लुल्ला परिवारLULLA FAMILY, शुरुआतEnglish

पात्र

शिव

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दो देवता एक विवाद में उलझे हैं, और उनके बीच एक अग्नि-स्तम्भ खड़ा हो गया है जिसका न ऊपर कोई छोर है, न नीचे। ब्रह्मा ऊपर की ओर चढ़ते चले जाते हैं और विष्णु नीचे की ओर उतरते जाते हैं, और सौ वर्ष थककर लौट आते हैं। शिवपुराण की रुद्रसंहिता यह कथा ब्रह्मा के ही मुख से नारद को सुनाती है: उस तत्त्व का न कोई नाम था, न कर्म, और दोनों देव चित्त स्थिर करके उसे प्रणाम करने लगे, “आप जो कोई भी हों, आपको हमारा नमस्कार है; हमें अपने यथार्थ रूप का दर्शन कराइए।” तब उस नाद में से ओम् का शब्द स्पष्ट सुनाई देने लगा, और फिर उमा सहित महेश्वर स्वयं प्रकट हुए, पाँच मुख, हर मुख में तीन नेत्र, कण्ठ में नीला चिह्न, सारे अंगों में भस्म। शिव की कथा इसी स्तम्भ से शुरू होती है, जिसका छोर खोजने वाले लौट आते हैं और प्रणाम करने वालों को वह स्वयं दिखाई देता है।

उसी सृष्टिखण्ड में ब्रह्मा बताते हैं कि प्रलय के अन्धकार में, जब न सूर्य था न चन्द्रमा, केवल वह सत् शेष था जिसे श्रुति तत्सद्ब्रह्म कहती है, और उसी के भीतर एक से अनेक होने का संकल्प उठा। उसने अपने लिए एक मूर्ति की कल्पना की, और वही मूर्ति सदाशिव हैं। एकाकी सदाशिव ने अपने ही विग्रह से एक शक्ति रची जो उनके अंग से कभी अलग होने वाली न थी, और दोनों ने मिलकर वह क्षेत्र बनाया जिसे काशी कहते हैं; वहीं विहार करते हुए उनके मन में इच्छा हुई कि किसी दूसरे पुरुष पर सृष्टि का भार रखकर वे केवल काशी में रहें। शिव ने अपने वाम अंग पर अमृत मल दिया, और वहाँ से वह पुरुष प्रकट हुआ जिसे उन्होंने हँसते हुए नाम दिया, “आप व्यापक हैं, इसीलिए आपका नाम विष्णु विख्यात होगा।” उनकी नाभि के कमल से ब्रह्मा निकले। शिवपुराण का शिव जन्म नहीं लेता; वह उस स्तम्भ की तरह है जिसका छोर नहीं मिलता, और उसके बाद की हर कथा में वह अपने ही संसार में अतिथि की तरह उतरता है।

दक्ष की सभा

सती खण्ड में वह विरक्त योगी ब्याहने को राज़ी होता है। ब्रह्मा और विष्णु कैलास पर आकर विवाह का अनुरोध करते हैं, और महादेव मुसकराकर कहते हैं कि हमारे लिये विवाह उचित नहीं, हम विरक्त योगी हैं, विवाह तो पराये बन्धन में बँधना है। फिर भी जगत के हित में वे मानते हैं, उसी एक शर्त पर कि वह नारी उनका तेज धारण कर सके, योग के समय योगिनी रहे और प्रेम के समय कामिनी। दक्ष के आँगन में वह कन्या बारह महीने नन्दाव्रत कर रही है, और नवमी को ध्यानमग्न सती के सामने शिव स्वयं प्रकट होकर कहते हैं, “दक्षनन्दिनि, हम आपके व्रत से प्रसन्न हैं, कोई वर माँगिये।” लज्जा से बात होंठों तक नहीं आती, और अन्तर्यामी उतावली से बारंबार कहते हैं, वर माँगिये, वर माँगिये; जब बात फिर भी पूरी नहीं होती, तो शंकर स्वयं कह देते हैं, “देवि, आप हमारी भार्या हो जाइये।” दक्ष अपने हाथ से सती का हाथ शंकर के हाथ में देते हैं। हिमालय के शिखर पर बरसों बाद सती परम तत्त्व पूछती हैं, और उत्तर में वह विरक्त योगी भक्ति के नौ अंग गिनाता है, और कहता है कि हम सदा भक्त के अधीन रहते हैं, भक्ति के बल से नीच समझे जानेवाले घरों में भी चले जाते हैं।

