अध्याय 34 · शर-शय्या पर भीष्म: राज-धर्म

महाभारत · शान्ति पर्व
शर-शय्या पर लेटे भीष्म का युधिष्ठिर को राज-धर्म का विस्तृत उपदेश, राजा का कर्तव्य, दण्ड-नीति, मन्त्र-रक्षा, कोष और प्रजा-पालन का धर्म, और बीच-बीच में आती दृष्टान्त-कथाएँ।

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व्याकुल युधिष्ठिर सूर्योदय के समय जल से बाहर आते हुए छाती पर हाथ रखे; कृष्ण और भाई घेरकर खड़े।

हस्तिनापुर की लड़ाई बीत चुकी थी, और कुरुक्षेत्र की धूल अब रक्त से सनी पड़ी थी। पाण्डु के पुत्रों ने, विदुर ने, धृतराष्ट्र ने, और भरतवंश की समस्त स्त्रियों ने अपने मारे गए स्वजनों को जल की अंजलियाँ दीं, और शोक का वह एक महीना उन्होंने कुरु-नगरी के बाहर, पवित्र गंगा के तट पर बिताने का निश्चय किया। युधिष्ठिर ने जब उदक-क्रिया (मृतकों को जल देने का कर्म) पूरी कर ली, तब अनेक तपोधन ऋषि उस राजा के दर्शन को आए। उनमें द्वीप पर जन्मे व्यास थे, नारद थे, महर्षि देवल, देवस्थान और कण्व थे, सब अपने श्रेष्ठ शिष्यों सहित। हज़ारों ब्राह्मणों ने उस शोक से विदीर्ण-हृदय राजा को सान्त्वना दी। तभी नारद ने, द्वीपोत्पन्न व्यास को आगे रखकर, धर्मपुत्र युधिष्ठिर से पूछा, “हे युधिष्ठिर! आपकी भुजाओं के बल और माधव की कृपा से सारी पृथ्वी आपने धर्मपूर्वक जीत ली। इस भयानक युद्ध से जीवित बचना आपका सौभाग्य है। क्षत्रिय-धर्म के पालक होकर भी क्या आपको हर्ष नहीं? क्या इस ऐश्वर्य को पाकर भी शोक आपको अब तक सता रहा है?”

राजा का शोक और कर्ण का रहस्य

युधिष्ठिर ने उत्तर दिया, “हे पूज्य! कृष्ण की भुजाओं के बल पर, ब्राह्मणों की कृपा से, और भीम तथा अर्जुन के पराक्रम से मैंने सारी पृथ्वी जीत ली है। किन्तु एक भारी शोक सदा मेरे हृदय में बैठा है, यह कि लोभ के वश होकर मैंने स्वजनों का यह भयंकर संहार करवाया। सुभद्रा के प्रिय पुत्र (अभिमन्यु) और द्रौपदी के पुत्रों की मृत्यु करवाकर यह विजय मुझे पराजय-सी लगती है। अब वृष्णिकुल की सुभद्रा, मेरी भौजाई, मुझसे क्या कहेगी? द्वारका के लोग जब मधुसूदन (कृष्ण) के वहाँ जाने पर उनसे सुनेंगे, तो क्या कहेंगे?”

फिर युधिष्ठिर ने वह बात कही जो उनके भीतर गहरे-से-गहरी जलन बनी हुई थी। कुन्ती ने, उदक-क्रिया के समय, कर्ण को सूर्य-पुत्र कहकर पुकारा था। “हे नारद! वह वीर जिसमें दस हज़ार हाथियों का बल था, जो इस संसार में अद्वितीय रथी था, जो सिंह के समान गर्वीला और गम्भीर था, वह कर्ण कुन्ती का ही पुत्र था, गुप्त रूप से जन्मा हमारा सहोदर भाई। जिसे संसार सूत-पुत्र, राधा का बेटा समझता रहा, वह वास्तव में कुन्ती का ज्येष्ठ पुत्र और हमारा सगा भाई था। राज्य के लोभ में मैंने अनजाने अपने उसी भाई का वध करवा दिया। यह बात मेरे अंगों को रूई के ढेर में लगी आग की तरह जला रही है।”

युधिष्ठिर ने आगे बताया कि एक बार पृथा (कुन्ती) स्वयं कर्ण के पास गई थीं और बोली थीं, “आप मेरे पुत्र हैं।” किन्तु कर्ण ने उनकी इच्छा मानने से इनकार कर दिया था। उसने कहा था, “युद्ध में दुर्योधन का साथ छोड़ना मेरे लिए कृतघ्न और निर्दय कर्म होगा। यदि मैं युधिष्ठिर से सन्धि करूँ तो लोग कहेंगे कि मैं अर्जुन से डर गया।” फिर भी, माता को आश्वासन देते हुए उसने कहा था, “हे देवी! आपके पाँच पुत्र सदा बने रहेंगे। यदि कर्ण अर्जुन के साथ मारा गया तो आपके पाँच पुत्र (शेष चार और अर्जुन) रहेंगे; और यदि अर्जुन मारा गया तो मुझे मिलाकर पाँच रहेंगे।” युधिष्ठिर ने स्मरण किया कि सभा में दुर्योधन के दुष्ट पुत्रों के बीच जब वे यातना भोग रहे थे, तब कर्ण के पैरों को देखते ही उनका क्रोध शान्त हो जाता था, क्योंकि वे पैर माता कुन्ती के पैरों जैसे लगते थे। “हे पूज्यपुरुष! मुझे यह सब सुनाइए। मेरे भाई के रथ का पहिया युद्ध में पृथ्वी ने क्यों निगल लिया? वह क्यों शापित हुआ? आप भूत और भविष्य दोनों जानते हैं।”

समझने की कुंजी: उदक-क्रिया मृतकों को तिल-जल देने का अन्त्येष्टि-कर्म है। सूत ब्राह्मण-पिता और क्षत्रिय-माता की मिश्र सन्तान, सारथि और स्तुति-गायक का वर्ण; इसी कारण कर्ण को जन्म-भर “सूत-पुत्र” का अपमान सहना पड़ा। पृथा कुन्ती का ही दूसरा नाम। रथी रथ पर लड़ने वाला महान योद्धा।

नारद की कथा: कर्ण के दो शाप

नारद ने कहा, “हे महाबाहु! आपने ठीक कहा। कर्ण और अर्जुन के सामने युद्ध में कोई टिक नहीं सकता था। मैं आपसे जो कहने जा रहा हूँ वह देवताओं तक को अज्ञात है।” फिर उन्होंने सारी बात बताई। कुन्ती के गर्भ से वह तेजस्वी बालक कौमार्य-अवस्था में ही जन्मा और सूत के घर पला। उसने द्रोण से अस्त्र-विद्या सीखी। भीम के बल, अर्जुन की हस्तलाघव, युधिष्ठिर की बुद्धि, और जुड़वाँ भाइयों की विनम्रता को देखकर वह ईर्ष्या से जल उठा, और कम उम्र में ही दुर्योधन का मित्र बन गया।

एक दिन कर्ण एकान्त में द्रोण के पास गया और बोला, “मैं अर्जुन से लड़ना चाहता हूँ; मुझे ब्रह्मास्त्र, उसके मन्त्र, और उसके लौटाने की विधि सिखाइए।” किन्तु द्रोण ने, अर्जुन के प्रति स्नेह और कर्ण की दुष्टता को जानते हुए, उत्तर दिया, “ब्रह्मास्त्र केवल वही ब्राह्मण जान सकता है जिसने सब व्रतों का पालन किया हो, अथवा वह क्षत्रिय जिसने कठोर तप किया हो; और कोई नहीं।” तब कर्ण महेन्द्र पर्वत पर परशुराम के पास गया और बोला, “मैं भृगुवंश का ब्राह्मण हूँ।” इस झूठ से उसे आदर मिला और राम (परशुराम) ने उसे सादर शिष्य बना लिया। वहाँ कर्ण ने सब अस्त्र सीख लिए।

एक दिन समुद्र-तट पर घूमते हुए कर्ण ने अनजाने एक ब्राह्मण की होम-धेनु (अग्निहोत्र के लिए रखी गाय) को मार डाला। पश्चात्ताप से उसने ब्राह्मण को बता दिया और गायों तथा धन से प्रसन्न करना चाहा, किन्तु ब्राह्मण ने क्रोध में शाप दिया, “जिस शत्रु से आप सदा युद्ध की कामना करते हैं, उसी से लड़ते समय पृथ्वी आपके रथ का पहिया निगल लेगी, और उसी क्षण मोहग्रस्त आपका सिर आपका शत्रु काट लेगा, जैसे आपने यह गाय असावधानी में मारी।” कितना ही प्रार्थना करने पर भी ब्राह्मण ने शाप वापस न लिया।

कुछ काल बाद दूसरा शाप मिला। एक दिन परशुराम थककर कर्ण की गोद में सिर रखकर सो गए। तभी एक भयानक कीड़ा, जो रक्त-मांस पर पलता था, कर्ण की जाँघ में घुसकर उसे छेदने लगा। गुरु की नींद टूटने के डर से कर्ण न उसे फेंक सका न मार सका; उसने वह असह्य पीड़ा बिना हिले-डुले सही। जब कर्ण का रक्त परशुराम के शरीर को छू गया, तब वे जाग उठे। उन्होंने देखा कि वह आठ पैरों और सुई-सी नुकीली रोमावली वाला, अलर्क नामक कीड़ा रक्त में गलकर प्राण त्याग चुका है। आकाश में एक राक्षस प्रकट हुआ जिसने कहा कि वह पूर्वजन्म में दंश नामक असुर था, जिसने भृगु की पत्नी का अपहरण किया था और शाप से कीड़ा बना; अब राम के निमित्त उसका उद्धार हुआ।

तब परशुराम ने क्रोध में कर्ण से कहा, “मूर्ख! इतनी पीड़ा कोई ब्राह्मण नहीं सह सकता। आपकी सहनशीलता क्षत्रिय की-सी है। सच बताइए।” शाप के भय से कर्ण ने सच कहा, “मैं सूत हूँ, ब्राह्मण और क्षत्रिय के मिश्रण से उत्पन्न, राधा का पुत्र कर्ण। अस्त्र पाने की इच्छा से मैंने यह छल किया।” परशुराम ने मुस्कुराते हुए, पर क्रोध से भरकर, शाप दिया, “अस्त्र के लोभ में आपने झूठ बोला, अतः जब आप अपने ही समान किसी योद्धा से जूझेंगे, तब मृत्यु के क्षण यह ब्रह्मास्त्र आपको स्मरण न रहेगा।” कर्ण लौटकर दुर्योधन से बोला, “मैंने सब अस्त्र सिद्ध कर लिए।”

एक उप-कथा: गोद में सोए गुरु, जाँघ में घुसा कीड़ा, और बिना सिसके सही गई पीड़ा। यही सहनशीलता कर्ण को धोखा दे गई, क्योंकि उसी से परशुराम ने पहचान लिया कि यह “ब्राह्मण” नहीं। महाभारत का यह क्रूर व्यंग्य है कि कर्ण का परम गुण ही उसके शाप का कारण बना।

कर्ण का यश और उसके पतन के अनेक कारण

नारद ने कर्ण का यश सुनाया: कलिंगराज चित्रांगद की कन्या के स्वयंवर में दुर्योधन ने कन्या का बलपूर्वक हरण किया और कर्ण ने अकेले सैकड़ों कुपित राजाओं को परास्त कर उसकी रक्षा की। मगधराज जरासन्ध ने कर्ण को द्वन्द्व-युद्ध के लिए ललकारा; बाहुयुद्ध में जब कर्ण उसके (जरा द्वारा जोड़े गए) दो भागों को चीरने ही वाला था, तब जरासन्ध ने प्रसन्न होकर मित्रता कर ली और उसे मालिनी नगर दिया। पहले कर्ण केवल अंग देश का राजा था; अब चम्पा पर भी राज्य करने लगा।

नारद ने कर्ण के पतन के सभी कारण गिनाए: ब्राह्मण का शाप, परशुराम का शाप, इन्द्र को कवचकुण्डल दान में दे देना (जो इन्द्र ने पाण्डवों के हित में माँगे), इन्द्र की दिव्य माया से छले जाना, भीष्म द्वारा रथ-अतिरथ की गणना में उसे अर्ध-रथी कहकर हीन बताया जाना, शल्य के कटु वचनों से उसके तेज का क्षय, वासुदेव की नीति, और अर्जुन को रुद्र-इन्द्र-यम-वरुण-कुबेर-द्रोण-कृप से मिले दिव्य अस्त्र। “इन सब से घिरकर ही गाण्डीवधारी अर्जुन सूर्य-समान तेजस्वी विकर्तन-पुत्र कर्ण का वध कर सका। इस प्रकार आपका भाई अनेकों के शाप और छल से ग्रस्त था। वह युद्ध में गिरा है, अतः आप उसके लिए शोक न करें।”

समझने की कुंजी: रथ-अतिरथ की गणना सेना के योद्धाओं को उनके बल के अनुसार श्रेणी देना; भीष्म ने कर्ण को “अर्ध-रथी” कहकर उसका अपमान किया था। विकर्तन सूर्य का नाम; विकर्तन-पुत्र अर्थात सूर्य-पुत्र कर्ण।

नारद के मौन होने पर युधिष्ठिर शोक में डूब गए। तब कुन्ती ने, स्वयं दुःख से व्याकुल होकर, उन्हें समझाया कि उन्होंने स्वयं और सूर्यदेव ने भी, स्वप्न में तथा प्रत्यक्ष, कर्ण को आपके साथ मिलने को कहा था, किन्तु काल के वश वह न माना। यह सुनकर युधिष्ठिर ने आँसू भरकर कहा, “आपने अपना मन्त्र (रहस्य) छिपाए रखा, इसी से यह महान दुःख मुझ पर आया।” और शोक में उन्होंने समस्त स्त्रियों को शाप दे दिया कि अब से कोई स्त्री कोई रहस्य न छिपा सकेगी।

सार: भीष्म के उपदेश से पहले मूल कथा युधिष्ठिर के अपराध-बोध से आरम्भ होती है। कर्ण के दो शाप और अनेक कारणों की यह कथा यह दिखाती है कि महान योद्धा का पतन किसी एक भूल से नहीं, अनेक नियति-सूत्रों के मिलने से होता है। और गहरे-से-गहरी पीड़ा यह कि विजय का मूल्य अपने ही सहोदर का रक्त था।

युधिष्ठिर की वैराग्य-घोषणा

कृष्ण तट पर बैठे शोकमग्न युधिष्ठिर को समझाते हुए; पीछे शरशय्या पर लेटे भीष्म और खड़े योद्धा दिखते।

शोक से जलते युधिष्ठिर अर्जुन से बोले, “हे अर्जुन! यदि हम वृष्णि-अन्धकों के नगरों में भिक्षा-वृत्ति से जीते, तो स्वजनों के संहार का यह दारुण अन्त हमारा न होता। क्षत्रिय की रीति को धिक्कार, बल और पराक्रम को धिक्कार, क्रोध को धिक्कार, जिनके कारण यह विपत्ति आई। क्षमा, आत्म-संयम, पवित्रता, त्याग, विनम्रता, अहिंसा और सत्य ही धन्य हैं, जिन्हें वनवासी ऋषि पालते हैं। मांस के एक टुकड़े के लिए परस्पर लड़ते कुत्तों के झुण्ड की तरह हम पर यह विपत्ति आई है; अब वह मांस का टुकड़ा भी हमें प्रिय नहीं रहा।” युधिष्ठिर ने माता और भाइयों के सामने घोषणा की कि वे राज्य त्यागकर वन चले जाएँगे, मौन-व्रत धारण कर ज्ञान के बताए मार्ग पर चलेंगे, क्योंकि जो पृथ्वी से बँधा है वह सम्पूर्ण धर्म-लाभ नहीं पा सकता। “हे अर्जुन! आप ही इस काँटों-रहित शान्त पृथ्वी का शासन कीजिए। मुझे न राज्य चाहिए न भोग।”

अर्जुन का प्रत्युत्तर: धन और कर्म का धर्म

अर्जुन ने तीखे स्वर में, होंठ चबाते हुए, पर मुस्कुराते हुए कहा, “हे राजन्! इतना अलौकिक कर्म करके आप इस समृद्धि को त्यागने पर तुले हैं, यह देखकर मुझे दुःख होता है। क्या किसी नपुंसक या आलसी ने कभी राज्य पाया है? अपने ही धर्म के पालन से जीती हुई पृथ्वी को आप चित्त की चंचलता से क्यों छोड़ें? यदि आप वन को जाएँगे, तो आपकी अनुपस्थिति में दुष्ट यज्ञों का नाश करेंगे, और वह पाप आपको लगेगा।”

अर्जुन ने धन की महिमा गाई: “राजा का धर्म पूर्णतः धन पर निर्भर है। जिसके पास धन है उसी के मित्र हैं, बन्धु हैं, वही विद्वान और सत्पुरुष माना जाता है। धन से ही धर्म, सुख और स्वर्ग की प्राप्ति होती है। जैसे पहाड़ से नदियाँ निकलती हैं, वैसे धन से धर्म-कर्म निकलते हैं। देवता तक अपने बन्धुओं (असुरों) का संहार चाहते हैं; उन्होंने आपसी संघर्षों से ही स्वर्ग पाया। जो धन राजा दूसरों से लेता है वही उसकी समृद्धि का साधन बनता है, जैसे पुत्र पिता के धन को अपना कहते हैं। यह पृथ्वी पहले दिलीप, नहुष, अम्बरीष और मान्धाता की थी; अब आपकी है। अतः प्रचुर दक्षिणा वाला महायज्ञ कीजिए। यदि न करेंगे तो इस राज्य के सब पाप आपके होंगे। यह अश्वमेध का शाश्वत और मंगल मार्ग है; इसे छोड़कर आप किस मार्ग पर जाएँगे?”

समझने की कुंजी: राजसूय, अश्वमेध, सर्वमेध राजाओं के महायज्ञ; अश्वमेध में छोड़ा गया घोड़ा जहाँ-जहाँ जाता, वह भूमि राजा की मानी जाती। दक्षिणा यज्ञ के अन्त में ब्राह्मणों को दिया जाने वाला दान।

युधिष्ठिर का वन-जीवन का चित्र, और भीम का खण्डन

युधिष्ठिर ने अपने वन-जीवन का विस्तृत चित्र खींचा: वे फल-मूल पर जीएँगे, मृगों के साथ वन में विचरेंगे, किसी भी प्राणी को तनिक भी कष्ट न देंगे, द्वन्द्वों (सुख-दुःख, स्तुति-निन्दा) से ऊपर उठ जाएँगे, मौन रहेंगे, अन्धे-बहरे जड़ की भाँति आचरण करेंगे। “यदि कोई मेरी एक भुजा काट दे और दूसरा दूसरी भुजा पर चन्दन लगाए, तो मैं न एक का बुरा चाहूँगा न दूसरे का भला। सूई की नोक के बराबर भोजन भी न मिले तो सात घरों तक भिक्षा माँगूँगा।”

क्रोधित भीम शिविर में सिर झुकाए बैठे युधिष्ठिर को हाथ बढ़ाकर समझाते; अर्जुन, नकुल और सहदेव पास खड़े।

भीमसेन क्रोध में बोले, “हे राजन्! वेद के बार-बार पाठ से जैसे मूर्ख पाठक की बुद्धि सत्य के प्रति अन्धी हो जाती है, वैसे आपकी बुद्धि हो गई है। यदि क्षत्रिय-धर्म की निन्दा करके आपको आलस्य का जीवन ही जीना था, तो धृतराष्ट्र-पुत्रों का यह संहार व्यर्थ था। यह तो वैसा हुआ कि कुआँ खोदते-खोदते जल पाने से पहले कीचड़ में सना मनुष्य लौट आए; या ऊँचे वृक्ष पर चढ़कर मधु पाकर चखने से पहले मर जाए। हम बलवान, ज्ञानी और तेजस्वी होकर भी एक नपुंसक की भाँति आपके वचन मान रहे हैं। शास्त्रों ने वैराग्य केवल वृद्ध या पराजित राजाओं के लिए विपत्ति-काल में कहा है, क्षत्रिय के धर्म के रूप में नहीं। यदि त्याग से ही सिद्धि मिलती तो पर्वत और वृक्ष, जो किसी को कष्ट नहीं देते और सदा ब्रह्मचारी हैं, सर्वप्रथम सिद्ध होते। मनुष्य को कर्म करना ही चाहिए; कर्महीन को कभी सिद्धि नहीं मिलती।”

अर्जुन की उप-कथा: सोने की चिड़िया और संन्यासी युवक

Beardless young brahmin ascetics in a forest gazing up in wonder at a luminous golden bird perched on a branch, dawn light filtering through trees.

अर्जुन ने एक प्राचीन कथा सुनाई। कुछ उच्चकुलीन, अल्पबुद्धि ब्राह्मण-युवक, अभी जिनकी दाढ़ी-मूँछ भी न आई थी, घर-बार और पिता-भाइयों को छोड़कर वन में ब्रह्मचारी का जीवन बिताने चले गए। इन्द्र को उन पर दया आई। स्वर्ण-पक्षी का रूप धरकर उसने कहा, “जो यज्ञ का बचा हुआ अन्न (विघस) खाते हैं, उनका कर्म परम कठिन और पुण्यमय है।” ऋषि-युवक बोले, “यह पक्षी हमें ही प्रशंसा दे रहा है, क्योंकि हम अवशिष्ट पर ही जीते हैं।” पर पक्षी ने कहा, “मैं आपको नहीं सराहता। आप तो कीचड़ में पड़े, अपवित्र, जूठन पर जीते दुष्ट हैं; यज्ञ-शेष पर जीने वाले नहीं।”

तब उस पक्षी (इन्द्र) ने उन्हें उपदेश दिया: चौपायों में गाय श्रेष्ठ, धातुओं में स्वर्ण, और द्विपदों में ब्राह्मण श्रेष्ठ हैं। जन्म से मृत्यु तक के सब संस्कार मन्त्रों से ही नियमित होते हैं। गृहस्थ-जीवन ही सिद्धि का क्षेत्र है। जो कर्म की निन्दा करते हैं वे देवों, ऋषियों और ब्रह्म के मार्ग छोड़कर श्रुति-निन्दित पथ पर जाते हैं। यज्ञ, वेदाध्ययन, पितरों का तर्पण, और गुरुसेवा ही कठोरतम तप हैं; देवताओं ने इन्हीं से महिमा पाई। “आप गृहस्थ-धर्म का भारी बोझ उठाइए। जो अतिथि, देव, ऋषि और बन्धुओं को खिलाकर बचा अन्न खाते हैं, वही विघस-भोजी हैं और दुर्लभ गति पाते हैं।” यह सुनकर युवकों ने वैराग्य त्यागकर गृहस्थ-जीवन अपना लिया। “हे राजन्! आप भी उसी शाश्वत बुद्धि से इस निष्कण्टक विश्व का शासन कीजिए।”

समझने की कुंजी: विघस अतिथि-देव-पितरों को भोजन कराने के पश्चात बचा हुआ अन्न; इसे खाना गृहस्थ का पुण्य माना जाता था। विघस-भोजी ऐसा गृहस्थ जो पहले सबको खिलाकर तब स्वयं खाता है।

सार: भाइयों का यह वाद-विवाद महाभारत के राज-धर्म का प्रवेश-द्वार है। प्रश्न यह है: युद्ध जीतकर राजा त्याग करे या शासन? अर्जुन धन और कर्म का पक्ष लेते हैं, भीम क्षत्रिय-धर्म का, और इन्द्र की कथा गृहस्थ-धर्म को चारों आश्रमों में श्रेष्ठ ठहराती है। नैतिक उलझन यह है कि वैराग्य कब धर्म है और कब पलायन।

नकुल और सहदेव का तर्क: सच्चा त्यागी कौन

नकुल ने ताम्र-वर्ण मुख से कहा, “देवता भी कर्म के फल पर निर्भर हैं; पितर भी कर्म में लगे हैं। जो वेद के कर्म-विधान को ठुकराते हैं उन्हें ही नास्तिक जानिए। जो अपना धर्मार्जित धन यज्ञ में वेदज्ञ ब्राह्मणों को देकर आत्म-संयम रखता है, वही सच्चा त्यागी है। जो गृहस्थ-सुख के स्रोत को छोड़कर आगे की अवस्था में कूद पड़ता है, वह तमोगुणी त्यागी है। चारों आश्रम जब तराज़ू पर तौले गए, तो एक पलड़े में गृहस्थ-धर्म रखने पर शेष तीनों को दूसरे पलड़े में रखना पड़ा। जो फल की कामना त्यागकर इसे कर्तव्य मानकर गृहस्थ-जीवन जीता है, वही सच्चा त्यागी है, और वह नहीं जो घर-बार छोड़कर वन में भी इच्छाओं को नहीं भूलता। जो राजा प्रजा को लुटेरों से नहीं बचाता, वह साक्षात कलि है। यदि दान और रक्षा किए बिना हम वन को जाएँ, तो हम राजवर्ग के कलि ही कहलाएँगे।”

सहदेव ने सूक्ष्म तर्क रखा, “केवल बाहरी वस्तुओं को त्यागने से सिद्धि नहीं मिलती; मानसिक आसक्ति भी त्यागनी होती है। ‘मम’ (मेरा) यह दो अक्षर का शब्द ही मृत्यु है, और ‘न मम’ (मेरा नहीं) यह तीन अक्षर का शब्द ही शाश्वत ब्रह्म है। जो समस्त प्राणियों को अपने ही समान देखता है, वह विनाश के महान भय से मुक्त हो जाता है। हे राजन्! आप मेरे पिता हैं, रक्षक हैं, भाई हैं, और गुरु भी। दुःखी जन के इन असंगत वचनों को क्षमा कर दीजिए, जो आपके प्रति आदर से ही कहे गए हैं।”

एक उप-कथा: चारों आश्रमों को तराज़ू पर तौलने का यह दृष्टान्त राज-धर्म का सूक्ष्म बीज है। ब्रह्मचर्य, वानप्रस्थ और संन्यास तीनों मिलकर भी गृहस्थ-धर्म के भार के बराबर ठहरते हैं, क्योंकि गृहस्थ ही देव, पितर, अतिथि और प्राणियों का पालन करता है। पर सहदेव यह मोड़ देते हैं कि असली त्याग बाहर नहीं, मन के “मम” को छोड़ने में है।

द्रौपदी का तीखा वचन: दण्ड के बिना क्षत्रिय शोभा नहीं देता

रणभूमि में भाई और द्रौपदी शोकमग्न युधिष्ठिर को घेरकर समझाते; पीछे कृष्ण खड़े और शरशय्या पर भीष्म हाथ उठाए।

जब युधिष्ठिर मौन रहे, तब बड़ी आँखों वाली, सुन्दर द्रौपदी, जो सदा युधिष्ठिर के स्नेह की अपेक्षा रखती थीं, बोलीं, “हे पार्थ! ये आपके भाई चातक पक्षी की तरह मुख सुखाकर प्रतीक्षा कर रहे हैं, पर आप इन्हें प्रसन्न नहीं करते। द्वैतवन के सरोवर के पास, ठण्ड-हवा-धूप सहते हुए, आपने ही इन भाइयों से कहा था कि हम दुर्योधन को मारकर सर्वकामना-दात्री पृथ्वी का भोग करेंगे और महायज्ञ करेंगे; तब आप अब हमारे हृदयों को क्यों खिन्न करते हैं? नपुंसक न धन भोग सकता है, न सन्तान पा सकता है, जैसे जलहीन कीचड़ में मछली नहीं रहती। दण्ड के बिना क्षत्रिय न शोभा पाता है, न पृथ्वी भोग सकता है, और न उसकी प्रजा सुखी रहती है। दुष्टों का दमन, सज्जनों का पालन, और युद्ध से पीठ न दिखाना, यही राजा का परम धर्म है।”

द्रौपदी ने स्मरण दिलाया कि युधिष्ठिर ने जम्बूद्वीप, क्रौंचद्वीप, शाकद्वीप और भद्राश्व जैसे विशाल भूखण्डों पर बल से शासन किया है; ऐसे अतुलनीय कर्म करके भी उनका मन तृप्त क्यों नहीं? उन्होंने सास (कुन्ती) के वचन भी सुनाए कि युधिष्ठिर सदा उन्हें सुखी रखेंगे। “हज़ारों पराक्रमी राजाओं को मारकर अब आप अपने ही मूढ़ता से उस कर्म को व्यर्थ करने जा रहे हैं। जिनका ज्येष्ठ भाई उन्मत्त हो जाए, उन सबको उसी का अनुसरण करना पड़ता है। यदि ये भाई होश में होते, तो आपको और सब अविश्वासियों को बाँधकर स्वयं पृथ्वी का शासन सँभाल लेते। हे राजन्! आप मान्धाता और अम्बरीष जैसे राजाओं की भाँति प्रजा का धर्मपूर्वक पालन कीजिए, यज्ञ कीजिए, शत्रुओं से लड़िए, और ब्राह्मणों को दान दीजिए।”

समझने की कुंजी: दण्ड राजदण्ड, अर्थात शासन की दण्ड-शक्ति या न्याय-व्यवस्था; यहाँ इसका अर्थ “तलवार से दण्ड” और “विधि का शासन” दोनों है। कलि चार युगों में अन्तिम और पतनशील युग; प्रतीक रूप में पाप और अव्यवस्था का अवतार।

अर्जुन का दण्ड-नीति का व्याख्यान

द्रौपदी के वचनों के बाद अर्जुन ने दण्ड (दण्ड-नीति) की गहरी व्याख्या की। “दण्डधारी राजा ही सब प्रजा का शासन और रक्षण करता है। जब सब सोते हैं, दण्ड जागता है; इसी से विद्वानों ने दण्ड को साक्षात धर्म कहा है। दण्ड धर्म, अर्थ और काम, तीनों की रक्षा करता है। कुछ लोग राजदण्ड के भय से पाप छोड़ते हैं, कुछ यमदण्ड के भय से, कुछ परलोक के भय से, और कुछ समाज के भय से। यदि दण्ड न होता तो प्रबल दुर्बल को निगल जाता, जैसे जल में बड़ी मछली छोटी को खाती है। दण्ड इसीलिए ‘दण्ड’ कहलाता है क्योंकि वह उद्दण्डों को रोकता और दुष्टों को दण्डित करता है।”

अर्जुन ने वर्णानुसार दण्ड का भेद बताया: ब्राह्मण का दण्ड वचन-मात्र से, क्षत्रिय का जीवन-निर्वाह जितना अन्न देकर, वैश्य का अर्थ-दण्ड और सम्पत्ति-हरण से, और शूद्र के लिए दण्ड नहीं। उन्होंने कहा कि बिना किसी प्राणी को कष्ट दिए कोई जीवन धारण नहीं कर सकता; नेवला चूहे को, बिल्ली नेवले को, कुत्ता बिल्ली को, और चीता कुत्ते को खाता है। यह चर-अचर जगत प्राणियों का भोजन है, यही देवों ने नियत किया। इन्द्र ने वृत्र-वध से इन्द्रत्व पाया। “हे राजन्! आप जैसे जन्म से हैं वैसे ही बनिए। यदि दण्ड न हो, तो कुत्ता यज्ञ का घृत चाट जाए, कौवा प्रथम आहुति ले जाए। दण्ड ही सबका मूल है; उस पर स्वर्ग और यह लोक दोनों टिके हैं।”

अर्जुन ने हिंसा-अहिंसा की नैतिक जटिलता को भी छुआ: “कोई कर्म पूर्णतः पुण्य नहीं, न कोई पूर्णतः पाप। हर कर्म में दोनों का अंश रहता है। जो शत्रु अस्त्र उठाकर सामने आता है, उसे अस्त्र से मारने में कोई पाप नहीं, क्योंकि वह क्रोध आक्रमणकारी का ही उकसाया हुआ है। आत्मा अवध्य है; जब आत्मा मारी ही नहीं जा सकती, तो एक दूसरे को कैसे मारता है? जैसे मनुष्य नया घर बदलता है, वैसे जीव नए शरीर धारण करता है।”

सार: यही खण्ड भीष्म के राज-धर्म का बीज-सूत्र है। दण्ड (राज-शक्ति) ही वह धुरी है जिस पर समाज की व्यवस्था घूमती है। बिना दण्ड के “मत्स्य-न्याय” (बड़ी मछली छोटी को खा जाए) आ जाता है। पर अर्जुन इसे सपाट नहीं रखते, वे मानते हैं कि हर कर्म में पुण्य-पाप मिले रहते हैं; राजा का धर्म स्वच्छ नहीं, सदा मिश्रित होता है।

भीम का मन-युद्ध का आह्वान, और युधिष्ठिर का सन्तोष-उपदेश

भीम ने फिर धैर्य बटोरकर कहा, “हे राजन्! दो प्रकार के रोग हैं, शारीरिक और मानसिक; एक दूसरे से उत्पन्न होते हैं। शीत, उष्ण और वायु शरीर के तीन गुण हैं; इनका सन्तुलन ही स्वास्थ्य है। सत्त्व, रज और तम मन के तीन गुण हैं; इनका सन्तुलन ही मानसिक स्वास्थ्य है। शोक हर्ष से और हर्ष शोक से सन्तुलित होता है। आप न कभी दुःख में दुःखी हुए न सुख में सुखी; तो अब सुख के समय स्मृति से दुःखी क्यों होते हैं?” भीम ने द्रौपदी के सभा में घसीटे जाने, वनवास, जटासुर और कीचक के अत्याचारों का स्मरण दिलाया और कहा, “अब आपके सामने भीष्म-द्रोण के युद्ध जैसा ही एक युद्ध है, जो केवल मन से लड़ा जाना है, जिसमें न बाण चाहिए, न मित्र, न बन्धु। यदि इस मन के शत्रु को जीते बिना आप प्राण त्याग देंगे, तो दूसरा शरीर धरकर फिर इन्हीं शत्रुओं से लड़ना होगा। अतः आज ही, शरीर की चिन्ता छोड़कर, मन के शत्रु को जीतिए।”

युधिष्ठिर ने उत्तर दिया, “हे भीम! असन्तोष, सांसारिक आसक्ति, अशान्ति, मद और चिन्ता, इन्हीं दोषों से आप राज्य चाहते हैं। जो राजा इस अनन्त पृथ्वी का शासन करे, उसका भी एक ही पेट होगा। इच्छाएँ एक दिन में, अनेक महीनों में, सारे जीवन में भी नहीं भरतीं। अग्नि को ईंधन से बढ़ाते हैं, न दें तो बुझ जाती है; वैसे ही पेट की अग्नि को थोड़े अन्न से शान्त कीजिए। पहले पेट को जीतिए, फिर पृथ्वी जीती जाएगी।” उन्होंने जनक के उस वचन का स्मरण कराया, “मेरा कोष अपार है, फिर भी मेरा कुछ नहीं! यदि सारी मिथिला जलकर राख हो जाए, तो भी मेरा कुछ नहीं जलता।” “जो ज्ञान के भवन की छत पर चढ़ गया है, वह नीचे शोक करते लोगों को ऐसे देखता है जैसे पर्वत-शिखर से मैदान के लोगों को। जब कोई अनेक रूपों वाले प्राणियों को एक ही तत्त्व का विविध प्रकटीकरण देखता है, तभी वह ब्रह्म को प्राप्त कहलाता है।”

समझने की कुंजी: पितृयान और देवयान दो मार्ग; यज्ञ-कर्म करने वाले पितृयान (दक्षिण मार्ग) से, और मोक्षार्थी देवयान (उत्तर मार्ग) से जाते हैं। जनक मिथिला का राजर्षि, जो राज्य में रहकर भी अनासक्त रहने का आदर्श है।

अर्जुन की उप-कथा: जनक और उनकी रानी का संवाद

King Janaka of Videha in his palace conversing with his crowned queen who counsels him, ornate Mithila throne-chamber, lamplit evening.

अर्जुन ने फिर विदेहराज जनक और उनकी रानी की कथा सुनाई। एक बार जनक धन, पुत्र, पत्नी और अग्नि तक त्यागकर, सिर मुँड़ाकर भिक्षु बन गए, और खेत की दरारों से बीने जौ के दानों पर जीने का संकल्प किया। तब उनकी तेजस्वी रानी ने एकान्त में, निडर होकर, क्रोध से उन्हें तर्कपूर्ण वचन कहे: “आपने धन-धान्य से भरा राज्य छोड़कर भिक्षा-वृत्ति क्यों ली? मुट्ठी-भर जौ से आप अतिथि, देव, ऋषि और पितरों को कैसे तृप्त करेंगे? आप तीनों वेदों के ज्ञाता हज़ारों ब्राह्मणों के पालक थे; अब उन्हीं से भिक्षा माँगेंगे? आपकी माता निर्पुत्र हुई, और मैं, कोसल की राजकुमारी, विधवा-सी हुई। ये असहाय क्षत्रिय फल और पुण्य की आशा में आप पर निर्भर हैं; उनकी आशा मारकर आप किस लोक में जाएँगे?”

रानी ने सूक्ष्म तर्क रखा: “यदि राज्य और मुट्ठी-भर जौ आपके लिए समान हैं, तो राज्य ही क्यों छोड़ते हैं? और यदि वह मुट्ठी-भर जौ आपकी आसक्ति का विषय बन गया, तो सब त्यागने का आपका संकल्प ही गिर गया। केवल सम्पत्ति छोड़ देने या भिक्षा पर निर्भर हो जाने से कोई संन्यासी नहीं होता। जो भीतर से अनासक्त रहे, बाहर से चाहे संलग्न दिखे, सब बन्धन तोड़ चुका हो, और मित्र-शत्रु को समान देखे, वही मुक्त है। सिर मुँड़ाकर गेरुआ वस्त्र धारण कर लेने वाले अनेक लोग भीतर अनेक बन्धनों से बँधे, व्यर्थ धन की ताक में घूमते हैं। हे राजन्! इन्द्रियों को वश में रखकर, सच्चे साधुओं का पालन करके आप परलोक के आनन्द-लोक जीतिए। जो अग्निहोत्र रखता है, यज्ञ करता है, और दिन-रात दान करता है, उससे बढ़कर धर्मात्मा कौन है?” अर्जुन ने जोड़ा, “जनक जैसा सत्यज्ञ भी इस विषय में मोहित हो गया था; आप मोह में न पड़िए। हम दान, अहिंसा, और सत्य-वचन से ही इष्ट लोक पाएँगे।”

एक उप-कथा: रानी का तर्क महाभारत का तीक्ष्ण वैचारिक मोड़ है। वह कहती है कि भिक्षा की मुट्ठी-भर जौ भी यदि आसक्ति बन जाए, तो वह राज्य से भी बड़ा बन्धन है। संन्यास का गेरुआ वस्त्र तभी सार्थक है जब भीतर का “मम” मरे; अन्यथा वह केवल पेट भरने का साधन है। यही विचार सहदेव के “मम और न मम” से जुड़ता है।

युधिष्ठिर का ज्ञान-पक्ष और देवस्थान का प्रत्युत्तर

युधिष्ठिर ने कहा, “हे अर्जुन! मैं वेद और ब्रह्म-विद्या दोनों जानता हूँ। वेद में कर्म और कर्म-त्याग, दोनों के उपदेश हैं। तप, त्याग और ब्रह्मज्ञान, इन तीनों में दूसरा पहले से और तीसरा दूसरे से श्रेष्ठ है। आप युद्ध-विद्या के ज्ञाता हैं, पर आपने वृद्धों की सेवा नहीं की; आप शास्त्रों का सूक्ष्म अर्थ नहीं जानते। धन को सर्वोपरि मानना भूल है। धर्मात्मा लोग तप और वेदाध्ययन में लगे रहते हैं। जो लोभ-रहित होकर सांसारिक इच्छाओं को रोकते हैं, वे उत्तर-मार्ग (देवयान) से त्यागियों के लोक जाते हैं।”

ऋषि व्यास रणभूमि में बैठे युधिष्ठिर और कृष्ण को उपदेश देते; अन्य वृद्ध ऋषि साथ बैठे, पीछे शरशय्या पर भीष्म।

तब महातपस्वी देवस्थान बोले, “हे अजातशत्रु! फाल्गुन (अर्जुन) ने कहा कि धन से बढ़कर कुछ नहीं; मैं भी इसी पर कहता हूँ। आपने पृथ्वी धर्मपूर्वक जीती है, बिना कारण उसे न त्यागिए। वेद में चार आश्रम बताए हैं; उन्हें क्रम से पार कीजिए। अभी प्रचुर दक्षिणा वाले महायज्ञ कीजिए। जो धन पाकर अपात्र को देता और सुपात्र को नहीं देता, वह भ्रूण-हत्या का पाप पाता है। सुपात्र-अपात्र का विवेक करके दान देना सरल नहीं। विधाता ने धन यज्ञ के लिए रचा, और मनुष्य को उस धन की रक्षा और यज्ञ के लिए। इन्द्र, महादेव, मरुत्त, और हरिश्चन्द्र ने यज्ञों से ही महिमा पाई।”

देवस्थान ने इन्द्र के पूछने पर बृहस्पति के दिए सन्तोष-उपदेश को उद्धृत किया: “सन्तोष ही परम स्वर्ग है, सन्तोष ही परम सुख है। जब मनुष्य कछुए की तरह अपनी सब इच्छाओं को समेट लेता है, तब उसकी आत्मा का स्वाभाविक तेज प्रकट होता है। जब कोई किसी प्राणी से न डरता है न किसी को डराता है, जब वह राग-द्वेष को जीत लेता है, तब वह आत्म-दर्शी कहलाता है। अहिंसा, सत्य-वचन, न्याय, करुणा, आत्म-संयम, सन्तान-उत्पत्ति, मृदुता, लज्जा और धैर्य, मनु के अनुसार यही श्रेष्ठ धर्म है। जो क्षत्रिय राज-धर्म को जानकर, आत्म-संयम रखते हुए, दुष्टों को रोककर और सज्जनों का पालन करके, अन्त में पुत्र को राज्य सौंपकर वन जाता है, वह दोनों लोकों में उत्तम फल पाता है।”

समझने की कुंजी: चार आश्रम ब्रह्मचर्य (विद्यार्थी), गृहस्थ, वानप्रस्थ (वन-निवास) और संन्यास; जीवन को क्रम से इन चरणों में जीने का विधान। भ्रूण-हत्या गर्भस्थ शिशु की हत्या, शास्त्रों में महापातक; अपात्र-दान को इसी के समान पाप कहा गया।

सार: इस खण्ड में दो धाराएँ टकराती हैं: युधिष्ठिर की ज्ञान-त्याग की धारा और देवस्थान-अर्जुन की कर्म-यज्ञ की धारा। देवस्थान बीच का मार्ग सुझाते हैं, क्रम से चारों आश्रमों को जीना, पहले राज-धर्म फिर वैराग्य। सन्तोष का उपदेश इस तनाव को सुलझाने की चाबी है: राज्य में रहकर भी कछुए-सी अनासक्ति सम्भव है।

व्यास का उपदेश और शंख-लिखित की दण्ड-कथा

अर्जुन के फिर समझाने पर जब युधिष्ठिर मौन रहे, तब द्वीपोत्पन्न व्यास बोले, “हे युधिष्ठिर! अर्जुन के वचन सत्य हैं। श्रेष्ठ धर्म गृहस्थ-धर्म पर निर्भर है। देव, पितर, अतिथि और सेवक सब गृहस्थ पर ही जीते हैं। आप वंश-परम्परा से आई राज्य-गठरी को बैल की तरह उठाइए। क्षत्रिय का प्रधान धर्म दण्ड-धारण है; बल क्षत्रिय में सदा रहे, और बल पर दण्ड टिका है। बृहस्पति ने यह श्लोक गाया है: ‘जैसे साँप चूहे को निगलता है, वैसे पृथ्वी उस राजा को निगल जाती है जो शान्ति-प्रिय हो, और उस ब्राह्मण को जो गृहस्थी में अति आसक्त हो।’ राजर्षि सुद्युम्न ने केवल दण्ड-धारण से ही दक्ष के समान परम सिद्धि पाई।”

युधिष्ठिर के पूछने पर व्यास ने शंख और लिखित नामक दो तपस्वी भाइयों की कथा सुनाई। बाहुदा नदी के तट पर दोनों के अलग-अलग सुन्दर आश्रम थे। एक दिन छोटा भाई लिखित बड़े भाई शंख के आश्रम आया; शंख बाहर गए थे। लिखित ने आश्रम के पके फल बिना किसी संकोच के तोड़कर खाने लगा। शंख ने लौटकर पूछा, “ये फल कहाँ से लिए?” लिखित ने हँसते हुए कहा, “इसी आश्रम से।” शंख क्रोधित होकर बोले, “आपने बिना दिए ले लिया, यह चोरी है। राजा सुद्युम्न के पास जाइए और कहिए, मैंने चोरी की, मुझे चोर का दण्ड दीजिए।”

लिखित राजा सुद्युम्न के पास गया और चोरी का दण्ड माँगा। राजा ने कहा, “यदि राजा दण्ड देने में समर्थ है, तो क्षमा करने में भी; आप पवित्र हुए, क्षमा कीजिए, और कोई वर माँगिए।” पर लिखित ने और कुछ न माँगा। तब राजा ने उसके दोनों हाथ कटवा दिए। लिखित दण्ड सहकर भाई के पास लौटा और बोला, “अब इस दण्डित अधम को क्षमा कर दीजिए।” शंख ने कहा, “मैं आपसे रुष्ट नहीं, न आपने मुझे हानि पहुँचाई; पर आपके धर्म को ठेस लगी थी, उसी से मैंने आपको उबारा। अब बाहुदा में स्नान कर देव, ऋषि और पितरों को तर्पण दीजिए।” लिखित ने स्नान कर जल-कर्म आरम्भ किया, तो उसके कटे हाथों के स्थान पर दो कमल-से नए हाथ उग आए। विस्मित लिखित ने भाई को दिखाया। शंख बोले, “यह मेरे तप का फल है; आश्चर्य न कीजिए, विधाता ही निमित्त है। मैंने आपको पहले इसलिए शुद्ध न किया क्योंकि मैं आपका दण्ड-दाता नहीं हूँ; राजा ने दण्ड देकर स्वयं को, आपको और पितरों को पवित्र किया।” व्यास ने कहा, “इसी कर्म से वह राजा दक्ष के समान परम सिद्धि को प्राप्त हुआ। क्षत्रिय का धर्म दण्ड-धारण है, सिर मुँड़ाना नहीं।”

एक उप-कथा: शंख-लिखित की यह कथा राज-धर्म की कठोर सुन्दरता दिखाती है। बड़ा भाई अपने छोटे भाई को राजदण्ड पाने भेजता है, और राजा का दण्ड ही उसे पाप से शुद्ध करता है। दण्ड यहाँ क्रोध नहीं, शुद्धि का साधन है; और कटे हाथों का फिर उगना यह संकेत है कि न्याय-दण्ड स्वीकार करने वाला अन्ततः अखण्ड हो जाता है।

व्यास की राज-नीति, और हयग्रीव की कथा

व्यास ने कुन्तीपुत्र को राज-धर्म के सूत्र दिए: “हे राजन्! जो छठा भाग (कर) लेकर भी राज्य की रक्षा नहीं करता, वह राज्य के पाप का चौथाई भाग पाता है। जो राजा शास्त्र-सम्मत बुद्धि से, काम-क्रोध को त्यागकर, पिता की भाँति सब प्रजा से निष्पक्ष व्यवहार करता है, वह पाप नहीं पाता। राजा बल और नीति से शत्रुओं का दमन करे; अपने राज्य में पाप न होने दे और धर्म का आचरण कराए। वीर, शील-सम्पन्न, विद्वान, वेदज्ञ ब्राह्मण और धनी, इनकी विशेष रक्षा करे। बुद्धिमान राजा किसी एक व्यक्ति पर, चाहे वह कितना ही गुणी हो, पूरा विश्वास न करे। जो राजा प्रजा की रक्षा नहीं करता, जिसके वासनाएँ अनियन्त्रित हैं, जो अहंकार और द्वेष से भरा है, वह पाप और अत्याचार का अपयश पाता है। यदि उसकी प्रजा रक्षा-अभाव में, देवों की मार और लुटेरों से पिसती है, तो वह सब पाप राजा को लगता है।”

व्यास ने प्राचीन राजा हयग्रीव की कथा सुनाई, जिसने अनेक शत्रुओं को मारकर अन्त में, अकेले बिना किसी सहायक के, युद्ध में वीरगति पाई। शत्रुओं द्वारा अस्त्रों से छिन्न-भिन्न होकर भी निडर लड़ते हुए उसने प्राण त्यागे। व्यास ने उसके युद्ध को यज्ञ का रूपक दिया: धनुष यज्ञ-स्तम्भ था, प्रत्यंचा बलि बाँधने की रस्सी, बाण छोटी आहुति-कुड़छी, तलवार बड़ी, रक्त आहुति का घृत, रथ वेदी, और युद्ध का क्रोध अग्नि; चार श्रेष्ठ घोड़े चार होता थे। उस यज्ञ में शत्रुओं को आहुति देकर, अन्त में अपने प्राण होमकर, हयग्रीव पाप-मुक्त होकर देव-लोक में विहार कर रहा है। “उसने नीति और बुद्धि से राज्य की रक्षा की, बिना अहंकार के पृथ्वी पर शासन किया, और युद्ध में प्राण त्यागे; इसी से वह देव-लोक में आनन्द कर रहा है।”

समझने की कुंजी: छठा भाग प्राचीन भारत में राजा प्रजा से उपज का छठा हिस्सा कर के रूप में लेता था, इसी के बदले रक्षा का दायित्व था। होता यज्ञ में मन्त्र पढ़कर आहुति देने वाला ऋत्विक्। युद्ध को यज्ञ कहना क्षत्रिय के लिए धर्मयुद्ध स्वयं एक यज्ञ है, जिसमें वह अपने प्राण तक आहुति कर देता है।

काल का उपदेश: सेनजित की कथा

युधिष्ठिर ने फिर कहा कि स्त्रियों के विलाप सुनकर उन्हें शान्ति नहीं मिलती। तब योगवेत्ता व्यास ने काल (समय) का गहन उपदेश दिया: “कोई मनुष्य अपने कर्म, यज्ञ या पूजा से कुछ नहीं पाता; मनुष्य सब कुछ काल से पाता है। विधाता ने काल को ही प्राप्ति का साधन बनाया। काल से ही वायु बहती है, मेघ बरसते हैं, सरोवर कमलों से सजते हैं, वृक्ष फूलते हैं। काल आए बिना न कोई जन्मता है न मरता है; काल आए बिना बीज अंकुरित नहीं होता।”

व्यास ने राजा सेनजित की कथा कही, जिसने शोक में यह सत्य कहा था: “काल का अप्रतिरोध्य प्रवाह सब मरणधर्मा को छूता है। कोई किसी को मारता है, फिर वही दूसरे से मारा जाता है, यह संसार की भाषा है। वास्तव में न कोई मारता है न मारा जाता है। धन के नाश पर, या पत्नी-पुत्र-पिता की मृत्यु पर मनुष्य ‘हाय कैसा दुःख’ कहकर उसी शोक में डूबकर उसे बढ़ाता है। हे राजन्! आप मूर्ख की भाँति शोक क्यों करते हैं? जो स्वयं शोक के योग्य हैं, उनके लिए क्यों शोक? इस संसार में केवल दुःख है, सुख नहीं। सुख अन्ततः दुःख में बदल जाता है, और कभी दुःख से ही उपजता है। जो शाश्वत सुख चाहता है उसे दोनों (सुख-दुःख) छोड़ने होंगे। जो दूसरों के दुःख पर दुःखी होता है वह कभी सुखी नहीं हो सकता। अतः शान्त-चित्त बुद्धिमान न हर्ष में फूले न शोक में डूबे।”

व्यास ने राजा के यज्ञ-धर्म का सार दिया: “युद्ध में लगा रहना राजा का यज्ञ है; दण्ड-नीति का पालन उसका योग है; और यज्ञ में दक्षिणा-दान उसका त्याग है। बुद्धि और नीति से राज्य चलाकर, अहंकार त्यागकर, यज्ञ करके, और सबको करुणा तथा निष्पक्षता से देखकर राजा मरणोपरान्त देव-लोक में विहार करता है।”

समझने की कुंजी: काल केवल “समय” नहीं, अपितु वह नियति-शक्ति जो सब घटनाओं का मूल कारण है; गीता में भी कृष्ण स्वयं को “काल” कहते हैं। योग यहाँ राजा के सन्दर्भ में अर्थ है कुशल नीति-पालन और चित्त की एकाग्रता।

सार: काल का यह उपदेश शोक का दार्शनिक उत्तर है। जब सब कुछ काल के अधीन है, तो “मैंने मारा” या “मैं कर्ता हूँ” यह अहंकार ही भ्रम है। पर ध्यान दें, व्यास इससे कर्म-त्याग नहीं सिखाते, अपितु निष्काम होकर राज-धर्म करने को कहते हैं; युद्ध, दण्ड और दान को ही राजा का यज्ञ, योग और त्याग बताते हैं।

धन के दोष, और युधिष्ठिर का प्राय-व्रत संकल्प

युधिष्ठिर ने अर्जुन से कहा कि धन को सर्वोपरि मानना भूल है; अनेक सिद्ध पुरुष केवल वेदाध्ययन और तप से ही उत्तम लोक पा गए। उन्होंने धन के दोष गिनाए: “धन बिना दूसरों को हानि पहुँचाए नहीं मिलता, और मिलने पर अनेक क्लेश लाता है। थोड़े-से धन के लोभ में संकीर्ण-हृदय मनुष्य पश्चात्ताप का भय छोड़कर ब्रह्म-हत्या तक का पाप कर बैठता है। विधाता ने धन यज्ञ के लिए रचा; अतः सब धन यज्ञ और दान में लगे, भोग-वासना में नहीं। धन के दो दोष हैं: अपात्र को देना, और सुपात्र को न देना।”

कृष्ण झुककर शोक में डूबे युधिष्ठिर के माथे को छूते हुए; पीछे शरशय्या पर भीष्म आकाश की ओर देखते।

फिर युधिष्ठिर शोक के चरम पर पहुँचे। उन्होंने अभिमन्यु, द्रौपदी के पुत्रों, धृष्टद्युम्न, विराट, द्रुपद, वसुषेण (कर्ण), धृष्टकेतु आदि के वध को स्मरण किया। उन्होंने भीष्म का स्मरण किया, “जिनकी छाती और गोद में मैं बालपन में खेलता था, उन्हीं गंगापुत्र को राज्य-लोभ में मैंने मरवा दिया। शिखण्डी को आगे करके अर्जुन ने उन्हें तीरों से बेधा; मैंने उन्हें रक्त में लथपथ पृथ्वी पर पड़े देखा।” उन्होंने द्रोण के साथ किए अर्ध-सत्य का अपराध भी स्वीकारा, “गुरु ने पूछा कि क्या मेरा पुत्र जीवित है; मुझ पर ही उन्हें सत्य का भरोसा था। मैंने धीमे स्वर में ‘हाथी’ कहकर छल किया, यह कहकर कि अश्वत्थामा मारा गया, जबकि उस नाम का हाथी मारा गया था। ऐसा घोर कर्म करके मैं किस लोक में जाऊँगा?”

