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हस्तिनापुर की लड़ाई बीत चुकी थी, और कुरुक्षेत्र की धूल अब रक्त से सनी पड़ी थी। पाण्डु के पुत्रों ने, विदुर ने, धृतराष्ट्र ने, और भरतवंश की समस्त स्त्रियों ने अपने मारे गए स्वजनों को जल की अंजलियाँ दीं, और शोक का वह एक महीना उन्होंने कुरु-नगरी के बाहर, पवित्र गंगा के तट पर बिताने का निश्चय किया। युधिष्ठिर ने जब उदक-क्रिया (मृतकों को जल देने का कर्म) पूरी कर ली, तब अनेक तपोधन ऋषि उस राजा के दर्शन को आए। उनमें द्वीप पर जन्मे व्यास थे, नारद थे, महर्षि देवल, देवस्थान और कण्व थे, सब अपने श्रेष्ठ शिष्यों सहित। हज़ारों ब्राह्मणों ने उस शोक से विदीर्ण-हृदय राजा को सान्त्वना दी। तभी नारद ने, द्वीपोत्पन्न व्यास को आगे रखकर, धर्मपुत्र युधिष्ठिर से पूछा, “हे युधिष्ठिर! आपकी भुजाओं के बल और माधव की कृपा से सारी पृथ्वी आपने धर्मपूर्वक जीत ली। इस भयानक युद्ध से जीवित बचना आपका सौभाग्य है। क्षत्रिय-धर्म के पालक होकर भी क्या आपको हर्ष नहीं? क्या इस ऐश्वर्य को पाकर भी शोक आपको अब तक सता रहा है?”
राजा का शोक और कर्ण का रहस्य
युधिष्ठिर ने उत्तर दिया, “हे पूज्य! कृष्ण की भुजाओं के बल पर, ब्राह्मणों की कृपा से, और भीम तथा अर्जुन के पराक्रम से मैंने सारी पृथ्वी जीत ली है। किन्तु एक भारी शोक सदा मेरे हृदय में बैठा है, यह कि लोभ के वश होकर मैंने स्वजनों का यह भयंकर संहार करवाया। सुभद्रा के प्रिय पुत्र (अभिमन्यु) और द्रौपदी के पुत्रों की मृत्यु करवाकर यह विजय मुझे पराजय-सी लगती है। अब वृष्णिकुल की सुभद्रा, मेरी भौजाई, मुझसे क्या कहेगी? द्वारका के लोग जब मधुसूदन (कृष्ण) के वहाँ जाने पर उनसे सुनेंगे, तो क्या कहेंगे?”
फिर युधिष्ठिर ने वह बात कही जो उनके भीतर गहरे-से-गहरी जलन बनी हुई थी। कुन्ती ने, उदक-क्रिया के समय, कर्ण को सूर्य-पुत्र कहकर पुकारा था। “हे नारद! वह वीर जिसमें दस हज़ार हाथियों का बल था, जो इस संसार में अद्वितीय रथी था, जो सिंह के समान गर्वीला और गम्भीर था, वह कर्ण कुन्ती का ही पुत्र था, गुप्त रूप से जन्मा हमारा सहोदर भाई। जिसे संसार सूत-पुत्र, राधा का बेटा समझता रहा, वह वास्तव में कुन्ती का ज्येष्ठ पुत्र और हमारा सगा भाई था। राज्य के लोभ में मैंने अनजाने अपने उसी भाई का वध करवा दिया। यह बात मेरे अंगों को रूई के ढेर में लगी आग की तरह जला रही है।”
युधिष्ठिर ने आगे बताया कि एक बार पृथा (कुन्ती) स्वयं कर्ण के पास गई थीं और बोली थीं, “आप मेरे पुत्र हैं।” किन्तु कर्ण ने उनकी इच्छा मानने से इनकार कर दिया था। उसने कहा था, “युद्ध में दुर्योधन का साथ छोड़ना मेरे लिए कृतघ्न और निर्दय कर्म होगा। यदि मैं युधिष्ठिर से सन्धि करूँ तो लोग कहेंगे कि मैं अर्जुन से डर गया।” फिर भी, माता को आश्वासन देते हुए उसने कहा था, “हे देवी! आपके पाँच पुत्र सदा बने रहेंगे। यदि कर्ण अर्जुन के साथ मारा गया तो आपके पाँच पुत्र (शेष चार और अर्जुन) रहेंगे; और यदि अर्जुन मारा गया तो मुझे मिलाकर पाँच रहेंगे।” युधिष्ठिर ने स्मरण किया कि सभा में दुर्योधन के दुष्ट पुत्रों के बीच जब वे यातना भोग रहे थे, तब कर्ण के पैरों को देखते ही उनका क्रोध शान्त हो जाता था, क्योंकि वे पैर माता कुन्ती के पैरों जैसे लगते थे। “हे पूज्यपुरुष! मुझे यह सब सुनाइए। मेरे भाई के रथ का पहिया युद्ध में पृथ्वी ने क्यों निगल लिया? वह क्यों शापित हुआ? आप भूत और भविष्य दोनों जानते हैं।”
समझने की कुंजी: उदक-क्रिया मृतकों को तिल-जल देने का अन्त्येष्टि-कर्म है। सूत ब्राह्मण और क्षत्रिय के मेल से उपजी जाति, सारथि और स्तुति-गायक का वर्ण; इसी कारण कर्ण को जन्म-भर “सूत-पुत्र” का अपमान सहना पड़ा। पृथा कुन्ती का ही दूसरा नाम। रथी रथ पर लड़ने वाला महान योद्धा।
नारद की कथा: कर्ण के दो शाप
नारद ने कहा, “हे महाबाहु! आपने ठीक कहा। कर्ण और अर्जुन के सामने युद्ध में कोई टिक नहीं सकता था। मैं आपसे जो कहने जा रहा हूँ वह देवताओं तक को अज्ञात है।” फिर उन्होंने सारी बात बताई। कुन्ती के गर्भ से वह तेजस्वी बालक कौमार्य-अवस्था में ही जन्मा और सूत के घर पला। उसने द्रोण से अस्त्र-विद्या सीखी। भीम के बल, अर्जुन की हस्तलाघव, युधिष्ठिर की बुद्धि, और जुड़वाँ भाइयों की विनम्रता को देखकर वह ईर्ष्या से जल उठा, और कम उम्र में ही दुर्योधन का मित्र बन गया।
एक दिन कर्ण एकान्त में द्रोण के पास गया और बोला, “मैं अर्जुन से लड़ना चाहता हूँ; मुझे ब्रह्मास्त्र, उसके मन्त्र, और उसके लौटाने की विधि सिखाइए।” किन्तु द्रोण ने, अर्जुन के प्रति स्नेह और कर्ण की दुष्टता को जानते हुए, उत्तर दिया, “ब्रह्मास्त्र केवल वही ब्राह्मण जान सकता है जिसने सब व्रतों का पालन किया हो, अथवा वह क्षत्रिय जिसने कठोर तप किया हो; और कोई नहीं।” तब कर्ण महेन्द्र पर्वत पर परशुराम के पास गया और बोला, “मैं भृगुवंश का ब्राह्मण हूँ।” इस झूठ से उसे आदर मिला और राम (परशुराम) ने उसे सादर शिष्य बना लिया। वहाँ कर्ण ने सब अस्त्र सीख लिए।
एक दिन समुद्र-तट पर घूमते हुए कर्ण ने अनजाने एक ब्राह्मण की होम-धेनु (अग्निहोत्र के लिए रखी गाय) को मार डाला। पश्चात्ताप से उसने ब्राह्मण को बता दिया और गायों तथा धन से प्रसन्न करना चाहा, किन्तु ब्राह्मण ने क्रोध में शाप दिया, “जिस शत्रु से आप सदा युद्ध की कामना करते हैं, उसी से लड़ते समय पृथ्वी आपके रथ का पहिया निगल लेगी, और उसी क्षण मोहग्रस्त आपका सिर आपका शत्रु काट लेगा, जैसे आपने यह गाय असावधानी में मारी।” कितना ही प्रार्थना करने पर भी ब्राह्मण ने शाप वापस न लिया।
कुछ काल बाद दूसरा शाप मिला। एक दिन परशुराम थककर कर्ण की गोद में सिर रखकर सो गए। तभी एक भयानक कीड़ा, जो रक्त-मांस पर पलता था, कर्ण की जाँघ में घुसकर उसे छेदने लगा। गुरु की नींद टूटने के डर से कर्ण न उसे फेंक सका न मार सका; उसने वह असह्य पीड़ा बिना हिले-डुले सही। जब कर्ण का रक्त परशुराम के शरीर को छू गया, तब वे जाग उठे। उन्होंने देखा कि वह आठ पैरों और सुई-सी नुकीली रोमावली वाला, अलर्क नामक कीड़ा रक्त में गलकर प्राण त्याग चुका है। आकाश में एक राक्षस प्रकट हुआ जिसने कहा कि वह पूर्वजन्म में दंश नामक असुर था, जिसने भृगु की पत्नी का अपहरण किया था और शाप से कीड़ा बना; अब राम के निमित्त उसका उद्धार हुआ।
तब परशुराम ने क्रोध में कर्ण से कहा, “मूर्ख! इतनी पीड़ा कोई ब्राह्मण नहीं सह सकता। आपकी सहनशीलता क्षत्रिय की-सी है। सच बताइए।” शाप के भय से कर्ण ने सच कहा, “मैं सूत हूँ, ब्राह्मण और क्षत्रिय के मिश्रण से उत्पन्न, राधा का पुत्र कर्ण। अस्त्र पाने की इच्छा से मैंने यह छल किया।” परशुराम ने मुस्कुराते हुए, पर क्रोध से भरकर, शाप दिया, “अस्त्र के लोभ में आपने झूठ बोला, अतः जब आप अपने ही समान किसी योद्धा से जूझेंगे, तब मृत्यु के क्षण यह ब्रह्मास्त्र आपको स्मरण न रहेगा।” कर्ण लौटकर दुर्योधन से बोला, “मैंने सब अस्त्र सिद्ध कर लिए।”
एक उप-कथा: गोद में सोए गुरु, जाँघ में घुसा कीड़ा, और बिना सिसके सही गई पीड़ा। यही सहनशीलता कर्ण को धोखा दे गई, क्योंकि उसी से परशुराम ने पहचान लिया कि यह “ब्राह्मण” नहीं। महाभारत का यह क्रूर व्यंग्य है कि कर्ण का परम गुण ही उसके शाप का कारण बना।
कर्ण का यश और उसके पतन के अनेक कारण
नारद ने कर्ण का यश सुनाया: कलिंगराज चित्रांगद की कन्या के स्वयंवर में दुर्योधन ने कन्या का बलपूर्वक हरण किया और कर्ण ने अकेले सैकड़ों कुपित राजाओं को परास्त कर उसकी रक्षा की। मगधराज जरासन्ध ने कर्ण को द्वन्द्व-युद्ध के लिए ललकारा; बाहुयुद्ध में जब कर्ण उसके (जरा द्वारा जोड़े गए) दो भागों को चीरने ही वाला था, तब पीड़ा से व्याकुल जरासन्ध ने वैर त्याग दिया और ‘मैं प्रसन्न हूँ’ कहकर मित्रता कर ली और उसे मालिनी नगर दिया। पहले कर्ण केवल अंग देश का राजा था; अब चम्पा पर भी राज्य करने लगा।
नारद ने कर्ण के पतन के सभी कारण गिनाए: ब्राह्मण का शाप, परशुराम का शाप, कुन्ती को दिया गया वर, इन्द्र को कवच-कुण्डल दान में दे देना (जो इन्द्र ने पाण्डवों के हित में माँगे), इन्द्र की दिव्य माया से छले जाना, भीष्म द्वारा रथ-अतिरथ की गणना में उसे अर्ध-रथी कहकर हीन बताया जाना, शल्य के कटु वचनों से उसके तेज का क्षय, वासुदेव की नीति, और अर्जुन को रुद्र-इन्द्र-यम-वरुण-कुबेर-द्रोण-कृप से मिले दिव्य अस्त्र। “इन सब से घिरकर ही गाण्डीवधारी अर्जुन सूर्य-समान तेजस्वी विकर्तन-पुत्र कर्ण का वध कर सका। इस प्रकार आपका भाई अनेकों के शाप और छल से ग्रस्त था। वह युद्ध में गिरा है, अतः आप उसके लिए शोक न करें।”
समझने की कुंजी: रथ-अतिरथ की गणना सेना के योद्धाओं को उनके बल के अनुसार श्रेणी देना; भीष्म ने कर्ण को “अर्ध-रथी” कहकर उसका अपमान किया था। विकर्तन सूर्य का नाम; विकर्तन-पुत्र अर्थात सूर्य-पुत्र कर्ण।
नारद के मौन होने पर युधिष्ठिर शोक में डूब गए। तब कुन्ती ने, स्वयं दुःख से व्याकुल होकर, उन्हें समझाया कि उन्होंने स्वयं और सूर्यदेव ने भी, स्वप्न में तथा प्रत्यक्ष, कर्ण को आपके साथ मिलने को कहा था, किन्तु काल के वश वह न माना। यह सुनकर युधिष्ठिर ने आँसू भरकर कहा, “आपने अपना मन्त्र (रहस्य) छिपाए रखा, इसी से यह महान दुःख मुझ पर आया।” और शोक में उन्होंने समस्त स्त्रियों को शाप दे दिया कि अब से कोई स्त्री कोई रहस्य न छिपा सकेगी।
सार: भीष्म के उपदेश से पहले मूल कथा युधिष्ठिर के अपराध-बोध से आरम्भ होती है। कर्ण के दो शाप और अनेक कारणों की यह कथा यह दिखाती है कि महान योद्धा का पतन किसी एक भूल से नहीं, अनेक नियति-सूत्रों के मिलने से होता है। और गहरे-से-गहरी पीड़ा यह कि विजय का मूल्य अपने ही सहोदर का रक्त था।
युधिष्ठिर की वैराग्य-घोषणा

शोक से जलते युधिष्ठिर अर्जुन से बोले, “हे अर्जुन! यदि हम वृष्णि-अन्धकों के नगरों में भिक्षा-वृत्ति से जीते, तो स्वजनों के संहार का यह दारुण अन्त हमारा न होता। क्षत्रिय की रीति को धिक्कार, बल और पराक्रम को धिक्कार, क्रोध को धिक्कार, जिनके कारण यह विपत्ति आई। क्षमा, आत्म-संयम, पवित्रता, त्याग, विनम्रता, अहिंसा और सत्य ही धन्य हैं, जिन्हें वनवासी ऋषि पालते हैं। मांस के एक टुकड़े के लिए परस्पर लड़ते कुत्तों के झुण्ड की तरह हम पर यह विपत्ति आई है; अब वह मांस का टुकड़ा भी हमें प्रिय नहीं रहा।” युधिष्ठिर ने माता और भाइयों के सामने घोषणा की कि वे राज्य त्यागकर वन चले जाएँगे, मौन-व्रत धारण कर ज्ञान के बताए मार्ग पर चलेंगे, क्योंकि जो पृथ्वी से बँधा है वह सम्पूर्ण धर्म-लाभ नहीं पा सकता। “हे अर्जुन! आप ही इस काँटों-रहित शान्त पृथ्वी का शासन कीजिए। मुझे न राज्य चाहिए न भोग।”
अर्जुन का प्रत्युत्तर: धन और कर्म का धर्म
अर्जुन ने तीखे स्वर में, होंठ चबाते हुए, पर मुस्कुराते हुए कहा, “हे राजन्! इतना अलौकिक कर्म करके आप इस समृद्धि को त्यागने पर तुले हैं, यह देखकर मुझे दुःख होता है। क्या किसी नपुंसक या आलसी ने कभी राज्य पाया है? अपने ही धर्म के पालन से जीती हुई पृथ्वी को आप चित्त की चंचलता से क्यों छोड़ें? यदि आप वन को जाएँगे, तो आपकी अनुपस्थिति में दुष्ट यज्ञों का नाश करेंगे, और वह पाप आपको लगेगा।”
अर्जुन ने धन की महिमा गाई: “राजा का धर्म पूर्णतः धन पर निर्भर है। जिसके पास धन है उसी के मित्र हैं, बन्धु हैं, वही विद्वान और सत्पुरुष माना जाता है। धन से ही धर्म, सुख और स्वर्ग की प्राप्ति होती है। जैसे पहाड़ से नदियाँ निकलती हैं, वैसे धन से धर्म-कर्म निकलते हैं। देवता तक अपने बन्धुओं (असुरों) का संहार चाहते हैं; उन्होंने आपसी संघर्षों से ही स्वर्ग पाया। जो धन राजा दूसरों से लेता है वही उसकी समृद्धि का साधन बनता है, जैसे पुत्र पिता के धन को अपना कहते हैं। यह पृथ्वी पहले दिलीप, नहुष, अम्बरीष और मान्धाता की थी; अब आपकी है। अतः प्रचुर दक्षिणा वाला महायज्ञ कीजिए। यदि न करेंगे तो इस राज्य के सब पाप आपके होंगे। यह अश्वमेध का शाश्वत और मंगल मार्ग है; इसे छोड़कर आप किस मार्ग पर जाएँगे?”