फिर प्रयाग की वह सभा, जहाँ सब देवर्षि दक्ष को सिर नवाते हैं और एक महेश्वर अपने आसन पर ज्यों के त्यों बैठे रहते हैं। दक्ष शाप देते हैं कि यह यज्ञ से बहिष्कृत हो, और शिव हँसते हुए से नन्दी को समझाते हैं, “आप परम ज्ञानी हैं; क्रोध आपको शोभा नहीं देता। हमें किसी का शाप छू भी नहीं सकता।” फिर दक्ष का महायज्ञ, जिसमें एक वही नहीं बुलाए जाते। सती जाना चाहती हैं, और शिव का पहले से घायल हृदय मधुर वाणी में कहता है, “आपके पिता हमारे विशेष द्रोही हो गये हैं। जो बिना बुलाये दूसरे के घर जाते हैं, वे वहाँ ऐसा अनादर पाते हैं जो मृत्यु से भी बढ़कर दुखदायी है।” पर निश्चय हो चुका है, और वे उन्हें विदा करते हैं। यज्ञशाला में शम्भु का भाग कहीं नहीं है, और सती भूमि पर बैठकर योग में प्राण और अपान को नाभि में स्थिर करती हैं; उनका निष्पाप शरीर गिरता है और उनकी इच्छा से योगाग्नि में भस्म हो जाता है। कथा स्वयं कहती है कि वह आग बाहर से नहीं आई, भीतर से उठी थी। शिवपुराण की यह कड़ी वहीं थमती है जहाँ यह समाचार अभी कैलास नहीं पहुँचा है। इसी खण्ड में दण्डकारण्य का वह दृश्य है जहाँ शिव सीता को खोजते राम को प्रणाम करते हैं; सती पूछती हैं कि स्वामी सेवक को प्रणाम करे, यह कैसे उचित है, और शिव हँसकर कहते हैं, “वरदान के प्रभाव से ही हमने इन्हें आदर के साथ प्रणाम किया है।”

तीसरा नेत्र, और अपनी ही निन्दा

पार्वती खण्ड तारकासुर से खुलता है, जिसकी एक ही मृत्यु बताई गई है, शिव के पुत्र के हाथ से; और इन्द्र कामदेव को उस योगी पर भेजते हैं जिसकी सेवा में गिरिराज-कन्या रोज़ आती है। काम बाण चलाता है, और कथा यहाँ लोक की कथा से अलग चलती है: असर हुआ, महायोगी का धैर्य डिगा। वाम भाग पर बाण खींचे मदन खड़ा है, और ललाट के तीसरे नेत्र से प्रलय की अग्नि सी आग उठती है; देवताओं के मुख से क्षमा निकल भी नहीं पाती कि काम भस्म हो जाता है। रति के विलाप पर वही क्रोधी देव कहते हैं कि “हमारे क्रोध से जो हो गया, वह अन्यथा नहीं हो सकता”, और उसी साँस में वह वचन कि जब रुक्मिणी के गर्भ से काम प्रद्युम्न होकर जन्मेगा तब रति उसे पाएगी, और फिर, “हम काम को सबके हृदय में जीवित कर देंगे।” पार्वती गंगावतरण तीर्थ पर तप में बैठती हैं, पत्ते तक छोड़कर अपर्णा कहलाती हैं, और एक पैर पर खड़ी तीन हजार वर्ष बिताती हैं। उस तप से तीनों लोक तपते हैं, देवता विष्णु के साथ कैलास आते हैं, और नन्दी के सूचित करने पर शम्भु धीरे धीरे आँखें खोलकर पूछते हैं, “आप सब मेरे समीप कैसे आये?”