शोक से अभिभूत युधिष्ठिर ने प्राय-व्रत (आमरण अनशन) का संकल्प किया: “मैं इसी आसन पर बैठकर, अन्न-जल त्यागकर, अपने प्रिय प्राणों को सुखा दूँगा। मुझे, अपने गुरु के हत्यारे को, यह करने की अनुमति दीजिए, ताकि मैं किसी अन्य योनि में पुनर्जन्म न लूँ।” व्यास ने “ऐसा नहीं हो सकता” कहकर उन्हें रोका, “यह सब नियति है। जैसे जल के बुलबुले उठते और मिटते हैं, वैसे सब प्राणी उठते और गिरते हैं। संयोग का अन्त वियोग में, और जीवन का अन्त मृत्यु में है। आप कर्म के लिए ही विधाता द्वारा रचे गए हैं; सिद्धि कर्म से ही आती है। आप कर्म से विमुख होने योग्य नहीं।”

समझने की कुंजी: प्राय (प्रायोपवेशन) आमरण अनशन का व्रत, जिसमें साधक एक स्थान पर बैठकर अन्न-जल त्यागकर देह छोड़ता है। अश्वत्थामा-प्रसंग युधिष्ठिर का यह आधा-सच (हाथी का नाम भी अश्वत्थामा था) महाभारत की नैतिक जटिलता का केन्द्रीय बिन्दु है; “सत्यवादी युधिष्ठिर” का यही एकमात्र असत्य उन्हें जीवन-भर सालता रहा।

अस्म की कथा: जनक को नियति का उपदेश

व्यास ने अस्म नामक विद्वान ब्राह्मण और विदेहराज जनक के संवाद की कथा सुनाई। जनक ने पूछा, “स्वजनों और धन के लाभ या नाश के अवसरों पर मनुष्य कैसा आचरण करे?” अस्म ने कहा, “शरीर के बनते ही सुख-दुःख उससे जुड़ जाते हैं। समृद्धि में मनुष्य त्रिविध मद से भर जाता है: ‘मैं उच्चकुलीन हूँ, जो चाहूँ कर सकता हूँ, मैं साधारण नहीं।’ फिर वह पूर्वजों का धन उड़ाकर, दरिद्र होने पर दूसरों का धन हरने को भी श्रेष्ठ मानने लगता है, और राजा उसे शिकारी की भाँति दण्डित करता है।”

अस्म ने नियति का गम्भीर उपदेश दिया: “जरा (बुढ़ापा) और मृत्यु, दो भेड़ियों की तरह, सब प्राणियों को, बलवान-दुर्बल, छोटे-बड़े, सबको खा जाते हैं। समुद्र-पर्यन्त पृथ्वी का विजेता भी इनसे नहीं बच सकता। सुख हो या दुःख, उसे बिना हर्ष-विषाद के भोगना या सहना चाहिए, क्योंकि इनसे बचने का कोई उपाय नहीं। जैसे गन्ध, रंग, स्वाद और स्पर्श स्वभाव से आते हैं, वैसे सुख-दुःख पूर्व-निर्धारित से आते हैं। वैद्य भी रोगी होते हैं; बलवान दुर्बल हो जाते हैं; समृद्ध दरिद्र हो जाते हैं। काल की गति विचित्र है।”

अस्म ने जीवन की क्षणभंगुरता का चित्र खींचा: “जैसे महासागर में बहते दो काठ मिलते और फिर बिछुड़ जाते हैं, वैसे प्राणी मिलते और बिछुड़ते हैं। माता, पिता, पुत्र, पत्नी, हज़ारों सम्बन्ध बनते हैं; पर वास्तव में किसका कौन है? पथिक जैसे सराय में मिलते हैं, वैसे ही हमारा बन्धुओं से मिलन है। ‘मैं कहाँ हूँ? कहाँ जाऊँगा? मैं कौन हूँ? यहाँ क्यों आया? किसके लिए शोक करूँ?’ इन प्रश्नों पर विचार करने से शान्ति मिलती है। कोई स्वर्ग-नरक नहीं देख सकता; शास्त्र ही सज्जनों के नेत्र हैं। हे राजन्! शास्त्र के अनुसार आचरण कीजिए, ब्रह्मचर्य के बाद सन्तान उत्पन्न कीजिए, यज्ञ कीजिए, और पितर-देव-मनुष्यों का ऋण चुकाइए।” यह सुनकर जनक शोक-मुक्त होकर अपने घर लौट गए। व्यास ने कहा, “हे युधिष्ठिर! आप भी शोक त्यागकर उठिए; आप साक्षात इन्द्र के समान हैं। क्षत्रिय-धर्म से जीती पृथ्वी का भोग कीजिए।”

समझने की कुंजी: जरा बुढ़ापा, वार्धक्य; यहाँ इसे मृत्यु के साथ “दो भेड़िये” कहा गया जो सबको निगल जाते हैं। तीन ऋण शास्त्रों के अनुसार मनुष्य पर देव-ऋण (यज्ञ से चुके), ऋषि-ऋण (वेदाध्ययन से) और पितृ-ऋण (सन्तान से) रहते हैं।

कृष्ण की सान्त्वना और सृंजय का आख्यान

कृष्ण बाणों से बिखरी रणभूमि में उँगली उठाकर चिंतामग्न युधिष्ठिर को समझाते हुए; पीछे सूर्यास्त का आकाश।

युधिष्ठिर के फिर भी मौन रहने पर अर्जुन ने कृष्ण से कहा, “हे माधव! धर्मपुत्र अपने स्वजनों के लिए शोक में जल रहे हैं; इनका शोक दूर कीजिए।” कमल-नयन गोविन्द ने राजा का चन्दन-चर्चित, संगमरमर के स्तम्भ-सा हाथ थामकर कहा, “हे नरश्रेष्ठ! इस शोक से अपने शरीर को मत सुखाइए। इस युद्ध में मारे गए वीर अब लौटकर नहीं आ सकते; वे स्वप्न में पाई वस्तु की भाँति हैं जो जागने पर मिट जाती है। वे सब शत्रुओं की ओर मुख करके लड़े, किसी की पीठ पर घाव नहीं था, कोई भागते हुए नहीं मारा गया; अतः वे सब अस्त्रों से पवित्र होकर वीरगति को प्राप्त हुए। आप उनके लिए शोक न करें।”

कृष्ण ने नारद का सृंजय को दिया वह प्राचीन उपदेश सुनाया, जो नारद ने सृंजय के पुत्र-शोक के समय कहा था। नारद ने कहा था, “हे सृंजय! मैं, आप, और सब प्राणी मरणधर्मा हैं; फिर शोक का क्या कारण? मैं आपको प्राचीन राजर्षियों की महिमा सुनाता हूँ; ध्यान से सुनकर शोक त्याग दीजिए।” फिर नारद ने उन सोलह महान राजाओं की एक लम्बी सूची सुनाई, जो आपसे (और आपके पुत्र से) धर्म, ज्ञान, त्याग और ऐश्वर्य में कहीं बड़े थे, और फिर भी मृत्यु के ग्रास बने, और हर एक के अन्त में दोहराया, “वे भी मरे, तो आप अपने पुत्र के लिए शोक मत कीजिए।”

  • मरुत्त (अविक्षित-पुत्र): जिसके यज्ञ में सब पात्र सोने के थे, और श्री स्वयं प्रकट हुईं; उसने इन्द्र को भी जीता।
  • सुहोत्र (अतिथि-पुत्र): जिसके राज्य पर इन्द्र ने वर्ष-भर स्वर्ण बरसाया; नदियाँ सोने के कछुए-मगर बहाने लगीं।
  • बृहद्रथ (अंगराज): जिसने एक लाख घोड़े, एक लाख स्वर्ण-अलंकृत कन्याएँ, और करोड़ों बैल दान किए।
  • शिबि (उशीनर-पुत्र): जिसने सारी पृथ्वी को चर्म-ढाल की तरह हाथ में घुमाया।
  • भरत (दुष्यन्त-शकुन्तला-पुत्र): जिसने एक हज़ार अश्वमेध और सौ राजसूय किए; कण्व को अगणित घोड़े और धन दिए।
  • राम (दशरथ-पुत्र): जिनके राज्य में कोई विधवा, कोई असहाय न था; मेघ ऋतु के अनुसार बरसते, हर मनुष्य हज़ार वर्ष जीता और हज़ार पुत्र पाता; उन्होंने दस अश्वमेध किए।
  • भगीरथ (इक्ष्वाकु-वंश): जिसने दस लाख स्वर्ण-अलंकृत कन्याएँ दान कीं; जिसकी गोद में बैठी गंगा “भागीरथी” कहलाई।
  • दिलीप: जिसने सारी धन-सम्पन्न पृथ्वी ब्राह्मणों को दान दी; जिसके स्वर्ण-स्तम्भ पर छह हज़ार देव-गन्धर्व नाचे।
  • मान्धाता (युवनाश्व-पुत्र): जिसे मरुतों ने पिता के पार्श्व से निकाला, इन्द्र ने अंगुली से दूध पिलाया; जिसने एक ही दिन में तीनों लोक जीते।
  • ययाति (नहुष-पुत्र): जिसने हज़ार यज्ञ और सौ वाजपेय किए; अन्त में पुरु को राज्य देकर वन गया।
  • अम्बरीष (नभग-पुत्र): जिसके यज्ञ में सहस्रों यज्ञ करने वाले राजा सेवक बने।
  • शशबिन्दु (चित्रसेन-पुत्र): जिसकी एक लाख पत्नियाँ और दस लाख पुत्र थे, सब स्वर्ण-कवचधारी धनुर्धर।
  • गय (अमूर्तरयस-पुत्र): जिसने सौ वर्ष यज्ञ-शेष पर जीकर अग्नि से वर पाए; गंगा की रेत के कणों जितनी गायें दान कीं।
  • रन्तिदेव (संकृति-पुत्र): जिसके यज्ञ-पशुओं के चर्म-स्राव से चर्मण्वती नदी बनी; जिसके भवन में सब पात्र स्वर्ण के थे।
  • सगर (इक्ष्वाकु-वंश): जिसके साठ हज़ार पुत्र थे; जिसके क्रोध से खोदी गई पृथ्वी पर सागर बना, जो उसी के नाम से “सागर” कहलाया।
  • पृथु (वेन-पुत्र): जिसके नाम से “पृथ्वी” बनी; जिसके शासन में पृथ्वी बिना जोते अन्न देती, हर पत्ता मधु और हर गाय घड़ा-भर दूध देती।

नारद ने यह लम्बी सूची पूरी कर पूछा, “हे सृंजय! आप मौन क्यों हैं? क्या आपने मेरे वचन नहीं सुने? यदि नहीं सुने, तो मेरा यह उपदेश मरणासन्न मनुष्य को दी गई औषधि की भाँति व्यर्थ गया।” सृंजय ने कहा, “हे नारद! मैं फूलों की माला-सा सुगन्धित आपका यह उपदेश सुन रहा हूँ; आपके दर्शन-मात्र से मैं शोक-मुक्त हुआ। अमृत-पान की तरह आपके वचनों से तृप्ति नहीं होती। हे प्रभु! यदि आप कृपा करें, तो मेरा मृत पुत्र पुनर्जीवित होकर मुझसे मिले।” तब नारद ने कहा, “मैं आपके उस पुत्र सुवर्णष्ठीवी को, जिसे पर्वत ने दिया था, लौटा दूँगा; वह स्वर्ण-कान्ति वाला पुत्र हज़ार वर्ष जीएगा।”

एक उप-कथा: सृंजय-आख्यान महाभारत की प्रसिद्ध “षोडश-राजकीय” सूची है। कृष्ण इसे युधिष्ठिर को इसलिए सुनाते हैं कि जब इतने महान, धर्मात्मा और ऐश्वर्यशाली राजर्षि भी मृत्यु के ग्रास बने, तो शोक का कोई आधार नहीं रहता। यह सूची स्वयं एक राज-धर्म-शिक्षा भी है, क्योंकि हर राजा अपने यज्ञ, दान और प्रजा-पालन के लिए स्मरण किया जाता है, बल या विजय के लिए नहीं।

सुवर्णष्ठीवी का रहस्य: नारद और पर्वत की कथा

युधिष्ठिर ने पूछा, “सृंजय का पुत्र सुवर्णष्ठीवी (जिसका मल स्वर्ण था) कैसे बना? पर्वत ने सृंजय को वह पुत्र क्यों दिया? और जब उन दिनों मनुष्य हज़ार वर्ष जीते थे, तो वह शिशु-अवस्था में ही क्यों मरा?” कृष्ण ने कहा, “मैं जैसा हुआ वैसा सुनाता हूँ। नारद और पर्वत, दो श्रेष्ठ ऋषि हैं; नारद मामा हैं और पर्वत भानजे। दोनों स्वर्ग से पृथ्वी पर घूमने आए और यह प्रतिज्ञा की कि एक के मन में जो भी इच्छा, अच्छी या बुरी, उठे, वह दूसरे को बता दे; न बताए तो शापित हो।”

दोनों राजा सृंजय (सित्य-पुत्र) के यहाँ अतिथि बने। राजा ने अपनी सुन्दर कन्या सुकुमारी को उनकी सेवा में लगाया। उसकी सेवा और अनुपम सौन्दर्य से नारद के हृदय में प्रेम जाग उठा, जो शुक्ल पक्ष के चन्द्रमा-सा बढ़ने लगा। पर लज्जावश नारद ने यह बात भानजे पर्वत को न बताई। पर्वत ने अपने तप-बल और संकेतों से सब जान लिया, और प्रतिज्ञा-भंग के क्रोध में नारद को शाप दिया, “सुकुमारी निःसन्देह आपकी पत्नी बनेगी, पर विवाह के क्षण से वह और सब लोग आपको वानर-मुख देखेंगे।” क्रुद्ध नारद ने भी पलटकर शाप दिया, “आप तपस्वी, ब्रह्मचारी और धर्मनिष्ठ होकर भी स्वर्ग नहीं जा सकेंगे।”

नारद ने विधिपूर्वक सुकुमारी का पाणिग्रहण किया, पर अन्तिम विवाह-मन्त्र के साथ ही सुकुमारी ने उन्हें वानर-मुख देखा। फिर भी उस पतिव्रता ने पति का तिरस्कार न किया, अपना सम्पूर्ण प्रेम उन्हीं को समर्पित किया। बहुत समय बाद, एकान्त वन में पर्वत ने नारद से क्षमा माँगते हुए स्वर्ग जाने की अनुमति चाही। दोनों ने एक-दूसरे को शाप-मुक्त कर दिया। तब सुकुमारी ने पति को दिव्य, सौन्दर्य से दीप्त रूप में देखा, और उसे कोई दूसरा पुरुष समझकर भागने लगी। पर्वत ने उसे समझाया, “यही आपके पति हैं, वही तेजस्वी ऋषि नारद; आप सन्देह न कीजिए।” आश्वस्त होकर सुकुमारी ने धैर्य धारण किया। पर्वत स्वर्ग गए और नारद अपने घर। कृष्ण ने कहा, “वे ऋषि नारद, जो इस घटना के स्वयं भागीदार थे, यहीं उपस्थित हैं; आपके पूछने पर वे सब सुनाएँगे।” तब युधिष्ठिर ने नारद से उस स्वर्ण-मल वाले शिशु के जन्म की कथा सुनने की इच्छा प्रकट की, और नारद ने वह सम्पूर्ण वृत्तान्त सुनाना आरम्भ किया।

समझने की कुंजी: सुवर्णष्ठीवी वह जिसका मल स्वर्ण हो; सृंजय के पुत्र का यही असाधारण लक्षण था जिसने उसे लुटेरों का निशाना बनाया। पाणिग्रहण विवाह-संस्कार, वर का वधू का हाथ थामना।

सार: शान्ति पर्व का यह आरम्भिक भाग वस्तुतः राज-धर्म के विशाल उपदेश की भूमिका है। युधिष्ठिर का अपराध-बोध, भाइयों और द्रौपदी का दण्ड-नीति का समर्थन, व्यास का काल-दर्शन और सृंजय-आख्यान, ये सब मिलकर राजा को इस सत्य तक लाते हैं कि वैराग्य पलायन नहीं, अपितु अनासक्त रहकर शासन, यज्ञ और प्रजा-पालन करना ही क्षत्रिय का परम धर्म है। यही वह नींव है जिस पर आगे शर-शय्या पर लेटे भीष्म युधिष्ठिर को विस्तृत राज-धर्म का उपदेश देंगे।

सुवर्णष्ठीवी की कथा का अन्त, और नारद का अपना वचन

नारद जी ने श्रीकृष्ण के कहे का सूत्र अपने मुँह से पूरा करते हुए कहा, “हे राजन्, जिस बालक की विष्ठा सोने की होती थी, उसे मैं आपको लौटा दूँगा। पर्वत ने जिसे सृंजय को दिया था और जिसके प्राण छूट गए थे, वह सुवर्णष्ठीवी (जिसका थूक तक सोने का हो) सहस्र वर्ष तक स्वर्ण की कान्ति धारण करेगा।”

युधिष्ठिर जी ने पूछा, “सृंजय का पुत्र सुवर्णष्ठीवी कैसे हुआ? पर्वत ने उन्हें वह बालक क्यों दिया? और वह क्यों मरा? जब उन दिनों समस्त मनुष्यों की आयु सहस्र वर्ष की होती थी, तब सृंजय का पुत्र बाल्यावस्था में ही क्यों चल बसा? वह केवल नाम से सुवर्णष्ठीवी था, या सचमुच ऐसा था? यह सब हम जानना चाहते हैं।”

श्रीकृष्ण ने उत्तर दिया, “हे राजन्, जैसा हुआ था वैसा ही कह सुनाता हूँ। संसार में दो परम ऋषि हैं, नारद और पर्वत। नारद मामा हैं और पर्वत उनकी बहन के पुत्र, अर्थात् भानजे। प्रसन्न-हृदय वे दोनों, घृत और चावल का स्वाद चखने की इच्छा से, प्राचीन काल में स्वर्ग छोड़ पृथ्वी पर विचरण करने आए। दोनों के बीच यह सन्धि (आपसी प्रतिज्ञा) हुई कि जो भी इच्छा, भली हो या बुरी, एक के मन में उठे, उसे वह दूसरे को बता दे; जो ऐसा न करे, वह दूसरे के शाप का भागी होगा। इस समझौते पर वे राजा सृंजय के पास, जो सित्य के पुत्र थे, पहुँचे और बोले, ‘आपके कल्याण के लिए हम कुछ दिन आपके साथ रहेंगे। हे पृथ्वीपति, आप हमारी सब आवश्यकताओं का विधिवत् ध्यान रखिए।’ राजा ने ‘ऐसा ही हो’ कहकर उनकी आतिथ्य-सेवा में स्वयं को लगा दिया।”

“एक दिन राजा ने अपनी अति सुन्दर कन्या को उन ऋषियों के सम्मुख लाकर कहा, ‘यह मेरी पुत्री आप दोनों की सेवा करेगी। कमल के केसर-सी आभा वाली, सुन्दर अंगों वाली, गुणवती और मधुर स्वभाव की, यह सुकुमारी नाम से पुकारी जाती है।’ ऋषियों ने ‘बहुत अच्छा’ कहा। राजा ने पुत्री से कहा, ‘हे बच्ची, इन दोनों ब्राह्मणों की सेवा वैसे ही करना जैसे देवताओं या अपने पिता की।’ सती राजकुमारी पिता की आज्ञा मानकर सेवा में लग गई। उसकी सेवा और अनुपम सौन्दर्य ने शीघ्र ही नारद के मन में उसके प्रति कोमल अनुराग जगा दिया। वह भाव शुक्ल पक्ष के चन्द्रमा-सा उनके हृदय में बढ़ता गया। पर लज्जा से भरे नारद यह जलता हुआ अनुराग अपने भानजे पर्वत को न बता सके।

“अपने तप-बल और संकेतों से पर्वत ने सब समझ लिया। क्रोध से भरकर उन्होंने प्रेम-पीड़ित नारद को शाप देने का निश्चय किया, और कहा, ‘आपने स्वयं मेरे साथ यह सन्धि की थी कि जो भी इच्छा हममें से किसी के मन में उठे वह दूसरे को बता दी जाए। आपने उसे तोड़ा है। आपने मुझसे यह नहीं कहा कि सुकुमारी के रूप ने आपका हृदय बेध दिया है। इसी कारण मैं आपको शाप दूँगा। आप ब्रह्मचारी हैं, मेरे गुरु हैं, तपस्वी और ब्राह्मण हैं, फिर भी आपने सन्धि भंग की। सुनिए, यह सुकुमारी निःसन्देह आपकी पत्नी होगी, परन्तु विवाह के समय से वह तथा समस्त लोग आपको वानर के रूप में देखेंगे; आपका असली रूप लुप्त हो जाएगा।’

“यह सुनकर नारद ने भी क्रोध में आकर भानजे को शाप दिया, ‘यद्यपि आपमें तप, ब्रह्मचर्य, सत्य और संयम है, और आप सदा धर्म में लीन हैं, तो भी आप स्वर्ग नहीं जा सकेंगे।’ दो मतवाले हाथियों की भाँति वे परस्पर शाप देकर तप गए। तब से पर्वत अपने तेज से सम्मानित होकर पृथ्वी पर विचरने लगे, और नारद ने विधिपूर्वक सुकुमारी का पाणिग्रहण किया। पर राजकुमारी ने नारद को ठीक वैसा ही देखा जैसा शाप ने कहा था; विवाह-मन्त्रों का अन्तिम पद उच्चारित होते ही उसे नारद का मुख वानर-सा दिखा। फिर भी उसने पति की अवहेलना नहीं की, अपना सारा प्रेम उन्हीं को समर्पित किया, और देवताओं, मुनियों या यक्षों में से किसी अन्य को मन से भी पति रूप में नहीं चाहा।

“एक दिन विचरते हुए पर्वत ने एकान्त वन में नारद को देखा। प्रणाम कर वे बोले, ‘हे प्रभु, मुझ पर अनुग्रह कीजिए और स्वर्ग जाने की अनुमति दीजिए।’ हाथ जोड़े उदास खड़े पर्वत को देखकर नारद, जो स्वयं भी उदास थे, बोले, ‘पहले आपने मुझे शाप दिया था कि वानर हो जाइए। तब क्रोध में मैंने आपको शाप दिया कि आज से आप स्वर्ग में न रहेंगे। यह उचित न था, क्योंकि आप तो मेरे पुत्र समान हैं।’ दोनों ने परस्पर शापों से एक-दूसरे को मुक्त कर दिया। तब अपने पति को दिव्य रूप और सौन्दर्य से दीप्त देखकर सुकुमारी, उन्हें कोई अन्य समझकर, भाग चली। पर्वत ने पुकारकर कहा, ‘यही आपके पति हैं, शंका न कीजिए। ये वही तेजस्वी ऋषि नारद हैं, आपके प्राण-समान स्वामी; सन्देह न रखिए।’ अनेक प्रकार से समझाए जाने पर और शाप का स्मरण आने पर राजकुमारी शान्त हुई। तब पर्वत स्वर्ग को गए और नारद अपने धाम को।”

श्रीकृष्ण ने आगे कहा, “जो ऋषि स्वयं इस घटना के साक्षी और अभिनेता थे, वे नारद यहीं उपस्थित हैं। हे श्रेष्ठ पुरुष, आपके पूछने पर वे सब कुछ कह देंगे।”

तब युधिष्ठिर जी ने नारद से कहा, “हे पवित्रात्मन्, जिस बालक का मल सोना था, उसके जन्म की कथा हम सुनना चाहते हैं।” नारद बोले, “जैसा केशव ने कहा, वैसा ही है। शेष भाग मैं सुनाता हूँ। मैं और मेरी बहन के पुत्र पर्वत, सृंजय के यहाँ रहने आए। वर्षा-ऋतु बीतने पर जब हमारे लौटने का समय आया, तब पर्वत ने कहा, ‘इस राजा ने हमारा बड़ा सम्मान किया है; सोचिए, हम क्या प्रत्युपकार करें।’ मैंने कहा, ‘हे भानजे, यह सब आप पर निर्भर है; अपने वरदान से राजा को सुखी कीजिए।’

“तब पर्वत ने राजा सृंजय को बुलाकर कहा, ‘हे राजन्, हम आपकी सेवा से अत्यन्त प्रसन्न हैं। ऐसा वर माँगिए जिसमें देवताओं से शत्रुता या मनुष्यों का विनाश न हो।’ सृंजय ने कहा, ‘यदि आप प्रसन्न हैं तो मेरा प्रयोजन सिद्ध हुआ; यही मेरी परम प्राप्ति और समस्त कामनाओं की पूर्ति है।’ पर्वत ने आग्रह किया, ‘जो इच्छा आप चिरकाल से हृदय में रखते हैं, उसे माँगिए।’ तब राजा बोले, ‘मुझे ऐसा पुत्र चाहिए जो वीर, महातेजस्वी, व्रत में दृढ़, दीर्घायु, और देवराज इन्द्र के समान कान्ति वाला हो।’

“पर्वत ने कहा, ‘यह कामना पूर्ण होगी, परन्तु आपका पुत्र दीर्घायु न होगा, क्योंकि आप तो देवराज से भी बढ़कर पुत्र चाहते हैं। वह सुवर्णष्ठीवी नाम से जाना जाएगा, इन्द्र-सी कान्ति वाला होगा; पर उसे सदा उस देवता से बचाए रखना।’ सृंजय ने विनती की, ‘हे मुनि, अपने तप से उसे दीर्घायु कीजिए।’ पर पर्वत इन्द्र के प्रति पक्षपात से मौन रहे। राजा को निराश देख मैंने कहा, ‘हे राजन्, संकट में मेरा स्मरण करना, मैं आ जाऊँगा। शोक न करिए; मरा हुआ भी हो तो आपका पुत्र जीवित रूप में लौटा दूँगा।’ ऐसा कहकर हम दोनों चले गए, और सृंजय अपने धाम लौट आए।

“कुछ काल बाद राजा को तेजस्वी पुत्र हुआ, जो सरोवर के विशाल कमल-सा बढ़ता गया और नाम के अनुरूप सचमुच सुवर्णष्ठीवी हुआ। यह बात संसार में फैल गई। देवराज इन्द्र ने भी जाना। अपमान के भय से उन्होंने अपने वज्र को साकार रूप में बुलाकर आदेश दिया, ‘व्याघ्र का रूप धरकर इस राजकुमार का वध कर दे, अन्यथा बड़ा होकर यह मुझे नीचा दिखाएगा।’ वज्र उस दिन से बालक के छिद्र (दोष या असावधानी का अवसर) ढूँढ़ने लगा।

“सृंजय अपने पुत्र को पाकर आनन्दित थे। एक दिन भागीरथी (गंगा) के तट पर पाँच वर्ष का वह बालक, धाय के साथ, खेलता हुआ इधर-उधर दौड़ रहा था; उसका पराक्रम महान् गज-सा था। तभी अकस्मात् एक बलवान् व्याघ्र आ पड़ा। बालक काँपता हुआ धरती पर निष्प्राण गिर पड़ा। धाय ने ऊँचा क्रन्दन किया। इन्द्र की माया से वह व्याघ्र वहीं अन्तर्धान हो गया। राजा दौड़े आए और पुत्र को रक्त-रहित, आकाश से गिरे चन्द्रमा-सा भूमि पर पड़ा देखा। रक्त-सने बालक को गोद में लेकर वे विलाप करने लगे। रानियाँ भी रोती हुई दौड़ी आईं। उस दशा में राजा ने एकाग्र मन से मेरा स्मरण किया। मैं प्रकट हो गया, और शोक-संतप्त राजा को वे ही कथाएँ सुनाईं जो यदुवंशी कृष्ण ने आपको सुनाई हैं। इन्द्र की अनुमति से मैंने बालक को जीवित किया। जो विधि में बँधा है, वह होकर ही रहता है; अन्यथा नहीं हो सकता।

“तत्पश्चात् सुवर्णष्ठीवी ने माता-पिता को आनन्दित किया, पिता के स्वर्गारोहण के बाद सिंहासन पर बैठा, और ग्यारह सौ वर्ष राज्य किया। उसने अनेक महायज्ञ किए, देवताओं और पितरों को तृप्त किया, अनेक पुत्र उत्पन्न किए, और अन्ततः प्रकृति के मार्ग को प्राप्त हुआ। अतः हे राजन्, यह शोक छोड़िए, उठिए, इस पैतृक राज्य का भार उठाइए, और महान् यज्ञ कीजिए, जिससे आप मनचाहे लोकों को पाएँ।”

समझने की कुंजी (सन्धि): “सन्धि” यहाँ राजनैतिक अर्थ में नहीं आई; यह दो ऋषियों के बीच की निजी प्रतिज्ञा है (मन की हर इच्छा एक-दूसरे को बताना)। इसी का भंग शाप का बीज बनता है। शान्ति पर्व आगे “सन्धि” को राजनीति की एक सन्धि-विग्रह नीति के रूप में भी बरतेगा, इसलिए शब्द का यह दोहरा प्रयोग ध्यान रखिए।

सार: भीष्म के मुख्य उपदेश से पहले व्यास और कृष्ण युधिष्ठिर का शोक हरने के लिए दृष्टान्त-कथाएँ कहते हैं। नारद-पर्वत और सृंजय के पुत्र की कथा का मर्म यही है, कि “जो विधि में बँधा है वह होकर रहता है”; पुत्र-वध और पुनर्जीवन दोनों नियति के अधीन। यह कथा शोक को “कर्म बनाम नियति” के बड़े प्रश्न की ओर मोड़ती है, जिसे आगे व्यास खोलेंगे।

व्यास का प्रश्न: कर्ता कौन है, ईश्वर, मनुष्य, या काल?

शोक में डूबे, मौन युधिष्ठिर से द्वीप में उत्पन्न व्यास जी ने फिर कहा, “हे कमलनयन, प्रजा की रक्षा राजा का धर्म है। जो सदा कर्तव्यपरायण हैं वे धर्म को ही सर्वोपरि मानते हैं। आप अपने पूर्वजों के मार्ग पर चलिए। ब्राह्मणों का धर्म तप है, यह वेदों का सनातन विधान है। क्षत्रिय समस्त वर्णों का उनके धर्म में रक्षक है। जो लोभवश उचित मर्यादा का उल्लंघन करता है, सामाजिक सामंजस्य का वह अपराधी, चाहे सेवक हो, पुत्र हो, या साधु हो, दण्ड के योग्य है, और वध के भी। जो राजा ऐसा नहीं करता वह पाप का भागी होता है। धर्म जब रौंदा जा रहा हो और जो उसकी रक्षा न करे, वह स्वयं धर्म का अपराधी है। कौरव धर्म के अपराधी थे; आपने उन्हें उनके अनुचरों सहित मारा। आपने अपने वर्ण-धर्म का पालन किया है। फिर हे पाण्डुनन्दन, ऐसा शोक क्यों?”

युधिष्ठिर बोले, “हे महातपस्वी, आपके वचनों में मुझे सन्देह नहीं। धर्म और कर्तव्य का सब कुछ आप जानते हैं। पर राज्य के लिए मैंने अनेक प्राणियों का वध करवाया है। वे कर्म, हे ब्राह्मण, मुझे जलाते हैं, भस्म करते हैं।”

व्यास ने तब कर्म और नियति का गहन प्रश्न खोला, “हे भारत, कर्ता परमेश्वर है या मनुष्य? संसार में सब कुछ संयोग का फल है, या जिन फलों को हम भोगते-सहते हैं वे पूर्व-कर्म के परिणाम हैं? यदि मनुष्य परमेश्वर की प्रेरणा से ही सब कर्म करता है, तो उन कर्मों का फल परमेश्वर को ही लगना चाहिए। यदि कोई कुल्हाड़ी से वन में वृक्ष काटे, तो पाप उस व्यक्ति को लगता है, कुल्हाड़ी को नहीं। और यदि कहें कि कुल्हाड़ी तो केवल साधन है, तो फिर वह दोष कुल्हाड़ी बनाने वाले को लगे, यह भी ठीक नहीं। यदि यह उचित नहीं कि एक के किए का फल दूसरे को मिले, तो इसी न्याय से समस्त उत्तरदायित्व परमेश्वर पर मत डालिए।

“फिर यदि मनुष्य ही अपने समस्त शुभ-अशुभ कर्मों का कर्ता है, तो कोई परम नियन्ता है ही नहीं, और तब आपका किया हुआ आप पर बुरा फल ला ही नहीं सकता। नियति से कोई मुड़ नहीं सकता। और यदि नियति पूर्व-जन्मों के कर्मों का फल है, तो इस जीवन में कोई पाप नहीं लगता, जैसे वृक्ष काटने का पाप कुल्हाड़ी-निर्माता को नहीं लगता। और यदि आप मानें कि केवल संयोग ही संसार में काम करता है, तो ऐसा संहार न कभी हुआ होता, न होगा।

“शुभ-अशुभ का निर्णय करना हो तो शास्त्र की ओर देखिए। शास्त्रों में कहा है कि राजाओं को दण्ड (चास्तित्व का डंडा) उठाए खड़े रहना चाहिए। मेरा मत है कि शुभ-अशुभ कर्म यहाँ चक्र-सा घूमते रहते हैं, और मनुष्य अपने किए का फल पाते हैं। एक पाप से दूसरा पाप जन्म लेता है। इसलिए, हे नृपश्रेष्ठ, समस्त बुरे कर्मों से बचिए, और शोक में हृदय मत लगाइए। अपने वर्ण-धर्म का पालन कीजिए, भले ही वह निन्दनीय जान पड़े। यह आत्म-विनाश आप पर शोभा नहीं देता। पापों के लिए प्रायश्चित्त (शुद्धि के विहित कर्म) ठहराए गए हैं; जो जीवित है वही उन्हें कर सकता है, मरने वाला नहीं। इसलिए प्राण त्यागे बिना वे प्रायश्चित्त कीजिए, अन्यथा परलोक में पछताना पड़े।”

समझने की कुंजी (दण्ड): “दण्ड” का अर्थ केवल “सज़ा” नहीं। यह राजशक्ति का वह प्रतीक-डंडा है जिससे राजा अराजकता रोकता है, और आगे की समूची दण्ड-नीति (न्याय-व्यवस्था) इसी शब्द से उपजती है। व्यास इसे यहाँ शास्त्र-सम्मत राजकर्तव्य के रूप में रखते हैं, ताकि युधिष्ठिर का “वध” व्यक्तिगत पाप न मानकर राज-धर्म दिखे।

सार: व्यास कर्तृत्व के चार पक्ष (ईश्वर-कर्ता, मनुष्य-कर्ता, पूर्व-कर्म, संयोग) रखकर दिखाते हैं कि किसी भी पक्ष में युधिष्ठिर पर सीधा पाप टिकता नहीं; फिर भी अन्त में व्यावहारिक मार्ग देते हैं, जीवित रहकर प्रायश्चित्त करो। यह तर्क महाभारत की नैतिक जटिलता का केन्द्र है, यह शोक को न झूठा ठहराता है, न पूरी तरह बरी करता है।

काल ही संहारक है, और देवासुर-संग्राम का दृष्टान्त

युधिष्ठिर ने अपना शोक और गहरा खोला, “हे पितामह, पुत्र, पौत्र, भाई, पितर, श्वसुर, गुरु, मामा, पितामह, अनेक महात्मा क्षत्रिय, सम्बन्धी, मित्र, सखा, भानजे, और भिन्न-भिन्न देशों से आए श्रेष्ठ पुरुष, सब गिर पड़े। इन सबका वध मैंने अकेले, राज्य की कामना से, करवाया है। जिन वीर राजाओं ने यज्ञों में सोम-पान किया था, उन्हें मरवाकर मुझे कौन सी गति मिलेगी? पृथ्वी अनेक सिंह-समान राजाओं से रिक्त हुई, यह सोचकर मैं जलता हूँ। और उन स्त्रियों की क्या दशा होगी जो पुत्र, पति, भाई से वंचित हुईं? पाण्डवों और वृष्णियों को निर्दय हत्यारा कहकर वे शोक में धरती पर गिरेंगी, प्राण त्यागकर यम के धाम जाएँगी। हम स्त्री-वध के पाप से लिप्त होंगे। बन्धु-मित्रों को मारकर हमने अक्षम्य पाप किया है; हमें सिर के बल नरक में गिरना पड़ेगा। इसलिए हम कठोरतम तप से अपने अंग गलाएँगे। हे पितामह, बताइए, मैं किस जीवन-मार्ग को अपनाऊँ?”

व्यास जी कुछ क्षण मनन कर बोले, “हे राजन्, क्षत्रिय-धर्म का स्मरण कर शोक मत कीजिए। वे सब क्षत्रिय अपने धर्म के पालन में गिरे हैं। महान् सम्पत्ति और यश की खोज में वे पुरुष, जो सभी मरणधर्मा थे, काल के प्रभाव से नष्ट हुए। न आप उनके हन्ता हैं, न भीम, न अर्जुन, न नकुल-सहदेव। काल ने ही महान् परिवर्तन-नियम के अनुसार उनके प्राण लिए। काल का न माता है, न पिता, न कोई जिस पर वह अनुग्रह करे। वह समस्त प्राणियों के कर्मों का साक्षी है। यह युद्ध तो काल का ठहराया हुआ अवसर मात्र था। वह प्राणियों के द्वारा ही प्राणियों का संहार करवाता है, यही उसकी अप्रतिरोध्य शक्ति का ढंग है।

“जैसे लोहार या बढ़ई का बनाया शस्त्र चलाने वाले के वश में रहता है और उसी की गति से चलता है, वैसे ही यह सम्पूर्ण विश्व काल में किए गए कर्मों के वश चलता है। प्राणियों के जन्म-मृत्यु बिना किसी प्रकट कारण के होते दिखें, तो भी शोक और हर्ष दोनों व्यर्थ हैं। यदि फिर भी आपका मन माने, तो प्रायश्चित्त कीजिए।

“सुना गया है कि देवताओं और असुरों में युद्ध हुआ। असुर बड़े भाई थे, देव छोटे। समृद्धि के लोभ में बत्तीस हज़ार वर्ष तक भयंकर युद्ध चला। पृथ्वी को रक्त का एक विस्तार बनाकर देवताओं ने दैत्यों को मारा और स्वर्ग पाया। फिर कुछ वेदज्ञ ब्राह्मण, अभिमान से मतवाले होकर, दानवों की ओर से लड़ने लगे; वे शालावृक नाम से जाने जाते थे और अट्ठासी हज़ार थे। उन सबको देवताओं ने मारा। जो दुष्ट धर्म का विनाश और पाप का प्रचार चाहते हैं, वे उन उन्मत्त दैत्यों की भाँति वध-योग्य हैं। यदि एक व्यक्ति को मारने से कुल बचे, या एक कुल को मारने से समस्त राज्य बचे, तो वह संहार अपराध नहीं। पाप कभी धर्म का रूप ले लेता है और धर्म कभी पाप का; जो विद्वान् हैं, वे जानते हैं कौन क्या है।

“आप तो वही मार्ग चले हैं जिस पर पहले स्वयं देवता चले। आप-जैसे पुरुष नरक नहीं जाते। जो जान-बूझकर पाप करता है, पाप कर भी लज्जित नहीं होता, और पहले-सा बना रहता है, वही महापापी कहलाता है; उसके पाप का प्रायश्चित्त नहीं। पर आप तो उत्तम कुल में जन्मे हैं; दूसरों के दोषों से विवश होकर, अनिच्छा से, आपने यह किया, और कर के पछता रहे हैं। आपके लिए अश्वमेध (वह महान् यज्ञ जिसमें राजा अश्व छोड़कर अपना प्रभुत्व सिद्ध करता है) ही प्रायश्चित्त बताया गया है। उसकी तैयारी कीजिए और पापमुक्त हो जाइए। इन्द्र ने भी मरुतों की सहायता से शत्रुओं को जीतकर सौ यज्ञ किए और शतक्रतु कहलाए, पापमुक्त होकर स्वर्ग और अनेक सुखद लोक पाए।

“अपने मित्रों सहित उन राजाओं के राज्यों में जाकर उनके भाइयों, पुत्रों या पौत्रों को सिंहासन पर बिठाइए। गर्भस्थ शिशुओं तक के प्रति दयालु रहकर प्रजा को प्रसन्न कीजिए। जिनके पुत्र नहीं, उनकी कन्याओं को राजगद्दी दीजिए। इस प्रकार समूचे साम्राज्य को आश्वस्त कर, इन्द्र की भाँति अश्वमेध कीजिए। उन क्षत्रियों के लिए शोक उचित नहीं जो विनाशक की शक्ति से, अपने वर्ण-धर्म के पालन में गिरे। आपने क्षत्रिय-धर्म निभाया और काँटे-रहित (निष्कण्टक) पृथ्वी पाई। अपना धर्म पालिए, तभी परलोक में सुख पाएँगे।”

एक उप-कथा: देवासुर-संग्राम में शालावृक नामक अट्ठासी हज़ार ब्राह्मण-योद्धा दानवों के पक्ष में लड़े। वेदज्ञ होकर भी, अभिमान से मतवाले होकर, धर्म के विरुद्ध खड़े हुए, इसलिए देवताओं ने उन्हें मार डाला। व्यास इसे इसलिए लाते हैं कि “ब्राह्मण-वध सदा पाप नहीं”; जब कोई वर्ण भी अधर्म के पक्ष में अस्त्र उठाए, तब उसका वध भी धर्म-संगत हो सकता है। यह महाभारत की वही असुविधाजनक नैतिकता है जिसे यह कथा सपाट नहीं करती।

सार: व्यास का दूसरा सूत्र, “काल ही कर्ता है”। योद्धा तो काल के हाथ का शस्त्र मात्र हैं। इसके साथ ही व्यास एक तीखा नीति-वाक्य देते हैं, “एक को मारकर कुल बचे, कुल को मारकर राज्य बचे, तो वह वध अपराध नहीं”, और “पाप कभी धर्म का रूप धरता है”। अश्वमेध और पराजितों के वंश को राजगद्दी देने का व्यावहारिक मार्ग भी यहीं रखा जाता है।

कौन-से कर्म प्रायश्चित्त माँगते हैं, और कब वे ही कर्म पाप नहीं रहते

युधिष्ठिर ने पूछा, “हे पितामह, कौन-से कर्म करने पर मनुष्य प्रायश्चित्त का अधिकारी होता है? और किन कर्मों से वह पाप-मुक्त होता है?” व्यास ने उत्तर दिया, “विहित कर्म छोड़कर, निषिद्ध कर्म करके, और कपट से बरतकर मनुष्य प्रायश्चित्त का भागी होता है।” फिर उन्होंने उन कर्मों की लम्बी सूची दी, ब्रह्मचर्य-व्रती जो सूर्योदय के बाद उठे या सूर्यास्त के समय सोए; जिसका छोटा भाई पहले विवाह कर ले, या जो बड़े भाई से पहले विवाह करे; ब्रह्म-हत्या करने वाला; दूसरों की निन्दा करने वाला; जो योग्य को वेद-ज्ञान न दे, अयोग्य को दे; जो अनेक प्राण हरे; मांस बेचने वाला; अग्नि-त्यागी; वेद बेचने वाला; गुरु या स्त्री का वध करने वाला; घर में आग लगाने वाला; कपट से जीने वाला; गुरु के विरुद्ध आचरण करने वाला; और सन्धि-भंग करने वाला, ये सब पाप-प्रायश्चित्त के योग्य हैं।

“फिर कुछ और निषिद्ध कर्म, अपने धर्म का त्याग और दूसरे का धर्म अपनाना; अयोग्य के यज्ञ में सहायता; निषिद्ध भोजन; शरणागत का परित्याग; आश्रित-सेवकों का पालन न करना; नमक-गुड़ बेचना; पक्षी-पशु मारना; याचना करती स्त्री से समर्थ होते हुए विमुख रहना; दैनिक दान (गौओं को मुट्ठी-भर घास आदि) का लोप; दक्षिणा न देना; ब्राह्मण का अपमान, ये सब वर्जित कहे गए हैं। जो पुत्र पिता से कलह करे, जो गुरु-शय्या का उल्लंघन करे, जो विवाहिता पत्नी में सन्तान उत्पन्न न करे, सब पापी हैं।

“अब सुनिए वे परिस्थितियाँ जिनमें ये ही कर्म करके भी मनुष्य पाप-लिप्त नहीं होता। यदि वेदज्ञ ब्राह्मण भी अस्त्र उठाकर आपको मारने युद्ध में दौड़े, तो आप उसके प्राण ले सकते हैं; ऐसा करने से ब्रह्म-हत्या का दोष नहीं लगता, क्योंकि तब हन्ता का क्रोध मारे जाने वाले के क्रोध के विरुद्ध जाता है। यह वेद-मन्त्र-सम्मत है। मद्य अनजाने में, या धर्मात्मा वैद्य की सलाह से प्राण-संकट में पीने पर, पुनः संस्कार से शुद्धि हो जाती है। गुरु की आज्ञा से गुरुपत्नी से सम्बन्ध शिष्य को कलंकित नहीं करता; ऋषि उद्दालक ने अपने पुत्र श्वेतकेतु को एक शिष्य द्वारा उत्पन्न कराया था। संकट-काल में गुरु के लिए चोरी करने वाला, यदि स्वयं उसमें से कुछ न ले, पाप-लिप्त नहीं होता। प्राण-रक्षा के लिए, किसी अन्य की रक्षा के लिए, गुरु के लिए, स्त्री को प्रसन्न करने के लिए, या विवाह कराने के लिए असत्य बोला जा सकता है।

“बड़ा भाई पतित हो या संन्यासी हो जाए, तो छोटा भाई विवाह करके पाप नहीं करता। स्त्री द्वारा याचना करने पर सम्बन्ध धर्म-विरुद्ध नहीं। यज्ञ को छोड़ किसी पशु का वध न करे, न करवाए, क्योंकि स्रष्टा ने अपने विधान में पशुओं को यज्ञ-योग्य बनाकर उन पर अनुग्रह किया है। अनजाने में अपात्र को दान देने से, या अज्ञानवश पात्र को न देने से पाप नहीं लगता। व्यभिचारिणी पत्नी को त्यागकर पुरुष पाप नहीं करता; इस आचरण से स्त्री शुद्ध हो सकती है और पति दोष से बच जाता है। जो सोम-रस का सच्चा उपयोग जानता है, उसे बेचकर पाप-लिप्त नहीं होता। अयोग्य सेवक को सेवामुक्त करने से दोष नहीं। ये वे कर्म हैं जिनसे मनुष्य पाप-लिप्त नहीं होता।”

समझने की कुंजी (प्रायश्चित्त): “प्रायश्चित्त” वे विहित शुद्धि-कर्म हैं जिनसे किया हुआ पाप धुलता है, जैसे व्रत, तप, दान, तीर्थ, यज्ञ। महाभारत इसे यान्त्रिक दण्ड-संहिता-सा नहीं रखता; यह देश-काल-पात्र पर निर्भर है, इसीलिए “एक ही कर्म” किसी स्थिति में पाप है और किसी में नहीं। यह नैतिकता की सापेक्षता न होकर सन्दर्भ-संवेदी धर्म है।

सार: व्यास पहले पाप-कर्मों की सूची देते हैं, फिर उन्हीं कर्मों के वे अपवाद गिनाते हैं जहाँ नियत (आक्रामक ब्राह्मण-वध, प्राण-रक्षा का असत्य, गुरु-आज्ञा) पाप नहीं रहती। यह उद्दालक-श्वेतकेतु जैसे असुविधाजनक प्रसंगों को भी बिना नरमी के रखता है। मर्म, धर्म का निर्णय सन्दर्भ देखकर होता है, सूची देखकर नहीं।

प्रायश्चित्तों का विस्तार, और मनु का शुद्ध-अशुद्ध अन्न का उपदेश

व्यास ने प्रायश्चित्तों को विस्तार से बताया, “तप, धार्मिक कर्म और दान से मनुष्य पाप धो सकता है, यदि वह उसे फिर न दोहराए। ब्रह्म-हत्या से शुद्ध होने के लिए, बारह वर्ष तक केवल भिक्षा से एक समय भोजन करे, अपने सब कार्य स्वयं करे, एक हाथ में नर-कपाल और दूसरे में खट्वांग लेकर भिक्षाटन करे, ब्रह्मचारी रहे, द्वेष त्यागे, भूमि पर सोए, और अपना अपराध संसार में प्रकट करे। अथवा शास्त्रज्ञों की सलाह से शस्त्रजीवी के शस्त्र पर स्वेच्छा से प्राण दे; या तीन बार सिर के बल जलती आग में कूदे; या वेद-पाठ करते हुए सौ योजन चले; या अपनी समस्त सम्पत्ति वेदज्ञ ब्राह्मण को दे; या गौ-ब्राह्मण की रक्षा करे। अश्वमेध के अन्त में अवभृथ-स्नान करने वाला ब्रह्म-हत्यारा भी शुद्ध हो जाता है, यह श्रुति का प्रबल विधान है।

“लाख गौएँ दान करने से, अथवा ब्राह्मण के लिए युद्ध में प्राण देने से, मनुष्य ब्रह्म-हत्या और समस्त पापों से मुक्त होता है। जो मद्य पी चुका हो, यदि प्रायश्चित्त-रूप तप्त मद्य पी ले, वह यहाँ-परलोक दोनों में शुद्ध होता है। पर्वत-शिखर से गिरकर, अग्नि में प्रवेश कर, या संसार त्यागकर अनन्त यात्रा पर निकलकर भी मनुष्य पाप-मुक्त होता है। जो स्त्री एक वर्ष नियमित जीवन बिताए, वह समस्त पापों से शुद्ध होती है। स्त्रियों के मानसिक पाप उनके ऋतु-धर्म से वैसे ही धुल जाते हैं जैसे राख से माँजा धातु-पात्र।

“ब्राह्मण को परम धर्म अर्जित और आचरित करना चाहिए; क्षत्रिय को उससे चौथाई कम, वैश्य को उससे चौथाई कम, और शूद्र को उससे चौथाई कम। इसी अनुपात से चारों वर्णों के पापों का भारीपन या हल्कापन आँका जाए। पाप दो प्रकार के हैं, जान-बूझकर किए (गुरु अर्थात् भारी) और अनजाने किए (हल्के); दोनों के प्रायश्चित्त हैं। पर महापातकों (अत्यन्त घोर पापों) को छोड़ हर पाप का प्रायश्चित्त है। ये विधान केवल आस्तिकों और श्रद्धावानों के लिए हैं, नास्तिकों या अभिमान-द्वेष से भरे लोगों के लिए नहीं। अतः, हे राजन्, आप पापमुक्त हैं, क्योंकि आपने राजधर्म के पालन में, अपने प्राण और उत्तराधिकार की रक्षा में शत्रुओं को मारा। फिर भी यदि स्वयं को पापी मानें तो प्रायश्चित्त कीजिए, पर शोकवश प्राण मत त्यागिए।”

युधिष्ठिर ने आगे पूछा, “हे पितामह, कौन-सा अन्न शुद्ध है और कौन अशुद्ध, कौन-सा दान प्रशंसनीय है, और दान का पात्र कौन है और अपात्र कौन?” व्यास बोले, “इस विषय में प्राचीन प्रसंग कहा जाता है, ऋषियों और प्रजापति मनु का संवाद। कृत-युग में कठोर-व्रती ऋषियों ने मनु से पूछा, ‘क्या अन्न खाया जाए, कौन दान का पात्र है, कौन-से दान करें, कैसे अध्ययन-तप करें, कौन कर्म करें और कौन न करें?’ मनु ने उत्तर दिया, ‘सुनिए। अनिषिद्ध क्षेत्रों में मौन-जप, होम, उपवास, आत्म-ज्ञान, पवित्र नदियाँ, पुण्यात्माओं से बसे प्रदेश, ये शुद्धि के कर्म हैं। कुछ पर्वत भी शुद्धिकारक हैं, स्वर्ण-सेवन, और रत्नों में डुबोए जल में स्नान भी। तीर्थ-यात्रा और सुसंस्कृत घृत का सेवन शीघ्र शुद्ध करते हैं। जो अभिमान करे वह विद्वान् नहीं कहलाता; दीर्घायु चाहे तो तीन रात तप्त जल पिए (अभिमान का प्रायश्चित्त)।

“‘न दी हुई वस्तु न लेना, दान, अध्ययन, तप, अहिंसा, सत्य, क्रोध-त्याग, और यज्ञ में देवपूजन, ये धर्म के लक्षण हैं। पर जो धर्म है, वही देश-काल के अनुसार पाप बन सकता है; और परधन-ग्रहण, असत्य, हिंसा, वध भी विशेष परिस्थिति में धर्म बन सकते हैं। वैदिक दृष्टि से धर्म-अधर्म “कर्म” और “अकर्म” में बँटते हैं, अकर्म (वैदिक कर्मों से विरति, चिन्तन-जीवन) मोक्ष की ओर ले जाता है, और कर्म (वैदिक कर्मों का अभ्यास) पुनर्जन्म-मृत्यु की ओर। लौकिक दृष्टि से बुरे कर्म बुरे फल देते हैं और भले, भले फल। जो कर्म देखने में बुरे लगें पर देवता, शास्त्र, जीवन, और जीविका के विचार से किए जाएँ, उनके फल भले होते हैं।

“‘जब कोई राजा किसी स्थिति में दण्ड का डंडा नीचे रख दे (दण्ड न दे), तो एक रात उपवास करे। जो पुरोहित राजा को दण्ड की सलाह न दे, तीन रात उपवास करे। जो शोकवश शस्त्र से आत्म-हत्या का प्रयास करे, तीन रात उपवास करे। जो अपने वर्ण, देश, कुल के धर्म त्याग दे और अपना मत ही छोड़ दे, उसका प्रायश्चित्त नहीं। जब कर्तव्य में सन्देह उठे, तो दस वेदज्ञ, या तीन नित्य-वेद-पाठी जो कहें, उसे शास्त्र का आदेश मानें।

“‘बैल, पृथ्वी, चींटियाँ, मैल के कीड़े, और विष ब्राह्मण न खाएँ। बिना शल्क की मछली, कछुए को छोड़ चौपाए जलचर (मेंढक आदि), तीखे-लम्बे दाँत वाले मांसाहारी पशु, और भास, हंसक, चक्रवाक, कौआ, गिद्ध, बाज़, उल्लू आदि पक्षी न खाएँ। भेड़, गधी, ऊँटनी, अभी-ब्याई गाय, स्त्री और हिरणी का दूध न लें। नवप्रसूता स्त्री का पकाया, अज्ञात व्यक्ति का पकाया, और देवता को अर्पित किए बिना मांस-तिल-मिश्रित अन्न न लें। क्षत्रिय का भोजन तेज घटाता है, शूद्र का ब्रह्म-कान्ति मलिन करता है, सूदखोर का अन्न मल-तुल्य है, और वेश्या का अन्न वर्जित। गृहस्थ ब्राह्मण पहले देवता, ऋषि, अतिथि, पितर और गृह-देवताओं को तृप्त कर, फिर भोजन करे; ऐसा गृहस्थ संन्यासी-तुल्य पुण्य अर्जित करता है।

“‘कोई यश के लिए, भय से, या उपकारी को दान न करे। गायक-नर्तक, विदूषक, मतवाले, उन्मत्त, चोर, निन्दक, मूर्ख, अंगहीन, बौने, दुष्ट, और नीच-कुल में जन्मे को दान न दे। वेद-अज्ञ ब्राह्मण को दान न दे; केवल श्रोत्रिय (वेदज्ञ) को दे। अनुचित दान और अनुचित ग्रहण, दोनों दाता और ग्रहीता को हानि देते हैं; जैसे पत्थर के सहारे समुद्र पार करने वाला डूबता है, वैसे ही दोनों डूबते हैं। काठ का हाथी या चमड़े का मृग जैसा निरर्थक होता है, वैसे ही वेद-हीन ब्राह्मण; तीनों केवल नाम के हैं। ऐसे अपात्र को दिया दान निष्फल होता है। पर दया से किसी निर्धन, पीड़ित या रोगी को देना उचित है, यद्यपि उससे कोई आध्यात्मिक पुण्य की आशा न रखे। यही मनु का उपदेश था, जो सबको सुनना चाहिए।’”

समझने की कुंजी (कर्म और अकर्म): मनु यहाँ “कर्म” (वैदिक यज्ञ-कर्मों का अभ्यास) और “अकर्म” (उन कर्मों से विरति, ध्यान-प्रधान जीवन) में भेद करते हैं। उनके अनुसार कर्म पुनर्जन्म के चक्र में बाँधता है, और अकर्म मोक्ष की ओर ले जाता है। यह गीता के निष्काम-कर्म से भिन्न दृष्टि है, इसे उसी से मिलाने की भूल न करें; शान्ति पर्व अनेक मतों को साथ रखता है।

सार: व्यास ब्रह्म-हत्या तक के विशद प्रायश्चित्त गिनाते हैं (बारह-वर्षीय व्रत, अश्वमेध-स्नान, गो-दान, युद्ध में आत्म-त्याग), और चारों वर्णों के लिए धर्म का चौथाई-घटता अनुपात देते हैं। फिर मनु-संवाद के द्वारा शुद्ध-अशुद्ध अन्न और सुपात्र-कुपात्र दान का विस्तृत विधान। मूल सूत्र, धर्म देश-काल-सापेक्ष है, और अपात्र को दिया दान निष्फल।

व्यास का निर्देश: भीष्म से ही राजधर्म पूछो, और हस्तिनापुर-प्रवेश

युधिष्ठिर ने कहा, “हे पवित्रात्मन्, मैं राजाओं के और चारों वर्णों के धर्म विस्तार से सुनना चाहता हूँ; आपद्-काल में कैसा आचरण हो, और धर्म के मार्ग पर चलते हुए मैं संसार को कैसे जीतूँ। धर्म का आचरण और राज-कर्तव्यों का निर्वाह सदा परस्पर विरुद्ध जान पड़ते हैं; इन दोनों में मेल बैठाने के विचार से मेरा मन मूढ़ हो जाता है।”

तब व्यास ने नारद की ओर देखकर कहा, “हे राजन्, यदि आप धर्म और नीति पूरी तरह सुनना चाहते हैं, तो कुरुओं के वृद्ध पितामह भीष्म से पूछिए। गंगा के वे पुत्र समस्त धर्मों के ज्ञाता और सर्वज्ञ हैं। उन्होंने बृहस्पति आदि से राजधर्म, उशना (शुक्र) से उसकी व्याख्या-सहित नीति-शास्त्र, वसिष्ठ और भृगुवंशी च्यवन से समस्त वेद-वेदांग, सनत्कुमार से आध्यात्म, मार्कण्डेय से यतियों का धर्म, और राम (परशुराम) तथा इन्द्र से समस्त अस्त्र सीखे। यद्यपि वे मनुष्यों में जन्मे, उनकी मृत्यु उनके अपने अधीन है। उनके पास कुछ भी जानने योग्य अज्ञात नहीं। प्राण त्यागने से पूर्व उनके पास जाइए।”

युधिष्ठिर बोले, “हे ब्राह्मण, बन्धु-संहार करवाकर मैं सबका अपराधी और पृथ्वी का विनाशक हूँ। और जिन भीष्म ने सदा न्यायपूर्वक युद्ध किया, उन्हें मैंने ही छल के सहारे मरवाया; अब किस मुख से उनके पास धर्म पूछने जाऊँ?”

तब श्रीकृष्ण ने फिर समझाया, “ऐसा शोक का हठ आपको शोभा नहीं देता। व्यास जी ने जो कहा वही कीजिए। ये ब्राह्मण और आपके भाई आपके सम्मुख ग्रीष्म के अन्त में मेघ की प्रतीक्षा करते लोगों-सी याचना-दृष्टि से खड़े हैं। बचे हुए राजा और चारों वर्णों की प्रजा यहाँ है। इन ब्राह्मणों के, व्यास के आदेश के, हम-जैसे शुभचिन्तकों के, और द्रौपदी के अनुरोध पर, वही कीजिए जो हमें प्रिय और संसार के हितकर हो।”

श्वेत बैलों से जुते स्वर्ण रथ पर युधिष्ठिर हस्तिनापुर में प्रवेश करते; कृष्ण सारथी, नगरवासी और ऋषि स्वागत करते।

इन वचनों से कमलनयन राजा संसार के कल्याण के लिए आसन से उठे। उन्होंने शोक-चिन्ता त्याग दी, मन को शान्त किया, और आगे क्या करना है यह निश्चय किया। धृतराष्ट्र को आगे रखकर वे नगर-प्रवेश को चले। देवताओं और सहस्रों ब्राह्मणों की पूजा कर, सोलह श्वेत, शुभ-लक्षण बैलों से जुते, वेद-मन्त्रों से अभिमन्त्रित नवीन श्वेत रथ पर वे सोम-से सवार हुए। भीम ने बागडोर सँभाली; अर्जुन ने ऊपर श्वेत छत्र धारण किया, जो तारों-जड़े श्वेत मेघ-सा शोभित था; नकुल-सहदेव ने चँवर डुलाए। आभूषणों से सजे पाँचों भाई पंचमहाभूतों-से दिखे। पीछे एक श्वेत रथ पर युयुत्सु आए; कृष्ण सात्यकि-सहित अपने स्वर्ण-रथ पर, धृतराष्ट्र गान्धारी-सहित नर-वाहित यान पर सबके आगे, और कुरु-कुल की स्त्रियाँ, कुन्ती और द्रौपदी, विदुर के नेतृत्व में उत्तम वाहनों पर।

नगर सजाया गया था, फूलों के तोरण, असंख्य ध्वज, धूप की सुगन्ध, सुगन्धित चूर्ण और पुष्प, हर द्वार पर जल-भरे कलश, और श्रेष्ठ स्थानों पर खड़ी सुन्दरियाँ। नागरिक स्वागत को उमड़ पड़े। मण्डपों से स्त्रियों ने मृदु स्वर में राजा-भाइयों का यश गाया, और द्रौपदी की भी प्रशंसा की, “हे पांचाल-राजकुमारी, आप धन्य हैं, आपके आचरण और व्रत सफल हुए।” इस प्रकार सत्कारित होकर युधिष्ठिर हस्तिनापुर के राजभवन में प्रविष्ट हुए, गृह-देवताओं को पूजा, और ब्राह्मणों को रत्न, स्वर्ण, गौ, वस्त्र आदि दान दिए।

समझने की कुंजी (राजधर्म बनाम धर्म): युधिष्ठिर का असली संकट यही है, कि “धर्म” (नैतिकता) और “राजधर्म” (शासन-कर्तव्य) प्रायः टकराते हैं, राजा को दण्ड देना, युद्ध करना, छल भी सहना पड़ता है। शान्ति पर्व का सारा उपदेश इसी तनाव को सुलझाने का प्रयत्न है, और इसीलिए व्यास इसे भीष्म के सुपुर्द करते हैं, जो दोनों के संगम के ज्ञाता हैं।

सार: व्यास उपदेश का भार स्वयं न लेकर भीष्म की ओर मोड़ देते हैं, क्योंकि भीष्म ही धर्म और राजधर्म दोनों के परम ज्ञाता हैं और उनके पास सीमित समय है। युधिष्ठिर पहले भीष्म-वध की ग्लानि से हिचकते हैं, पर कृष्ण के समझाने पर सिंहासन की ओर बढ़ते हैं और हस्तिनापुर में प्रवेश करते हैं।

चार्वाक राक्षस का छल, और राज्याभिषेक

जब ब्राह्मण मौन हुए, तब चार्वाक नामक एक राक्षस, जो ब्राह्मण-वेश धरे, दुर्योधन का मित्र था, जप-माला, शिखा और त्रिदण्ड लिए संन्यासी के रूप में सहस्रों ब्राह्मणों के बीच निर्भय खड़ा हो गया। पाण्डवों का अनिष्ट चाहता वह, बिना किसी ब्राह्मण से पूछे, राजा से बोला, “ये सब ब्राह्मण मुझे अपना प्रवक्ता बनाकर कहते हैं, ‘धिक्कार है आपको! आप कुल-घातक दुष्ट राजा हैं। बन्धुओं और गुरुजनों का नाश कर अब आपको प्राण त्याग देना चाहिए।’”

यह सुनकर ब्राह्मण क्षुब्ध हो उठे और कोलाहल करने लगे। राजा युधिष्ठिर लज्जा और चिन्ता से मूक रह गए, और बोले, “मैं आप सबको प्रणाम कर विनती करता हूँ, मुझ पर प्रसन्न होइए। मुझे धिक्कारना उचित नहीं; मैं शीघ्र ही प्राण त्याग दूँगा।” तब ब्राह्मणों ने ऊँचे स्वर में कहा, “ये हमारे वचन नहीं! आपका कल्याण हो!” अपनी आध्यात्मिक दृष्टि से उन्होंने वक्ता का छद्म पहचाना और बोले, “यह दुर्योधन का मित्र राक्षस चार्वाक है, जिसने संन्यासी-वेश धरा है। हमने ऐसा कुछ नहीं कहा; आपकी यह चिन्ता दूर हो।” फिर रोष से भरकर ब्राह्मणों ने “हुँ” का उच्चार किया, और उस पाप-कर्मा राक्षस को उसी ध्वनि से वहीं भस्म कर दिया; इन्द्र के वज्र से झुलसे, अंकुर-सहित वृक्ष-सा वह गिर पड़ा।

तब श्रीकृष्ण ने इसका रहस्य खोला, “हे राजन्, ब्राह्मण सदा मेरे पूज्य हैं; वे पृथ्वी के देवता हैं, जिनकी वाणी में विष है पर जो शीघ्र प्रसन्न होते हैं। कृत-युग में इस चार्वाक ने बदरी में कठोर तप किया था। ब्रह्मा ने वर माँगने को कहा, तो उसने समस्त प्राणियों से अभय का वर माँगा। ब्रह्मा ने यह वर इस शर्त पर दिया कि वह ब्राह्मणों का अपराध करने से बचे। वर पाकर वह देवताओं को सताने लगा। पीड़ित देवता ब्रह्मा के पास गए। ब्रह्मा ने कहा, ‘मैंने इसके वध का उपाय रच रखा है। दुर्योधन नामक राजा होगा, जिसका यह मित्र बनेगा। उसके स्नेह में आकर यह ब्राह्मणों का अपमान करेगा, और वाणी-बल वाले ब्राह्मण क्रोध में इसे शाप देकर मार डालेंगे।’ वही चार्वाक आज ब्राह्मणों के शाप से निष्प्राण पड़ा है। अतः शोक न कीजिए; बन्धु क्षत्रिय-धर्म के पालन में गिरकर स्वर्ग गए। अब अपने कर्तव्य पर ध्यान दीजिए, प्रजा की रक्षा कीजिए, और ब्राह्मणों की पूजा कीजिए।”

शोक-मुक्त युधिष्ठिर पूर्वाभिमुख स्वर्ण-आसन पर बैठे; सात्यकि और वासुदेव सम्मुख, भीम और अर्जुन दोनों ओर, कुन्ती नकुल-सहदेव-सहित हाथीदाँत के श्वेत सिंहासन पर। विदुर, धौम्य, धृतराष्ट्र, युयुत्सु, सञ्जय और गान्धारी यथास्थान बैठे। पुरोहित धौम्य ने कृष्ण के अनुरोध पर पूर्व-उत्तर की ओर ढलती वेदी रची। सर्वतोभद्र नामक व्याघ्र-चर्म से ढके आसन पर द्रुपद-कन्या द्रौपदी-सहित युधिष्ठिर को बिठाकर, मन्त्रों से घृताहुति दी। फिर दशरथ-वंशी (राम के वंश के) ने पवित्र शंख उठाकर राजा के सिर पर अभिषेक-जल डाला; धृतराष्ट्र और प्रजा ने भी वैसा किया। पणव, आनक और दुन्दुभि बजे। राजा ने स्तुति करने वाले सहस्र वेदज्ञ ब्राह्मणों को सहस्र निष्क (स्वर्ण-मुद्राएँ) दिए, और बड़े राज्य के सिंहासन पर प्रतिष्ठित हुए।

एक उप-कथा: चार्वाक का वध संयोग नहीं था। कृत-युग में उसने ब्रह्मा से सर्व-प्राणियों से अभय का वर पाया था, पर एक शर्त छिपी थी, कि ब्राह्मणों को न छेड़े। ब्रह्मा ने पहले से ही उसकी मृत्यु का यन्त्र रच रखा था, दुर्योधन की मित्रता, ब्राह्मण-अपमान, और फिर ब्राह्मणों का शाप। यह दिखाता है कि महाभारत में वर भी जाल बन जाते हैं; अभय का वर भी अपने भीतर अपना अन्त लिए चलता है।

सार: चार्वाक-प्रसंग युधिष्ठिर की ग्लानि पर अन्तिम आघात था, जिसे ब्राह्मणों ने अपने “हुँ”-कार से तत्काल समाप्त कर दिया। कृष्ण इसके पीछे का पुराना ब्रह्मा-विधान खोलते हैं। तत्पश्चात् विधिवत् राज्याभिषेक होता है, और युधिष्ठिर औपचारिक रूप से सम्राट् बनते हैं।

युधिष्ठिर का प्रथम राज-प्रबन्ध, श्राद्ध, और कृष्ण की स्तुति

अभिषेक के बाद युधिष्ठिर ने हाथ जोड़कर कृष्ण की स्तुति की, “हे कृष्ण, आपकी कृपा, नीति, बल और बुद्धि से मुझे यह पैतृक राज्य मिला। आप एकमात्र परम तत्त्व कहे जाते हैं, समस्त उपासकों के आश्रय। आप विश्व के स्रष्टा, विश्व की आत्मा, और जिनसे यह विश्व उपजा। आप विष्णु, जिष्णु, हरि, कृष्ण और वैकुण्ठ हैं।” अनेक नामों और रूपों से कृष्ण की स्तुति कर युधिष्ठिर ने उन्हें प्रसन्न किया, और कृष्ण ने मधुर वचनों से उन्हें हर्षित किया।

राजा ने प्रजा को विदा किया। भीम को युवराज नियुक्त किया; विदुर को मन्त्रणा और राज्य की षड्विध आवश्यकताओं (सन्धि, विग्रह, यान, आसन, द्वैधीभाव, समाश्रय) की देखरेख सौंपी; सञ्जय को कोष का प्रधान अधीक्षक बनाया; नकुल को सेना का लेखा, भोजन-वेतन और प्रबन्ध; अर्जुन को शत्रु-सेनाओं के प्रतिरोध और दुष्ट-दमन का भार; धौम्य को नित्य देव-कार्य और ब्राह्मण-सेवा; और सहदेव को सदा अपने पास रखा, यह सोचकर कि वे ही उनकी रक्षा करें। विदुर और युयुत्सु को आदेश दिया कि वे धृतराष्ट्र की हर इच्छा का यत्न से पालन करें।