समझने की कुंजी: राजसूय, अश्वमेध, सर्वमेध राजाओं के महायज्ञ; अश्वमेध में छोड़ा गया घोड़ा जहाँ-जहाँ जाता, वह भूमि राजा की मानी जाती। दक्षिणा यज्ञ के अन्त में ब्राह्मणों को दिया जाने वाला दान।
युधिष्ठिर का वन-जीवन का चित्र, और भीम का खण्डन
युधिष्ठिर ने अपने वन-जीवन का विस्तृत चित्र खींचा: वे फल-मूल पर जीएँगे, मृगों के साथ वन में विचरेंगे, किसी भी प्राणी को तनिक भी कष्ट न देंगे, द्वन्द्वों (सुख-दुःख, स्तुति-निन्दा) से ऊपर उठ जाएँगे, मौन रहेंगे, अन्धे-बहरे जड़ की भाँति आचरण करेंगे। “यदि कोई मेरी एक भुजा काट दे और दूसरा दूसरी भुजा पर चन्दन लगाए, तो मैं न एक का बुरा चाहूँगा न दूसरे का भला। सूई की नोक के बराबर भोजन भी न मिले तो सात घरों तक भिक्षा माँगूँगा।”

भीमसेन क्रोध में बोले, “हे राजन्! वेद के बार-बार पाठ से जैसे मूर्ख पाठक की बुद्धि सत्य के प्रति अन्धी हो जाती है, वैसे आपकी बुद्धि हो गई है। यदि क्षत्रिय-धर्म की निन्दा करके आपको आलस्य का जीवन ही जीना था, तो धृतराष्ट्र-पुत्रों का यह संहार व्यर्थ था। यह तो वैसा हुआ कि कुआँ खोदते-खोदते जल पाने से पहले कीचड़ में सना मनुष्य लौट आए; या ऊँचे वृक्ष पर चढ़कर मधु पाकर चखने से पहले मर जाए। हम बलवान, ज्ञानी और तेजस्वी होकर भी एक नपुंसक की भाँति आपके वचन मान रहे हैं। शास्त्रों ने वैराग्य केवल वृद्ध या पराजित राजाओं के लिए विपत्ति-काल में कहा है, क्षत्रिय के धर्म के रूप में नहीं। यदि त्याग से ही सिद्धि मिलती तो पर्वत और वृक्ष, जो किसी को कष्ट नहीं देते और सदा ब्रह्मचारी हैं, सर्वप्रथम सिद्ध होते। मनुष्य को कर्म करना ही चाहिए; कर्महीन को कभी सिद्धि नहीं मिलती।”
अर्जुन की उप-कथा: सोने की चिड़िया और संन्यासी युवक

अर्जुन ने एक प्राचीन कथा सुनाई। कुछ उच्चकुलीन, अल्पबुद्धि ब्राह्मण-युवक, अभी जिनकी दाढ़ी-मूँछ भी न आई थी, घर-बार और पिता-भाइयों को छोड़कर वन में ब्रह्मचारी का जीवन बिताने चले गए। इन्द्र को उन पर दया आई। स्वर्ण-पक्षी का रूप धरकर उसने कहा, “जो यज्ञ का बचा हुआ अन्न (विघस) खाते हैं, उनका कर्म परम कठिन और पुण्यमय है।” ऋषि-युवक बोले, “यह पक्षी हमें ही प्रशंसा दे रहा है, क्योंकि हम अवशिष्ट पर ही जीते हैं।” पर पक्षी ने कहा, “मैं आपको नहीं सराहता। आप तो कीचड़ में पड़े, अपवित्र, जूठन पर जीते दुष्ट हैं; यज्ञ-शेष पर जीने वाले नहीं।”
तब उस पक्षी (इन्द्र) ने उन्हें उपदेश दिया: चौपायों में गाय श्रेष्ठ, धातुओं में स्वर्ण, और द्विपदों में ब्राह्मण श्रेष्ठ हैं। जन्म से मृत्यु तक के सब संस्कार मन्त्रों से ही नियमित होते हैं। गृहस्थ-जीवन ही सिद्धि का क्षेत्र है। जो कर्म की निन्दा करते हैं वे देवों, ऋषियों और ब्रह्म के मार्ग छोड़कर श्रुति-निन्दित पथ पर जाते हैं। यज्ञ, वेदाध्ययन, पितरों का तर्पण, और गुरुसेवा ही कठोरतम तप हैं; देवताओं ने इन्हीं से महिमा पाई। “आप गृहस्थ-धर्म का भारी बोझ उठाइए। जो अतिथि, देव, ऋषि और बन्धुओं को खिलाकर बचा अन्न खाते हैं, वही विघस-भोजी हैं और दुर्लभ गति पाते हैं।” यह सुनकर युवकों ने वैराग्य त्यागकर गृहस्थ-जीवन अपना लिया। “हे राजन्! आप भी उसी शाश्वत बुद्धि से इस निष्कण्टक विश्व का शासन कीजिए।”
समझने की कुंजी: विघस अतिथि-देव-पितरों को भोजन कराने के पश्चात बचा हुआ अन्न; इसे खाना गृहस्थ का पुण्य माना जाता था। विघस-भोजी ऐसा गृहस्थ जो पहले सबको खिलाकर तब स्वयं खाता है।
सार: भाइयों का यह वाद-विवाद महाभारत के राज-धर्म का प्रवेश-द्वार है। प्रश्न यह है: युद्ध जीतकर राजा त्याग करे या शासन? अर्जुन धन और कर्म का पक्ष लेते हैं, भीम क्षत्रिय-धर्म का, और इन्द्र की कथा गृहस्थ-धर्म को चारों आश्रमों में श्रेष्ठ ठहराती है। नैतिक उलझन यह है कि वैराग्य कब धर्म है और कब पलायन।
नकुल और सहदेव का तर्क: सच्चा त्यागी कौन
नकुल ने ताम्र-वर्ण मुख से कहा, “देवता भी कर्म के फल पर निर्भर हैं; पितर भी कर्म में लगे हैं। जो वेद के कर्म-विधान को ठुकराते हैं उन्हें ही नास्तिक जानिए। जो अपना धर्मार्जित धन यज्ञ में वेदज्ञ ब्राह्मणों को देकर आत्म-संयम रखता है, वही सच्चा त्यागी है। जो गृहस्थ-सुख के स्रोत को छोड़कर आगे की अवस्था में कूद पड़ता है, वह तमोगुणी त्यागी है। चारों आश्रम जब तराज़ू पर तौले गए, तो एक पलड़े में गृहस्थ-धर्म रखने पर शेष तीनों को दूसरे पलड़े में रखना पड़ा। जो फल की कामना त्यागकर इसे कर्तव्य मानकर गृहस्थ-जीवन जीता है, वही सच्चा त्यागी है, और वह नहीं जो घर-बार छोड़कर वन में भी इच्छाओं को नहीं भूलता। जो राजा प्रजा को लुटेरों से नहीं बचाता, वह साक्षात कलि है। यदि दान और रक्षा किए बिना हम वन को जाएँ, तो हम राजवर्ग के कलि ही कहलाएँगे।”
सहदेव ने सूक्ष्म तर्क रखा, “केवल बाहरी वस्तुओं को त्यागने से सिद्धि नहीं मिलती; मानसिक आसक्ति भी त्यागनी होती है। ‘मम’ (मेरा) यह दो अक्षर का शब्द ही मृत्यु है, और ‘न मम’ (मेरा नहीं) यह तीन अक्षर का शब्द ही शाश्वत ब्रह्म है। जो समस्त प्राणियों को अपने ही समान देखता है, वह विनाश के महान भय से मुक्त हो जाता है। हे राजन्! आप मेरे पिता हैं, रक्षक हैं, भाई हैं, और गुरु भी। दुःखी जन के इन असंगत वचनों को क्षमा कर दीजिए, जो आपके प्रति आदर से ही कहे गए हैं।”
एक उप-कथा: चारों आश्रमों को तराज़ू पर तौलने का यह दृष्टान्त राज-धर्म का सूक्ष्म बीज है। ब्रह्मचर्य, वानप्रस्थ और संन्यास तीनों मिलकर भी गृहस्थ-धर्म के भार के बराबर ठहरते हैं, क्योंकि गृहस्थ ही देव, पितर, अतिथि और प्राणियों का पालन करता है। पर सहदेव यह मोड़ देते हैं कि असली त्याग बाहर नहीं, मन के “मम” को छोड़ने में है।
द्रौपदी का तीखा वचन: दण्ड के बिना क्षत्रिय शोभा नहीं देता

जब युधिष्ठिर मौन रहे, तब बड़ी आँखों वाली, सुन्दर द्रौपदी, जो सदा युधिष्ठिर के स्नेह की अपेक्षा रखती थीं, बोलीं, “हे पार्थ! ये आपके भाई चातक पक्षी की तरह मुख सुखाकर प्रतीक्षा कर रहे हैं, पर आप इन्हें प्रसन्न नहीं करते। द्वैतवन के सरोवर के पास, ठण्ड-हवा-धूप सहते हुए, आपने ही इन भाइयों से कहा था कि हम दुर्योधन को मारकर सर्वकामना-दात्री पृथ्वी का भोग करेंगे और महायज्ञ करेंगे; तब आप अब हमारे हृदयों को क्यों खिन्न करते हैं? नपुंसक न धन भोग सकता है, न सन्तान पा सकता है, जैसे जलहीन कीचड़ में मछली नहीं रहती। दण्ड के बिना क्षत्रिय न शोभा पाता है, न पृथ्वी भोग सकता है, और न उसकी प्रजा सुखी रहती है। दुष्टों का दमन, सज्जनों का पालन, और युद्ध से पीठ न दिखाना, यही राजा का परम धर्म है।”
द्रौपदी ने स्मरण दिलाया कि युधिष्ठिर ने जम्बूद्वीप, क्रौंचद्वीप, शाकद्वीप और भद्राश्व जैसे विशाल भूखण्डों पर बल से शासन किया है; ऐसे अतुलनीय कर्म करके भी उनका मन तृप्त क्यों नहीं? उन्होंने सास (कुन्ती) के वचन भी सुनाए कि युधिष्ठिर सदा उन्हें सुखी रखेंगे। “हज़ारों पराक्रमी राजाओं को मारकर अब आप अपने ही मूढ़ता से उस कर्म को व्यर्थ करने जा रहे हैं। जिनका ज्येष्ठ भाई उन्मत्त हो जाए, उन सबको उसी का अनुसरण करना पड़ता है। यदि ये भाई होश में होते, तो आपको और सब अविश्वासियों को बाँधकर स्वयं पृथ्वी का शासन सँभाल लेते। हे राजन्! आप मान्धाता और अम्बरीष जैसे राजाओं की भाँति प्रजा का धर्मपूर्वक पालन कीजिए, यज्ञ कीजिए, शत्रुओं से लड़िए, और ब्राह्मणों को दान दीजिए।”
समझने की कुंजी: दण्ड राजदण्ड, अर्थात शासन की दण्ड-शक्ति या न्याय-व्यवस्था; यहाँ इसका अर्थ “तलवार से दण्ड” और “विधि का शासन” दोनों है। कलि चार युगों में अन्तिम और पतनशील युग; प्रतीक रूप में पाप और अव्यवस्था का अवतार।
अर्जुन का दण्ड-नीति का व्याख्यान
द्रौपदी के वचनों के बाद अर्जुन ने दण्ड (दण्ड-नीति) की गहरी व्याख्या की। “दण्डधारी राजा ही सब प्रजा का शासन और रक्षण करता है। जब सब सोते हैं, दण्ड जागता है; इसी से विद्वानों ने दण्ड को साक्षात धर्म कहा है। दण्ड धर्म, अर्थ और काम, तीनों की रक्षा करता है। कुछ लोग राजदण्ड के भय से पाप छोड़ते हैं, कुछ यमदण्ड के भय से, कुछ परलोक के भय से, और कुछ समाज के भय से। यदि दण्ड न होता तो प्रबल दुर्बल को निगल जाता, जैसे जल में बड़ी मछली छोटी को खाती है। दण्ड इसीलिए ‘दण्ड’ कहलाता है क्योंकि वह उद्दण्डों को रोकता और दुष्टों को दण्डित करता है।”
अर्जुन ने वर्णानुसार दण्ड का भेद बताया: ब्राह्मण का दण्ड वचन-मात्र से, क्षत्रिय का जीवन-निर्वाह जितना अन्न देकर, वैश्य का अर्थ-दण्ड और सम्पत्ति-हरण से, और शूद्र के लिए दण्ड नहीं। उन्होंने कहा कि बिना किसी प्राणी को कष्ट दिए कोई जीवन धारण नहीं कर सकता; नेवला चूहे को, बिल्ली नेवले को, कुत्ता बिल्ली को, और चीता कुत्ते को खाता है। यह चर-अचर जगत प्राणियों का भोजन है, यही देवों ने नियत किया। इन्द्र ने वृत्र-वध से इन्द्रत्व पाया। “हे राजन्! आप जैसे जन्म से हैं वैसे ही बनिए। यदि दण्ड न हो, तो कुत्ता यज्ञ का घृत चाट जाए, कौवा प्रथम आहुति ले जाए। दण्ड ही सबका मूल है; उस पर स्वर्ग और यह लोक दोनों टिके हैं।”
अर्जुन ने हिंसा-अहिंसा की नैतिक जटिलता को भी छुआ: “कोई कर्म पूर्णतः पुण्य नहीं, न कोई पूर्णतः पाप। हर कर्म में दोनों का अंश रहता है। जो शत्रु अस्त्र उठाकर सामने आता है, उसे अस्त्र से मारने में कोई पाप नहीं, क्योंकि वह क्रोध आक्रमणकारी का ही उकसाया हुआ है। आत्मा अवध्य है; जब आत्मा मारी ही नहीं जा सकती, तो एक दूसरे को कैसे मारता है? जैसे मनुष्य नया घर बदलता है, वैसे जीव नए शरीर धारण करता है।”
सार: यही खण्ड भीष्म के राज-धर्म का बीज-सूत्र है। दण्ड (राज-शक्ति) ही वह धुरी है जिस पर समाज की व्यवस्था घूमती है। बिना दण्ड के “मत्स्य-न्याय” (बड़ी मछली छोटी को खा जाए) आ जाता है। पर अर्जुन इसे सपाट नहीं रखते, वे मानते हैं कि हर कर्म में पुण्य-पाप मिले रहते हैं; राजा का धर्म स्वच्छ नहीं, सदा मिश्रित होता है।
भीम का मन-युद्ध का आह्वान, और युधिष्ठिर का सन्तोष-उपदेश
भीम ने फिर धैर्य बटोरकर कहा, “हे राजन्! दो प्रकार के रोग हैं, शारीरिक और मानसिक; एक दूसरे से उत्पन्न होते हैं। शीत, उष्ण और वायु शरीर के तीन गुण हैं; इनका सन्तुलन ही स्वास्थ्य है। सत्त्व, रज और तम मन के तीन गुण हैं; इनका सन्तुलन ही मानसिक स्वास्थ्य है। शोक हर्ष से और हर्ष शोक से सन्तुलित होता है। आप न कभी दुःख में दुःखी हुए न सुख में सुखी; तो अब सुख के समय स्मृति से दुःखी क्यों होते हैं?” भीम ने द्रौपदी के सभा में घसीटे जाने, वनवास, जटासुर और कीचक के अत्याचारों का स्मरण दिलाया और कहा, “अब आपके सामने भीष्म-द्रोण के युद्ध जैसा ही एक युद्ध है, जो केवल मन से लड़ा जाना है, जिसमें न बाण चाहिए, न मित्र, न बन्धु। यदि इस मन के शत्रु को जीते बिना आप प्राण त्याग देंगे, तो दूसरा शरीर धरकर फिर इन्हीं शत्रुओं से लड़ना होगा। अतः आज ही, शरीर की चिन्ता छोड़कर, मन के शत्रु को जीतिए।”
युधिष्ठिर ने उत्तर दिया, “हे भीम! असन्तोष, सांसारिक आसक्ति, अशान्ति, मद और चिन्ता, इन्हीं दोषों से आप राज्य चाहते हैं। जो राजा इस अनन्त पृथ्वी का शासन करे, उसका भी एक ही पेट होगा। इच्छाएँ एक दिन में, अनेक महीनों में, सारे जीवन में भी नहीं भरतीं। अग्नि को ईंधन से बढ़ाते हैं, न दें तो बुझ जाती है; वैसे ही पेट की अग्नि को थोड़े अन्न से शान्त कीजिए। पहले पेट को जीतिए, फिर पृथ्वी जीती जाएगी।” उन्होंने जनक के उस वचन का स्मरण कराया, “मेरा कोष अपार है, फिर भी मेरा कुछ नहीं! यदि सारी मिथिला जलकर राख हो जाए, तो भी मेरा कुछ नहीं जलता।” “जो ज्ञान के भवन की छत पर चढ़ गया है, वह नीचे शोक करते लोगों को ऐसे देखता है जैसे पर्वत-शिखर से मैदान के लोगों को। जब कोई अनेक रूपों वाले प्राणियों को एक ही तत्त्व का विविध प्रकटीकरण देखता है, तभी वह ब्रह्म को प्राप्त कहलाता है।”
समझने की कुंजी: पितृयान और देवयान दो मार्ग; यज्ञ-कर्म करने वाले पितृयान (दक्षिण मार्ग) से, और मोक्षार्थी देवयान (उत्तर मार्ग) से जाते हैं। जनक मिथिला का राजर्षि, जो राज्य में रहकर भी अनासक्त रहने का आदर्श है।
अर्जुन की उप-कथा: जनक और उनकी रानी का संवाद

अर्जुन ने फिर विदेहराज जनक और उनकी रानी की कथा सुनाई। एक बार जनक धन, पुत्र, पत्नी और अग्नि तक त्यागकर, सिर मुँड़ाकर भिक्षु बन गए, और खेत की दरारों से बीने जौ के दानों पर जीने का संकल्प किया। तब उनकी तेजस्वी रानी ने एकान्त में, निडर होकर, क्रोध से उन्हें तर्कपूर्ण वचन कहे: “आपने धन-धान्य से भरा राज्य छोड़कर भिक्षा-वृत्ति क्यों ली? मुट्ठी-भर जौ से आप अतिथि, देव, ऋषि और पितरों को कैसे तृप्त करेंगे? आप तीनों वेदों के ज्ञाता हज़ारों ब्राह्मणों के पालक थे; अब उन्हीं से भिक्षा माँगेंगे? आपकी माता निर्पुत्र हुई, और मैं, कोसल की राजकुमारी, विधवा-सी हुई। ये असहाय क्षत्रिय फल और पुण्य की आशा में आप पर निर्भर हैं; उनकी आशा मारकर आप किस लोक में जाएँगे?”
