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मन्दराचल पर एक दैत्य एक पैर पर खड़ा है, ब्रह्मा से अमरता छीन लाने की ज़िद में देह गलाता हुआ, और उसके पीठ फेरते ही देवताओं की सेना उसकी राजधानी पर टूट पड़ी है। असुर सब छोड़कर भाग खड़े हुए हैं, और लूट के बीच इन्द्र की दृष्टि एक गर्भवती रानी पर पड़ती है। श्रीमद्भागवत का सातवाँ स्कन्ध अपने सातवें अध्याय में इसी दृश्य से प्रह्लाद की कथा उठाता है, जन्म से पहले। इन्द्र कयाधु की कलाई पकड़कर घसीट रहे हैं, हिसाब लगाकर कि प्रसव होते ही बालक को मार देंगे, और रानी कुररी पक्षी की भाँति बिलखती हुई बार बार अपना हाथ पेट पर ले जाती है। तभी मार्ग में वीणा की एक हलकी झंकार उठती है, और देवर्षि नारद सामने आ खड़े होते हैं। “देवराज, ठहरिए। यह स्त्री निरपराध है।” इन्द्र पकड़ ढीली नहीं करते, तो नारद बताते हैं कि जिसे वे शत्रु का बीज समझ रहे हैं, वह भगवान् का परम प्रेमी भक्त है, और उसे मारने की शक्ति इन्द्र में नहीं। देवराज कलाई छोड़ते हैं, और जिस गर्भ को क्षण भर पहले मिटा देना चाहते थे, उसी की प्रदक्षिणा करके अपने लोक लौट जाते हैं।
नारद रानी को अपने आश्रम ले जाते हैं, और पति के तप से लौटने तक वे कयाधु को भागवत-धर्म का रहस्य और आत्मा के निर्मल स्वरूप की बात सुनाते रहते हैं। माँ सुनती हैं, और भीतर एक और श्रोता सुनता है, जिसकी आँखें अभी बन्द हैं। हिरण्यकशिपु वर पाकर लौटता है और रानी को घर ले आता है। समय के साथ माँ की स्मृति से वे वचन धुँधले पड़ जाते हैं, पर देवर्षि की कृपा से गर्भ के भीतर वे ज्यों के त्यों बैठे रहते हैं। माँ भूल गईं। भीतर वाला नहीं भूला। फिर बालक जन्मता है, और बीच बीच में, बिना किसी के सिखाए, धीरे से “नारायण” पुकार उठता है।
गोद में बैठा प्रश्न
पाँचवाँ अध्याय पहले हिरण्यकशिपु के भीतर का काँटा दिखाता है। उसका भाई हिरण्याक्ष वराह के हाथों मारा गया था, और उस दिन से विष्णु का नाम उसके मन में एक रिसता हुआ घाव है। तप से उसने ब्रह्मा से ऐसे वर पाए कि उसकी मृत्यु दिन और रात, घर और बाहर, मनुष्य और पशु, शस्त्र और अस्त्र, सबकी सीमाओं से बाहर रहे। उसने तीनों लोक जीते और शुक्राचार्य के पुत्रों षण्ड और अमर्क को बेटे की पढ़ाई सौंपी। एक दिन वह बालक को गोद में बिठाकर पूछता है कि आपको कौन सी बात सब में अच्छी लगती है। उत्तर आता है, “पिताजी, संसार के प्राणी ‘मैं’ और ‘मेरे’ के झूठे आग्रह में पड़कर सदा अत्यन्त उद्विग्न रहते हैं।” ऐसे प्राणी घास से ढके अँधेरे कुएँ जैसा यह घर छोड़कर वन में जाएँ और श्रीहरि की शरण लें। पिता ठट्ठाकर हँसता है, फिर हँसी रुक जाती है। गुरु पूछते हैं कि यह बुद्धि उलटी कैसे हो गई, और बालक कहता है, “आप जिसे शत्रु मानते हैं, वही हर एक की आत्मा है, मेरी भी, आपकी भी।”