फिर युधिष्ठिर ने युद्ध में मारे गए हर बन्धु का श्राद्ध कराया। धृतराष्ट्र ने अपने पुत्रों के परलोक-हित के लिए दान दिए। युधिष्ठिर ने द्रौपदी-सहित द्रोण, कर्ण, धृष्टद्युम्न, अभिमन्यु, घटोत्कच, विराट, द्रुपद, और द्रौपदी के पाँच पुत्रों के निमित्त सहस्रों ब्राह्मणों को धन-रत्न-गौ-वस्त्र दिए। जिन राजाओं के कोई बन्धु-मित्र न बचे थे, उनका भी श्राद्ध कराया। अन्न-वितरण के गृह, जल-स्थान और तालाब उनके नाम पर बनवाए। इस प्रकार ऋण चुकाकर, निन्दा से बचकर, राजा सुखपूर्वक धर्म से प्रजा-पालन करने लगा। धृतराष्ट्र, गान्धारी, विदुर और सब कौरव-वृद्धों का यथापूर्व सम्मान किया, और युद्ध में पति-पुत्र खोई स्त्रियों, अनाथों, अन्धों और असहायों को अन्न-वस्त्र-आश्रय देकर सबकी रक्षा की।

उसने भाइयों को दुर्योधन, दुःशासन, दुर्मर्षण और दुर्मुख के भव्य प्रासाद धृतराष्ट्र की स्वीकृति से सौंपे, भीम को दुर्योधन का, अर्जुन को दुःशासन का, नकुल को दुर्मर्षण का, और सहदेव को दुर्मुख का। सात्यकि-सहित कृष्ण अर्जुन के भवन में ठहरे। प्रातः सब प्रसन्न-हृदय युधिष्ठिर के पास आए।

समझने की कुंजी (षड्विध राज्य-आवश्यकताएँ): “षाड्गुण्य” राजनीति के छह उपाय हैं, सन्धि (मेल), विग्रह (युद्ध), यान (चढ़ाई), आसन (तटस्थ रहना), द्वैधीभाव (दोहरी नीति), और समाश्रय (बलवान् की शरण)। यही आगे भीष्म के राजधर्म-उपदेश का व्यावहारिक ढाँचा है। आधुनिक समतुल्य, राज्य के परराष्ट्र, रक्षा, कोष, गुप्तचर और प्रशासन विभाग।

सार: सिंहासन पर बैठते ही युधिष्ठिर राजधर्म को क्रिया में उतारते हैं, भाइयों को विभाग सौंपना, श्राद्ध और दान से ऋण चुकाना, शत्रु-पक्ष के मृतकों तक का श्राद्ध, और विधवाओं-अनाथों का पालन। धृतराष्ट्र को पिता-तुल्य सम्मान, यह उपदेश से पहले का “जीवित राजधर्म” है।

कृष्ण की समाधि का रहस्य: भीष्म का स्मरण

दूसरे दिन युधिष्ठिर ने हाथ जोड़कर कृष्ण से पूछा, “हे अमित-पराक्रमी, यह आश्चर्य है कि आप समाधि में लीन हैं! क्या तीनों लोकों में सब कुशल है? आपने पाँचों प्राण स्थिर कर लिए, इन्द्रियों को मन में, वाणी-मन को बुद्धि में, और समस्त इन्द्रियों को आत्मा में समेट लिया है। आप वायुहीन स्थान के दीपक-से, शिला-से अचल हैं। यदि यह कोई रहस्य न हो तो कृपया मेरा सन्देह दूर कीजिए।”

तब कृष्ण ने मन्द मुस्कान से मन, बुद्धि और इन्द्रियों को सामान्य स्थिति में लौटाकर कहा, “वह नर-श्रेष्ठ भीष्म, जो शर-शय्या पर लेटे हैं और बुझते दीपक-से हैं, मेरा स्मरण कर रहे हैं; इसीलिए मेरा मन उन पर केन्द्रित था। जिनके धनुष की टंकार और करतल-ध्वनि इन्द्र भी न सह सका, जिन्होंने काशिराज की कन्याओं के स्वयंवर में समस्त राजाओं को क्षण-भर में जीतकर अपने भाई विचित्रवीर्य के लिए तीन राजकुमारियों का हरण किया, जो भृगुवंशी राम (परशुराम) से तेईस दिन निरन्तर लड़े और अजेय रहे, जिन्हें गंगा ने जना और वसिष्ठ ने शिष्य बनाया, जो चारों वेद-वेदांग और समस्त दिव्यास्त्रों के ज्ञाता हैं, जो भूत-भविष्य-वर्तमान जानते हैं, ऐसे भीष्म ने अपनी समस्त इन्द्रियाँ समेटकर मेरी शरण ली, इसीलिए मेरा चित्त उन पर लगा।

“वह नर-व्याघ्र जब अपने कर्मों के बल स्वर्ग जाएँगे, तब पृथ्वी अमावस की रात्रि-सी हो जाएगी। अतः, हे युधिष्ठिर, विनम्रता से गंगा-पुत्र के पास जाइए और जो जानना हो पूछिए, चार पुरुषार्थों (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) के विषय में, चारों वर्णों के यज्ञ और संस्कारों के, चारों आश्रमों के, और सम्पूर्ण राजधर्म के। भीष्म के जाते ही समस्त ज्ञान भी उनके साथ चला जाएगा; इसीलिए मैं आपको प्रेरित करता हूँ।”

युधिष्ठिर ने अश्रु-भरे कण्ठ से कहा, “हे माधव, भीष्म की महिमा सत्य है, इसमें सन्देह नहीं। यदि आपका हृदय कृपालु हो, तो हम आपको आगे रखकर भीष्म के पास चलें। जब सूर्य उत्तरायण होगा, तब भीष्म इस लोक को त्यागेंगे। वे आपके, जो प्रथम देव और ब्रह्म के महान् आश्रय हैं, दर्शन के अधिकारी हैं।” तब कृष्ण ने सात्यकि से रथ जोतने को कहा, और दारुक ने स्वर्ण-जटित, मरकत और चन्द्रकान्त-सूर्यकान्त मणियों से सजे, गरुड-ध्वज वाले रथ में सुग्रीव-शैव्य आदि वायु-वेगी अश्व जोते।

समझने की कुंजी (उत्तरायण): सूर्य के उत्तर की ओर मुड़ने का काल “उत्तरायण” है, जिसे शास्त्रों में देहत्याग का शुभ समय माना गया। भीष्म को इच्छा-मृत्यु का वर है, इसलिए वे दक्षिणायन में नहीं मरते, उत्तरायण की प्रतीक्षा करते हैं। यह उनके सम्पूर्ण उपदेश को एक “समय-सीमा” देता है, ज्ञान तब तक ही, जब तक वे जीवित हैं।

सार: कृष्ण की समाधि का कारण भीष्म का स्मरण था। कृष्ण भीष्म की महिमा (स्वयंवर-विजय, परशुराम से युद्ध, सर्व-शास्त्र-ज्ञान) गिनाकर युधिष्ठिर को उनके पास भेजते हैं, इस चेतावनी के साथ कि भीष्म के साथ ज्ञान भी विदा हो जाएगा। यहीं से उपदेश-पर्व की भूमिका बँधती है।

कुरुक्षेत्र की यात्रा, और परशुराम का इक्कीस बार का क्षत्रिय-संहार

कृष्ण और युधिष्ठिर श्वेत अश्वों के रथ पर शवों, अस्थियों और गिद्धों से भरी रणभूमि पार करते हुए।

कृष्ण, युधिष्ठिर और पाण्डव कुरुक्षेत्र की ओर चले, जो बाल, मज्जा, अस्थि से ढका था, जहाँ लाखों क्षत्रियों ने देह त्यागी थी। हाथी-घोड़ों की अस्थियों के पर्वत, शंख-से बिखरे नर-कपाल, सहस्रों चिताएँ, यह विस्तार मानो विनाशक की भोग-वाटिका था। मार्ग में कृष्ण ने जमदग्नि-पुत्र (परशुराम) के पराक्रम की बात कही, “वहाँ दूर राम के पाँच सरोवर हैं, जहाँ राम ने पितरों को क्षत्रिय-रक्त की अंजलि दी; यहीं उन्होंने इक्कीस बार पृथ्वी को क्षत्रिय-रहित कर अपना कार्य पूर्ण किया।”

युधिष्ठिर ने सन्देह उठाया, “जब क्षत्रिय-बीज ही जल गया, तो क्षत्रिय-कुल फिर कैसे जीवित हुआ? यह संहार क्यों हुआ, और कुल फिर कैसे बढ़ा?” तब कृष्ण ने पूरी कथा कही, “जदु से रजस्, रजस् से बालकाश्व, उससे धर्मात्मा कुशिक हुए। पुत्र-कामना से कुशिक ने कठोर तप किया, और स्वयं इन्द्र उनके पुत्र गाधि रूप में जन्मे। गाधि की कन्या सत्यवती का विवाह भृगुवंशी ऋषिक से हुआ। ऋषिक ने ससुर गाधि के लिए और पत्नी के लिए दो भाग का अभिमन्त्रित चरु (दूध-चावल का यज्ञ-अन्न) पकाया, और कहा, ‘यह भाग आप लें, वह आपकी माता लें। आपकी माता का पुत्र क्षत्रियों में श्रेष्ठ, क्षत्रिय-संहारक वीर होगा; आपका पुत्र शान्त, तपस्वी, श्रेष्ठ ब्राह्मण होगा।’

“पर माता ने अनजाने में दोनों भाग बदल लिए, अपना भाग पुत्री को देकर पुत्री का भाग स्वयं ले लिया। फलतः सत्यवती के गर्भ में क्षत्रिय-संहारक तेज वाला बालक आ गया। ऋषिक ने यह जानकर कहा, ‘भाग बदलने से आपका पुत्र क्रूर-कर्मा होगा, और आपका भाई शान्त ब्राह्मण।’ सत्यवती ने विनती की, ‘मुझे क्रूर ब्राह्मण-पुत्र न दीजिए।’ ऋषिक ने कहा, ‘मैंने ऐसा नहीं चाहा था, भाग-परिवर्तन से ऐसा हुआ। यह विधि का विधान है।’ सत्यवती ने तब प्रार्थना की, ‘पुत्र भले शान्त हो, पौत्र चाहे ऐसा हो।’ ऋषिक ने वर दिया, और सत्यवती ने शान्त-स्वभाव जमदग्नि को जन्म दिया, जबकि उनकी माता का पुत्र विश्वामित्र, क्षत्रिय-कुल में जन्मकर भी ब्राह्मण-तुल्य हुआ।

“जमदग्नि से उग्र-कर्मा राम (परशुराम) हुए, जिन्होंने गन्धमादन पर महादेव को प्रसन्न कर तीव्र-तेज परशु पाया। उधर कृतवीर्य-पुत्र अर्जुन (कार्तवीर्य), हैहयों का राजा, दत्तात्रेय के अनुग्रह से सहस्रबाहु हुआ, और सात द्वीपों-सहित पृथ्वी जीतकर अश्वमेध में दान कर दी। एक बार अग्नि की याचना पर उसने जो दान दिया, उससे अग्नि ने अपव (वसिष्ठ) का निर्जन आश्रम जला दिया। अपव ने शाप दिया, ‘आपने मेरे वन भी जला डाले, अतः राम आपकी हज़ार भुजाएँ काटेंगे।’

“पर कार्तवीर्य के अहंकारी पुत्रों ने, उसके अनजाने में, जमदग्नि की होम-धेनु का बछड़ा छीन लिया। राम ने क्रोध में अर्जुन की भुजाएँ काट दीं और बछड़ा लौटाया। तब अर्जुन के मूर्ख पुत्रों ने, राम के समिधा-कुश लाने गए होने पर, जमदग्नि का सिर धड़ से अलग कर दिया। पिता की मृत्यु से प्रतिशोध की ज्वाला में राम ने पृथ्वी को क्षत्रिय-रहित करने का व्रत लिया और कृतवीर्य के समस्त पुत्र-पौत्रों को मार डाला; सहस्रों हैहयों को मारकर पृथ्वी रक्त से कीचड़-सी कर दी, फिर करुणा से वन में चले गए।

भीष्म शरशय्या से परशुराम की कथा सुनाते; आकाश में फरसा लिए योद्धा रक्तरंजित रणभूमि पर खड़ा दिखता।

“कुछ सहस्र वर्ष बाद विश्वामित्र-पौत्र, रैभ्य-पुत्र पारावसु ने राम पर कायरता का आक्षेप किया, ‘क्षत्रिय-वीरों के भय से आप पर्वत भाग गए।’ तब राम ने फिर अस्त्र उठाया और सैकड़ों क्षत्रिय-शव बिछा दिए। जो बच गए, वे फिर बढ़े और राजा बने; राम ने उन्हें भी मारा, बालकों तक को न छोड़ा। कुछ क्षत्रिय-स्त्रियाँ अपने बच्चे बचा सकीं। इस प्रकार इक्कीस बार पृथ्वी को क्षत्रिय-रहित कर, अश्वमेध के अन्त में राम ने पृथ्वी कश्यप को दान कर दी।

“कश्यप ने यज्ञ-स्रुवा (आहुति की कलछी) से इंगित कर कहा, ‘हे राम, अब आप दक्षिण समुद्र-तट को जाइए, मेरे राज्य में न रहिए।’ तब समुद्र ने राम के लिए दूसरे तट पर शूर्पारक नामक प्रदेश रचा। कश्यप ने पृथ्वी ब्राह्मणों को देकर वन में प्रवेश किया। तब शूद्र-वैश्य मनमाने आचरण करने लगे; अराजकता में दुर्बल को बलवान् सताने लगा, कोई अपनी सम्पत्ति का स्वामी न रहा, और भयभीत पृथ्वी रसातल को धँसने लगी। कश्यप ने उसे अपनी जाँघ (ऊरु) पर धारण किया, इसीलिए पृथ्वी “उर्वी” कहलाई।

“पृथ्वी ने रक्षा के लिए राजा माँगा, और बताया कि उसने अनेक क्षत्रिय-शिशु छिपा रखे हैं, हैहय-वंश में जन्मे, विदूरथ-पुत्र जो ऋक्षवान् पर्वत पर भालुओं में पला, सौदास-पुत्र जिसे पराशर ने बचाया और जो शूद्र-सा सेवा करने से “सर्वकर्मा” कहलाया, शिवि-पुत्र गोपति जो गौओं में पला, प्रतर्दन-पुत्र वत्स जो बछड़ों में पला, और दधिवाहन-पौत्र बृहद्रथ जिसे गौतम ने गंगा-तट पर बचाया। कश्यप ने इन सबको ढूँढ़कर विधिवत् राजा बनाया, और आज के क्षत्रिय-कुल इन्हीं की सन्तान हैं।”

एक उप-कथा: सत्यवती के चरु-भाग बदलने की कथा महाभारत की वंश-नियति का अनूठा उदाहरण है। ब्राह्मण-तेज और क्षत्रिय-तेज वाले दो अभिमन्त्रित अन्न-भागों के माता-पुत्री के बीच बदल जाने से वंश-स्वभाव ही पलट गया, क्षत्रिय-कुल में जन्मा विश्वामित्र ब्राह्मण-तुल्य ऋषि बना, और ब्राह्मण-कुल में जन्मा परशुराम उग्र क्षत्रिय-संहारक। एक अनजानी चूक पीढ़ियों का चरित्र मोड़ देती है।

समझने की कुंजी (इक्कीस बार): “इक्कीस बार पृथ्वी को क्षत्रिय-रहित करना” का अर्थ यह नहीं कि क्षत्रिय एकदम लुप्त हुए; जो बचते थे वे फिर बढ़ते थे और परशुराम फिर संहार करते थे, ऐसा इक्कीस आवर्तन। यह संख्या परशुराम के अनवरत प्रतिशोध-चक्र की प्रतीक है, और यही दिखाता है कि “वर्ण-नाश” भी पूर्ण नहीं होता, स्त्रियों और ऋषियों के बचाए बीज से कुल पुनर्जीवित होता है।

सार: कुरुक्षेत्र के संहार-स्थल से गुज़रते हुए कृष्ण परशुराम-कथा कहते हैं, चरु-भाग बदलने से उपजे विश्वामित्र और परशुराम, कार्तवीर्य की भुजाओं का छेदन, जमदग्नि-वध, और इक्कीस बार का क्षत्रिय-संहार। अन्त में कश्यप द्वारा छिपे क्षत्रिय-शिशुओं का पुनः राजा बनना, जिससे वर्तमान क्षत्रिय-वंश चले। यह संहार और पुनर्जन्म का चक्र युद्ध-शोक को बड़े परिप्रेक्ष्य में रखता है।

शर-शय्या के पास: कृष्ण और भीष्म का संवाद, और दिव्य-दृष्टि का वर

पांडव और कृष्ण शरशय्या पर लेटे भीष्म के समीप आते; भीष्म हाथ उठाकर हाथ जोड़े युधिष्ठिर का स्वागत करते।

युधिष्ठिर परशुराम के पराक्रम सुनकर विस्मित हुए। तत्पश्चात् कृष्ण और युधिष्ठिर वहाँ पहुँचे जहाँ गंगा-पुत्र शर-शय्या पर, ओघवती नदी के तट के पवित्र स्थल पर लेटे थे, अनेक ऋषियों से घिरे, सन्ध्या के सूर्य-से दीप्त। दूर से देखकर सब रथ से उतरे, इन्द्रियाँ संयत कर पास आए, और व्यास आदि ऋषियों को प्रणाम कर भीष्म के निकट बैठे।

बुझती अग्नि-से भीष्म को देख कृष्ण ने कुछ खिन्न-हृदय कहा, “क्या आपकी चेतना पहले-सी स्वच्छ है? बुद्धि मलिन तो नहीं? बाणों की पीड़ा अंगों को सता तो नहीं रही? आप तो देवताओं को भी प्राणियों के जन्म-प्रलय का उपदेश देने में समर्थ हैं। भूत-भविष्य-वर्तमान सब आपको ज्ञात है। आपकी पिता शान्तनु के वर से आपकी मृत्यु आपके अधीन है। शरीर में छोटी-सी सुई भी पीड़ा देती है, फिर सैकड़ों बाणों की क्या कहें! पर निश्चय ही पीड़ा आपको छू नहीं सकती। आपने पूर्ण समर्थ रहते हुए भी स्त्री-संग का त्याग किया; आप-जैसा सत्य, तप, दान, यज्ञ, अस्त्र-विद्या और शरणागत-रक्षा में निष्ठ, समस्त प्राणियों का हितैषी, न कभी सुना न देखा। ब्राह्मण आपको वसुओं में नवाँ कहते हैं, पर आपने अपने गुणों से उन सबको लाँघ लिया। पाण्डु-पुत्र का शोक हरने में आप समर्थ हैं, क्योंकि चारों वर्ण, चारों आश्रम, और समस्त धर्म-शास्त्र आपके मन में बसते हैं।”

शरशय्या पर भीष्म हाथ जोड़कर स्तुति करते; कृष्ण, वीणा लिए नारद, अन्य ऋषि और पांडव चारों ओर उपस्थित।

भीष्म ने सिर थोड़ा उठाकर हाथ जोड़कर कृष्ण की स्तुति की, “हे दिव्य कृष्ण, आपको प्रणाम! आप समस्त लोकों के आदि और अन्त, स्रष्टा और संहारक हैं। आप अजेय हैं, आप विश्व की आत्मा हैं, विश्व आपसे उपजा। आप पाँच भूतों से परे, तीनों लोकों से परे हैं। आपके वचनों ने मुझे आपके दिव्य रूप के दर्शन कराए, मैं आपका शाश्वत रूप देखता हूँ, आपका सिर आकाश को, चरण पृथ्वी को भरते हैं, दिशाएँ आपकी भुजाएँ, सूर्य आपका नेत्र। पीताम्बर-धारी आपका रूप विद्युत्-युक्त मेघ-सा है। हे कमलनयन, मुझ शरणागत भक्त के लिए जो श्रेयस्कर हो, वही सोचिए।”

कृष्ण ने कहा, “हे भीष्म, आपकी भक्ति महान् है, इसीलिए मैंने आपको अपना दिव्य रूप दिखाया। जो भक्त नहीं, या अनिष्ठ है, या असंयत है, उसे मैं नहीं दिखाता। आपकी अपनी तपस्या से आप मुझे देख सके। वे लोक आपके लिए तैयार हैं जहाँ से लौटना नहीं। आपके जीने में अभी छप्पन दिन शेष हैं। देह त्यागकर आप अपने कर्मों का शुभ फल पाएँगे। अग्नि-तेज वाले वसु-देवता रथों पर अदृश्य आपकी प्रतीक्षा कर रहे हैं, उस क्षण तक जब सूर्य उत्तरायण में प्रवेश करेगा। आपके जाने पर समस्त ज्ञान आपके साथ चला जाएगा; इसीलिए ये सब आपके पास धर्म-उपदेश सुनने आए हैं। शोक से जिसकी विद्या ढक गई है, उस सत्यनिष्ठ युधिष्ठिर से धर्म और योग के सत्य-वचन कहकर उसका शोक शीघ्र दूर कीजिए।”

भीष्म बोले, “हे शिव, हे नारायण, आपके वचन सुनकर मैं हर्षित हूँ। पर आपके सम्मुख मैं क्या उपदेश दूँ, जब वाणी के समस्त विषय आपकी वाणी में पहले से समाहित हैं? जो कुछ किया जाता है, आपकी ही बुद्धि से होता है। मेरा मन बाण-पीड़ा से अत्यन्त व्याकुल है, अंग दुर्बल, बुद्धि अस्पष्ट, बल छूट रहा है, प्राण जाने को हैं; मैं कैसे बोलूँ? बृहस्पति भी आपके सामने बोलने में हिचकेंगे। आप ही समस्त विधानों के ओदाता हैं, अतः युधिष्ठिर के हित के लिए आप ही बोलिए।”

कृष्ण शरशय्या पर लेटे भीष्म के ऊपर आशीर्वाद की मुद्रा में हाथ उठाए; पीछे राजकुमार हाथ जोड़े झुका।

कृष्ण ने कहा, “हे गंगा-पुत्र, आपके बाण-घावों की पीड़ा के विषय में आपने जो कहा, उसके लिए मैं आपको यह वर देता हूँ, असुविधा, मूर्च्छा, ताप, पीड़ा, भूख और प्यास आपको नहीं सताएँगी। आपकी चेतना और स्मृति निर्मल रहेगी, बुद्धि कभी न चूकेगी। रज और तम से मुक्त आपका मन सदा सत्त्व-गुण में, मेघ से निकले चन्द्रमा-सा, रहेगा। धर्म, अर्थ या नीति का जो भी विषय आप सोचेंगे, उसमें आपकी बुद्धि प्रवेश कर जाएगी। दिव्य-दृष्टि पाकर आप चारों प्रकार के प्राणियों को, और जिस भी विषय का स्मरण करेंगे उसे, निर्मल जल में मछली-सा स्पष्ट देखेंगे।”

तब व्यास आदि ऋषियों ने ऋक्, यजुः, साम के मन्त्रों से कृष्ण की स्तुति की। उस स्थल पर सब ऋतुओं के दिव्य पुष्प बरसे, दिव्य वाद्य बजे, अप्सराएँ गाने लगीं, सुगन्धित वायु बही, दिशाएँ निर्मल हुईं, पशु-पक्षी शान्त विचरने लगे। फिर सूर्य पश्चिम को ढला। ऋषियों ने जनार्दन, भीष्म और युधिष्ठिर को प्रणाम कर “कल लौटेंगे” कहकर विदा ली। कृष्ण और पाण्डव भी भीष्म की प्रदक्षिणा कर रथों पर हस्तिनापुर लौटे।

समझने की कुंजी (छप्पन दिन): कृष्ण भीष्म को बताते हैं कि उनके जीवन के छप्पन दिन शेष हैं, अर्थात् उत्तरायण के प्रारम्भ तक। यह समूचे शान्ति और अनुशासन पर्वों के उपदेश का “घड़ी-यन्त्र” है, भीष्म इन्हीं दिनों में राजधर्म, आपद्धर्म, मोक्षधर्म और दानधर्म का विशद उपदेश देंगे। कृष्ण का दिया वर (पीड़ा-मुक्ति और निर्मल स्मृति) ही इस उपदेश को सम्भव बनाता है।

सार: शर-शय्या के पास कृष्ण और भीष्म परस्पर स्तुति करते हैं। भीष्म पहले बाण-पीड़ा और कृष्ण की सर्वज्ञता के कारण उपदेश से हिचकते हैं, पर कृष्ण उन्हें पीड़ा-रहित निर्मल बुद्धि और दिव्य-दृष्टि का वर देकर बोलने के योग्य बनाते हैं। यही वर आगामी समस्त राजधर्म-उपदेश की नींव है।

भीष्म का राजधर्म आरम्भ: प्रजा-रक्षा, सत्य, और दण्ड का सन्तुलन

युधिष्ठिर हाथ जोड़े शरशय्या के पास बैठे; भीष्म उँगली उठाकर राजधर्म समझाते, कृष्ण खड़े होकर सुनते।

अगले दिन फिर वहाँ पहुँचकर सबने भीष्म का कुशल पूछा। नारद ने कहा, “अब समय है कि आप भीष्म से धर्म-विषयक प्रश्न पूछें, क्योंकि गंगा-पुत्र अस्ताचल को जाते सूर्य-से प्राण त्यागने वाले हैं।” प्रेरित होकर भी राजकुमार कुछ पूछ न सके, एक-दूसरे को देखते रहे। तब युधिष्ठिर ने कृष्ण से कहा, “देवकी-पुत्र के सिवा कोई पितामह से प्रश्न नहीं कर सकता; आप ही प्रथम बोलिए।” कृष्ण ने भीष्म से कुशल पूछा, और भीष्म बोले, “हे कृष्ण, आपकी कृपा से एक ही दिन में ताप, मूर्च्छा, थकान और पीड़ा सब चली गई। भूत-भविष्य-वर्तमान, वेद-वेदान्त के समस्त धर्म, देश-जाति-कुल के आचार, चारों आश्रम और राजनीति, सब हथेली पर रखे फल-से मुझे दिख रहे हैं। पर हे जनार्दन, आप स्वयं ही पाण्डु-पुत्र को उपदेश क्यों नहीं देते?”

कृष्ण ने कहा, “हे कुरु-श्रेष्ठ, जानिए कि मैं यश और समस्त शुभ का मूल हूँ; भले-बुरे सब मुझसे ही निकलते हैं। पर मैंने आपका यश बढ़ाने का संकल्प किया है, इसीलिए मैंने आपको यह दिव्य बुद्धि दी। जब तक पृथ्वी रहेगी, आपका यश अक्षुण्ण रहेगा। आप युधिष्ठिर से जो भी कहेंगे, वह पृथ्वी पर वेद-वचन-सा प्रमाण माना जाएगा। आप वृद्ध हैं, श्रुति-सम्मत आचरण वाले, राजधर्म और हर धर्म-विज्ञान के ज्ञाता; आपके जन्म से किसी ने आपमें तनिक भी दोष नहीं देखा। अतः पिता-सा होकर इन्हें उच्च धर्म का उपदेश दीजिए। यदि आप न बोलेंगे तो पाप के भागी होंगे।”

शरशय्या पर लेटे भीष्म हाथ बढ़ाकर हाथ जोड़े खड़े युधिष्ठिर की बाँह थामते; पीछे कृष्ण और योद्धा खड़े।

भीष्म ने ‘मैं धर्म का उपदेश करूँगा’ कहा। तब कृष्ण ने युधिष्ठिर की हिचक का कारण बताया, “ये शाप के भय और लज्जा से आपके पास आने में झिझकते हैं, क्योंकि इन्होंने आप-जैसे पूज्य, गुरु और बन्धु को बाणों से बेधा।” भीष्म ने कहा, “जैसे ब्राह्मण का धर्म दान, अध्ययन और तप है, वैसे क्षत्रिय का धर्म युद्ध में देह त्यागना है। क्षत्रिय को चाहिए कि अन्यायपूर्ण युद्ध में जो सम्मुख हों, उन गुरुजनों, पितरों और बन्धुओं का भी वध करे; यही उसका घोषित धर्म है। जो क्षत्रिय युद्ध में अपने गुरु को भी, यदि वे पापी, लोभी और संयम-व्रत-हीन हों, मार दे, वही धर्मज्ञ है। चुनौती मिलने पर क्षत्रिय को सदा युद्ध करना चाहिए, क्योंकि मनु ने कहा है कि न्यायपूर्ण युद्ध क्षत्रिय को स्वर्ग और यश दोनों देता है।” तब युधिष्ठिर ने अति विनम्रता से भीष्म के चरण पकड़े, और भीष्म ने उन्हें स्नेह से आश्वस्त कर कहा, “मत डरिए, हे कुरु-श्रेष्ठ, निःशंक होकर पूछिए।”

युधिष्ठिर ने पूछा, “धर्मज्ञ कहते हैं कि राजधर्म समस्त विज्ञानों में परम है; मुझे भी इसका भार अत्यन्त गुरु जान पड़ता है। राजधर्म ही समस्त जीव-जगत् का आश्रय है; धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष तक इसी पर निर्भर हैं। जैसे अश्व के लिए लगाम और गज के लिए अंकुश, वैसे ही राजधर्म-विज्ञान संसार को थामने की लगाम है। यदि राजधर्म में मूढ़ता आ जाए तो पृथ्वी पर अराजकता फैल जाए। अतः, हे पितामह, पहले राजधर्म का उपदेश कीजिए।”

शरशय्या पर लेटे भीष्म उँगली उठाकर उपदेश देते; युधिष्ठिर हाथ जोड़े रोते, कृष्ण और पगड़ीधारी श्रोता समीप बैठे।

भीष्म बोले, “धर्म, कृष्ण-रूप ब्रह्म और ब्राह्मणों को प्रणाम कर मैं सनातन धर्म कहता हूँ। हे युधिष्ठिर, एकाग्र होकर सुनिए। प्रथमतः राजा को, प्रजा को प्रसन्न करने की इच्छा से, देवताओं और ब्राह्मणों की विनम्र सेवा करनी चाहिए; इससे वह अपना धर्म-ऋण चुकाता है और प्रजा का सम्मान पाता है। राजा को सदा तत्परता से उद्यम (पुरुषार्थ) करना चाहिए, क्योंकि उद्यम बिना केवल भाग्य कुछ नहीं देता। उद्यम और भाग्य दोनों के बीच मैं उद्यम को श्रेष्ठ मानता हूँ, क्योंकि भाग्य का पता तो उद्यम के फल से ही चलता है। कोई कार्य विफल हो तो शोक न करें, उसी कार्य में दूना यत्न करें, यही राजा का परम धर्म है।

“राजा की सफलता में सत्य से बढ़कर कुछ नहीं। सत्यनिष्ठ राजा यहाँ-परलोक दोनों में सुखी होता है; जैसे ऋषियों का धन सत्य है, वैसे ही राजा में विश्वास सत्य से ही जगता है। जो राजा गुणवान्, सदाचारी, संयमी, विनम्र, धर्मात्मा, जितेन्द्रिय, सुन्दर और अति-कुतूहली नहीं, वह कभी श्री नहीं खोता। न्याय करके, और तीन बातों, अपने दोष छिपाना, शत्रु के दोष जानना, और अपनी मन्त्रणा गुप्त रखना, का पालन कर राजा समृद्धि पाता है।

“यदि राजा अति मृदु हो तो सब उसकी अवहेलना करते हैं; यदि अति उग्र हो तो प्रजा त्रस्त होती है। अतः दोनों आचरण रखिए। ब्राह्मण को आप दण्ड न दें, क्योंकि वह पृथ्वी का परम प्राणी है। मनु के दो श्लोक स्मरण रखिए, अग्नि जल से उपजी, क्षत्रिय ब्राह्मण से, और लोहा पत्थर से; ये तीनों हर वस्तु पर बल चलाते हैं, पर अपने जनक के सम्पर्क में आते ही इनका बल शान्त हो जाता है। जब लोहा पत्थर से, अग्नि जल से, या क्षत्रिय ब्राह्मण से बैर करे, तो तीनों दुर्बल पड़ जाते हैं। अतः ब्राह्मण पूज्य हैं। पर जो ब्राह्मण तीनों लोकों के लिए बाधक बनें, उन्हें भुजबल से दमित कीजिए।

“उशना (शुक्राचार्य) के दो श्लोक सुनिए, धर्मनिष्ठ क्षत्रिय वेद-पारंगत ब्राह्मण को भी, यदि वह अस्त्र उठाकर युद्ध को दौड़े, दण्ड दे सकता है; धर्म की रक्षा करते हुए ऐसा करने से वह पापी नहीं होता, क्योंकि आक्रामक का क्रोध दण्डक के क्रोध को न्यायसंगत बना देता है। यदि ब्राह्मण ब्रह्म-हत्या, गुरु-शय्या-उल्लंघन, गर्भपात, या राज-द्रोह का दोषी हो, तो उसका दण्ड देश-निकाला हो, शारीरिक दण्ड नहीं।

“राजा सदा क्षमाशील भी न रहे, क्योंकि मृदु राजा निस्तेज गज-सा निकृष्ट माना जाता है। बृहस्पति का श्लोक है, यदि राजा सदा क्षमाशील हो, तो नीच व्यक्ति उस पर वैसे ही चढ़ बैठता है जैसे महावत गज के सिर पर। अतः राजा न सदा मृदु हो, न सदा उग्र; वह वसन्त के सूर्य-सा हो, न शीतल, न इतना तप्त कि पसीना छूटे।

“राजा अपने सेवकों से परिहास (हँसी-मज़ाक) में न पड़े, क्योंकि अधिक घुलने-मिलने पर आश्रित स्वामी की अवहेलना करने लगते हैं, उसके रहस्य खोलते हैं, अनुचित वस्तुएँ माँगते हैं, स्वामी का भोजन तक ले लेते हैं, क्रोध दिखाते हैं, और स्वामी पर हावी होना चाहते हैं; रिश्वत और कपट से राज-कार्य रोकते हैं, झूठे लेखों से राज्य को सड़ाते हैं, और राजा को डोर से बँधे पक्षी-सा खेलाना चाहते हैं। मृदु और परिहास-प्रिय राजा से ये और अनेक अनर्थ उपजते हैं।

“राजा सदा कर्म के लिए उद्यत रहे; जो स्त्री-सा उद्यम-हीन हो, वह प्रशंसा-योग्य नहीं। उशना का श्लोक है, जैसे सर्प चूहों को निगलता है, वैसे ही पृथ्वी दो को निगल जाती है, युद्ध से विमुख राजा को, और पत्नी-पुत्रों में अति-आसक्त ब्राह्मण को। जिनसे शास्त्रानुसार सन्धि हो, उनसे सन्धि कीजिए, और जिनसे युद्ध हो, उनसे युद्ध। चाहे गुरु हो या मित्र, जो आपके सप्त-अंग वाले राज्य (राजा, मन्त्री, मित्र, कोष, राष्ट्र, दुर्ग, सेना) के प्रति शत्रुता रखे, वह वध्य है।

“राजा दूसरों के धन का लोभ न करे, समय पर देय वस्तु दे, क्रोध को वश में रखे, और धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष का विवेक से अनुसरण करे। इन तीनों (धर्म, अर्थ, काम) की मन्त्रणा सदा गुप्त रखे; मन्त्रणा का प्रकट होना राजा का परम अनर्थ है। राजा यम-सा न्याय करे और कुबेर-सा धन संचित करे। जो भूखे रहे उन्हें खिलाए, जो भर चुके उनकी सुध ले। मधुर-भाषी हो, मुस्कान-सहित बोले। वृद्धों की सेवा करे, आलस्य त्यागे, सदाचारियों का आचरण देखे, और अधर्मियों का धन लेकर धर्मियों को दे।

“राजा वीर, निष्ठावान्, कुलीन, स्वस्थ, सुशील पुरुषों को सेवा में बाँधे। भोग की वस्तुओं में राजा और सेवक में भेद न हो, अन्तर केवल छत्र और आज्ञा देने की शक्ति का हो। जो कुटिल, लोभी राजा सब पर सन्देह कर प्रजा पर भारी कर लगाता है, वह शीघ्र अपने ही सेवकों-सम्बन्धियों से मारा जाता है। पर जो धर्मात्मा है और प्रजा के हृदय जीतता है, वह शत्रु से आक्रान्त होकर भी नहीं डूबता, और गिरकर भी फिर उठ खड़ा होता है। मनु के दो श्लोक, छह को समुद्र की फूटी नौका-सा त्यागें, मौन रहने वाले गुरु को, अध्ययनहीन पुरोहित को, रक्षा न करने वाले राजा को, अप्रिय बोलने वाली पत्नी को, गाँव में घूमने वाले ग्वाले को, और वन जाने को उत्सुक नाई को।”

भीष्म ने प्रजा-रक्षा को राजधर्म का सार बताया, “बृहस्पति इससे बढ़कर कोई धर्म नहीं मानते। रक्षा के साधन, गुप्तचर और सेवक नियुक्त करना, उन्हें बिना अहंकार उनका भाग देना, विचारपूर्वक कर वसूलना, कभी बिना कारण कुछ न लेना, ईमानदारों का चयन, वीरता और कौशल, सत्य, प्रजा-हित, शत्रु में फूट डालना, जर्जर भवनों की मरम्मत, अवसर देखकर दण्ड-जुर्माना, ईमानदार का त्याग न करना, कुलीनों को आश्रय, संचय-योग्य का संचय, बुद्धिमानों का संग, सेना को सदा प्रसन्न रखना, कोष भरना, नगर-रक्षकों पर अन्ध-विश्वास न करना, और दुष्टों का त्याग।

“उद्यम ही राजधर्म का मूल है, बृहस्पति कहते हैं, उद्यम से अमृत मिला, उद्यम से असुर मरे, उद्यम से ही इन्द्र ने स्वर्ग और पृथ्वी का राज्य पाया; उद्यम-वीर वाणी-वीरों से श्रेष्ठ है। उद्यम-हीन राजा, चाहे बुद्धिमान् हो, विष-रहित सर्प-सा शत्रुओं से पराजित होता है। बलवान् राजा भी दुर्बल शत्रु की उपेक्षा न करे; अग्नि की एक चिनगारी दावानल रच सकती है, और विष का एक कण मार सकता है।

“राजा को कपट-रहित आचरण का आवरण ओढ़कर अपनी गुप्त मन्त्रणा, सेना-संचय, और योजनाएँ छिपानी चाहिए। प्रजा को वश में रखने के लिए धर्म से आचरण करे। मांस-सा सबको प्रिय राज्य केवल सरलता से रक्षित नहीं होता; अतः राजा सरलता और कुटिलता दोनों रखे। प्रजा-रक्षा में पड़े संकट से राजा महान् पुण्य अर्जित करता है, राजा का आचरण ऐसा ही हो।”

कृष्ण शरशय्या के पास बैठे हाथ के संकेत से बोलते; युधिष्ठिर हाथ जोड़े सुनते, भीष्म बाणों के बीच लेटे।

व्यास, देवस्थान, अश्व, वासुदेव, कृप, सात्यकि और सञ्जय ने प्रसन्न होकर “उत्तम! उत्तम!” कहकर भीष्म की प्रशंसा की। तब युधिष्ठिर ने अश्रु-भरे नेत्रों से भीष्म के चरण छूकर कहा, “हे पितामह, अपने सन्देह कल पूछूँगा, क्योंकि आज सूर्य समस्त भूमि का रस सोखकर अस्त होने को है।” फिर सब ऋषियों और भीष्म को प्रणाम कर, दृषद्वती में स्नान कर, पितरों को जलांजलि और सन्ध्या-वन्दन कर, हस्तिनापुर लौटे।

समझने की कुंजी (सप्तांग राज्य): “सप्त-अंग वाला राज्य” प्राचीन राजनीति की मूल अवधारणा है, राज्य के सात अंग, स्वामी (राजा), अमात्य (मन्त्री), सुहृद् (मित्र-सहयोगी), कोष (खज़ाना), राष्ट्र (जनपद), दुर्ग (किला), और दण्ड/बल (सेना)। जो इनमें से किसी पर भी आघात करे, भीष्म उसे, चाहे वह गुरु ही क्यों न हो, वध्य ठहराते हैं। यही दिखाता है कि राजधर्म व्यक्तिगत सम्बन्धों से ऊपर है।

समझने की कुंजी (मन्त्र-रक्षा): “मन्त्र” यहाँ देवता-मन्त्र नहीं, राजनीतिक गोपनीय परामर्श है। भीष्म बार-बार कहते हैं कि मन्त्रणा का भेद खुलना राजा का परम अनर्थ है; अतः राजा सरल दिखकर भी अपनी योजनाएँ गुप्त रखे। यह कौटिल्य-परम्परा की गुप्तचर और गोपनीयता-नीति का बीज है।

सार: भीष्म का राजधर्म-उपदेश आरम्भ होता है। प्रथम सूत्र, प्रजा-रक्षा ही राजा का परम धर्म; उसके साधन हैं देव-ब्राह्मण-सेवा, अथक उद्यम (जो भाग्य से श्रेष्ठ है), सत्य, मन्त्र-गोपन, और मृदुता-उग्रता का सन्तुलन (वसन्त-सूर्य-सा)। ब्राह्मण पूज्य हैं पर आक्रामक होने पर दण्डनीय; सेवकों से परिहास वर्जित; सरलता और कुटिलता दोनों आवश्यक। यहीं इस खण्ड का उपदेश-क्रम विराम लेता है, अगले दिन युधिष्ठिर “राजन्” शब्द की उत्पत्ति और सृष्टि-आदि के राज्य का प्रश्न उठाएँगे।

भीष्म की शरशय्या के पास बैठे युधिष्ठिर रोते हुए; कृष्ण हाथ उठाकर समझाते, वृद्ध ऋषि चारों ओर बैठे।

शर-शय्या पर लेटे हुए, अपनी ही इच्छा से प्राण रोके, गंगापुत्र भीष्म धर्मराज युधिष्ठिर को राजधर्म का उपदेश दे रहे थे। बृहस्पति के सूत्रों का सहारा लेकर वे राजा के अनगिनत कर्तव्यों की लड़ी पिरो रहे थे: ईमानदार पुरुषों को कार्यभार सौंपना, शूरता, व्यवहार-कुशलता, सत्य, प्रजा का हित, उचित अवसर देखकर दण्ड और अर्थदण्ड लगाना, सज्जनों को कभी न त्यागना, कुलीनों को आजीविका और रक्षण देना, संचय योग्य वस्तु का संचय, बुद्धिमानों की संगति, सैनिकों को सदा प्रसन्न रखना, कोष भरना, अपने ही नगर के पहरेदारों पर अन्धा विश्वास न करना, शत्रु-नगर में भेद डालना, शत्रु-देश के बीच रहते मित्रों की रक्षा करना, अपने सेवकों पर भी कड़ी दृष्टि रखना, और दुष्टों को दूर हटा देना। भीष्म ने कहा कि उद्योग ही राजधर्म की जड़ है; उद्योग से ही अमृत मिला, असुर मारे गए, और इन्द्र ने स्वर्ग तथा पृथ्वी का राज्य पाया। उद्योगी वीर वाणी के वीरों से ऊपर है; वाणी के वीर तो उद्योगी की ही पूजा करते हैं। बुद्धिमान् होकर भी जो राजा उद्योगहीन है, वह विषहीन साँप-सा शत्रुओं से परास्त हो जाता है।

भीष्म ने आगे कहा कि बलवान् होकर भी राजा किसी दुर्बल शत्रु की उपेक्षा न करे, क्योंकि एक चिंगारी दावानल बन सकती है और विष का एक कण प्राण ले सकता है। किले के भीतर बैठा एक ही शत्रु समृद्ध और बलशाली राजा के समूचे देश को व्यथित कर देता है। राजा अपने गुप्त मन्त्र, सेना का संग्रह, हृदय के टेढ़े प्रयोजन और जो अनुचित कर्म वह करता या करना चाहता है, इन सबको सरलता का आवरण ओढ़कर छिपाए रखे। प्रजा को वश में रखने के लिए वह धर्म से ही आचरण करे, पर साथ ही जान ले कि कुटिल मनवाले विशाल साम्राज्य का भार नहीं उठा सकते, और जो राजा केवल मृदु है वह उस श्रेष्ठ पद को नहीं पाता जिसकी प्राप्ति परिश्रम पर टिकी है। मांस-सी सबकी प्यारी यह पृथ्वी केवल सरलता और सीधेपन से रक्षित नहीं हो सकती; इसलिए राजा सरलता और कुटिलता, दोनों का आश्रय ले। प्रजा की रक्षा करते हुए यदि राजा संकट में पड़े, तो भी उसे बड़ा पुण्य मिलता है।

यह सुनकर व्यास, देवस्थान, अश्व, वासुदेव, कृप, सात्यकि और संजय खिले हुए मुख से बोल उठे, “उत्तम! उत्तम!” और उन्होंने नरश्रेष्ठ भीष्म की प्रशंसा की। तभी युधिष्ठिर ने उदास मन और आँसुओं से भीगी आँखों से भीष्म के चरण छूकर कहा कि हे पितामह, जिन विषयों में मुझे संशय है, वे मैं कल पूछूँगा, क्योंकि आज सूर्य समस्त भूमि का रस सोखकर अस्त होने को है। तब केशव, कृप, युधिष्ठिर आदि ब्राह्मणों को प्रणाम कर और गंगापुत्र की परिक्रमा करके अपने रथों पर चढ़े। उन्होंने दृषद्वती के जल में स्नान किया, पितरों को जलांजलि दी, मन्त्र-जप तथा सन्ध्या-वन्दन करके हस्तिनापुर में प्रवेश किया।

समझने की कुंजी (अवधारणा): राजधर्म का यह पूरा प्रसंग शान्ति पर्व का “राजधर्मानुशासन” है। भीष्म युद्ध के बाद, अपनी ही इच्छा से मृत्यु को टाले हुए, उत्तरायण की प्रतीक्षा में शर-शय्या (बाणों की सेज) पर पड़े हैं। उपदेश में नैतिक जटिलता खुलकर आती है: धर्म और कूटनीति दोनों एक साथ, क्योंकि महाभारत राजा से केवल सीधापन नहीं, अपितु प्रजा-रक्षा के लिए आवश्यक कुटिलता भी माँगता है।

सार: भीष्म ने राजा के कर्तव्यों की लम्बी सूची दी, उद्योग को राजधर्म की जड़ बताया, और कहा कि राजा सरलता तथा कुटिलता, दोनों का सन्तुलित आश्रय ले। दिन ढलने पर सभा विसर्जित हुई और सब हस्तिनापुर लौटे।

“राजा” शब्द कहाँ से आया: सृष्टि के आरम्भ में राज्य का जन्म

दूसरे दिन प्रातःकर्म करके पाण्डव और यादव फिर कुरुक्षेत्र में भीष्म के पास पहुँचे। कुशल-क्षेम पूछकर, ऋषियों को प्रणाम करके वे भीष्म के चारों ओर बैठ गए। हाथ जोड़कर युधिष्ठिर ने पूछा कि हे भरतश्रेष्ठ, पृथ्वी पर “राजन्” शब्द कहाँ से आया? जिसके दूसरों के समान ही हाथ, भुजा, गर्दन, बुद्धि, इन्द्रियाँ, सुख-दुःख, हड्डी-मांस-रक्त, श्वास-प्रश्वास और जन्म-मरण हैं, और जो मनुष्यता के समस्त गुणों में औरों जैसा ही है, वही एक मनुष्य अनेक बुद्धिमान् और वीर पुरुषों पर शासन कैसे करता है? सब लोग उसकी कृपा क्यों चाहते हैं? एक मनुष्य के प्रसन्न होने पर समूचा संसार प्रसन्न और उसके दुखी होने पर समूचा संसार दुखी क्यों हो जाता है? यह तो किसी गम्भीर कारण के बिना नहीं हो सकता, क्योंकि सारा संसार एक पुरुष के सामने देवता के समान झुकता है।

भीष्म शरशय्या से उँगली उठाकर कथाएँ सुनाते; आकाश में मनुष्यों और मछलियों के दृश्य, कृष्ण और युधिष्ठिर सुनते।

भीष्म ने उत्तर दिया कि हे राजन्, ध्यानपूर्वक सुनिए कि सत्ययुग में सर्वप्रथम राजत्व कैसे आरम्भ हुआ। आरम्भ में न राज्य था, न राजा, न दण्ड, न दण्ड देने वाला; सब लोग धर्मपूर्वक एक-दूसरे की रक्षा करते थे। किन्तु कुछ काल बाद यह कार्य उन्हें कष्टकर लगने लगा। मोह ने उनके हृदय पर अधिकार किया, बुद्धि धुँधली हुई और धर्म घटने लगा। मोह से वे लोभी हुए; लोभ से अप्राप्त वस्तुओं की कामना जागी; कामना से क्रोध आया; और क्रोध से कर्तव्य-अकर्तव्य का भेद ही मिट गया। मर्यादाहीन भोग फैल गया, लोग जो चाहे बोलने लगे, भक्ष्य-अभक्ष्य और धर्म-अधर्म का अन्तर लुप्त हो गया। इस संकर के फैलते ही वेद विलीन हो गए, और वेदों के साथ धर्म भी।

वेद और धर्म के लुप्त होने पर देवता भयभीत हो उठे और ब्रह्मा की शरण में गए। उन्होंने हाथ जोड़कर कहा कि हे पितामह, लोभ और मोह से मनुष्यलोक में सनातन वेद पीड़ित हो गए, धर्म नष्ट हो गया; मनुष्य ऊपर की ओर आहुति देते थे और हम नीचे वर्षा करते थे, पर पवित्र कर्म रुक जाने से अब हमें भारी संकट होगा। आप ऐसा उपाय कीजिए जिससे आपकी रची सृष्टि नष्ट न हो। तब स्वयम्भू भगवान् ने कहा कि भय छोड़िए, मैं सबके हित का उपाय सोचता हूँ।

तब ब्रह्मा ने अपनी बुद्धि से एक लाख अध्यायों का एक महान् ग्रन्थ रचा, जिसमें धर्म, अर्थ और काम, यह त्रिवर्ग, तथा चौथे विषय मोक्ष का भी विवेचन था। उसमें दण्डनीति (राज्य-शासन और दण्ड का शास्त्र) का विशाल अंग था; मन्त्रियों, गुप्तचरों, दूतों के लक्षण; साम, दान, भेद, दण्ड और उपेक्षा, यह पाँच उपाय; तीन प्रकार की सन्धियाँ; तीन प्रकार की विजय (धर्म से, धन से, और छल से प्राप्त); मन्त्र (राजकीय गुप्त परामर्श), राष्ट्र, दुर्ग, सेना और कोष, यह पंचवर्ग; तथा खुले और गुप्त दण्ड का सविस्तार वर्णन था। उसमें मित्र, शत्रु और तटस्थ का स्वरूप, सेना की व्यूह-रचना, युद्ध और पीछे हटने की रीति, अस्त्रों की रक्षा, राज्य के सात अंगों की वृद्धि-क्षय-संतुलन, और मनुष्य को धर्मपथ से न डिगने देने के समस्त उपाय निरूपित थे।

भीष्म ने बताया कि ग्रन्थ रचकर ब्रह्मा ने इन्द्रादि देवों से प्रसन्न होकर कहा कि लोकहित और त्रिवर्ग की स्थापना के लिए मैंने यह वाणी-नवनीत-सा शास्त्र रचा है; दण्ड के सहारे यह संसार की रक्षा करेगा। चूँकि दण्ड ही सबको शासित या नियन्त्रित करता है, इसलिए यह शास्त्र तीनों लोकों में “दण्डनीति” नाम से प्रसिद्ध होगा। तब बड़े नेत्रों वाले उमापति शिव ने पहले इसका अध्ययन किया, और मनुष्यों की क्रमशः घटती आयु देखकर उसे संक्षिप्त किया। शिव-कृत वह संक्षेप दस हज़ार अध्यायों का “वैशालाक्ष” कहलाया। उसे इन्द्र ने पाकर पाँच हज़ार अध्यायों का “बाहुदन्तक” बनाया; बृहस्पति ने उसे तीन हज़ार का “बार्हस्पत्य” किया; और योगाचार्य कवि (शुक्राचार्य) ने उसे एक हज़ार अध्यायों में समेट दिया। आयु और सर्वत्र हो रही ह्रास को देखकर महर्षियों ने लोकहित के लिए इस शास्त्र को इस प्रकार संक्षिप्त किया।

समझने की कुंजी (अवधारणा, संख्या): दण्डनीति-शास्त्र का यह क्रमिक संक्षेप राजनीति-ज्ञान की एक काल्पनिक वंशावली है: ब्रह्मा का एक लाख अध्यायों का मूल → शिव का दस हज़ार (वैशालाक्ष) → इन्द्र का पाँच हज़ार (बाहुदन्तक) → बृहस्पति का तीन हज़ार (बार्हस्पत्य) → शुक्राचार्य का एक हज़ार। आधुनिक दृष्टि में यह “ज्ञान घटती आयु और सामर्थ्य के अनुसार संक्षिप्त होता गया” का रूपक है, जैसे कोई विशाल विधि-संहिता समय के साथ सारगर्भित नियम-पुस्तिका में सिमट जाए।

आगे भीष्म ने कहा कि देवताओं ने प्रजापति विष्णु के पास जाकर प्रार्थना की कि मनुष्यों में किसी को औरों पर श्रेष्ठता देने योग्य ठहराइए। तब नारायण ने संकल्पमात्र से अपने तेज से विरजा नामक पुत्र उत्पन्न किया, किन्तु उसका मन राज्य में नहीं, संन्यास में लगा। विरजा का पुत्र कीर्तिमत् भी भोग से विरक्त रहा। कीर्तिमत् के पुत्र कर्दम ने कठोर तप किया। कर्दम के पुत्र अनंग प्रजा के रक्षक, धर्मनिष्ठ और दण्डनीति में निपुण हुए। अनंग के पुत्र अतिबल नीति में कुशल थे, पर विशाल साम्राज्य पाकर इन्द्रियों के दास बन गए। मृत्यु की मानस-कन्या सुनीता अतिबल को ब्याही गई, और उससे वेन नामक पुत्र हुआ।

वेन का अधर्म और पृथु का उदय: “राजा” तथा “पृथ्वी” नाम की उत्पत्ति

Radiant King Prithu rising newly-born from the body of the fallen tyrant Vena, sages anointing him as the earth, personified as a cow, yields its wealth before him.