रानी ने सूक्ष्म तर्क रखा: “यदि राज्य और मुट्ठी-भर जौ आपके लिए समान हैं, तो राज्य ही क्यों छोड़ते हैं? और यदि वह मुट्ठी-भर जौ आपकी आसक्ति का विषय बन गया, तो सब त्यागने का आपका संकल्प ही गिर गया। केवल सम्पत्ति छोड़ देने या भिक्षा पर निर्भर हो जाने से कोई संन्यासी नहीं होता। जो भीतर से अनासक्त रहे, बाहर से चाहे संलग्न दिखे, सब बन्धन तोड़ चुका हो, और मित्र-शत्रु को समान देखे, वही मुक्त है। सिर मुँड़ाकर गेरुआ वस्त्र धारण कर लेने वाले अनेक लोग भीतर अनेक बन्धनों से बँधे, व्यर्थ धन की ताक में घूमते हैं। हे राजन्! इन्द्रियों को वश में रखकर, सच्चे साधुओं का पालन करके आप परलोक के आनन्द-लोक जीतिए। जो अग्निहोत्र रखता है, यज्ञ करता है, और दिन-रात दान करता है, उससे बढ़कर धर्मात्मा कौन है?” अर्जुन ने जोड़ा, “जनक जैसा सत्यज्ञ भी इस विषय में मोहित हो गया था; आप मोह में न पड़िए। हम दान, अहिंसा, और सत्य-वचन से ही इष्ट लोक पाएँगे।”
एक उप-कथा: रानी का तर्क महाभारत का तीक्ष्ण वैचारिक मोड़ है। वह कहती है कि भिक्षा की मुट्ठी-भर जौ भी यदि आसक्ति बन जाए, तो वह राज्य से भी बड़ा बन्धन है। संन्यास का गेरुआ वस्त्र तभी सार्थक है जब भीतर का “मम” मरे; अन्यथा वह केवल पेट भरने का साधन है। यही विचार सहदेव के “मम और न मम” से जुड़ता है।
युधिष्ठिर का ज्ञान-पक्ष और देवस्थान का प्रत्युत्तर
युधिष्ठिर ने कहा, “हे अर्जुन! मैं वेद और ब्रह्म-विद्या दोनों जानता हूँ। वेद में कर्म और कर्म-त्याग, दोनों के उपदेश हैं। तप, त्याग और ब्रह्मज्ञान, इन तीनों में दूसरा पहले से और तीसरा दूसरे से श्रेष्ठ है। आप युद्ध-विद्या के ज्ञाता हैं, पर आपने वृद्धों की सेवा नहीं की; आप शास्त्रों का सूक्ष्म अर्थ नहीं जानते। धन को सर्वोपरि मानना भूल है। धर्मात्मा लोग तप और वेदाध्ययन में लगे रहते हैं। जो लोभ-रहित होकर सांसारिक इच्छाओं को रोकते हैं, वे उत्तर-मार्ग (देवयान) से त्यागियों के लोक जाते हैं।”

तब महातपस्वी देवस्थान बोले, “हे अजातशत्रु! फाल्गुन (अर्जुन) ने कहा कि धन से बढ़कर कुछ नहीं; मैं भी इसी पर कहता हूँ। आपने पृथ्वी धर्मपूर्वक जीती है, बिना कारण उसे न त्यागिए। वेद में चार आश्रम बताए हैं; उन्हें क्रम से पार कीजिए। अभी प्रचुर दक्षिणा वाले महायज्ञ कीजिए। जो धन पाकर अपात्र को देता और सुपात्र को नहीं देता, वह भ्रूण-हत्या का पाप पाता है। सुपात्र-अपात्र का विवेक करके दान देना सरल नहीं। विधाता ने धन यज्ञ के लिए रचा, और मनुष्य को उस धन की रक्षा और यज्ञ के लिए। इन्द्र, महादेव, मरुत्त, और हरिश्चन्द्र ने यज्ञों से ही महिमा पाई।”
देवस्थान ने इन्द्र के पूछने पर बृहस्पति के दिए सन्तोष-उपदेश को उद्धृत किया: “सन्तोष ही परम स्वर्ग है, सन्तोष ही परम सुख है। जब मनुष्य कछुए की तरह अपनी सब इच्छाओं को समेट लेता है, तब उसकी आत्मा का स्वाभाविक तेज प्रकट होता है। जब कोई किसी प्राणी से न डरता है न किसी को डराता है, जब वह राग-द्वेष को जीत लेता है, तब वह आत्म-दर्शी कहलाता है। अहिंसा, सत्य-वचन, न्याय, करुणा, आत्म-संयम, सन्तान-उत्पत्ति, मृदुता, लज्जा और धैर्य, मनु के अनुसार यही श्रेष्ठ धर्म है। जो क्षत्रिय राज-धर्म को जानकर, आत्म-संयम रखते हुए, दुष्टों को रोककर और सज्जनों का पालन करके, अन्त में पुत्र को राज्य सौंपकर वन जाता है, वह दोनों लोकों में उत्तम फल पाता है।”
समझने की कुंजी: चार आश्रम ब्रह्मचर्य (विद्यार्थी), गृहस्थ, वानप्रस्थ (वन-निवास) और संन्यास; जीवन को क्रम से इन चरणों में जीने का विधान। भ्रूण-हत्या गर्भस्थ शिशु की हत्या, शास्त्रों में महापातक; अपात्र-दान को इसी के समान पाप कहा गया।
सार: इस खण्ड में दो धाराएँ टकराती हैं: युधिष्ठिर की ज्ञान-त्याग की धारा और देवस्थान-अर्जुन की कर्म-यज्ञ की धारा। देवस्थान बीच का मार्ग सुझाते हैं, क्रम से चारों आश्रमों को जीना, पहले राज-धर्म फिर वैराग्य। सन्तोष का उपदेश इस तनाव को सुलझाने की चाबी है: राज्य में रहकर भी कछुए-सी अनासक्ति सम्भव है।
व्यास का उपदेश और शंख-लिखित की दण्ड-कथा
अर्जुन के फिर समझाने पर जब युधिष्ठिर मौन रहे, तब द्वीपोत्पन्न व्यास बोले, “हे युधिष्ठिर! अर्जुन के वचन सत्य हैं। श्रेष्ठ धर्म गृहस्थ-धर्म पर निर्भर है। देव, पितर, अतिथि और सेवक सब गृहस्थ पर ही जीते हैं। आप वंश-परम्परा से आई राज्य-गठरी को बैल की तरह उठाइए। क्षत्रिय का प्रधान धर्म दण्ड-धारण है; बल क्षत्रिय में सदा रहे, और बल पर दण्ड टिका है। बृहस्पति ने यह श्लोक गाया है: ‘जैसे साँप चूहे को निगलता है, वैसे पृथ्वी उस राजा को निगल जाती है जो शान्ति-प्रिय हो, और उस ब्राह्मण को जो गृहस्थी में अति आसक्त हो।’ राजर्षि सुद्युम्न ने केवल दण्ड-धारण से ही दक्ष के समान परम सिद्धि पाई।”
युधिष्ठिर के पूछने पर व्यास ने शंख और लिखित नामक दो तपस्वी भाइयों की कथा सुनाई। बाहुदा नदी के तट पर दोनों के अलग-अलग सुन्दर आश्रम थे। एक दिन छोटा भाई लिखित बड़े भाई शंख के आश्रम आया; शंख बाहर गए थे। लिखित ने आश्रम के पके फल बिना किसी संकोच के तोड़कर खाने लगा। शंख ने लौटकर पूछा, “ये फल कहाँ से लिए?” लिखित ने हँसते हुए कहा, “इसी आश्रम से।” शंख क्रोधित होकर बोले, “आपने बिना दिए ले लिया, यह चोरी है। राजा सुद्युम्न के पास जाइए और कहिए, मैंने चोरी की, मुझे चोर का दण्ड दीजिए।”
लिखित राजा सुद्युम्न के पास गया और चोरी का दण्ड माँगा। राजा ने कहा, “यदि राजा दण्ड देने में समर्थ है, तो क्षमा करने में भी; आप पवित्र हुए, क्षमा कीजिए, और कोई वर माँगिए।” पर लिखित ने और कुछ न माँगा। तब राजा ने उसके दोनों हाथ कटवा दिए। लिखित दण्ड सहकर भाई के पास लौटा और बोला, “अब इस दण्डित अधम को क्षमा कर दीजिए।” शंख ने कहा, “मैं आपसे रुष्ट नहीं, न आपने मुझे हानि पहुँचाई; पर आपके धर्म को ठेस लगी थी, उसी से मैंने आपको उबारा। अब बाहुदा में स्नान कर देव, ऋषि और पितरों को तर्पण दीजिए।” लिखित ने स्नान कर जल-कर्म आरम्भ किया, तो उसके कटे हाथों के स्थान पर दो कमल-से नए हाथ उग आए। विस्मित लिखित ने भाई को दिखाया। शंख बोले, “यह मेरे तप का फल है; आश्चर्य न कीजिए, विधाता ही निमित्त है। मैंने आपको पहले इसलिए शुद्ध न किया क्योंकि मैं आपका दण्ड-दाता नहीं हूँ; राजा ने दण्ड देकर स्वयं को, आपको और पितरों को पवित्र किया।” व्यास ने कहा, “इसी कर्म से वह राजा दक्ष के समान परम सिद्धि को प्राप्त हुआ। क्षत्रिय का धर्म दण्ड-धारण है, सिर मुँड़ाना नहीं।”
एक उप-कथा: शंख-लिखित की यह कथा राज-धर्म की कठोर सुन्दरता दिखाती है। बड़ा भाई अपने छोटे भाई को राजदण्ड पाने भेजता है, और राजा का दण्ड ही उसे पाप से शुद्ध करता है। दण्ड यहाँ क्रोध नहीं, शुद्धि का साधन है; और कटे हाथों का फिर उगना यह संकेत है कि न्याय-दण्ड स्वीकार करने वाला अन्ततः अखण्ड हो जाता है।
व्यास की राज-नीति, और हयग्रीव की कथा
व्यास ने कुन्तीपुत्र को राज-धर्म के सूत्र दिए: “हे राजन्! जो छठा भाग (कर) लेकर भी राज्य की रक्षा नहीं करता, वह राज्य के पाप का चौथाई भाग पाता है। जो राजा शास्त्र-सम्मत बुद्धि से, काम-क्रोध को त्यागकर, पिता की भाँति सब प्रजा से निष्पक्ष व्यवहार करता है, वह पाप नहीं पाता। राजा बल और नीति से शत्रुओं का दमन करे; अपने राज्य में पाप न होने दे और धर्म का आचरण कराए। वीर, शील-सम्पन्न, विद्वान, वेदज्ञ ब्राह्मण और धनी, इनकी विशेष रक्षा करे। बुद्धिमान राजा किसी एक व्यक्ति पर, चाहे वह कितना ही गुणी हो, पूरा विश्वास न करे। जो राजा प्रजा की रक्षा नहीं करता, जिसके वासनाएँ अनियन्त्रित हैं, जो अहंकार और द्वेष से भरा है, वह पाप और अत्याचार का अपयश पाता है। यदि उसकी प्रजा रक्षा-अभाव में, देवों की मार और लुटेरों से पिसती है, तो वह सब पाप राजा को लगता है।”
व्यास ने प्राचीन राजा हयग्रीव की कथा सुनाई, जिसने अनेक शत्रुओं को मारकर अन्त में, अकेले बिना किसी सहायक के, युद्ध में वीरगति पाई। लुटेरों द्वारा अस्त्रों से छिन्न-भिन्न होकर भी निडर लड़ते हुए उसने प्राण त्यागे। व्यास ने उसके युद्ध को यज्ञ का रूपक दिया: धनुष यज्ञ-स्तम्भ था, प्रत्यंचा बलि बाँधने की रस्सी, बाण छोटी आहुति-कुड़छी, तलवार बड़ी, रक्त आहुति का घृत, रथ वेदी, और युद्ध का क्रोध अग्नि; चार श्रेष्ठ घोड़े चार होता थे। उस यज्ञ में शत्रुओं को आहुति देकर, अन्त में अपने प्राण होमकर, हयग्रीव पाप-मुक्त होकर देव-लोक में विहार कर रहा है। “उसने नीति और बुद्धि से राज्य की रक्षा की, बिना अहंकार के पृथ्वी पर शासन किया, और युद्ध में प्राण त्यागे; इसी से वह देव-लोक में आनन्द कर रहा है।”
समझने की कुंजी: छठा भाग प्राचीन भारत में राजा प्रजा से उपज का छठा हिस्सा कर के रूप में लेता था, इसी के बदले रक्षा का दायित्व था। होता यज्ञ में मन्त्र पढ़कर आहुति देने वाला ऋत्विक्। युद्ध को यज्ञ कहना क्षत्रिय के लिए धर्मयुद्ध स्वयं एक यज्ञ है, जिसमें वह अपने प्राण तक आहुति कर देता है।
काल का उपदेश: सेनजित की कथा
युधिष्ठिर ने फिर कहा कि स्त्रियों के विलाप सुनकर उन्हें शान्ति नहीं मिलती। तब योगवेत्ता व्यास ने काल (समय) का गहन उपदेश दिया: “कोई मनुष्य अपने कर्म, यज्ञ या पूजा से कुछ नहीं पाता; मनुष्य सब कुछ काल से पाता है। विधाता ने काल को ही प्राप्ति का साधन बनाया। काल से ही वायु बहती है, मेघ बरसते हैं, सरोवर कमलों से सजते हैं, वृक्ष फूलते हैं। काल आए बिना न कोई जन्मता है न मरता है; काल आए बिना बीज अंकुरित नहीं होता।”
व्यास ने राजा सेनजित की कथा कही, जिसने शोक में यह सत्य कहा था: “काल का अप्रतिरोध्य प्रवाह सब मरणधर्मा को छूता है। कोई किसी को मारता है, फिर वही दूसरे से मारा जाता है, यह संसार की भाषा है। वास्तव में न कोई मारता है न मारा जाता है। धन के नाश पर, या पत्नी-पुत्र-पिता की मृत्यु पर मनुष्य ‘हाय कैसा दुःख’ कहकर उसी शोक में डूबकर उसे बढ़ाता है। हे राजन्! आप मूर्ख की भाँति शोक क्यों करते हैं? जो स्वयं शोक के योग्य हैं, उनके लिए क्यों शोक? इस संसार में केवल दुःख है, सुख नहीं। सुख अन्ततः दुःख में बदल जाता है, और कभी दुःख से ही उपजता है। जो शाश्वत सुख चाहता है उसे दोनों (सुख-दुःख) छोड़ने होंगे। जो दूसरों के दुःख पर दुःखी होता है वह कभी सुखी नहीं हो सकता। अतः शान्त-चित्त बुद्धिमान न हर्ष में फूले न शोक में डूबे।”
व्यास ने राजा के यज्ञ-धर्म का सार दिया: “युद्ध में लगा रहना राजा का यज्ञ है; दण्ड-नीति का पालन उसका योग है; और यज्ञ में दक्षिणा-दान उसका त्याग है। बुद्धि और नीति से राज्य चलाकर, अहंकार त्यागकर, यज्ञ करके, और सबको करुणा तथा निष्पक्षता से देखकर राजा मरणोपरान्त देव-लोक में विहार करता है।”
समझने की कुंजी: काल केवल “समय” नहीं; वह नियति-शक्ति जो सब घटनाओं का मूल कारण है। योग यहाँ राजा के सन्दर्भ में अर्थ है कुशल नीति-पालन और चित्त की एकाग्रता।
सार: काल का यह उपदेश शोक का दार्शनिक उत्तर है। जब सब कुछ काल के अधीन है, तो “मैंने मारा” या “मैं कर्ता हूँ” यह अहंकार ही भ्रम है। पर ध्यान दें, व्यास निष्काम होकर राज-धर्म करने को कहते हैं; युद्ध, दण्ड और दान को ही राजा का यज्ञ, योग और त्याग बताते हैं।
धन के दोष, और युधिष्ठिर का प्राय-व्रत संकल्प
युधिष्ठिर ने अर्जुन से कहा कि धन को सर्वोपरि मानना भूल है; अनेक सिद्ध पुरुष केवल वेदाध्ययन और तप से ही उत्तम लोक पा गए। उन्होंने धन के दोष गिनाए: “धन बिना दूसरों को हानि पहुँचाए नहीं मिलता, और मिलने पर अनेक क्लेश लाता है। थोड़े-से धन के लोभ में संकीर्ण-हृदय मनुष्य पश्चात्ताप का भय छोड़कर ब्रह्म-हत्या तक का पाप कर बैठता है। विधाता ने धन यज्ञ के लिए रचा; अतः सब धन यज्ञ और दान में लगे, भोग-वासना में नहीं। धन के दो दोष हैं: अपात्र को देना, और सुपात्र को न देना।”

फिर युधिष्ठिर शोक के चरम पर पहुँचे। उन्होंने अभिमन्यु, द्रौपदी के पुत्रों, धृष्टद्युम्न, विराट, द्रुपद, वसुषेण (कर्ण), धृष्टकेतु आदि के वध को स्मरण किया। उन्होंने भीष्म का स्मरण किया, “जिनकी छाती और गोद में मैं बालपन में खेलता था, उन्हीं गंगापुत्र को राज्य-लोभ में मैंने मरवा दिया। शिखण्डी को आगे करके अर्जुन ने उन्हें तीरों से बेधा; मैंने उन्हें रक्त में लथपथ पृथ्वी पर पड़े देखा।” उन्होंने द्रोण के साथ किए अर्ध-सत्य का अपराध भी स्वीकारा, “गुरु ने पूछा कि क्या मेरा पुत्र जीवित है; मुझ पर ही उन्हें सत्य का भरोसा था। मैंने धीमे स्वर में ‘हाथी’ कहकर छल किया, यह कहकर कि अश्वत्थामा मारा गया, जबकि उस नाम का हाथी मारा गया था। ऐसा घोर कर्म करके मैं किस लोक में जाऊँगा?”