पाठशाला में साम, दान, भेद और दण्ड पढ़ाकर गुरु उसे गहने पहनाकर पिता के पास लौटाते हैं, और पिता उसे गले से लगाकर कहता है कि कोई अच्छी सी बात सुनाइए। प्रह्लाद श्रवण से आत्मनिवेदन तक भक्ति के नौ भेद गिनाता है, “यदि भगवान् के प्रति समर्पण के भाव से यह नौ प्रकार की भक्ति की जाए, तो मैं उसी को सब में उत्तम अध्ययन समझता हूँ।” पिता के ओठ फड़कने लगते हैं, गुरुपुत्र कहते हैं कि यह बुद्धि इसकी जन्मजात है, और बालक स्वयं कह देता है कि गृहासक्त पुरुषों की बुद्धि हरि में नहीं लगती, वे अन्धे के पीछे अन्धों की तरह गड्ढे में गिरते चले जाते हैं। हिरण्यकशिपु उसे गोद से उठाकर भूमि पर पटक देता है। “दैत्यो, इसे यहाँ से बाहर ले जाया जाए और तुरंत मार डाला जाए।” त्रिशूल उसके मर्मस्थानों पर पड़ते हैं और बालक चुपचाप बैठा रहता है, चित्त उस परब्रह्म में लगा हुआ जिसे कोई शस्त्र नहीं छूता। फिर मतवाले हाथी, विषधर साँप, कृत्या, विष, आग, समुद्र, और पर्वतों के नीचे दबाना। हर बार वह वहीं का वहीं, हरि-नाम लेता हुआ, बैठा मिलता है। पिता का चेहरा उतर जाता है, और षण्ड-अमर्क सलाह देते हैं कि शुक्राचार्य के लौटने तक इसे वरुण के पाशों में बाँध रखिए।
छुट्टी का एक दिन
छठा अध्याय पाठशाला के उस दिन का है जब गुरु बाहर गए हैं और दैत्य-बालक प्रह्लाद को खेलने पुकारते हैं। वह उठता है, पर खेलने नहीं। “भाइयो, सुनिए,” वह कहता है, और आवाज़ इतनी कोमल है कि बच्चे खेल भूलकर पास सरक आते हैं। “इस संसार में मनुष्य-जन्म बड़ा दुर्लभ है।” पता नहीं कब इसका अन्त हो जाए, इसलिए बुढ़ापे के भरोसे न रहकर इसी बचपन से भगवान् की प्राप्ति के साधन कर लेने चाहिए। एक बच्चा पूछता है कि अभी तो हम छोटे हैं, और उत्तर मिलता है कि इन्द्रियों का सुख प्रारब्ध से वैसे ही मिल जाता है जैसे दुःख मिल जाता है। “हम राक्षस के बेटे हैं तो क्या हुआ। भगवान् तो अपने और पराये का भेद ही नहीं करते।” बालक खिलौने एक ओर रख देते हैं, उसके चारों ओर बैठ जाते हैं, और एक एक करके हरि हरि बोलने लगते हैं। गुरु डर जाते हैं, ख़बर महल पहुँचती है, और इस बार पिता बालक को भरी सभा में बुलाता है।
खम्भा, देहरी, और नंगे पाँव एक बालक
ऊँचे खम्भों की पाँत के बीच वह खड़ा है, और पिता की आवाज़ में अब थकान की एक दरार है। “बताइए, आपका यह विष्णु कहाँ है?” “हर जगह है, पिताजी।” “तो इस खम्भे में भी है?” “हाँ, पिताजी। इसमें भी।” आवाज़ में रत्ती भर हिचक नहीं, और यही पिता को सब में असह्य लगता है। आठवाँ अध्याय उसके मुख से पूरी कथा की धुरी कहलवाता है, “अभागे, आपने मेरे सिवा जो और किसी को जगत् का स्वामी बताया है, सो देखूँ, आपका वह जगदीश्वर कहाँ है?” वह सिंहासन से कूदकर खम्भे पर घूँसा मारता है। ऐसा शब्द होता है मानो ब्रह्माण्ड फट गया हो, और उसमें से वह रूप निकलता है जो सिंह और मनुष्य दोनों की श्रेणियों से परे है। पिता डरता नहीं, गदा सँभालता है, और भागवत उसका अन्त सभा की देहरी पर, जाँघ पर लिटाकर नखों से दिखाता है, वर की हर झिरी एक साथ पकड़ी हुई। उस सभा में एक ही प्राणी उस गर्जना से नहीं काँपता, वही बालक, जो पिता और उस रूप के ठीक बीच में खड़ा है।