भीष्म ने कहा कि क्रोध और द्वेष का दास वेन समस्त प्राणियों के प्रति अधर्मी हो गया। तब ब्रह्मवादी ऋषियों ने मन्त्रपूत कुश-तृणों से उसका वध कर दिया। मन्त्र पढ़ते हुए उन्होंने वेन की दाहिनी जाँघ मथी, और उससे एक छोटे अंगों वाला, जले हुए कोयले-सा, रक्तनेत्र और कृष्णकेश पुरुष निकला। ऋषियों ने उससे कहा, “निषीद” (यहीं बैठ जाइए); उसी से निषाद उत्पन्न हुए, अर्थात् पर्वत और वन में बसने वाली वे जातियाँ तथा विन्ध्य पर बसने वाले सहस्रों म्लेच्छ। फिर ऋषियों ने वेन की दाहिनी भुजा मथी, और उससे दूसरे इन्द्र-सा एक तेजस्वी पुरुष प्रकट हुआ, जो कवच पहने, धनुष-बाण और खड्ग धारण किए, वेद-वेदांगों और अस्त्रविद्या में निपुण था। दण्डनीति के समस्त नियम मूर्तिमान् होकर उस श्रेष्ठ पुरुष के पास आ गए।

वेन-पुत्र ने हाथ जोड़कर ऋषियों से पूछा कि मुझे जो तीक्ष्ण और धर्म-परायण बुद्धि मिली है, उससे मैं क्या करूँ? जो हितकर कार्य आप बताएँगे, वह मैं बिना हिचक पूरा करूँगा। तब देवों और ऋषियों ने कहा कि निर्भय होकर वे सब कार्य कीजिए जिनमें धर्म बसता है; प्रिय-अप्रिय छोड़कर समस्त प्राणियों को समान दृष्टि से देखिए; काम, क्रोध, लोभ और पक्षपात को दूर रखकर, जो भी धर्मपथ से विचले, उसे अपने ही हाथों दण्ड दीजिए। यह प्रतिज्ञा कीजिए कि मन, वचन और कर्म से आप सदा वेदोक्त धर्म का पालन करेंगे, दण्डनीति के सहारे वेद-विहित कर्तव्यों को निर्भय निभाएँगे, कभी मनमानी न करेंगे, ब्राह्मणों को दण्ड से मुक्त जानेंगे, और वर्ण-संकर से जगत् की रक्षा करेंगे। वेन-पुत्र ने उत्तर दिया कि श्रेष्ठ ब्राह्मणों की मैं सदा पूजा करूँगा। ऋषियों ने कहा, “ऐसा ही हो।”

तब ब्रह्मतेज के आगार शुक्र उसके पुरोहित बने, वालखिल्य उसके मन्त्री, सारस्वत उसके सहचर, और गर्ग उसके ज्योतिषी हुए। श्रुति की यह उद्घोषणा प्रसिद्ध है कि पृथु विष्णु से आठवें हैं। सूत और मागध नामक दो जन उत्पन्न होकर उसके स्तुति-पाठक बने; प्रसन्न होकर पृथु ने सूत को समुद्रतटवर्ती भूमि और मागध को मगध-देश दिया।

भीष्म ने कहा कि सुना है कि पहले पृथ्वी की सतह बड़ी ऊबड़-खाबड़ थी; वेन-पुत्र पृथु ने ही उसे समतल किया। उन्होंने अपने धनुष की नोक से चट्टानें हटाईं, जिससे पर्वत और बड़े हो गए। तब विष्णु, इन्द्रादि देव, ऋषि, लोकपाल और ब्राह्मण पृथु के राज्याभिषेक के लिए एकत्र हुए। मूर्तिमती पृथ्वी रत्नों की भेंट लेकर उनके पास आई; समुद्र, हिमवान् और शक्र ने अक्षय धन दिया; मेरु ने स्वर्ण के ढेर दिए; और मनुष्यों के कन्धों पर चढ़कर आने वाले कुबेर ने धर्म, अर्थ और काम की पूर्ति के योग्य धन दिया। वेन-पुत्र के स्मरणमात्र से करोड़ों अश्व, रथ, हाथी और मनुष्य उत्पन्न हो गए। उस समय न जरा थी, न दुर्भिक्ष, न रोग, न विपत्ति; उस राजा के रक्षण से किसी को साँप, चोर या किसी से भय न था। वे समुद्र की ओर बढ़ते तो जल जम जाता, पर्वत मार्ग दे देते, और उनका ध्वज कहीं रुकता न था। गौ से दूध-सा उन्होंने पृथ्वी से सत्रह प्रकार के अन्न दुहे, जिनसे यक्ष, राक्षस, नाग और समस्त प्राणियों का पोषण हुआ।

भीष्म ने नामों का रहस्य खोलते हुए कहा कि चूँकि उन्होंने समस्त प्रजा को रंजित (प्रसन्न) किया, इसलिए वे “राजन्” कहलाए; चूँकि उन्होंने ब्राह्मणों के क्षत (घाव) से उनकी रक्षा की, इसलिए “क्षत्रिय” कहलाए; और चूँकि उनके राज्य में पृथ्वी पर धर्म प्रसिद्ध हुआ, इसलिए वह “पृथ्वी” कहलाई। स्वयं विष्णु ने उनके बल को स्थिर करते हुए कहा कि कोई आपको लाँघ न सकेगा, और तप के प्रभाव से विष्णु उस राजा के शरीर में प्रविष्ट हुए; इसीलिए सारा जगत् मनुष्य-देव पृथु की पूजा करने लगा। इसी कारण समूह एक के आदेश पर चलता है, क्योंकि राजा में दिव्यता है। विष्णु के ललाट से एक स्वर्ण-कमल उत्पन्न हुआ, उससे श्री देवी प्रकट हुईं, जो धर्म की पत्नी बनीं; श्री में धर्म ने अर्थ को जन्म दिया, और धर्म, अर्थ तथा श्री, तीनों राजत्व में प्रतिष्ठित हुए। पुण्य क्षीण होने पर स्वर्ग से उतरकर मनुष्य दण्डनीति-कुशल राजा-रूप में जन्म लेता है; वह विष्णु का अंश होता है, इसीलिए सब एक की आज्ञा मानते हैं।

समझने की कुंजी (वंश, अवधारणा): वेन-पृथु आख्यान राजसत्ता की उत्पत्ति-कथा है। दुष्ट राजा वेन ऋषियों द्वारा मारा जाता है, और उसके शरीर के मन्थन से ही निषाद (अधर्म का अवशेष) तथा पृथु (आदर्श राजा) दोनों निकलते हैं। यहाँ “राजन्” शब्द रञ्जन (प्रजा को प्रसन्न करना) से, “क्षत्रिय” क्षत-त्राण (घाव से रक्षा) से, और “पृथ्वी” पृथु से जुड़ती है। यह व्युत्पत्ति बताती है कि राजपद का औचित्य भोग में नहीं, रक्षण और रञ्जन में है।

सार: सत्ययुग में मोह से धर्म घटा तो ब्रह्मा ने दण्डनीति-शास्त्र रचा, जो क्रमशः संक्षिप्त होता गया। दुष्ट वेन के वध और उसके शरीर-मन्थन से पृथु प्रकट हुए, जिन्होंने प्रजा को रञ्जित किया, पृथ्वी समतल की, और इसी से “राजा”, “क्षत्रिय” तथा “पृथ्वी” नाम पड़े। राजा में विष्णु का अंश है, इसी से वह पूज्य है।

चार वर्णों के धर्म और शूद्र के यज्ञ-अधिकार पर भीष्म

युधिष्ठिर ने फिर पूछा कि चार वर्णों के सामान्य और विशेष धर्म क्या हैं, राज्य और राजा किन साधनों से बढ़ते हैं, और राजा को किन कोषों, दण्डों, दुर्गों, मित्रों, मन्त्रियों, पुरोहितों तथा गुरुओं से बचना चाहिए। भीष्म ने धर्म और कृष्ण को प्रणाम करके कहा कि क्रोध का दमन, सत्यभाषण, न्याय, क्षमा, अपनी विवाहिता पत्नी से ही सन्तानोत्पत्ति, आचार-शुद्धि, कलह से बचना, सरलता और आश्रितों का भरण, यह नौ धर्म चारों वर्णों के समान हैं। फिर उन्होंने ब्राह्मण के विशेष धर्म बताए: आत्मसंयम, वेदाध्ययन और तप-सहिष्णुता। यदि अपने धर्म में लगे, ज्ञानवान् और शान्त ब्राह्मण को धन मिले तो वह विवाह करके सन्तान उत्पन्न करे, दान दे और यज्ञ करे; उस धन का उपभोग पात्रों में बाँटकर ही करना चाहिए।

क्षत्रिय के विषय में भीष्म ने कहा कि वह दान दे पर माँगे नहीं, स्वयं यज्ञ करे पर दूसरों का पुरोहित न बने, वेद पढ़े पर पढ़ाए नहीं, प्रजा की रक्षा करे और चोर-दुष्टों के विनाश के लिए युद्ध में पराक्रम दिखाए। बिना घाव खाए युद्ध से लौटने वाले क्षत्रिय की पुरातन शास्त्रवेत्ता प्रशंसा नहीं करते; उसके लिए चोरों के दमन से बढ़कर कोई धर्म नहीं। वैश्य दान, अध्ययन, यज्ञ और न्यायपूर्वक धनार्जन करे, तथा पुत्र-सा पशुओं का पालन करे। भीष्म ने उसकी जीविका का गणित भी बताया: छह गौएँ रखे तो एक का दूध, सौ रखे तो एक जोड़ा उसका पारिश्रमिक; दूसरे के धन से व्यापार करे तो लाभ का सातवाँ भाग उसका।

शूद्र के विषय में भीष्म ने कहा कि स्रष्टा ने उसे तीन वर्णों की सेवा के लिए रचा; इसी सेवा में उसका कल्याण है। वह वरिष्ठता-क्रम से तीनों की सेवा करे। शूद्र अत्यधिक धन-संचय न करे, क्योंकि धनी होने पर वह उच्च वर्णों को अपने अधीन कर लेगा और इससे पाप का भागी होगा; किन्तु राजा की अनुमति से, धर्म-कर्म के लिए, वह धन कमा सकता है। उसका स्वामी सन्तानहीन शूद्र को पिण्डदान दे, और दुर्बल-वृद्ध शूद्रों का भरण करे; शूद्र संकट में भी स्वामी को न छोड़े, और स्वामी का धन नष्ट हो तो उसे और भी निष्ठा से सहारा दे।

तब भीष्म ने एक गहरा मोड़ दिया: यज्ञ केवल तीन वर्णों का नहीं, शूद्र का भी विहित है। शूद्र स्वाहा-स्वधा या वेदमन्त्र नहीं बोल सकता, इसलिए वह वेदोक्त व्रतों के बिना “पाक-यज्ञ” नामक छोटे यज्ञों से देवों की पूजा करे, जिनकी दक्षिणा “पूर्ण-पात्र” कही गई है। उन्होंने स्मरण कराया कि प्राचीन काल में पैजवन नामक शूद्र ने ऐन्द्राग्नि विधि से एक लाख पूर्ण-पात्रों की दक्षिणा दी थी। समस्त यज्ञों में भक्ति ही श्रेष्ठ है; भक्ति महान् देवता है जो सब यजमानों को पवित्र करती है। मानस-यज्ञ सब वर्णों के लिए विहित है। यह सत्य नहीं कि देवता और श्रेष्ठ जन शूद्र के भी ऐसे यज्ञ की आहुति में हिस्सा लेने की इच्छा न रखें; इसी से भक्ति-रूप यज्ञ सब वर्णों के लिए विहित है। जो यज्ञ करना चाहे, वह चोर, पापी या पापियों में अधम भी हो, तो भी धर्मिष्ठ माना जाता है; ऋषि उसकी प्रशंसा करते हैं।

समझने की कुंजी (अवधारणा): वर्ण-धर्म का यह खण्ड महाभारत की नैतिक जटिलता को सपाट नहीं करता: एक ओर वह शूद्र पर कठोर प्रतिबन्ध (धन-संचय और वेदमन्त्र का निषेध) रखता है, दूसरी ओर वही उसके लिए यज्ञ और भक्ति का द्वार खोल देता है, और कहता है कि देवता शूद्र की भक्ति-आहुति भी स्वीकारते हैं। पैजवन का दृष्टान्त इसी विरोधाभास को सामने रखता है। पाठ अपने युग के सामाजिक ढाँचे को दर्ज करता है; हम उसे ज्यों-का-त्यों, बिना नरम किए, सुना रहे हैं।

सार: नौ धर्म सब वर्णों के समान; फिर ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र के पृथक् धर्म। यज्ञ चारों वर्णों के लिए विहित है, शूद्र के लिए भी पाक-यज्ञ और भक्ति के रूप में; भक्ति ही सब यज्ञों में श्रेष्ठ है।

चार आश्रम और क्षत्रिय-धर्म की सर्वोपरिता

भीष्म ने चार आश्रमों के नाम और धर्म बताए: वानप्रस्थ, भैक्ष्य (भिक्षावृत्ति), गार्हस्थ्य और ब्रह्मचर्य। ब्रह्मचारी संयमी होकर गुरु की सेवा करे, मन्त्रों का जप करे, और शत्रु का भी भला करे। गृहस्थ वेद पढ़कर विहित कर्म करे, सन्तान उत्पन्न करे, अपनी विवाहिता पत्नी से ही और ऋतुकाल में ही समागम करे, मितभोजी, देवभक्त, कृतज्ञ, कोमल और क्षमाशील हो, तथा ब्राह्मणों का आतिथ्य करे। गार्हस्थ्य के सब कर्तव्य निभाने के बाद वह पत्नी सहित या उसके बिना वन को जाकर वानप्रस्थ ग्रहण करे, आरण्यक पढ़े, और अन्ततः अक्षय आत्मा में लीन हो। नारायण-गीत वचन उन्होंने सुनाया: सत्य, सरलता, अतिथि-पूजा, धर्म-अर्थ की प्राप्ति और अपनी विवाहिता पत्नियों के सुख से मनुष्य इस लोक और परलोक, दोनों में नाना सुख भोगता है।

युधिष्ठिर ने पूछा कि हम-जैसों के लिए कौन-से धर्म शुभ और सबको प्रिय हैं? भीष्म ने कहा कि चारों आश्रम तो ब्राह्मण के लिए हैं; क्षत्रिय आदि उन्हें नहीं अपनाते। जो ब्राह्मण क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र के कर्मों में लगता है, वह इस लोक में निन्दित और परलोक में नरकगामी होता है। जैसे हाथी के पदचिह्न में सब प्राणियों के पदचिह्न समा जाते हैं, वैसे ही अन्य वर्णों के सब धर्म क्षत्रिय-धर्म में समा जाते हैं। दण्डनीति लुप्त हो तो वेद लुप्त हो जाएँ, और मनुष्यों के धर्म बताने वाले सब शास्त्र भी।

फिर भीष्म ने एक प्राचीन इतिहास सुनाया। जब दानव बढ़कर समस्त मर्यादाएँ तोड़ने लगे, तब बलशाली मान्धाता पृथ्वी के राजा हुए। नारायण के दर्शन की कामना से उन्होंने महायज्ञ किया, और भगवान् इन्द्र का रूप धरकर प्रकट हुए। इन्द्र-रूपी विष्णु ने पूछा कि अनादि-मध्य-अन्तरहित नारायण के दर्शन आप क्यों चाहते हैं; उन्हें तो न मैं, न ब्रह्मा देख सकते हैं; आप कोई और वर माँगिए। मान्धाता ने कहा कि मैं समस्त सांसारिक कामनाएँ छोड़कर धर्म कमाना और सत्पुरुषों का श्रेष्ठ मार्ग जानना चाहता हूँ; क्षत्रिय-धर्म से मैंने अनेक लोक और यश पाया, पर देवों से प्रवाहित वे श्रेष्ठ धर्म मैं नहीं जानता।

इन्द्र-रूपी विष्णु ने कहा कि जो राजा नहीं हैं, वे चाहे कितने ही धर्मनिष्ठ हों, धर्म का परम फल सहज नहीं पाते। आदि-देव से पहले राजधर्म प्रवाहित हुआ, अन्य धर्म बाद में; उन सबके फल क्षयशील हैं, राजधर्म उनसे ऊपर है क्योंकि उसमें सब धर्म समाए हैं। प्राचीन काल में विष्णु ने स्वयं क्षत्रिय-धर्म से शत्रुओं का दमन करके देवों-ऋषियों को राहत दी; यदि उन्होंने असुरों का वध न किया होता तो ब्राह्मण, ब्रह्मा और समस्त धर्म नष्ट हो जाते। युद्ध में प्राणत्याग, समस्त प्राणियों पर करुणा, लोक-ज्ञान, मनुष्यों की रक्षा, संकटग्रस्त और पीड़ितों को बचाना, यह सब क्षत्रिय-धर्म में है। काम-क्रोध के दास भी राजभय से खुले पाप नहीं करते, और सज्जन उसी प्रभाव से अपने धर्म निभा पाते हैं; इसी से क्षत्रिय-धर्म धर्मिष्ठ है।

मान्धाता ने पूछा कि यवन, किरात, गान्धार, चीन, शबर, बर्बर, शक, तुषार, पुलिन्द, काम्बोज आदि जो जातियाँ आर्य-राजाओं के राज्य में रहती हैं, उनके क्या धर्म हैं, और चोरी से जीने वाली जातियों को कैसे धर्म पर लाया जाए? इन्द्र-रूपी विष्णु ने कहा कि वे सब अपने माता-पिता, गुरुओं, वनवासी तपस्वियों और अपने राजा की सेवा करें, वेदोक्त रीति से पितरों के लिए यज्ञ करें, कुएँ खुदवाएँ, प्यासे राहगीरों को जल दें, ब्राह्मणों को शय्या और दान दें। अहिंसा, सत्य, क्रोध-दमन, स्वजनों का पालन, पवित्रता और शान्ति, यह उनके धर्म हैं; वे महँगे अन्न-धन की दक्षिणा वाले पाक-यज्ञ भी करें।

समझने की कुंजी (अवधारणा): “क्षत्रिय-धर्म सर्वोपरि है” यह भीष्म का केन्द्रीय राजनीतिक सिद्धान्त है, जो हाथी के पदचिह्न के दृष्टान्त में खुलता है। इसका तर्क यह है कि दण्ड और रक्षण के बिना अन्य सब आश्रम और वर्ण-धर्म टिक नहीं सकते: यज्ञ, अध्ययन, तप, सब राजा की रक्षा पर निर्भर हैं। मान्धाता-संवाद इसी को नारायण के मुख से प्रमाणित करता है, जहाँ स्वयं विष्णु क्षत्रिय-धर्म से असुर-वध करते दिखाए जाते हैं।

सार: चार आश्रम मुख्यतः ब्राह्मण के लिए हैं, और क्षत्रिय-धर्म सब धर्मों में सर्वोपरि, क्योंकि उसी से अन्य धर्म रक्षित रहते हैं। मान्धाता-संवाद में इन्द्र-रूपी विष्णु इसी सिद्धान्त की पुष्टि करते हैं और सीमावर्ती तथा चोर-जातियों के लिए भी धर्म बताते हैं।

राजा से अन्य आश्रमों के फल और राज्य की प्रथम कर्तव्य-सूची

भीष्म ने कहा कि नारायण इन्द्र-रूप में यह कहकर अपने धाम लौट गए। फिर उन्होंने युधिष्ठिर से कहा कि दूसरों के विभिन्न आश्रम-धर्मों से राजा को जो पुण्य मिलता है, वह सुनिए। जो राजा काम-द्वेष से रहित होकर, दण्डनीति के सहारे, सब प्राणियों को समान दृष्टि से देखकर शासन करता है, वह भैक्ष्य आश्रम का फल पाता है; जो ज्ञानवान् होकर पात्रों को यथासमय दान देता है और शास्त्रानुसार आचरण करता है, वह गार्हस्थ्य का फल पाता है; जो संकट में पड़े स्वजनों-मित्रों को यथाशक्ति बचाता है, वह वानप्रस्थ का फल पाता है। जो समस्त प्राणियों की और अपने राज्य की उचित रक्षा करता है, वह उतने ही यज्ञों का पुण्य पाकर संन्यास का फल प्राप्त करता है। प्रतिदिन मन्त्र-जप और देवपूजा से गार्हस्थ्य का; राज्य-रक्षा के संकल्प से युद्ध में उतरने पर वानप्रस्थ का; और समस्त प्राणियों पर करुणा तथा क्रूरता-त्याग से वह सब आश्रमों का फल पाता है।

भीष्म ने जोड़ा कि राजा अपनी प्रजा के पुण्य का चौथाई भाग पाता है यदि वह उनकी ठीक रक्षा करे; और यदि रक्षा न करे तो प्रजा के पाप का भागी होता है। एक दिन भी प्रजा को भय से न बचाने का पाप ऐसा है कि राजा सहस्र वर्ष नरक भोगता है; और एक ही दिन धर्मपूर्वक रक्षा का पुण्य ऐसा है कि वह दस सहस्र वर्ष स्वर्ग भोगता है। राज्य-रूपी नौका, जिसकी हवा दान है, रस्से शास्त्र हैं, कर्णधार की शक्ति बुद्धि है, और जो धर्म के बल पर तैरती है, उसके सहारे राजा संसार-सागर सहज पार कर लेता है। रक्षा के इसी एक धर्म से राजा वनवासी तपस्वियों से सौ गुना अधिक पुण्य कमाता है।

तब युधिष्ठिर ने राज्य के प्रधान धर्म पूछे। भीष्म ने कहा कि राजा का चयन और अभिषेक राज्य का प्रथम कर्तव्य है। अराजकता वाला राज्य दुर्बल होकर शीघ्र चोरों से पीड़ित हो जाता है; वहाँ धर्म नहीं ठहरता, लोग एक-दूसरे को खा जाते हैं। अराजकता से बुरी कोई दशा नहीं। श्रुति कहती है कि राजा के अभिषेक में मानो इन्द्र का ही अभिषेक होता है, इसलिए समृद्धिकामी इन्द्र-समान राजा की पूजा करे। यदि कोई बलवान् राजा अराजक देश को मिलाने आए, तो प्रजा उसका आदर से स्वागत करे; जो आसानी से दूही जा सके वह गौ कष्ट नहीं पाती, जो सहज झुक जाए वह वृक्ष काटा नहीं जाता; इसी से बलवान् के आगे झुकना बुद्धिमानी है, क्योंकि बलवान् के आगे झुकना मानो इन्द्र के आगे झुकना है।

भीष्म ने वह प्रसिद्ध मत्स्य-न्याय सुनाया: यदि दण्ड चलाने वाला राजा न हो, तो बलवान् दुर्बल को वैसे ही खा जाए जैसे जल में बड़ी मछली छोटी को। प्राचीन काल में अराजकता से लोग एक-दूसरे को निगलकर नष्ट होने लगे थे। तब कुछ लोगों ने मिलकर यह सन्धि की कि जो कठोर बोले, उग्र हो, परस्त्री का अपहरण करे या दूसरे का धन लूटे, उसे हम त्याग देंगे; पर इससे शान्ति न मिली। तब वे पीड़ित होकर ब्रह्मा के पास गए और राजा माँगा। ब्रह्मा ने मनु से कहा, पर मनु ने अस्वीकार किया कि मैं पापकर्मों से डरता हूँ, और सदा झूठे-कपटी मनुष्यों पर शासन अत्यन्त कठिन है।

तब पृथ्वीवासियों ने मनु से कहा कि भय न कीजिए; जो पाप प्रजा करेगी वह उन्हीं को लगेगा, आपको नहीं। हम अपने पशु-धन का पचासवाँ, धातुओं का पचासवाँ और अन्न का दसवाँ भाग आपको देंगे; अपनी कन्याओं में श्रेष्ठ आपको देंगे; अस्त्र-अश्व-वाहन में निपुण वीर देवों-सा आपके पीछे चलेंगे; प्रजा के पुण्य का चौथाई आपका होगा। मनु ने यह सुनकर बड़ी सेना के साथ प्रस्थान किया; उनके तेज से भयभीत होकर लोग अपने-अपने धर्म में लग गए, और मनु ने वर्षा-बादल-से सर्वत्र भ्रमण कर दुष्कर्म रोके और सबको कर्तव्यों में लगाया।

एक उप-कथा: मनु के राजपद-स्वीकार की यह कथा भारतीय “सामाजिक अनुबन्ध” का प्राचीन रूप है। मनु पहले इनकार करते हैं कि राज-शासन पापमय और दुष्कर है; प्रजा तब उन्हें कर (पशु का पचासवाँ, अन्न का दसवाँ भाग), श्रेष्ठ कन्याएँ, वीर सैनिक और पुण्य का चौथाई हिस्सा देने का वचन देती है। राजा और प्रजा के बीच यह आदान-प्रदान, रक्षण के बदले कर और सम्मान, राजधर्म की नींव है। मत्स्य-न्याय (बड़ी मछली का छोटी को निगलना) इसी अनुबन्ध का तर्क है: बिना दण्ड के समाज स्वयं को नष्ट कर लेता है।

सार: राजा से दूसरों के आश्रम-धर्मों का भी फल मिलता है; रक्षा ही उसका परम पुण्य है। राज्य का प्रथम कर्तव्य राजा का अभिषेक है, क्योंकि अराजकता में मत्स्य-न्याय फैलता है। मनु ने प्रजा के अनुबन्ध और वचनों पर ही राजपद स्वीकारा।

राजा देवता क्यों: बृहस्पति और वसुमना का संवाद

युधिष्ठिर ने पूछा कि ब्राह्मणों ने राजा को देवता क्यों कहा है? भीष्म ने उत्तर में बृहस्पति और कोसल-राजा वसुमना का प्राचीन संवाद सुनाया। बुद्धिमान् वसुमना ने विनयपूर्वक बृहस्पति की परिक्रमा करके पूछा कि प्राणी किनसे बढ़ते और किनसे नष्ट होते हैं, और किसकी पूजा से नित्य सुख पाते हैं? बृहस्पति ने कहा कि सब मनुष्यों के धर्म की जड़ राजा है; राजभय से ही लोग एक-दूसरे को नहीं खाते। जैसे सूर्य-चन्द्र न उगें तो सब अन्धकार में डूब जाएँ, और छिछले जल की मछलियाँ तथा निरापद स्थान के पक्षी थोड़ी देर स्वच्छन्द विचरकर अन्ततः परस्पर लड़कर नष्ट हो जाएँ, वैसे ही बिना राजा के मनुष्य चरवाहे-विहीन गाय के झुण्ड-से अन्धकार में नष्ट हो जाते हैं।

बृहस्पति ने गिनाया कि यदि राजा रक्षा न करे, तो बलवान् दुर्बल का धन और प्राण छीन ले; कोई “यह मेरा है” न कह सके; पत्नी, पुत्र, अन्न और सम्पत्ति कुछ न बचे; लोग वृद्ध माता-पिता, गुरुओं और अतिथियों तक का अपमान या हिंसा करें; विवाह और मर्यादाएँ टूट जाएँ; कृषि-व्यापार बिखर जाए; तीनों वेद लुप्त हो जाएँ; यज्ञ न हों; समाज ही न रहे। राजरक्षण से ही लोग द्वार खुले रखकर निर्भय सोते हैं, आभूषण पहने स्त्रियाँ बिना रक्षक के निःशंक विचरती हैं, और तीनों वर्ण यज्ञ तथा विद्या में लगते हैं।

बृहस्पति ने कहा कि राजा को मनुष्य समझकर कोई उसकी उपेक्षा न करे, क्योंकि वह मनुष्य-रूप में उच्च देवता है। वह पाँच अवसरों पर पाँच रूप धारण करता है: छली अपराधी को अपने तेज से भस्म करते समय अग्नि; गुप्तचरों से सबके कर्म देखकर लोकहित करते समय आदित्य; क्रोध में दुष्टों को कुल सहित नष्ट करते समय मृत्यु (विनाशक); दुष्टों को दण्ड और सज्जनों को पुरस्कार देते समय यम; और सेवकों को धन देते तथा अपराधियों का धन छीनते समय कुबेर। जिसमें प्रजा बसती है और जिसके नाश में प्रजा नष्ट होती है, उस राजा की पूजा कौन न करे? राजा का धन दूर से ही त्याज्य है; राजधन हड़पने वाला विष छू लेने वाले हिरण-सा शीघ्र नष्ट होता है। जो मन्त्री कृतज्ञ, बुद्धिमान्, उदार, निष्ठावान् और जितेन्द्रिय हो, राजा उसका सम्मान करे। राजा प्रजा का हृदय, शरण, गौरव और परम सुख है। इस उपदेश से वसुमना तब से प्रजा की रक्षा करने लगे।

समझने की कुंजी (अवधारणा): “राजा देवता है” वाला कथन भक्ति या चापलूसी नहीं, अपितु एक संस्थागत सिद्धान्त है: राजा पाँच कार्यों में पाँच देव-शक्तियों (अग्नि-दण्ड, आदित्य-दृष्टि, मृत्यु-संहार, यम-न्याय, कुबेर-कोष) का प्रतिनिधित्व करता है। यह राजपद की भूमिकाओं का रूपक है, व्यक्ति-पूजा नहीं। पाठ साथ ही चेताता है कि राजधन का दुरुपयोग विष-सा घातक है, इसलिए यह देवत्व उत्तरदायित्व से बँधा है।

सार: बृहस्पति ने वसुमना को समझाया कि राजरक्षण के बिना समाज ध्वस्त हो जाए; राजा मनुष्य-रूप में देवता है, जो अग्नि, आदित्य, मृत्यु, यम और कुबेर के पाँच रूप धारण करता है। इसी से वह पूज्य है, पर राजधन का दुरुपयोग विष-सा घातक है।

आत्म-विजय, गुप्तचर, कोष और सात अंग: राज्य-रक्षा की विस्तृत नीति

युधिष्ठिर ने पूछा कि राजा कैसे राज्य की रक्षा करे, शत्रु को वश में करे, गुप्तचर कैसे नियुक्त करे, और चारों वर्णों, सेवकों, पत्नियों तथा पुत्रों में विश्वास कैसे जगाए। भीष्म ने कहा कि राजा पहले स्वयं को जीते, फिर शत्रु को; जो अपने को न जीत सके वह शत्रु को क्या जीतेगा? पाँच इन्द्रियों का जय ही आत्म-जय है। वह दुर्ग, सीमा, नगर, उद्यान और अपने महल तक में सैनिक रखे। गुप्तचरों को मूर्ख, अन्धे या बहरे-से दीखने वाले, भूख-प्यास सहने वाले, परीक्षित और बुद्धिमान् पुरुष बनाए, जो एक-दूसरे को न पहचानें। दुकानों, उद्यानों, सभाओं, तीर्थों और नागरिकों के घरों में भी गुप्तचर रखकर वह शत्रु के भेदियों को पहचाने।

भीष्म ने कूटनीति के व्यावहारिक सूत्र दिए: अपने को दुर्बल पाने पर राजा बलवान् शत्रु से सन्धि करे; बलवान् होकर भी, यदि लाभ हो, तो शीघ्र सन्धि कर ले। संकट के समय पहले उपेक्षित अपराधियों और जनता द्वारा संकेतित दोषियों का वध करे। जो न लाभ दे न हानि, या जो स्वयं को संकट से न उबार सके, उससे राजा का कोई प्रयोजन नहीं। आक्रमण के समय, अपनी राजधानी की रक्षा का प्रबन्ध करके, बिना गन्तव्य घोषित किए, बड़ी सेना के साथ प्रसन्न मन से कूच करे, और मित्रहीन, अन्यत्र युद्ध में उलझे, या अपने से दुर्बल शत्रु पर चढ़ाई करे। दुर्बल होकर भी वह बलवान् की सदा अधीनता में न रहे, अपितु अस्त्र, अग्नि और विष से, तथा शत्रु के मन्त्रियों-सेवकों में फूट डालकर उसे पीड़ित करे। बृहस्पति का मत है कि बुद्धिमान् राजा भूमि-लाभ के लिए युद्ध से बचे और साम, दान, भेद से अधिकार बढ़ाए।

भीष्म ने कर-व्यवस्था बताई: राजा प्रजा की आय का छठा भाग रक्षण के व्यय हेतु कर के रूप में ले, और शास्त्रोक्त दस प्रकार के अपराधियों से उनकी रक्षा के लिए न्यून या अधिक धन बलपूर्वक ले। वह प्रजा को सन्तान-सा देखे, पर न्याय में पक्षपात या दया न करे; न्याय-निर्णय के लिए लोकज्ञ बुद्धिमानों को नियुक्त करे, क्योंकि राज्य उचित न्याय-व्यवस्था पर ही टिका है। खानों, नमक, अन्न, घाट और गजसेना पर ईमानदार पुरुष नियुक्त करे। उचित दण्ड का विधान राजा का परम धर्म है; न्याय न करने वाले राजा को न स्वर्ग मिलता है, न यश।

दुर्ग-रक्षा के लिए भीष्म ने सूक्ष्म आदेश दिए: बलवान् से पीड़ित राजा दुर्ग में शरण ले; खुले देश के निवासियों को सुरक्षित दुर्गों में बुला ले; अन्न-भण्डार दुर्ग में भर ले, और न हो सके तो जला दे; शत्रु के खेत और फल काट दे; नदियों के पुल तोड़ दे; तालाब उलीच दे या विषाक्त कर दे। चैत्य-वृक्षों को छोड़कर छोटे वृक्ष काट दे, बड़े वृक्षों की शाखाएँ छाँट दे। दुर्ग के चारों ओर प्राचीर, जल से भरी खाइयाँ, नुकीले खूँटे, मगर-मच्छ; द्वारों पर यन्त्र और शतघ्नी (सौ को मारने वाला अस्त्र) रखे। घास-फूस के घर मिट्टी से लीप दे, ग्रीष्म में अग्नि-भय से घास हटा ले, भोजन रात में पकवाए, और दिन में आग जलाने वाले को दण्ड दे। भिखारी, नपुंसक, उन्मत्त और भाँड़ नगर से निकाल दे। शस्त्र, औषधि, तेल, घी, मधु, कोयला, बाण, लेखक, और नाना अस्त्र संचित रखे; भयभीत करने वाले को, चाहे वह सेवक, मन्त्री या पड़ोसी राजा हो, शीघ्र वश में करे।

तब भीष्म ने सात अंग गिनाए जिनकी राजा रक्षा करे: स्वयं, मन्त्री, कोष, दण्ड-व्यवस्था, मित्र, राष्ट्र और राजधानी। फिर “षाड्गुण्य” (छह नीतियाँ: सन्धि, युद्ध, भेद, संग्रह-से-भयभीत करना, युद्ध-शान्ति की तैयारी, और गठबन्धन); “त्रिवर्ग-संग्रह” (क्षय, स्थिति और वृद्धि); तथा धर्म-अर्थ-काम का उच्च त्रिवर्ग बताया। बृहस्पति-गीत श्लोक सुनाया: समस्त कर्तव्य निभाकर, नगरों और प्रजा की रक्षा करने वाला राजा स्वर्ग में परम सुख पाता है; जो प्रजा की भली रक्षा करे, उसे तप या यज्ञ की क्या आवश्यकता।

समझने की कुंजी (अवधारणा): “सप्तांग” (राज्य के सात अंग) और “षाड्गुण्य” (छह विदेश-नीतियाँ) प्राचीन भारतीय राजनीति-शास्त्र की आधारशिला हैं, जो आगे कौटिल्य के अर्थशास्त्र में भी विस्तृत होती हैं। सात अंग राज्य को एक जैविक शरीर मानते हैं: स्वयं (राजा) सिर, मन्त्री बुद्धि, कोष रक्त, दण्ड-व्यवस्था भुजा, मित्र-राष्ट्र-राजधानी शेष अंग। छह गुण शत्रु के साथ बरते जाने वाले छह विकल्प हैं: सन्धि, युद्ध, भेद, बल-संचय, द्विधा-स्थिति और आश्रय।

सार: राजा पहले इन्द्रिय-जय करे, गुप्तचर-तन्त्र बिछाए, साम-दान-भेद से शत्रु साधे, छठाँश कर ले, न्याय में निष्पक्ष रहे, दुर्ग और संचय की सूक्ष्म तैयारी करे, और सप्तांग, षाड्गुण्य तथा धर्म-अर्थ-काम के त्रिवर्ग की रक्षा करे।

दण्डनीति और चार युग: छत्तीस गुण

युधिष्ठिर ने दण्ड, राजा और प्रजा के पारस्परिक लाभ पर प्रश्न किया। भीष्म ने दण्डनीति की महिमा गाई: दण्ड ही सब मनुष्यों को अपने-अपने वर्ण-धर्म में बाँधता है और सुख-शान्ति का स्रोत है। फिर उन्होंने एक गहन सिद्धान्त दिया: “राजा युग बनाता है या युग राजा बनाता है?” इसमें सन्देह न करना; सत्य यह है कि राजा ही युग बनाता है। जब राजा पूर्णतया और कठोरता से दण्डनीति पर टिककर शासन करता है, तब सत्ययुग होता है: धर्म ही रहता है, अधर्म नहीं; रोग मिटते हैं, सब दीर्घायु होते हैं, पत्नियाँ विधवा नहीं होतीं, और पृथ्वी बिना जोते अन्न देती है।

जब राजा दण्डनीति के चार में से तीन भाग पालता है, तब त्रेता आता है, चौथाई अधर्म फैलता है, और पृथ्वी जोतने पर अन्न देती है। आधा पालता है तो द्वापर, जहाँ आधा अधर्म, आधी कृषि-निर्भरता; और दण्डनीति को पूर्णतः छोड़कर प्रजा को कुमार्ग से पीड़ित करता है तो कलियुग, जहाँ अधर्म पूर्ण और धर्म लुप्त, शूद्र भिक्षा से और ब्राह्मण सेवा से जीते हैं, वर्ण-संकर होता है, स्त्रियाँ विधवा होती हैं और मनुष्य अकाल-मृत्यु पाते हैं। राजा ही चारों युगों का कारण है: सत्ययुग रचे तो शाश्वत स्वर्ग; कलियुग रचे तो प्रजा के पापों में डूबकर असंख्य वर्ष नरक भोगे। दण्डनीति का ठीक प्रयोग राजा का परम पुण्य है, क्योंकि प्राणियों के जीवन इसी पर टिके हैं।

तब युधिष्ठिर ने पूछा कि किस आचरण से राजा यहाँ और परलोक में सुखद फल सहज पाता है। भीष्म ने “छत्तीस गुण” गिनाए जो छत्तीस अन्य गुणों से जुड़े हैं: राजा क्रोध-द्वेष से रहित होकर धर्म निभाए, दया न छोड़े, श्रद्धा रखे, बिना अत्याचार धन कमाए, बिना आसक्ति सुख भोगे, बिना डींग के वीर हो, बिना क्रूरता पराक्रमी हो, दुष्टों से बचकर मित्रता करे, मित्रों से शत्रुता न करे, अपात्र को दान न दे, बिना सावधान जाँच के दण्ड न दे, अपने गुप्त परामर्श प्रकट न करे, अपने मुँह से अपनी प्रशंसा न करे, सत्पुरुषों से कर न ले, अपकारी पर विश्वास न करे, द्वेष न पाले, अपनी विवाहिता पत्नियों की रक्षा करे, अति-स्त्री-संग न करे, हितकर भोजन ही करे, गुरुओं की सच्ची सेवा करे, बिना गर्व देवपूजा करे, यश तो चाहे पर अपयश का काम न करे, समय की प्रतीक्षा करे, किसी को रीते वचनों से न लौटाए, कृपा करके फिर त्याग न दे, अज्ञान में प्रहार न करे, शत्रु को मारकर शोक न करे, और बिना अवसर क्रोध न दिखाए। इन गुणों वाला राजा पृथ्वी पर अनेक आशीष और स्वर्ग में महान् फल पाता है। यह सुनकर भीम आदि से रक्षित युधिष्ठिर ने पितामह की पूजा की और उसी शिक्षा से शासन करने लगे।

समझने की कुंजी (अवधारणा): “राजा ही युग रचता है” शान्ति पर्व का परम साहसी राजनीतिक कथन है। यह युगों (सत्य, त्रेता, द्वापर, कलि) को नियति या ब्रह्माण्डीय घड़ी नहीं, अपितु शासन की गुणवत्ता का प्रतिफल बताता है: राजा दण्डनीति का जितना अंश पालता है, युग उतना ही उज्ज्वल या पतित होता है। यह उत्तरदायित्व को पूरी तरह राजा पर डालता है, और भाग्यवाद को नकारता है।

सार: दण्डनीति सबको धर्म में बाँधती है; राजा ही युग बनाता है, दण्डनीति का पूर्ण पालन सत्ययुग और पूर्ण त्याग कलियुग लाता है। छत्तीस राजगुणों से राजा इहलोक-परलोक में फल पाता है।

कोष का धर्म: फूलवाला बनिए, कोयलावाला नहीं

युधिष्ठिर ने पूछा कि राजा बिना शोक और बिना अधर्म प्रजा की रक्षा कैसे करे। भीष्म ने कहा कि वह वेदनिष्ठ, व्रती, गुणी ब्राह्मणों की पूजा करे, उनके आने पर पुरोहित सहित उठकर उनके चरण छुए, और दान देकर उनसे मंगल-आशीष कहलवाए। सत्य, बुद्धि और विवेक अपनाए, काम-क्रोध त्यागे। जो मूढ़ राजा काम-क्रोध छोड़े बिना अर्थ का अनुसरण करता है, वह धर्म खोता है और अन्ततः अर्थ भी। लोभी और मूर्ख को अर्थ-काम के कार्यों में न लगाए।

कोष के विषय में भीष्म का सूत्र मार्मिक है: राजा भूमि की उपज का छठाँश, अपराधियों से अर्थदण्ड, और शास्त्रोक्त रीति से व्यापारियों-सौदागरों से कर लेकर कोष भरे, और इस प्रकार चले कि प्रजा को अभाव की पीड़ा न हो। अधर्म या लोभ से कोष भरने की कभी इच्छा न करे। जैसे गाय के थन काटकर दूध नहीं मिलता, वैसे ही अनुचित साधनों से पीड़ित राज्य राजा को लाभ नहीं देता; और जो दुधारू गाय को कोमलता से सहेजता है उसे दूध मिलता रहता है। भीष्म ने स्पष्ट कहा कि हे राजन्, फूलवाले का अनुकरण कीजिए, कोयलावाले का नहीं; अर्थात् फूल चुनने वाला पौधे को बचाकर बार-बार फूल पाता है, पर कोयला बनाने वाला वृक्ष को ही जलाकर एक बार में नष्ट कर देता है।

भीष्म ने जोड़ा कि शत्रु-राज्य पर आक्रमण से यदि कोष रीत जाए, तो ब्राह्मणों को छोड़कर शेष सब से धन ले; घोर संकट में भी धनी ब्राह्मण को देखकर मन न डिगे, अपितु यथाशक्ति उन्हें धन देकर सान्त्वना दे। एक दिन भी प्रजा को भय से न बचाने का पाप सहस्र वर्ष नरक भुगवाता है, और एक दिन की धर्म-रक्षा दस सहस्र वर्ष स्वर्ग देती है।

तभी युधिष्ठिर ने एक गहरा संशय रखा: मुझे राज्य का सुख या राज्य स्वयं नहीं चाहिए; मैं तो उससे मिलने वाले पुण्य के लिए ही चाहता था, पर अब लगता है उसमें पुण्य ही नहीं; अतः मैं वन में जाकर फल-मूल पर तपस्वी-जीवन बिताकर धर्म कमाऊँगा। भीष्म ने उत्तर दिया कि मैं आपके कोमल और निरीह स्वभाव को जानता हूँ, पर केवल निरीहता से राज्य नहीं चलता। आप अत्यन्त धर्मात्मा, करुणामय और मृदु हैं, पर तेजहीन होने से लोग आपका अधिक आदर नहीं करते। अपने पिता और पितामह के मार्ग पर चलिए; राजा को वह आचरण नहीं अपनाना चाहिए जो आप अपनाना चाहते हैं। आपके पिता पाण्डु आपके लिए साहस, बल और सत्य माँगते थे, और माता कुन्ती उदारता तथा उच्च-मनस्विता। दान, अध्ययन, यज्ञ और प्रजा-रक्षा, चाहे पुण्य हों या पाप, आप उन्हीं के लिए जन्मे हैं। जो भार आप पर रखा गया है, उसे ढोने में चूकने वाले का भी यश नहीं घटता, पर पूर्ण अकर्मण्यता घोर पापमय है; थोड़े पुण्य वाला सत्कर्म भी पूर्ण अकर्म से श्रेष्ठ है।

शरशय्या पर लेटे रक्तरंजित भीष्म हाथ उठाकर पास आए व्याकुल युधिष्ठिर और कृष्ण से बोलते हुए।

युधिष्ठिर ने पूछा कि कौन-से कर्म स्वर्ग और महान् फल देते हैं। भीष्म ने कहा कि जिससे भयभीत मनुष्य को एक क्षण भी अभय मिल जाए, वही हम सबमें स्वर्ग का परम अधिकारी है, यह नितान्त सत्य है। हे कुरुश्रेष्ठ, आप प्रसन्न मन से कुरुओं के राजा बनिए, स्वर्ग पाइए, सज्जनों की रक्षा और दुष्टों का संहार कीजिए; आपके मित्र और सज्जन आपसे वैसे ही आश्रय पाएँ जैसे प्राणी मेघ से और पक्षी मधुर फलों वाले विशाल वृक्ष से।

एक उप-कथा: “फूलवाला बनाम कोयलावाला” का दृष्टान्त राजकोष-नीति का हृदय है। माली फूल चुनकर पौधे को जीवित रखता है, सो हर ऋतु फूल पाता है; कोयला बनाने वाला पूरे वृक्ष को जलाकर एक बार में लाभ लेता है, फिर कुछ नहीं बचता। इसी तरह जो राजा प्रजा से माप-तौलकर कर लेता है वह दीर्घकाल तक समृद्धि दुहता है, और जो लोभ में प्रजा को निचोड़ लेता है वह स्रोत ही सुखा देता है। गाय के थन काटने का रूपक भी यही कहता है: अति-दोहन स्वयं अपने पोषण को मार देता है।

सार: राजा छठाँश कर और शास्त्रोक्त साधनों से कोष भरे, पर लोभ से प्रजा को न निचोड़े; फूलवाले-सा बने, कोयलावाले-सा नहीं। युधिष्ठिर के वन जाने के संकल्प को भीष्म ने यह कहकर लौटाया कि भयभीत को अभय देना ही परम धर्म है, अतः वे राज्य करें।

ब्राह्मण और क्षत्रिय: पुरोहित का चयन और परस्पर निर्भरता

भीष्म ने कहा कि जो सज्जनों की रक्षा और दुष्टों को दण्ड दे, ऐसे को ही राजा अपना पुरोहित बनाए। इस सम्बन्ध में पुरूरवा (इला-पुत्र) और मातरिश्वा (वायु) का संवाद है। पुरूरवा ने पूछा कि ब्राह्मण कहाँ से उत्पन्न हुआ और अन्य वर्ण कहाँ से? मातरिश्वा ने कहा कि ब्राह्मण ब्रह्मा के मुख से, क्षत्रिय दो भुजाओं से, वैश्य दो जंघाओं से, और इन तीनों की सेवा के लिए शूद्र दोनों चरणों से उत्पन्न हुआ। पुरूरवा ने पूछा कि यह पृथ्वी धर्मतः किसकी है। वायु ने कहा कि जन्म और प्राथमिकता के कारण विश्व का सब कुछ ब्राह्मण का है; जैसे पति के अभाव में स्त्री उसके छोटे भाई को स्वीकारती है, वैसे ही ब्राह्मण के अस्वीकार करने पर पृथ्वी ने उसके अनुज क्षत्रिय को अपना स्वामी स्वीकारा।

वायु ने जोड़ा कि कुलीन, विनयी और बुद्धिमान् ब्राह्मण राजा को हर विषय में सुमार्ग दिखाता है; राजा जब तक धर्मनिष्ठ और निरभिमान होकर ब्राह्मण की शिक्षा सुनना चाहता है, तब तक सम्मानित और यशस्वी रहता है। राजा का पुरोहित प्रजा के पुण्य में भागी होता है; ऐसे राजा पर भरोसा करके प्रजा धर्मनिष्ठ और निर्भय हो जाती है, और राजा उनके धर्म-कर्मों का चौथाई भाग पाता है। यज्ञ पर देव, मनुष्य, पितर, गन्धर्व, उरग और राक्षस सब टिके हैं, और यज्ञ राजा पर; अराजक देश में यज्ञ नहीं होता। जो भयभीत के भय हरता है, वही महान् पुण्य पाता है; तीनों लोकों में प्राण-दान-सा कोई दान नहीं। राजा इन्द्र है, यम है, धर्म है; राजा ही सबको धारण करता है।

भीष्म ने तीसरी बार इसी सूत्र को ऐल-पुत्र और कश्यप के संवाद से गहराया। ऐल ने पूछा कि जब ब्राह्मण क्षत्रिय को या क्षत्रिय ब्राह्मण को छोड़ दे, तो श्रेष्ठ कौन और अन्य वर्ण किसका आश्रय लें? कश्यप ने कहा कि जब दोनों परस्पर विरोध करें, तब राज्य का नाश होता है, चोर फैलते हैं, बैल-सन्तान नहीं पनपते, दूध नहीं मथा जाता और यज्ञ नहीं होते। क्षत्रिय ब्राह्मण की वृद्धि का कारण है और ब्राह्मण क्षत्रिय की; दोनों परस्पर रक्षा करते हैं, और दोनों के मिलने से ही प्रजा सुखी रहती है।

तब ऐल ने रुद्र के विषय में पूछा, और कश्यप ने कहा कि रुद्र मनुष्यों के हृदय में बसते हैं; वे जिस देह में रहते हैं उसे और दूसरों की देह को भी नष्ट करते हैं। ऐल ने आपत्ति की कि यदि पापियों के पाप से दण्ड सज्जन-दुर्जन दोनों को छूता है, तो मनुष्य सत्कर्म ही क्यों करें? कश्यप ने कहा कि पापियों की संगति से ही निष्पाप दण्ड पाते हैं, जैसे गीली लकड़ी सूखी के साथ मिलकर जल जाती है; इसलिए निष्पाप को पापियों से संग न करना चाहिए। ऐल ने कहा कि पृथ्वी, सूर्य, वायु और जल तो सज्जन-दुर्जन में भेद नहीं करते। कश्यप ने उत्तर दिया कि इस लोक में ऐसा ही है, पर परलोक में धर्मात्मा और पापी की गति में महान् अन्तर है: पुण्यवान् मधु-से, स्वर्ण-से दीप्त लोक पाते हैं जहाँ मृत्यु, जरा और शोक नहीं; पापी का स्थान नरक है, जहाँ अन्धकार और अविराम पीड़ा है।

समझने की कुंजी (अवधारणा): ब्राह्मण-क्षत्रिय की परस्पर निर्भरता राजधर्म का स्थायी सूत्र है: तप-मन्त्र का बल ब्राह्मण में, अस्त्र-शस्त्र का बल क्षत्रिय में; दोनों अलग-अलग प्रयुक्त हों तो जगत् को धारण नहीं कर सकते। पाठ इसे अग्नि-जल, क्षत्रिय-ब्राह्मण, लोहा-पत्थर के उपमानों से खोलता है: जैसे लोहा पत्थर से, अग्नि जल से, वैसे ही क्षत्रिय अपने मूल ब्राह्मण से टकराए तो उसकी शक्ति स्वयं शान्त हो जाती है।

सार: राजा सुयोग्य ब्राह्मण को पहले पुरोहित नियुक्त करके फिर अपना अभिषेक कराए। पुरूरवा-वायु और ऐल-कश्यप संवादों में ब्राह्मण-क्षत्रिय की परस्पर निर्भरता बताई गई: इनके बीच फूट राज्य का नाश करती है, और रुद्र-रूपी दण्ड पापियों के साथ निर्दोषों को भी छू लेता है।

मुचुकुन्द और कुबेर: भुजबल बनाम वर का राज्य

King Muchukunda confronting the wealth-god Kubera, asserting the strength of his own arm over riches gained by boon, divine yaksha host behind Kubera.

भीष्म ने कहा कि राज्य की वृद्धि राजा पर और राजा की वृद्धि उसके पुरोहित पर टिकी है। उस राज्य में सच्चा सुख होता है जहाँ प्रजा के अदृश्य भय ब्राह्मण और दृश्य भय राजा अपने भुजबल से दूर करता है। इस पर मुचुकुन्द और वैश्रवण (कुबेर) का प्राचीन इतिहास है। समूची पृथ्वी जीतकर मुचुकुन्द अपने बल की परीक्षा के लिए अलकापति कुबेर के पास गए। कुबेर ने तप-बल से राक्षसों की विशाल सेना रची, जिसने मुचुकुन्द की सेना पीस डाली। अपनी सेना का संहार देखकर मुचुकुन्द ने अपने विद्वान् पुरोहित वसिष्ठ को उलाहना दिया। तब वसिष्ठ ने उग्र तप करके राक्षसों का संहार कराया।

कुबेर ने मुचुकुन्द से कहा कि आपसे भी बलवान् अनेक प्राचीन राजा पुरोहितों के सहारे कभी मुझ पर ऐसे नहीं चढ़े; वे मुझे सुख-दुःख का दाता मानकर पूजा करते थे। यदि भुजबल है तो उसे दिखाइए; ब्राह्मण-बल के सहारे इतना गर्व क्यों? क्रुद्ध मुचुकुन्द ने बिना गर्व और भय के युक्ति-संगत उत्तर दिया कि स्वयम्भू ब्रह्मा ने ब्राह्मण और क्षत्रिय को एक ही मूल से रचा है; यदि ये अपने बल अलग-अलग लगाएँ तो जगत् को धारण नहीं कर सकते। ब्राह्मणों को तप-मन्त्र का बल और क्षत्रियों को अस्त्र-शस्त्र का बल मिला है; दोनों बलों से सम्पन्न होकर राजा प्रजा की रक्षा करते हैं, और मैं वही कर रहा हूँ; फिर आप मुझे उलाहना क्यों देते हैं?

यह सुनकर कुबेर ने कहा कि मैं स्वयम्भू की आज्ञा के बिना न किसी को राज्य देता हूँ, न लेता हूँ; आप निःसीम पृथ्वी का राज्य कीजिए। पर मुचुकुन्द ने कहा कि मैं आपके दिए हुए राज्य का भोग नहीं चाहता; मैं तो अपने भुजबल से अर्जित राज्य ही भोगना चाहता हूँ। क्षत्रिय-धर्म में मुचुकुन्द की यह निर्भयता देखकर कुबेर विस्मित हुए, और मुचुकुन्द अपने भुजबल से जीती हुई समूची पृथ्वी का शासन करते रहे। भीष्म ने सार दिया कि जो राजा ब्राह्मण को आगे रखकर और उसका सम्मान करते हुए राज्य करता है, वही समूची पृथ्वी जीतकर महान् यश पाता है; ब्राह्मण नित्य धर्म-कर्म करे और क्षत्रिय सदा शस्त्रधारी रहे, तभी दोनों मिलकर विश्व के यथार्थ स्वामी हैं।

सार: मुचुकुन्द-कुबेर प्रसंग में राजा घोषित करता है कि वह कुबेर के दिए वर का नहीं, अपने भुजबल से जीते राज्य का भोग चाहता है; पर साथ ही ब्राह्मण-बल और क्षत्रिय-बल, दोनों से ही प्रजा रक्षित होती है। आत्मनिर्भर पराक्रम और ब्राह्मण-सम्मान, दोनों एक साथ।

कैकेय-राजा और राक्षस: धर्मराज्य का कवच

युधिष्ठिर ने पूछा कि राजा किसके धन का स्वामी है और उसका आचरण कैसा हो। भीष्म ने कहा कि वेद घोषित करते हैं कि ब्राह्मणों को छोड़कर शेष सब का, तथा अपने धर्म से च्युत ब्राह्मणों का भी धन राजा का है। जिस राज्य में ब्राह्मण चोर बने, उस पाप का कर्ता राजा माना जाता है; इसलिए धर्मनिष्ठ राजा ब्राह्मणों के भरण का प्रबन्ध करते हैं। इस पर कैकेय-राजा और एक राक्षस का इतिहास है। कठोर व्रती और वेदज्ञ कैकेय-राजा वन में रहते थे, तभी एक राक्षस ने उन्हें पकड़ लिया।

राजा ने राक्षस से पूछा कि आप मुझ पर अधिकार कैसे पा सके? मेरे राज्य में कोई चोर नहीं, कोई दुराचारी नहीं, कोई मद्यपायी नहीं; कोई ब्राह्मण ऐसा नहीं जो अविद्वान् हो, व्रतहीन हो या जिसने सोमपान न किया हो; सब अग्निहोत्री और यज्ञशील हैं। मेरे क्षत्रिय अपने धर्म में दृढ़ हैं, माँगते नहीं देते हैं, सत्य और धर्म जानते हैं, ब्राह्मणों की रक्षा करते हैं और युद्ध से नहीं भागते। मेरे वैश्य कृषि-गोपालन-व्यापार से, बिना छल, अपनी जीविका चलाते हैं और अतिथि-सत्कार करते हैं। मेरे शूद्र बिना द्वेष तीनों वर्णों की सेवा करते हैं। मैं असहाय, वृद्ध, दुर्बल, रोगी और रक्षकहीन स्त्रियों का भरण करता हूँ। मैं कुल और देश की प्राचीन मर्यादाओं का नाश नहीं करता; तपस्वियों का सम्मान और अन्न से सत्कार करता हूँ। मैं दूसरों को खिलाए बिना नहीं खाता, परस्त्री के पास नहीं जाता, अकेले विहार नहीं करता। मेरे शरीर पर दो अंगुल भी ऐसी जगह नहीं जिस पर शस्त्र-घाव का चिह्न न हो; मैं सदा धर्म के लिए लड़ता हूँ। फिर आप मुझे कैसे वश में कर सके?

राक्षस ने कहा कि चूँकि आप हर दशा में धर्म-परायण हैं, हे कैकेयराज, इसलिए अपने धाम लौट जाइए; आपका कल्याण हो, मैं आपको छोड़ता हूँ। जो राजा गौ, ब्राह्मण और समस्त प्रजा की रक्षा करते हैं, उन्हें राक्षसों से भय नहीं, पापियों से तो और भी नहीं; जो ब्राह्मणों को आगे रखते हैं और जिनकी प्रजा अतिथि-धर्म निभाती है, वे स्वर्ग पाते हैं। भीष्म ने सार दिया कि अतः ब्राह्मणों की रक्षा कीजिए; आपके रक्षित ब्राह्मण आपकी रक्षा करेंगे, और धर्मात्मा राजा पर उनके आशीष अवश्य उतरेंगे।

एक उप-कथा: कैकेय-राजा का राक्षस से संवाद धर्मराज्य का “कवच-स्तोत्र” है। राजा यह नहीं कहता कि उसके अस्त्र उसे बचाएँगे; वह अपने राज्य की धार्मिक व्यवस्था का लेखा गिनाता है, कि हर वर्ग अपने धर्म में दृढ़ है, असहाय रक्षित हैं, मर्यादाएँ अक्षुण्ण हैं, और वह स्वयं धर्म के लिए घावों से भरा है। राक्षस इसी अदृश्य कवच के आगे विवश होकर उसे छोड़ देता है। संकेत यह है कि सुशासित धर्मराज्य ही राजा की असली अभेद्य सुरक्षा है।

सार: ब्राह्मणों को छोड़ शेष सबका तथा पतित ब्राह्मणों का धन राजा का है। कैकेय-राजा अपने धर्मराज्य का ब्योरा गिनाकर राक्षस से मुक्त हो जाता है, यह दिखाते हुए कि सुशासन और ब्राह्मण-रक्षण ही राजा का अभेद्य कवच है।

आपद्धर्म: ब्राह्मण की वृत्ति, और जब क्षत्रिय अक्षम हो

युधिष्ठिर ने पूछा कि क्या आपत्ति में ब्राह्मण वैश्य-वृत्ति अपना सकता है। भीष्म ने कहा कि जीविका खोने पर, यदि क्षत्रिय-कर्म में असमर्थ हो, तो ब्राह्मण कृषि और गोपालन से जी सकता है। युधिष्ठिर ने पूछा कि तब वह क्या बेच सकता है। भीष्म ने कहा कि मद्य, नमक, तिल, अयाल वाले पशु, बैल, मधु, मांस और पका अन्न, ये ब्राह्मण को कभी न बेचने चाहिए; इन्हें बेचने से वह नरकगामी होता है। बकरा बेचने में अग्नि बेचने का, भेड़ में जल बेचने का, अश्व में सूर्य, पका अन्न में भूमि, और गौ बेचने में सोम तथा यज्ञ बेचने का पाप है। “मैं यह देता हूँ, बदले में वह दीजिए”, ऐसा विनिमय धर्म्य है, पर बलपूर्वक लेना पाप है; यही ऋषियों का प्राचीन मार्ग है।

तब युधिष्ठिर ने एक तीखा प्रश्न रखा: जब सब वर्ण अपने धर्म छोड़कर राजा के विरुद्ध अस्त्र उठा लें और राजा की शक्ति घट जाए, तब वह प्रजा का रक्षक कैसे बने? भीष्म ने कहा कि ऐसे समय ब्राह्मण-प्रमुख सब वर्ण दान, तप, यज्ञ, शान्ति और संयम से अपना कल्याण करें; वेदबल वाले ब्राह्मण उठकर देवों-से वैदिक कर्मों से राजा का बल बढ़ाएँ। राजा की शक्ति क्षीण हो तो ब्राह्मण ही उसकी शरण हैं। और जब चोर सब मर्यादाएँ तोड़कर लूट मचाएँ, तब सब वर्ण अस्त्र उठा सकते हैं, इसमें पाप नहीं।

युधिष्ठिर ने पूछा कि यदि क्षत्रिय ब्राह्मणों के शत्रु बन जाएँ, तो ब्राह्मणों और वेदों की रक्षा कौन करे? भीष्म ने कहा कि तप, ब्रह्मचर्य, अस्त्र और बल से, छल सहित या बिना छल, क्षत्रियों को वश में किया जाए। यदि क्षत्रिय कुमार्गी हो, विशेषतः ब्राह्मणों के प्रति, तो स्वयं वेद ही उसे वश में कर लेते हैं। क्षत्रिय ब्राह्मण से ही उत्पन्न हुआ; जैसे जल से अग्नि, ब्राह्मण से क्षत्रिय, और पत्थर से लोहा निकला; अग्नि, क्षत्रिय और लोहे का तेज अप्रतिरोध्य है, पर अपने उद्गम से टकराने पर उनका बल शान्त हो जाता है। ब्राह्मणों, धर्म और अपनी रक्षा के लिए मृत्यु-भय छोड़कर लड़ने वाले उच्च लोक पाते हैं; तीन अवसरों पर अस्त्र उठाने में ब्राह्मण को पाप नहीं: अपनी रक्षा, अन्य वर्णों को धर्म में लाने, और चोरों के दमन के लिए। भीष्म ने स्पष्ट कहा कि धर्म और अधर्म देश-काल से परिभाषित होते हैं; मानवता के मित्रों ने क्रूर-से कर्म करके भी उच्च स्वर्ग पाया, और धर्मनिष्ठ क्षत्रियों ने पापमय-से कर्म करके भी श्रेष्ठ गति पाई।

युधिष्ठिर ने अन्तिम प्रश्न रखा: जब चोर उठें, वर्ण-संकर फैले, और क्षत्रिय अक्षम हो जाएँ, तब यदि कोई क्षत्रियेतर बलवान् पुरुष, चाहे ब्राह्मण, वैश्य या शूद्र, प्रजा-रक्षा के लिए धर्मपूर्वक दण्ड चलाकर लोगों को बचाए, तो क्या वह उचित करता है? भीष्म ने उत्तर दिया कि चाहे शूद्र हो या किसी अन्य वर्ण का, जो बिना नौका वाली धारा में नौका बने, या जहाँ पार करने का साधन न हो वहाँ साधन बने, वह हर प्रकार से आदरणीय है। जो दूसरों के भय हरता है, वह सदा पूज्य है; जो प्रजा की रक्षा करता है उसे निकट स्वजन-सा प्रेम से पूजना चाहिए। भार न ढोने वाले बैल, दूध न देने वाली गाय और बन्ध्या स्त्री का क्या उपयोग, वैसे ही रक्षा न करने वाले राजा का क्या? जो सदा सज्जनों की रक्षा और दुष्टों का दमन करे, वही राजा बनने और जगत् का शासन करने योग्य है।

समझने की कुंजी (अवधारणा): “आपद्धर्म” वह नैतिक छूट है जो संकटकाल में सामान्य नियमों को शिथिल करती है। यहाँ महाभारत का यथार्थवाद चरम पर है: सामान्य काल में वह वर्ण-वृत्ति को कठोरता से बाँधता है, पर आपत्ति में ब्राह्मण को कृषि-व्यापार, सब वर्णों को शस्त्र, और यहाँ तक कि गैर-क्षत्रिय को भी प्रजा-रक्षा के लिए दण्ड-धारण की अनुमति देता है, यह कहकर कि “धर्म और अधर्म देश-काल से परिभाषित होते हैं।” यह नैतिक सापेक्षता को छिपाता नहीं, स्वीकारता है।

सार: आपत्ति में ब्राह्मण वैश्य-वृत्ति अपना सकता है (कुछ वस्तुओं के विक्रय-निषेध के साथ)। चोरी-संकट में सब वर्ण अस्त्र उठा सकते हैं; धर्म-अधर्म देश-काल से तय होते हैं; और क्षत्रिय के अक्षम होने पर जो भी प्रजा को बचाए, वही राजपद के योग्य है।

पुरोहित के गुण, दक्षिणा-तत्त्व, और तप यज्ञ से श्रेष्ठ

युधिष्ठिर ने यज्ञ में नियुक्त पुरोहितों के गुण पूछे। भीष्म ने कहा कि वे सामवेद सहित छन्दों और श्रौत-कर्मों के ज्ञाता हों, राजा के कल्याणकारी कर्म कर सकें, निष्ठावान्, मधुरभाषी, परस्पर मित्र, समदर्शी, क्रूरता-रहित, सत्यवादी, सूदखोरी से दूर, और सरल हों। जो शान्त, निरभिमान, विनयी, दानशील, जितेन्द्रिय, सन्तुष्ट, सत्यनिष्ठ, व्रती, अहिंसक, काम-द्वेष से रहित और ज्ञानी हो, वही ब्रह्मा के आसन के योग्य श्रेष्ठ पुरोहित है।

तब युधिष्ठिर ने दक्षिणा पर एक सूक्ष्म शंका रखी: वेद में यज्ञ में दक्षिणा का विधान है, पर कितनी दी जाए यह नियत नहीं; और असमर्थता की दशा में भी वह आज्ञा भयानक तथा यजमान की सामर्थ्य के प्रति अन्धी जान पड़ती है। वेद कहता है कि भक्ति से यज्ञ करना चाहिए, पर जब यजमान असत्य से कलंकित हो तो भक्ति क्या करे? भीष्म ने उत्तर दिया कि वेद की अवज्ञा, छल या असत्य से कोई पुण्य नहीं मिलता। दक्षिणा यज्ञ का अंग है और वेदों का पोषण करती है; बिना दक्षिणा का यज्ञ मुक्ति नहीं देता, पर एक “पूर्ण-पात्र” की दक्षिणा किसी भी समृद्ध दक्षिणा के समान फल देती है, इसलिए तीनों वर्ण यज्ञ करें। यजमान, यज्ञ और सोम, तीनों सदाचारी हों; दुराचारी न इस लोक का रहता है, न परलोक का।

भीष्म ने अन्त में एक ऊँचा सूत्र दिया कि वेद में घोषित है कि तप यज्ञ से श्रेष्ठ है। तप क्या है? अहिंसा, सत्यभाषण, परोपकार और करुणा, यही बुद्धिमानों के अनुसार तप है, न कि केवल शरीर को सुखाना। वेद की अवज्ञा, शास्त्र की अवहेलना और मर्यादाओं का उल्लंघन आत्म-विनाश है। जो तप-यज्ञ करते हैं उनके लिए ब्रह्म से योग ही उनका स्रुवा (आहुति-दण्ड) है, हृदय घृत है, और उच्च ज्ञान उनका पवित्र है। समस्त कुटिलता मृत्यु है, और समस्त सरलता ब्रह्म है; यही ज्ञान का विषय है, जिसे वाद-विवाद रचने वालों के मत हिला नहीं सकते।

समझने की कुंजी (दार्शनिक): “तप यज्ञ से श्रेष्ठ” और “तप अर्थात् अहिंसा-सत्य-करुणा, न कि देह-शोषण” यह भीष्म के राजधर्म को कर्मकाण्ड से ऊपर एक नैतिक धरातल पर ले जाता है। बाहरी अनुष्ठान और दक्षिणा का महत्त्व स्वीकारते हुए भी पाठ कहता है कि असली तप आन्तरिक सरलता और प्राणि-दया है; “सब कुटिलता मृत्यु, सब सरलता ब्रह्म” इस खण्ड का सार-वाक्य है।

सार: पुरोहित शास्त्रज्ञ, सत्यनिष्ठ और निरभिमान हो। दक्षिणा यज्ञ का आवश्यक अंग है पर एक पूर्ण-पात्र भी पूर्ण फल देता है; और इन सबके ऊपर तप है, जिसका अर्थ अहिंसा, सत्य और करुणा है, न कि केवल देह-दमन।

मन्त्री, विश्वास, और स्वजनों का धर्म: वासुदेव-नारद संवाद

युधिष्ठिर ने पूछा कि राजा मन्त्री का चयन कैसे करे और किस पर विश्वास करे, किस पर नहीं। भीष्म ने कहा कि राजा के चार प्रकार के मित्र होते हैं: सहोद्देश्य (समान प्रयोजन वाला), भक्त, जन्म से सम्बन्धी, और दान-कृपा से जीता हुआ; पाँचवाँ वह धर्मात्मा है जो किसी एक पक्ष का नहीं, धर्म के पक्ष का होता है। इनमें भक्त और जन्म-सम्बन्धी श्रेष्ठ हैं, पर अपने हाथ से करने योग्य कार्यों में राजा चारों को ही सन्देह की दृष्टि से देखे। राजा मित्रों की रक्षा में असावधान न हो; न पूर्ण विश्वास उचित है, न पूर्ण अविश्वास, क्योंकि पूर्ण विश्वास अकाल-मृत्यु है और पूर्ण अविश्वास मृत्यु से भी बुरा। एक कार्य एक ही पुरुष को सौंपे, दो-तीन को नहीं, क्योंकि वे परस्पर विरोध करते हैं।

भीष्म ने चेताया कि राजा स्वजनों से मृत्यु-सा डरे, क्योंकि जैसे सामन्त अपने स्वामी की समृद्धि नहीं सह पाता, वैसे ही स्वजन स्वजन की समृद्धि नहीं सह पाता; फिर भी स्वजनहीन सुखी नहीं होता, क्योंकि स्वजनहीन को शत्रु सहज दबा लेते हैं। अतः स्वजनों में गुण-दोष दोनों हैं; उन्हें वचन और कर्म से सम्मान दे, कभी न सताए, हृदय से अविश्वास रखकर भी ऊपर से पूर्ण विश्वास-सा बरते। जो ऐसा करता है, वह अपने शत्रुओं को भी मित्र बना लेता है।

इसी पर भीष्म ने वासुदेव और देवर्षि नारद का संवाद सुनाया। कृष्ण ने कहा कि न मूर्ख-अनपढ़ मित्र, न चंचल-मन का विद्वान् मित्र गुप्त मन्त्र जानने योग्य है। मैं स्वजनों के समृद्धि-वचनों की दासतापूर्ण चापलूसी नहीं करता; अपना आधा देता हूँ और उनके कटु वचन क्षमा करता हूँ, पर वे कटु वचन प्रतिदिन अरणि-मन्थन-से मेरे हृदय को घिसते हैं। संकर्षण में बल है, गद में मृदुता, और प्रद्युम्न रूप में मुझसे भी बढ़कर है, फिर भी मैं असहाय हूँ। अहुक और अक्रूर, दोनों मुझे विपरीत दिशाओं में खींचते हैं; दोनों का साथ होना भी पीड़ा है, दोनों का न होना भी; मैं दो जुआ खेलते भाइयों की माता-सा हूँ जो दोनों की विजय चाहती है। आप वह बताइए जो मेरे और मेरे स्वजनों, दोनों के हित में हो।

नारद ने कहा कि हे कृष्ण, यह आन्तरिक विपत्ति है, आपके ही कर्मों से जनी। आपने अपना अर्जित धन और राज्य बभ्रु तथा उग्रसेन को दे दिया है, अब उसे वमन किए अन्न की भाँति वापस नहीं लिया जा सकता, और लेने का प्रयास भीतरी कलह तथा महान् संहार लाएगा। अतः लोहे का नहीं, ऐसा कोमल पर हृदय-भेदी अस्त्र चलाइए जिससे स्वजनों की कटु जिह्वाओं को सुधारा जा सके। कृष्ण के पूछने पर नारद ने वह अस्त्र खोला: यथाशक्ति अन्नदान, क्षमा, सरलता, मृदुता और पात्र का सम्मान, यही वह बिना-लोहे का अस्त्र है। कोमल वचनों से स्वजनों का क्रोध मोड़िए, उनके मन और जिह्वा को नरम कीजिए। फूट से भोज और वृष्णि-वंश का नाश होगा; आप ही उनमें श्रेष्ठ हैं, अतः ऐसा कीजिए कि वंश न मिटे। यादव, कुकुर, भोज, अन्धक और वृष्णि सब आप पर ही टिके हैं।

तब भीष्म ने दूसरा उपाय बताया: जो राजा के हित का साधक हो उसकी राजा सदा रक्षा करे। यदि कोई वेतनभोगी या अवैतनिक पुरुष आकर बताए कि कोष को कोई मन्त्री खा रहा है, तो राजा उसे एकान्त में सुने और उस मन्त्री से उसकी रक्षा करे, क्योंकि घोटाला करने वाले मन्त्री ऐसे सूचक को मारना चाहते हैं।

एक उप-कथा: “बिना लोहे का अस्त्र” नारद का दिया अनूठा रूपक है। कृष्ण अपने ही वृष्णि-स्वजनों की कटु जिह्वाओं और अहुक-अक्रूर की गुटबन्दी से व्यथित हैं; नारद कहते हैं कि इस घाव का इलाज तलवार नहीं, अपितु अन्नदान, क्षमा, सरलता, मृदुता और सम्मान है, यही वह कोमल पर सब हृदयों को भेदने वाला अस्त्र है। यह राजनीति में बल के स्थान पर सहनशीलता और उदारता को रखने का दुर्लभ प्रसंग है, जहाँ स्वयं कृष्ण अपनी विवशता खुलकर स्वीकारते हैं।

सार: राजा के चार-पाँच प्रकार के मित्र; न पूर्ण विश्वास उचित, न पूर्ण अविश्वास। स्वजन समृद्धि नहीं सह पाते, फिर भी अनिवार्य हैं। नारद ने कृष्ण को “बिना लोहे का अस्त्र”, दान-क्षमा-मृदुता, सुझाया, और भीष्म ने कोष-घोटाले के सूचक की रक्षा का धर्म बताया।

कालकवृक्षीय और क्षेमदर्शी: पिंजरे का कौआ और भ्रष्ट अधिकारी

The sage Kalakavrikshiya standing before King Kshemadarshi in court, carrying a caged crow as a pointed emblem of corrupt officials.