शोक से अभिभूत युधिष्ठिर ने प्राय-व्रत (आमरण अनशन) का संकल्प किया: “मैं इसी आसन पर बैठकर, अन्न-जल त्यागकर, अपने प्रिय प्राणों को सुखा दूँगा। मुझे, अपने गुरु के हत्यारे को, यह करने की अनुमति दीजिए, ताकि मैं किसी अन्य योनि में पुनर्जन्म न लूँ।” व्यास ने “ऐसा नहीं हो सकता” कहकर उन्हें रोका, “यह सब नियति है। जैसे जल के बुलबुले उठते और मिटते हैं, वैसे सब प्राणी उठते और गिरते हैं। संयोग का अन्त वियोग में, और जीवन का अन्त मृत्यु में है। आप कर्म के लिए ही विधाता द्वारा रचे गए हैं; सिद्धि कर्म से ही आती है। आप कर्म से विमुख होने योग्य नहीं।”
समझने की कुंजी: प्राय (प्रायोपवेशन) आमरण अनशन का व्रत, जिसमें साधक एक स्थान पर बैठकर अन्न-जल त्यागकर देह छोड़ता है। अश्वत्थामा-प्रसंग युधिष्ठिर का यह आधा-सच (हाथी का नाम भी अश्वत्थामा था) महाभारत की नैतिक जटिलता का केन्द्रीय बिन्दु है; “सत्यवादी युधिष्ठिर” का यही एकमात्र असत्य उन्हें जीवन-भर सालता रहा।
अस्म की कथा: जनक को नियति का उपदेश
व्यास ने अस्म नामक विद्वान ब्राह्मण और विदेहराज जनक के संवाद की कथा सुनाई। जनक ने पूछा, “स्वजनों और धन के लाभ या नाश के अवसरों पर मनुष्य कैसा आचरण करे?” अस्म ने कहा, “शरीर के बनते ही सुख-दुःख उससे जुड़ जाते हैं। समृद्धि में मनुष्य त्रिविध मद से भर जाता है: ‘मैं उच्चकुलीन हूँ, जो चाहूँ कर सकता हूँ, मैं साधारण नहीं।’ फिर वह पूर्वजों का धन उड़ाकर, दरिद्र होने पर दूसरों का धन हरने को भी श्रेष्ठ मानने लगता है, और राजा उसे शिकारी की भाँति दण्डित करता है।”
अस्म ने नियति का गम्भीर उपदेश दिया: “जरा (बुढ़ापा) और मृत्यु, दो भेड़ियों की तरह, सब प्राणियों को, बलवान-दुर्बल, छोटे-बड़े, सबको खा जाते हैं। समुद्र-पर्यन्त पृथ्वी का विजेता भी इनसे नहीं बच सकता। सुख हो या दुःख, उसे बिना हर्ष-विषाद के भोगना या सहना चाहिए, क्योंकि इनसे बचने का कोई उपाय नहीं। जैसे गन्ध, रंग, स्वाद और स्पर्श स्वभाव से आते हैं, वैसे सुख-दुःख पूर्व-निर्धारित से आते हैं। वैद्य भी रोगी होते हैं; बलवान दुर्बल हो जाते हैं; समृद्ध दरिद्र हो जाते हैं। काल की गति विचित्र है।”
अस्म ने जीवन की क्षणभंगुरता का चित्र खींचा: “जैसे महासागर में बहते दो काठ मिलते और फिर बिछुड़ जाते हैं, वैसे प्राणी मिलते और बिछुड़ते हैं। माता, पिता, पुत्र, पत्नी, हज़ारों सम्बन्ध बनते हैं; पर वास्तव में किसका कौन है? पथिक जैसे सराय में मिलते हैं, वैसे ही हमारा बन्धुओं से मिलन है। ‘मैं कहाँ हूँ? कहाँ जाऊँगा? मैं कौन हूँ? यहाँ क्यों आया? किसके लिए शोक करूँ?’ इन प्रश्नों पर विचार करने से शान्ति मिलती है। कोई स्वर्ग-नरक नहीं देख सकता; शास्त्र ही सज्जनों के नेत्र हैं। हे राजन्! शास्त्र के अनुसार आचरण कीजिए, ब्रह्मचर्य के बाद सन्तान उत्पन्न कीजिए, यज्ञ कीजिए, और पितर-देव-मनुष्यों का ऋण चुकाइए।” यह सुनकर जनक शोक-मुक्त होकर अपने घर लौट गए। व्यास ने कहा, “हे युधिष्ठिर! आप भी शोक त्यागकर उठिए; आप साक्षात इन्द्र के समान हैं। क्षत्रिय-धर्म से जीती पृथ्वी का भोग कीजिए।”
समझने की कुंजी: जरा बुढ़ापा, वार्धक्य; यहाँ इसे मृत्यु के साथ “दो भेड़िये” कहा गया जो सबको निगल जाते हैं। तीन ऋण यहाँ व्यास पितरों, देवताओं और मनुष्यों के ऋण गिनाते हैं, जो ब्रह्मचर्य के बाद सन्तान उत्पन्न करने और यज्ञ करने से चुकते हैं।
कृष्ण की सान्त्वना और सृंजय का आख्यान

युधिष्ठिर के फिर भी मौन रहने पर अर्जुन ने कृष्ण से कहा, “हे माधव! धर्मपुत्र अपने स्वजनों के लिए शोक में जल रहे हैं; इनका शोक दूर कीजिए।” कमल-नयन गोविन्द ने राजा का चन्दन-चर्चित, संगमरमर के स्तम्भ-सा हाथ थामकर कहा, “हे नरश्रेष्ठ! इस शोक से अपने शरीर को मत सुखाइए। इस युद्ध में मारे गए वीर अब लौटकर नहीं आ सकते; वे स्वप्न में पाई वस्तु की भाँति हैं जो जागने पर मिट जाती है। वे सब शत्रुओं की ओर मुख करके लड़े, किसी की पीठ पर घाव नहीं था, कोई भागते हुए नहीं मारा गया; अतः वे सब अस्त्रों से पवित्र होकर वीरगति को प्राप्त हुए। आप उनके लिए शोक न करें।”
कृष्ण ने नारद का सृंजय को दिया वह प्राचीन उपदेश सुनाया, जो नारद ने सृंजय के पुत्र-शोक के समय कहा था। नारद ने कहा था, “हे सृंजय! मैं, आप, और सब प्राणी मरणधर्मा हैं; फिर शोक का क्या कारण? मैं आपको प्राचीन राजर्षियों की महिमा सुनाता हूँ; ध्यान से सुनकर शोक त्याग दीजिए।” फिर नारद ने उन सोलह महान राजाओं की एक लम्बी सूची सुनाई, जो आपसे (और आपके पुत्र से) धर्म, ज्ञान, त्याग और ऐश्वर्य में कहीं बड़े थे, और फिर भी मृत्यु के ग्रास बने, और हर एक के अन्त में दोहराया, “वे भी मरे, तो आप अपने पुत्र के लिए शोक मत कीजिए।”
- मरुत्त (अविक्षित-पुत्र): जिसके यज्ञ में सब पात्र सोने के थे, और श्री स्वयं प्रकट हुईं; उसने इन्द्र को भी जीता।
- सुहोत्र (अतिथि-पुत्र): जिसके राज्य पर इन्द्र ने वर्ष-भर स्वर्ण बरसाया; नदियाँ सोने के कछुए-मगर बहाने लगीं।
- बृहद्रथ (अंगराज): जिसने एक लाख घोड़े, एक लाख स्वर्ण-अलंकृत कन्याएँ, और करोड़ों बैल दान किए।
- शिबि (उशीनर-पुत्र): जिसने सारी पृथ्वी को चर्म-ढाल की तरह हाथ में घुमाया।
- भरत (दुष्यन्त-शकुन्तला-पुत्र): जिसने एक हज़ार अश्वमेध और सौ राजसूय किए; कण्व को अगणित घोड़े और धन दिए।
- राम (दशरथ-पुत्र): जिनके राज्य में कोई विधवा, कोई असहाय न था; मेघ ऋतु के अनुसार बरसते, हर मनुष्य हज़ार वर्ष जीता और हज़ार पुत्र पाता; उन्होंने दस अश्वमेध किए।
- भगीरथ (इक्ष्वाकु-वंश): जिसने दस लाख स्वर्ण-अलंकृत कन्याएँ दान कीं; जिसकी गोद में बैठने से गंगा, जो पहले से भागीरथी कहलाती थीं, “उर्वशी” कहलाईं।
- दिलीप: जिसने सारी धन-सम्पन्न पृथ्वी ब्राह्मणों को दान दी; जिसके स्वर्ण-स्तम्भ पर छह हज़ार देव-गन्धर्व नाचे।
- मान्धाता (युवनाश्व-पुत्र): जिसे मरुतों ने पिता के पार्श्व से निकाला, इन्द्र ने अंगुली से दूध पिलाया; जिसने तीनों लोक जीते, और जिसके वश में एक ही दिन में सारी पृथ्वी आ गई।
- ययाति (नहुष-पुत्र): जिसने हज़ार यज्ञ और सौ वाजपेय किए; अन्त में पुरु को राज्य देकर वन गया।
- अम्बरीष (नभग-पुत्र): जिसके यज्ञ में सहस्रों यज्ञ करने वाले राजा सेवक बने।
- शशबिन्दु (चित्रसेन-पुत्र): जिसकी एक लाख पत्नियाँ और दस लाख पुत्र थे, सब स्वर्ण-कवचधारी धनुर्धर।
- गय (अमूर्तरयस-पुत्र): जिसने सौ वर्ष यज्ञ-शेष पर जीकर अग्नि से वर पाए; गंगा की रेत के कणों जितनी गायें दान कीं।
- रन्तिदेव (संकृति-पुत्र): जिसके यज्ञ-पशुओं के चर्म-स्राव से चर्मण्वती नदी बनी; जिसके भवन में सब पात्र स्वर्ण के थे।
- सगर (इक्ष्वाकु-वंश): जिसके साठ हज़ार पुत्र थे; जिसके क्रोध से खोदी गई पृथ्वी पर सागर बना, जो उसी के नाम से “सागर” कहलाया।
- पृथु (वेन-पुत्र): जो प्रजा को आगे बढ़ाने से “पृथु”, क्षत से बचाने से “क्षत्रिय” और सबका मन रँगने से “राजा” कहलाया; जिसके शासन में पृथ्वी बिना जोते अन्न देती, हर पत्ता मधु और हर गाय घड़ा-भर दूध देती।
नारद ने यह लम्बी सूची पूरी कर पूछा, “हे सृंजय! आप मौन क्यों हैं? क्या आपने मेरे वचन नहीं सुने? यदि नहीं सुने, तो मेरा यह उपदेश मरणासन्न मनुष्य को दी गई औषधि की भाँति व्यर्थ गया।” सृंजय ने कहा, “हे नारद! मैं फूलों की माला-सा सुगन्धित आपका यह उपदेश सुन रहा हूँ; आपके दर्शन-मात्र से मैं शोक-मुक्त हुआ। अमृत-पान की तरह आपके वचनों से तृप्ति नहीं होती। हे प्रभु! यदि आप कृपा करें, तो मेरा मृत पुत्र पुनर्जीवित होकर मुझसे मिले।” तब नारद ने कहा, “मैं आपके उस पुत्र सुवर्णष्ठीवी को, जिसे पर्वत ने दिया था, लौटा दूँगा; वह स्वर्ण-कान्ति वाला पुत्र हज़ार वर्ष जीएगा।”
एक उप-कथा: सृंजय-आख्यान महाभारत की प्रसिद्ध “षोडश-राजकीय” सूची है। कृष्ण इसे युधिष्ठिर को इसलिए सुनाते हैं कि जब इतने महान, धर्मात्मा और ऐश्वर्यशाली राजर्षि भी मृत्यु के ग्रास बने, तो शोक का कोई आधार नहीं रहता। यह सूची स्वयं एक राज-धर्म-शिक्षा भी है, क्योंकि हर राजा अपने यज्ञ, दान और प्रजा-पालन के लिए स्मरण किया जाता है, बल या विजय के लिए नहीं।
सुवर्णष्ठीवी का रहस्य: नारद और पर्वत की कथा
युधिष्ठिर ने पूछा, “सृंजय का पुत्र सुवर्णष्ठीवी (जिसका मल स्वर्ण था) कैसे बना? पर्वत ने सृंजय को वह पुत्र क्यों दिया? और जब उन दिनों मनुष्य हज़ार वर्ष जीते थे, तो वह शिशु-अवस्था में ही क्यों मरा?” कृष्ण ने कहा, “मैं जैसा हुआ वैसा सुनाता हूँ। नारद और पर्वत, दो श्रेष्ठ ऋषि हैं; नारद मामा हैं और पर्वत भानजे। दोनों स्वर्ग से पृथ्वी पर घूमने आए और यह प्रतिज्ञा की कि एक के मन में जो भी इच्छा, अच्छी या बुरी, उठे, वह दूसरे को बता दे; न बताए तो शापित हो।”
दोनों राजा सृंजय (सित्य-पुत्र) के यहाँ अतिथि बने। राजा ने अपनी सुन्दर कन्या सुकुमारी को उनकी सेवा में लगाया। उसकी सेवा और अनुपम सौन्दर्य से नारद के हृदय में प्रेम जाग उठा, जो शुक्ल पक्ष के चन्द्रमा-सा बढ़ने लगा। पर लज्जावश नारद ने यह बात भानजे पर्वत को न बताई। पर्वत ने अपने तप-बल और संकेतों से सब जान लिया, और प्रतिज्ञा-भंग के क्रोध में नारद को शाप दिया, “सुकुमारी निःसन्देह आपकी पत्नी बनेगी, पर विवाह के क्षण से वह और सब लोग आपको वानर-मुख देखेंगे।” क्रुद्ध नारद ने भी पलटकर शाप दिया, “आप तपस्वी, ब्रह्मचारी और धर्मनिष्ठ होकर भी स्वर्ग नहीं जा सकेंगे।”
नारद ने विधिपूर्वक सुकुमारी का पाणिग्रहण किया, पर अन्तिम विवाह-मन्त्र के साथ ही सुकुमारी ने उन्हें वानर-मुख देखा। फिर भी उस पतिव्रता ने पति का तिरस्कार न किया, अपना सम्पूर्ण प्रेम उन्हीं को समर्पित किया। बहुत समय बाद, एकान्त वन में पर्वत ने नारद से क्षमा माँगते हुए स्वर्ग जाने की अनुमति चाही। दोनों ने एक-दूसरे को शाप-मुक्त कर दिया। तब सुकुमारी ने पति को दिव्य, सौन्दर्य से दीप्त रूप में देखा, और उसे कोई दूसरा पुरुष समझकर भागने लगी। पर्वत ने उसे समझाया, “यही आपके पति हैं, वही तेजस्वी ऋषि नारद; आप सन्देह न कीजिए।” आश्वस्त होकर सुकुमारी ने धैर्य धारण किया। पर्वत स्वर्ग गए और नारद अपने घर। कृष्ण ने कहा, “वे ऋषि नारद, जो इस घटना के स्वयं भागीदार थे, यहीं उपस्थित हैं; आपके पूछने पर वे सब सुनाएँगे।” तब युधिष्ठिर ने नारद से उस स्वर्ण-मल वाले शिशु के जन्म की कथा सुनने की इच्छा प्रकट की, और नारद ने वह सम्पूर्ण वृत्तान्त सुनाना आरम्भ किया।
समझने की कुंजी: सुवर्णष्ठीवी वह जिसका मल स्वर्ण हो; सृंजय के पुत्र का यही असाधारण लक्षण था जिससे इन्द्र के मन में अपमान का भय जागा। पाणिग्रहण विवाह-संस्कार, वर का वधू का हाथ थामना।
सार: शान्ति पर्व का यह आरम्भिक भाग वस्तुतः राज-धर्म के विशाल उपदेश की भूमिका है। युधिष्ठिर का अपराध-बोध, भाइयों और द्रौपदी का दण्ड-नीति का समर्थन, व्यास का काल-दर्शन और सृंजय-आख्यान, ये सब मिलकर राजा को इस सत्य तक लाते हैं कि यहाँ वैराग्य का अर्थ अनासक्त रहकर शासन, यज्ञ और प्रजा-पालन करना है; इसी को क्षत्रिय का परम धर्म कहा गया है। यही वह नींव है जिस पर आगे शर-शय्या पर लेटे भीष्म युधिष्ठिर को विस्तृत राज-धर्म का उपदेश देंगे।
सुवर्णष्ठीवी की कथा का अन्त, और नारद का अपना वचन
नारद जी ने श्रीकृष्ण के कहे का सूत्र अपने मुँह से पूरा करते हुए कहा, “हे राजन्, जिस बालक की विष्ठा सोने की होती थी, उसे मैं आपको लौटा दूँगा। पर्वत ने जिसे सृंजय को दिया था और जिसके प्राण छूट गए थे, वह सुवर्णष्ठीवी (जिसका थूक तक सोने का हो) सहस्र वर्ष तक स्वर्ण की कान्ति धारण करेगा।”
युधिष्ठिर जी ने पूछा, “सृंजय का पुत्र सुवर्णष्ठीवी कैसे हुआ? पर्वत ने उन्हें वह बालक क्यों दिया? और वह क्यों मरा? जब उन दिनों समस्त मनुष्यों की आयु सहस्र वर्ष की होती थी, तब सृंजय का पुत्र बाल्यावस्था में ही क्यों चल बसा? वह केवल नाम से सुवर्णष्ठीवी था, या सचमुच ऐसा था? यह सब हम जानना चाहते हैं।”
श्रीकृष्ण ने उत्तर दिया, “हे राजन्, जैसा हुआ था वैसा ही कह सुनाता हूँ। संसार में दो परम ऋषि हैं, नारद और पर्वत। नारद मामा हैं और पर्वत उनकी बहन के पुत्र, अर्थात् भानजे। प्रसन्न-हृदय वे दोनों, घृत और चावल का स्वाद चखने की इच्छा से, प्राचीन काल में स्वर्ग छोड़ पृथ्वी पर विचरण करने आए। दोनों के बीच यह सन्धि (आपसी प्रतिज्ञा) हुई कि जो भी इच्छा, भली हो या बुरी, एक के मन में उठे, उसे वह दूसरे को बता दे; जो ऐसा न करे, वह दूसरे के शाप का भागी होगा। इस समझौते पर वे राजा सृंजय के पास, जो सित्य के पुत्र थे, पहुँचे और बोले, ‘आपके कल्याण के लिए हम कुछ दिन आपके साथ रहेंगे। हे पृथ्वीपति, आप हमारी सब आवश्यकताओं का विधिवत् ध्यान रखिए।’ राजा ने ‘ऐसा ही हो’ कहकर उनकी आतिथ्य-सेवा में स्वयं को लगा दिया।”