परीक्षा की कथा में शिव पहले सप्तर्षियों को भेजते हैं, इस आज्ञा के साथ कि वहाँ आपको सर्वथा छलयुक्त बातें कहनी हैं, और फिर स्वयं दण्ड और छत्र लिए जटाधारी बूढ़े ब्राह्मण का रूप धरकर आश्रम में आते हैं। वह ब्राह्मण महादेव का जो चित्र खींचता है, वह शिव का अपने विषय में कहा हुआ है: भीख का खप्पर, बाघ का चाम, सवारी में एक बूढ़ा बैल, “वर में जो गुण खोजे जाते हैं, एक भी उनमें नहीं।” पार्वती उस निन्दक से कहती हैं कि महेश्वर अपनी लीलाशक्ति से अद्भुत वेष धर लेते हैं, पर वास्तव में वे साक्षात् परब्रह्म हैं। वे पैर उठाती हैं, और शिव अपने साक्षात् स्वरूप में प्रकट होकर प्रिया का हाथ पकड़ लेते हैं, “मुझे छोड़कर कहाँ जाएँगी? अब मैं फिर कभी आपका त्याग न करूँगा।” और वह वाक्य जो इस पूरे खण्ड को नाम देता है, “आज से मैं तपस्या के मोल खरीदा हुआ आपका दास हूँ।” विवाह में वही देव सप्तर्षियों से हँसकर कहते हैं, “विवाह तो हमने न कभी देखा है, न सुना; उसकी विधि आप ही बताइए।” उनका सहज रूप ही आभूषण बन जाता है। मेना वर को देखकर कटी लता सी गिरती हैं, और तब शिव अपना परम सुन्दर रूप प्रकट करते हैं; गोत्र पूछने पर नारद वीणा बजाकर कहते हैं कि शिव का न गोत्र है, न कुल, न नाम, वे नादमय हैं।

गोद, द्वार और त्रिशूल

कुमार खण्ड में देवता छह मुखों वाले एक बालक को कैलास लाते हैं, और जिनके कोप से लोक काँपते हैं, उनकी गोद उस घड़ी पालना बन जाती है। दूसरा पुत्र द्वार पर मिलता है। पार्वती अपने शरीर की मैल से एक पुरुष गढ़कर उसे द्वारपाल बनाती हैं, और परम कौतुकी शिव द्वार पर आकर एक बालक से रोके जाते हैं। “अरे मूर्ख, यह किसे रोक रहा है? क्या यह हमें पहचानता नहीं? शिव के सिवा हम और कोई नहीं हैं।” और अन्त में शूलपाणि के त्रिशूल से उसका सिर कटकर गिरता है; कथा कहती है कि माँ की आज्ञा का पहरा देते देते बालक ने प्राण दे दिये, पर द्वार नहीं छोड़ा। शिव की आज्ञा से देवता उत्तर दिशा में मिले पहले जीव, एक दाँत वाले हाथी, का सिर लाकर बालक के धड़ से जोड़ देते हैं। देवता उसे शिव की गोद में बैठाते हैं और वे मस्तक पर हाथ फेरकर कहते हैं, “यह हमारा दूसरा पुत्र है”, और उसे अपने सम्पूर्ण गणों का अध्यक्ष बनाते हैं। युद्ध खण्ड में अन्धकासुर उन्हीं नेत्रों से जन्मता है जिन्हें गिरिजा ने हँसी में पीछे से मूँद लिया था; ललाट की अग्नि से टपके पसीने से एक अन्धा, विकट जीव प्रकट होता है, और शिव मुसकराकर कहते हैं, “प्रिये, मेरे नेत्रों को मूँदकर यह कर्म तो आपने ही किया है; फिर आप इससे भय क्यों करती हैं?”

