सर्प-सी साँसें भरते, उनके नेत्र रक्त-से लाल हो गए।

एक उप-कथा: धृतराष्ट्र ने संजय से अश्वत्थामा का परिचय पूछा। संजय ने बताया कि वे शस्त्र-विद्या में कर्ण के, युद्ध में पुरन्दर (इन्द्र) के, तेज में कार्तवीर्य के, और बुद्धि में बृहस्पति के समान हैं। धैर्य में पर्वत, तेज में अग्नि, गाम्भीर्य में समुद्र, और क्रोध में सर्प-विष के तुल्य। द्रोण ने राम (परशुराम) से अस्त्र-विद्या पाकर अपने पुत्र को सब दिव्यास्त्र दिए थे। और यह भी विधान था कि जैसे यज्ञसेन का पुत्र द्रोण का संहारक नियत हुआ, वैसे अश्वत्थामा धृष्टद्युम्न का संहारक नियत है।

सार: कृप ने अश्वत्थामा को पूरी कथा सुनाई, ब्रह्मास्त्र, कृष्ण की सलाह, भीम का हाथी-वध, युधिष्ठिर का आधा-सत्य, द्रोण का प्राय-व्रत और धृष्टद्युम्न का खड्ग। यह सुनकर अश्वत्थामा का शोक प्रचण्ड रोष में बदल गया, और अगला अध्याय उनकी भीषण प्रतिज्ञा और नारायणास्त्र की ओर बढ़ता है।

अश्वत्थामा की प्रतिज्ञा और नारायणास्त्र की कथा

आँसू भरे नेत्र बार-बार पोंछते, क्रोध में तप्त साँसें भरते अश्वत्थामा ने दुर्योधन से कहा, अब मुझे ज्ञात हुआ कि मेरे पिता को उन अधमों ने शस्त्र रखवाकर किस प्रकार मारा, और धर्म का बाहरी वेश धरे युधिष्ठिर ने कैसा पापकर्म किया। युद्ध में जुटे व्यक्ति के लिए दो ही गति है, विजय अथवा पराजय। युद्ध में मृत्यु सदा प्रशंसनीय है। धर्मपूर्वक लड़ते हुए मृत्यु पाने वाले के लिए शोक नहीं किया जाता, ऋषियों ने यही कहा है। निःसन्देह मेरे पिता वीरलोक को गए, इसके लिए मैं शोक नहीं करता।

पर सारी सेना के सामने, धर्मपूर्वक युद्ध करते हुए, उनके केश पकड़े जाने का जो अपमान उन्होंने सहा, वही मेरे हृदय का मर्म चीर रहा है। मेरे जीवित रहते मेरे पिता के केश पकड़े गए, तो फिर निस्सन्तान लोग सन्तान की इच्छा ही क्यों करें? प्रिषत के क्रूर, दुष्टात्मा पुत्र ने मेरी पूरी उपेक्षा कर यह अत्यन्त पापकर्म किया है। अतः धृष्टद्युम्न उस कर्म का भयानक फल अवश्य भोगेगा, और वह असत्यवादी पाण्डुपुत्र भी, जिसने ऐसा अनुचित किया। आज धरती उस धर्मराज युधिष्ठिर का रक्त अवश्य पिएगी, जिसने छल से आचार्य के शस्त्र रखवाए।

अश्वत्थामा ने कहा, हे कौरव्य, मैं सत्य की और अपने धर्म-कर्मों की शपथ खाकर कहता हूँ, यदि मैं पाञ्चालों का उच्छेद न कर सका, तो जीवन का भार न ढोऊँगा। कोमल हो या कठोर, जो भी उपाय हो, शान्ति पाने से पूर्व मैं समस्त पाञ्चालों का अन्त कर दूँगा। मित्रों, ब्राह्मणों और अपने ही आचार्य के घातक उस अधम धृष्टद्युम्न को मैं युद्ध में अवश्य मारूँगा। आज देवता, गन्धर्व, असुर, उरग, राक्षस अथवा कोई भी नर मुझे रथ पर युद्ध में नहीं जीत सकेगा। शस्त्र-ज्ञान में मेरे और अर्जुन के समान संसार में कोई नहीं।

तब अश्वत्थामा ने नारायणास्त्र की कथा सुनाई। एक समय नारायण ब्राह्मण का रूप धरकर मेरे पिता के पास आए। प्रणाम कर मेरे पिता ने विधिवत भेंट अर्पित की। उसे स्वीकार कर भगवान ने वर देना चाहा। मेरे पिता ने नारायण नामक परम अस्त्र माँगा। देवश्रेष्ठ ने कहा, युद्ध में कोई आपके समान न होगा। पर यह अस्त्र कभी हड़बड़ी में न चलाइए। यह शत्रु का संहार किए बिना नहीं लौटता। मैं किसी को नहीं जानता जिसे यह न मार सके, यह अवध्य को भी मार डालेगा। अतः इसे बिना गहरे विचार के न चलाइए। जो रण में अपने रथ या शस्त्र त्याग दें, जो शरण माँगें, अथवा जो हार मान लें, उन पर यह अस्त्र कभी न छोड़िए। जो इसे अवध्य पर चलाएगा, वह स्वयं इससे अत्यन्त पीड़ित होगा।

अश्वत्थामा ने कहा, मेरे पिता ने वह अस्त्र इस प्रकार पाया। फिर नारायण ने मुझसे भी कहा, इस अस्त्र से आप भी रण में अनेक दिव्यास्त्रों की वर्षा करेंगे और तेज से दहकेंगे। यह कहकर भगवान स्वर्ग सिधार गए। यही नारायणास्त्र का इतिहास है, जो मेरे पिता के पुत्र को प्राप्त है। इसी से मैं पाण्डवों, पाञ्चालों, मत्स्यों और केकयों को सचि-पति इन्द्र के असुरों को नष्ट करने की भाँति मार डालूँगा। उस पाञ्चाल-अधम धृष्टद्युम्न को, जो मित्रों, ब्राह्मणों और अपने ही आचार्य का घातक है, आज प्राण लेकर मुझसे बच निकलने न दूँगा।

द्रोण-पुत्र के ये वचन सुनकर कुरु-सेना फिर संगठित हुई। अनेक श्रेष्ठ पुरुषों ने अपने विशाल शंख फूँके। हर्ष में भरकर उन्होंने सहस्रों ढोल और दुन्दुभि बजाए। घोड़ों के खुरों और रथों के पहियों से पीड़ित धरती उस घोष से गूँज उठी। मेघगर्जन-सा गहरा वह घोष सुनकर पाण्डव-महारथी एकत्र होकर परस्पर मन्त्रणा करने लगे। इधर ये वचन कहकर अश्वत्थामा ने जल का स्पर्श किया और नारायण नामक दिव्यास्त्र का आवाहन कर दिया।

सार: अश्वत्थामा ने शोक से उपजे रोष में तीन प्रतिज्ञाएँ कीं, धृष्टद्युम्न का वध, समस्त पाञ्चालों का उच्छेद, और छली युधिष्ठिर से प्रतिशोध। फिर उन्होंने नारायणास्त्र की उत्पत्ति-कथा सुनाई, और चेतावनी भी कि यह अस्त्र शस्त्र-त्यागी और शरणागत पर नहीं चलाया जाता। इसी विधान में आगे की कथा का बीज छिपा है। तब उन्होंने जल छूकर वह महाअस्त्र छोड़ दिया, और प्रकृति में भारी उत्पात मच गया।

मूल: महाभारत (कृष्णद्वैपायन व्यास), द्रोण पर्व; गीता प्रेस गोरखपुर परम्परा।