“एक दिन राजा ने अपनी अति सुन्दर कन्या को उन ऋषियों के सम्मुख लाकर कहा, ‘यह मेरी पुत्री आप दोनों की सेवा करेगी। कमल के केसर-सी आभा वाली, सुन्दर अंगों वाली, गुणवती और मधुर स्वभाव की, यह सुकुमारी नाम से पुकारी जाती है।’ ऋषियों ने ‘बहुत अच्छा’ कहा। राजा ने पुत्री से कहा, ‘हे बच्ची, इन दोनों ब्राह्मणों की सेवा वैसे ही करना जैसे देवताओं या अपने पिता की।’ सती राजकुमारी पिता की आज्ञा मानकर सेवा में लग गई। उसकी सेवा और अनुपम सौन्दर्य ने शीघ्र ही नारद के मन में उसके प्रति कोमल अनुराग जगा दिया। वह भाव शुक्ल पक्ष के चन्द्रमा-सा उनके हृदय में बढ़ता गया। पर लज्जा से भरे नारद यह जलता हुआ अनुराग अपने भानजे पर्वत को न बता सके।
“अपने तप-बल और संकेतों से पर्वत ने सब समझ लिया। क्रोध से भरकर उन्होंने प्रेम-पीड़ित नारद को शाप देने का निश्चय किया, और कहा, ‘आपने स्वयं मेरे साथ यह सन्धि की थी कि जो भी इच्छा हममें से किसी के मन में उठे वह दूसरे को बता दी जाए। आपने उसे तोड़ा है। आपने मुझसे यह नहीं कहा कि सुकुमारी के रूप ने आपका हृदय बेध दिया है। इसी कारण मैं आपको शाप दूँगा। आप ब्रह्मचारी हैं, मेरे गुरु हैं, तपस्वी और ब्राह्मण हैं, फिर भी आपने सन्धि भंग की। सुनिए, यह सुकुमारी निःसन्देह आपकी पत्नी होगी, परन्तु विवाह के समय से वह तथा समस्त लोग आपको वानर के रूप में देखेंगे; आपका असली रूप लुप्त हो जाएगा।’
“यह सुनकर नारद ने भी क्रोध में आकर भानजे को शाप दिया, ‘यद्यपि आपमें तप, ब्रह्मचर्य, सत्य और संयम है, और आप सदा धर्म में लीन हैं, तो भी आप स्वर्ग नहीं जा सकेंगे।’ दो मतवाले हाथियों की भाँति वे परस्पर शाप देकर तप गए। तब से पर्वत अपने तेज से सम्मानित होकर पृथ्वी पर विचरने लगे, और नारद ने विधिपूर्वक सुकुमारी का पाणिग्रहण किया। पर राजकुमारी ने नारद को ठीक वैसा ही देखा जैसा शाप ने कहा था; विवाह-मन्त्रों का अन्तिम पद उच्चारित होते ही उसे नारद का मुख वानर-सा दिखा। फिर भी उसने पति की अवहेलना नहीं की, अपना सारा प्रेम उन्हीं को समर्पित किया, और देवताओं, मुनियों या यक्षों में से किसी अन्य को मन से भी पति रूप में नहीं चाहा।
“एक दिन विचरते हुए पर्वत ने एकान्त वन में नारद को देखा। प्रणाम कर वे बोले, ‘हे प्रभु, मुझ पर अनुग्रह कीजिए और स्वर्ग जाने की अनुमति दीजिए।’ हाथ जोड़े उदास खड़े पर्वत को देखकर नारद, जो स्वयं भी उदास थे, बोले, ‘पहले आपने मुझे शाप दिया था कि वानर हो जाइए। तब क्रोध में मैंने आपको शाप दिया कि आज से आप स्वर्ग में न रहेंगे। यह उचित न था, क्योंकि आप तो मेरे पुत्र समान हैं।’ दोनों ने परस्पर शापों से एक-दूसरे को मुक्त कर दिया। तब अपने पति को दिव्य रूप और सौन्दर्य से दीप्त देखकर सुकुमारी, उन्हें कोई अन्य समझकर, भाग चली। पर्वत ने पुकारकर कहा, ‘यही आपके पति हैं, शंका न कीजिए। ये वही तेजस्वी ऋषि नारद हैं, आपके प्राण-समान स्वामी; सन्देह न रखिए।’ अनेक प्रकार से समझाए जाने पर और शाप का स्मरण आने पर राजकुमारी शान्त हुई। तब पर्वत स्वर्ग को गए और नारद अपने धाम को।”
श्रीकृष्ण ने आगे कहा, “जो ऋषि स्वयं इस घटना के साक्षी और अभिनेता थे, वे नारद यहीं उपस्थित हैं। हे श्रेष्ठ पुरुष, आपके पूछने पर वे सब कुछ कह देंगे।”
तब युधिष्ठिर जी ने नारद से कहा, “हे पवित्रात्मन्, जिस बालक का मल सोना था, उसके जन्म की कथा हम सुनना चाहते हैं।” नारद बोले, “जैसा केशव ने कहा, वैसा ही है। शेष भाग मैं सुनाता हूँ। मैं और मेरी बहन के पुत्र पर्वत, सृंजय के यहाँ रहने आए। वर्षा-ऋतु बीतने पर जब हमारे लौटने का समय आया, तब पर्वत ने कहा, ‘इस राजा ने हमारा बड़ा सम्मान किया है; सोचिए, हम क्या प्रत्युपकार करें।’ मैंने कहा, ‘हे भानजे, यह सब आप पर निर्भर है; अपने वरदान से राजा को सुखी कीजिए।’
“तब पर्वत ने राजा सृंजय को बुलाकर कहा, ‘हे राजन्, हम आपकी सेवा से अत्यन्त प्रसन्न हैं। ऐसा वर माँगिए जिसमें देवताओं से शत्रुता या मनुष्यों का विनाश न हो।’ सृंजय ने कहा, ‘यदि आप प्रसन्न हैं तो मेरा प्रयोजन सिद्ध हुआ; यही मेरी परम प्राप्ति और समस्त कामनाओं की पूर्ति है।’ पर्वत ने आग्रह किया, ‘जो इच्छा आप चिरकाल से हृदय में रखते हैं, उसे माँगिए।’ तब राजा बोले, ‘मुझे ऐसा पुत्र चाहिए जो वीर, महातेजस्वी, व्रत में दृढ़, दीर्घायु, और देवराज इन्द्र के समान कान्ति वाला हो।’
“पर्वत ने कहा, ‘यह कामना पूर्ण होगी, परन्तु आपका पुत्र दीर्घायु न होगा, क्योंकि आप तो देवराज से भी बढ़कर पुत्र चाहते हैं। वह सुवर्णष्ठीवी नाम से जाना जाएगा, इन्द्र-सी कान्ति वाला होगा; पर उसे सदा उस देवता से बचाए रखना।’ सृंजय ने विनती की, ‘हे मुनि, अपने तप से उसे दीर्घायु कीजिए।’ पर पर्वत इन्द्र के प्रति पक्षपात से मौन रहे। राजा को निराश देख मैंने कहा, ‘हे राजन्, संकट में मेरा स्मरण करना, मैं आ जाऊँगा। शोक न करिए; मरा हुआ भी हो तो आपका पुत्र जीवित रूप में लौटा दूँगा।’ ऐसा कहकर हम दोनों चले गए, और सृंजय अपने धाम लौट आए।
“कुछ काल बाद राजा को तेजस्वी पुत्र हुआ, जो सरोवर के विशाल कमल-सा बढ़ता गया और नाम के अनुरूप सचमुच सुवर्णष्ठीवी हुआ। यह बात संसार में फैल गई। देवराज इन्द्र ने भी जाना। अपमान के भय से उन्होंने अपने वज्र को साकार रूप में बुलाकर आदेश दिया, ‘व्याघ्र का रूप धरकर इस राजकुमार का वध कर दे, अन्यथा बड़ा होकर यह मुझे नीचा दिखाएगा।’ वज्र उस दिन से बालक के छिद्र (दोष या असावधानी का अवसर) ढूँढ़ने लगा।
“सृंजय अपने पुत्र को पाकर आनन्दित थे। एक दिन भागीरथी (गंगा) के तट पर पाँच वर्ष का वह बालक, धाय के साथ, खेलता हुआ इधर-उधर दौड़ रहा था; उसका पराक्रम महान् गज-सा था। तभी अकस्मात् एक बलवान् व्याघ्र आ पड़ा। बालक काँपता हुआ धरती पर निष्प्राण गिर पड़ा। धाय ने ऊँचा क्रन्दन किया। इन्द्र की माया से वह व्याघ्र वहीं अन्तर्धान हो गया। राजा दौड़े आए और पुत्र को रक्त-रहित, आकाश से गिरे चन्द्रमा-सा भूमि पर पड़ा देखा। रक्त-सने बालक को गोद में लेकर वे विलाप करने लगे। रानियाँ भी रोती हुई दौड़ी आईं। उस दशा में राजा ने एकाग्र मन से मेरा स्मरण किया। मैं प्रकट हो गया, और शोक-संतप्त राजा को वे ही कथाएँ सुनाईं जो यदुवंशी कृष्ण ने आपको सुनाई हैं। इन्द्र की अनुमति से मैंने बालक को जीवित किया। जो विधि में बँधा है, वह होकर ही रहता है; अन्यथा नहीं हो सकता।
“तत्पश्चात् सुवर्णष्ठीवी ने माता-पिता को आनन्दित किया, पिता के स्वर्गारोहण के बाद सिंहासन पर बैठा, और ग्यारह सौ वर्ष राज्य किया। उसने अनेक महायज्ञ किए, देवताओं और पितरों को तृप्त किया, अनेक पुत्र उत्पन्न किए, और अन्ततः प्रकृति के मार्ग को प्राप्त हुआ। अतः हे राजन्, यह शोक छोड़िए, उठिए, इस पैतृक राज्य का भार उठाइए, और महान् यज्ञ कीजिए, जिससे आप मनचाहे लोकों को पाएँ।”
समझने की कुंजी (सन्धि): “सन्धि” यहाँ राजनैतिक अर्थ में नहीं आई; यह दो ऋषियों के बीच की निजी प्रतिज्ञा है (मन की हर इच्छा एक-दूसरे को बताना)। इसी का भंग शाप का बीज बनता है। शान्ति पर्व आगे “सन्धि” को राजनीति की एक सन्धि-विग्रह नीति के रूप में भी बरतेगा, इसलिए शब्द का यह दोहरा प्रयोग ध्यान रखिए।
सार: भीष्म के मुख्य उपदेश से पहले व्यास और कृष्ण युधिष्ठिर का शोक हरने के लिए दृष्टान्त-कथाएँ कहते हैं। नारद-पर्वत और सृंजय के पुत्र की कथा का मर्म यही है, कि “जो विधि में बँधा है वह होकर रहता है”; पुत्र-वध और पुनर्जीवन दोनों नियति के अधीन। यह कथा शोक को “कर्म बनाम नियति” के बड़े प्रश्न की ओर मोड़ती है, जिसे आगे व्यास खोलेंगे।
व्यास का प्रश्न: कर्ता कौन है, ईश्वर, मनुष्य, या काल?
शोक में डूबे, मौन युधिष्ठिर से द्वीप में उत्पन्न व्यास जी ने फिर कहा, “हे कमलनयन, प्रजा की रक्षा राजा का धर्म है। जो सदा कर्तव्यपरायण हैं वे धर्म को ही सर्वोपरि मानते हैं। आप अपने पूर्वजों के मार्ग पर चलिए। ब्राह्मणों का धर्म तप है, यह वेदों का सनातन विधान है। क्षत्रिय समस्त वर्णों का उनके धर्म में रक्षक है। जो लोभवश उचित मर्यादा का उल्लंघन करता है, सामाजिक सामंजस्य का वह अपराधी, चाहे सेवक हो, पुत्र हो, या साधु हो, दण्ड के योग्य है, और वध के भी। जो राजा ऐसा नहीं करता वह पाप का भागी होता है। धर्म जब रौंदा जा रहा हो और जो उसकी रक्षा न करे, वह स्वयं धर्म का अपराधी है। कौरव धर्म के अपराधी थे; आपने उन्हें उनके अनुचरों सहित मारा। आपने अपने वर्ण-धर्म का पालन किया है। फिर हे पाण्डुनन्दन, ऐसा शोक क्यों?”
युधिष्ठिर बोले, “हे महातपस्वी, आपके वचनों में मुझे सन्देह नहीं। धर्म और कर्तव्य का सब कुछ आप जानते हैं। पर राज्य के लिए मैंने अनेक प्राणियों का वध करवाया है। वे कर्म, हे ब्राह्मण, मुझे जलाते हैं, भस्म करते हैं।”
व्यास ने तब कर्म और नियति का गहन प्रश्न खोला, “हे भारत, कर्ता परमेश्वर है या मनुष्य? संसार में सब कुछ संयोग का फल है, या जिन फलों को हम भोगते-सहते हैं वे पूर्व-कर्म के परिणाम हैं? यदि मनुष्य परमेश्वर की प्रेरणा से ही सब कर्म करता है, तो उन कर्मों का फल परमेश्वर को ही लगना चाहिए। यदि कोई कुल्हाड़ी से वन में वृक्ष काटे, तो पाप उस व्यक्ति को लगता है, कुल्हाड़ी को नहीं। और यदि कहें कि कुल्हाड़ी तो केवल साधन है, तो फिर वह दोष कुल्हाड़ी बनाने वाले को लगे, यह भी ठीक नहीं। यदि यह उचित नहीं कि एक के किए का फल दूसरे को मिले, तो इसी न्याय से समस्त उत्तरदायित्व परमेश्वर पर ही डालिए।
“फिर यदि मनुष्य ही अपने समस्त शुभ-अशुभ कर्मों का कर्ता है, तो कोई परम नियन्ता है ही नहीं, और तब आपका किया हुआ आप पर बुरा फल ला ही नहीं सकता। नियति से कोई मुड़ नहीं सकता। और यदि नियति पूर्व-जन्मों के कर्मों का फल है, तो इस जीवन में कोई पाप नहीं लगता, जैसे वृक्ष काटने का पाप कुल्हाड़ी-निर्माता को नहीं लगता। और यदि आप मानें कि केवल संयोग ही संसार में काम करता है, तो ऐसा संहार न कभी हुआ होता, न होगा।
“शुभ-अशुभ का निर्णय करना हो तो शास्त्र की ओर देखिए। शास्त्रों में कहा है कि राजाओं को दण्ड (चास्तित्व का डंडा) उठाए खड़े रहना चाहिए। मेरा मत है कि शुभ-अशुभ कर्म यहाँ चक्र-सा घूमते रहते हैं, और मनुष्य अपने किए का फल पाते हैं। एक पाप से दूसरा पाप जन्म लेता है। इसलिए, हे नृपश्रेष्ठ, समस्त बुरे कर्मों से बचिए, और शोक में हृदय मत लगाइए। अपने वर्ण-धर्म का पालन कीजिए, भले ही वह निन्दनीय जान पड़े। यह आत्म-विनाश आप पर शोभा नहीं देता। पापों के लिए प्रायश्चित्त (शुद्धि के विहित कर्म) ठहराए गए हैं; जो जीवित है वही उन्हें कर सकता है, मरने वाला नहीं। इसलिए प्राण त्यागे बिना वे प्रायश्चित्त कीजिए, अन्यथा परलोक में पछताना पड़े।”
समझने की कुंजी (दण्ड): “दण्ड” का अर्थ केवल “सज़ा” नहीं। यह राजशक्ति का वह प्रतीक-डंडा है जिससे राजा अराजकता रोकता है, और आगे की समूची दण्ड-नीति (न्याय-व्यवस्था) इसी शब्द से उपजती है। व्यास इसे यहाँ शास्त्र-सम्मत राजकर्तव्य के रूप में रखते हैं, ताकि युधिष्ठिर का “वध” व्यक्तिगत पाप न मानकर राज-धर्म दिखे।
सार: व्यास कर्तृत्व के चार पक्ष (ईश्वर-कर्ता, मनुष्य-कर्ता, पूर्व-कर्म, संयोग) रखकर दिखाते हैं कि किसी भी पक्ष में युधिष्ठिर पर सीधा पाप टिकता नहीं; फिर भी अन्त में व्यावहारिक मार्ग देते हैं, जीवित रहकर प्रायश्चित्त करो। यह तर्क महाभारत की नैतिक जटिलता का केन्द्र है, यह शोक को न झूठा ठहराता है, न पूरी तरह बरी करता है।
काल ही संहारक है, और देवासुर-संग्राम का दृष्टान्त
युधिष्ठिर ने अपना शोक और गहरा खोला, “हे पितामह, पुत्र, पौत्र, भाई, पितर, श्वसुर, गुरु, मामा, पितामह, अनेक महात्मा क्षत्रिय, सम्बन्धी, मित्र, सखा, भानजे, और भिन्न-भिन्न देशों से आए श्रेष्ठ पुरुष, सब गिर पड़े। इन सबका वध मैंने अकेले, राज्य की कामना से, करवाया है। जिन वीर राजाओं ने यज्ञों में सोम-पान किया था, उन्हें मरवाकर मुझे कौन सी गति मिलेगी? पृथ्वी अनेक सिंह-समान राजाओं से रिक्त हुई, यह सोचकर मैं जलता हूँ। और उन स्त्रियों की क्या दशा होगी जो पुत्र, पति, भाई से वंचित हुईं? पाण्डवों और वृष्णियों को निर्दय हत्यारा कहकर वे शोक में धरती पर गिरेंगी, प्राण त्यागकर यम के धाम जाएँगी। हम स्त्री-वध के पाप से लिप्त होंगे। बन्धु-मित्रों को मारकर हमने अक्षम्य पाप किया है; हमें सिर के बल नरक में गिरना पड़ेगा। इसलिए हम कठोरतम तप से अपने अंग गलाएँगे। हे पितामह, बताइए, मैं किस जीवन-मार्ग को अपनाऊँ?”