नौवें अध्याय में शत्रु मर चुका है पर क्रोध नहीं मरा। ब्रह्मा आगे बढ़ते हैं और उनकी भाषा गले में रह जाती है, रुद्र मौन रह जाते हैं, लक्ष्मी अपने ही प्रियतम के पास एक डग नहीं बढ़ा पातीं। तब ब्रह्मा की दृष्टि पास खड़े बालक पर पड़ती है, जिसका पिता अभी अभी उन्हीं चरणों में मारा गया है। “बेटा, आपके पिता पर भगवान् कुपित हुए थे। अब आप ही उनके पास जाकर उन्हें शान्त कीजिए।” बालक आँख नहीं झपकाता। “जो आज्ञा।” वह नंगे पाँव उस गरजती ज्वाला की ओर जाता है और चरणों में साष्टांग लोट जाता है, और वही पंजा, जिसने अभी एक असुर का सीना चीरा है, उसके सिर पर आ टिकता है। स्तुति उठती है। वह उस लपलपाती जीभ, आँतों की माला और पिता को फाड़ने वाले नखों को गिनाता है और कहता है, “इन सबको देखकर मैं तनिक भी नहीं डरता।” डर है तो केवल उस संसार-चक्र से जिसमें जीव अपने ही कर्मों के पाश में बँधा है। और जो उसी क्षण छूट सकता था, वह कहता है, “पर मैं इन भूले-भटके, असहाय, दीन जीवों को छोड़कर अकेला मुक्त नहीं होना चाहता।” अयाल बैठ जाती है, भौंहें खुल जाती हैं। “प्रह्लाद, आपका कल्याण हो। दैत्यश्रेष्ठ, मैं आप पर अत्यन्त प्रसन्न हूँ। जो अभिलाषा हो, माँग लें।”
दसवाँ अध्याय उस माँगने का है, और प्रह्लाद माँगने से मना कर देता है। जिन विषय-सुखों से डरकर वह शरण आया है, उन्हीं का वर देकर उसे न लुभाया जाए; जो सेवक सेवा के बदले कुछ चाहे वह सेवक नहीं, व्यापारी है। भगवान् कहते हैं कि तब भी इस मन्वन्तर भर दैत्यों का ऐश्वर्य भोगिए, कर्म मुझे अर्पित कीजिए, और समय आने पर देह छोड़कर मुझ तक आइए। तब बालक एक वर माँगता है, अपने लिए नहीं, कि जिस पिता ने आपकी निन्दा की और मुझसे द्रोह किया, उसका पाप छूट जाए। उत्तर आता है कि मेरे स्पर्श से वह पहले ही शुद्ध हो चुका, अब आप उसका श्राद्ध कीजिए और उसके सिंहासन पर बैठिए। ब्रह्मा और शुक्राचार्य उसे दैत्यों का राजा अभिषिक्त करते हैं, और नृसिंह ब्रह्मा से इतना कहकर अन्तर्धान होते हैं कि असुरों को ऐसे वर फिर न दिए जाएँ, साँप को दूध पिलाने जैसे।
वसिष्ठ के प्रह्लाद