सम्राट् का रथ

तारक के तीन पुत्र सोने, चाँदी और लोहे के तीन नगर पाते हैं, जो तभी मरें जब स्वयं शंकर एक अनोखे रथ से एक ही बाण में तीनों को भेद दें। देवता आते हैं, और यहाँ इस कथा की सबसे अनूठी गाँठ है: शिव अस्त्र नहीं उठाते। “वे त्रिपुरवासी बड़े पुण्य-कार्यों में लगे हैं, और पुण्यात्मा पर प्रहार नहीं किया जाता। हम रणकर्कश सही, पर जान-बूझकर मित्रद्रोह कैसे करें?” जब ब्रह्मा उन्हें सार्वभौम सम्राट् कहते हैं, तो एक नई अड़चन मुसकराती हुई आती है, “सम्राट् कहते हैं, तो सम्राट् के योग्य सामग्री कहां?” तब वह रथ बनता है जिसमें ब्रह्मा स्वयं सारथि हैं, हिमालय धनुष, शेष प्रत्यंचा, और बाण स्वयं विष्णु। मार्ग में रुद्र शर्त रखते हैं कि सब प्राणियों का पशुभाव मानकर उनका आधिपत्य हमें दीजिए, देवता काँपते हैं, और देवदेव हँसकर कहते हैं कि पशुभाव से आपका पतन नहीं होगा; उसी दिन से वे पशुपति कहलाए। धनुष चढ़ाकर भी तीनों पुर लक्ष्य में नहीं आते, क्योंकि उनके अँगूठे पर विराजे गणेश पीड़ा पहुँचा रहे हैं, और त्रिशूलधारी गजानन का पूजन करते हैं; अभिजित् मुहूर्त में करोड़ों सूर्यों सा बाण छूटता है, और उसी आग में से जलता हुआ तारकाक्ष कहता है, “अब ज्ञात हुआ कि आप हम पर प्रसन्न ही हैं। जो लाभ देवताओं और असुरों को भी अप्राप्य है, वह हमें मिला, आपके हाथ से मरण।” बचता है एक मय, जिसे शिव वितल भेजते हैं।

दूसरे ग्रन्थों के शिव

वाल्मीकि रामायण का बालकाण्ड शिव को दो जगह छूता है। विश्वामित्र राम को बताते हैं कि हिमालय की दो कन्याएँ हैं, गंगा और उमा; नीलकण्ठ शिव ने उमा से विवाह किया, और जब देवताओं ने उनके तेज से डरकर उस क्रीड़ा को रोका, तो विचलित तेज को पृथ्वी ने धारण किया, जिससे आगे अग्नि-जन्मा कार्तिकेय हुए। भगीरथ की गंगा दर्प में शिव को पाताल तक बहा ले जाना चाहती है, और त्रिनेत्र उसे अपनी जटाओं में छिपा लेते हैं, जहाँ वह कई वर्ष चक्कर काटती रहती है। मिथिला में जनक बताते हैं कि दक्ष के यज्ञ का विध्वंस करते हुए रुद्र ने खेल खेल में इसी धनुष की डोरी खींची थी, और प्रसन्न होकर वही धनुष देवताओं को दे दिया; उसी धनुष को राम तोड़ते हैं। महाभारत का वन पर्व किरात-वेशधारी शिव को अर्जुन के सामने खड़ा करता है, और वे कहते हैं, “मैं आपको अपना वह प्रिय अस्त्र दूँगा जो पाशुपत कहलाता है।” द्रोण पर्व में व्यास अर्जुन से कहते हैं कि रथ के आगे आगे चलने वाला शूलधारी पुरुष शंकर थे; सौप्तिक पर्व में शिविर के द्वार पर वही महादेव प्रकट होकर द्रोण-पुत्र से कहते हैं, “मुझे कृष्ण से प्रिय कोई नहीं।” और श्रीमद्भागवत उन्हें दो बार मनुष्य की तरह देखता है। आठवें स्कन्ध में मोहिनी की चर्चा सुनकर शंकर उसे देखने जाते हैं, और वही शंकर, जो योगियों के भी योगी हैं, जिनकी एक दृष्टि ने कामदेव को राख कर दिया था, उनकी सुध हाथ से निकल जाती है; वे भवानी के सामने ही उस छाया के पीछे दौड़ते हैं, और लौटकर सती से कुछ छिपाते नहीं। चौथे स्कन्ध में दक्ष का यज्ञ वहाँ तक जाता है जहाँ शिवपुराण की कड़ी रुकी थी: कैलास तक खबर पहुँचती है, शिव अपनी जटा से बिजली सी एक लट खींचकर धरती पर दे मारते हैं, उससे आकाश छूता वीरभद्र प्रकट होता है, और दक्ष के कटे धड़ पर बाद में बकरे का सिर जुड़ता है।