व्यास जी कुछ क्षण मनन कर बोले, “हे राजन्, क्षत्रिय-धर्म का स्मरण कर शोक मत कीजिए। वे सब क्षत्रिय अपने धर्म के पालन में गिरे हैं। महान् सम्पत्ति और यश की खोज में वे पुरुष, जो सभी मरणधर्मा थे, काल के प्रभाव से नष्ट हुए। न आप उनके हन्ता हैं, न भीम, न अर्जुन, न नकुल-सहदेव। काल ने ही महान् परिवर्तन-नियम के अनुसार उनके प्राण लिए। काल का न माता है, न पिता, न कोई जिस पर वह अनुग्रह करे। वह समस्त प्राणियों के कर्मों का साक्षी है। यह युद्ध तो काल का ठहराया हुआ अवसर मात्र था। वह प्राणियों के द्वारा ही प्राणियों का संहार करवाता है, यही उसकी अप्रतिरोध्य शक्ति का ढंग है।
“जैसे लोहार या बढ़ई का बनाया शस्त्र चलाने वाले के वश में रहता है और उसी की गति से चलता है, वैसे ही यह सम्पूर्ण विश्व काल में किए गए कर्मों के वश चलता है। प्राणियों के जन्म-मृत्यु बिना किसी प्रकट कारण के होते दिखें, तो भी शोक और हर्ष दोनों व्यर्थ हैं। यदि फिर भी आपका मन माने, तो प्रायश्चित्त कीजिए।
“सुना गया है कि देवताओं और असुरों में युद्ध हुआ। असुर बड़े भाई थे, देव छोटे। समृद्धि के लोभ में बत्तीस हज़ार वर्ष तक भयंकर युद्ध चला। पृथ्वी को रक्त का एक विस्तार बनाकर देवताओं ने दैत्यों को मारा और स्वर्ग पाया। फिर कुछ वेदज्ञ ब्राह्मण, अभिमान से मतवाले होकर, दानवों की ओर से लड़ने लगे; वे शालावृक नाम से जाने जाते थे और अट्ठासी हज़ार थे। उन सबको देवताओं ने मारा। जो दुष्ट धर्म का विनाश और पाप का प्रचार चाहते हैं, वे उन उन्मत्त दैत्यों की भाँति वध-योग्य हैं। यदि एक व्यक्ति को मारने से कुल बचे, या एक कुल को मारने से समस्त राज्य बचे, तो वह संहार अपराध नहीं। पाप कभी धर्म का रूप ले लेता है और धर्म कभी पाप का; जो विद्वान् हैं, वे जानते हैं कौन क्या है।
“आप तो वही मार्ग चले हैं जिस पर पहले स्वयं देवता चले। आप-जैसे पुरुष नरक नहीं जाते। जो जान-बूझकर पाप करता है, पाप कर भी लज्जित नहीं होता, और पहले-सा बना रहता है, वही महापापी कहलाता है; उसके पाप का प्रायश्चित्त नहीं। पर आप तो उत्तम कुल में जन्मे हैं; दूसरों के दोषों से विवश होकर, अनिच्छा से, आपने यह किया, और कर के पछता रहे हैं। आपके लिए अश्वमेध (वह महान् यज्ञ जिसमें राजा अश्व छोड़कर अपना प्रभुत्व सिद्ध करता है) ही प्रायश्चित्त बताया गया है। उसकी तैयारी कीजिए और पापमुक्त हो जाइए। इन्द्र ने भी मरुतों की सहायता से शत्रुओं को जीतकर सौ यज्ञ किए और शतक्रतु कहलाए, पापमुक्त होकर स्वर्ग और अनेक सुखद लोक पाए।
“अपने मित्रों सहित उन राजाओं के राज्यों में जाकर उनके भाइयों, पुत्रों या पौत्रों को सिंहासन पर बिठाइए। गर्भस्थ शिशुओं तक के प्रति दयालु रहकर प्रजा को प्रसन्न कीजिए। जिनके पुत्र नहीं, उनकी कन्याओं को राजगद्दी दीजिए। इस प्रकार समूचे साम्राज्य को आश्वस्त कर, इन्द्र की भाँति अश्वमेध कीजिए। उन क्षत्रियों के लिए शोक उचित नहीं जो विनाशक की शक्ति से, अपने वर्ण-धर्म के पालन में गिरे। आपने क्षत्रिय-धर्म निभाया और काँटे-रहित (निष्कण्टक) पृथ्वी पाई। अपना धर्म पालिए, तभी परलोक में सुख पाएँगे।”
एक उप-कथा: देवासुर-संग्राम में शालावृक नामक अट्ठासी हज़ार ब्राह्मण-योद्धा दानवों के पक्ष में लड़े। वेदज्ञ होकर भी, अभिमान से मतवाले होकर, धर्म के विरुद्ध खड़े हुए, इसलिए देवताओं ने उन्हें मार डाला। व्यास इसे इसलिए लाते हैं कि “ब्राह्मण-वध सदा पाप नहीं”; जब कोई वर्ण भी अधर्म के पक्ष में अस्त्र उठाए, तब उसका वध भी धर्म-संगत हो सकता है। यह महाभारत की वही असुविधाजनक नैतिकता है जिसे यह कथा सपाट नहीं करती।
सार: व्यास का दूसरा सूत्र, “काल ही कर्ता है”। योद्धा तो काल के हाथ का शस्त्र मात्र हैं। इसके साथ ही व्यास एक तीखा नीति-वाक्य देते हैं, “एक को मारकर कुल बचे, कुल को मारकर राज्य बचे, तो वह वध अपराध नहीं”, और “पाप कभी धर्म का रूप धरता है”। अश्वमेध और पराजितों के वंश को राजगद्दी देने का व्यावहारिक मार्ग भी यहीं रखा जाता है।
कौन-से कर्म प्रायश्चित्त माँगते हैं, और कब वे ही कर्म पाप नहीं रहते
युधिष्ठिर ने पूछा, “हे पितामह, कौन-से कर्म करने पर मनुष्य प्रायश्चित्त का अधिकारी होता है? और किन कर्मों से वह पाप-मुक्त होता है?” व्यास ने उत्तर दिया, “विहित कर्म छोड़कर, निषिद्ध कर्म करके, और कपट से बरतकर मनुष्य प्रायश्चित्त का भागी होता है।” फिर उन्होंने उन कर्मों की लम्बी सूची दी, ब्रह्मचर्य-व्रती जो सूर्योदय के बाद उठे या सूर्यास्त के समय सोए; जिसका छोटा भाई पहले विवाह कर ले, या जो बड़े भाई से पहले विवाह करे; ब्रह्म-हत्या करने वाला; दूसरों की निन्दा करने वाला; जो योग्य को वेद-ज्ञान न दे, अयोग्य को दे; जो अनेक प्राण हरे; मांस बेचने वाला; अग्नि-त्यागी; वेद बेचने वाला; गुरु या स्त्री का वध करने वाला; घर में आग लगाने वाला; कपट से जीने वाला; गुरु के विरुद्ध आचरण करने वाला; और सन्धि-भंग करने वाला, ये सब पाप-प्रायश्चित्त के योग्य हैं।
“फिर कुछ और निषिद्ध कर्म, अपने धर्म का त्याग और दूसरे का धर्म अपनाना; अयोग्य के यज्ञ में सहायता; निषिद्ध भोजन; शरणागत का परित्याग; आश्रित-सेवकों का पालन न करना; नमक-गुड़ बेचना; पक्षी-पशु मारना; याचना करती स्त्री से समर्थ होते हुए विमुख रहना; दैनिक दान (गौओं को मुट्ठी-भर घास आदि) का लोप; दक्षिणा न देना; ब्राह्मण का अपमान, ये सब वर्जित कहे गए हैं। जो पुत्र पिता से कलह करे, जो गुरु-शय्या का उल्लंघन करे, जो विवाहिता पत्नी में सन्तान उत्पन्न न करे, सब पापी हैं।
“अब सुनिए वे परिस्थितियाँ जिनमें ये ही कर्म करके भी मनुष्य पाप-लिप्त नहीं होता। यदि वेदज्ञ ब्राह्मण भी अस्त्र उठाकर आपको मारने युद्ध में दौड़े, तो आप उसके प्राण ले सकते हैं; ऐसा करने से ब्रह्म-हत्या का दोष नहीं लगता, क्योंकि तब हन्ता का क्रोध मारे जाने वाले के क्रोध के विरुद्ध जाता है। यह वेद-मन्त्र-सम्मत है। मद्य अनजाने में, या धर्मात्मा वैद्य की सलाह से प्राण-संकट में पीने पर, पुनः संस्कार से शुद्धि हो जाती है। गुरु की आज्ञा से गुरुपत्नी से सम्बन्ध शिष्य को कलंकित नहीं करता; ऋषि उद्दालक ने अपने पुत्र श्वेतकेतु को एक शिष्य द्वारा उत्पन्न कराया था। संकट-काल में गुरु के लिए चोरी करने वाला, यदि स्वयं उसमें से कुछ न ले, पाप-लिप्त नहीं होता। प्राण-रक्षा के लिए, किसी अन्य की रक्षा के लिए, गुरु के लिए, स्त्री को प्रसन्न करने के लिए, या विवाह कराने के लिए असत्य बोला जा सकता है।
“बड़ा भाई पतित हो या संन्यासी हो जाए, तो छोटा भाई विवाह करके पाप नहीं करता। स्त्री द्वारा याचना करने पर सम्बन्ध धर्म-विरुद्ध नहीं। यज्ञ को छोड़ किसी पशु का वध न करे, न करवाए, क्योंकि स्रष्टा ने अपने विधान में पशुओं को यज्ञ-योग्य बनाकर उन पर अनुग्रह किया है। अनजाने में अपात्र को दान देने से, या अज्ञानवश पात्र को न देने से पाप नहीं लगता। व्यभिचारिणी पत्नी को त्यागकर पुरुष पाप नहीं करता; इस आचरण से स्त्री शुद्ध हो सकती है और पति दोष से बच जाता है। जो सोम-रस का सच्चा उपयोग जानता है, उसे बेचकर पाप-लिप्त नहीं होता। अयोग्य सेवक को सेवामुक्त करने से दोष नहीं। ये वे कर्म हैं जिनसे मनुष्य पाप-लिप्त नहीं होता।”
समझने की कुंजी (प्रायश्चित्त): “प्रायश्चित्त” वे विहित शुद्धि-कर्म हैं जिनसे किया हुआ पाप धुलता है, जैसे व्रत, तप, दान, तीर्थ, यज्ञ। महाभारत इसे यान्त्रिक दण्ड-संहिता-सा नहीं रखता; यह देश-काल-पात्र पर निर्भर है, इसीलिए “एक ही कर्म” किसी स्थिति में पाप है और किसी में नहीं। यह नैतिकता की सापेक्षता न होकर सन्दर्भ-संवेदी धर्म है।
सार: व्यास पहले पाप-कर्मों की सूची देते हैं, फिर उन्हीं कर्मों के वे अपवाद गिनाते हैं जहाँ नियत (आक्रामक ब्राह्मण-वध, प्राण-रक्षा का असत्य, गुरु-आज्ञा) पाप नहीं रहती। यह उद्दालक-श्वेतकेतु जैसे असुविधाजनक प्रसंगों को भी बिना नरमी के रखता है। मर्म, धर्म का निर्णय सन्दर्भ देखकर होता है, सूची देखकर नहीं।
प्रायश्चित्तों का विस्तार, और मनु का शुद्ध-अशुद्ध अन्न का उपदेश
व्यास ने प्रायश्चित्तों को विस्तार से बताया, “तप, धार्मिक कर्म और दान से मनुष्य पाप धो सकता है, यदि वह उसे फिर न दोहराए। ब्रह्म-हत्या से शुद्ध होने के लिए, बारह वर्ष तक केवल भिक्षा से एक समय भोजन करे, अपने सब कार्य स्वयं करे, एक हाथ में नर-कपाल और दूसरे में खट्वांग लेकर भिक्षाटन करे, ब्रह्मचारी रहे, द्वेष त्यागे, भूमि पर सोए, और अपना अपराध संसार में प्रकट करे। अथवा शास्त्रज्ञों की सलाह से शस्त्रजीवी के शस्त्र पर स्वेच्छा से प्राण दे; या तीन बार सिर के बल जलती आग में कूदे; या वेद-पाठ करते हुए सौ योजन चले; या अपनी समस्त सम्पत्ति वेदज्ञ ब्राह्मण को दे; या गौ-ब्राह्मण की रक्षा करे। अश्वमेध के अन्त में अवभृथ-स्नान करने वाला ब्रह्म-हत्यारा भी शुद्ध हो जाता है, यह श्रुति का प्रबल विधान है।
“लाख गौएँ दान करने से, अथवा ब्राह्मण के लिए युद्ध में प्राण देने से, मनुष्य ब्रह्म-हत्या और समस्त पापों से मुक्त होता है। जो मद्य पी चुका हो, यदि प्रायश्चित्त-रूप तप्त मद्य पी ले, वह यहाँ-परलोक दोनों में शुद्ध होता है। पर्वत-शिखर से गिरकर, अग्नि में प्रवेश कर, या संसार त्यागकर अनन्त यात्रा पर निकलकर भी मनुष्य पाप-मुक्त होता है। जो स्त्री एक वर्ष नियमित जीवन बिताए, वह समस्त पापों से शुद्ध होती है। स्त्रियों के मानसिक पाप उनके ऋतु-धर्म से वैसे ही धुल जाते हैं जैसे राख से माँजा धातु-पात्र।
“ब्राह्मण को परम धर्म अर्जित और आचरित करना चाहिए; क्षत्रिय को उससे चौथाई कम, वैश्य को उससे चौथाई कम, और शूद्र को उससे चौथाई कम। इसी अनुपात से चारों वर्णों के पापों का भारीपन या हल्कापन आँका जाए। पाप दो प्रकार के हैं, जान-बूझकर किए (गुरु अर्थात् भारी) और अनजाने किए (हल्के); दोनों के प्रायश्चित्त हैं। पर महापातकों (अत्यन्त घोर पापों) को छोड़ हर पाप का प्रायश्चित्त है। ये विधान केवल आस्तिकों और श्रद्धावानों के लिए हैं, नास्तिकों या अभिमान-द्वेष से भरे लोगों के लिए नहीं। अतः, हे राजन्, आप पापमुक्त हैं, क्योंकि आपने राजधर्म के पालन में, अपने प्राण और उत्तराधिकार की रक्षा में शत्रुओं को मारा। फिर भी यदि स्वयं को पापी मानें तो प्रायश्चित्त कीजिए, पर शोकवश प्राण मत त्यागिए।”
युधिष्ठिर ने आगे पूछा, “हे पितामह, कौन-सा अन्न शुद्ध है और कौन अशुद्ध, कौन-सा दान प्रशंसनीय है, और दान का पात्र कौन है और अपात्र कौन?” व्यास बोले, “इस विषय में प्राचीन प्रसंग कहा जाता है, ऋषियों और प्रजापति मनु का संवाद। कृत-युग में कठोर-व्रती ऋषियों ने मनु से पूछा, ‘क्या अन्न खाया जाए, कौन दान का पात्र है, कौन-से दान करें, कैसे अध्ययन-तप करें, कौन कर्म करें और कौन न करें?’ मनु ने उत्तर दिया, ‘सुनिए। अनिषिद्ध क्षेत्रों में मौन-जप, होम, उपवास, आत्म-ज्ञान, पवित्र नदियाँ, पुण्यात्माओं से बसे प्रदेश, ये शुद्धि के कर्म हैं। कुछ पर्वत भी शुद्धिकारक हैं, स्वर्ण-सेवन, और रत्नों में डुबोए जल में स्नान भी। तीर्थ-यात्रा और सुसंस्कृत घृत का सेवन शीघ्र शुद्ध करते हैं। जो अभिमान करे वह विद्वान् नहीं कहलाता; दीर्घायु चाहे तो तीन रात तप्त जल पिए (अभिमान का प्रायश्चित्त)।
“‘न दी हुई वस्तु न लेना, दान, अध्ययन, तप, अहिंसा, सत्य, क्रोध-त्याग, और यज्ञ में देवपूजन, ये धर्म के लक्षण हैं। पर जो धर्म है, वही देश-काल के अनुसार पाप बन सकता है; और परधन-ग्रहण, असत्य, हिंसा, वध भी विशेष परिस्थिति में धर्म बन सकते हैं। वैदिक दृष्टि से धर्म-अधर्म “कर्म” और “अकर्म” में बँटते हैं, अकर्म (वैदिक कर्मों से विरति, चिन्तन-जीवन) मोक्ष की ओर ले जाता है, और कर्म (वैदिक कर्मों का अभ्यास) पुनर्जन्म-मृत्यु की ओर। लौकिक दृष्टि से बुरे कर्म बुरे फल देते हैं और भले, भले फल। जो कर्म देखने में बुरे लगें पर देवता, शास्त्र, जीवन, और जीविका के विचार से किए जाएँ, उनके फल भले होते हैं।
“‘जब कोई राजा किसी स्थिति में दण्ड का डंडा नीचे रख दे (दण्ड न दे), तो एक रात उपवास करे। जो पुरोहित राजा को दण्ड की सलाह न दे, तीन रात उपवास करे। जो शोकवश शस्त्र से आत्म-हत्या का प्रयास करे, तीन रात उपवास करे। जो अपने वर्ण, देश, कुल के धर्म त्याग दे और अपना मत ही छोड़ दे, उसका प्रायश्चित्त नहीं। जब कर्तव्य में सन्देह उठे, तो दस वेदज्ञ, या तीन नित्य-वेद-पाठी जो कहें, उसे शास्त्र का आदेश मानें।
“‘बैल, पृथ्वी, चींटियाँ, मैल के कीड़े, और विष ब्राह्मण न खाएँ। बिना शल्क की मछली, कछुए को छोड़ चौपाए जलचर (मेंढक आदि), तीखे-लम्बे दाँत वाले मांसाहारी पशु, और भास, हंसक, चक्रवाक, कौआ, गिद्ध, बाज़, उल्लू आदि पक्षी न खाएँ। भेड़, गधी, ऊँटनी, अभी-ब्याई गाय, स्त्री और हिरणी का दूध न लें। नवप्रसूता स्त्री का पकाया, अज्ञात व्यक्ति का पकाया, और देवता को अर्पित किए बिना मांस-तिल-मिश्रित अन्न न लें। क्षत्रिय का भोजन तेज घटाता है, शूद्र का ब्रह्म-कान्ति मलिन करता है, सूदखोर का अन्न मल-तुल्य है, और वेश्या का अन्न वर्जित। गृहस्थ ब्राह्मण पहले देवता, ऋषि, अतिथि, पितर और गृह-देवताओं को तृप्त कर, फिर भोजन करे; ऐसा गृहस्थ संन्यासी-तुल्य पुण्य अर्जित करता है।
“‘कोई यश के लिए, भय से, या उपकारी को दान न करे। गायक-नर्तक, विदूषक, मतवाले, उन्मत्त, चोर, निन्दक, मूर्ख, अंगहीन, बौने, दुष्ट, और नीच-कुल में जन्मे को दान न दे। वेद-अज्ञ ब्राह्मण को दान न दे; केवल श्रोत्रिय (वेदज्ञ) को दे। अनुचित दान और अनुचित ग्रहण, दोनों दाता और ग्रहीता को हानि देते हैं; जैसे पत्थर के सहारे समुद्र पार करने वाला डूबता है, वैसे ही दोनों डूबते हैं। काठ का हाथी या चमड़े का मृग जैसा निरर्थक होता है, वैसे ही वेद-हीन ब्राह्मण; तीनों केवल नाम के हैं। ऐसे अपात्र को दिया दान निष्फल होता है। पर दया से किसी निर्धन, पीड़ित या रोगी को देना उचित है, यद्यपि उससे कोई आध्यात्मिक पुण्य की आशा न रखे। यही मनु का उपदेश था, जो सबको सुनना चाहिए।’”
समझने की कुंजी (कर्म और अकर्म): मनु यहाँ “कर्म” (वैदिक यज्ञ-कर्मों का अभ्यास) और “अकर्म” (उन कर्मों से विरति, ध्यान-प्रधान जीवन) में भेद करते हैं। उनके अनुसार कर्म पुनर्जन्म के चक्र में बाँधता है, और अकर्म मोक्ष की ओर ले जाता है। यह गीता के निष्काम-कर्म से भिन्न दृष्टि है, इसे उसी से मिलाने की भूल न करें; शान्ति पर्व अनेक मतों को साथ रखता है।
सार: व्यास ब्रह्म-हत्या तक के विशद प्रायश्चित्त गिनाते हैं (बारह-वर्षीय व्रत, अश्वमेध-स्नान, गो-दान, युद्ध में आत्म-त्याग), और चारों वर्णों के लिए धर्म का चौथाई-घटता अनुपात देते हैं। फिर मनु-संवाद के द्वारा शुद्ध-अशुद्ध अन्न और सुपात्र-कुपात्र दान का विस्तृत विधान। मूल सूत्र, धर्म देश-काल-सापेक्ष है, और अपात्र को दिया दान निष्फल।
व्यास का निर्देश: भीष्म से ही राजधर्म पूछो, और हस्तिनापुर-प्रवेश
युधिष्ठिर ने कहा, “हे पवित्रात्मन्, मैं राजाओं के और चारों वर्णों के धर्म विस्तार से सुनना चाहता हूँ; आपद्-काल में कैसा आचरण हो, और धर्म के मार्ग पर चलते हुए मैं संसार को कैसे जीतूँ। धर्म का आचरण और राज-कर्तव्यों का निर्वाह सदा परस्पर विरुद्ध जान पड़ते हैं; इन दोनों में मेल बैठाने के विचार से मेरा मन मूढ़ हो जाता है।”
तब व्यास ने नारद की ओर देखकर कहा, “हे राजन्, यदि आप धर्म और नीति पूरी तरह सुनना चाहते हैं, तो कुरुओं के वृद्ध पितामह भीष्म से पूछिए। गंगा के वे पुत्र समस्त धर्मों के ज्ञाता और सर्वज्ञ हैं। उन्होंने बृहस्पति आदि से राजधर्म, उशना (शुक्र) से उसकी व्याख्या-सहित नीति-शास्त्र, वसिष्ठ और भृगुवंशी च्यवन से समस्त वेद-वेदांग, सनत्कुमार से आध्यात्म, मार्कण्डेय से यतियों का धर्म, और राम (परशुराम) तथा इन्द्र से समस्त अस्त्र सीखे। यद्यपि वे मनुष्यों में जन्मे, उनकी मृत्यु उनके अपने अधीन है। उनके पास कुछ भी जानने योग्य अज्ञात नहीं। प्राण त्यागने से पूर्व उनके पास जाइए।”
युधिष्ठिर बोले, “हे ब्राह्मण, बन्धु-संहार करवाकर मैं सबका अपराधी और पृथ्वी का विनाशक हूँ। और जिन भीष्म ने सदा न्यायपूर्वक युद्ध किया, उन्हें मैंने ही छल के सहारे मरवाया; अब किस मुख से उनके पास धर्म पूछने जाऊँ?”