भीष्म ने आगे कालकवृक्षीय ऋषि और कोसल-राजा क्षेमदर्शी का प्रसंग सुनाया। राजा क्षेमदर्शी सिंहासन पर बैठे, तब वह ऋषि एक पिंजरे में कौआ लेकर राज्य भर में घूमने लगे, और सब से कहते कि “कौआ-विद्या सीखिए; यह कौआ मुझे भूत, वर्तमान और भविष्य बताता है।” यह घोषणा करते हुए, बहुत-से लोगों के साथ, उन्होंने राज्य के सब अधिकारियों के कुकर्म जान लिए। फिर राजसभा में जाकर उन्होंने एक-एक मन्त्री और अधिकारी का नाम लेकर कहा कि “मेरा कौआ कहता है कि अमुक ने अमुक स्थान पर यह घोटाला किया, और अमुक-अमुक लोग जानते हैं कि उसने कोष लूटा; मेरा कौआ कभी झूठ नहीं कहता; अभी सिद्ध कीजिए या झूठ ठहराइए।”

इस प्रकार अपमानित और उजागर हुए सब अधिकारी एकजुट होकर, ऋषि के सोते समय रात में, पिंजरे में बन्द उस कौए को बाण से बेध गए। प्रातः मरे कौए को देखकर ऋषि क्षेमदर्शी के पास गए और कहा कि हे राजन्, मैं आपकी शरण चाहता हूँ; आप प्राण और धन के स्वामी हैं। मित्र मानकर, भक्ति से प्रेरित होकर, आपको चेताने आया हूँ कि आपका धन लूटा जा रहा है। राजा ने अनुमति दी कि निःसंकोच कहिए, मैं अपने हित से अन्धा नहीं।

तब ऋषि ने यम-वचन सुनाए कि राजा की सेवा अत्यन्त कष्टप्रद है; राजा से सम्बन्ध मानो विषधर साँप से सम्बन्ध है। सेवक हर क्षण राजा से ही भय खाता है, क्योंकि राजा सबके प्राण-धन का स्वामी है। जैसे प्रज्वलित अग्नि के सामने, वैसे ही राजा के सामने बैठना चाहिए, प्रतिक्षण प्राण देने को तत्पर। राजा प्रसन्न हो तो देवता-सा समृद्धि बरसाए, रुष्ट हो तो अग्नि-सा जड़ से भस्म कर दे। ऋषि ने आगे कहा कि आपका यह राज्य मगरमच्छों से भरी नदी-सा, अन्धकार से ढका दुर्गम वन-सा है, जिस पर सर्वनाशी जाल बिछा है; आपके मन्त्री विशाल वृक्ष पर पनपती परजीवी घास-सी हैं, जो वृक्ष को ढककर अन्ततः दावानल में उसी के साथ उसे जला डालती हैं। ये आप ही के पाले हुए हैं, पर आपके विरुद्ध षड्यन्त्र करके आपकी समृद्धि नष्ट कर रहे हैं; इन्हें रोकिए और सुधारिए। मेरा कौआ आपके काम के लिए मारा गया; मैं इस घातक राज्य में अब साँप वाले कमरे में रहने-से दहशत में हूँ। मैं केवल यह परखने आया था कि राजा जितेन्द्रिय है या नहीं, सेवक उसके वश में हैं या नहीं, और प्रजा से उसका प्रेम है या नहीं। राजा ने कहा कि आप मेरे महल में रहिए; मैं सदा आपका सम्मान करूँगा, और जो आपसे द्वेष करें वे मेरे साथ न रहेंगे।

एक उप-कथा: “पिंजरे का कौआ” भ्रष्टाचार उजागर करने की एक चतुर युक्ति है। कालकवृक्षीय ऋषि स्वयं सूचना का स्रोत नहीं बनते, अपितु एक “भविष्य-वक्ता कौए” का स्वाँग रचकर अधिकारियों के कुकर्म सबके सामने रखते हैं, ताकि दोष कौए पर जाए और वे स्वयं सुरक्षित रहें। पर भ्रष्ट अधिकारी रात में कौए को ही मार डालते हैं, यह दिखाते हुए कि सूचक की जान सदा संकट में रहती है। यह प्रसंग कोष-घोटाले के सूचक की रक्षा वाले भीष्म-वचन को कथा-रूप में सिद्ध करता है।

सार: कालकवृक्षीय ऋषि ने “भविष्य बताने वाले कौए” के बहाने क्षेमदर्शी के भ्रष्ट अधिकारियों को उजागर किया; अधिकारियों ने कौआ मार दिया। ऋषि ने राजा को मन्त्रियों को परजीवी घास बताकर चेताया कि राज-सेवा विष-सी है और भ्रष्ट परिजन ही राज्य को भीतर से खाते हैं। राजा ने ऋषि को आश्रय और सम्मान दिया।

शर-शय्या पर लेटे हुए भीष्म, बाणों की नोकों पर टिके हुए, अपने प्राण रोके बैठे थे, और युधिष्ठिर एक के बाद एक प्रश्न रखते जा रहे थे। पितामह की वाणी थमती न थी, मानो जीवन-भर का सञ्चित राज-धर्म इन्हीं अन्तिम दिनों में युधिष्ठिर के हृदय में उँडेल देना चाहते हों। पिछली कथा कोसल-नरेश और काकवृक्षीय मुनि की चल रही थी, जिसमें मुनि ने राजा को उसके अपने ही सेवकों के छल से सावधान किया था। उसी कथा का शेष पहले सुन लें, फिर भीष्म मन्त्रियों, दुर्ग, कोष, प्रजा-पालन, धर्मयुद्ध और शत्रु-नीति का विस्तार खोलते हैं।

काकवृक्षीय मुनि का शेष उपदेश: राजा के पास सेवा करना विष-सर्प के पास रहना है

प्रातːकाल मुनि क्षेमदर्शी राजा के पास आकर बोले, हे राजन्, हम आपकी शरण चाहते हैं। आप सर्व-समर्थ हैं, सबके प्राण और धन के स्वामी हैं। यदि आज्ञा मिले तो हम वह कहें जो आपके हित में है। आपको हम मित्र मानते हैं, और आपके लिए दुखी होकर, अपनी भक्ति से प्रेरित होकर, पूरे हृदय से सेवा करने को उपस्थित हुए हैं। आपका धन लूटा जा रहा है, और हम लुटेरों का कोई लिहाज़ किए बिना यह बात आपसे कहने आए हैं। जैसे सारथि किसी उत्तम अश्व को हाँकता है, वैसे ही हम आपको जगाने आए हैं। राजा ने उत्तर दिया, हे ब्राह्मण, हम आपकी हर बात सुनेंगे, क्योंकि हम अपने हित के प्रति अन्धे नहीं हैं। आप जो चाहें कहें, हम अवश्य उस उपदेश का पालन करेंगे।

मुनि बोले, आपके सेवकों के गुण-दोष और उनके हाथों आप पर आने वाले संकट को जानकर, हम भक्ति से प्रेरित होकर सब कुछ आपके सामने रखने आए हैं। प्राचीन आचार्यों ने पहले ही बता दिया है कि दूसरों की सेवा करने वालों पर कैसे-कैसे शाप पड़ते हैं। राजा की सेवा करने वालों का जीवन अत्यन्त दुखद और कष्टमय होता है। जिसका राजाओं से सम्बन्ध है, उसका मानो तीव्र विष वाले सर्पों से सम्बन्ध है। राजाओं के अनेक मित्र होते हैं और अनेक शत्रु भी। जो राजा की सेवा करते हैं, उन्हें इन सब से डरना पड़ता है। और प्रति क्षण स्वयं राजा से भी भय बना रहता है। राजा का कार्य करने में किंचित भी प्रमाद (असावधानी) क्षम्य नहीं। ऐसा प्रमाद राजा को क्रोधित कर सकता है, और वह क्रोध सेवक का सर्वनाश ला सकता है। आचरण भली-भाँति सीखकर मनुष्य को राजा के सामने वैसे ही बैठना चाहिए जैसे प्रज्वलित अग्नि के सामने। प्राण हथेली पर रखकर सेवा करनी चाहिए, क्योंकि राजा सर्व-समर्थ है और तीव्र विष वाले सर्प के समान है। राजा के सामने कटु वचन कहने, उदास या अशिष्ट मुद्रा में बैठने, अनादर से प्रतीक्षा करने या उद्धत भाव से चलने से सदा डरना चाहिए। राजा प्रसन्न हो तो देवता के समान समृद्धि बरसा देता है, और कुपित हो तो प्रज्वलित अग्नि के समान जड़ से भस्म कर देता है। यह यम का कथन है, और संसार के व्यवहार में इसकी सत्यता दिखती है।

समझने की कुंजी (राज-धर्म): राज-धर्म का अर्थ है राजा का अपना विशेष धर्म, अर्थात शासन-नीति, न्याय, दण्ड, कोष और प्रजा-रक्षा से जुड़े कर्तव्यों का समूह। यह सामान्य गृहस्थ-धर्म से भिन्न है, क्योंकि राजा पर सहस्रों प्राणों का भार है। भीष्म की पूरी शान्ति पर्व-शिक्षा का आधार यही है कि राजा का प्रत्येक निर्णय केवल उसका निजी कर्म नहीं, समूचे राष्ट्र का भाग्य है।

मुनि ने आगे कहा, यह जो मेरा कौआ था, आपका ही कार्य करते हुए मारा गया। फिर भी मैं इसके लिए आपको दोष नहीं देता, क्योंकि जिन्होंने इसे मारा वे आपके प्रिय नहीं हैं। पहचानिए कि आपके मित्र कौन हैं और शत्रु कौन। हर काम स्वयं कीजिए, अपनी बुद्धि दूसरों को सौंप मत दीजिए। आपके दरबार में जो बैठे हैं, वे सब धन हड़पने वाले हैं। वे आपकी प्रजा का भला नहीं चाहते। मैंने उनकी शत्रुता मोल ले ली है। आपके निकट रहने वाले सेवकों से मिलकर वे आपका नाश करके राज्य हड़पना चाहते हैं। किन्हीं अकल्पित परिस्थितियों के कारण उनकी योजनाएँ अब तक सफल नहीं हुईं। मैंने तप से निर्मल हुई दृष्टि से यह सब देखा है। उस एक कौए की सहायता से मैंने आपके इस राज्य को पार किया, जो घड़ियाल, शार्क और मगरों से भरी नदी के समान है। उसी पक्षी के सहारे मैं हिमालय की उस दुर्गम घाटी जैसे आपके राज्य से निकला, जो गिरे वृक्षों के तनों, बिखरी चट्टानों, काँटेदार झाड़ियों और सिंह-व्याघ्र जैसे हिंसक पशुओं से अगम्य रहती है।

मुनि बोले, विद्वान कहते हैं कि अन्धकार से अगम्य प्रदेश दीपक से पार हो जाता है, और अथाह नदी नौका से। पर राज्य-कार्य के इस भूल-भुलैया में घुसने या पार करने का कोई उपाय नहीं। आपका राज्य अन्धकार से ढका दुर्गम वन है। आप जो इसके स्वामी हैं, इसका भरोसा नहीं कर सकते, तो मैं कैसे करूँ? यहाँ अच्छाई और बुराई एक ही दृष्टि से देखी जाती हैं। धर्मकर्म करने वाला यहाँ मृत्यु पाता है, और अधर्मी निर्भय फिरता है। न्याय की दृष्टि से तो अधर्मी का वध होना चाहिए, धर्मात्मा का कभी नहीं। यहाँ सीता नाम की वह नदी जैसी स्थिति है, जिसमें नौकाएँ डूब जाती हैं। आप उस गड्ढे जैसे हैं जिसमें विष-सर्प भरे हों, उस मीठे जल वाली पर खड़े तटों और काँटेदार झाड़ियों से घिरी नदी जैसे जिस तक पहुँचना दुष्कर हो, कुत्तों, गिद्धों और गीदड़ों के बीच फँसे हंस जैसे। आपके मन्त्री उन परजीवी घासों जैसे हैं जो किसी विशाल वृक्ष से रस लेकर पनपती हैं और अन्ततः उसी को ढककर भस्म कर देती हैं, जब वन में आग लगती है। आपने उन्हें पाला, और वे आप ही के विरुद्ध षड्यन्त्र रचकर आपकी समृद्धि नष्ट कर रहे हैं। उन्हें रोकिए और सुधारिए।

मुनि ने अपना परिचय दिया, मैं आपका मित्र हूँ, काकवृक्षीय नाम का मुनि। मैं सदा सत्य पर अडिग रहता हूँ। आपके पिता मुझे प्रेम से मित्र मानते थे। जब आपके पिता के राज्यकाल में यह राज्य संकट में पड़ा था, तब मैंने हर दूसरा काम छोड़कर अनेक तप किए थे, ताकि वह संकट टल जाए। आपके स्नेह से ही मैं यह कहता हूँ, ताकि आप फिर से अपात्रों पर भरोसा करने का दोष न करें। आपको राज्य बिना परिश्रम के मिला है। इसके भले-बुरे पर विचार कीजिए। यह सुनकर कोसल-नरेश ने क्षत्रिय वर्ण से एक मन्त्री नियुक्त किया और उन ब्राह्मण-श्रेष्ठ काकवृक्षीय को अपना पुरोहित बना लिया। इन परिवर्तनों के पश्चात कोसल-राज ने सारी पृथ्वी जीत ली और महान कीर्ति अर्जित की। मुनि ने राजा के लिए अनेक भव्य यज्ञ कराए, और राजा ने उनके हितकारी परामर्श पर चलकर सम्पूर्ण पृथ्वी जीती।

सार: काकवृक्षीय की कथा का मर्म यह है कि राजा को अपने ही दरबारियों और कर्मचारियों की ईमानदारी जाँचनी चाहिए, अपनी बुद्धि दूसरों को सौंपनी नहीं चाहिए, और दोषी सेवकों को एक साथ नहीं, क्रम से, एक-एक कर निर्बल करके दण्डित करना चाहिए, ताकि वे संगठित होकर पलट न पड़ें।

मन्त्री, सेनापति, दूत और सभासद कैसे हों

युधिष्ठिर ने पूछा, हे पितामह, राजा के विधि-निर्माता, सेनापति, सभासद, सेना के अधिकारी और मन्त्री किन लक्षणों वाले होने चाहिए? भीष्म बोले, जो लज्जाशील, संयमी, सत्यवादी, निष्कपट और उचित कहने का साहस रखते हों, वे आपके विधि-निर्माता हों। जो सदा आपके निकट रहें, बड़े साहसी हों, ब्राह्मण वर्ण के हों, अत्यन्त विद्वान हों, आपसे प्रसन्न हों और हर कार्य में दृढ़ता से लगे रहें, वे संकट के समय आपके युद्ध-मन्त्री हों, हे कुन्तीपुत्र। जो उच्च वंश का हो, आपके सम्मान का बदला अपनी पूरी शक्ति से चुकाए, और सुख-दुःख, रोग या मृत्यु में आपको कभी न छोड़े, उसे सभासद बनाइए। जो उच्च कुल में जन्मे, आपके राज्य में ही उत्पन्न हुए हों, बुद्धिमान, सुन्दर रूप-रंग वाले, विद्वान, गरिमामय आचरण वाले और आपके प्रति समर्पित हों, उन्हें सेना का अधिकारी बनाइए।

भीष्म बोले, नीच कुल के, लोभी, क्रूर और निर्लज्ज लोग आपकी चापलूसी तभी तक करेंगे जब तक उनके हाथ गीले हैं, अर्थात जब तक उन्हें कुछ मिलता रहे। जो अच्छे कुल और अच्छे आचरण वाले हों, संकेत और भाव-भंगिमा पढ़ना जानते हों, निर्दय न हों, देश-काल की माँग समझते हों, और हर कार्य में अपने स्वामी का हित चाहते हों, उन्हें मन्त्री बनाइए। जब प्रश्न यह हो कि दो पक्षों में से किसे अपनाया जाए, तब आप अनेक को छोड़कर एक का पक्ष न लें। पर जब वह एक व्यक्ति अनेक गुणों के कारण अनेक से बढ़कर हो, तब उस एक के लिए अनेक को छोड़ दीजिए। श्रेष्ठता के चिह्न ये हैं, पराक्रम, यश देने वाले कार्यों में लगन, और हितकर मर्यादाओं का पालन। उच्च कुल, रक्त की शुद्धता, क्षमा, चतुराई, आत्मा की पवित्रता, वीरता, कृतज्ञता और सत्य, हे पृथापुत्र, श्रेष्ठता और सद्गुण के लक्षण हैं।

समझने की कुंजी (मन्त्र-रक्षा): मन्त्र का अर्थ केवल जादुई शब्द नहीं, यहाँ इसका अभिप्राय गुप्त मन्त्रणा, अर्थात राजा की राजनीतिक योजना और परामर्श है। मन्त्र-रक्षा का अर्थ है इन गुप्त परामर्शों को शत्रु से छिपाए रखना। भीष्म इसे कछुए के रूपक से समझाते हैं, जैसे कछुआ अपने अंगों को कवच में समेट लेता है, वैसे ही मन्त्री अपने गुप्त परामर्श छिपाकर रखें।

भीष्म ने कहा, जो आत्म-संयमी, बुद्धिमान और समृद्धि का इच्छुक राजा हो, वह अपने मन्त्रियों के गुण-दोष ध्यान से परखे। उसके मन्त्री उसके विश्वस्त मित्रों से सम्बन्धित हों, उच्च कुल में और उसी के राज्य में जन्मे हों, अभ्रष्ट हों, व्यभिचार जैसे दोषों से अकलंकित हों, भली-भाँति परखे हुए हों, अच्छे परिवारों से हों, विद्वान हों, पूर्वजों से इन्हीं पदों पर रहे आए हों और विनम्रता से सुशोभित हों। राजा ऐसे पाँच व्यक्तियों को कार्य देखने के लिए नियुक्त करे जिनकी बुद्धि अहंकार से रहित हो, स्वभाव सुन्दर हो, जिनमें तेज, धैर्य, क्षमा, पवित्रता, निष्ठा, दृढ़ता और साहस हो, जिनके गुण-दोष परख लिए गए हों, जो परिपक्व आयु के हों, भार उठाने में समर्थ हों और छल से मुक्त हों। मन्त्रियों की संख्या तीन से कम न हो।

भीष्म ने कहा, राजा उस मन्त्री पर कभी भरोसा न करे जो उसके प्रति समर्पित नहीं, और उसके सामने अपने गुप्त परामर्श प्रकट न करे। ऐसा दुष्ट मन्त्री अन्य मन्त्रियों से मिलकर अपने स्वामी का वैसे ही नाश कर सकता है जैसे आग, हवा की सहायता से वृक्ष के छिद्रों में घुसकर उसका भीतर ही भीतर अन्तःकरण जला डालती है। कभी क्रोधवश राजा किसी सेवक को पद से उतार दे या कठोर वचन कहे, और फिर पुनः उसे पद पर बिठा दे। ऐसा व्यवहार वही सेवक सह सकता है जो सच्चे हृदय से समर्पित हो। जो दुष्ट हृदय वाला हो, चाहे वह स्वामी-भक्त, बुद्धिमान और अनेक गुणों से युक्त हो, उससे राजा कभी परामर्श न करे। जो शत्रुओं से मिला हो और प्रजा के हित की उपेक्षा करता हो, उसे शत्रु ही जानिए। जिसका पिता कभी राजकीय आदेश से अन्यायपूर्वक निर्वासित हुआ हो, या जिसकी सम्पत्ति किसी छोटे अपराध पर ज़ब्त हुई हो, उससे चाहे बाद में सम्मान और जीविका दे दी जाए, परामर्श न लीजिए।

भीष्म बोले, जो बुद्धि, मेधा और विद्या से युक्त हो, जो राज्य के भीतर जन्मा हो, पवित्र और धर्मनिष्ठ हो, जो मित्र-शत्रु दोनों के स्वभाव को जानता हो, और जो राजा का ऐसा मित्र हो मानो राजा का दूसरा रूप हो, वही परामर्श के योग्य है। जो सत्यवादी, विनम्र, मृदुभाषी और पुश्तैनी सेवक हो, जो सन्तुष्ट और सम्मानित हो, जो दुष्टता और दुष्टों से घृणा करता हो, जो नीति और समय की माँग जानता हो और साहसी हो, वही परामर्श-योग्य है। राज्य की जड़ मन्त्रियों के नीति-परामर्श में है, और उसका विकास भी वहीं से होता है। मन्त्री इस प्रकार काम करें कि शत्रु राजा के दोष न ढूँढ़ सकें। राजा गुप्तचरों को अपनी आँख बनाकर शत्रु, मित्र और तटस्थ, सबके आचरण और इरादों का पता लगाए। जहाँ राजा परामर्श करे, वहाँ कोई बौना, कुबड़ा, दुर्बल, लँगड़ा या अन्धा, कोई मूढ़, कोई स्त्री और कोई नपुंसक न हो। आगे-पीछे, ऊपर-नीचे या अगल-बगल कुछ न हिले। नौका पर चढ़कर, या घास-झाड़ियों से रहित किसी खुले स्थान पर, जहाँ से चारों ओर की भूमि स्पष्ट दिखे, राजा उचित समय पर परामर्श करे, वाणी और भाव-भंगिमा के दोषों से बचता हुआ।

समझने की कुंजी (दूत के सात गुण): दूत वह राजकीय प्रतिनिधि है जो एक राजा का सन्देश दूसरे तक ले जाता है। भीष्म कहते हैं, राजा किसी भी स्थिति में दूत का वध न करे, ऐसा करने वाला राजा अपने सब मन्त्रियों सहित नरक में गिरता है। दूत में सात गुण हों, उच्च जन्म, अच्छा कुल, वाक्पटुता, चतुराई, मधुर वाणी, सन्देश को ज्यों का त्यों कहने की निष्ठा, और तीव्र स्मरण-शक्ति।

सार: राजा का तन्त्र उतना ही सुदृढ़ है जितने उसके मन्त्री। उच्च कुल, परखी हुई निष्ठा, विद्या और गुप्तता-रक्षा, यही चयन की कसौटी है। पर अन्तिम सूत्र भीष्म यह देते हैं कि राजा किसी पर पूर्ण भरोसा न करे, अपने पुत्र पर भी नहीं। अविश्वास राज-नीति का परम रहस्य है।

बृहस्पति और इन्द्र: मधुर वाणी का एक ही गुण

भीष्म ने कहा, हे युधिष्ठिर, इस सन्दर्भ में बृहस्पति और शक्र के बीच हुआ प्राचीन संवाद कहा जाता है। इन्द्र ने पूछा, हे विप्र, वह एक कौन-सा कार्य है जिसे ध्यान से करने पर मनुष्य सब प्राणियों का प्रिय बन जाए और महान कीर्ति पाए? बृहस्पति ने उत्तर दिया, हे शक्र, वाणी की मधुरता ही वह एक गुण है जिसके अभ्यास से मनुष्य सब प्राणियों का प्रिय बनता है। यही एक वस्तु है जो सबको सुख देती है। जो एक शब्द भी नहीं बोलता और जिसका मुख सदा भ्रकुटि से भरा रहता है, वह सबका द्वेष-पात्र बन जाता है, केवल इसलिए कि वह मधुर वचन नहीं बोलता। पर जो किसी को देखकर पहले स्वयं, मुस्कुराते हुए, सम्बोधित करता है, वह सबको प्रसन्न कर लेता है।

बृहस्पति ने कहा, यदि दान भी मधुर वचन के बिना दिया जाए, तो पाने वाले को वैसे ही नहीं भाता जैसे बिना तरकारी का भात। और यदि मनुष्यों का धन भी मीठे वचनों के साथ ले लिया जाए, तो वह मधुरता लुटे हुए को भी सन्तुष्ट कर देती है। इसलिए जो राजा दण्ड देना भी चाहे, उसे भी मधुर वचन बोलने चाहिए। वाणी की मधुरता अपने प्रयोजन में कभी असफल नहीं होती, और किसी हृदय को पीड़ा भी नहीं देती। सत्कर्मी और मधुरभाषी मनुष्य की कोई बराबरी नहीं। भीष्म ने जोड़ा, अपने पुरोहित के यों समझाने पर इन्द्र ने उसी के अनुसार आचरण किया। हे कुन्तीपुत्र, आप भी इस गुण का अभ्यास कीजिए।

सार: राजनीति में बल और दण्ड के साथ-साथ वाणी की मधुरता एक अमोघ साधन है। यह बिना किसी क्षति के शत्रु को भी अपना बना लेती है।

मन्त्रि-परिषद का गठन और न्याय-दण्ड का धर्म

युधिष्ठिर ने पूछा, हे राजन्, किस विधि से प्रजा का पालन करने वाला राजा महान कल्याण और शाश्वत यश पाता है? भीष्म बोले, निर्मल आत्मा वाला और प्रजा-रक्षा में तत्पर राजा, धर्मपूर्वक आचरण करके, इस लोक और परलोक दोनों में पुण्य और यश अर्जित करता है। युधिष्ठिर ने फिर कहा, आपने जिन गुणों की चर्चा की, वे सब किसी एक व्यक्ति में पाए जाएँ, यह मेरी बुद्धि में कठिन जान पड़ता है। भीष्म ने सराहा, हे युधिष्ठिर, आप बड़ी बुद्धि वाले हैं, यह ठीक ही कहते हैं। सब गुणों से युक्त व्यक्ति अत्यन्त दुर्लभ है। फिर भी मैं बताता हूँ कि कैसे मन्त्री नियुक्त किए जाने चाहिए।

भीष्म ने कहा, चार ब्राह्मण, जो वेदों के ज्ञाता हों, गरिमा से युक्त हों, स्नातक हों और पवित्र आचरण वाले हों; आठ क्षत्रिय, जो शारीरिक बल वाले हों और अस्त्र चलाने में समर्थ हों; इक्कीस वैश्य, जो सब धनवान हों; तीन शूद्र, जिनमें हर एक विनम्र, पवित्र आचरण वाला और अपने नित्य-कर्म में तत्पर हो; और एक सूत-वर्ण का व्यक्ति, जो पुराणों और आठ मुख्य गुणों का ज्ञाता हो, ये आपके मन्त्री हों। इनमें से हर एक पचास वर्ष की आयु का हो, गरिमावान हो, ईर्ष्या से रहित हो, श्रुति और स्मृति का ज्ञाता हो, विनम्र, निष्पक्ष, परस्पर विवाद करने वालों के बीच तत्काल निर्णय देने में समर्थ हो, लोभ और सात भयानक व्यसनों से मुक्त हो। राजा इन आठ प्रमुख मन्त्रियों से परामर्श करे और उनका मुखिया रहे। फिर निर्णयों को प्रजा की जानकारी के लिए राज्य में घोषित करे।

समझने की कुंजी (दण्ड-नीति): दण्ड-नीति वह विद्या है जो अपराध और दण्ड के सम्बन्ध को निर्धारित करती है, अर्थात न्याय-व्यवस्था और शासन का विज्ञान। भीष्म का मूल सूत्र यह है कि दण्ड अपराध के परिमाण के अनुसार हो, मनमाने ढंग से नहीं। मनमाना दण्ड देने वाला मूर्ख राजा इस लोक में अपयश पाता है और परलोक में नरक में गिरता है।

भीष्म ने कहा, आप कभी अपने पास धरोहर रखी वस्तु को न हड़पें, न उस वस्तु को अपना बनाएँ जिसके स्वामित्व पर दो जन विवाद करते हों। ऐसा आचरण न्याय को दूषित कर देता है, और तब पाप आपको और आपके राज्य को भी पीड़ित करेगा, और प्रजा बाज़ को देख डरते छोटे पक्षियों जैसी भयभीत हो जाएगी। राज्य की जड़ धर्म में है। जो मन्त्री या राजपुत्र न्याय के आसन पर बैठकर अधर्म करता है, और जो अधिकारी स्वार्थवश अन्याय करते हैं, वे सब राजा सहित नरक में डूबते हैं। शक्तिशाली से पीड़ित और सहायताहीन लोगों का रक्षक राजा ही है। विवाद में निर्णय साक्षियों के प्रमाण पर आधारित हो। यदि एक पक्ष के पास साक्षी न हो और वह असहाय हो, तो राजा उस मुक़दमे पर अपना सर्वोत्तम विचार करे।

भीष्म ने कहा, राजा अपराधियों को उनके अपराध के माप से दण्ड दे। धनवानों को जुर्माने और ज़ब्ती से दण्डित करे, निर्धनों को बन्दी बनाकर। जो अत्यन्त दुराचारी हों, उन्हें शारीरिक दण्ड भी दे। सत्पुरुषों को मधुर वचन और धन-दान से सहेजे। जो राजा का वध करना चाहे, उसे विविध उपायों से मृत्युदण्ड मिले। आगज़नी, चोरी, या वर्ण-संकर लाने वाले व्यभिचार के अपराधी को भी यही दण्ड हो। जो राजा दण्ड-नीति के अनुसार उचित दण्ड देता है, उसे कोई पाप नहीं लगता, अपितु शाश्वत पुण्य मिलता है। एक के अपराध का दण्ड दूसरे को न दिया जाए। अपराध-संहिता पर भली-भाँति विचार करके ही किसी को दोषी या निर्दोष ठहराया जाए। राजा किसी परिस्थिति में दूत का वध न करे।

सार: मन्त्रि-परिषद चारों वर्णों से चुनी जाए, पर निर्णय का भार राजा अपने सिर रखे। न्याय का प्राण है दण्ड का अपराध के अनुपात में होना, साक्ष्य पर आधारित होना, और निर्दोष का कभी दण्ड न होना। मनमाना दण्ड स्वयं पाप है।

राजा की राजधानी और दुर्ग की रचना

युधिष्ठिर ने पूछा, राजा को किस प्रकार के नगर में निवास करना चाहिए, हे पितामह? क्या पहले से बना हुआ चुने या विशेष रूप से बनवाए? भीष्म बोले, हे भारत, राजा को छह प्रकार के दुर्गों पर दृष्टि रखकर अपना नगर बसाना चाहिए, जो हर प्रकार की सम्पन्नता और उपयोगी वस्तुओं से भरा हो। वे छह दुर्ग हैं, जल-दुर्ग, भूमि-दुर्ग, पर्वत-दुर्ग, मनुष्य-दुर्ग, मिट्टी-दुर्ग और वन-दुर्ग। राजा अपने मन्त्रियों और पूर्ण निष्ठावान सेना के साथ उस नगर में रहे जो ऐसे दुर्ग से रक्षित हो जिसमें चावल और अस्त्रों का प्रचुर भण्डार हो, जो अभेद्य दीवारों और खाई से घिरा हो, जहाँ हाथी, घोड़े और रथ भरे हों, जहाँ विद्वान और शिल्पकुशल मनुष्य बसते हों, जहाँ की प्रजा सदाचारी और व्यापार में निपुण हो, जो खुले चौकों और दुकानों की पंक्तियों से सुशोभित हो, जहाँ शान्ति हो, कोई भय न हो, जो संगीत और गीतों से गूँजता हो, जहाँ के घर विशाल हों, जहाँ वेद-मन्त्रों का घोष हो, उत्सव होते रहें और देवताओं की नित पूजा हो।

भीष्म ने कहा, वहाँ रहता हुआ राजा कोष भरने, सेना बढ़ाने, मित्रों की संख्या बढ़ाने और न्यायालय स्थापित करने में लगे। अपने नगरों और प्रान्तों में हर दुराचार और बुराई को रोके। हर प्रकार की रसद इकट्ठी करे और अपने शस्त्रागार ध्यान से भरे। चावल और अन्य अन्न का भण्डार बढ़ाए, और अपने परामर्श को बुद्धि से सुदृढ़ करे। ईंधन, लोहा, भूसा, कोयला, इमारती लकड़ी, सींग, हड्डियाँ, बाँस, मज्जा, तेल और घी, चर्बी, मधु, औषधियाँ, सन, गोंद, चावल, अस्त्र, बाण, चमड़ा, धनुष की डोरी के लिए ताँत, और मूँज आदि की रस्सियाँ, सबका संग्रह बढ़ाए। बड़ी मात्रा में जल वाले तालाब और कुएँ बढ़ाए और रस वाले वृक्षों की रक्षा करे। विभिन्न विद्याओं के आचार्यों, ऋत्विजों और पुरोहितों, बलशाली धनुर्धरों, वास्तुकारों, ज्योतिषियों और चिकित्सकों को, तथा बुद्धि, संयम, चतुराई, साहस, विद्या, उच्च जन्म और तेज वाले हर व्यक्ति को आदर और मान से रखे।

भीष्म ने कहा, राजा धर्मात्माओं का सम्मान करे और अधर्मियों को दण्ड दे। दृढ़ संकल्प से हर वर्ण को उसके कर्तव्य पर लगाए। गुप्तचरों द्वारा नगर और प्रान्तों के निवासियों का बाहरी आचरण और मन की दशा ठीक से जानकर उचित उपाय करे। राजा स्वयं अपने गुप्तचरों, परामर्शों, कोष और दण्ड देने वाली व्यवस्थाओं की देखरेख करे, क्योंकि सब कुछ इन्हीं पर निर्भर है। गुप्तचरों को आँख बनाकर वह शत्रु, मित्र और तटस्थ, सबके कार्य और इरादे जाने। असहायों, अनाथों, वृद्धों और विधवा स्त्रियों का सदा पालन और रक्षण करे। तपस्वियों का सम्मान करे और उन्हें उचित समय पर वस्त्र, पात्र और भोजन दे। जब भी कोई संकट आए, राजा किसी तपस्वी पर विश्वास करे, क्योंकि लुटेरे तक ऐसे व्यक्ति का भरोसा करते हैं। अपने राज्य में से एक तपस्वी को, शत्रु के राज्य में से एक को, वन में रहने वालों में से एक को, और कर देने वाले राज्यों में से एक को, राजा अपनी मित्रता के लिए चुने और उन्हें सम्मान तथा जीविका दे। यदि कभी राजा पर विपत्ति आए और वह रक्षा माँगे, तो ये कठोर तपस्वी उसे चाहा हुआ दे देते हैं।

समझने की कुंजी (छह दुर्ग): प्राचीन शास्त्र में दुर्ग, अर्थात किलेबन्द रक्षा-स्थल, छह प्रकार के कहे गए। जल-दुर्ग जल से घिरा हो, भूमि-दुर्ग खुले मरुस्थल जैसी कठिन भूमि से, पर्वत-दुर्ग पहाड़ी ऊँचाई से, वन-दुर्ग घने जंगल से, मिट्टी-दुर्ग ऊँची मिट्टी की दीवारों से, और मनुष्य-दुर्ग वीर सैनिकों की पंक्तियों से रक्षित होता है। राजा को इनमें से उपयुक्त दुर्ग वाला नगर चुनना चाहिए।

सार: राजधानी ऐसी हो जो रसद, अस्त्र, सेना और सदाचारी प्रजा से भरी और सुदृढ़ दुर्ग से रक्षित हो। राजा का काम केवल भोग नहीं, अपितु कोष, गुप्तचर, दण्ड-व्यवस्था और तपस्वियों के सम्मान की निरन्तर देखरेख है।

राज्य का सुदृढ़ीकरण और कर-नीति: गाय और बछड़े का दृष्टान्त

युधिष्ठिर ने पूछा, राज्य कैसे सुदृढ़ किया जाए और कैसे रक्षित? भीष्म बोले, ध्यान से सुनिए। हर गाँव के लिए एक मुखिया चुना जाए। दस गाँवों के ऊपर एक अधीक्षक हो। दो अधीक्षकों के ऊपर एक अधिकारी हो, जिसके नियन्त्रण में बीस गाँव हों। उसके ऊपर ऐसे अधिकारी नियुक्त हों जिनके अधीन सौ गाँव हों, और उनके ऊपर ऐसे जिनके अधीन एक हज़ार गाँव हों। गाँव का मुखिया अपने गाँव के हर व्यक्ति के लक्षण और सुधारने योग्य दोषों को जाने, और सब दस गाँवों के अधिकारी को बताए। वह बीस गाँवों के अधिकारी को, और वह सौ गाँवों के अधिकारी को सूचित करे।

भीष्म ने कहा, गाँव की उपज और सम्पत्ति पर मुखिया का अधिकार हो। हर मुखिया दस गाँवों के स्वामी के भरण के लिए अपना अंश दे, और वह बीस गाँवों के स्वामी के लिए। सौ गाँवों के स्वामी को राजा से पूरा सम्मान और भरण के लिए एक बड़ा, धन-धान्य से भरा गाँव मिले। हज़ार गाँवों के स्वामी को एक छोटा नगर मिले, जिसकी उपज वह भोगे और जिसके युद्ध और आन्तरिक कार्य वह सँभाले। किसी क्रोधी और दृढ़ मन्त्री को इन अधिकारियों के प्रशासन और परस्पर सम्बन्धों की देखरेख पर रखा जाए। जैसे कोई भयानक ग्रह नीचे के सब नक्षत्रों के ऊपर घूमता है, वैसे ही यह सर्वोच्च अधिकारी अपने सब अधीनस्थों के ऊपर चले। ऐसे अधिकारी हत्यारी प्रवृत्ति वाले, दुष्कर्मी, दूसरों का धन लूटने वाले और छली लोगों से प्रजा की रक्षा करें।

भीष्म ने कहा, बिक्री-खरीद, मार्गों की दशा, भोजन-वस्त्र, और व्यापारियों के माल और लाभ का हिसाब रखकर राजा उन पर कर लगाए। उत्पादन की मात्रा, उत्पादकों की आय-व्यय और शिल्पों की दशा जानकर शिल्पियों पर उनके शिल्प के अनुसार कर ले। हे युधिष्ठिर, राजा ऊँचे कर भले ले, पर ऐसे कर कभी न ले जो प्रजा को बल-शून्य कर दें। उपज और परिश्रम का अनुमान किए बिना कोई कर न लगाया जाए, क्योंकि बिना पर्याप्त कारण कोई परिश्रम या उत्पादन नहीं करता। राजा विचारपूर्वक कर इस प्रकार ले कि वह और उत्पादक, दोनों उस वस्तु के मूल्य में हिस्सा पाएँ। राजा अपने लोभ से अपनी और दूसरों की नींव न ढहाए। जिन कामों से वह प्रजा का द्वेष-पात्र बने, उनसे सदा बचे।

एक उप-कथा: भीष्म कर-नीति को गाय और बछड़े के दृष्टान्त से खोलते हैं। बुद्धिमान राजा अपने राज्य को बछड़े के विवेक से दुहता है। यदि बछड़े को दूध पीने दिया जाए, तो वह बलवान होकर भारी बोझ उठाता है। पर यदि गाय को अधिक दुह लिया जाए, तो बछड़ा दुबला हो जाता है और स्वामी के काम का नहीं रहता। उसी प्रकार, यदि राज्य अधिक निचोड़ा जाए, तो प्रजा कोई बड़ा कार्य नहीं कर पाती। जो राजा प्रजा पर कर में अनुग्रह करता है और सहज प्राप्त पर सन्तोष करता है, वह अन्ततः अनेक महान फल पाता है। तब समूचा राज्य उसका कोष बन जाता है, और जो उसका कोष था, वह उसका शयन-कक्ष।

भीष्म ने कहा, यदि नगरों और प्रान्तों के निवासी निर्धन हों, तो राजा उन पर दया दिखाए। बाहरी क्षेत्रों के लुटेरों को दण्ड देकर गाँवों की प्रजा की रक्षा करे और उन्हें सुखी रखे। तब प्रजा राजा के सुख-दुःख की सहभागी बनकर उससे अत्यन्त प्रसन्न रहती है। संकट के समय राजा प्रजा को भय की स्थिति समझाकर सम्पत्ति की माँग करे, और कहे, यहाँ विपत्ति आ खड़ी हुई है, शत्रु के कार्यों से बड़ा संकट उठा है। आशा है यह संकट टल जाएगा, क्योंकि फूले हुए बाँस की भाँति शत्रु शीघ्र ही नष्ट हो जाएगा। मेरे अनेक शत्रु बहुत-से लुटेरों से मिलकर हमारे राज्य को कठिनाई में डालना चाहते हैं, पर वे स्वयं ही नष्ट होंगे। इस भयानक संकट को देखते हुए, मैं आपकी ही रक्षा के साधन जुटाने के लिए आपका धन माँगता हूँ। संकट टलने पर जो मैं लेता हूँ, लौटा दूँगा। पर शत्रु जो बल से छीनेंगे, वह कभी न लौटाएँगे, अपितु आपके सगे-सम्बन्धियों और पत्नियों तक का नाश कर देंगे।

भीष्म ने कहा, समय की माँग को समझने वाला राजा ऐसे मधुर, आदरपूर्ण वचनों से अपने प्रतिनिधि भेजकर प्रजा से कर इकट्ठा करे। दुर्ग की मरम्मत, राजकीय व्यवस्था के व्यय, और विदेशी आक्रमण के भय को सामने रखकर, उन्हें सुरक्षा और शान्ति से जीने का साधन देने की आवश्यकता समझाकर, राजा वैश्यों पर कर लगाए। यदि राजा वैश्यों की उपेक्षा करे, तो वे राज्य छोड़कर वनों में चले जाते हैं। इसलिए राजा वैश्यों के साथ कोमलता से बरते, उन्हें सुरक्षा का भाव दे, और सदा ऐसा करे जिससे उनकी उत्पादक शक्ति बढ़े। वैश्य ही राज्य का बल बढ़ाते हैं, कृषि सुधारते हैं और व्यापार बढ़ाते हैं। बुद्धिमान राजा सदा उन्हें प्रसन्न रखे और उन पर हल्के कर लगाए।

सार: राज्य गाँव से लेकर हज़ार-गाँव तक एक स्तरीकृत तन्त्र से सुदृढ़ होता है। कर-नीति का परम सूत्र है संयम, गाय को इतना न दुहो कि बछड़ा दुबला पड़ जाए। प्रजा को निचोड़ने वाला राजा अन्ततः अपनी ही जड़ काटता है, और वैश्यों के प्रति कोमलता राज्य की समृद्धि का मूल है।

और धन की लालसा हो तब: मधुमक्खी, जोंक और चूहे का दृष्टान्त

युधिष्ठिर ने पूछा, हे पितामह, यदि महान धन होने पर भी राजा और चाहे, तो कैसे बरते? भीष्म बोले, पुण्य का इच्छुक राजा प्रजा के हित में लगे और देश-काल तथा अपनी बुद्धि-शक्ति के अनुसार उनकी रक्षा करे। राजा अपने राज्य को मधुमक्खी की भाँति दुहे, जो पौधों से थोड़ा-थोड़ा मधु लेती है। वह उस गोपालक की तरह बरते जो गाय के थन छेदे बिना और बछड़े को भूखा रखे बिना दूध निकालता है। कर के मामले में राजा जोंक की तरह बरते, जो रक्त धीरे से खींचती है। वह बाघिन की तरह बरते जो अपने बच्चों को दाँतों से छूकर उठाती है, पर बेधती नहीं। वह उस चूहे की तरह बरते जो तीखे दाँत होते हुए भी सोते पशुओं के पैर इस तरह कुतरता है कि उन्हें भान तक नहीं होता।

भीष्म ने कहा, बढ़ते हुए प्रजाजन से थोड़ा-थोड़ा लिया जाए, और माँग क्रमशः बढ़ाई जाए जब तक वह उचित अनुपात में न पहुँच जाए। राजा अपनी प्रजा का भार वैसे क्रमशः बढ़ाए जैसे कोई किसी बछड़े पर भार धीरे-धीरे बढ़ाता है। सावधानी और कोमलता से अन्ततः वह उन पर लगाम कस सकता है। ये उपाय जो मैं बताता हूँ, राज-नीति के उचित साधन हैं, छल की रीति नहीं। मद्यशालाएँ, वेश्याएँ, दलाल, नट, जुआरी और जुआघर रखने वाले, और ऐसे ही अन्य लोग जो राज्य में विकार फैलाते हैं, सब रोके जाएँ। राज्य में निवास करते हुए ये उत्तम वर्ग की प्रजा को पीड़ित और हानि पहुँचाते हैं।

एक उप-कथा: भीष्म स्मरण कराते हैं कि प्राचीन काल में स्वयं मनु ने व्यवस्था दी थी कि जब कोई संकट न हो, तब कोई किसी से माँग न करे। यदि सब मनुष्य माँगकर ही जीने लगें और परिश्रम छोड़ दें, तो निःसन्देह संसार का अन्त हो जाए। राजा ही इसे रोकने में समर्थ है। जो राजा प्रजा को पाप से नहीं रोकता, वह प्रजा के पापों का चौथाई भाग स्वयं भोगता है, यह श्रुति का कथन है। क्योंकि राजा प्रजा के पुण्य का चौथाई पाता है, वैसे ही उनके पाप का भी। इसलिए वह पापी प्रजा को अवश्य रोके।

भीष्म ने कहा, जो भिक्षा पर नहीं जीते, वे संकट के समय माँग सकते हैं। राजा धर्म का पालन करते हुए दया से उन्हें दे, भय से नहीं। आपके राज्य में न कोई भिखारी हो, न कोई लुटेरा। कृषि, पशुपालन, व्यापार और ऐसे ही कर्म श्रम-विभाजन के सिद्धान्त पर अनेक लोगों से कराए जाएँ। यदि चोरों और अत्याचारी अधिकारियों के कारण कृषक, पशुपालक या व्यापारी असुरक्षित अनुभव करे, तो राजा अपयश पाता है। राजा धनवान प्रजा का सम्मान करे और उनसे कहे, मेरे साथ मिलकर प्रजा का हित बढ़ाइए। हर राज्य में धनवान लोग एक प्रतिष्ठित वर्ग होते हैं। जो बुद्धिमान, साहसी, धनी, प्रभावशाली, धर्मात्मा, तपस्वी, सत्यवादी या मेधावी है, वह अपने सहनागरिकों की रक्षा में सहायक होता है। इसलिए, हे राजन्, सब प्राणियों से प्रेम कीजिए, और सत्य, निष्कपटता, अक्रोध और अहिंसा के गुण धारण कीजिए।

सार: धन की लालसा होने पर भी राजा मधुमक्खी, जोंक, बाघिन और चूहे की तरह कोमलता से ले, ताकि प्रजा को पीड़ा का भान भी न हो। कर क्रमशः बढ़े, मौसम और सामर्थ्य देखकर। और राजा का परम कर्तव्य है प्रजा को पाप से रोकना, क्योंकि अनरोकी प्रजा के पाप का चौथाई भाग वह स्वयं भोगता है।

ब्राह्मण-रक्षा, गुप्तचर और आत्म-रक्षा का धर्म

भीष्म ने कहा, आपके राज्य में फलदायी वृक्ष न काटे जाएँ। फल और कन्द ब्राह्मणों की सम्पत्ति हैं, ऋषियों ने इसे धर्म की व्यवस्था कहा है। ब्राह्मणों के भरण के पश्चात जो शेष बचे, वह अन्य प्रजा के पालन में लगे। ब्राह्मण को हानि पहुँचाकर कोई कुछ न ले। यदि कोई ब्राह्मण जीविका के अभाव से दुखी होकर राज्य छोड़ना चाहे, तो राजा स्नेह और सम्मान से उसे जीविका दे। यदि फिर भी वह न रुके, तो राजा ब्राह्मणों की सभा में जाकर कहे, अमुक ब्राह्मण राज्य छोड़ रहा है, तब मेरी प्रजा किसके मार्गदर्शन में रहेगी? यदि तब भी वह न रुके और कुछ कहे, तो राजा कहे, बीती को भुला दीजिए। यह, हे कुन्तीपुत्र, राज-धर्म का सनातन मार्ग है।

भीष्म ने कहा, राजा और कहे, हे ब्राह्मण, लोग कहते हैं कि ब्राह्मण को केवल उतना ही दिया जाए जितना उसके भरण के लिए पर्याप्त हो। पर मैं यह मत नहीं मानता। मैं तो मानता हूँ कि यदि ब्राह्मण राजा की उपेक्षा से राज्य छोड़ता है, तो उसे जीविका दी जाए, और यदि वह विलासिता के साधनों के लिए जाना चाहता है, तब भी रोककर वही साधन दिए जाएँ। कृषि, पशुपालन और व्यापार सब मनुष्यों को जीविका देते हैं, पर वेदों का ज्ञान उन्हें स्वर्ग का साधन देता है। इसलिए जो वेदाध्ययन और वैदिक कर्मों में बाधा डालते हैं, वे समाज के शत्रु जाने जाएँ। इन्हीं के विनाश के लिए ब्रह्मा ने क्षत्रियों को रचा। शत्रुओं को वश में कीजिए, प्रजा की रक्षा कीजिए, यज्ञों में देवों की पूजा कीजिए और साहस से युद्ध कीजिए, हे कुरुओं के आनन्द।

भीष्म ने कहा, राजा उन्हीं की रक्षा करे जो रक्षा के योग्य हैं, वही श्रेष्ठ शासक है। जो राजा रक्षा का धर्म नहीं निभाते, उनका जीवन व्यर्थ है। सब प्रजा के हित के लिए राजा सबके कार्य और विचार जानने का यत्न करे, और इसी कारण गुप्तचर और गुप्त एजेण्ट नियुक्त करे। अपनों को परायों से, परायों को अपनों से, परायों को परायों से, और अपनों को अपनों से बचाते हुए राजा प्रजा का सदा पालन करे। पहले अपने आपको हर एक से बचाकर राजा धरती की रक्षा करे। ज्ञानियों ने कहा है कि हर वस्तु की जड़ अपने आप में है। राजा सदा विचारे, मेरे क्या दोष हैं, मैं किन बुरी आदतों में फँसा हूँ, मेरी दुर्बलता के स्रोत कौन हैं। वह गुप्त और विश्वस्त एजेण्टों को राज्य में घुमाए, यह जानने के लिए कि पिछले दिन उसका आचरण प्रजा को रुचा या नहीं।

सार: ब्राह्मण-रक्षा राज-धर्म का सनातन अंग है, फलदायी वृक्ष और ब्राह्मण की जीविका दोनों राजा की रक्षा में हैं। साथ ही गुप्तचर राजा की आँखें हैं, और पहली रक्षा राजा को अपनी ही करनी है, क्योंकि हर दोष की जड़ अपने भीतर है।

उतथ्य का माण्धाता को उपदेश: राजा ही धर्म है, राजा ही युग है

भीष्म ने कहा, अब अंगिरा-वंशी उतथ्य का वह उपदेश सुनाता हूँ जो उन्होंने युवनाश्व-पुत्र माण्धाता को दिया था। उतथ्य बोले, मनुष्य राजा इसलिए बनता है कि धर्म के हित में काम करे, मनमाने आचरण के लिए नहीं। यह जान लीजिए, हे माण्धाता, राजा ही संसार का रक्षक है। यदि राजा धर्मपूर्वक आचरण करे, तो देवता की स्थिति पाता है, और अधर्म करे तो नरक में गिरता है। सब प्राणी धर्म पर टिके हैं, और धर्म राजा पर। जो राजा धर्म को धारण करता है, वही सच्चा राजा है। यदि राजा अधर्म को दण्ड न दे, तो देवता उसका भवन छोड़ देते हैं और वह मनुष्यों में अपयश पाता है।

उतथ्य बोले, जब पाप नहीं रोका जाता, तब धर्माचरण समाप्त हो जाता है और अधर्म बढ़ता है। तब कोई शास्त्र के अनुसार यह नहीं कह सकता कि यह मेरा है और यह मेरा नहीं। मनुष्य अपनी पत्नियों, पशुओं, खेतों और घरों के स्वामी नहीं रह जाते। देवताओं को पूजा नहीं मिलती, पितरों को श्राद्ध में अर्पण नहीं मिलता, अतिथियों को आतिथ्य नहीं मिलता। द्विज वर्ण वेद नहीं पढ़ते, व्रत नहीं पालते, यज्ञ नहीं फैलाते। मनुष्यों के मन शस्त्र से घायलों के समान दुर्बल और मूढ़ हो जाते हैं। दोनों लोकों पर दृष्टि रखकर ऋषियों ने राजा को इसलिए रचा कि वह धरती पर धर्म का साकार रूप बने। जिसमें धर्म चमके, वही राजन कहलाता है। जिसमें धर्म न हो, वह वृषल कहलाता है। दिव्य धर्म का दूसरा नाम वृष है, और जो वृष को क्षीण करे, वह वृषल कहलाता है। धर्म इसलिए धर्म कहलाता है क्योंकि वह धन की प्राप्ति और रक्षा में सहायक होता है।

एक उप-कथा: उतथ्य अहंकार और अधर्म की चेतावनी देते हुए विरोचन के पुत्र असुर बलि का दृष्टान्त देते हैं। ब्राह्मणों के प्रति द्वेष से, जो उसकी मूढ़ता से उपजा था, समृद्धि की देवी, जो पहले उसके साथ रहती थी, क्रोधित होकर बलि को छोड़ गईं और इन्द्र की शरण में चली गईं। बलि उसे इन्द्र के साथ देखकर व्यर्थ ही पछताता रहा। उतथ्य कहते हैं, श्रुति कहती है कि अधर्म ने समृद्धि की देवी के गर्भ से अहंकार नामक पुत्र को जन्म दिया, और इसी अहंकार ने अनेक देवों, असुरों और राजर्षियों का नाश किया। हे माण्धाता, जागिए, ताकि देवी क्रोध में आपको भी न छोड़ दें।

उतथ्य बोले, जो इन दो, अहंकार और अधर्म, में नहीं फँसता, वही शाश्वत सुख का जीवन जीता है। मद में चूर, ईमान से बेसुध, धर्म का उपहास करने वाले और मूढ़ व्यक्ति की संगति त्यागिए। जिन मन्त्रियों को एक बार दण्ड दे चुके हों, उनसे, विशेषकर स्त्रियों से, पर्वतों, ऊँची-नीची और दुर्गम भूमियों, हाथी-घोड़ों और विषैले सरीसृपों से सदा सावधान रहिए। रात में भटकना त्यागिए, और कंजूसी, घमण्ड, डींग और क्रोध के दोषों से बचिए। जब राजा अधर्म को नहीं रोकता, तब वर्ण-संकर होता है, पापी राक्षस और नपुंसक जन्म लेते हैं, और सम्मानित कुलों में भी अपंग या मूढ़ बालक उत्पन्न होते हैं। तब ग्रीष्म में शीत पड़ता है और ऋतु आने पर वह लोप हो जाता है। अकाल, बाढ़ और महामारी प्रजा को सताते हैं। अशुभ तारे और भयानक धूमकेतु उठते हैं, राज्य के विनाश के अनेक अपशकुन दिखते हैं।

समझने की कुंजी (राजन और वृषल): उतथ्य के इस उपदेश में शब्दों का गूढ़ खेल है। राजन वह है जिसमें धर्म चमके (राज् धातु से, चमकना)। धर्म का एक नाम वृष है। जो इस वृष को दुर्बल करे, वह वृषल, अर्थात पतित राजा या अधर्मी कहलाता है। धर्म स्वयं धन (धन) से जुड़ा है, क्योंकि वह धन की रक्षा करता है। यह दृष्टान्त राजा को स्मरण कराता है कि उसका शासन-अधिकार धर्म से ही आता है, बल से नहीं।

भीष्म ने आगे उतथ्य के शब्द दोहराए, यदि मेघ का देवता समय पर वर्षा करे और राजा धर्मपूर्वक आचरण करे, तो वह समृद्धि प्रजा को सुख में रखती है। जो धोबी कपड़े का रंग छुड़ाए बिना मैल नहीं धो सकता, वह अपने काम में अकुशल है। उसी प्रकार जो ब्राह्मण, क्षत्रिय या वैश्य अपने वर्ण के धर्म से गिरकर शूद्र-सा हो गया हो, वह उसी धोबी जैसा है। जो क्षत्रिय अन्य वर्णों के आचरण के दोष सुधारकर उन्हें धोबी की तरह स्वच्छ कर सके, वही उनका सच्चा पिता और राजा होने योग्य है। कृत, त्रेता, द्वापर और कलि, ये युग राजा के आचरण पर निर्भर हैं। राजा ही युग का निर्माण करता है। जब राजा प्रमादी होता है, तब चारों वर्ण, वेद और चारों आश्रमों के धर्म, सब भ्रष्ट और दुर्बल हो जाते हैं। राजा ही सब प्राणियों का सृष्टा है और राजा ही संहारक। धर्मात्मा राजा सृष्टा है और पापी राजा संहारक।

एक उप-कथा: उतथ्य दुर्बल की शक्ति का गूढ़ दृष्टान्त देते हैं। दुर्बल, मुनि और विष-सर्प की आँखें असह्य होती हैं, उनसे शत्रुता मत कीजिए। दुर्बल को सदा अपमान-योग्य समझने की भूल न कीजिए। दुर्बल की आँखें आपको आपके कुल सहित जला सकती हैं। जिस वंश को दुर्बल की आँखें झुलसा दें, उसमें सन्तान नहीं होती, वह वंश जड़ से जल जाता है। दुर्बलता परम शक्ति से भी बलवती है, क्योंकि दुर्बलता से झुलसी हुई शक्ति पूरी तरह मिट जाती है। यदि कोई अपमानित या प्रताड़ित व्यक्ति सहायता के लिए चिल्लाते हुए भी रक्षक न पाए, तो दिव्य दण्ड राजा का नाश कर देता है। उतथ्य कहते हैं, सृष्टा ने शक्ति (राजा) को दुर्बलता की रक्षा के लिए ही रचा। दुर्बलता एक महान सत्ता है, क्योंकि सब कुछ उसी पर निर्भर है।

भीष्म ने उतथ्य के शब्द कहे, राजा यम के समान है। वह धर्मात्माओं के लिए साक्षात देवता है। इन्द्रियों को वश में करके वह महान ऐश्वर्य पाता है, और वश में न करके पाप कमाता है। यम सब प्राणियों को बिना भेद किए शासित करता है, राजा उसी की भाँति सब प्रजा का संयम करे। राजा सहस्र-नेत्र इन्द्र के समान कहा गया है, जिसे वह धर्म माने वही धर्म है। आप प्रमाद छोड़कर क्षमा, बुद्धि, धैर्य और सब प्राणियों के प्रति प्रेम का विकास कीजिए। सबके बल-निर्बलता को जानिए और सही-गलत में भेद करना सीखिए। नगर और प्रान्तों के निवासियों को सुख में रखिए। जो राजा कुशल नहीं, वह प्रजा की रक्षा नहीं कर पाता। राज-पद बड़ा सुखद भार है, पर इसे वही उठा सकता है जो बुद्धि, साहस और दण्ड-नीति से युक्त हो। भीष्म ने जोड़ा, इस उपदेश से माण्धाता ने वैसा ही किया, और सम्पूर्ण धरती का एकछत्र स्वामी हुआ। हे राजन्, आप भी माण्धाता की तरह धर्म से आचरण कीजिए, तो धरती शासन कर अन्त में स्वर्ग पाएँगे।

सार: उतथ्य का उपदेश राजा को धर्म का साकार रूप घोषित करता है। राजा ही युग रचता है, राजा ही सृष्टा और संहारक है। अहंकार और अधर्म से बचे, दुर्बल को कभी न सताए, क्योंकि दुर्बल के आँसुओं और शाप की शक्ति परम प्रचण्ड है। राजा का बल दुर्बल की रक्षा के लिए ही रचा गया।

वामदेव का वसुमना को उपदेश: धर्म से बढ़कर कुछ नहीं

युधिष्ठिर ने पूछा, धर्म का इच्छुक धर्मात्मा राजा कैसे बरते? भीष्म बोले, इस पर वामदेव का प्राचीन उपदेश है। राजा वसुमना ने महर्षि वामदेव से पूछा कि वे ऐसा आचरण बताएँ जिससे वे अपने नियत धर्म से न गिरें। ययाति की भाँति सुख से बैठे, स्वर्ण-वर्ण वसुमना से वामदेव बोले, धर्मपूर्वक आचरण कीजिए, धर्म से बढ़कर कुछ नहीं। जो राजा धर्म-परायण हैं, वे सारी धरती जीत लेते हैं। जो राजा धर्म को अपने प्रयोजन सिद्ध करने का परम साधन माने और धर्मात्माओं के परामर्श पर चले, वह धर्म से दीप्त होता है। जो धर्म की उपेक्षा कर बल-प्रयोग से काम लेना चाहे, वह शीघ्र ही धर्म और अर्थ दोनों खो देता है।