योग वासिष्ठ इसी नाम को अपनी अलग कथा में उठाता है, जो वसिष्ठ राम को सुनाते हैं, और जिसमें प्रह्लाद अपने ही अन्तर्बोध से सिद्धि पाते हैं। नृसिंह लौट चुके हैं, पाताल की जली नगरी पर धुआँ अभी बैठा नहीं, और दैत्यराज का बड़ा बेटा निश्चय करता है कि शरण उसी हरि की ली जाए जिनके हाथों पिता मारे गए। पूजागृह में विष्णु स्वयं प्रकट होकर वर माँगने को कहते हैं, और प्रह्लाद वही माँगते हैं जिसे प्रभु अपना सबसे बड़ा उपहार मानें। “निष्पाप, वस्तुओं का आपका सम्यक् विवेक आपको ईश्वर में विश्राम तक और परम सुख की प्राप्ति तक ले जाए।” इसके बाद लम्बा आत्मविचार चलता है, मैं यह जड़ देह नहीं, मैं वह अविकारी आत्मा हूँ जो बोध के रूप में चमकती है, और वाणी ठहर जाती है। प्रह्लाद सहस्रों वर्ष समाधि में बैठे रह जाते हैं, चित्र में बनी चट्टान की तरह, और राजा-विहीन पाताल में बलवान निर्बल को खाने लगता है। क्षीरसागर में जागे हरि समुद्र के नीचे की सुरंग से पाताल उतरकर पाञ्चजन्य फूँकते हैं। जागे हुए प्रह्लाद राज्य से ऊब चुके हैं, और हरि उन्हें जीवन और मृत्यु का अर्थ समझाकर कहते हैं, “उठिए, दानवों के स्वामी, और अपने सिंहासन पर बैठिए।” “आप यहाँ एकछत्र राजा की तरह तब तक राज कीजिए जब तक पृथ्वी पर मेरु पर्वत खड़ा है और आकाश में सूर्य और चन्द्र चमकते हैं।” विष्णुपुराण भी अपने पहले अंश के सत्रहवें से बीसवें अध्याय तक यही कथा अपने ढंग से कहता है, पर वह कथा अपने ग्रन्थ में अलग रहे।
भागवत में प्रह्लाद एक बार और आते हैं, आठवें स्कन्ध के तेईसवें अध्याय में, अपने पोते बलि के यज्ञ में, उदय होते चन्द्रमा से। वामन तीन पग में सब नाप चुके हैं और बलि पाश में बँधा है। प्रह्लाद उस बँधे हुए पोते को देखकर भी हाथ जोड़कर कहते हैं, “प्रभु, यह ऐश्वर्य आपने ही बलि को दिया था, और आज आपने ही छीन लिया। आपका छीनना भी उतना ही सुंदर है, जितना देना।” भगवान् उन्हें बलि के साथ सुतल भेजते हैं, और वचन देते हैं कि वहाँ वे उन्हें सदा गदा लिए द्वार पर खड़ा देखेंगे।
उनकी राह
तीन ठहराव, तीन प्रश्न
नीचे तीन प्रसंग हैं जहाँ वे सुनते हैं, उत्तर देते हैं, या माँगने से मना करते हैं। ये हमारे पढ़ने के प्रश्न हैं।
- जन्म से पहले की पाठशाला। गर्भ की शिक्षा पढ़िए। भागवत 7.7 में नारद कयाधु को उपदेश देते हैं, माँ भूल जाती है, भीतर वाला नहीं भूलता। पूछिए: जो हमने सुना और भूल गए, क्या वह सचमुच गया, या किसी और में बैठा रह गया?
- खम्भे का प्रश्न। पाठशाला और सभा की कड़ी पढ़िए, फिर खम्भे से निकला रूप। 7.8 में पिता पूछता है कि इस खम्भे में भी, और बालक कहता है, इसमें भी। पूछिए: हर जगह कहना सरल है; किसी एक जगह की ओर उँगली उठे तो क्या उत्तर वही रहता है?
- माँगने से मना। नृसिंह के चरणों की स्तुति पढ़िए। 7.9 में वह अकेले मुक्त होने से मना करता है, 7.10 में वर लेने से, कि सेवक व्यापारी न बन जाए। पूछिए: जो सब कुछ दे सकता है, उसके सामने कुछ न माँगना त्याग है या सबसे बड़ी माँग?
अन्त में पहले दृश्य पर लौटिए, जहाँ इन्द्र एक रानी की कलाई थामे हैं और जिस बालक को मारने चले थे, उसी की प्रदक्षिणा करके लौटते हैं। क्या बाक़ी कथा उसी मोड़ को बार बार दोहराती है?