उनकी राह

तीन ठहराव, तीन प्रश्न

नीचे तीन प्रसंग हैं जहाँ वे मना करते हैं, अपनी ही निन्दा करते हैं, या एक सिर काटकर दूसरा जोड़ते हैं। ये हमारे पढ़ने के प्रश्न हैं।

  1. वर माँगिये, वर माँगिये। शिव-सती विवाह पढ़िए, कैलास पर विवाह से इन्कार से लेकर उस उतावले आग्रह तक। पूछिए: जो विवाह को पराया बन्धन कहता है, वह स्वयं कन्या की बात पूरी क्यों कर देता है?
  2. एक भी गुण नहीं। पार्वती की परीक्षा में जटाधारी ब्राह्मण की बातें पढ़िए, और फिर पार्वती का उत्तर। पूछिए: अपनी निन्दा स्वयं करके वह क्या सुनना चाहता था?
  3. यह हमारा दूसरा पुत्र है। गणेश का जन्म पढ़िए, द्वार पर ठनी से उत्तर दिशा के पहले जीव तक। पूछिए: जो त्रिशूल द्वार पर उठा, वही हाथ मस्तक पर कैसे फिरा?

अन्त में पहले दृश्य पर लौटिए, जहाँ एक अग्नि-स्तम्भ का छोर खोजते दो देव लौट आए हैं। क्या वह स्तम्भ नापने के लिए था, या प्रणाम करने के लिए?

सृष्टि और शिवलिंग का प्रादुर्भाव · प्रलय का अन्धकार, वाम अंग से विष्णु, और वह स्तम्भ जिसमें से ओम् सुनाई दिया।

दक्ष-यज्ञ और सती-दहन · प्रयाग की सभा में एक आसन जो झुका नहीं, और भीतर से उठी आग।

कामदेव का दहन · डिगा हुआ धैर्य, तीसरे नेत्र की आग, और सबके हृदय में जिया हुआ काम।

शिव-पार्वती विवाह · सहज रूप जो आभूषण बन गया, मेना का भय, और नाद ही जिसका कुल है।

कार्तिकेय और तारकासुर · छह मुखों वाला बालक, और वह गोद जो पालना बन गई।

अन्धकासुर · हँसी में मूँदे गए नेत्र, क्षण भर का अन्धकार, और ललाट के पसीने से जन्मा पुत्र।

काशी विश्वनाथ · पाँच कोस की पुरी, त्रिशूल पर उठाई हुई, और प्रलय में भी न डूबने वाली।