वामदेव बोले, जो राजा किसी दुष्ट और पापी मन्त्री के परामर्श पर चले, वह धर्म का नाशक बनकर अपने सारे कुल सहित प्रजा द्वारा वध-योग्य हो जाता है, और शीघ्र विनाश पाता है। जो राजा राज-कार्य में अकुशल हो, हर काम में मनमानी करे और डींग हाँके, वह सारी धरती का स्वामी होकर भी शीघ्र नष्ट होता है। पर जो समृद्धि का इच्छुक हो, द्वेष से रहित हो, इन्द्रिय-संयमी और बुद्धिमान हो, वह उस समुद्र की भाँति समृद्धि में बढ़ता है जिसमें सौ नदियाँ अपना जल उँडेलती हैं। राजा कभी न समझे कि उसके पास पर्याप्त धर्म, भोग, धन, बुद्धि और मित्र हैं। संसार का व्यवहार इन्हीं पर टिका है। जो राजा कठोर, स्नेहहीन, अनुचित दण्ड से प्रजा को सताने वाला और आचरण में उतावला हो, वह शीघ्र विनाश पाता है। जो बुद्धिहीन हो, वह अपने दोष नहीं देख पाता, यहाँ अपयश पाकर परलोक में नरक में गिरता है।

वामदेव बोले, यदि राजा योग्य लोगों को सम्मान दे, दान करे और स्वयं मधुर वचन बोलकर उनका मूल्य पहचाने, तो उसकी प्रजा उस पर आए संकटों को ऐसे दूर करती है मानो वे संकट उन्हीं पर पड़े हों। जो राजा धर्म-मार्ग में कोई गुरु न रखे, किसी से परामर्श न ले और मनमाने उपायों से धन कमाना चाहे, वह कभी दीर्घकाल तक सुख नहीं भोगता। पर जो अपने आचार्यों के उपदेश सुने, राज-कार्य की स्वयं देखरेख करे और हर अर्जन में धर्म का विचार रखे, वह दीर्घकाल तक सुख भोगता है। भीष्म ने जोड़ा, वसुमना ने इसी उपदेश के अनुसार आचरण किया।

सार: वामदेव की शिक्षा का केन्द्र-बिन्दु है धर्म की सर्वोच्चता। बल-प्रयोग और मनमानी से अर्जित राज्य टिकता नहीं। राजा को सन्तोष का भ्रम न पाले, अपितु धर्म, बुद्धि और मित्रों की निरन्तर वृद्धि करता रहे।

वामदेव का आगे का वचन: निर्बल पर अन्याय का दुष्परिणाम

वामदेव बोले, जब बलवान राजा निर्बल के प्रति अधर्म करता है, तो उसके वंश में जन्मे भी वही आचरण सीखते हैं। दूसरे भी उस पापारम्भक का अनुकरण करते हैं। ऐसा अनियन्त्रित अनुकरण शीघ्र ही राज्य का नाश ले आता है। जो राजा अपने धर्म पर अडिग रहे, उसका आचरण लोग आदर्श मानकर अपनाते हैं। पर जो राजा अपने धर्म से गिरे, उसका आचरण उसके अपने सगे भी नहीं सहते। जो उतावला राजा शास्त्र की मर्यादा छोड़कर राज्य में हठ-बल से चले, वह शीघ्र विनाश पाता है। जो क्षत्रिय प्राचीन क्षत्रियों की रीति का पालन न करे, चाहे विजित हो या अविजित, वह क्षत्रिय-धर्म से गिरता है। युद्ध में किसी ऐसे शत्रु-राजा को पकड़कर जिसने पहले कभी विजेता का भला किया हो, यदि विजेता द्वेषवश उसका सम्मान न करे, तो वह क्षत्रिय-धर्म से गिरता है।

वामदेव बोले, राजा अपना बल दिखाए, प्रसन्न रहकर जिए, और संकट के समय जो आवश्यक हो वही करे। ऐसा शासक सब प्राणियों का प्रिय बनता है। यदि आपने किसी से बुरा किया हो, तो अवसर आने पर उसका भला करके भरपाई कीजिए। असत्य वचन त्यागिए। बिना माँगे ही दूसरों का भला कीजिए। काम, क्रोध या द्वेष से धर्म को कभी न छोड़िए। किसी के पूछने पर रूखा उत्तर मत दीजिए, अशिष्ट वचन मत बोलिए, किसी काम में उतावले मत होइए, द्वेष में मत डूबिए। इन्हीं उपायों से शत्रु भी अपना बन जाता है। प्रिय घटने पर अति आनन्द में न डूबिए और अप्रिय पर अति शोक में न बहिए। धन समाप्त होने पर शोक न कीजिए और प्रजा का भला करने का धर्म सदा स्मरण रखिए।

वामदेव बोले, राजा उस समर्पित सेवक का सावधानी से पालन करे जो स्वामी का अहित नहीं करता और सदा हित करता है। जिन्होंने इन्द्रियाँ जीती हैं, जो समर्पित और पवित्र आचरण वाले और सामर्थ्यवान हैं, उन्हें बड़े कार्यों में नियुक्त करे। राजा मूढ़ों, इन्द्रियों के दासों, लोभियों, अप्रतिष्ठित आचरण वालों, छली, कपटी, द्वेषी, दुष्ट-आत्मा, अज्ञानी, नीच-मन वाले, तथा मद्य, जुआ, स्त्री और आखेट में लिप्त लोगों को महत्व के पदों पर रखकर अपनी समृद्धि खो देता है। जो राजा पहले अपनी रक्षा करके फिर रक्षा-योग्य दूसरों की रक्षा करता है, वह प्रजा को समृद्ध होते देखकर सन्तोष पाता है और महानता भी पाता है।

समझने की कुंजी (राज्य के पाँच स्तम्भ): वामदेव कहते हैं कि दुर्गों की रक्षा, युद्ध, न्याय-प्रशासन, नीति-विषयक परामर्श, और प्रजा को सुख में रखना, ये पाँच कर्म राजा के राज्य को बढ़ाते हैं। पर एक मनुष्य के लिए हर समय इन सबकी देखरेख असम्भव है, इसलिए इन्हें योग्य मन्त्रियों को सौंपकर राजा चिरकाल तक धरती शासन कर सकता है।

वामदेव बोले, किसी बलवान राजा को हानि पहुँचाकर यह मत सोचिए कि वह दूर रहता है तो सुरक्षित हैं। आहत बलवान राजा प्रमाद के क्षण में बाज़ की तरह झपटता है। जिस राजा का बल सुदृढ़ हो, वह अपने से दुर्बल पड़ोसी पर आक्रमण करे, बलवान पर कभी नहीं। जो राजा अपने ही निर्दोष प्रजाजनों के साथ छल करे, वह कुल्हाड़ी से वन काटने वाले की भाँति अपना ही नाश करता है। पर राजा एक बार दण्डित मन्त्रियों से, विशेषकर स्त्रियों से, पर्वतों और दुर्गम स्थलों से, हाथी-घोड़ों और सरीसृपों से, अपनी रक्षा सावधानी से करे। जो राजा अपने प्रमुख मन्त्रियों को छोड़कर नीच लोगों को चहेता बनाए, वह शीघ्र संकट में पड़ता है। नहुष-पुत्र ययाति ने राज-नीति के रहस्य बताते हुए कहा था कि शासक तुच्छ शत्रु को भी नष्ट कर दे।

सार: निर्बल और निर्दोष पर अन्याय राजा के अपने ही कुल को क्षय में ले जाता है। आहत बलवान कभी निरापद नहीं, इसलिए हानि पहुँचाकर निश्चिन्त मत रहिए। राज्य के पाँच स्तम्भों की देखरेख योग्य मन्त्रियों को सौंपकर राजा चिरकाल शासन कर सकता है।

बिना युद्ध की विजय और धर्मयुद्ध के नियम

वामदेव बोले, राजा बिना युद्ध के ही विजय पाए। युद्ध से प्राप्त विजय की बुद्धिमान प्रशंसा नहीं करते। जब तक अपनी शक्ति सुदृढ़ न हो, राजा नई विजयों की लालसा न करे। जिस राजा का राज्य विस्तृत और धन-धान्य से भरा हो, जिसकी प्रजा निष्ठावान और सन्तुष्ट हो, और जिसके पास अनेक योग्य अधिकारी हों, उसी की शक्ति सुदृढ़ कही जाती है। जिस राजा के सैनिक सन्तुष्ट, वेतन और पुरस्कार से प्रसन्न और शत्रु को छलने में समर्थ हों, वह छोटी सेना से भी सारी धरती जीत सकता है। राजा अपने तेज को बढ़ाना सीखे, पर शत्रु को विवेक से जीते। जो राजा अपने क्रोध को मारना जानता है, उसका कोई शत्रु नहीं। भीष्म ने जोड़ा, वसुमना ने वैसा ही किया।

युधिष्ठिर ने पूछा, यदि कोई क्षत्रिय युद्ध में किसी अन्य क्षत्रिय को जीतना चाहे, तो विजय के मामले में उसका आचरण कैसा हो? भीष्म बोले, राजा, चाहे सेना के साथ या बिना सेना के, जिस राजा को जीतना चाहे उसके राज्य में जाकर सब प्रजा से कहे, मैं आपका राजा हूँ, मैं सदा आपकी रक्षा करूँगा, मुझे उचित कर दीजिए या मुझसे युद्ध कीजिए। यदि प्रजा उसे राजा मान ले, तो युद्ध की आवश्यकता ही नहीं।

भीष्म ने धर्मयुद्ध के नियम खोले, क्षत्रिय बिना कवच वाले क्षत्रिय से युद्ध करते समय स्वयं कवच न पहने। एक से एक भिड़े, और शत्रु के अशक्त हो जाने पर उसे छोड़ दे। यदि शत्रु कवच पहने हो, तो प्रतिद्वन्द्वी भी कवच पहने। यदि शत्रु सेना के साथ आए, तो सेना से सामना हो। यदि शत्रु छल से लड़े, तो छल से जवाब हो, और यदि निष्कपट लड़े, तो निष्कपट साधनों से सामना हो। घुड़सवार रथी पर आक्रमण न करे, रथी रथी से भिड़े। जब प्रतिद्वन्द्वी संकट में पड़ जाए, उस पर प्रहार न हो, न ही भयभीत या परास्त पर। विषैले या काँटेदार बाण काम में न लाए जाएँ, ये दुष्टों के अस्त्र हैं। निष्कपट होकर, क्रोध और हत्या की लालसा के बिना, युद्ध करना चाहिए। दुर्बल या घायल का, सन्तानहीन का, जिसका अस्त्र टूट गया हो, जो संकट में पड़ा हो, जिसकी धनुष-डोरी कट गई हो, या जिसका वाहन छिन गया हो, वध न हो।

भीष्म ने कहा, घायल शत्रु को या तो उसके घर भेज दिया जाए, या विजेता के यहाँ लाकर कुशल वैद्यों से उसके घाव भरवाए जाएँ। जब धर्मात्मा राजाओं के झगड़े में कोई धर्मनिष्ठ योद्धा संकट में पड़े, तो उसके घाव भरवाकर, स्वस्थ होने पर उसे मुक्त कर देना चाहिए। यह सनातन धर्म है। स्वयं स्वयम्भू-पुत्र मनु ने कहा है कि युद्ध निष्कपट होकर लड़े जाएँ। यदि धर्मपूर्वक लड़ने को बाध्य क्षत्रिय अधर्म से विजय पाए, तो वह पापी हो जाता है, मानो अपना ही वध करता हो। दुष्ट को भी निष्कपट साधनों से जीतना चाहिए। धर्म के पालन में प्राण त्याग देना भी पाप से जीतने से श्रेष्ठ है।

एक उप-कथा: भीष्म पाप के विलम्बित फल का दृष्टान्त देते हैं। गाय की तरह, किया हुआ पाप तुरन्त फल नहीं देता। वह पापी की जड़ और शाखाएँ चाटकर अन्ततः उसे डुबो देता है। पापी अधर्म से धन कमाकर हर्षित होता है, धर्म को निष्फल मानकर धर्मात्माओं का उपहास करता है। वरुण के पाश में फँसा होकर भी वह स्वयं को अमर समझता है। पर वह हवा से फूली चमड़े की मशक की भाँति है, और शीघ्र ही उस वृक्ष की तरह जड़ सहित बह जाता है जो नदी-तट पर खड़ा था। तब लोग उसे पत्थर पर फूटे मिट्टी के घड़े-सा मानकर उसकी निन्दा करते हैं।

सार: श्रेष्ठ विजय वह है जो बिना युद्ध के हो। पर जब युद्ध अनिवार्य हो, तो वह धर्मयुद्ध हो, बराबरी का, निष्कपट, संकटग्रस्त और निरस्त्र पर प्रहार रहित। अधर्म से जीती विजय राजा और धरती दोनों को क्षीण करती है।

विजय के बाद का धर्म और प्राचीन राजाओं के उदाहरण

भीष्म ने कहा, राजा अधर्म के साधनों से धरती जीतने की इच्छा कभी न करे, चाहे वह सारी पृथ्वी का स्वामी क्यों न बना दे। कौन राजा अनुचित साधनों से पाई विजय से प्रसन्न होगा? अधर्म से कलंकित विजय अस्थिर है और स्वर्ग नहीं देती। ऐसी विजय राजा और धरती, दोनों को दुर्बल करती है। जिस योद्धा का कवच गिर चुका हो, जो शरण माँगे और कहे मैं आपका हूँ, या हाथ जोड़ ले, या अस्त्र रख दे, उसे बस पकड़ा जाए, मारा कभी नहीं। यदि कोई शत्रु-राजा आक्रमणकारी की सेना से परास्त हो जाए, तो विजेता स्वयं उससे न लड़े। वह उसे अपने महल लाकर पूरे वर्ष समझाए कि वह कहे मैं आपका सेवक हूँ। चाहे वह कहे या न कहे, विजेता के घर एक वर्ष रहकर वह परास्त शत्रु नया जीवन पाता है।

भीष्म ने कहा, यदि राजा परास्त शत्रु के घर से बलपूर्वक किसी कन्या को लाए, तो उसे एक वर्ष अपने पास रखे और पूछे कि वह उससे या किसी और से विवाह करना चाहती है। यदि वह सहमत न हो, तो उसे लौटा दे। बल से अर्जित अन्य सम्पत्ति के विषय में भी वही व्यवहार करे। राजा फाँसी की प्रतीक्षा में पड़े चोरों आदि से ज़ब्त धन को अपने काम में न ले। शत्रु से बल से ली गई गायें ब्राह्मणों को दे दे, ताकि वे उनका दूध पिएँ। शत्रु से लिए बैल कृषि में लगाए या शत्रु को लौटा दे। यह नियम है कि राजा ही राजा से लड़े। जो राजा नहीं, वह राजा पर प्रहार न करे। यदि कोई ब्राह्मण शान्ति का इच्छुक होकर निर्भय दो लड़ती सेनाओं के बीच आ जाए, तो दोनों तुरन्त युद्ध रोक दें।

एक उप-कथा: भीष्म प्राचीन राजाओं के उदाहरण देते हैं। राजा प्रतर्दन ने महायुद्ध में शत्रुओं को जीतकर उनका सारा धन, यहाँ तक कि अन्न और औषधियाँ तक ले लीं, पर उनकी भूमि अछूती छोड़ दी। राजा दिवोदास ने शत्रुओं को जीतकर उनके यज्ञ की अग्नि के अवशेष, आहुति का घृत और भोजन तक उठा लाया, और इसी कारण अपनी विजय का पुण्य खो बैठा। राजा नाभाग ने अपनी विजयों के बाद पूरे राज्य उनके शासकों सहित ब्राह्मणों को यज्ञ-दक्षिणा में दे दिए, पर विद्वान ब्राह्मणों और तपस्वियों का धन छोड़ दिया। भीष्म कहते हैं, प्राचीन धर्मात्मा राजाओं का यह आचरण उत्तम था, और मैं इसका पूर्ण समर्थन करता हूँ।

भीष्म ने कहा, नए जीते राज्य के उत्तेजनशील वर्गों को बिना विलम्ब मधुर वचनों और उपहारों से शान्त किया जाए, यही उत्तम नीति है। यदि इसके बजाय उन्हें कुनीति से वश में करने का यत्न हो, तो वे राज्य छोड़कर विजेता के शत्रुओं से जा मिलते हैं और विपत्ति की प्रतीक्षा करते हैं। असन्तुष्ट लोग, संकट ताकते हुए, संकट के समय शत्रु से मिल जाते हैं। शत्रु को अनुचित साधनों से छला न जाए, न उसे प्राणघातक रूप से घायल किया जाए, क्योंकि प्राणघातक चोट से उसका जीवन ही निकल सकता है। जिस राजा का राज्य विस्तृत और धनी हो, प्रजा निष्ठावान हो और सेवक-अधिकारी सन्तुष्ट हों, उसी की जड़ें सुदृढ़ कही जाती हैं। जिस राजा के ऋत्विज, पुरोहित, आचार्य और सम्मान-योग्य विद्वान उचित आदर पाते हैं, वही संसार की रीति का ज्ञाता कहलाता है। ऐसे ही आचरण से इन्द्र ने जगत का स्वामित्व पाया।

सार: विजय के बाद का धर्म और भी सूक्ष्म है। परास्त शत्रु, बलपूर्वक लाई कन्या और जब्त सम्पत्ति, सबके प्रति उदारता और मर्यादा का पालन हो। प्राचीन राजाओं ने भूमि और विद्वानों का धन छोड़कर ही अपनी विजय को पुण्य बनाया। शत्रु-भूमि के असन्तुष्ट वर्गों को मधुरता से जीतना ही श्रेष्ठ नीति है।

युद्ध की हिंसा में राजा का पुण्य कैसे: खेत-रक्षक का दृष्टान्त

युधिष्ठिर ने व्याकुल होकर पूछा, क्षत्रिय के कर्मों से अधिक पापमय कुछ नहीं। यात्रा या युद्ध में राजा असंख्य प्राणियों का संहार करता है। तो किन कर्मों से राजा सुख के लोक पाता है? भीष्म बोले, दुष्टों को दण्ड देकर, सत्पुरुषों को सहेजकर, यज्ञ और दान से राजा शुद्ध होते हैं। यह सच है कि विजय के इच्छुक राजा अनेक प्राणियों को पीड़ित करते हैं, पर विजय के बाद वे सबको आगे बढ़ाते और समृद्ध करते हैं। दान, यज्ञ और तप के बल से वे अपने पाप नष्ट करते हैं और उनका पुण्य इसलिए बढ़ता है कि वे सब प्राणियों का भला कर सकें।

एक उप-कथा: भीष्म खेत सुधारने वाले का दृष्टान्त देते हैं। खेत को उपजाऊ बनाने के लिए किसान धान के पौधे और खर-पतवार, दोनों उखाड़ता है। पर उसका यह कर्म धान के पौधों को नष्ट करने के बजाय उन्हें और सबल बना देता है। उसी तरह जो अस्त्र उठाते हैं, वे अनेक वध-योग्य लोगों का संहार करते हैं, और यह व्यापक संहार शेष बचे लोगों की वृद्धि और उन्नति का कारण बनता है। जो प्रजा को लूट, हत्या और पीड़ा से बचाता है, वह उनके प्राण लुटेरों से बचाकर धन, जीवन और भोजन का दाता माना जाता है।

भीष्म ने कहा, जो राजा ब्राह्मणों के लिए उठे युद्धों में जूझकर प्राण देता है, वह असीम दक्षिणा वाले यज्ञ का साकार रूप माना जाता है। यदि राजा अपने तरकश शत्रुओं पर निर्भयता से रिक्त करे, तो देवता उससे श्रेष्ठ कोई नहीं देखते। जितने बाणों से वह शत्रुओं के शरीर बेधता है, उतने ही शाश्वत और कामना-पूर्ण लोक वह भोगता है। शरीर से बहता रक्त उसे उसके सब पापों से, और साथ ही उस पीड़ा से भी, धो देता है। शास्त्र कहते हैं कि क्षत्रिय युद्ध में जो पीड़ा सहता है, वह तप की भाँति उसके पुण्य को बढ़ाती है। डरे हुए धर्मात्मा वीरों के पीछे खड़े होकर उनसे जीवन की याचना करते हैं, जैसे लोग मेघों से वर्षा माँगते हैं। यदि वे वीर, याचकों को युद्ध के संकट में डाले बिना, स्वयं संकट झेलकर भय के समय उनकी रक्षा करें, तो उनका पुण्य महान होता है।

भीष्म ने कहा, मनुष्यों में बड़ा अन्तर है। कुछ युद्ध के भयानक कोलाहल में शस्त्र-सज्जित शत्रु-पंक्तियों पर टूट पड़ते हैं, और वीर स्वर्ग का मार्ग अपनाते हुए शत्रु-समूह में घुसता है। पर जो कायर भय से भरकर भागने में बचाव ढूँढ़ता है और संकट में साथियों को छोड़ देता है, ऐसे नीच आपके वंश में न जन्में। जो साथियों को छोड़कर अनाहत अंगों से लौटते हैं, उन पर इन्द्र सहित देवता विपत्तियाँ भेजते हैं। ऐसे को लाठियों या पत्थरों से मारना चाहिए, या सूखी घास में लपेटकर जलाना चाहिए। कफ-मूत्र त्यागते हुए, दीन क्रन्दन करते हुए, शय्या पर मरना क्षत्रिय के लिए पापमय है। क्षत्रिय की घर में मृत्यु प्रशंसनीय नहीं। वे वीर हैं, उनका कोई अवीर कर्म पाप और अपयश है। जो रोग से ग्रस्त होकर पछताते हुए मरता है, वह स्वजनों को शोक में डुबोता है। पर वीर, गर्व और गरिमा से युक्त, स्वजनों से घिरा, शत्रुओं का संहार करता, तीखे शस्त्रों की धार पर मरे, यही उसे यश और इन्द्रलोक का निवास देता है।

सार: युद्ध की हिंसा के बावजूद राजा पुण्य पाता है, क्योंकि वह दुष्टों के संहार से शेष प्रजा की वृद्धि करता है, जैसे खेत-रक्षक खर-पतवार उखाड़कर फसल सबल करता है। क्षत्रिय की वीरगति तप के समान है। साथियों को छोड़कर भागना परम अपयश और पाप है।

अम्बरीष और इन्द्र: युद्ध-यज्ञ का रूपक

युधिष्ठिर ने पूछा, युद्ध में मृत्यु पाने वाले अपराजित वीर कौन-से लोक पाते हैं? भीष्म ने अम्बरीष और इन्द्र का संवाद सुनाया। नाभाग-पुत्र अम्बरीष, उस दुर्लभ स्वर्ग में पहुँचकर, अपने ही सेनापति को इन्द्र के साथ दिव्य रूप में, अति सुन्दर रथ पर, और भी ऊँचे लोकों की ओर बढ़ते देखकर विस्मित हुए। उन्होंने इन्द्र से पूछा, मैंने समुद्र-पर्यन्त धरती धर्म से शासित की, चारों वर्णों के साझा धर्म पाले, कठोर ब्रह्मचर्य का व्रत निभाया, गुरुजनों की सेवा की, वेद और राज-शास्त्र पढ़े, अतिथियों को अन्न-जल दिया, पितरों को श्राद्ध, ऋषियों को अध्ययन और दीक्षा, और देवों को उत्तम यज्ञ अर्पित किए, क्षत्रिय-धर्म निभाया और अनेक विजय पाईं। यह सुदेव, जो पहले मेरा सेनापति था, शान्त-आत्मा योद्धा था, उसने न महान यज्ञ किए, न ब्राह्मणों को विधिवत प्रचुर दान दिया। फिर वह किस कारण मुझसे आगे निकल गया?

इन्द्र ने उत्तर दिया, हे राजन्, इस सुदेव ने अनेक बार युद्ध का महान यज्ञ रचा था। यही हर उस मनुष्य के साथ होता है जो युद्ध में उतरता है। कवच पहने जो योद्धा शत्रु-पंक्तियों पर बढ़ता है, वह उस यज्ञ में दीक्षित हो जाता है। निश्चय ही ऐसा व्यक्ति युद्ध-यज्ञ का यजमान माना जाता है।

एक उप-कथा: अम्बरीष ने पूछा, इस यज्ञ में आहुति, द्रव-अर्पण, दक्षिणा और ऋत्विज क्या हैं? इन्द्र ने रूपक खोला। हाथी इस यज्ञ के ऋत्विज हैं, घोड़े इसके अध्वर्यु। शत्रुओं का मांस इसकी आहुति है, रक्त इसका द्रव-अर्पण। गीदड़, गिद्ध और कौए, और सपक्ष बाण, इसके सदस्य हैं। भाले, बरछी, तलवारें, फरसे और कुल्हाड़े इसके चमचे हैं। तीखे बाण इसके बड़े दोमुँहे चमचे हैं। बाघ-चर्म की म्यान में रखी, हाथीदाँत की मूठ वाली तलवारें इसके यज्ञ-पात्र हैं। रणक्षेत्र पर बहता रक्त इस होम की अन्तिम आहुति है, जो असीम पुण्य देती और हर कामना पूरी करती है। काटो, बेधो जैसी ध्वनियाँ इसके साम-गान हैं। हाथियों की चिंघाड़ इसके इडा-मन्त्र हैं, और नगाड़ों की थाप के साथ करतल-ध्वनि इसके वषट्कार और त्रिसामन-उद्गाता हैं।

इन्द्र ने कहा, जब किसी ब्राह्मण का धन हरा जा रहा हो, और कोई उसकी रक्षा के लिए अपने प्रिय शरीर का त्याग कर दे, तो वह आत्म-समर्पण से असीम दक्षिणा वाले यज्ञ का फल पाता है। जो वीर अपने स्वामी के लिए सेना के अग्रभाग में पराक्रम दिखाए और भय से पीठ न दिखाए, वह मेरे जैसे लोक पाता है। जो योद्धा रक्त की भयानक और अपार नदी बहा दे, जिसमें नगाड़े मेंढक-कछुए हों, वीरों की हड्डियाँ रेत, रक्त-मांस कीचड़, तलवार-ढाल बेड़े, मारे योद्धाओं के केश काई, घोड़े-हाथी-रथ पुल, ध्वजाएँ नरकट की झाड़ियाँ, मरे हाथियों के शरीर नौकाएँ, और गिद्ध-कौए तैरती राफ्ट हों, वह उस यज्ञ की अन्तिम स्नान-क्रिया पूरी करता है।

इन्द्र ने कहा, ऋषियों ने कहा है कि जो योद्धा शत्रु-सेना के अग्रभाग को अपनी रानियों का अन्तःपुर, अपनी सेना के अग्रभाग को आहुति-पात्र, अपने दक्षिण के योद्धाओं को सदस्य और उत्तर के योद्धाओं को अग्निध्र माने, और शत्रु-सेना को अपनी विवाहिता पत्नी समझे, वह सब लोक जीत लेता है। दो सेनाओं के बीच की खुली भूमि उसकी यज्ञ-वेदी है, और तीनों वेद उसकी तीन अग्नियाँ। जो भयभीत होकर युद्ध से मुँह मोड़ता और शत्रुओं से मारा जाता है, वह नरक में गिरता है, इसमें सन्देह नहीं। वीर के लिए कोई शोक न करे। बिना शोक किए मारा गया वीर स्वर्ग जाता है और वहाँ के निवासियों का सम्मान पाता है। ऐसे वीर के लिए लोग अन्न-जल अर्पित नहीं करते, स्नान या शोक नहीं करते। सहस्रों श्रेष्ठ अप्सराएँ बड़े वेग से उसे अपना स्वामी बनाने की इच्छा से, उस मारे गए वीर की आत्मा को लेने आती हैं।

इन्द्र ने कहा, वृद्ध और बालक न मारे जाएँ, न कोई स्त्री, न भागता हुआ, न जो होंठों में तिनका दबाए हो, न जो कहे मैं आपका हूँ। जम्भ, वृत्र, बल, पाक, शतमाय, विरोचन, अदम्य नमुचि, असंख्य मायाओं वाले सम्बर, विप्रचित्ति, इन सब दिति और दनु के पुत्रों को, तथा प्रह्लाद को, युद्ध में जीतकर मैं स्वयं देवों का अधिपति बना। भीष्म ने जोड़ा, ये शक्र के वचन सुनकर अम्बरीष ने समझ लिया कि योद्धा युद्ध को साधन बनाकर स्वर्ग में परम कल्याण कैसे पाते हैं।

समझने की कुंजी (युद्ध-यज्ञ का रूपक): यहाँ इन्द्र युद्ध की भयावहता को वैदिक यज्ञ की शब्दावली में ढाल देते हैं। यज्ञ में ऋत्विज (पुरोहित), अध्वर्यु (कर्मकाण्ड कराने वाला), आहुति (अग्नि में अर्पण), दक्षिणा (पुरोहितों को दिया धन), सदस्य (साक्षी), इडा और वषट्कार (मन्त्र-उच्चार) होते हैं। इन्द्र इन सबको रणक्षेत्र के तत्वों से जोड़ देते हैं, ताकि यह स्थापित हो कि वीर का युद्ध स्वयं एक पवित्र यज्ञ है, और उसका रक्त ही उसकी अन्तिम पावन आहुति।

सार: युद्ध स्वयं एक महायज्ञ है, जिसमें वीर यजमान, उसका रक्त अन्तिम आहुति, और वीरगति परम पुण्य है। पर इसी रूपक के भीतर इन्द्र युद्ध की क्रूर मर्यादा भी रखते हैं, बालक, वृद्ध, स्त्री, भागते और शरणागत का वध वर्जित है।

मिथिला-नरेश जनक की वीरों को प्रेरणा और सेना-व्यूह

भीष्म ने कहा, इस सन्दर्भ में प्रतर्दन और मिथिला-नरेश के युद्ध की प्राचीन कथा है। मिथिला के राजा जनक ने युद्ध-यज्ञ में दीक्षित होकर युद्ध की पूर्वसन्ध्या पर अपने सब सैनिकों को उत्साहित किया। सत्य के ज्ञाता उच्च-आत्मा जनक ने अपने योद्धाओं को स्वर्ग और नरक, दोनों दिखाए। उन्होंने कहा, देखिए, ये महान तेज वाले लोक उनके लिए हैं जो निर्भय होकर लड़ते हैं। गन्धर्व-कन्याओं से भरे ये लोक शाश्वत हैं और हर कामना पूर्ण करते हैं। और उस ओर वे नरक के लोक हैं, उनके लिए जो युद्ध से भागते हैं। उन्हें वहाँ अनन्त काल अपयश में सड़ना होगा। अपने प्राणों की परवाह छोड़कर अपने शत्रुओं को जीतिए। अपयश के नरक में मत गिरिए। वीरों के लिए युद्ध में प्राण देना ही स्वर्ग का सुखद द्वार है। यह सुनकर मिथिला के योद्धाओं ने अपने शासकों को प्रसन्न करते हुए शत्रुओं को युद्ध में जीत लिया।

भीष्म ने सेना-व्यूह की रचना बताई, जो दृढ़-आत्मा हों, वे युद्ध के अग्रभाग में खड़े हों। रथी हाथियों के बीच रखे जाएँ। रथियों के पीछे घुड़सवार और उनके पीछे कवच-धारी पैदल सैनिक। जो राजा इस प्रकार व्यूह बनाता है, वह सदा शत्रुओं को जीतता है। क्रोध से भरे वीर निष्कपट युद्ध करके स्वर्ग का कल्याण पाना चाहते हैं। जैसे मकर समुद्र को मथते हैं, वैसे वे शत्रु-पंक्तियों को मथ देते हैं। एक-दूसरे को आश्वासन देते हुए वे उत्साहहीनों को उत्साहित करें। विजेता नव-विजित भूमि की रक्षा करे और भागते शत्रु का अधिक पीछा न कराए। जो परास्त होकर फिर संगठित हो जाते हैं और प्राणों से निराश होकर पीछा करने वालों पर टूट पड़ते हैं, उनका आक्रमण अप्रतिरोध्य होता है। इसी कारण, हे राजन्, भागते शत्रु का अधिक पीछा न कराइए।

सार: जनक ने योद्धाओं को स्वर्ग-नरक का दर्शन कराकर निर्भय बनाया। व्यूह में दृढ़-आत्मा आगे, रथी-हाथी मध्य में, घुड़सवार और पैदल पीछे। भागते शत्रु का अति पीछा वर्जित है, क्योंकि निराश शत्रु का पलटवार परम घातक होता है।

सेना-संचालन, ऋतु, मार्ग और सात्त्विक-तामस उपाय

युधिष्ठिर ने पूछा, हे पितामह, विजय के इच्छुक राजा धर्म से थोड़ा हटकर भी अपनी सेना को कैसे युद्ध में ले जाएँ? भीष्म बोले, कुछ कहते हैं धर्म सत्य से स्थिर होता है, कुछ तर्क से, कुछ सदाचार से, और कुछ उपाय-साधनों से। मैं तत्काल फल देने वाले उपाय बताता हूँ। लुटेरे प्रायः मर्यादा तोड़कर सम्पत्ति और पुण्य के नाशक बनते हैं। इन्हें रोकने के उपाय शास्त्रसम्मत हैं। राजा के पास सीधी और टेढ़ी, दोनों बुद्धि उपलब्ध हों। टेढ़ी बुद्धि का प्रयोग वह दूसरों को हानि पहुँचाने में न करे, पर अपने ऊपर आए संकट से बचने में कर सकता है। शत्रु प्रायः मन्त्रियों, सैनिकों, मित्रों या प्रजा में फूट डालकर राजा को हानि पहुँचाते हैं। छल का ज्ञाता राजा छल से ही उनका प्रतिकार करे।

भीष्म ने सामग्री-संग्रह बताया, हाथियों के शरीर की रक्षा के लिए चमड़े के कवच, बैलों के लिए वैसे ही कवच, हड्डी, काँटे, तीखे लोहे के अस्त्र, कवच, याक-पूँछ, तीखे और सुधरे हुए शस्त्र, पीले-लाल कवच, भाँति-भाँति की ध्वजाएँ, तलवारें, भाले, फरसे, बरछियाँ और ढालें, सब प्रचुर मात्रा में बनवाकर रखे जाएँ। सब शस्त्र भली-भाँति धार किए हों। सैनिक साहस और संकल्प से भरे जाएँ। सेना को चैत्र या अग्रहायण मास में चलाना उचित है, क्योंकि उस समय फसलें पकती हैं और जल का अभाव नहीं रहता। वह ऋतु न अधिक शीत होती है, न अधिक उष्ण। पर यदि शत्रु संकट में हो, तो उस अनुकूल समय की प्रतीक्षा किए बिना तुरन्त सेना चलाई जाए।

भीष्म ने कहा, जिस मार्ग पर जल और घास प्रचुर हो, जो समतल और सुगम हो, वही चुना जाए। मार्ग के दोनों ओर के क्षेत्र पहले से कुशल और वन-परिचित गुप्तचरों से जान लिए जाएँ। सेना को पशुओं की तरह घने वनों से न ले जाया जाए। दुर्गों में वही प्रशंसनीय है जिसके चारों ओर जल भरी खाई और दीवार हो, और प्रवेश केवल एक हो। शिविर खुले आकाश के नीचे से अधिक उत्तम वन के निकट माना जाता है। सैनिकों को इस प्रकार खड़ा किया जाए कि हवा, सूर्य और शुक्र-ग्रह उनके पीछे से आएँ। विजय के साधनों में हवा सूर्य से श्रेष्ठ है, और सूर्य शुक्र से। जो भूमि दलदली, जलमय, ऊबड़-खाबड़ और ईंट-पत्थर वाली न हो, वह घुड़सवारों के लिए उपयुक्त है। कीचड़ और गड्ढों से मुक्त भूमि रथियों के लिए, झाड़ियों और बड़े वृक्षों वाली जलमय भूमि हाथी-योद्धाओं के लिए, और दुर्गम, वृक्षों-नरकट से भरी या पर्वतीय भूमि पैदल सेना के लिए उपयुक्त है।

भीष्म ने कहा, जो आपकी सेना में शत्रु-पंक्ति तोड़ें या भागती सेना को फिर खड़ा करें, उनका वेतन दुगुना हो और उन्हें अपने समान भोजन, पेय और आसन से सम्मानित कीजिए। जो दस सैनिकों का मुखिया हो, उसे सौ का बनाइए, और जो सौ का, उसे सहस्र का। प्रमुख योद्धाओं को एकत्र कर कहिए, हम विजय की और एक-दूसरे को न छोड़ने की शपथ लें। जो भयभीत हों, वे यहीं रहें। जो साथियों को संकट में छोड़कर भागे, उसे प्राणों का त्याग, धन-हानि, अपयश और निन्दा भोगनी पड़ती है। जो प्राण देने को तैयार हों, वे ही साहस से शत्रु-पंक्तियों पर टूटें। अग्रभाग में तलवार-ढाल वाली टुकड़ी रखी जाए, पीछे रथ-दल, और बीच में अन्य योद्धा। डरे हुए दुर्बल सैनिकों को धीरज से ढाढ़स दिया जाए और कम-से-कम सेना की संख्या दिखाने के लिए मैदान में रखा जाए। यदि सेना थोड़ी हो और बड़ी सेना से भिड़ना हो, तो सूचीमुख व्यूह बनाया जाए।

समझने की कुंजी (आधुनिक समतुल्यता): भीष्म जिस सूचीमुख व्यूह की बात करते हैं, वह सुई की नोक जैसी पतली, भेदक रचना है, जिससे थोड़े सैनिक भी बड़ी सेना में सेंध मार सकें। आधुनिक सैन्य भाषा में यह केन्द्रित आक्रमण (कन्सन्ट्रेटेड पेनिट्रेशन) जैसा है, जहाँ कम बल को एक बिन्दु पर समेटकर शत्रु की पंक्ति तोड़ी जाती है। चैत्र-अग्रहायण की ऋतु-गणना भी आधुनिक सेनाओं की उस रणनीति जैसी है जहाँ रसद और मौसम देखकर ही अभियान का समय तय होता है।

सार: सेना-संचालन का धर्म व्यावहारिक है, अस्त्र-संग्रह, उचित ऋतु, सुगम मार्ग, भूभाग के अनुसार सेना का प्रयोग, वीरों का सम्मान और पुरस्कार, और थोड़ी सेना के लिए सूचीमुख व्यूह। संकटग्रस्त शत्रु पर समय की प्रतीक्षा बिना ही प्रहार उचित है।

योद्धाओं के लक्षण और विजय के शकुन

युधिष्ठिर ने पूछा, युद्ध के योग्य योद्धा किस स्वभाव, रूप और शस्त्र वाले हों? भीष्म बोले, हर योद्धा-दल वही शस्त्र और वाहन अपनाए जिनका वह अभ्यासी हो। गन्धर्व, सिन्धु और सौवीर देश के लोग नख और भालों से उत्तम लड़ते हैं, वे बलशाली और हर सेना को जीतने में समर्थ हैं। उशीनर के लोग सब शस्त्रों में निपुण हैं। पूर्व के लोग हाथी की पीठ से और अनुचित युद्ध की हर रीति में कुशल हैं। यवन, काम्बोज और मथुरा के आसपास के लोग नंगे हाथों से लड़ने में दक्ष हैं। दक्षिण के लोग तलवार हाथ में लेकर लड़ने में निपुण हैं। बल और साहस से युक्त लोग प्रायः हर देश में जन्मते हैं।

भीष्म ने योद्धाओं के बाह्य लक्षण बताए, जिनकी वाणी और आँखें सिंह-व्याघ्र जैसी हों, चाल सिंह-व्याघ्र जैसी हो, और आँखें कबूतर या सर्प जैसी हों, वे सब शत्रु-पंक्ति पीसने वाले वीर हैं। जिनकी वाणी हिरन जैसी और आँखें चीते या बैल जैसी हों, वे बड़े फुर्तीले हैं। जिनकी वाणी घण्टों जैसी हो, वे उत्तेजित, दुष्ट और क्रोधी होते हैं। जिनकी वाणी मेघ जैसी गम्भीर हो, मुख क्रोधपूर्ण या ऊँट जैसा हो, नाक और जीभ टेढ़ी हो, वे बड़े वेग वाले होते हैं और दूर तक शस्त्र फेंक सकते हैं। बिल्ली जैसी टेढ़ी देह और पतले बाल-त्वचा वाले बड़े वेगवान और रण में लगभग अजेय होते हैं। जो सुगठित, सुन्दर और सम देह वाले, चौड़ी छाती वाले हों, शत्रु का नगाड़ा-तुरही सुनते ही क्रोधित हों, हर भिड़न्त में आनन्द लें, उनकी आँखें गम्भीर हों या उभरी हुई या हरी हों, वे सब वीर हैं और रण में प्राण न्योछावर करने में समर्थ। जो दूर के प्रदेशों में रहते हैं, क्रूर और उद्धत हैं, मधुर वचन को पराजय का चिह्न मानते हैं, उन्हें सदा अग्रभाग में रखा जाए। वे बिना पीछे हटे शत्रु को मारते और स्वयं मरते हैं। यदि उनसे कोमलता बरती जाए, तो वे अपने ही राजा पर क्रोध दिखाते हैं।

युधिष्ठिर ने पूछा, सेना की भावी विजय के सुप्रसिद्ध लक्षण क्या हैं? भीष्म बोले, जिस सेना के सैनिक और पशु अनुदास और प्रसन्न हों, वह निश्चित विजय पाती है। ऐसी सेना के पीछे से अनुकूल हवा बहती है। आकाश में इन्द्रधनुष दिखते हैं। मेघ उन पर छाया डालते हैं और कभी सूर्य उन पर चमकता है। गीदड़, कौए और गिद्ध उनके अनुकूल हो जाते हैं। उनकी यज्ञाग्नि शुद्ध तेज से ऊपर की ओर जलती है, धुआँ-रहित लपटें दक्षिण की ओर झुकती हैं, और आहुति से सुगन्ध उठती है। शंख और नगाड़े गहरी, गूँजती ध्वनि देते हैं, सैनिक उत्साह से भर जाते हैं, ये भावी विजय के लक्षण हैं।

भीष्म ने कहा, यदि हंस, सारस, शतपत्र और चाष पक्षी शुभ स्वर बोलें, और सब सबल योद्धा प्रसन्न हों, तो ये विजय के लक्षण हैं। जिनका व्यूह शस्त्रों, यन्त्रों, कवचों और ध्वजाओं की चमक से तथा भीतर खड़े तेजस्वी सैनिकों के दीप्त मुखों से देदीप्यमान और भयावह दिखे, वे सदा शत्रु को जीतते हैं। यदि सेना के योद्धा पवित्र आचरण और विनम्र व्यवहार वाले हों और एक-दूसरे का स्नेह से ध्यान रखें, तो यह विजय का लक्षण है। बायें खड़ा कौआ युद्ध में जुटे व्यक्ति के लिए, और दाहिने खड़ा कौआ युद्ध में जुटने वाले के लिए शुभ माना जाता है। पीठ पीछे दिखे तो उद्देश्य की अपूर्ति, और सामने दिखे तो संकट का संकेत है।

भीष्म ने अन्तिम और परम सूत्र दिया, चारों प्रकार की विशाल सेना जुटा लेने पर भी, हे युधिष्ठिर, पहले शान्ति का ही व्यवहार कीजिए। यदि शान्ति के प्रयत्न विफल हों, तभी युद्ध में उतरिए। युद्ध से पाई विजय अति निम्न श्रेणी की है, वह मानो सनक या भाग्य पर निर्भर है। जब बड़ी सेना टूटकर भागने लगती है, तब उसका वेग रोकना अत्यन्त कठिन हो जाता है, मानो जल का प्रवाह या डरे हिरनों का झुंड हो। कुछ टूटते हैं, और बिना कारण साहसी और कुशल योद्धा भी उनके साथ टूट जाते हैं। फिर भी, कभी पचास संकल्पवान, एक-दूसरे पर भरोसा करते, प्राण देने को तैयार सैनिक संख्या में बहुत बड़े शत्रु को पीस देते हैं। कभी पाँच, छह या सात उच्च कुल के, परस्पर सटे और सम्मानित योद्धा अपने से कहीं अधिक संख्या वाले शत्रु को जीत लेते हैं।

सार: योद्धाओं की पहचान उनके देश, स्वभाव और बाह्य लक्षणों से होती है, और विजय के शकुन सेना के मनोबल, अग्नि, पक्षियों और हवा से पढ़े जाते हैं। पर भीष्म का परम सूत्र यह है कि युद्ध अन्तिम उपाय है, पहले शान्ति का यत्न हो। युद्ध की विजय भाग्य पर टिकी, निम्न श्रेणी की विजय है।

साम-दाम-भेद-दण्ड और विजय के बाद की करुणा

भीष्म ने कहा, जब तक टकराव टल सके, युद्ध वांछनीय नहीं। पहले साम (मेल), भेद (फूट डालना) और दान (उपहार) के उपाय आज़माए जाएँ, युद्ध इन सबके बाद। शत्रु-सेना के मात्र दर्शन से भयभीत लोग वैसे ही काँप उठते हैं जैसे आकाश की बिजली गिरते देख पूछते हों, यह किस पर गिरेगी। शत्रु के सहयोगियों में फूट डालने के लिए गुप्तचर भेजे जाएँ। फूट डाल देने पर उस राजा से सन्धि करना उचित है जो उस शत्रु से अधिक बलवान हो जिसे कुचलना है। शत्रु पर हर ओर से घेरा डालने का यत्न हो। क्षमा सदा सत्पुरुषों को मिलती है, दुष्टों को नहीं।

भीष्म ने कहा, विजय के बाद क्षमा दिखाने वाले राजा की कीर्ति अधिक फैलती है। क्षमाशील राजा के शत्रु भी, चाहे वह कोई बड़ा अपराध कर बैठे, उस पर भरोसा करते हैं। सम्बर ने कहा था कि पहले शत्रु को पीड़ित करके फिर क्षमा दिखानी चाहिए, क्योंकि लकड़ी का डण्डा, यदि पहले आग पर सीधा न किया जाए, शीघ्र अपनी पुरानी टेढ़ी अवस्था में लौट आता है। पर शास्त्रज्ञ इसकी प्रशंसा नहीं करते। वे कहते हैं कि शत्रु को पिता के समान, बिना क्रोध और बिना नष्ट किए, पुत्र को वश में करने की भाँति वश में करना चाहिए। यदि राजा अति कठोर हो, तो सब उससे घृणा करते हैं, और अति मृदु हो, तो सब उसकी उपेक्षा करते हैं। इसलिए दोनों का अभ्यास कीजिए, कठोरता और मृदुता।

भीष्म ने करुणा का अनुपम सूत्र दिया, प्रहार से पहले और प्रहार करते समय, हे भारत, मधुर वचन बोलिए, और प्रहार के बाद उन पर करुणा दिखाइए, ताकि वे जानें कि आप उनके लिए शोक और अश्रु बहा रहे हैं। किसी शत्रु-सेना को जीतकर राजा बचे हुओं से कहे, मुझे तनिक हर्ष नहीं कि मेरे सैनिकों ने इतनों को मार डाला। मैंने बार-बार मना किया, पर उन्होंने मेरी बात नहीं मानी। काश ये सब, जो मारे गए, जीवित होते। वे ऐसी मृत्यु के योग्य नहीं थे। वे सब सज्जन और सच्चे थे, युद्ध से न हटने वाले। ऐसे लोग दुर्लभ हैं। जिसने ऐसे वीर को मारा है, उसने वह किया जो मुझे प्रिय नहीं। ऐसे वचन परास्त पक्ष के सामने कहकर, राजा एकान्त में अपने उन वीरों का सम्मान करे जिन्होंने साहस से शत्रु को मारा। घायल योद्धाओं की पीड़ा पर सान्त्वना देते हुए, उन्हें अपने साथ जोड़ने को राजा उनके हाथ स्नेह से पकड़कर रो भी ले। ऐसा निर्भय और धर्मात्मा राजा सब प्राणियों का प्रिय बनता है, और उनका विश्वास जीतकर धरती को इच्छानुसार भोगता है।

समझने की कुंजी (साम-दाम-भेद-दण्ड): राज-नीति के ये चार उपाय हैं। साम का अर्थ मेल-मिलाप और मधुर वचन, दान का अर्थ उपहार या रिश्वत देकर पक्ष में करना, भेद का अर्थ शत्रु-पक्ष में फूट डालना, और दण्ड का अर्थ बल-प्रयोग या युद्ध। भीष्म का मूल विधान यह है कि दण्ड (युद्ध) अन्त में आए, पहले तीन उपाय पूरी तरह आज़माए जाएँ।

सार: राज-नीति का क्रम है साम, दान, भेद, और अन्त में दण्ड। राजा न अति कठोर हो न अति मृदु, अपितु दोनों। और विजय के बाद की करुणा, परास्त के लिए शोक प्रकट करना, ही राजा को सब प्राणियों का प्रिय बनाती है।

बृहस्पति और इन्द्र: शत्रु से कैसे बरतें और दुष्ट की पहचान

युधिष्ठिर ने पूछा, राजा मृदु शत्रु, उग्र शत्रु, और अनेक मित्रों व बड़ी सेना वाले शत्रु के साथ कैसे बरते? भीष्म ने बृहस्पति और इन्द्र का संवाद सुनाया। इन्द्र ने हाथ जोड़कर बृहस्पति से पूछा, हे विप्र, मैं अपने शत्रुओं से कैसे बरतूँ? उन्हें बिना नष्ट किए उपायों से कैसे वश में करूँ? दो सेनाओं की भिड़न्त में विजय किसी भी ओर हो सकती है। मैं ऐसा कैसे करूँ कि मेरी जीती हुई यह प्रचण्ड समृद्धि मुझे न छोड़े? बृहस्पति ने उत्तर दिया, झगड़े से शत्रु को जीतने की इच्छा कभी न कीजिए। क्रोध से भरे और क्षमा-हीन बालक ही झगड़ा ढूँढ़ते हैं।

बृहस्पति बोले, जो शत्रु का नाश चाहे, वह उसे सावधान न होने दे। अपना क्रोध, भय या हर्ष कभी प्रकट न करे, इन्हें हृदय में छिपाए रखे। वास्तव में शत्रु पर भरोसा किए बिना, उसके साथ ऐसे बरते मानो पूरा भरोसा हो। शत्रु से सदा मधुर वचन बोले और कुछ अप्रिय न करे। व्यर्थ की शत्रुता और कटु वाणी से बचे। जैसे बहेलिया उन्हीं पक्षियों की-सी बोली बोलकर उन्हें फँसा लेता है जिन्हें पकड़ना चाहता है, वैसे ही राजा अपने शत्रुओं को वश में लाकर, यदि चाहे, तब नष्ट करे। शत्रुओं को जीतकर निश्चिन्त होकर न सोए, क्योंकि दुष्ट शत्रु लापरवाही से बुझाई आग की तरह फिर सिर उठा लेता है।

बृहस्पति बोले, राजा शत्रु को निश्चिन्त बनाकर वश में लाए और अपना प्रयोजन सिद्ध करे। मन्त्रियों और नीति-ज्ञ बुद्धिमानों से परामर्श करके, उपेक्षित और हृदय से अजेय शत्रु पर उचित समय पर, विशेषकर तब प्रहार करे जब वह कोई भूल कर बैठे। राजा शत्रु को पूरी तरह कभी न मारे, पर ऐसा कर्म अवश्य करे जो विजय को निर्णायक बना दे। शत्रु को ऐसी चोट न दे जो उसके हृदय में सदा सालती रहे, न ही वचन के बाणों से घाव करे। काम, क्रोध और घमण्ड त्यागकर, सावधानी से, राजा शत्रुओं की भूलों की प्रतीक्षा करे। अपनी मृदुता, दण्ड की कठोरता, अकर्मण्यता और प्रमाद, तथा शत्रुओं के सुप्रयुक्त छल, ये चार दोष मूर्ख राजा का नाश करते हैं। जो इन चार दोषों को जीत ले और शत्रुओं के छल का प्रतिकार कर सके, वह निश्चय ही सबको जीत लेता है।

बृहस्पति बोले, जब कोई एक मन्त्री अकेला गुप्त कार्य कर सकता हो, तब राजा केवल उसी एक से परामर्श करे। अनेक से परामर्श करने पर वे काम का भार एक-दूसरे पर डालते हैं और गुप्त बात को प्रकट कर देते हैं। शत्रु अदृश्य हों तो उन पर दिव्य दण्ड (होम-मन्त्रादि) का आह्वान हो, और दृश्य हों तो चतुरंगिणी सेना चलाई जाए। राजा यदि मृदु हो तो उपेक्षित होता है, उग्र हो तो लोग डरते हैं। इसलिए न उग्र बनिए न मृदु, अपितु दोनों। जैसे तीव्र धारा ऊँचे तट को निरन्तर काटकर भूमि गिरा देती है, वैसे ही प्रमाद और भूल राज्य को नष्ट कर देते हैं। एक साथ अनेक शत्रुओं पर आक्रमण कभी न कीजिए। साम, दान या भेद से उन्हें एक-एक करके पीसिए, और शेष थोड़े बचे शत्रुओं से शान्ति से बरतिए। बुद्धिमान राजा समर्थ होने पर भी सब शत्रुओं को एक साथ कुचलने न लगे।

एक उप-कथा: इन्द्र ने पूछा, दुष्ट व्यक्ति के लक्षण क्या हैं? मैं कैसे जानूँ कौन दुष्ट है? बृहस्पति बोले, दुष्ट वह है जो दूसरों के दोष उनकी पीठ पीछे फैलाता है, जो दूसरों की उपलब्धियों से ईर्ष्या करता है, और जब उसके सामने किसी के गुणों की प्रशंसा होती है तो मौन रह जाता है, मानो उस स्तुति में मिलना उसे भारी पड़ता हो। केवल मौन रहना दुष्टता का चिह्न नहीं। पर दुष्ट ऐसे अवसर पर गहरी साँसें लेता है, होंठ चबाता है और सिर हिलाता है। ऐसा व्यक्ति समाज में घुलमिलकर भी असंगत बातें करता है। वह अपने वचन तब पूरे नहीं करता जब आश्वासन पाने वाले की दृष्टि उस पर न हो। जब दृष्टि उस पर हो, तब वह उस विषय का उल्लेख तक नहीं करता। दुष्ट व्यक्ति अकेला भोजन करता है और परोसे भोजन में दोष ढूँढ़ता है कि आज सब वैसा अच्छा नहीं जैसा अन्य दिनों होता है। उसका स्वभाव उसके बैठने, लेटने और सवारी करने तक में प्रकट हो जाता है। शोक के अवसर पर दुखी होना और हर्ष के अवसर पर प्रसन्न होना, ये मित्र के लक्षण हैं, और इसके विपरीत आचरण शत्रु का।

भीष्म ने जोड़ा, बृहस्पति के ये वचन सुनकर पुरन्दर ने उन्हीं के अनुसार आचरण किया, और अवसर पाते ही, विजय का संकल्प करके, अपने सब शत्रुओं को वश में कर लिया।

सार: शत्रु-नीति का सार है धैर्य और गोपनीयता, अपना क्रोध-भय-हर्ष छिपाओ, शत्रु को निश्चिन्त बनाकर उसकी भूल की प्रतीक्षा करो, एक साथ अनेक पर आक्रमण मत करो। न अति मृदु बनो न अति उग्र। और मित्र-शत्रु की पहचान आचरण के सूक्ष्म चिह्नों से करो।

यहाँ यह राज-धर्म का खण्ड विराम लेता है। शर-शय्या पर लेटे भीष्म ने मन्त्री-चयन से लेकर दुर्ग, कोष, कर-नीति, ब्राह्मण-रक्षा, धर्मयुद्ध, विजय की मर्यादा और शत्रु-नीति तक का विस्तृत मार्ग युधिष्ठिर के सामने खोल दिया, बीच-बीच में काकवृक्षीय, बृहस्पति-इन्द्र, उतथ्य-माण्धाता, वामदेव-वसुमना, अम्बरीष-इन्द्र और जनक की कथाओं से उसे सजाते हुए। धर्मराज का प्रश्न-क्रम अभी थमा नहीं, क्योंकि अगली कथा फिर क्षेमदर्शी और काकवृक्षीय से आरम्भ होती है, जहाँ संकटग्रस्त, राज्यहीन राजा के कर्तव्य का प्रश्न उठता है।

कृष्ण हाथ जोड़कर शरशय्या पर लेटे भीष्म के समीप खड़े; भीष्म हाथ उठाकर बोलते, पीछे पांडव शोकमग्न।

धर्म क्या है, और कब असत्य भी पाप नहीं

भीष्म ने कहा, “हे युधिष्ठिर, जो प्रश्न आपने पूछा है, वह कठिन है, क्योंकि यह कहना ही कठिन है कि धर्म क्या है। उसका ठीक-ठीक संकेत करना सहज नहीं। धर्म पर बोलते हुए कोई भी उसे पूरी सूक्ष्मता से नहीं बता सकता। ब्रह्मा ने धर्म को सब प्राणियों की उन्नति और वृद्धि के लिए कहा है। अतः जो उन्नति और वृद्धि की ओर ले जाए, वही धर्म है। धर्म इसलिए कहा गया कि प्राणी एक-दूसरे को क्षति न पहुँचाएँ; अतः जो प्राणियों की हिंसा को रोके, वही धर्म है। धर्म को धर्म इसलिए कहते हैं कि वह सब प्राणियों को धारण करता है। सचमुच, सारे प्राणी धर्म से ही धारण किए जाते हैं; अतः जो सब प्राणियों को धारण करने में समर्थ हो, वही धर्म है।

“कुछ कहते हैं कि धर्म वही है जो श्रुति (वेद) में कहा गया है। दूसरे इससे सहमत नहीं। हम उन्हें दोष नहीं देते जो ऐसा कहते हैं। फिर भी सब कुछ श्रुति में बताया नहीं गया। कभी डाकू किसी का धन हड़पना चाहते हैं और लूट को सरल करने के लिए पूछताछ करते हैं। ऐसी पूछताछ का उत्तर कभी नहीं देना चाहिए, यह निश्चित कर्तव्य है। यदि चुप रहकर बच जाएँ तो चुप ही रह जाएँ। किन्तु जहाँ बोलना ही पड़े और चुप्पी से सन्देह जागे, वहाँ सत्य की अपेक्षा असत्य कह देना अच्छा है, यह निश्चित निष्कर्ष है। यदि किसी झूठी शपथ से भी पापी जनों से बचा जा सके, तो वह शपथ बिना पाप लिए ली जा सकती है।

“समर्थ होते हुए भी पापी जनों को अपना धन न दे। पापियों को दिया गया धन देनेवाले को भी पीड़ित करता है। प्राण संकट में हों, अथवा विवाह का अवसर हो, तब असत्य कहा जा सकता है। जो धर्म चाहता है, वह असत्य कहकर भी पाप नहीं करता, यदि वह असत्य दूसरों के धन और समृद्धि की रक्षा के लिए, अथवा धार्मिक प्रयोजन के लिए कहा जाए। देने का वचन देकर मनुष्य उसे पूरा करने को बँधता है; न करे तो उस आत्म-हरणकर्ता को बलपूर्वक दास बना लें। जो धर्म-संगत वचन पूरा किए बिना अनुचित आचरण करे, उसे दण्ड के द्वारा अवश्य पीड़ित किया जाए।

“कपटी पुरुष सब कर्तव्यों से गिरकर, अपने वर्ण के धर्म त्यागकर, जीवन-निर्वाह के लिए असुरों के आचरण की ओर झुकता है। ऐसा पापी जो छल से जीता है, उसे हर उपाय से मारा जाए। ऐसे पापी समझते हैं कि इस संसार में धन से बड़ा कुछ नहीं। ऐसे जनों को कभी न सहा जाए। कोई उनके साथ भोजन न करे। वे अपने पापों के कारण पतित माने जाएँ। मनुष्यता से गिरे, देवताओं की कृपा से बहिष्कृत, वे दुष्ट प्रेतों के समान हैं। न यज्ञ, न तप; उनका संग छोड़ दें। यदि उनका धन नष्ट हो जाए तो वे आत्महत्या तक कर बैठते हैं, जो अत्यन्त दयनीय है। ऐसे पापियों में कोई ऐसा नहीं जिससे आप कह सकें, ‘यह आपका कर्तव्य है, इसमें मन लगाइए।’ उनका दृढ़ विश्वास यही है कि संसार में धन के बराबर कुछ नहीं। जो ऐसे प्राणी को मारता है, वह कोई पाप नहीं करता; वह तो उसी को मारता है जो अपने ही कर्मों से पहले ही मारा जा चुका है। मारा जाए तो मरा हुआ ही मारा जाता है। जिसने ऐसे विवेक-शून्य जनों के नाश की प्रतिज्ञा की हो, वह अपनी प्रतिज्ञा निबाहे। ऐसे पापी कौवे और गिद्ध के समान छल पर जीते हैं; शरीर छूटने पर वे कौवे और गिद्ध होकर ही जन्म लेते हैं। किसी भी विषय में दूसरे के साथ वैसा ही बरतना चाहिए जैसा वह उस विषय में बरतता है। जो छल करे, उसका छल से सामना करना चाहिए; जो ईमानदार हो, उसके साथ ईमानदारी से।”

समझने की कुंजी (श्रुति): श्रुति का अर्थ है “जो सुना गया”, अर्थात् वेद। भीष्म का यह कथन महाभारत की नैतिक जटिलता दिखाता है: वे स्वीकारते हैं कि सत्य ही सर्वत्र धर्म नहीं; प्राण-रक्षा, धन-रक्षा और निर्दोष की रक्षा के लिए असत्य भी क्षम्य है। यह सपाट “सदा सच बोलो” का खण्डन है।

सार: धर्म वह है जो प्राणियों को धारण करे, उनकी हिंसा रोके, उनकी उन्नति करे। श्रुति में सब कुछ नहीं समाया; प्राण, विवाह और निर्दोष की रक्षा में असत्य पाप नहीं। छल का सामना छल से, सत्य का सत्कार सत्य से।

समस्त कठिनाइयों को पार करने के उपाय

युधिष्ठिर ने कहा, “हे पितामह, प्राणी नाना प्रकार के कष्टों से प्रायः निरन्तर पीड़ित दिखते हैं। बताइए, मनुष्य उन सब कठिनाइयों को किस प्रकार पार करे।”

भीष्म ने कहा, “द्विज वर्ग के जो लोग संयत-चित्त होकर अपने-अपने आश्रम के लिए शास्त्रों में कहे कर्तव्यों का विधिपूर्वक पालन करते हैं, वे सब कठिनाइयों को पार कर जाते हैं। जो कभी छल नहीं करते, जिनका आचरण हितकर मर्यादाओं से बँधा है, जो सब सांसारिक कामनाओं पर नियन्त्रण रखते हैं, वे पार हो जाते हैं। जो बुरी भाषा सुनकर भी उत्तर नहीं देते, जो स्वयं पीड़ित होकर भी दूसरों को नहीं सताते, जो देते हैं पर लेते नहीं, वे पार हो जाते हैं। जो अतिथियों को सदा शरण देते हैं, जो द्वेष नहीं रखते, जो निरन्तर वेद-अध्ययन में लगे रहते हैं, वे पार हो जाते हैं। जो माता-पिता के प्रति उचित आचरण रखते हैं, जो दिन में सोने से बचते हैं, वे पार हो जाते हैं। जो मन, वचन और कर्म से किसी प्रकार का पाप नहीं करते, किसी प्राणी को क्षति नहीं पहुँचाते, वे पार हो जाते हैं।

“जो राजा राग और लोभ के वश में आकर भारी कर नहीं लगाते और अपने राज्य की रक्षा करते हैं, वे पार हो जाते हैं। जो ऋतु-काल में अपनी विवाहिता पत्नियों के पास जाते हैं और पर-स्त्री का संग नहीं चाहते, जो ईमानदार हैं और अग्निहोत्र में सावधान हैं, वे पार हो जाते हैं। जो साहसी हैं और मृत्यु का भय त्यागकर, उचित उपायों से विजय चाहते हुए युद्ध में जुटते हैं, वे पार हो जाते हैं। जो प्राण संकट में होने पर भी सदा सत्य बोलते हैं और सब प्राणियों के लिए अनुकरणीय आदर्श हैं, वे पार हो जाते हैं। जिनके कर्म कभी छलते नहीं, जिनके वचन सदा प्रिय हैं, जिनका धन सदा सुपात्र में व्यय होता है, वे पार हो जाते हैं। जो ब्राह्मण अनध्याय (अध्ययन-निषिद्ध) समय में वेद नहीं पढ़ते और श्रद्धा से तप करते हैं, वे पार हो जाते हैं। जो ब्रह्मचर्य का जीवन अपनाते हैं, तप करते हैं और विद्या, वेद-ज्ञान तथा उचित व्रतों से शुद्ध हैं, वे पार हो जाते हैं।

“जिन्होंने रजोगुण और तमोगुण के सब लक्षण रोक लिए हैं, जो उच्च-आत्मा हैं और सत्त्वगुण का अभ्यास करते हैं, वे पार हो जाते हैं। जिनसे कोई प्राणी नहीं डरता और जो स्वयं किसी प्राणी से नहीं डरते, जो सब प्राणियों को अपने ही समान देखते हैं, वे पार हो जाते हैं। जो श्रेष्ठ पुरुष दूसरों की समृद्धि देखकर कभी दुःखी नहीं होते और हर नीच आचरण से दूर रहते हैं, वे पार हो जाते हैं। जो सब देवताओं को नमस्कार करते हैं, सब मतों के सिद्धान्त सुनते हैं, जिनमें श्रद्धा है और जिनकी आत्मा शान्त है, वे पार हो जाते हैं। जो अपने लिए सम्मान नहीं चाहते, दूसरों को सम्मान देते हैं और पूज्यों के सामने झुकते हैं, वे पार हो जाते हैं। जो उचित तिथियों पर शुद्ध मन से, सन्तान की कामना से श्राद्ध करते हैं, वे पार हो जाते हैं। जो अपना क्रोध रोकते हैं, दूसरों का क्रोध शान्त करते हैं और किसी प्राणी पर कुपित नहीं होते, वे पार हो जाते हैं। जो जन्म से ही मधु, मांस और मादक पेय से दूर रहते हैं, वे पार हो जाते हैं। जो केवल प्राण-धारण के लिए खाते हैं, केवल सन्तान के लिए स्त्री-संग करते हैं और केवल सत्य कहने के लिए होंठ खोलते हैं, वे पार हो जाते हैं।

“जो उन भगवान् नारायण की भक्ति से उपासना करते हैं, जो सब प्राणियों के परम स्वामी, जगत् के उद्भव और प्रलय हैं, वे पार हो जाते हैं। यही कृष्ण, कमल-से लाल नेत्रोंवाले, पीताम्बरधारी, महाबाहु, जो हमारे हितैषी, भाई, मित्र और सम्बन्धी हैं, वही अविनाशी कीर्तिवाले नारायण हैं। वे अपनी इच्छा से सब लोकों को चर्म के समान ढक लेते हैं। वे अचिन्त्य आत्मावाले पुण्य प्रभु हैं, गोविन्द हैं, सब प्राणियों में अग्रणी। यही कृष्ण, जो सदा जिष्णु (अर्जुन) का और आपका, हे राजन्, प्रिय और हित करते हैं, वही उन सब प्राणियों में परम, अप्रतिरोध्य, नित्य-आनन्द के धाम हैं। जो भक्ति से इन नारायण की, जिन्हें हरि भी कहते हैं, शरण लेते हैं, वे सब कठिनाइयों को पार कर जाते हैं। जो इन कठिनाई-तरण के श्लोकों को पढ़ते हैं, दूसरों को सुनाते हैं और ब्राह्मणों से इनकी चर्चा करते हैं, वे भी पार हो जाते हैं। हे निष्पाप, अब हमने आपको वे सब कर्म कह दिए जिनसे मनुष्य इस लोक और परलोक की सब कठिनाइयाँ पार करता है।”

समझने की कुंजी (तीन गुण): सत्त्व (शुभता, प्रकाश), रजस् (राग, चंचलता) और तमस् (अन्धकार, जड़ता) प्रकृति के तीन गुण हैं। भीष्म कहते हैं कि रज और तम के लक्षण रोककर सत्त्व का अभ्यास करनेवाला कठिनाई पार करता है। अन्त में पूरी सूची नारायण-भक्ति में मिल जाती है, और भीष्म स्पष्ट कहते हैं कि उपस्थित कृष्ण ही वे नारायण हैं।

सार: कठिनाइयाँ पार करने का मार्ग है संयम, अहिंसा, सत्य, अतिथि-सत्कार, माता-पिता की सेवा, अल्प-भोग, क्रोध-शमन और अन्ततः नारायण की शरण; और वे नारायण साक्षात् यहीं विराजमान कृष्ण हैं।

बाघ और सियार की कथा: शान्त-आत्मा की पहचान

युधिष्ठिर ने कहा, “यहाँ बहुत-से ऐसे जन हैं जो वस्तुतः शान्त-आत्मा न होकर भी बाहर से शान्त-आत्मा-से दिखते हैं। और कुछ ऐसे भी हैं जो वस्तुतः शान्त-आत्मा हैं, पर अन्यथा दिखते हैं। हे आर्य, हम इन लोगों को कैसे पहचानें?”