नृसिंह अवतार · खम्भे पर एक घूँसा, ब्रह्माण्ड फटने जैसा शब्द, और देहरी पर जाँघ पर लिटाकर टूटते हुए वर।
योग वासिष्ठ के प्रह्लाद · जली नगरी में हरि की शरण का निश्चय, सहस्रों वर्ष की समाधि, और पाताल उतरकर बजाया गया पाञ्चजन्य।
वामन और बलि · तीन पग में नपा ब्रह्माण्ड, पाश में बँधा पोता, और दादा की हथेलियाँ जो छीनने वाले के आगे भी जुड़ी रहीं।
जिसने कभी काँपना सीखा ही नहीं
प्रह्लाद की कथा में हमें सबसे अधिक यह बात रोकती है कि इसमें भय की जगह कहीं बनी ही नहीं। त्रिशूल, हाथी, विष, आग, और फिर वह रूप जिसके पास लक्ष्मी तक एक डग न बढ़ा सकीं, हर बार बालक वहीं का वहीं है, और भागवत इसका कारण भी देता है। जो पाठ उसे मिला, वह जन्म से पहले मिला, जब वह केवल सुन सकता था। उसके पास अपना कोई तप नहीं, कोई वर नहीं, और नृसिंह के सामने वह यही कहता है कि धन, कुल, विद्या, बल, इनमें से कुछ भी आपको नहीं रिझाता, गजेन्द्र को तो केवल भक्ति से बचाया था। अधिकतर विद्वान भागवत की रचना ईस्वी नौवीं या दसवीं शताब्दी की मानते हैं, और उसके भीतर प्रह्लाद उस कड़ी में आते हैं जहाँ नारद युधिष्ठिर को बताते हैं कि बैर की एकाग्रता से भी भगवान् तक पहुँचा जा सकता है, हिरण्यकशिपु वैसे, और उसका बेटा प्रेम की एकाग्रता से। दोनों एक ही घर में रहते हैं और एक ही खम्भे की ओर देखते हैं। पिता उसमें शून्य देखता है, पुत्र उसमें भी उन्हें। और जब माँगने की बारी आती है, जिसके पास कुछ नहीं था, वह अपने लिए कुछ नहीं माँगता, पिता के लिए क्षमा माँगता है और उन सबके लिए पार जाना जो अभी डूब रहे हैं। योग वासिष्ठ के प्रह्लाद उसी निडरता को भीतर मोड़ते हैं, और सहस्रों वर्ष की समाधि के बाद भी उन्हें सिंहासन पर लौटाया जाता है, क्योंकि वहाँ मुक्ति देह में रहकर अनासक्त रहने का नाम है। खम्भे का उत्तर और सिंहासन का उत्तर एक ही है, वह हर जगह हैं, इसलिए यहाँ भी, इस काम में भी।
आधार-संस्करण और पाठ
आधार-संस्करण: गीताप्रेस का श्रीमद्भागवत, संस्कृत-हिन्दी पाठ; योग वासिष्ठ के प्रसंग के लिए इस पुस्तकालय की प्रह्लाद-कथा, जो मित्र के अंग्रेज़ी अनुवाद पर चलती है।
इस कथा का पाठ: माता-पिता और कुल: भागवत 6.18। गर्भ की शिक्षा: भागवत 7.7। हिरण्यकशिपु के वर, गोद का संवाद, पाठशाला और यातनाएँ: भागवत 7.3 से 7.5। दैत्य-बालकों को उपदेश: भागवत 7.6। खम्भा और नृसिंह: भागवत 7.8। स्तुति: भागवत 7.9। वर का अस्वीकार, पिता का श्राद्ध और अभिषेक: भागवत 7.10। बलि के यज्ञ में और सुतल: भागवत 8.23। योग वासिष्ठ: उपशम प्रकरण की प्रह्लाद-कथा। विष्णुपुराण: प्रथम अंश, अध्याय 17 से 20, केवल नामित।
इस प्रस्तुति का दायरा: चुने हुए पात्र-प्रसंग और अलग चिह्नित पाठकीय प्रश्न।
सीमाएँ और पाठ-भेद: भागवत और योग वासिष्ठ के प्रह्लाद अलग अलग कथाएँ हैं और यहाँ अलग ही रखे गए हैं; विष्णुपुराण की कथा केवल नामित है, उससे कोई प्रसंग नहीं लिया गया। उद्धरण-चिह्नों के वाक्य इस पुस्तकालय की भागवत और योग वासिष्ठ की कड़ियों के हिन्दी पाठ से हैं। संध्या, देहरी, जाँघ और नख से वर की हर शर्त के एक साथ पूरे होने का विवरण श्रीधर स्वामी की परम्परा से है, मूल 7.8 केवल जाँघ और नखों का उल्लेख करता है।