तब श्रीकृष्ण ने फिर समझाया, “ऐसा शोक का हठ आपको शोभा नहीं देता। व्यास जी ने जो कहा वही कीजिए। ये ब्राह्मण और आपके भाई आपके सम्मुख ग्रीष्म के अन्त में मेघ की प्रतीक्षा करते लोगों-सी याचना-दृष्टि से खड़े हैं। बचे हुए राजा और चारों वर्णों की प्रजा यहाँ है। इन ब्राह्मणों के, व्यास के आदेश के, हम-जैसे शुभचिन्तकों के, और द्रौपदी के अनुरोध पर, वही कीजिए जो हमें प्रिय और संसार के हितकर हो।”

इन वचनों से कमलनयन राजा संसार के कल्याण के लिए आसन से उठे। उन्होंने शोक-चिन्ता त्याग दी, मन को शान्त किया, और आगे क्या करना है यह निश्चय किया। धृतराष्ट्र को आगे रखकर वे नगर-प्रवेश को चले। देवताओं और सहस्रों ब्राह्मणों की पूजा कर, सोलह श्वेत, शुभ-लक्षण बैलों से जुते, वेद-मन्त्रों से अभिमन्त्रित नवीन श्वेत रथ पर वे सोम-से सवार हुए। भीम ने बागडोर सँभाली; अर्जुन ने ऊपर श्वेत छत्र धारण किया, जो तारों-जड़े श्वेत मेघ-सा शोभित था; नकुल-सहदेव ने चँवर डुलाए। आभूषणों से सजे पाँचों भाई पंचमहाभूतों-से दिखे। पीछे एक श्वेत रथ पर युयुत्सु आए; कृष्ण सात्यकि-सहित अपने स्वर्ण-रथ पर, धृतराष्ट्र गान्धारी-सहित नर-वाहित यान पर सबके आगे, और कुरु-कुल की स्त्रियाँ, कुन्ती और द्रौपदी, विदुर के नेतृत्व में उत्तम वाहनों पर।
नगर सजाया गया था, फूलों के तोरण, असंख्य ध्वज, धूप की सुगन्ध, सुगन्धित चूर्ण और पुष्प, हर द्वार पर जल-भरे कलश, और श्रेष्ठ स्थानों पर खड़ी सुन्दरियाँ। नागरिक स्वागत को उमड़ पड़े। मण्डपों से स्त्रियों ने मृदु स्वर में राजा-भाइयों का यश गाया, और द्रौपदी की भी प्रशंसा की, “हे पांचाल-राजकुमारी, आप धन्य हैं, आपके आचरण और व्रत सफल हुए।” इस प्रकार सत्कारित होकर युधिष्ठिर हस्तिनापुर के राजभवन में प्रविष्ट हुए, गृह-देवताओं को पूजा, और ब्राह्मणों को रत्न, स्वर्ण, गौ, वस्त्र आदि दान दिए।
समझने की कुंजी (राजधर्म बनाम धर्म): युधिष्ठिर का असली संकट यही है, कि “धर्म” (नैतिकता) और “राजधर्म” (शासन-कर्तव्य) प्रायः टकराते हैं, राजा को दण्ड देना, युद्ध करना, छल भी सहना पड़ता है। शान्ति पर्व का सारा उपदेश इसी तनाव को सुलझाने का प्रयत्न है, और इसीलिए व्यास इसे भीष्म के सुपुर्द करते हैं, जो दोनों के संगम के ज्ञाता हैं।
सार: व्यास उपदेश का भार स्वयं न लेकर भीष्म की ओर मोड़ देते हैं, क्योंकि भीष्म ही धर्म और राजधर्म दोनों के परम ज्ञाता हैं और उनके पास सीमित समय है। युधिष्ठिर पहले भीष्म-वध की ग्लानि से हिचकते हैं, पर कृष्ण के समझाने पर सिंहासन की ओर बढ़ते हैं और हस्तिनापुर में प्रवेश करते हैं।
चार्वाक राक्षस का छल, और राज्याभिषेक
जब ब्राह्मण मौन हुए, तब चार्वाक नामक एक राक्षस, जो ब्राह्मण-वेश धरे, दुर्योधन का मित्र था, जप-माला, शिखा और त्रिदण्ड लिए संन्यासी के रूप में सहस्रों ब्राह्मणों के बीच निर्भय खड़ा हो गया। पाण्डवों का अनिष्ट चाहता वह, बिना किसी ब्राह्मण से पूछे, राजा से बोला, “ये सब ब्राह्मण मुझे अपना प्रवक्ता बनाकर कहते हैं, ‘धिक्कार है आपको! आप कुल-घातक दुष्ट राजा हैं। बन्धुओं और गुरुजनों का नाश कर अब आपको प्राण त्याग देना चाहिए।’”
यह सुनकर ब्राह्मण क्षुब्ध हो उठे और कोलाहल करने लगे। राजा युधिष्ठिर लज्जा और चिन्ता से मूक रह गए, और बोले, “मैं आप सबको प्रणाम कर विनती करता हूँ, मुझ पर प्रसन्न होइए। मुझे धिक्कारना उचित नहीं; मैं शीघ्र ही प्राण त्याग दूँगा।” तब ब्राह्मणों ने ऊँचे स्वर में कहा, “ये हमारे वचन नहीं! आपका कल्याण हो!” अपनी आध्यात्मिक दृष्टि से उन्होंने वक्ता का छद्म पहचाना और बोले, “यह दुर्योधन का मित्र राक्षस चार्वाक है, जिसने संन्यासी-वेश धरा है। हमने ऐसा कुछ नहीं कहा; आपकी यह चिन्ता दूर हो।” फिर रोष से भरकर ब्राह्मणों ने “हुँ” का उच्चार किया, और उस पाप-कर्मा राक्षस को उसी ध्वनि से वहीं भस्म कर दिया; इन्द्र के वज्र से झुलसे, अंकुर-सहित वृक्ष-सा वह गिर पड़ा।
तब श्रीकृष्ण ने इसका रहस्य खोला, “हे राजन्, ब्राह्मण सदा मेरे पूज्य हैं; वे पृथ्वी के देवता हैं, जिनकी वाणी में विष है पर जो शीघ्र प्रसन्न होते हैं। कृत-युग में इस चार्वाक ने बदरी में कठोर तप किया था। ब्रह्मा ने वर माँगने को कहा, तो उसने समस्त प्राणियों से अभय का वर माँगा। ब्रह्मा ने यह वर इस शर्त पर दिया कि वह ब्राह्मणों का अपराध करने से बचे। वर पाकर वह देवताओं को सताने लगा। पीड़ित देवता ब्रह्मा के पास गए। ब्रह्मा ने कहा, ‘मैंने इसके वध का उपाय रच रखा है। दुर्योधन नामक राजा होगा, जिसका यह मित्र बनेगा। उसके स्नेह में आकर यह ब्राह्मणों का अपमान करेगा, और वाणी-बल वाले ब्राह्मण क्रोध में इसे शाप देकर मार डालेंगे।’ वही चार्वाक आज ब्राह्मणों के शाप से निष्प्राण पड़ा है। अतः शोक न कीजिए; बन्धु क्षत्रिय-धर्म के पालन में गिरकर स्वर्ग गए। अब अपने कर्तव्य पर ध्यान दीजिए, प्रजा की रक्षा कीजिए, और ब्राह्मणों की पूजा कीजिए।”
शोक-मुक्त युधिष्ठिर पूर्वाभिमुख स्वर्ण-आसन पर बैठे; सात्यकि और वासुदेव सम्मुख, भीम और अर्जुन दोनों ओर, कुन्ती नकुल-सहदेव-सहित हाथीदाँत के श्वेत सिंहासन पर। विदुर, धौम्य, धृतराष्ट्र, युयुत्सु, सञ्जय और गान्धारी यथास्थान बैठे। पुरोहित धौम्य ने कृष्ण के अनुरोध पर पूर्व-उत्तर की ओर ढलती वेदी रची। सर्वतोभद्र नामक व्याघ्र-चर्म से ढके आसन पर द्रुपद-कन्या द्रौपदी-सहित युधिष्ठिर को बिठाकर, मन्त्रों से घृताहुति दी। फिर दाशार्ह-वंशी कृष्ण ने पवित्र शंख उठाकर राजा के सिर पर अभिषेक-जल डाला; धृतराष्ट्र और प्रजा ने भी वैसा किया। पणव, आनक और दुन्दुभि बजे। राजा ने स्तुति करने वाले सहस्र वेदज्ञ ब्राह्मणों को सहस्र निष्क (स्वर्ण-मुद्राएँ) दिए, और बड़े राज्य के सिंहासन पर प्रतिष्ठित हुए।
एक उप-कथा: चार्वाक का वध संयोग नहीं था। कृत-युग में उसने ब्रह्मा से सर्व-प्राणियों से अभय का वर पाया था, पर एक शर्त छिपी थी, कि ब्राह्मणों को न छेड़े। ब्रह्मा ने पहले से ही उसकी मृत्यु का यन्त्र रच रखा था, दुर्योधन की मित्रता, ब्राह्मण-अपमान, और फिर ब्राह्मणों का शाप। यह दिखाता है कि महाभारत में वर भी जाल बन जाते हैं; अभय का वर भी अपने भीतर अपना अन्त लिए चलता है।
सार: चार्वाक-प्रसंग युधिष्ठिर की ग्लानि पर अन्तिम आघात था, जिसे ब्राह्मणों ने अपने “हुँ”-कार से तत्काल समाप्त कर दिया। कृष्ण इसके पीछे का पुराना ब्रह्मा-विधान खोलते हैं। तत्पश्चात् विधिवत् राज्याभिषेक होता है, और युधिष्ठिर औपचारिक रूप से सम्राट् बनते हैं।
युधिष्ठिर का प्रथम राज-प्रबन्ध, श्राद्ध, और कृष्ण की स्तुति
अभिषेक के बाद युधिष्ठिर ने हाथ जोड़कर कृष्ण की स्तुति की, “हे कृष्ण, आपकी कृपा, नीति, बल और बुद्धि से मुझे यह पैतृक राज्य मिला। आप एकमात्र परम तत्त्व कहे जाते हैं, समस्त उपासकों के आश्रय। आप विश्व के स्रष्टा, विश्व की आत्मा, और जिनसे यह विश्व उपजा। आप विष्णु, जिष्णु, हरि, कृष्ण और वैकुण्ठ हैं।” अनेक नामों और रूपों से कृष्ण की स्तुति कर युधिष्ठिर ने उन्हें प्रसन्न किया, और कृष्ण ने मधुर वचनों से उन्हें हर्षित किया।
राजा ने प्रजा को विदा किया। भीम को युवराज नियुक्त किया; विदुर को मन्त्रणा और राज्य की षड्विध आवश्यकताओं (सन्धि, विग्रह, यान, आसन, द्वैधीभाव, समाश्रय) की देखरेख सौंपी; सञ्जय को कोष का प्रधान अधीक्षक बनाया; नकुल को सेना का लेखा, भोजन-वेतन और प्रबन्ध; अर्जुन को शत्रु-सेनाओं के प्रतिरोध और दुष्ट-दमन का भार; धौम्य को नित्य देव-कार्य और ब्राह्मण-सेवा; और सहदेव को सदा अपने पास रखा, यह सोचकर कि वे ही उनकी रक्षा करें। विदुर और युयुत्सु को आदेश दिया कि वे धृतराष्ट्र की हर इच्छा का यत्न से पालन करें।
फिर युधिष्ठिर ने युद्ध में मारे गए हर बन्धु का श्राद्ध कराया। धृतराष्ट्र ने अपने पुत्रों के परलोक-हित के लिए दान दिए। युधिष्ठिर ने द्रौपदी-सहित द्रोण, कर्ण, धृष्टद्युम्न, अभिमन्यु, घटोत्कच, विराट, द्रुपद, और द्रौपदी के पाँच पुत्रों के निमित्त सहस्रों ब्राह्मणों को धन-रत्न-गौ-वस्त्र दिए। जिन राजाओं के कोई बन्धु-मित्र न बचे थे, उनका भी श्राद्ध कराया। अन्न-वितरण के गृह, जल-स्थान और तालाब उनके नाम पर बनवाए। इस प्रकार ऋण चुकाकर, निन्दा से बचकर, राजा सुखपूर्वक धर्म से प्रजा-पालन करने लगा। धृतराष्ट्र, गान्धारी, विदुर और सब कौरव-वृद्धों का यथापूर्व सम्मान किया, और युद्ध में पति-पुत्र खोई स्त्रियों, अनाथों, अन्धों और असहायों को अन्न-वस्त्र-आश्रय देकर सबकी रक्षा की।
उसने भाइयों को दुर्योधन, दुःशासन, दुर्मर्षण और दुर्मुख के भव्य प्रासाद धृतराष्ट्र की स्वीकृति से सौंपे, भीम को दुर्योधन का, अर्जुन को दुःशासन का, नकुल को दुर्मर्षण का, और सहदेव को दुर्मुख का। सात्यकि-सहित कृष्ण अर्जुन के भवन में ठहरे। प्रातः सब प्रसन्न-हृदय युधिष्ठिर के पास आए।
समझने की कुंजी (षड्विध राज्य-आवश्यकताएँ): “षाड्गुण्य” राजनीति के छह उपाय हैं, सन्धि (मेल), विग्रह (युद्ध), यान (चढ़ाई), आसन (तटस्थ रहना), द्वैधीभाव (दोहरी नीति), और समाश्रय (बलवान् की शरण)। यही आगे भीष्म के राजधर्म-उपदेश का व्यावहारिक ढाँचा है। आधुनिक समतुल्य, राज्य के परराष्ट्र, रक्षा, कोष, गुप्तचर और प्रशासन विभाग।
सार: सिंहासन पर बैठते ही युधिष्ठिर राजधर्म को क्रिया में उतारते हैं, भाइयों को विभाग सौंपना, श्राद्ध और दान से ऋण चुकाना, शत्रु-पक्ष के मृतकों तक का श्राद्ध, और विधवाओं-अनाथों का पालन। धृतराष्ट्र को पिता-तुल्य सम्मान, यह उपदेश से पहले का “जीवित राजधर्म” है।
कृष्ण की समाधि का रहस्य: भीष्म का स्मरण
दूसरे दिन युधिष्ठिर ने हाथ जोड़कर कृष्ण से पूछा, “हे अमित-पराक्रमी, यह आश्चर्य है कि आप समाधि में लीन हैं! क्या तीनों लोकों में सब कुशल है? आपने पाँचों प्राण स्थिर कर लिए, इन्द्रियों को मन में, वाणी-मन को बुद्धि में, और समस्त इन्द्रियों को आत्मा में समेट लिया है। आप वायुहीन स्थान के दीपक-से, शिला-से अचल हैं। यदि यह कोई रहस्य न हो तो कृपया मेरा सन्देह दूर कीजिए।”
तब कृष्ण ने मन्द मुस्कान से मन, बुद्धि और इन्द्रियों को सामान्य स्थिति में लौटाकर कहा, “वह नर-श्रेष्ठ भीष्म, जो शर-शय्या पर लेटे हैं और बुझते दीपक-से हैं, मेरा स्मरण कर रहे हैं; इसीलिए मेरा मन उन पर केन्द्रित था। जिनके धनुष की टंकार और करतल-ध्वनि इन्द्र भी न सह सका, जिन्होंने काशिराज की कन्याओं के स्वयंवर में समस्त राजाओं को क्षण-भर में जीतकर अपने भाई विचित्रवीर्य के लिए तीन राजकुमारियों का हरण किया, जो भृगुवंशी राम (परशुराम) से तेईस दिन निरन्तर लड़े और अजेय रहे, जिन्हें गंगा ने जना और वसिष्ठ ने शिष्य बनाया, जो चारों वेद-वेदांग और समस्त दिव्यास्त्रों के ज्ञाता हैं, जो भूत-भविष्य-वर्तमान जानते हैं, ऐसे भीष्म ने अपनी समस्त इन्द्रियाँ समेटकर मेरी शरण ली, इसीलिए मेरा चित्त उन पर लगा।
“वह नर-व्याघ्र जब अपने कर्मों के बल स्वर्ग जाएँगे, तब पृथ्वी अमावस की रात्रि-सी हो जाएगी। अतः, हे युधिष्ठिर, विनम्रता से गंगा-पुत्र के पास जाइए और जो जानना हो पूछिए, चार पुरुषार्थों (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) के विषय में, चारों वर्णों के यज्ञ और संस्कारों के, चारों आश्रमों के, और सम्पूर्ण राजधर्म के। भीष्म के जाते ही समस्त ज्ञान भी उनके साथ चला जाएगा; इसीलिए मैं आपको प्रेरित करता हूँ।”
युधिष्ठिर ने अश्रु-भरे कण्ठ से कहा, “हे माधव, भीष्म की महिमा सत्य है, इसमें सन्देह नहीं। यदि आपका हृदय कृपालु हो, तो हम आपको आगे रखकर भीष्म के पास चलें। जब सूर्य उत्तरायण होगा, तब भीष्म इस लोक को त्यागेंगे। वे आपके, जो प्रथम देव और ब्रह्म के महान् आश्रय हैं, दर्शन के अधिकारी हैं।” तब कृष्ण ने सात्यकि से रथ जोतने को कहा, और दारुक ने स्वर्ण-जटित, मरकत और चन्द्रकान्त-सूर्यकान्त मणियों से सजे, गरुड-ध्वज वाले रथ में सुग्रीव-शैव्य आदि वायु-वेगी अश्व जोते।
समझने की कुंजी (उत्तरायण): सूर्य के उत्तर की ओर मुड़ने का काल “उत्तरायण” है, जिसे शास्त्रों में देहत्याग का शुभ समय माना गया। भीष्म को इच्छा-मृत्यु का वर है, इसलिए वे दक्षिणायन में नहीं मरते, उत्तरायण की प्रतीक्षा करते हैं। यह उनके सम्पूर्ण उपदेश को एक “समय-सीमा” देता है, ज्ञान तब तक ही, जब तक वे जीवित हैं।