भीष्म ने कहा, “इस सम्बन्ध में बाघ और सियार के बीच हुए पुराने संवाद की कथा सुनाई जाती है। सुनिए, हे युधिष्ठिर। पुराने समय में पुरिका नामक एक समृद्ध नगर में पौरिक नामक राजा था। वह प्राणियों में अत्यन्त क्रूर और दूसरों को सताने में प्रसन्न रहता था। आयु पूरी होने पर उसकी अवांछित गति हुई। अपने मानव-जीवन के दुष्कर्मों से कलंकित होकर वह सियार के रूप में जन्मा। पूर्व-समृद्धि स्मरण कर वह शोक से भर गया और दूसरों के लाए मांस को भी छोड़ देता। वह सब प्राणियों पर दयालु, वचन में सत्यनिष्ठ और कठोर व्रतों में दृढ़ हो गया। नियत समय पर वह केवल वृक्षों से गिरे फल खाता। वह सियार एक विशाल श्मशान में रहता और वहीं रहना उसे प्रिय था; वह उसका जन्म-स्थान था, इसलिए वह उसे किसी सुन्दर स्थान के लिए बदलना नहीं चाहता था।

“उसके आचरण की शुद्धता न सह सकनेवाले उसकी जाति के अन्य सियार उसे विनम्र शब्दों में फुसलाने लगे, ‘इस भयानक श्मशान में रहकर भी आप ऐसी शुद्धता से जीना चाहते हैं? आप तो स्वभाव से मुर्दाखोर हैं, फिर यह आपकी बुद्धि की विकृति नहीं तो क्या है? हमारे जैसे बन जाइए। हम सब आपको भोजन देंगे। यह शुद्ध आचरण छोड़कर वही खाइए जो सदा आपका भोजन होना चाहिए।’ यह सुनकर सियार ने मधुर, सयुक्तिक और अहिंसा-भरे वचनों में, पूर्ण ध्यान से उत्तर दिया, ‘मेरा जन्म नीचा है। किन्तु जाति का निर्णय आचरण से होता है। मैं ऐसे आचरण की इच्छा रखता हूँ जिससे मेरी कीर्ति फैले। यद्यपि मेरा निवास यह श्मशान है, फिर भी मेरे आचरण-व्रत सुनिए। अपने कर्मों का कारण मनुष्य का अपना स्व ही है; जिस जीवन-शैली में मनुष्य हो, वह उसके धार्मिक कर्मों का कारण नहीं। यदि कोई किसी विशेष जीवन-शैली में रहकर ब्राह्मण की हत्या करे, तो क्या उसे ब्रह्म-हत्या का पाप न लगेगा? और यदि कोई किसी विशेष शैली के बिना गाय दान दे, तो क्या वह पुण्य फल न देगा? प्रिय की कामना से प्रेरित होकर आप केवल पेट भरने में लगे हैं। मूढ़ता से ग्रस्त आप अन्त के तीन दोष नहीं देखते। मुझे आपका जीवन स्वीकार नहीं, जो यहाँ और परलोक, दोनों में बुरा है, और जिसमें असन्तोष और लोभ से धर्म की निन्दनीय हानि होती है।’

“पराक्रम के लिए प्रसिद्ध एक बाघ ने यह संवाद सुन लिया, और सियार को शुद्ध-आचरण विद्वान् मानकर उसका यथोचित सत्कार किया तथा उसे अपना मन्त्री बनाने की इच्छा प्रकट की।

“बाघ ने कहा, ‘हे धर्मनिष्ठ, मैं जानता हूँ कि आप क्या हैं। आप मेरे साथ शासन के कार्यों में लगिए। जो वस्तु आप चाहें, उसका उपभोग कीजिए, और जो रुचिकर न हो, उसे छोड़ दीजिए। रहा हमारा स्वभाव, हम उग्र प्रकृति के जाने जाते हैं; यह हम आपको पहले ही बताए देते हैं। यदि आप मृदुता से बरतेंगे, तो आपका लाभ होगा।’ पशुओं के उस उदार-आत्मा स्वामी के इन वचनों का सम्मान कर सियार ने सिर थोड़ा झुकाकर विनम्र वचन कहे।

“सियार ने कहा, ‘हे पशुओं के राजा, मेरे विषय में आपके ये वचन आपके योग्य ही हैं। यह भी आपके योग्य है कि आप शुद्ध-आचरण और कर्तव्य तथा लोक-व्यवहार के ज्ञाता मन्त्री खोजें। आप पवित्र मन्त्री के बिना अपनी महत्ता नहीं रख सकते, हे वीर; अथवा ऐसे दुष्ट मन्त्री के साथ जो आपके प्राण लेने की ताक में हो। हे महाभाग, अपने मन्त्रियों में जो आपके प्रति समर्पित हों, नीति के ज्ञाता हों, एक-दूसरे पर निर्भर न हों, आपको विजय दिलाने के इच्छुक हों, लोभ-रहित, छल-रहित, बुद्धिमान् और सदा आपके हित में लगे और महान् मानसिक शक्तिवाले हों, उनको आप अपने गुरुजनों या माता-पिता के समान मानें। किन्तु, हे पशु-राज, मैं अपने वर्तमान स्थान से पूर्ण सन्तुष्ट हूँ; उसे किसी और के लिए बदलना नहीं चाहता। मुझे विलासी भोग या उनसे उपजते सुख की लालसा नहीं। मेरा आचरण आपके पुराने सेवकों से मेल न खाएगा। यदि वे दुष्ट आचरणवाले निकले, तो आपमें और मुझमें फूट डालेंगे। दूसरे पर निर्भरता, चाहे वह दूसरा कितना ही तेजस्वी क्यों न हो, वांछनीय या प्रशंसनीय नहीं।

“‘मैं शुद्ध-आत्मा हूँ, महाभाग हूँ। मैं पापियों पर भी कठोरता दिखाने में असमर्थ हूँ। मैं बड़ी दूरदर्शिता रखता हूँ, बड़े प्रयत्न की क्षमता रखता हूँ। मैं छोटी बातों पर ध्यान नहीं देता, बड़े बल से युक्त हूँ, कर्मों में सफल हूँ, कभी निष्फल नहीं होता। मैं हर भोग-वस्तु से सम्पन्न हूँ, थोड़े से कभी सन्तुष्ट नहीं। मैंने कभी किसी की सेवा नहीं की, और सेवा में अकुशल भी हूँ। मैं वन में अपनी इच्छा से जीता हूँ। राजाओं के पास रहनेवालों को अपने विरुद्ध कुवचनों के कारण बड़ा कष्ट सहना पड़ता है। जो वन में रहते हैं, वे निर्भय और निश्चिन्त, व्रतों का पालन करते हुए दिन बिताते हैं। राजा से बुलाए जाने पर हृदय में जो भय जागता है, वह फल-मूल पर सन्तोषपूर्वक जीनेवाले वनवासियों को नहीं होता। बिना प्रयत्न मिला सादा अन्न-जल, और भय के साथ पाया विलासी भोजन, दोनों में बड़ा अन्तर है। इन दोनों पर विचार कर मेरा मत यही है कि सुख वहीं है जहाँ चिन्ता नहीं। राजाओं की सेवा करनेवालों में थोड़े ही अपने अपराध के लिए न्यायपूर्वक दण्डित होते हैं; बहुत-से तो झूठे अभियोगों में मृत्यु पाते हैं।

“‘फिर भी, हे पशु-राज, यदि आप मुझे मन्त्री बनाते ही हैं, तो मैं आपके साथ अपने प्रति आपके आचरण की एक प्रतिज्ञा करना चाहता हूँ। आपके हित के लिए मैं जो वचन कहूँ, उन्हें आप सुनें और मानें। मेरे लिए जो व्यवस्था आप करेंगे, उसमें आप हस्तक्षेप न करें। मैं आपके अन्य मन्त्रियों से कभी परामर्श न करूँगा; यदि करूँ तो वे, श्रेष्ठता के इच्छुक होकर, मुझ पर नाना दोष लगाएँगे। आपसे एकान्त में अकेला मिलकर ही मैं आपका हित कहूँगा। आपके कुटुम्बियों से जुड़े विषयों में आप मुझसे न पूछें कि क्या हित है और क्या अहित। मुझसे परामर्श करके आप अपने अन्य मन्त्रियों को बाद में दण्ड न दें; और क्रोध में आकर मेरे अनुयायियों और आश्रितों को दण्ड न दें।’ सियार के इन वचनों पर पशु-राज ने कहा, ‘ऐसा ही हो,’ और उसका हर प्रकार सत्कार किया। तब सियार ने बाघ का मन्त्री-पद स्वीकार कर लिया।

समझने की कुंजी (मन्त्री की प्रतिज्ञा): सियार जो शर्तें रखता है, वे ही प्राचीन राजनीति का मन्त्रि-धर्म हैं: गोपनीय एकान्त-परामर्श, अन्य मन्त्रियों से असंलग्नता, और राजा द्वारा बिना कारण अविश्वास न करने का वचन। यह आगे की पूरी कथा की धुरी बनती है।

“सियार को सम्मानित और हर कार्य में आदृत देख राजा के पुराने सेवक एक होकर निरन्तर उससे द्वेष दिखाने लगे। उन दुष्टों ने पहले मित्र-भाव से उसे रिझाने और दरबार के नाना भ्रष्टाचार सहन कराने का यत्न किया। दूसरों की सम्पत्ति लूटनेवाले वे अब, सियार के शासन में, किसी का कुछ हड़प न पाते थे। उन्नति और समृद्धि के इच्छुक वे मीठी बातों से उसे लुभाने लगे; उसका मन मोहने के लिए बड़ी-बड़ी रिश्वतें तक दी गईं। महाबुद्धिमान् सियार उन प्रलोभनों में नहीं झुका। तब उनमें से कुछ ने आपस में मिलकर उसके विनाश की सन्धि की, और पशु-राज के लिए रखा, उसका अति-प्रिय भोजन, सुसज्जित मांस चुराकर चुपके से सियार के घर रख दिया। सियार जानता था कि मांस किसने चुराया और किसने षड्यन्त्र रचा। पर सब जानते हुए भी, एक विशेष प्रयोजन से, उसने सह लिया। मन्त्री-पद स्वीकार करते समय उसने राजा से यह वचन ले रखा था, ‘आप मेरी मित्रता चाहते हैं, किन्तु हे राजन्, आप मुझ पर बिना कारण अविश्वास न करेंगे।’

“भीष्म ने कहा, जब पशु-राज भूख से व्याकुल भोजन करने आया, तो उसके भोजन के लिए जो मांस रखा जाना था, वह उसे न मिला। राजा ने आदेश दिया, ‘चोर का पता लगाओ।’ उसके कपटी मन्त्रियों ने कहा कि उसके लिए रखा मांस उसके विद्वान् मन्त्री सियार ने, जो अपनी बुद्धि पर इतना घमण्ड करता है, चुरा लिया है। सियार के इस अविवेकी कर्म की बात सुनकर बाघ क्रोध से भर गया, और रोष में आकर मन्त्री को मारने का आदेश दे दिया। अवसर पाकर पुराने मन्त्रियों ने कहा, ‘सियार तो हम सब से जीविका छीनने को सदा तैयार रहता है।’ यह कहकर उन्होंने फिर राजा के भोजन-चोरी का दोष दोहराया। और कहा, ‘यही उसका कर्म है! ऐसा क्या है जो वह न कर बैठे? वह वैसा नहीं जैसा आपने सुना था। वह वचन में धर्मात्मा है, पर असली स्वभाव पापमय। वास्तव में दुष्ट, उसने सद्गुण का वेश धर रखा है। अपने स्वार्थ के लिए ही उसने आहार और व्रतों में तप किया था। यदि आपको विश्वास न हो, तो हम प्रत्यक्ष प्रमाण देते हैं।’ यह कहकर उन्होंने तुरन्त सियार के घर में घुसकर वह मांस ढुँढ़वा दिया। मांस सियार के घर से लाया गया जान, और अपने पुराने सेवकों की सब बातें सुन, राजा ने आदेश दिया, ‘सियार को मार डाला जाए।’

“बाघ के ये वचन सुनकर उसकी माता उस स्थान पर आई, ताकि पुत्र की सद्बुद्धि हितकारी सलाह से जगाए। आदरणीया माता ने कहा, ‘हे पुत्र, इस छल-भरे अभियोग को मत स्वीकार कीजिए। दुष्ट जन ईर्ष्या और प्रतिद्वन्द्विता से प्रेरित होकर ईमानदार पर भी दोष लगाते हैं। झगड़े के इच्छुक शत्रु किसी शत्रु की उन्नति, जो उसके उच्च कर्मों से आई हो, नहीं सह सकते। तप में लगे शुद्ध-आत्मा पर भी दोष मढ़े जाते हैं। वन में अपने निर्दोष कर्मों में लगे तपस्वी के प्रति भी तीन दल खड़े होते हैं: मित्र, तटस्थ और शत्रु। लोभी शुद्धों से बैर रखते हैं, आलसी कर्मठों से, मूर्ख विद्वानों से, निर्धन धनिकों से, अधर्मी धर्मात्माओं से, कुरूप सुन्दरों से। विद्वान्, मूर्ख, लोभी और कपटी, ये बहुत-से निर्दोष पर भी झूठा दोष मढ़ देंगे, चाहे वह निर्दोष बृहस्पति-सा गुणी और बुद्धिमान् ही क्यों न हो।

“‘यदि सचमुच आपकी अनुपस्थिति में आपके घर से मांस चुराया गया, तो स्मरण रहे, सियार तो दिया हुआ मांस भी लेने से मना करता है। इस तथ्य पर भली-भाँति विचार किया जाए (चोर ढूँढने में)। दुष्ट कभी सज्जन का स्वाँग रचते हैं और सज्जन कभी दुष्ट-से दिखते हैं। प्राणियों में नाना रूप दिखते हैं; अतः परीक्षा आवश्यक है कि कौन क्या है। आकाश किसी पात्र के ठोस तल-सा दिखता है, जुगनू अग्नि की वास्तविक चिनगारी-सा। पर आकाश का कोई तल नहीं, और जुगनू में आग नहीं। देखिए, जो आँखों के सामने हैं, उनकी भी जाँच आवश्यक है। जो जाँच के बाद हर बात निश्चित करता है, उसे बाद में पछताना नहीं पड़ता। स्वामी के लिए सेवक को मार डालना कठिन नहीं, हे पुत्र; किन्तु शक्तिमानों में क्षमा सदा प्रशंसनीय और कीर्ति देनेवाली है। आपने सियार को अपना प्रथम मन्त्री बनाया था; इस कर्म से आपने पड़ोसी राजाओं में बड़ी कीर्ति पाई। अच्छा मन्त्री सरलता से नहीं मिलता। सियार आपका हितैषी है; अतः उसे सँभालिए। जो राजा शत्रुओं द्वारा झूठा दोषी ठहराए गए सचमुच निर्दोष व्यक्ति को अपराधी मान लेता है, वह उन दुष्ट मन्त्रियों के कारण, जो उसे इस मत पर ले जाते हैं, शीघ्र विनाश पाता है।’

“बाघ की माता के यह कहने के बाद, सियार का एक धर्मनिष्ठ आदमी उसके शत्रुओं की उस पंक्ति से निकलकर सामने आया और बता दिया कि वह झूठा अभियोग किस प्रकार रचा गया। सियार की निर्दोषता प्रकट हुई; वह दोष-मुक्त हुआ और स्वामी से सम्मानित हुआ। पशु-राज ने उसे बार-बार स्नेह से गले लगाया। किन्तु नीति-शास्त्र के ज्ञाता सियार ने, शोक से जलते हुए, पशु-राज को प्रणाम कर ‘प्राय’ व्रत (आमरण-अनशन) द्वारा अपने प्राण त्यागने की अनुमति माँगी। स्नेह से फैले नेत्रोंवाले बाघ ने उस सद्गुणी सियार पर श्रद्धापूर्ण सत्कार बरसाते हुए उसे संकल्प से रोकने का यत्न किया। स्वामी को स्नेह से व्याकुल देख सियार ने उसे प्रणाम किया और आँसुओं से रुँधे कण्ठ से ये वचन कहे, ‘पहले आपने मुझे सम्मानित किया, फिर अपमानित किया। आपका मेरे प्रति आचरण मुझे आपका शत्रु बनानेवाला है। अतः अब मेरा आपके साथ रहना उचित नहीं।

“‘असन्तुष्ट सेवक, जो अपने पदों से हटाए गए हों या जिनका मान घटाया गया हो, जो दरिद्रता में पड़े हों या शत्रुओं से (स्वामी के क्रोध के द्वारा) नष्ट किए गए हों, जो दुर्बल किए गए हों, जो लोभी या रुष्ट या भयभीत या ठगे गए हों, जिनकी सम्पत्ति जब्त हो गई हो, जो अभिमानी और बड़े कर्मों के इच्छुक हों पर धन कमाने के साधन से वंचित हों, जो किसी अपकार से शोक या रोष में जल रहे हों, वे सदा अपने स्वामियों पर आ पड़नेवाली विपत्तियों की प्रतीक्षा करते हैं; ठगे जाकर वे स्वामी को छोड़ देते हैं और शत्रुओं के हाथ का प्रभावी अस्त्र बन जाते हैं। आपने मुझे अपमानित किया और मेरे स्थान से गिराया; अब आप मुझ पर फिर कैसे विश्वास करेंगे? और मैं आपके साथ कैसे रहूँगा? आपने मुझे योग्य समझकर लिया, परीक्षा कर पद पर बैठाया; फिर अपनी प्रतिज्ञा भंग कर मुझे अपमानित किया। यदि कोई दूसरों के सामने किसी को धर्मात्मा कहे, तो अपनी संगति बनाए रखना चाहे, तो बाद में उसी को दुष्ट न कहे।

“‘इस प्रकार जब आपने मेरी उपेक्षा की, तो अब मैं आपका विश्वास-पात्र नहीं रह सकता। और मेरी ओर से, जब मैं देखूँगा कि आप मुझसे विश्वास हटा रहे हैं, तो मैं भय और चिन्ता से भर उठूँगा। आप शंकालु, मैं भयभीत, तब हमारे शत्रु हमें क्षति पहुँचाने के अवसर ढूँढेंगे। परिणामस्वरूप आपकी प्रजा चिन्तित और असन्तुष्ट होगी। ऐसी स्थिति में बहुत दोष हैं। बुद्धिमान् उस स्थिति को सुखद नहीं मानते जिसमें पहले मान, फिर अपमान हो। जो दो अलग हो गए, उन्हें फिर मिलाना कठिन है, जैसे दो मिले हुओं को अलग करना। बिछुड़कर फिर मिले लोगों का आचरण स्नेहपूर्ण नहीं रहता। ऐसा कोई सेवक नहीं दिखता जो केवल स्वामी के हित की इच्छा से कुछ करता हो; सेवा स्वामी के और अपने, दोनों के हित के भाव से चलती है। सब कर्म स्वार्थ-प्रेरित होते हैं; निःस्वार्थ कर्म या भाव बहुत दुर्लभ हैं। जिन राजाओं के हृदय अस्थिर और अशान्त हैं, वे मनुष्यों का सच्चा ज्ञान नहीं पा सकते। सौ में एक ही ऐसा मिलता है जो समर्थ या निर्भय हो। मनुष्यों की समृद्धि और पतन, दोनों स्वयं आते हैं; समृद्धि, विपत्ति और महत्ता, सब बुद्धि की दुर्बलता से ही उपजते हैं।’

“भीष्म ने कहा, धर्म, अर्थ और काम से युक्त ये सान्त्वना-भरे वचन कहकर और राजा को प्रसन्न कर, सियार वन को चला गया। पशु-राज की विनती न सुनकर, बुद्धिमान् सियार ने ‘प्राय’ में बैठकर अपना शरीर त्याग दिया और (अपने सत्कर्मों के फल से) स्वर्ग को गया।”

एक उप-कथा: राजा पौरिक की पुनर्जन्म-कथा इस आख्यान की नींव है: अत्याचारी राजा अगले जन्म में सियार बनता है, पर पूर्व-स्मृति के साथ सद्गुणी जीवन चुनता है। यह महाभारत का स्थायी सूत्र दिखाता है कि जाति जन्म से नहीं, आचरण से तय होती है (“जन्म नीचा है, पर आचरण जाति का निर्णय करता है”)।

सार: एक बार खोया विश्वास फिर पूरा नहीं जुड़ता। राजा को सेवक पर बिना जाँच दोष नहीं मढ़ना चाहिए; पर अपमानित सेवक, चाहे निर्दोष सिद्ध हो, स्वामी के पास रहना उचित नहीं समझता। शक्तिमान् की क्षमा प्रशंसनीय, किन्तु टूटी प्रतिज्ञा अपूरणीय।

ऊँट की कथा: आलस्य का अनर्थ, और बुद्धि से विजय

युधिष्ठिर ने कहा, “राजा को कौन-से कर्म करने चाहिए, और किन कर्मों से राजा सुखी होता है? हे कर्तव्यज्ञों में श्रेष्ठ, यह मुझे विस्तार से बताइए।”

भीष्म ने कहा, “जो आप जानना चाहते हैं, वह कहूँगा। राजा को उस ऊँट के समान आचरण नहीं करना चाहिए जिसकी कथा हमने सुनी है। सुनिए, हे युधिष्ठिर। कृतयुग में एक विशाल ऊँट था, जिसे अपने पूर्व-जन्म के सब कर्म स्मरण थे। कठोरतम व्रत धारण कर उस ऊँट ने वन में अति-उग्र तप किया। तप के अन्त में पुण्य-स्वरूप ब्रह्मा उससे प्रसन्न हुए और उसे वर देना चाहा।

“ऊँट ने कहा, ‘हे पुण्यपुरुष, आपकी कृपा से मेरी गर्दन इतनी लम्बी हो जाए कि मैं सौ योजन दूर पड़ा भोजन भी ग्रहण कर सकूँ।’ वर-दाता उदार-आत्मा ने कहा, ‘ऐसा ही हो।’ वर पाकर ऊँट अपने वन को लौट आया। उस दिन से वह मूर्ख पशु आलसी हो गया; भाग्य से मोहित होकर उस दिन से चरने ही नहीं निकला। एक दिन वह अपनी सौ-योजन लम्बी गर्दन फैलाकर बिना परिश्रम भोजन चुग रहा था कि भारी आँधी उठी। ऊँट ने अपना सिर और गर्दन का कुछ भाग एक पर्वत-गुफा में रख दिया और आँधी के थमने की प्रतीक्षा करने लगा। तभी मूसलाधार वर्षा होने लगी और सारी पृथ्वी जलमग्न हो गई। वर्षा में भीगा, ठण्ड से काँपता एक सियार अपनी मादा के साथ कठिनाई से उसी गुफा की ओर खिंचा आया और शरण के लिए शीघ्र भीतर घुस गया। मांसाहारी, अति भूखा और थका वह सियार, हे भरतवंशी, ऊँट की गर्दन देखकर जितना खा सकता था, खाने लगा। ऊँट ने जब देखा कि उसकी गर्दन खाई जा रही है, तो दुःख में उसे छोटा करने का यत्न किया; पर ज्यों-ज्यों वह उसे ऊपर-नीचे करता, सियार और उसकी मादा पकड़ न छोड़ते हुए उसे खाते ही गए। थोड़े ही समय में ऊँट प्राण-हीन हो गया। आँधी-वर्षा थमने पर सियार ऊँट को मार-खाकर गुफा से बाहर निकला। इस प्रकार वह मूर्ख ऊँट अपनी मृत्यु को प्राप्त हुआ। देखिए, आलस्य के पीछे कितना बड़ा अनर्थ चला आया।

“आप, आलस्य त्यागकर और इन्द्रियों को संयत कर, संसार में हर कार्य उचित साधनों से कीजिए। मनु ने स्वयं कहा है कि विजय बुद्धि पर निर्भर है। जो कर्म बुद्धि की सहायता से सिद्ध हों, वे श्रेष्ठ माने जाते हैं; जो भुजबल से हों, मध्यम; जो पैरों से हों, निकृष्ट; और जो भार ढोकर हों, अधम। यदि राजा कार्य-संचालन में चतुर हो और इन्द्रियों को रोके, तो उसका राज्य टिकता है। मनु ने कहा है कि महत्त्वाकांक्षी पुरुष बुद्धि की सहायता से ही विजय पाता है। हे युधिष्ठिर, इस संसार में जो उन गूढ़ बुद्धिमान् परामर्शों को सुनते हैं जो सर्वसाधारण को ज्ञात नहीं, जिनके पास सहायक-मित्र हैं, और जो उचित जाँच के बाद कर्म करते हैं, वे अपने सब प्रयोजन सिद्ध कर लेते हैं और समस्त पृथ्वी पर शासन कर सकते हैं। हे इन्द्र-समान पराक्रमी, यह प्राचीन शास्त्रज्ञ मनीषियों का कथन है; मैंने भी शास्त्र की ओर दृष्टि रखकर वही आपसे कहा। अपनी बुद्धि का प्रयोग कर, हे राजन्, आप इस संसार में कर्म कीजिए।”

समझने की कुंजी (योजन और कृतयुग): “योजन” प्राचीन दूरी-माप है, लगभग आठ से दस किलोमीटर; सौ योजन अर्थात् नौ सौ किलोमीटर से अधिक, एक असम्भव-सा वरदान। “कृतयुग” चार युगों में पहला, धर्म का पूर्ण-युग। कथा का मर्म: सुविधा का वरदान भी आलस्य के साथ मृत्यु बन जाता है।

सार: सुविधा का वर भी आलस्य के साथ विनाश लाता है। मनु का वचन: विजय बुद्धि पर टिकी है; बुद्धि से किए कर्म श्रेष्ठ, बाहुबल मध्यम, भार-वहन अधम। संयत और उद्यमी राजा का राज्य टिकता है।

समुद्र और नदियों का संवाद: नरकट की तरह झुकना

युधिष्ठिर ने कहा, “हे भरतश्रेष्ठ, साधनहीन राजा, जिसने इतना अमूल्य राज्य पाया हो, बलवान् शत्रु के प्रति कैसे आचरण करे?”

भीष्म ने कहा, “इस सम्बन्ध में समुद्र और नदियों के बीच हुए पुराने संवाद की कथा कही जाती है। पुराने समय में नित्य समुद्र, नदियों का वह स्वामी, देवशत्रुओं का आश्रय, अपने मन में उठे एक सन्देह को सुलझाने के लिए सब नदियों से पूछता है।

“समुद्र ने कहा, ‘हे नदियो, मैं देखता हूँ कि आप सब अपने पूरे प्रवाह से बड़े-बड़े तनोंवाले वृक्षों को जड़ और शाखाओं समेत उखाड़ लाती हैं। पर कभी एक नरकट तक नहीं लातीं। आपके तटों पर उगते नरकट दुर्बल तनेवाले और बल-हीन हैं। क्या आप उन्हें तुच्छ समझकर बहा लाने से इनकार करती हैं, अथवा वे आपके किसी काम के हैं? मैं जानना चाहता हूँ कि आप सबकी प्रेरणा क्या है। नरकट किसी से क्यों नहीं उखाड़े जाते?’ यह सुनकर गंगा ने नदियों के स्वामी समुद्र को गम्भीर, सयुक्तिक और इसीलिए सबको स्वीकार्य वचनों में उत्तर दिया।

“गंगा ने कहा, ‘वृक्ष एक ही स्थान पर खड़े रहते हैं और अपने स्थान के विषय में अड़े रहते हैं। हमारे प्रवाह का प्रतिरोध करने के इसी स्वभाव के कारण उन्हें अपना उगने का स्थान छोड़ना पड़ता है। नरकट भिन्न रीति से आचरण करते हैं। बढ़ता प्रवाह देखकर नरकट उसके आगे झुक जाता है; दूसरे ऐसा नहीं करते। प्रवाह बीत जाने पर नरकट फिर अपनी पूर्व-मुद्रा में आ जाता है। नरकट काल और अवसर के गुण जानता है। वह विनम्र और आज्ञाकारी है, कड़ा हुए बिना नम्र है। इसी कारण वह जहाँ उगता है, वहीं खड़ा रहता है, हमारे साथ बहना नहीं पड़ता। जो पौधे, वृक्ष और लताएँ पवन और जल के वेग के आगे झुककर फिर उठ खड़े होते हैं, उन्हें कभी (जड़ से उखड़ने की) पराजय नहीं भुगतनी पड़ती।’

“भीष्म ने कहा, जो पुरुष उस शत्रु के बल के आगे नहीं झुकता जो बल में बढ़ा हुआ और बन्दी बनाने या मारने में समर्थ हो, वह शीघ्र विनाश पाता है। जो बुद्धिमान् अपने और शत्रु के बल-दुर्बलता, सामर्थ्य और तेज को भली-भाँति जानकर कर्म करता है, उसे कभी पराजय नहीं भुगतनी पड़ती। अतः बुद्धिमान् पुरुष, जब शत्रु को अपने से अधिक बलवान् देखे, तो नरकट का-सा आचरण करे; यही बुद्धिमत्ता का लक्षण है।”

सार: दृढ़ खड़ा वृक्ष प्रवाह में उखड़ जाता है, झुकनेवाला नरकट बच जाता है। बलवान् शत्रु के आगे, अपने और शत्रु के बल को परखकर, नरकट की भाँति झुक जाना ही बुद्धिमत्ता है, कायरता नहीं।

सभा में कटु वचनों को सहना

युधिष्ठिर ने कहा, “हे भरत, विनम्रता से सुशोभित विद्वान् पुरुष, जब किसी घमण्ड से फूले अज्ञानी द्वारा सभा के बीच कठोर वचनों से आक्रान्त किया जाए, तब कैसे आचरण करे?”

भीष्म ने कहा, “सुनिए, हे पृथ्वीपति, सज्जन-पुरुष को अल्पबुद्धि जनों के अपशब्द कैसे सहने चाहिए। यदि कोई दूसरे के अपशब्द सुनकर क्रोध के वश न हो, तो वह अपमान करनेवाले के सब सत्कर्मों का पुण्य छीन लेता है; और सहनेवाला अपने सब दुष्कर्मों का दोष उस क्रोधी अपमानकर्ता को दे देता है। बुद्धिमान् को ऐसी अपमान-भाषा की उपेक्षा करनी चाहिए जो टिटिभ (टिटहरी) के कर्कश स्वर-सी ही है। जो द्वेष के वश हो जाए, वह व्यर्थ जीता कहा जाता है। मूर्ख प्रायः कहता सुना जाता है, ‘अमुक प्रतिष्ठित व्यक्ति को मैंने अमुक सभा में अमुक वचन कहे,’ और इस दुष्ट कर्म पर डींग भी हाँकता है। वह कहेगा, ‘मेरे अपमान से वह लज्जा से मरा-सा मौन रह गया।’ इस प्रकार निर्लज्ज पुरुष उस कर्म पर इतराता है जिस पर किसी को इतराना न चाहिए। ऐसे नर-अधम की सावधानी से उपेक्षा करनी चाहिए। बुद्धिमान् को ऐसे अल्पबुद्धि के सब कथन सहने चाहिए। गँवार अपनी स्तुति या निन्दा से क्या कर लेगा? वह तो वन में व्यर्थ काँव-काँव करते कौवे-सा है।

“जो केवल वचनों से दूसरों पर दोष लगाते हैं, यदि वे उन दोषों को सिद्ध कर पाते, तब शायद उनके वचनों का कुछ मूल्य होता। पर वास्तव में वे वचन उतने ही प्रभावी हैं जितने मूर्खों के वे शाप जो वे अपने विवादी पर मृत्यु बुलाते हुए देते हैं। ऐसा आचरण और वचन करनेवाला अपनी ही हीनता की घोषणा करता है; वह उस मोर-सा है जो नाचते समय शरीर का वह भाग दिखा देता है जो सदा छिपा रहना चाहिए। शुद्ध-आचरण पुरुष को उस पापाचारी से कभी बात भी न करनी चाहिए जो कुछ भी कहने या करने में संकोच नहीं करता। जो सामने हो तब किसी के गुण कहे और पीठ-पीछे निन्दा करे, वह कुत्ते-सा है; वह स्वर्ग के अपने सब लोक और अपनी विद्या-धर्म के सब फल खो देता है। पीठ-पीछे निन्दा करनेवाला अपने सब हवन और सौ पुरुषों को दिए दान के फल तुरन्त खो देता है। अतः बुद्धिमान् ऐसे पाप-हृदय की उपेक्षा बिना हिचक करे, जैसे कुत्ते का मांस त्यागते हैं।

“जो दुष्ट-आत्मा किसी उच्च-आत्मा के दोष ढिंढोरा पीटता है, वह उसी कर्म से अपना दुष्ट स्वभाव प्रकट करता है, जैसे साँप छेड़े जाने पर फन फैलाता है। जो ऐसे सदा अपने ही व्यवसाय में लगे निन्दक का प्रतिकार करना चाहे, वह राख के ढेर में धँसे मूर्ख गधे-सी कष्टप्रद दशा पाता है। सदा दूसरों की निन्दा में लगे पुरुष से उसी प्रकार बचना चाहिए जैसे उग्र भेड़िये, मद में गरजते हाथी या उग्र कुत्ते से। धिक्कार है उस पापी को जो मूर्खों के मार्ग पर चलकर सब मर्यादा और लज्जा से गिर गया, जो सदा दूसरों का अनिष्ट करने में लगा है और अपनी ही समृद्धि की परवाह नहीं करता। यदि ईमानदार पुरुष ऐसे अधमों से, जब वे उसे अपमानित करना चाहें, वचन-विनिमय करना चाहे, तो उसे यह सलाह दी जाए: ‘आप पीड़ित न होइए।’ उच्च और नीच के बीच वाद-विवाद को शान्त-बुद्धि जन सदा अनुचित मानते हैं। निन्दक, क्रुद्ध होने पर, हथेली से प्रहार कर सकता है, धूल या भूसी फेंक सकता है, या दाँत पीसकर डरा सकता है; यह सब विदित है। जो दुष्ट-आत्माओं की सभाओं में कही निन्दा और अपवाद सहन करता है, अथवा जो इन उपदेशों को बार-बार पढ़ता है, वह वाणी से उपजा कोई कष्ट नहीं भुगतता।”

समझने की कुंजी (पुण्य-पाप का स्थानान्तरण): भीष्म एक सूक्ष्म नैतिक नियम कहते हैं: जो अपमान सहकर क्रोध नहीं करता, वह अपमानकर्ता का पुण्य पा जाता है और अपना दोष उसे दे देता है। यही “टिटिभ के स्वर-सी उपेक्षा” का आधार है: मौन-क्षमा निष्क्रियता नहीं, सूक्ष्म-धर्म का सक्रिय लाभ है।

सार: कटु वचन सुनकर क्रोध न करनेवाला निन्दक का पुण्य छीन लेता है। गँवार की निन्दा-स्तुति कौवे की काँव-काँव-सी निरर्थक। निन्दक की उपेक्षा कीजिए, उच्च-नीच का वाद-विवाद टालिए; सहनशील को वाणी का कोई घाव नहीं लगता।

राज्य को सुखी कैसे रखें: सेवक, कोष और न्याय

युधिष्ठिर ने कहा, “हे महाबुद्धि पितामह, एक बड़ा सन्देह मुझे सताता है। आपने दुष्ट-आत्माओं के निन्दा-वचनों पर उपदेश दिया; अब मैं और पूछना चाहता हूँ। जो राज्य के लिए हितकर हो, राजवंश के सुख का कारण हो, भविष्य और वर्तमान में कल्याण और उन्नति दे, अन्न-जल और शरीर के लिए भी अच्छा हो, उन विषयों पर आप उपदेश दें। सिंहासन पर बैठा राजा, मित्रों, मन्त्रियों और सेवकों से घिरा हुआ, अपनी प्रजा को कैसे प्रसन्न करे? जो राजा अपने राग-रुचियों के वश दुष्ट संगियों में लिप्त हो और इन्द्रियों के दास होकर पापियों की चापलूसी करे, उसके सब कुलीन सेवक उससे विमुख हो जाते हैं; और ऐसा राजा उन प्रयोजनों को सिद्ध नहीं कर पाता जिनकी सिद्धि अनेक अच्छे सेवकों पर निर्भर है। यदि राजा अकेला, सेवकों के बिना, शासन करना चाहे, तो वह कभी प्रजा की रक्षा नहीं कर सकता। फिर भी सब उच्चकुल के लोग राज-पद की लालसा रखते हैं।”

भीष्म ने कहा, “हे भरत, राजा अकेला अपने राज्य का शासन नहीं कर सकता। सहायक सेवकों के बिना वह कोई प्रयोजन सिद्ध नहीं कर सकता; और सिद्ध कर भी ले, तो अकेला उसे रख नहीं सकता। जिस राजा के सेवक ज्ञान और बुद्धि से सम्पन्न, स्वामी के हित में समर्पित, कुलीन और शान्त-स्वभाव हों, वही राज-सुख भोगता है। जिसके मन्त्री सुकुल के हों, रिश्वत आदि से न डिगाए जा सकें, सदा उसके साथ रहें, परामर्श देने में लगे रहें, बुद्धिमान् और सद्गुणी हों, वस्तुओं के सम्बन्ध जानें, भावी घटनाओं की व्यवस्था कर सकें, काल के गुण जानें और बीते पर शोक न करें, वही राज-सुख भोगता है। जिसके सेवक उसके शोक-हर्ष में सहभागी हों, सदा उसका प्रिय करें, स्वामी के प्रयोजन की सिद्धि में ध्यान लगाएँ और सब निष्ठावान् हों, वही राज-सुख भोगता है। जिसकी प्रजा सदा प्रसन्न, उच्च-मन और धर्म-मार्ग पर हो, वही राज-सुख भोगता है।

“वही राजा श्रेष्ठ है जिसकी आय के सब स्रोत सन्तुष्ट, विश्वसनीय और वित्त-वृद्धि के साधन जाननेवाले पुरुषों द्वारा देखे-सँभाले जाएँ। वही राजा समृद्धि और पुण्य पाता है जिसके कोष और भण्डार अभ्रष्ट, विश्वसनीय, समर्पित और लोभ-रहित सेवकों के अधीन हों, जो सदा संचय में लगे रहें। जिस राजा की नगरी में न्याय का ठीक-ठीक पालन हो, जहाँ झूठा वादी या प्रतिवादी दण्डित हो, और जहाँ शंख तथा लिखित (प्राचीन धर्म-शास्त्रकार) की रीति से दण्ड-विधि चले, वही राज-पुण्य पाता है। जो राजा कृपा से अपनी प्रजा को अपने साथ जोड़ता है, राज-धर्म जानता है और छह गुणों के समुच्चय का ध्यान रखता है, वही राज-पुण्य पाता है।”

समझने की कुंजी (छह गुण और शंख-लिखित): राजनीति में “षाड्गुण्य” अर्थात् सन्धि (मेल), विग्रह (युद्ध), यान (चढ़ाई), आसन (ठहराव), द्वैधीभाव (दुहरी नीति) और आश्रय (शरण), ये छह परराष्ट्र-उपाय हैं। शंख और लिखित भाई-ऋषि थे, जिनकी धर्म-संहिता प्राचीन दण्ड-विधि की प्रमाण मानी जाती थी।

सार: राजा अकेला नहीं चल सकता। कुलीन, निष्ठावान्, लोभ-रहित मन्त्री; कोष और भण्डार की ईमानदार रक्षा; शंख-लिखित-सा निष्पक्ष न्याय; और कृपा से प्रजा को जोड़ना, यही राज-सुख का मूल है।

कुत्ते की कथा: योग्यता से बढ़कर पद का अनर्थ

A hermit's dog, magically transformed up the ladder of beasts into a mighty tiger by a forest ascetic, now baring fangs at its own benefactor outside the hut.

भीष्म ने कहा, “इस सम्बन्ध में एक प्राचीन कथा कही जाती है, जिसे साधु और बुद्धिमान् जन ऊँचा दृष्टान्त मानते हैं। मैंने इसे जमदग्नि-पुत्र राम के आश्रम में अनेक श्रेष्ठ ऋषियों के मुख से सुना था। एक विशाल, मनुष्य-रहित वन में एक तपस्वी फल-मूल पर जीता, कठोर व्रत और संयत इन्द्रियोंवाला रहता था। शान्त और शुद्ध-आत्मा, सदा वेद-पाठ में लीन, उपवासों से शुद्ध-हृदय, वह सब प्राणियों के प्रति सद्भाव-पूर्ण जीवन जीता था। उसके सद्भाव को जानकर वन के सब प्राणी स्नेह से उसके पास आते। उग्र सिंह और बाघ, विशाल मदोन्मत्त हाथी, चीते, गैंडे, भालू, और रक्त पर जीनेवाले अन्य भयानक पशु ऋषि के पास आकर शिष्ट कुशल-प्रश्न करते, शिष्यों और दासों-से व्यवहार करते, फिर अपने स्थानों को लौट जाते।

“किन्तु एक पालतू पशु वहाँ स्थायी रूप से रहता, मुनि को कभी न छोड़ता। वह उपवासों से दुर्बल और क्षीण एक कुत्ता था, फल-मूल और जल पर जीता, शान्त और निरुपद्रव। उच्च-आत्मा ऋषि के चरणों में पड़ा वह कुत्ता, मानव-से हृदयवाला, उस स्नेह के कारण ऋषि से अत्यन्त संलग्न हो गया था। एक दिन रक्त पर जीनेवाला एक बलवान् चीता वहाँ आया, क्रूर और शिकार की आशा से प्रसन्न, दूसरे यम-सा। जीभ से मुख के कोने चाटता, पूँछ फटकारता, भूखा-प्यासा, फैले जबड़ोंवाला वह चीता कुत्ते को शिकार बनाने आया। वह भयानक पशु आता देख, हे राजन्, प्राण-भय से कुत्ते ने मुनि से कहा, ‘हे पुण्यपुरुष, यह चीता कुत्तों का शत्रु है, मुझे मारना चाहता है। हे महर्षि, आप ऐसा कीजिए जिससे इस पशु से मेरा सब भय आपकी कृपा से दूर हो। आप निस्सन्देह सर्वज्ञ हैं।’ सब प्राणियों के विचार जाननेवाले ऋषि ने अनुभव किया कि कुत्ते का भय सकारण है।

“ऋषि ने कहा, ‘अब आपको चीतों से मृत्यु का भय न रहेगा। आपका यह स्वरूप लोप हो और आप चीता बन जाइए, हे पुत्र!’ इन शब्दों से कुत्ता स्वर्ण-सी कान्तिवाला चीता बन गया, शरीर पर धारियाँ और बड़े दाँतों के साथ; अब वह उस वन में निर्भय विचरने लगा। चीते ने अपनी ही जाति का पशु देख उसके प्रति शत्रुता त्याग दी। कुछ काल बाद एक भूखा बाघ, फैले मुख से, रक्त-पान का इच्छुक, चीता-बने पशु की ओर बढ़ा। भयभीत होकर उसने ऋषि की शरण ली; ऋषि ने, उसके सहवास के स्नेह से, उसे सब शत्रुओं के लिए प्रबल बाघ बना दिया। बाघ अपनी जाति का प्राणी देख उसे क्षति न पहुँचाता। कालान्तर में कुत्ता प्रबल बाघ बनकर मांस-रक्त पर जीने लगा और अपना पुराना फल-मूल का आहार छोड़ बैठा।

“एक दिन आश्रम के आँगन में पड़े उस बाघ के पास एक मदोन्मत्त हाथी आया, उठते बादल-सा। फटे कपोलों, कमल-चिह्नित देह, चौड़े कुम्भ-स्थलों, लम्बे दाँतों और मेघ-गम्भीर स्वरवाले उस हाथी को देख बाघ भयभीत होकर ऋषि की शरण गया; ऋषि ने उसे हाथी बना दिया। असली हाथी अपनी ही जाति का विशाल प्राणी देख डर गया। ऋषि का हाथी कमल-पराग से रँगा, कमल-भरे सरोवरों में आनन्द से गोता लगाता विचरने लगा। बहुत काल बीता। एक दिन आश्रम के पास विचरते हाथी के सामने पर्वत-गुफा में जन्मा, हाथियों का वध करनेवाला एक केसरी सिंह आया। भय से काँपता हाथी ऋषि की शरण गया; ऋषि ने उसे सिंह बना दिया। जंगली सिंह अपने से प्रबल सजातीय देख डर गया। ऋषि का सिंह आश्रम में रहने लगा, और उसके भय से अन्य प्राणियों ने आश्रम के पास आना छोड़ दिया।

“कुछ काल बाद एक शरभ वहाँ आया, सब प्राणियों का वधकर्ता, अति बलवान्, सबको भय देनेवाला, आठ पैरों और मस्तक पर नेत्रोंवाला; वह ऋषि के सिंह को मारने ही आया था। यह देख ऋषि ने अपने सिंह को महाबली शरभ बना दिया। जंगली शरभ, ऋषि के शरभ को अधिक उग्र और प्रबल देख, उस वन से शीघ्र भाग गया। शरभ बना वह पशु अपने रूपान्तरकर्ता के पास सुख से रहने लगा। उसके भय से आसपास के सब प्राणी वन छोड़ भागे। प्रसन्न होकर शरभ नित्य प्राणियों का वध कर भोजन करता; मांसाहारी होकर उसने फल-मूल छोड़ दिया। एक दिन वह कृतघ्न पशु, जो पहले कुत्ता था और अब शरभ बन चुका था, रक्त की तीव्र लालसा में ऋषि को ही मारना चाहने लगा। तपोबल से ऋषि ने यह सब अपने आध्यात्मिक ज्ञान से जान लिया, और पशु के अभिप्राय को निश्चित कर उससे कहा।

“ऋषि ने कहा, ‘हे कुत्ते, पहले आप चीता बने, फिर बाघ, फिर मद-झरते कपोलोंवाला हाथी, फिर सिंह, फिर सिंह से शरभ। आप पर स्नेह से मैंने ही आपको ये नाना रूप दिए। जन्म से आप इनमें से किसी जाति के नहीं थे। पर, हे पापी, जब आप मुझ निरपराध को ही मारना चाहते हैं, तो आप अपनी ही जाति में लौटिए और फिर कुत्ता बन जाइए।’ इसके बाद वह नीच, मूर्ख और दुष्ट-आत्मा पशु, ऋषि के शाप से, फिर से अपना उचित कुत्ते का रूप पा गया।”

समझने की कुंजी (शरभ): शरभ पुराणों का एक कल्पित अष्टपाद प्राणी है, सिंह से भी प्रबल, मस्तक पर अतिरिक्त नेत्रोंवाला। कथा में रूपान्तर की यह सीढ़ी (कुत्ता → चीता → बाघ → हाथी → सिंह → शरभ) राजनीति का रूपक है: नीच को जब उसकी पात्रता से ऊँचा पद मिले, तो वह अन्ततः उसी हाथ को काटता है जिसने उसे उठाया।

“भीष्म ने कहा, अपना उचित रूप पाकर कुत्ता बहुत उदास हुआ। ऋषि ने उसे फटकारकर उस पापी को अपने आश्रम से निकाल दिया। बुद्धिमान् राजा इस दृष्टान्त से शिक्षा ले, और प्रत्येक सेवक को उसी कार्य पर नियुक्त करे जिसके योग्य वह हो, उन पर समुचित निगरानी रखे, और पहले उनकी सत्यनिष्ठा, शुद्धता, निष्कपटता, स्वभाव, शास्त्र-ज्ञान, आचरण, कुल, संयम, करुणा, बल, तेज, गरिमा और क्षमा की परीक्षा कर ले। राजा बिना परीक्षा के मन्त्री न रखे। यदि राजा नीच-कुल के लोग एकत्र करे, तो कभी सुखी नहीं हो सकता। उच्चकुल का पुरुष, बिना दोष सताए जाने पर भी, अपने रक्त की प्रतिष्ठा के कारण स्वामी का अनिष्ट नहीं चाहता; पर नीच और निम्नकुल का व्यक्ति, किसी सज्जन की संगति से बड़ी सम्पत्ति पाकर भी, यदि वचनों से भर्त्सना पा जाए, तो उसी का शत्रु बन जाता है।

“मन्त्री उच्चकुल और बलवान्, क्षमाशील, संयमी, इन्द्रिय-जयी हो; लोभ-दोष से मुक्त, अपने उचित अर्जन में सन्तुष्ट, स्वामी और मित्रों की समृद्धि से प्रसन्न, देश-काल के अनुकूल; सदा शुभ-कर्मों से मनुष्यों को जोड़ने में लगा, कर्तव्य में सावधान, स्वामी-हितैषी, युद्ध और सन्धि की कला में निपुण, सेना को उत्साह देने में समर्थ, संकेत-संकेत पढ़नेवाला, कूच की सब आवश्यकताओं का ज्ञाता, गज-शिक्षण में कुशल, घमण्ड-रहित, आत्म-विश्वासी, कार्य-दक्ष, सदा उचित करनेवाला, धर्मनिष्ठ मित्रोंवाला, मधुरभाषी, सुन्दर रूपवाला, मनुष्यों का नेतृत्व करने योग्य, नीतिज्ञ, गुणवान्, उद्यमी, सक्रिय, चतुर, मधुर-स्वभाव, विनम्र-वचन, धीर, वीर, धनी और देश-काल के अनुसार उपाय ढालने में समर्थ हो। ऐसा मन्त्री पानेवाला राजा कभी पराजित नहीं होता; उसका राज्य चन्द्रमा की कान्ति-सा पृथ्वी पर धीरे-धीरे फैलता है।

“जो राजा शास्त्रज्ञ हो, धर्म को परम माने, सदा प्रजा-रक्षा में लगा हो, और इन गुणों से युक्त हो, वह सबका प्रेम पाता है: धैर्यवान्, क्षमाशील, शुद्ध-आचरण, अवसर पड़ने पर कठोर, उद्यम का फल जाननेवाला, गुरुजनों के प्रति आदर-शील, शास्त्रज्ञ, योग्य परामर्शदाताओं की सलाह सुनने को तत्पर, परस्पर-विरोधी मार्गों में ठीक निर्णय करने में समर्थ, बुद्धिमान्, तीव्र-स्मृति, न्याय करने को तत्पर, संयमी, सदा मधुरभाषी, शत्रुओं को भी क्षमा करनेवाला, स्वयं दान देनेवाला, श्रद्धावान्, सुन्दर रूपवाला, विपत्ति में पड़े जनों को हाथ देनेवाला, हितैषी मन्त्रियोंवाला, अहंकार-रहित, सदा पत्नी-सहित, और किसी कार्य में हड़बड़ी न करनेवाला। वह अपने मन्त्रियों को उनके किसी विशेष कार्य पर पुरस्कृत करे, समर्पित जनों से प्रेम करे, आलस्य त्यागकर शुभकर्मों से लोगों को अपने साथ जोड़े। उसका मुख सदा प्रसन्न रहे, सेवकों की आवश्यकता पर ध्यान दे, क्रोध न करे, उदार रहे। दण्ड का स्वामी (राजदण्ड) त्यागे बिना, उसे औचित्य से चलाए। सबको धर्म-आचरण में प्रवृत्त करे। गुप्तचरों को अपना नेत्र बनाकर प्रजा के कार्यों की देखरेख करे और धर्म-अर्थ के सब विषयों का ज्ञाता हो। इन सौ गुणों से युक्त राजा सबका प्रेम पाता है; हर शासक को ऐसा होने का यत्न करना चाहिए।

“राजा अच्छे योद्धा भी खोजे, सब आवश्यक गुणोंवाले, जो राज्य-रक्षा में सहायक हों। अपनी उन्नति चाहनेवाला राजा अपनी सेना की कभी उपेक्षा न करे। जिसके सैनिक युद्ध में वीर, कृतज्ञ और शास्त्रज्ञ हों, जिसके पैदल धर्म-कर्तव्य के ग्रन्थों के ज्ञाता हों, गज-योद्धा निर्भय हों, रथी अपनी युद्ध-शैली में कुशल और अस्त्र-संचालन में निपुण हों, वही समस्त पृथ्वी को जीतता है। जो राजा सदा सब मनुष्यों को अपने साथ जोड़ने में लगा हो, उद्यम के लिए तत्पर हो, मित्रों और सहयोगियों से धनी हो, वही शासकों में अग्रणी होता है। हे भरत, जिसने सब मनुष्यों को अपने साथ जोड़ लिया, वह हज़ार साहसी अश्वारोहियों की सहायता से भी समस्त पृथ्वी जीत सकता है।”

सार: कुत्ते के दृष्टान्त की शिक्षा: राजा हर सेवक को परख कर ही नियुक्त करे, और उसकी पात्रता से ऊँचा पद कभी न दे, वरना नीच उठकर उसी को काटता है। मन्त्री और राजा के सौ-सौ गुण गिनाए गए; प्रजा को कृपा से जोड़नेवाला राजा थोड़े बल से भी पृथ्वी जीत लेता है।

योग्यता के अनुसार पद, और सिंह की संगति

भीष्म ने कहा, “जो राजा कुत्ते की कथा की शिक्षा से, हर सेवक को उसके योग्य पद पर नियुक्त करता है, वही राज-सुख भोगता है। कुत्ते को सम्मान देकर उससे ऊँचे स्थान पर न बैठाएँ जिसके वह योग्य नहीं; अपने योग्य से ऊपर बैठाया कुत्ता घमण्ड में उन्मत्त हो जाता है। मन्त्री उन्हीं पदों पर हों जिनके वे योग्य हों, और उनके पास अपने-अपने कार्य के लिए आवश्यक गुण हों। अयोग्य की नियुक्ति कभी सराही नहीं जाती। शरभ शरभ के स्थान पर रहे, सिंह सिंह के बल से फूले, बाघ बाघ के पद पर, चीता चीता के रूप में रखा जाए। यदि सफलता चाहते हैं, तो सेवकों को उनकी पात्रता से ऊँचे स्थान पर कभी न बैठाएँ। जो मूर्ख राजा मर्यादा लाँघकर अयोग्यों को पद देता है, वह प्रजा को प्रसन्न नहीं कर पाता।

“बुद्धिहीन, नीच-मन, विवेक-शून्य, इन्द्रियों के दास और नीच-कुल के लोगों को राजा कभी नियुक्त न करे। ईमानदार, उच्चकुल, वीर, विद्वान्, द्वेष और ईर्ष्या से रहित, उच्च-मन, शुद्ध-आचरण और कार्य-दक्ष पुरुष ही मन्त्री-पद के योग्य हैं। विनम्र, कर्तव्य-तत्पर, शान्त-स्वभाव, शुद्ध-मन, नाना सद्गुणों से सज्जित और जिनके पद को लेकर कोई निन्दा न हो, वे राजा के घनिष्ठ सहचर हों। सिंह सदा सिंह की ही संगति करे; जो सिंह नहीं वह सिंह का संगी बने, तो सिंह के सब लाभ पा जाता है। पर जो सिंह, सिंह के कर्तव्य निभाते हुए, केवल कुत्तों के झुण्ड को संगी बनाए, वह उस संगति से अपने कर्तव्य कभी सिद्ध नहीं कर पाता। इसी प्रकार, हे नर-शासक, राजा यदि वीर, बुद्धिमान्, विद्वान् और उच्चकुल मन्त्री रखे, तो समस्त पृथ्वी जीत सकता है। हे राज-स्वामियों में श्रेष्ठ, विद्या, निष्कपटता, बुद्धि और महान् सम्पत्ति से रहित सेवक राजा कभी न रखे। स्वामी की सेवा में समर्पित जनों को कोई बाधा नहीं रोक पाती। स्वामी का सदा भला करनेवाले सेवकों से राजा सान्त्वना-भरे वचन कहे।

“राजा बड़े यत्न से अपने कोषों की रक्षा करे; राजा की जड़ उसके कोषों में है। राजा सदा अपना कोष बढ़ाने का यत्न करे। हे राजन्, आपके भण्डार अन्न से भरे रहें, और उनकी रक्षा ईमानदार सेवकों को सौंपी जाए। आप धन और अन्न बढ़ाने का यत्न कीजिए। आपके युद्ध-कुशल सेवक सदा अपने कर्तव्य में तत्पर रहें, और अश्व-संचालन में निपुण हों। हे कुरु-आनन्द, अपने कुटुम्बियों और मित्रों की आवश्यकता का ध्यान रखिए, मित्रों और सम्बन्धियों से घिरे रहिए, अपनी नगरी का हित खोजिए। कुत्ते का दृष्टान्त देकर मैंने आपको बताया कि प्रजा के प्रति आपका कर्तव्य कैसा हो। और क्या सुनना चाहते हैं?”