जो अपने ही संसार में अतिथि है

शिवपुराण का शिव हर कथा में देर से और मनाने पर आता है। विवाह के लिए ब्रह्मा और विष्णु को उनकी अपनी प्रतिज्ञा याद दिलानी पड़ती है, तप के लिए नन्दी को आँख खुलवानी पड़ती है, और त्रिपुर के लिए देवताओं को पहले उन्हें सम्राट् कहना पड़ता है और फिर रथ बनाना पड़ता है। जो देता है वह सदा नाप से अधिक है, काम को देह की जगह सबका हृदय, मय को वितल, तारकाक्ष को अपने हाथ से मरण, और गणेश को कटे सिर के बदले अग्रपूजा; और जो माँगता है वह केवल इतना कि जो पास आए वह सच कहे, जैसे पार्वती ने जटाधारी ब्राह्मण से कहा। दक्ष का शाप उन्हें छूता नहीं, और सती की योगाग्नि उन्हें छू जाती है; यही इस पात्र का नाप है। भागवत उन्हें मोहिनी के पीछे दौड़ता दिखाता है और लौटकर सती से कुछ न छिपाते हुए, और वह भी इसी नाप में है। जिस स्तम्भ का छोर ब्रह्मा और विष्णु नहीं पा सके, वह प्रणाम करने पर स्वयं प्रकट हुआ, और उसके बाद की हर कथा उसी एक घटना को दोहराती है, नापने वाले लौट आते हैं, पुकारने वालों के सामने वह अपने गणों सहित आ खड़ा होता है।

आधार-संस्करण और पाठ

आधार-संस्करण: गीताप्रेस का संक्षिप्त शिवपुराणाङ्क।

इस कथा का पाठ: अग्नि-स्तम्भ, सदाशिव और अम्बिका, वाम अंग से विष्णु, नाभि-कमल से ब्रह्मा: रुद्रसंहिता, सृष्टि खण्ड, अध्याय 5 से 9। सती का व्रत, कैलास पर अनुरोध, विवाह और नवधा भक्ति: रुद्रसंहिता, सती खण्ड, अध्याय 8 से 13। दण्डकारण्य में श्रीराम को प्रणाम: सती खण्ड, अध्याय 14 से 15। प्रयाग की सभा, दक्ष का यज्ञ और सती का देह-त्याग: सती खण्ड, अध्याय 16 से 20। काम का दहन और रति को वचन: पार्वती खण्ड, अध्याय 12 से 13। पार्वती का तप और देवताओं का आना: पार्वती खण्ड, अध्याय 15 से 17। सप्तर्षि और जटाधारी ब्राह्मण: पार्वती खण्ड, अध्याय 18 से 22। विवाह: पार्वती खण्ड, अध्याय 23 से 40। कार्तिकेय और गणेश: कुमार खण्ड, अध्याय 1 से 4। त्रिपुर: युद्ध खण्ड, अध्याय 1 से 5। अन्धक का जन्म: युद्ध खण्ड, अध्याय 11। काशी: कोटिरुद्रसंहिता। वाल्मीकि: बालकाण्ड, सर्ग 35 से 37 (उमा और गंगा), 43 (जटाओं में गंगा), 66 (धनुष)। महाभारत: वन पर्व, कैरात उपपर्व; द्रोण पर्व, नारायणास्त्रमोक्ष उपपर्व; सौप्तिक पर्व, अध्याय 7। भागवत: स्कन्ध 8, अध्याय 12; स्कन्ध 4, अध्याय 2 से 7।

इस प्रस्तुति का दायरा: चुने हुए पात्र-प्रसंग और अलग चिह्नित पाठकीय प्रश्न।

सीमाएँ और पाठ-भेद: यह पात्र-परिचय कथा-सार और संपादकीय मनन को साथ रखता है। प्रसंगों के आधार इस पुस्तकालय की शिवपुराण, रामायण, महाभारत और भागवत की कड़ियाँ हैं; अध्याय-संख्याएँ गीताप्रेस के संक्षिप्त शिवपुराणाङ्क की विषय-सूची से हैं। शिवपुराण, वाल्मीकि, महाभारत और भागवत शिव को अलग अलग कहते हैं, और यहाँ हर ग्रन्थ का कथन उसी के नाम से अलग रखा गया है; वीरभद्र और बकरे का सिर यहाँ भागवत की कथा से हैं, क्योंकि शिवपुराण की कड़ी सती के देह-त्याग पर थमती है, यद्यपि उसका सती खण्ड आगे वीरभद्र और दक्ष के पुनर्जीवन तक जाता है। उद्धरण-चिह्नों के वाक्य इन्हीं कड़ियों के हिन्दी पाठ से हैं।