सार: कृष्ण की समाधि का कारण भीष्म का स्मरण था। कृष्ण भीष्म की महिमा (स्वयंवर-विजय, परशुराम से युद्ध, सर्व-शास्त्र-ज्ञान) गिनाकर युधिष्ठिर को उनके पास भेजते हैं, इस चेतावनी के साथ कि भीष्म के साथ ज्ञान भी विदा हो जाएगा। यहीं से उपदेश-पर्व की भूमिका बँधती है।
कुरुक्षेत्र की यात्रा, और परशुराम का इक्कीस बार का क्षत्रिय-संहार

कृष्ण, युधिष्ठिर और पाण्डव कुरुक्षेत्र की ओर चले, जो बाल, मज्जा, अस्थि से ढका था, जहाँ लाखों क्षत्रियों ने देह त्यागी थी। हाथी-घोड़ों की अस्थियों के पर्वत, शंख-से बिखरे नर-कपाल, सहस्रों चिताएँ, यह विस्तार मानो विनाशक की भोग-वाटिका था। मार्ग में कृष्ण ने जमदग्नि-पुत्र (परशुराम) के पराक्रम की बात कही, “वहाँ दूर राम के पाँच सरोवर हैं, जहाँ राम ने पितरों को क्षत्रिय-रक्त की अंजलि दी; यहीं उन्होंने इक्कीस बार पृथ्वी को क्षत्रिय-रहित कर अपना कार्य पूर्ण किया।”
युधिष्ठिर ने सन्देह उठाया, “जब क्षत्रिय-बीज ही जल गया, तो क्षत्रिय-कुल फिर कैसे जीवित हुआ? यह संहार क्यों हुआ, और कुल फिर कैसे बढ़ा?” तब कृष्ण ने पूरी कथा कही, “जदु से रजस्, रजस् से बालकाश्व, उससे धर्मात्मा कुशिक हुए। पुत्र-कामना से कुशिक ने कठोर तप किया, और स्वयं इन्द्र उनके पुत्र गाधि रूप में जन्मे। गाधि की कन्या सत्यवती का विवाह भृगुवंशी ऋषिक से हुआ। ऋषिक ने ससुर गाधि के लिए और पत्नी के लिए दो भाग का अभिमन्त्रित चरु (दूध-चावल का यज्ञ-अन्न) पकाया, और कहा, ‘यह भाग आप लें, वह आपकी माता लें। आपकी माता का पुत्र क्षत्रियों में श्रेष्ठ, क्षत्रिय-संहारक वीर होगा; आपका पुत्र शान्त, तपस्वी, श्रेष्ठ ब्राह्मण होगा।’
“पर माता ने अनजाने में दोनों भाग बदल लिए, अपना भाग पुत्री को देकर पुत्री का भाग स्वयं ले लिया। फलतः सत्यवती के गर्भ में क्षत्रिय-संहारक तेज वाला बालक आ गया। ऋषिक ने यह जानकर कहा, ‘भाग बदलने से आपका पुत्र क्रूर-कर्मा होगा, और आपका भाई शान्त ब्राह्मण।’ सत्यवती ने विनती की, ‘मुझे क्रूर ब्राह्मण-पुत्र न दीजिए।’ ऋषिक ने कहा, ‘मैंने ऐसा नहीं चाहा था, भाग-परिवर्तन से ऐसा हुआ। यह विधि का विधान है।’ सत्यवती ने तब प्रार्थना की, ‘पुत्र भले शान्त हो, पौत्र चाहे ऐसा हो।’ ऋषिक ने वर दिया, और सत्यवती ने शान्त-स्वभाव जमदग्नि को जन्म दिया, जबकि उनकी माता का पुत्र विश्वामित्र, क्षत्रिय-कुल में जन्मकर भी ब्राह्मण-तुल्य हुआ।
“जमदग्नि से उग्र-कर्मा राम (परशुराम) हुए, जिन्होंने गन्धमादन पर महादेव को प्रसन्न कर तीव्र-तेज परशु पाया। उधर कृतवीर्य-पुत्र अर्जुन (कार्तवीर्य), हैहयों का राजा, दत्तात्रेय के अनुग्रह से सहस्रबाहु हुआ, और सात द्वीपों-सहित पृथ्वी जीतकर अश्वमेध में दान कर दी। एक बार अग्नि की याचना पर उसने जो दान दिया, उससे अग्नि ने अपव (वसिष्ठ) का निर्जन आश्रम जला दिया। अपव ने शाप दिया, ‘आपने मेरे वन भी जला डाले, अतः राम आपकी हज़ार भुजाएँ काटेंगे।’
“पर कार्तवीर्य के अहंकारी पुत्रों ने, उसके अनजाने में, जमदग्नि की होम-धेनु का बछड़ा छीन लिया। राम ने क्रोध में अर्जुन की भुजाएँ काट दीं और बछड़ा लौटाया। तब अर्जुन के मूर्ख पुत्रों ने, राम के समिधा-कुश लाने गए होने पर, जमदग्नि का सिर धड़ से अलग कर दिया। पिता की मृत्यु से प्रतिशोध की ज्वाला में राम ने पृथ्वी को क्षत्रिय-रहित करने का व्रत लिया और कृतवीर्य के समस्त पुत्र-पौत्रों को मार डाला; सहस्रों हैहयों को मारकर पृथ्वी रक्त से कीचड़-सी कर दी, फिर करुणा से वन में चले गए।

“कुछ सहस्र वर्ष बाद विश्वामित्र-पौत्र, रैभ्य-पुत्र पारावसु ने राम पर कायरता का आक्षेप किया, ‘क्षत्रिय-वीरों के भय से आप पर्वत भाग गए।’ तब राम ने फिर अस्त्र उठाया और सैकड़ों क्षत्रिय-शव बिछा दिए। जो बच गए, वे फिर बढ़े और राजा बने; राम ने उन्हें भी मारा, बालकों तक को न छोड़ा। कुछ क्षत्रिय-स्त्रियाँ अपने बच्चे बचा सकीं। इस प्रकार इक्कीस बार पृथ्वी को क्षत्रिय-रहित कर, अश्वमेध के अन्त में राम ने पृथ्वी कश्यप को दान कर दी।
“कश्यप ने यज्ञ-स्रुवा (आहुति की कलछी) से इंगित कर कहा, ‘हे राम, अब आप दक्षिण समुद्र-तट को जाइए, मेरे राज्य में न रहिए।’ तब समुद्र ने राम के लिए दूसरे तट पर शूर्पारक नामक प्रदेश रचा। कश्यप ने पृथ्वी ब्राह्मणों को देकर वन में प्रवेश किया। तब शूद्र-वैश्य मनमाने आचरण करने लगे; अराजकता में दुर्बल को बलवान् सताने लगा, कोई अपनी सम्पत्ति का स्वामी न रहा, और भयभीत पृथ्वी रसातल को धँसने लगी। कश्यप ने उसे अपनी जाँघ (ऊरु) पर धारण किया, इसीलिए पृथ्वी “उर्वी” कहलाई।
“पृथ्वी ने रक्षा के लिए राजा माँगा, और बताया कि उसने अनेक क्षत्रिय-शिशु छिपा रखे हैं, हैहय-वंश में जन्मे कुछ क्षत्रिय जिन्हें उसने स्त्रियों के बीच छिपाया, पुरु-वंशी विदूरथ-पुत्र जो ऋक्षवान् पर्वत पर भालुओं में पला, सौदास-पुत्र जिसे पराशर ने बचाया और जो शूद्र-सा सेवा करने से “सर्वकर्मा” कहलाया, शिवि-पुत्र गोपति जो गौओं में पला, प्रतर्दन-पुत्र वत्स जो बछड़ों में पला, और दधिवाहन-पौत्र बृहद्रथ जिसे गौतम ने गंगा-तट पर बचाया। कश्यप ने इन सबको ढूँढ़कर विधिवत् राजा बनाया, और आज के क्षत्रिय-कुल इन्हीं की सन्तान हैं।”
एक उप-कथा: सत्यवती के चरु-भाग बदलने की कथा महाभारत की वंश-नियति का अनूठा उदाहरण है। ब्राह्मण-तेज और क्षत्रिय-तेज वाले दो अभिमन्त्रित अन्न-भागों के माता-पुत्री के बीच बदल जाने से वंश-स्वभाव ही पलट गया, क्षत्रिय-कुल में जन्मा विश्वामित्र ब्राह्मण-तुल्य ऋषि बना, और ब्राह्मण-कुल में जन्मा परशुराम उग्र क्षत्रिय-संहारक। एक अनजानी चूक पीढ़ियों का चरित्र मोड़ देती है।
समझने की कुंजी (इक्कीस बार): “इक्कीस बार पृथ्वी को क्षत्रिय-रहित करना” का अर्थ यह नहीं कि क्षत्रिय एकदम लुप्त हुए; जो बचते थे वे फिर बढ़ते थे और परशुराम फिर संहार करते थे, ऐसा इक्कीस आवर्तन। यह संख्या परशुराम के अनवरत प्रतिशोध-चक्र की प्रतीक है, और यही दिखाता है कि “वर्ण-नाश” भी पूर्ण नहीं होता, स्त्रियों और ऋषियों के बचाए बीज से कुल पुनर्जीवित होता है।
सार: कुरुक्षेत्र के संहार-स्थल से गुज़रते हुए कृष्ण परशुराम-कथा कहते हैं, चरु-भाग बदलने से उपजे विश्वामित्र और परशुराम, कार्तवीर्य की भुजाओं का छेदन, जमदग्नि-वध, और इक्कीस बार का क्षत्रिय-संहार। अन्त में कश्यप द्वारा छिपे क्षत्रिय-शिशुओं का पुनः राजा बनना, जिससे वर्तमान क्षत्रिय-वंश चले। यह संहार और पुनर्जन्म का चक्र युद्ध-शोक को बड़े परिप्रेक्ष्य में रखता है।
शर-शय्या के पास: कृष्ण और भीष्म का संवाद, और दिव्य-दृष्टि का वर

युधिष्ठिर परशुराम के पराक्रम सुनकर विस्मित हुए। तत्पश्चात् कृष्ण और युधिष्ठिर वहाँ पहुँचे जहाँ गंगा-पुत्र शर-शय्या पर, ओघवती नदी के तट के पवित्र स्थल पर लेटे थे, अनेक ऋषियों से घिरे, सन्ध्या के सूर्य-से दीप्त। दूर से देखकर सब रथ से उतरे, इन्द्रियाँ संयत कर पास आए, और व्यास आदि ऋषियों को प्रणाम कर भीष्म के निकट बैठे।
बुझती अग्नि-से भीष्म को देख कृष्ण ने कुछ खिन्न-हृदय कहा, “क्या आपकी चेतना पहले-सी स्वच्छ है? बुद्धि मलिन तो नहीं? बाणों की पीड़ा अंगों को सता तो नहीं रही? आप तो देवताओं को भी प्राणियों के जन्म-प्रलय का उपदेश देने में समर्थ हैं। भूत-भविष्य-वर्तमान सब आपको ज्ञात है। आपकी पिता शान्तनु के वर से आपकी मृत्यु आपके अधीन है। शरीर में छोटी-सी सुई भी पीड़ा देती है, फिर सैकड़ों बाणों की क्या कहें! पर निश्चय ही पीड़ा आपको छू नहीं सकती। आपने पूर्ण समर्थ रहते हुए भी स्त्री-संग का त्याग किया; आप-जैसा सत्य, तप, दान, यज्ञ, अस्त्र-विद्या और शरणागत-रक्षा में निष्ठ, समस्त प्राणियों का हितैषी, न कभी सुना न देखा। ब्राह्मण आपको वसुओं में नवाँ कहते हैं, पर आपने अपने गुणों से उन सबको लाँघ लिया। पाण्डु-पुत्र का शोक हरने में आप समर्थ हैं, क्योंकि चारों वर्ण, चारों आश्रम, और समस्त धर्म-शास्त्र आपके मन में बसते हैं।”

भीष्म ने सिर थोड़ा उठाकर हाथ जोड़कर कृष्ण की स्तुति की, “हे दिव्य कृष्ण, आपको प्रणाम! आप समस्त लोकों के आदि और अन्त, स्रष्टा और संहारक हैं। आप अजेय हैं, आप विश्व की आत्मा हैं, विश्व आपसे उपजा। आप पाँच भूतों से परे, तीनों लोकों से परे हैं। आपके वचनों ने मुझे आपके दिव्य रूप के दर्शन कराए, मैं आपका शाश्वत रूप देखता हूँ, आपका सिर आकाश को, चरण पृथ्वी को भरते हैं, दिशाएँ आपकी भुजाएँ, सूर्य आपका नेत्र। पीताम्बर-धारी आपका रूप विद्युत्-युक्त मेघ-सा है। हे कमलनयन, मुझ शरणागत भक्त के लिए जो श्रेयस्कर हो, वही सोचिए।”
कृष्ण ने कहा, “हे भीष्म, आपकी भक्ति महान् है, इसीलिए मैंने आपको अपना दिव्य रूप दिखाया। जो भक्त नहीं, या अनिष्ठ है, या असंयत है, उसे मैं नहीं दिखाता। आपकी अपनी तपस्या से आप मुझे देख सके। वे लोक आपके लिए तैयार हैं जहाँ से लौटना नहीं। आपके जीने में अभी छप्पन दिन शेष हैं। देह त्यागकर आप अपने कर्मों का शुभ फल पाएँगे। अग्नि-तेज वाले वसु-देवता रथों पर अदृश्य आपकी प्रतीक्षा कर रहे हैं, उस क्षण तक जब सूर्य उत्तरायण में प्रवेश करेगा। आपके जाने पर समस्त ज्ञान आपके साथ चला जाएगा; इसीलिए ये सब आपके पास धर्म-उपदेश सुनने आए हैं। शोक से जिसकी विद्या ढक गई है, उस सत्यनिष्ठ युधिष्ठिर से धर्म और योग के सत्य-वचन कहकर उसका शोक शीघ्र दूर कीजिए।”
भीष्म बोले, “हे शिव, हे नारायण, आपके वचन सुनकर मैं हर्षित हूँ। पर आपके सम्मुख मैं क्या उपदेश दूँ, जब वाणी के समस्त विषय आपकी वाणी में पहले से समाहित हैं? जो कुछ किया जाता है, आपकी ही बुद्धि से होता है। मेरा मन बाण-पीड़ा से अत्यन्त व्याकुल है, अंग दुर्बल, बुद्धि अस्पष्ट, बल छूट रहा है, प्राण जाने को हैं; मैं कैसे बोलूँ? बृहस्पति भी आपके सामने बोलने में हिचकेंगे। आप ही समस्त विधानों के ओदाता हैं, अतः युधिष्ठिर के हित के लिए आप ही बोलिए।”

कृष्ण ने कहा, “हे गंगा-पुत्र, आपके बाण-घावों की पीड़ा के विषय में आपने जो कहा, उसके लिए मैं आपको यह वर देता हूँ, असुविधा, मूर्च्छा, ताप, पीड़ा, भूख और प्यास आपको नहीं सताएँगी। आपकी चेतना और स्मृति निर्मल रहेगी, बुद्धि कभी न चूकेगी। रज और तम से मुक्त आपका मन सदा सत्त्व-गुण में, मेघ से निकले चन्द्रमा-सा, रहेगा। धर्म, अर्थ या नीति का जो भी विषय आप सोचेंगे, उसमें आपकी बुद्धि प्रवेश कर जाएगी। दिव्य-दृष्टि पाकर आप चारों प्रकार के प्राणियों को, और जिस भी विषय का स्मरण करेंगे उसे, निर्मल जल में मछली-सा स्पष्ट देखेंगे।”
तब व्यास आदि ऋषियों ने ऋक्, यजुः, साम के मन्त्रों से कृष्ण की स्तुति की। उस स्थल पर सब ऋतुओं के दिव्य पुष्प बरसे, दिव्य वाद्य बजे, अप्सराएँ गाने लगीं, सुगन्धित वायु बही, दिशाएँ निर्मल हुईं, पशु-पक्षी शान्त विचरने लगे। फिर सूर्य पश्चिम को ढला। ऋषियों ने जनार्दन, भीष्म और युधिष्ठिर को प्रणाम कर “कल लौटेंगे” कहकर विदा ली। कृष्ण और पाण्डव भी भीष्म की प्रदक्षिणा कर रथों पर हस्तिनापुर लौटे।
समझने की कुंजी (छप्पन दिन): कृष्ण भीष्म को बताते हैं कि उनके जीवन के छप्पन दिन शेष हैं, अर्थात् उत्तरायण के प्रारम्भ तक। यह समूचे शान्ति और अनुशासन पर्वों के उपदेश का “घड़ी-यन्त्र” है, भीष्म इन्हीं दिनों में राजधर्म, आपद्धर्म, मोक्षधर्म और दानधर्म का विशद उपदेश देंगे। कृष्ण का दिया वर (पीड़ा-मुक्ति और निर्मल स्मृति) ही इस उपदेश को सम्भव बनाता है।
सार: शर-शय्या के पास कृष्ण और भीष्म परस्पर स्तुति करते हैं। भीष्म पहले बाण-पीड़ा और कृष्ण की सर्वज्ञता के कारण उपदेश से हिचकते हैं, पर कृष्ण उन्हें पीड़ा-रहित निर्मल बुद्धि और दिव्य-दृष्टि का वर देकर बोलने के योग्य बनाते हैं। यही वर आगामी समस्त राजधर्म-उपदेश की नींव है।
मूल: महाभारत (कृष्णद्वैपायन व्यास), शान्ति पर्व, राजधर्मानुशासन उपपर्व, अध्याय 1-128; पाठान्तर में गीता प्रेस का क्रम रखा गया है।
आधार: महाभारत, वेदव्यास (गीता प्रेस, गोरखपुर)