सार: हर पद उसके योग्य को; अयोग्य को ऊँचा बैठाना उसे उन्मत्त करता है। सिंह सिंह की संगति करे, कुत्तों की नहीं। कोष ही राज्य की जड़ है, उसकी और भण्डारों की रक्षा ईमानदार हाथों में हो।

राजा मोर की तरह: स्मरण रखने योग्य राज-धर्म

युधिष्ठिर ने कहा, “हे भरतश्रेष्ठ, आपने प्राचीन राज-धर्मज्ञों के देखे-कहे अनेक राज-कर्तव्य बताए। अब उन्हें ऐसे कहिए कि स्मृति में टिक जाएँ।”

भीष्म ने कहा, “सब प्राणियों की रक्षा क्षत्रिय का परम धर्म है। सुनिए, यह रक्षा-धर्म कैसे निभाया जाए। राज-धर्मज्ञ राजा अनेक रूप धारण करे, जैसे मोर नाना रंग के पंख फैलाता है। तीक्ष्णता, कुटिलता, सत्य और निष्कपटता, ये गुण उसमें हों। पूर्ण निष्पक्षता से, यदि वह सुख चाहे, तो सत्त्व-गुण का आचरण करे। जिस प्रयोजन को साधना हो, उसी के अनुकूल रंग या रूप धारण करे; जो राजा नाना रूप धर सकता है, वह सूक्ष्म-से-सूक्ष्म प्रयोजन भी साध लेता है। शरद् के मोर-सा मौन रहकर अपना मन्त्र छिपाए। थोड़ा बोले, और जो थोड़ा बोले वह मधुर हो। सुन्दर रूपवाला और शास्त्रज्ञ हो। जिन द्वारों से संकट आ सकते हैं, उनके प्रति सदा सावधान रहे, जैसे लोग तालाब के बाँध की दरारों की रक्षा करते हैं ताकि जल खेत-घर न डुबो दे। तप-सिद्ध ब्राह्मणों की शरण ले, जैसे लोग पर्वत-झीलों से उपजी प्रबल नदियों की शरण लेते हैं।

“राजदण्ड सदा उसके हाथ में उठा रहे। प्रजा की आय-व्यय परखकर ही वह सावधानी से कर ले, जैसे लोग पूर्ण-विकसित ताड़ से रस खींचने जाते हैं। अपनी प्रजा से समता का बरताव करे; शत्रुओं की फसलें अश्वारोही-दल की टापों से कुचले; जब अपने पंख (पक्ष) बलवान् हो जाएँ तभी शत्रु पर चढ़े; और अपनी दुर्बलता के सब स्रोत देखता रहे। शत्रुओं के दोष घोषित करे, उनके पक्षधरों को कुचले, और बाहर से धन बटोरे जैसे कोई वन से फूल चुनता है। उन्नत-मस्तक पर्वत-से बलोन्मत्त राजाओं का नाश अज्ञात आड़, घात और अकस्मात् आक्रमण से करे। वर्षा-ऋतु के मोर-सा वह अकेला, अदृश्य, अपने रात्रि-निवास में जाए; और मोर की भाँति अपने अन्तःपुर में अपनी पत्नियों का सान्निध्य भोगे। कवच न उतारे, स्वयं अपनी रक्षा करे, और शत्रुओं के गुप्तचरों के फैलाए जालों से बचे। शत्रुओं के गुप्तचरों को अपने वश में करे, पर अवसर पाते ही उनका उन्मूलन करे। मोर-सी रीति से बलवान्, क्रुद्ध और कुटिल-नीति शत्रुओं को मारे, उनकी शक्ति तोड़े और उन्हें उनके घर से दूर खदेड़े। मोर की भाँति राजा अपना हित करे, और सब ओर से ज्ञान बटोरे जैसे मोर वन से भी कीट चुन लेते हैं।

“बुद्धिमान्, मोर-से राजा को इसी प्रकार राज्य चलाना और हितकर नीति अपनानी चाहिए। अपनी बुद्धि से तय करे कि क्या करना है; दूसरों से परामर्श कर उस निश्चय को छोड़े या दृढ़ करे। शास्त्र से तीक्ष्ण हुई बुद्धि से ही कर्म-मार्ग तय होते हैं; यही शास्त्र की उपयोगिता है। साम-नीति से शत्रुओं के हृदय में विश्वास जगाए, अपना बल दिखाए, और भिन्न मार्गों को मन में तौलकर अपनी बुद्धि से निष्कर्ष पर पहुँचे। राजा को यह आना चाहिए कि क्या करना है और क्या नहीं। गहरी बुद्धिवाले को परामर्श की आवश्यकता ही नहीं रहती। बृहस्पति-सी बुद्धिवाला बुद्धिमान्, यदि निन्दा भी पाए, तो शीघ्र अपनी स्वस्थ-वृत्ति लौटा लेता है, जैसे तपा लोहा जल में डूबकर शान्त हो जाता है।

“राजा अपने योग्य सेवकों को उनके योग्य कार्यों में लगाकर, उन सबके साथ वैसे ही ताल मिलाकर चले जैसे उचित कसाव में बँधे वाद्य के तार अपने-अपने स्वर में बजते हैं। धर्म की मर्यादा लाँघे बिना राजा सबका हित करे। वही राजा पर्वत-सा अटल खड़ा रहता है जिसे हर कोई ‘यह मेरा है’ कहकर मानता है। वादियों के बीच न्याय करते समय राजा, प्रिय-अप्रिय में भेद किए बिना, न्याय की रक्षा करे। राजा हर पद पर उन्हें नियुक्त करे जो विभिन्न कुलों, जन-समूहों और देशों के लक्षण जानते हों; जो मृदुभाषी, मध्यम आयु के, निर्दोष, सत्कर्म में लगे, सदा सावधान, लोभ-रहित, विद्या और संयम से युक्त, धर्म में दृढ़ और धर्म-अर्थ दोनों के हित-रक्षक हों। इस प्रकार कार्यों और उनके अन्तिम लक्ष्यों को जानकर राजा उन्हें सावधानी से सिद्ध करे, और गुप्तचरों से सब बातें जानकर प्रसन्नतापूर्वक जीए।

“जो राजा बिना पर्याप्त कारण क्रोध या हर्ष नहीं करता, अपने सब कर्म स्वयं देखता है, और आय-व्यय अपनी आँखों से जाँचता है, वही पृथ्वी से महान् धन पाता है। वही राजा राज-धर्मज्ञ कहा जाता है जो किसी के सत्कर्म पर सार्वजनिक रूप से पुरस्कार दे, दण्ड-योग्य को दण्ड दे, अपनी और अपने राज्य की हर अनिष्ट से रक्षा करे। सूर्य की भाँति, जो नीचे सब पर किरणें बरसाता है, राजा अपने राज्य को स्वयं देखे और अपनी बुद्धि से सब गुप्तचरों-अधिकारियों की देखरेख करे। राजा उचित समय पर प्रजा से धन ले, और जो करता है उसका ढिंढोरा न पीटे। बुद्धिमान् ग्वाले की तरह जो रोज़ गाय दुहता है, राजा अपने राज्य को नित्य दुहे। मधुमक्खी जैसे फूलों से धीरे-धीरे मधु संचित करती है, वैसे राजा अपने राज्य से धीरे-धीरे धन संचित करे। पर्याप्त भाग पृथक् रखकर शेष धर्म-संचय और इच्छित सुख-प्राप्ति में व्यय करे। धर्मज्ञ-बुद्धिमान् राजा संचित धन को कभी नष्ट नहीं करता।

“राजा किसी धन को उसकी अल्पता से तुच्छ न समझे, किसी शत्रु को उसकी दुर्बलता से उपेक्षित न करे; अपनी बुद्धि से अपने आप को परखे; बुद्धिहीन जनों पर कभी विश्वास न करे। स्थिरता, चतुरता, संयम, बुद्धि, स्वास्थ्य, धैर्य, वीरता और देश-काल का ध्यान, ये आठ गुण धन की वृद्धि करते हैं, चाहे थोड़ा हो या बहुत। घी से पोषित छोटी आग दावानल बन सकती है, एक बीज से हज़ार वृक्ष उपज सकते हैं; अतः राजा अपनी आय-व्यय को बड़ा सुनकर भी छोटे मदों की उपेक्षा न करे। शत्रु चाहे बालक हो, युवक हो या वृद्ध, असावधान को मार डालता है। तुच्छ शत्रु भी बलवान् होकर राजा का उच्छेद कर सकता है; अतः काल का ज्ञाता राजा ही श्रेष्ठ है। शत्रु, बलवान् हो या दुर्बल, द्वेष से प्रेरित होकर राजा की कीर्ति शीघ्र नष्ट कर सकता है, उसके पुण्यार्जन में बाधा डाल सकता है, उसका तेज तक छीन सकता है; अतः संयत-मन राजा शत्रु होने पर कभी असावधान न रहे।

“यदि बुद्धिमान् राजा समृद्धि और विजय चाहता है, तो आय-व्यय, संचय और शासन का सर्वेक्षण कर सन्धि या युद्ध करे; इसी कारण राजा बुद्धिमान् मन्त्री की सहायता ले। प्रचण्ड बुद्धि बलवान् को भी दुर्बल करती है; बुद्धि से बढ़ती शक्ति की रक्षा होती है; बढ़ता शत्रु बुद्धि से दुर्बल किया जाता है; अतः बुद्धि के अनुसार किया हर कर्म प्रशंसनीय है। धैर्यवान् और निर्दोष राजा, चाहे तो थोड़े बल से भी सब कामनाएँ पा लेता है; पर जो राजा स्वार्थी चापलूसों के झुण्ड से घिरना चाहता है, वह तनिक भी लाभ नहीं पाता। इसलिए राजा प्रजा से धन मृदुता से ले। यदि राजा निरन्तर प्रजा का उत्पीड़न करे, तो वह उस बिजली-सा नष्ट होता है जो क्षण-भर चमककर बुझ जाती है।

“विद्या, तप, विपुल धन, सब कुछ उद्यम से अर्जित होता है। प्राणियों में उद्यम बुद्धि से शासित होता है; अतः उद्यम को सर्वोपरि मानना चाहिए। यह मानव-शरीर अनेक तेजस्वी, बुद्धिमान् सत्त्वों, इन्द्र, विष्णु, सरस्वती आदि का निवास है; अतः ज्ञानी कभी शरीर की उपेक्षा न करे। लोभी को निरन्तर दान से वश में किया जाए; लोभी दूसरों का धन हड़पकर कभी तृप्त नहीं होता। धन-हीन हुआ मनुष्य धर्म और सुख, दोनों से वंचित हो जाता है, क्योंकि वे धन से ही प्राप्य हैं। लोभी दूसरों का धन, भोग, पुत्र-पुत्री और सम्पत्ति हड़पना चाहता है; लोभी में हर दोष दिखता है। अतः राजा लोभी को कभी मन्त्री या अधिकारी न बनाए। उचित अभिकर्ता न हो तो राजा शत्रुओं के भाव और कर्म जानने के लिए नीच व्यक्ति को भी भेज सकता है। बुद्धिमान् शासक शत्रुओं के सब यत्न और प्रयोजन विफल करे। जो विश्वासी, उच्चकुल राजा विद्वान्-सद्गुणी ब्राह्मणों से शिक्षा लेता है और मन्त्रियों से रक्षित रहता है, वह अपने सब सामन्तों को वश में रखता है। हे नरश्रेष्ठ, मैंने आपको शास्त्र-कथित सब कर्तव्य संक्षेप में कह दिए; बुद्धि की सहायता से इन्हें ध्यान में रखिए। जो राजा अपने गुरु की आज्ञा मानकर इनका पालन करता है, वह समस्त पृथ्वी पर शासन करता है। जो राजा नीति से उपजते सुख की उपेक्षा कर संयोग पर भरोसा करता है, वह न राज-सुख पाता है, न परलोक का कल्याण।

“सावधान राजा, युद्ध और सन्धि की आवश्यकताओं का ध्यान रखकर, ऐसे शत्रुओं को भी मार सकता है जो धन से प्रतिष्ठित, बुद्धि-आचरण के लिए पूजित, गुणवान्, युद्ध में वीर और उद्यम के लिए तत्पर हों। राजा भिन्न-भिन्न कर्मों और उपायों से प्राप्त साधन खोजे, भाग्य पर निर्भर न रहे। जो निर्दोषों में दोष देखता है, वह समृद्धि-कीर्ति नहीं पाता। जब दो मित्र एक ही कार्य में जुटें, तो बुद्धिमान् उन दोनों में उसी की सराहना करता है जो भारी भाग स्वयं उठाता है। हे कुन्ती-पुत्र, इन राज-कर्तव्यों का पालन कीजिए, मनुष्यों की रक्षा में हृदय लगाइए; तब आप सहज ही धर्म का फल पाएँगे; परलोक के सब सुख-लोक पुण्य पर ही टिके हैं।”

समझने की कुंजी (मोर का रूपक): भीष्म पूरा राज-धर्म एक मोर के बिम्ब में बाँध देते हैं: नाना रंग (अनेक रूप धरना), शरद् का मौन (मन्त्र-गोपन), वर्षा में एकान्त (अन्तःपुर-सुख और गुप्त-गति), और कीट चुगना (हर ओर से ज्ञान बटोरना)। साथ ही धन-संग्रह के दो सूत्र: गाय को नित्य दुहना और मधुमक्खी-सा धीरे-धीरे संचय, अर्थात् प्रजा को निचोड़े बिना क्रमिक कर-संग्रह।

सार: राजा मोर-सा हो: अनेक रूप, गुप्त मन्त्र, मधुर थोड़े वचन, सतर्क द्वार-रक्षा। धन गाय-दूध और मधु-संग्रह की भाँति क्रमशः ले, प्रजा को निचोड़े नहीं। छोटे मद, छोटे शत्रु, छोटे धन की उपेक्षा न करे; उद्यम और बुद्धि सर्वोपरि।

दण्ड कौन है: उसका रूप और उसके अनेक नाम

युधिष्ठिर ने कहा, “हे पितामह, अब आपका राज-धर्म-उपदेश पूरा हुआ। आपके कथन से प्रतीत होता है कि दण्ड (दण्ड-शक्ति, राजदण्ड) उच्च स्थान पर है और सबका स्वामी है, क्योंकि सब कुछ दण्ड पर निर्भर है। महान् तेजवाला, सर्वत्र व्याप्त दण्ड देवताओं, ऋषियों, पितरों, यक्षों, राक्षसों, पिशाचों, साध्यों और इस लोक के पशु-पक्षी सहित सब प्राणियों में अग्रणी जान पड़ता है। आपने कहा कि देव, असुर और मनुष्य सहित समस्त चराचर दण्ड पर ही टिके हैं। अब मैं सचमुच जानना चाहता हूँ कि दण्ड कौन है? वह किस प्रकार का है? उसका रूप, स्वभाव, उपादान, उद्भव, लक्षण और तेज क्या हैं? वह प्राणियों के बीच कैसे इतनी सावधानी से जागता रहता है? कौन है वह जो नित्य जागकर इस जगत् की रक्षा करता है?”

भीष्म ने कहा, “सुनिए, हे कुरु-वंशी, दण्ड कौन है और वह ‘व्यवहार’ भी क्यों कहा जाता है। जिस पर सब कुछ टिका है, वही दण्ड है। दण्ड वह है जिससे धर्म बना रहता है। उसे कभी व्यवहार भी कहते हैं। सावधानी से जागते राजा का धर्म नष्ट न हो, इसी कारण उसे यह नाम मिला। पुराने समय में मनु ने सर्वप्रथम यह सत्य घोषित किया, ‘जो प्रिय और अप्रिय, दोनों प्रकार के प्राणियों की समान-रूप से रक्षा करता है, दण्ड का निष्पक्ष प्रयोग करते हुए, वही धर्म का मूर्त रूप कहा जाता है।’ ये वचन मनु ने पुराने समय में कहे थे; ये ब्रह्मा के उच्च वचन हैं, और सर्वप्रथम कहे जाने से ‘प्रथम वचन’ कहलाए। और चूँकि दण्ड से ही दूसरों के धन के अपहरण रोके जाते हैं, इसी से उसे व्यवहार नाम मिला।

“धर्म, अर्थ और काम, यह त्रिवर्ग सदा सुप्रयुक्त दण्ड पर टिका है। दण्ड महान् देव है। रूप में वह धधकती आग-सा दिखता है, उसका वर्ण नील-कमल की पँखुड़ी-सा गहरा है। चार दाँत, चार भुजाएँ, आठ पैर और अनेक नेत्र; उसके कान बाण-से नुकीले, बाल खड़े, जटाएँ बँधी, दो जीभ, मुख ताम्र-वर्ण, और देह सिंह-चर्म से ढकी। वह अप्रतिरोध्य देव ऐसा भयानक रूप धरता है। तलवार, धनुष, गदा, भाला, त्रिशूल, मुद्गर, बाण, छोटी मोटी सोंटा, फरसा, चक्र, पाश, भारी डण्डा, कृपाण, बरछी, और पृथ्वी पर विद्यमान हर अस्त्र का रूप धरकर दण्ड संसार में विचरता है, अपने शिकार को भेदता, काटता, पीड़ित करता, खण्डित करता, मारता और झपटता हुआ।

“हे युधिष्ठिर, दण्ड के कुछ नाम ये हैं: खड्ग, कृपाण, धर्म, क्रोध, अप्रतिरोध्य, समृद्धि का जनक, विजय, दण्डकर्ता, निवारक, नित्य, शास्त्र, ब्राह्मण, मन्त्र, प्रतिकारी, प्रथम विधि-निर्माता, न्यायाधीश, अक्षय, देव, अमोघ-गति, सदा-गतिमान्, प्रथम-जात, राग-रहित, रुद्र की आत्मा, ज्येष्ठ मनु और महान् उपकारक। दण्ड पवित्र विष्णु है, वही प्रबल नारायण है। और चूँकि वह सदा भयानक रूप धरता है, इसी से महापुरुष कहलाता है। उसकी पत्नी ‘मर्यादा’ (नीति) ब्राह्मण-कन्या, लक्ष्मी, वृति, सरस्वती और जगत्-माता नामों से जानी जाती है। दण्ड के इस प्रकार अनेक रूप हैं: आशीर्वाद और शाप, सुख और दुःख, धर्म और अधर्म, बल और दुर्बलता, सौभाग्य और दुर्भाग्य, पुण्य और पाप, राग और द्वेष, ऋतु और मास, रात्रि-दिन और मुहूर्त, सावधानी और प्रमाद, हर्ष और क्रोध, शान्ति और संयम, भाग्य और उद्यम, मोक्ष और निन्दा, भय और निर्भयता, हिंसा और अहिंसा, तप-यज्ञ-व्रत, विष और पथ्य, आदि-मध्य-अन्त, सब घातक कर्मों का फल, उद्धतता, उन्माद, अहंकार, गर्व, धैर्य, नीति-अनीति, शक्ति-अशक्ति, मान-अपमान, क्षय-स्थिरता, विनम्रता, दान, सु-अवसर और कु-अवसर, असत्य, बुद्धि, सत्य, श्रद्धा-अश्रद्धा, व्यापार, लाभ-हानि, जय-पराजय, उग्रता-मृदुता, मृत्यु, संग्रह-असंग्रह, मेल-अनमेल, करणीय-अकरणीय, द्वेष-सद्भाव, लज्जा-निर्लज्जता, समृद्धि-विपत्ति, तेज, कर्म, विद्या, वाक्-चातुर्य और बुद्धि की तीक्ष्णता, ये सब, हे युधिष्ठिर, इस संसार में दण्ड के ही रूप हैं। अतः दण्ड अत्यन्त बहुरूप है।

“यदि दण्ड न होता, तो सब प्राणी एक-दूसरे को पीस डालते। दण्ड के भय से ही प्राणी एक-दूसरे को नहीं मारते। दण्ड से रक्षित प्रजा अपने शासक की शक्ति बढ़ाती है; इसी से दण्ड सबका परम आश्रय माना जाता है। दण्ड संसार को शीघ्र धर्म-मार्ग पर लाता है। सत्य पर आश्रित धर्म ब्राह्मणों में रहता है; धर्मयुक्त श्रेष्ठ ब्राह्मण वेदों में लीन होते हैं; वेदों से यज्ञ बहते हैं; यज्ञ देवताओं को तृप्त करते हैं; तृप्त देव प्रजा को इन्द्र के समीप ले जाते हैं; इन्द्र प्रजा-हित के लिए वर्षा-रूप अन्न देते हैं, जिसके बिना फसल और वनस्पति विफल हो जाएँ; सब प्राणियों का जीवन अन्न पर निर्भर है। दण्ड (क्षत्रिय-शासक के रूप में) उनके बीच जागता रहता है। इसी प्रयोजन से दण्ड मनुष्यों में क्षत्रिय का रूप धरता है; मनुष्यों की रक्षा करते हुए वह सदा सावधान, अक्षय जागता है।”

समझने की कुंजी (दण्ड और व्यवहार): “दण्ड” का अर्थ राजदण्ड या दण्ड-शक्ति है, जिसे यहाँ एक प्रचण्ड देव-रूप में व्यक्तित किया गया है। “व्यवहार” का दोहरा अर्थ है: न्यायालय का मुकदमा (वादी-प्रतिवादी का विवाद), और लोक-व्यवहार (धर्म-मर्यादा)। भीष्म दण्ड को धर्म, वेद, मन्त्र और अन्ततः विष्णु-नारायण के समान बताते हैं; उसकी पत्नी “मर्यादा” लक्ष्मी और सरस्वती से अभिन्न है।

सार: दण्ड वह शक्ति है जिस पर धर्म, अर्थ और काम टिके हैं। वह बहुरूप देव है, खड्ग से लेकर लज्जा-तक हर द्वन्द्व उसका रूप है। दण्ड के भय से ही प्राणी एक-दूसरे को नहीं मारते; वह क्षत्रिय-रूप धरकर सबकी रक्षा में जागता है।

वसुहोम और मान्धाता: दण्ड का उद्भव और उसकी सौंपी हुई परम्परा

भीष्म ने आगे कहा, “दण्ड के ये आठ नाम और हैं: देव, मनुष्य, प्राण, शक्ति, हृदय, प्रजापति, सर्व-आत्मा और जीव। ईश्वर ने उस राजा को समृद्धि और राजदण्ड, दोनों दिए जो (सैन्य-रूप में) बलवान् हो और पाँच अंगों से युक्त हो। राजा के लिए ये खोजे जाएँ: कुल की श्रेष्ठता, धनी मन्त्री, विद्या, नाना प्रकार के बल (देह-बल, मनोबल आदि), आठ वस्तुओं सहित, और भरे कोष पर आश्रित बल। वे आठ वस्तुएँ हैं: हाथी, घोड़े, रथ, पैदल, नौकाएँ, बेगारी-श्रमिक (जो शिविर के साथ चलें और काम करें), जन-वृद्धि, और पशुधन (भेड़ आदि)। कवच-सज्जित सेना के अंग हैं: रथी, गज-योद्धा, अश्वारोही, पैदल, अधिकारी और शल्य-चिकित्सक। भिखारी, प्रधान न्यायाधीश, ज्योतिषी, शान्ति-कर्म और अथर्व-कर्म के कर्ता, कोष, सहयोगी, अन्न और अन्य आवश्यकताएँ, ये राज्य-रूपी शरीर के अंग हैं, जो सात गुणों और आठ अंगों से बना है। दण्ड (सेना-रूप में) राज्य का एक और प्रबल अंग है, और राज्य का जनक है। ईश्वर ने बड़ी सावधानी से क्षत्रिय के उपयोग के लिए दण्ड भेजा है। यह नित्य जगत् निष्पक्ष दण्ड का ही स्वरूप है। राजाओं के लिए दण्ड से बढ़कर पूज्य कुछ नहीं, जिससे धर्म के मार्ग दिखाए जाते हैं।

“इस सम्बन्ध में एक प्राचीन कथा कही जाती है। अंग देश में वसुहोम नामक महान् तेजस्वी राजा था। वह सदा धर्म-कर्मों में लगा, अपनी पत्नी सहित कठोर तप करता था। वह ‘मुंजपृष्ठ’ नामक स्थान को गया, जो पितरों और देव-ऋषियों में सम्मानित था। वहाँ, हिमवान् के उस शिखर पर, मेरु के स्वर्ण-पर्वतों के निकट, राम (परशुराम) ने एक प्रसिद्ध वट-वृक्ष की छाया में अपनी जटाएँ बाँधी थीं। उसी से, हे राजन्, वह रुद्र का प्रिय-स्थल, कठोर-व्रत ऋषियों द्वारा मुंजपृष्ठ कहलाया। वसुहोम वहाँ रहकर अनेक पुण्य-गुण अर्जित कर, ब्राह्मणों का सम्मान पाकर, पवित्रता में देव-ऋषि-सा माना गया।

“एक दिन शत्रु-संहारक, इन्द्र के मित्र, महात्मा राजा मान्धाता उस पर्वत-आश्रम में वसुहोम के पास आए। वसुहोम ने अतिथि को पैर धोने का जल और यथोचित अर्घ्य दिया, और सात अंगोंवाले उसके राज्य की कुशल पूछी। फिर वसुहोम ने पूछा, ‘हे राजन्, मैं आपके लिए क्या करूँ?’ तब अति प्रसन्न मान्धाता ने सुख से बैठे वसुहोम से कहा।

“मान्धाता ने कहा, ‘आपने बृहस्पति के सब सिद्धान्त पढ़े हैं, उशनस् (शुक्र) के मत भी आप जानते हैं। मैं जानना चाहता हूँ कि दण्ड का उद्भव क्या है? दण्ड से पहले कौन जागता था? उसका अन्त क्या कहा जाता है? दण्ड क्षत्रिय पर कैसे निर्भर हुआ? यह सब मुझे बताइए। मैं शिष्य-भाव से, गुरु-दक्षिणा देने को तत्पर, आपके पास आया हूँ।’

“वसुहोम ने कहा, ‘सुनिए, हे राजन्, जगत् का धारक दण्ड कैसे उत्पन्न हुआ। धर्म की आत्मा-रूप वह नित्य है, और सब प्राणियों के उचित शासन के लिए रचा गया। हमने सुना है कि एक बार, सब लोकों के पितामह दिव्य ब्रह्मा यज्ञ करना चाहते थे, पर अपने समान योग्य पुरोहित न पा सके। इसी से उन्होंने मस्तिष्क में गर्भ धारण किया और अनेक वर्षों तक उसे रोके रखा। हज़ार वर्ष बीतने पर उस महान् देव को छींक आई, और उस क्रिया में गर्भ उनके मस्तक से गिर पड़ा। जो दिव्य प्राणी इस प्रकार ब्रह्मा से जन्मा, उसका नाम क्षुप पड़ा। महान् शक्तिवाला वह प्रजापति बना, और उसी ने पितामह के उस यज्ञ में पुरोहित का कार्य किया। उस यज्ञ के आरम्भ में, पितामह को जो दृश्य रूप धारण करना पड़ा, उसके कारण दण्ड अन्तर्धान हो गया।

“‘दण्ड के लोप होते ही सब प्राणियों में महान् भ्रम फैल गया। करणीय-अकरणीय का भेद न रहा, शुद्ध-अशुद्ध भोजन का भेद मिट गया, पेय-अपेय का विवेक छूट गया। सब प्राणी एक-दूसरे को क्षति पहुँचाने लगे, स्त्री-पुरुष-संग में कोई मर्यादा न रही, सम्पत्ति का सब भाव लुप्त हो गया। सब लूटने और एक-दूसरे से मांस छीनने लगे; बलवान् दुर्बल को मारने लगे; कोई अपने पड़ोसी की तनिक भी परवाह न करता। तब पितामह ने नित्य दिव्य विष्णु की उपासना कर उस वरदाता देव से कहा, “हे केशव, इस समय कृपा कीजिए। आप ऐसा विधान कीजिए जिससे यह भ्रम मिट जाए।” यह सुनकर विशाल शूल-धारी उन देवश्रेष्ठ ने दीर्घ चिन्तन कर अपने ही स्वरूप को दण्ड के रूप में रच डाला। धर्म को पैर बनाकर रचे उस रूप से सरस्वती देवी ने दण्ड-नीति (दण्ड का शास्त्र) रची, जो शीघ्र ही संसार में प्रसिद्ध हुई।

“‘इसके बाद शूल-धारी महान् देव ने फिर चिन्तन कर देवताओं में से कुछ को उनके वर्गों के स्वामी नियुक्त किया। तब उन्होंने सहस्र-नेत्र इन्द्र को देवताओं का स्वामी बनाया, विवस्वान् के पुत्र यम को पितरों का, कुबेर को धन और राक्षसों का, मेरु को पर्वतों का राजा, समुद्र को नदियों का स्वामी, वरुण को जलों और असुरों का अधिपति, मृत्यु को प्राण और सब जीवों का, अग्नि को तेजस्वी पदार्थों का। तीन-नेत्र ईशान, उच्च-आत्मा नित्य महादेव, रुद्रों के स्वामी बनाए गए; वसिष्ठ ब्राह्मणों के, जातवेदा वसुओं के प्रमुख; सूर्य ज्योतिर्मय पिण्डों का, चन्द्रमा नक्षत्रों-तारों का राजा; अंशुमान् सब औषधियों का स्वामी, और बारह भुजाओंवाले कुमार (स्कन्द) सब भूत-गणों के प्रमुख। नाश और वृद्धि, दोनों के बीज धारण करनेवाला काल सब प्राणियों का, और मृत्यु के चार भागों (अस्त्र, रोग, यम और कर्म) तथा शोक-हर्ष का अधिपति बनाया गया। श्रुति घोषित करती है कि शूल-धारी परम देव महादेव, रुद्रों के प्रमुख हैं। दण्ड ब्रह्मा के परवर्ती पुत्र क्षुप को दिया गया, जो सब प्राणियों के स्वामी और धर्मात्माओं में अग्रणी थे।

“‘यज्ञ की समाप्ति पर महादेव ने यथोचित आदर कर दण्ड, धर्म के रक्षक, विष्णु को सौंपा। विष्णु ने उसे अंगिरा को दिया; अंगिरा ने इन्द्र और मरीचि को; मरीचि ने भृगु को; भृगु ने सब ऋषियों को; ऋषियों ने लोकपालों को; लोकपालों ने पुनः क्षुप को; क्षुप ने सूर्य-पुत्र मनु को; और श्राद्ध-देव मनु ने सच्चे धर्म और अर्थ के लिए उसे अपने पुत्रों को दिया। दण्ड विवेक से दिया जाए, धर्म से प्रेरित होकर, मनमानी से नहीं; वह दुष्टों को रोकने के लिए है। जुर्माने और जब्ती भय जगाने के लिए हैं, राजा का कोष भरने के लिए नहीं। शरीर का अंग-भंग या प्राण-दण्ड तुच्छ कारणों से न दिया जाए। नाना उपायों से शारीरिक पीड़ा, पर्वत-शिखर से गिराना, और निर्वासन भी तुच्छ कारणों से न हों।

“‘सूर्य-पुत्र मनु ने जगत् की रक्षा के लिए अपने पुत्रों को दण्ड सौंपा। दण्ड क्रमशः उत्तराधिकारियों के हाथ में सब प्राणियों की रक्षा करता जागता रहा। शिखर पर दिव्य इन्द्र जागते हैं; उनके बाद धधकती ज्वालावाले अग्नि; फिर वरुण; फिर प्रजापति; फिर संयम-रूपी धर्म; फिर ब्रह्मा के पुत्र नित्य विधि; फिर रक्षा-कर्म में लगा तेज; फिर (यज्ञ में आहुत) औषधियाँ; फिर पर्वत; फिर सब रस और उनके गुण; फिर निऋति देवी; फिर ग्रह और ज्योतिर्मय पिण्ड; फिर वेद; फिर अश्व-शिर विष्णु; फिर सर्वशक्तिमान् नित्य पितामह ब्रह्मा; फिर दिव्य महादेव; फिर विश्वेदेव; फिर महान् ऋषि; फिर दिव्य सोम; फिर नित्य देवता; और देवताओं के बाद, जान लीजिए कि ब्राह्मण जागते हैं। ब्राह्मणों के बाद क्षत्रिय धर्मपूर्वक सब प्राणियों की रक्षा करते हैं। चराचर का यह नित्य जगत् क्षत्रियों से जगाया रहता है। प्राणी इस लोक में जगाए रहते हैं, और दण्ड उनके बीच जागता है। पितामह-सी कान्तिवाला दण्ड सब को साथ बाँधे, धारण किए रहता है। हे भरत, काल आदि-मध्य-अन्त, सदा जागता है। सब लोकों का स्वामी, प्रजा-पति, प्रबल कल्याणकारी महादेव, देवों के देव, सदा जागते हैं। उन्हें कपर्दी, शंकर, रुद्र, भव, स्थाणु और उमा-पति भी कहते हैं। इस प्रकार दण्ड भी आदि-मध्य-अन्त में जागता रहता है। धर्मात्मा राजा दण्ड के निर्देशन में ठीक-ठीक शासन करे।’

“भीष्म ने कहा, जो वसुहोम के इस उपदेश को सुनकर उसी अनुसार आचरण करता है, वह अपनी सब कामनाएँ पाता है। हे नरश्रेष्ठ, अब मैंने आपको सब कुछ कह दिया कि दण्ड कौन है, वह धर्म-शासित जगत् का संयमकर्ता।”

एक उप-कथा: ब्रह्मा का यज्ञ-प्रसंग दण्ड के उद्भव की कुंजी है: जब ब्रह्मा को यज्ञ हेतु दृश्य-रूप धरना पड़ा, तब दण्ड अन्तर्धान हुआ और जगत् में मात्स्य-न्याय (बड़ी मछली छोटी को खाए) फैल गया। तब विष्णु ने अपने को ही दण्ड-रूप में रचा, सरस्वती ने दण्ड-नीति प्रकट की, और दण्ड विष्णु → अंगिरा → मरीचि → भृगु → ऋषि → लोकपाल → क्षुप → मनु की परम्परा से होता क्षत्रिय तक पहुँचा।

सार: दण्ड का उद्भव विष्णु के स्वरूप से हुआ; उसके लोप होते ही जगत् अराजकता में डूबा। दण्ड देव-ऋषि-परम्परा से क्षत्रिय तक उतरा। वह विवेक और धर्म से दिया जाए, मनमानी या कोष-लोभ से नहीं; भय जगाना उसका प्रयोजन है, राजकोष भरना नहीं।

धर्म, अर्थ और काम: कामन्दक और अंगारिष्ठ

युधिष्ठिर ने कहा, “हे आर्य, मैं धर्म, अर्थ और काम के विषय में निश्चित निष्कर्ष सुनना चाहता हूँ। जीवन का प्रवाह इनमें से किस पर निर्भर है? इन तीनों की जड़ें क्या हैं? इनके फल क्या हैं? ये कभी मिले-जुले दिखते हैं, कभी पृथक्।”

भीष्म ने कहा, “जब मनुष्य इस संसार में शुभ हृदय से धर्म की सहायता से अर्थ अर्जित करते हैं, तब धर्म, अर्थ और काम, ये तीनों काल, कारण और कर्म में एक साथ मिले दिखते हैं। अर्थ की जड़ धर्म में है, और काम अर्थ का फल कहा जाता है। तीनों की जड़ संकल्प (इच्छा) में है। संकल्प विषयों से जुड़ा है, और सब विषय भोग की कामना तृप्त करने के लिए हैं। इन्हीं पर त्रिवर्ग टिका है। सब विषयों से पूर्ण विरति ही मोक्ष है। कहा जाता है कि धर्म शरीर की रक्षा के लिए खोजा जाता है, अर्थ धर्म-अर्जन के लिए, और काम इन्द्रियों की तृप्ति-मात्र है; अतः तीनों में रजोगुण का अंश है।

“धर्म, अर्थ और काम जब स्वर्ग आदि फल के लिए खोजे जाएँ, तो दूर कहलाते हैं, क्योंकि फल स्वयं दूर हैं; पर जब आत्म-ज्ञान के लिए खोजे जाएँ, तो निकट कहलाते हैं। ऐसी अवस्था में इन्हें खोजना चाहिए, मन से भी त्यागना नहीं चाहिए। यदि त्यागना ही हो, तो तप से अपने को मुक्त कर लेने पर त्यागे। त्रिवर्ग का लक्ष्य मोक्ष की ओर है; काश मनुष्य उसे पा सके। बुद्धि की सहायता से किए-पूरे किए कर्म कभी अभीष्ट फल देते हैं, कभी नहीं। धर्म ही सदा अर्थ की जड़ नहीं, क्योंकि धर्म के सिवा सेवा, कृषि आदि से भी अर्थ मिलता है। एक विरुद्ध मत भी है (कि अर्थ संयोग, जन्म आदि से मिलता है)। कई बार अर्जित अर्थ अनिष्टकारी हुआ है, और उपवास-व्रत आदि धर्म-साधनों से अर्थ नहीं, धर्म ही अर्जित हुआ है। अतः अज्ञान से मलिन बुद्धिवाला मूढ़ धर्म और अर्थ का परम लक्ष्य, अर्थात् मोक्ष, कभी नहीं पाता। धर्म का मैल है फल की कामना, और अर्थ का मैल है उसे जमा रखना; इन मलों से शुद्ध होने पर ही ये महान् फल देते हैं।

“इस सम्बन्ध में कामन्दक और अंगारिष्ठ के पुराने संवाद की कथा कही जाती है। एक दिन राजा अंगारिष्ठ ने अवसर पाकर, सुख से बैठे ऋषि कामन्दक का अभिवादन कर पूछा, ‘हे ऋषि, यदि कोई राजा काम और मूढ़ता से प्रेरित होकर पाप करे, और बाद में पछताए, तो किन कर्मों से वे पाप नष्ट हों? और यदि कोई अज्ञानवश पाप को धर्म समझकर करे, तो राजा उस प्रचलित पाप को कैसे रोके?’

“कामन्दक ने कहा, ‘जो मनुष्य धर्म और अर्थ छोड़कर केवल काम का पीछा करता है, उसके फलस्वरूप उसकी बुद्धि नष्ट होती है। बुद्धि-नाश के बाद प्रमाद आता है, जो धर्म और अर्थ, दोनों का विनाशक है। ऐसे प्रमाद से घोर नास्तिकता और व्यवस्थित दुराचार उपजते हैं। यदि राजा उन पापाचारी दुष्टों को न रोके, तो सब सज्जन प्रजा उससे उसी प्रकार डरकर जीती है जैसे उस कमरे में रहनेवाला जिसमें साँप छिपा हो। प्रजा ऐसे राजा का अनुसरण नहीं करती; ब्राह्मण और सब पुण्यात्मा भी वैसा ही करते हैं। फलतः राजा महान् संकट और अन्ततः विनाश के जोखिम में पड़ता है; अपयश और अपमान से घिरा वह दयनीय जीवन घसीटता है, और अपयश का जीवन मृत्यु के बराबर है।

“‘शास्त्रज्ञों ने पाप रोकने के ये उपाय बताए हैं: राजा सदा तीनों वेदों के अध्ययन में लगे, ब्राह्मणों का सम्मान और उपकार करे, धर्म में समर्पित रहे, उच्च-कुलों से विवाह-सम्बन्ध जोड़े, क्षमाशील उच्च-मन ब्राह्मणों की सेवा करे, स्नान और मन्त्र-जप कर सुख से समय बिताए। सब दुष्ट प्रजा को अपने और राज्य से निकालकर सद्जनों की संगति करे। वचनों या सत्कर्मों से सबको प्रसन्न करे; सब से कहे, “मैं आपका हूँ”; अपने शत्रुओं तक के गुण घोषित करे। ऐसे आचरण से वह शीघ्र अपने पापों से शुद्ध होकर सबका आदर पाता है। आप अपने गुरुजनों के बताए सब उच्च कर्तव्य निभाएँ; उनकी कृपा से आप महान् कल्याण पाएँगे।’”

समझने की कुंजी (त्रिवर्ग और मोक्ष): धर्म (नैतिक-कर्तव्य), अर्थ (साधन-सम्पत्ति) और काम (इच्छा-भोग), ये तीन पुरुषार्थ “त्रिवर्ग” कहलाते हैं; चौथा और परम पुरुषार्थ मोक्ष (मुक्ति) है। भीष्म का सूक्ष्म मत: त्रिवर्ग तब “दूर” है जब स्वर्ग-फल के लिए हो, और “निकट” जब आत्म-ज्ञान के लिए; इसका अन्तिम लक्ष्य भी मोक्ष ही है। कामन्दक प्राचीन नीति-शास्त्रकार हैं।

सार: अर्थ की जड़ धर्म में, काम अर्थ का फल; पर तीनों का अन्तिम लक्ष्य मोक्ष है। धर्म का मैल फल-कामना, अर्थ का मैल संग्रह। केवल काम का पीछा बुद्धि-नाश, प्रमाद और नास्तिकता लाता है; राजा वेद-अध्ययन, ब्राह्मण-सेवा और दुष्ट-त्याग से पाप धोए।

आचरण की महिमा: प्रह्लाद ने अपना आचरण कैसे खोया

युधिष्ठिर ने कहा, “हे नरश्रेष्ठ, पृथ्वी के सब लोग सदाचरण की प्रशंसा करते हैं। मुझे इस प्रशंसा-विषय में गहरा सन्देह है। हे सद्जनों में श्रेष्ठ, मैं सुनना चाहता हूँ कि सदाचरण कैसे अर्जित होता है, और उसके लक्षण क्या कहे गए हैं।”

भीष्म ने कहा, “पहले, हे मान-दाता, इन्द्रप्रस्थ में आपकी और आपके भाइयों की प्रसिद्ध समृद्धि देखकर, और उस भव्य भवन में अपनी भूल पर मिले उपहास से जलते हुए, दुर्योधन ने अपने पिता धृतराष्ट्र से यही प्रश्न पूछा था। सुनिए, हे भरत, उस अवसर पर क्या हुआ। आपके उस भव्य भवन और उच्च समृद्धि को देखकर दुर्योधन ने पिता के सामने उसका वर्णन किया। दुर्योधन के वचन सुनकर धृतराष्ट्र ने पुत्र और कर्ण को सम्बोधित कर उत्तर दिया।

“धृतराष्ट्र ने कहा, ‘हे पुत्र, आप क्यों शोक करते हैं? मैं विस्तार से कारण सुनना चाहता हूँ। यदि कारण पर्याप्त निकले, तो मैं आपको परामर्श दूँगा। हे शत्रु-नगर-विजयी, आपने भी बड़ी सम्पत्ति पाई है, आपके सब भाई आपके आज्ञाकारी हैं, सब मित्र-सम्बन्धी भी। आप उत्तम वस्त्र पहनते हैं, समृद्ध भोजन करते हैं, श्रेष्ठ अश्व आपको वहन करते हैं। फिर आप क्यों पीले और दुर्बल हो गए हैं?’

“दुर्योधन ने कहा, ‘दस सहस्र उच्च-आत्मा स्नातक ब्राह्मण नित्य युधिष्ठिर के भवन में सोने के पात्रों में भोजन करते हैं। उनका उत्तम भवन, फूलों-फलों से सजा, तित्तिरि और कल्माष नस्ल के अश्व, नाना वस्त्र, और मेरे शत्रु पाण्डु-पुत्रों की वह समृद्धि, जो वैश्रवण (कुबेर) के वैभव-सी है, देखकर मैं शोक से जल रहा हूँ, हे भरत!’

“धृतराष्ट्र ने कहा, ‘हे पुत्र, यदि आप युधिष्ठिर-सी या उससे भी अधिक समृद्धि चाहते हैं, तो सदाचरण के लिए यत्न कीजिए। निस्सन्देह केवल आचरण से तीनों लोक जीते जा सकते हैं; सदाचारी के लिए कुछ भी अप्राप्य नहीं। मान्धाता ने एक ही रात्रि में सारा संसार जीता, जनमेजय ने तीन में, और नाभाग ने सात में। ये सब करुणावान् और सदाचारी थे; इसी से पृथ्वी उनकी ओर स्वयं चली आई।’

“दुर्योधन ने कहा, ‘हे भरत, मैं सुनना चाहता हूँ कि वह आचरण कैसे अर्जित होता है, जिसके कारण उन राजाओं ने पृथ्वी इतनी शीघ्र जीती।’

“धृतराष्ट्र ने कहा, ‘इस सम्बन्ध में नारद की कही एक पुरानी कथा है। पुराने समय में दैत्य प्रह्लाद ने अपने आचरण के पुण्य से उच्च-आत्मा इन्द्र से उसका राज्य छीनकर तीनों लोक वश में कर लिए। तब शुक्र हाथ जोड़कर बृहस्पति के पास गए। इन्द्र ने महान् देव-गुरु से पूछा, “मैं जानना चाहता हूँ कि सुख का स्रोत क्या है?” बृहस्पति ने कहा कि (मोक्ष की ओर ले जानेवाला) ज्ञान परम सुख का स्रोत है। पर इन्द्र ने फिर पूछा कि क्या इससे भी कुछ ऊँचा है।

“‘बृहस्पति ने कहा, “हे पुत्र, कुछ है जो अब भी ऊँचा है। उच्च-आत्मा भार्गव (उशनस्) आपको बेहतर बताएँगे; उनके पास जाइए।” तब इन्द्र भार्गव के पास गए और सन्तुष्ट-हृदय से अपने महान् हित का ज्ञान पाया। भार्गव की अनुमति लेकर शत-यज्ञकर्ता इन्द्र ने फिर पूछा कि क्या इससे ऊँचा भी कुछ है। सर्वज्ञ भार्गव ने कहा, “उच्च-आत्मा प्रह्लाद को इससे अच्छा ज्ञान है।” यह जान इन्द्र अति प्रसन्न हुए। पाक-शत्रु इन्द्र ने ब्राह्मण का रूप धरकर प्रह्लाद के पास जाकर कहा, “मैं सुनना चाहता हूँ कि सुख किससे आता है।” प्रह्लाद ने उत्तर दिया, “हे द्विजश्रेष्ठ, मुझे समय नहीं; मैं तीनों लोकों के शासन में पूर्ण व्यस्त हूँ, अतः उपदेश नहीं दे सकता।” ब्राह्मण ने कहा, “हे राजन्, जब आपको अवकाश हो, मैं आपके उपदेश सुनना चाहता हूँ।” इस उत्तर पर प्रह्लाद उस ब्रह्मवादी से प्रसन्न हुए; “ऐसा ही हो” कहकर अवसर पाते ही ज्ञान के सत्य उसे बताने लगे।

“‘ब्राह्मण ने प्रह्लाद के प्रति शिष्य का-सा आचरण किया और पूरे हृदय से उनकी सेवा की। कई बार उसने पूछा, “हे शत्रु-दमन, किन उपायों से आपने तीनों लोकों का राज्य जीता? बताइए।” प्रह्लाद ने उत्तर दिया, “हे द्विज, मुझे राजा होने का कोई गर्व नहीं, न ब्राह्मणों के प्रति शत्रुता। शुक्र की शिक्षा पर आधारित जो नीति-परामर्श वे देते हैं, उसे मैं स्वीकार और पालन करता हूँ। वे पूर्ण विश्वास से मुझे कहते हैं और अधर्म-अनुचित मार्गों से रोकते हैं। मैं सदा शुक्र की शिक्षा का आज्ञाकारी हूँ, ब्राह्मणों और गुरुजनों की सेवा करता हूँ, द्वेष नहीं रखता, धर्मात्मा हूँ, क्रोध जीत चुका हूँ, संयमी हूँ, सब इन्द्रियाँ वश में हैं। ये गुरुजन मुझ पर हितकर शिक्षा यों उँडेलते हैं जैसे मधुमक्खियाँ छत्ते के कोषों में मधु। उस अमृत को चखकर मैं अपने वंश में चन्द्रमा-सा नक्षत्रों के बीच रहता हूँ। यही पृथ्वी पर अमृत है, यही निर्मल नेत्र है, अर्थात् ब्राह्मणों के मुख से शुक्र की शिक्षा सुनना और उसके अनुसार आचरण; इसी में मनुष्य का हित है।”

“‘सेवा से प्रसन्न दैत्य-राज ने फिर कहा, “हे द्विजश्रेष्ठ, आपकी सेवा-वृत्ति से मैं अति प्रसन्न हूँ। जो वर चाहें, माँगिए; मैं अवश्य दूँगा।” ब्राह्मण ने कहा, “बहुत अच्छा।” प्रह्लाद ने कहा, “जो चाहें, ले लीजिए।” ब्राह्मण ने कहा, “हे राजन्, यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं और मेरा प्रिय करना चाहते हैं, तो मैं आपका आचरण पाना चाहता हूँ; यही वर माँगता हूँ।” यह सुनकर प्रह्लाद प्रसन्न होते हुए भी महान् भय से भर गए। उन्होंने सोचा, यह याचक साधारण तेजवाला नहीं हो सकता। बड़े आश्चर्य से अन्ततः कहा, “ऐसा ही हो।” पर वर देकर दैत्य-राज शोक से भर गए और न जान सके कि क्या करें।

“‘जब दैत्य-राज इस पर चिन्तित बैठे थे, उनके शरीर से एक तेज-ज्योति निकली, विशाल और छाया-सी आकृतिवाली। प्रह्लाद ने पूछा, “आप कौन हैं?” आकृति ने कहा, “मैं आपके आचरण का मूर्त रूप हूँ। आपने मुझे त्याग दिया, अतः मैं जा रही हूँ; अब उस निर्दोष श्रेष्ठ ब्राह्मण में रहूँगी जो आपका समर्पित शिष्य बना।” यह कहकर वह लुप्त हो गई और शीघ्र इन्द्र के शरीर में प्रविष्ट हुई। इसके बाद वैसी ही एक और आकृति प्रह्लाद के शरीर से निकली; पूछने पर उसने कहा, “मुझे धर्म का मूर्त रूप जानिए, हे प्रह्लाद। मैं वहीं जाऊँगी जहाँ वह श्रेष्ठ ब्राह्मण है, क्योंकि मैं वहीं रहता हूँ जहाँ आचरण रहता है।” फिर एक तीसरी तेजस्वी आकृति निकली; पूछने पर उसने कहा, “मैं सत्य हूँ; धर्म के पीछे चलकर आपको छोड़ता हूँ।” सत्य के जाने पर एक और महान् पुरुष निकला; पूछने पर बोला, “मैं सत्कर्मों का मूर्त रूप हूँ; मैं वहीं रहता हूँ जहाँ सत्य है।” फिर ऊँचे-गम्भीर स्वर करता एक और निकला; बोला, “मैं बल हूँ; वहीं रहता हूँ जहाँ सत्कर्म हैं।” यह कहकर बल भी सत्कर्मों के पीछे चला गया।

“‘इसके बाद महान् तेजवाली एक देवी प्रह्लाद के शरीर से निकलीं; पूछने पर बोलीं कि वे समृद्धि (श्री) का मूर्त रूप हैं, और कहा, “मैं आप में रहती थी, हे वीर; अब आपके त्यागने से मैं बल के पीछे जाऊँगी।” भय से भरे प्रह्लाद ने फिर पूछा, “हे कमल-वासिनी देवी, आप कहाँ जाती हैं? आप सदा सत्य-समर्पित हैं और देवियों में प्रथम। वह श्रेष्ठ ब्राह्मण (जो मेरा शिष्य था) कौन है? मैं सत्य जानना चाहता हूँ।” समृद्धि-देवी ने कहा, “ब्रह्मचर्य-व्रत में तत्पर जिस ब्राह्मण को आपने शिक्षा दी, वही शुक्र थे। हे प्रभु, उन्होंने आपसे तीनों लोकों का वह राज्य छीन लिया जो आपने अपने आचरण से वश किया था। यह जानकर इन्द्र ने आपसे आपका आचरण ही छीन लिया। हे महाबुद्धि, धर्म, सत्य, सत्कर्म, बल और मैं, सब की जड़ निश्चय ही आचरण में है।”

“भीष्म ने कहा, यह कहकर समृद्धि-देवी और शेष सब चले गए, हे युधिष्ठिर। दुर्योधन ने फिर पिता से कहा, ‘हे कुरु-आनन्द, मैं आचरण का सत्य जानना चाहता हूँ; उसे पाने का उपाय बताइए।’

“धृतराष्ट्र ने कहा, ‘वे उपाय प्रह्लाद ने इन्द्र को बताए थे। सुनिए, संक्षेप में आचरण कैसे अर्जित होता है। सब प्राणियों के प्रति मन, वचन और कर्म से अहिंसा, करुणा और दान, यही प्रशंसनीय आचरण है। जिस कर्म या यत्न से दूसरों का हित न हो, अथवा जिसके कारण लज्जित होना पड़े, वह कभी न किया जाए; और वह कर्म किया जाए जिससे समाज में प्रशंसा मिले। हे कुरुश्रेष्ठ, मैंने संक्षेप में बता दिया कि आचरण क्या है। हे पुत्र, यदि दुष्ट-आचरण जन कभी समृद्धि पा भी लें, तो उसे देर तक नहीं भोग पाते, और जड़ से उखड़ते देखे जाते हैं। यह सब सत्य जानकर, हे पुत्र, यदि युधिष्ठिर से बड़ी समृद्धि चाहते हैं, तो सदाचारी बनिए।’

“भीष्म ने कहा, यही धृतराष्ट्र ने अपने पुत्र से कहा था। हे कुन्ती-पुत्र, आप भी इन्हीं शिक्षाओं के अनुसार आचरण कीजिए; तब निश्चय ही इनका फल पाएँगे।”

एक उप-कथा: यह आख्यान दोहरे आवरण में है: भीष्म युधिष्ठिर को वह संवाद सुनाते हैं जो कभी धृतराष्ट्र ने ईर्ष्या से जलते दुर्योधन को सुनाया था, और उसके भीतर नारद की कही प्रह्लाद-कथा है। मर्म यह कि इन्द्र ने प्रह्लाद से उनका “आचरण” ही वर-रूप में छीना, और आचरण के साथ धर्म, सत्य, सत्कर्म, बल और लक्ष्मी, सब एक-एक कर निकल गईं, क्योंकि इन सबकी जड़ आचरण में ही है।

सार: आचरण ही सब का मूल है; धर्म, सत्य, सत्कर्म, बल और समृद्धि उसी से बँधे रहते हैं। केवल आचरण से तीनों लोक जीते जा सकते हैं। अहिंसा, करुणा और दान सदाचरण के लक्षण हैं; दुष्ट-आचरण की समृद्धि जड़ से उखड़ती है।

आशा से अधिक विशाल क्या है: सुमित्र और ऋषभ

युधिष्ठिर ने कहा, “हे आचरण को प्रथम बतानेवाले पितामह, आशा कहाँ से उठती है? वह क्या है? यह बड़ा सन्देह मेरे मन को घेरे है; आपके सिवा कोई इसे दूर नहीं कर सकता। मुझे सुयोधन (दुर्योधन) से बड़ी आशा थी कि युद्ध छिड़ने को होगा, तब वह उचित करेगा। हर मनुष्य में आशा महान् होती है; जब वह नष्ट होती है, तो जो शोक उपजता है, वह निस्सन्देह मृत्यु-सा है। मूर्ख मैं! धृतराष्ट्र के दुष्ट-आत्मा पुत्र दुर्योधन ने मेरी पाली आशा नष्ट कर दी। देखिए, हे राजन्, मेरे मन की मूढ़ता! मुझे लगता है आशा वृक्षों सहित पर्वत से, अथवा स्वयं आकाश से भी विशाल है; शायद अपरिमेय है। हे कुरुश्रेष्ठ, आशा को समझना और जीतना अत्यन्त कठिन है। मैं पूछता हूँ, इस आशा-सा अजेय और क्या है?”

भीष्म ने कहा, “इस सम्बन्ध में सुमित्र और ऋषभ के बीच हुए पुराने संवाद की कथा सुनाता हूँ। हैहय-वंश का एक राज-ऋषि सुमित्र नामक राजा आखेट को निकला। उसने एक हरिण को सीधे बाण से बेधा। बलवान् हरिण बाण लिए ही आगे भागा। बल-सम्पन्न राजा ने बड़े वेग से उसका पीछा किया। फुर्तीला हरिण नीची भूमि और समतल मैदान शीघ्र पार कर गया। युवा, सक्रिय, बलवान् राजा, धनुष-तलवार लिए, कवच पहने, पीछे लगा रहा। अकेला, वन में हरिण का पीछा करते राजा ने अनेक नदियाँ, सरोवर और झुरमुट पार किए। हरिण कभी-कभी राजा को दिखता, फिर वेग से दूर हो जाता। अनेक बाणों से बिंधा वह वन-वासी, मानो खेल में, बार-बार दूरी घटाता; एक के बाद एक वन लाँघता, कभी पास आकर दिख जाता। अन्त में राजा ने एक श्रेष्ठ, तीक्ष्ण, मर्म-भेदी बाण प्रत्यंचा पर चढ़ाया। तभी विशाल हरिण, मानो पीछा करनेवाले के यत्न पर हँसता, अचानक बाण की पहुँच से चार कोस आगे निकल गया। तेजस्वी बाण भूमि पर गिर पड़ा। हरिण एक विशाल वन में घुस गया, पर राजा ने पीछा न छोड़ा।

“उस विशाल वन में घुसकर राजा एक तपस्वी-आश्रम पर पहुँचा। श्रम से थका वह विश्राम को बैठ गया। धनुष लिए, थके, भूखे राजा को देख तपस्वियों ने उसका यथोचित सत्कार किया। राजा ने ऋषियों के तप की प्रगति पूछी; उन्होंने उत्तर देकर राजा से उसके आने का कारण और कुल-नाम पूछा। राजा ने अपना परिचय दिया, ‘मैं हैहय-वंश में जन्मा, नाम सुमित्र, मित्र का पुत्र। मैं हरिणों के झुण्ड का आखेट करता, सहस्रों को बाणों से मारता हूँ। बड़ी सेना, मन्त्रियों और अन्तःपुर की स्त्रियों सहित आखेट को निकला था। एक हरिण को बाण से बेधा, पर वह बाण लिए वेग से भागा। बिना किसी निश्चित प्रयोजन उसका पीछा करते इस वन में आ पहुँचा, और आपके सम्मुख हूँ, श्रीहीन, थका, आशा-भंग। इससे अधिक दयनीय क्या होगा कि मैं श्रम-थका, राज-चिह्नों से हीन, आशा-भंग होकर इस आश्रम में आया। मुझे राज-चिह्नों के छूटने या राजधानी से दूरी का दुःख नहीं; तीव्र शोक तो आशा-भंग का है। पर्वत-राज हिमवान् और जल-राशि समुद्र भी अपनी विशालता से आकाश की सीमा नहीं नाप सकते; वैसे ही मैं आशा की सीमा नहीं पा सकता। आप सर्वज्ञ और परम धन्य हैं; मेरा सन्देह सुलझाइए: मनुष्य की आशा और यह विशाल आकाश, इन दोनों में आपको कौन बड़ा जान पड़ता है? मैं विस्तार से सुनना चाहता हूँ कि आशा-सा अजेय क्या है। यदि यह चर्चा-योग्य विषय हो और आपके तप को हानि न पहुँचाए, तो मुझे बताइए।’

“भीष्म ने कहा, तब सब ऋषियों के बीच बैठे श्रेष्ठ ऋषि ऋषभ कुछ मुस्कुराकर बोले, ‘हे राज-व्याघ्र, पहले तीर्थाटन करते मैं नर-नारायण के सुन्दर आश्रम पहुँचा था, जहाँ रमणीय वदरी-स्थल है और वह आकाश-झील (जहाँ से पवित्र गंगा निकलती हैं)। वहाँ अश्वशिर नामक ऋषि नित्य वेद पढ़ते हैं। उस झील में स्नान कर, पितरों को जल-तर्पण देकर, मैं आश्रम में गया। उस एकान्त में नर और नारायण सच्चे आनन्द में रहते हैं। वहाँ से कुछ दूर मैं एक अन्य आश्रम में रहने गया। बैठे-बैठे मैंने एक अत्यन्त लम्बा, कृशकाय ऋषि देखा, चीथड़ों और मृग-चर्म पहने, मेरी ओर आते। तप-धनी, नाम तनु। अन्य मनुष्यों से उसकी ऊँचाई आठ गुनी जान पड़ी; उसकी दुबलता मैंने कभी न देखी थी। उसकी देह कनिष्ठ अँगुली-सी पतली थी; गर्दन, भुजाएँ, पैर, बाल, सब असाधारण। सिर देह के अनुरूप, कान और नेत्र भी। उसकी वाणी और गति अत्यन्त क्षीण। उसे देख मैं उदास और भयभीत हो गया। उनके चरण नमस्कार कर मैं हाथ जोड़े खड़ा हुआ, अपना नाम-कुल और पिता का नाम बताकर, उनके बताए आसन पर धीरे बैठ गया।

“‘तब वे धर्मात्मा तनु आश्रम के ऋषियों के बीच धर्म और अर्थ पर प्रवचन करने लगे। उसी समय कमल-दल-से नेत्रोंवाला एक राजा, अपनी सेना और अन्तःपुर की स्त्रियों सहित, वेगवान् अश्वों के रथ पर वहाँ आया। उसका नाम विरद्युम्न था; सुन्दर रूप और महान् यश। उसका पुत्र भूरिद्युम्न खो गया था, और शोक-व्याकुल पिता उसे ढूँढते वन में भटक रहा था। “मेरा पुत्र यहाँ मिलेगा! यहाँ मिलेगा!” इसी आशा से खिंचा वह राजा वन में फिरता था। उस कृश ऋषि से उसने कहा, “मेरा वह परम धर्मात्मा पुत्र मिलना अति कठिन है। हाय, वह मेरा एकमात्र सन्तान था; खो गया है, कहीं नहीं मिलता। मिलना असम्भव-सा है, फिर भी मिलने की मेरी आशा बड़ी है। इसी आशा (जो निरन्तर टूटती है) से भरा मैं मृत्यु के निकट हूँ।” राजा के ये वचन सुनकर मुनि तनु क्षण-भर सिर झुकाए चिन्तन में लीन रहे। उन्हें ऐसा देख राजा अति उदास हुआ और धीमे-कोमल स्वर में बोला, “हे देव-ऋषि, अजेय क्या है और आशा से बड़ा क्या है? हे पुण्यपुरुष, यदि सुनने में अनौचित्य न हो, तो बताइए।”

“‘मुनि ने कहा, “एक पवित्र महान् ऋषि का आपके पुत्र ने अपमान किया था; उसने यह दुर्भाग्यवश, अपनी मूढ़ बुद्धि से किया। ऋषि ने आपके पुत्र से एक स्वर्ण-कलश और वनस्पति-छाल माँगी थी; आपके पुत्र ने तिरस्कारपूर्वक मना कर दिया। इस व्यवहार से वह महान् ऋषि निराश हो गया।” यह सुनकर राजा ने सर्व-पूजित उस तपस्वी की पूजा की। धर्मात्मा विरद्युम्न वहीं थका बैठ गया, जैसे, हे नरश्रेष्ठ, आप अब बैठे हैं। महान् ऋषि ने वन-वासियों की रीति से राजा को पैर धोने का जल और अर्घ्य दिया। तब सब ऋषि उस नरश्रेष्ठ को घेरकर बैठे, जैसे सप्तर्षि-तारे ध्रुव को घेरते हैं, और अजेय राजा से आने का कारण पूछा।

“‘राजा ने कहा, “मैं विरद्युम्न नामक राजा हूँ; मेरा यश सब दिशाओं में फैला है। मेरा पुत्र भूरिद्युम्न खो गया है; उसी की खोज में इस वन में आया हूँ। हे ब्राह्मणो, वह मेरा एकमात्र पुत्र, अति कोमल आयु का, यहाँ नहीं मिलता; मैं सर्वत्र उसे ढूँढता फिरता हूँ।”

“‘ऋषभ ने कहा, राजा के ये वचन सुनकर तपस्वी तनु सिर झुकाए मौन रहे, एक शब्द भी न बोले। पहले उस ब्राह्मण का राजा ने अधिक सम्मान न किया था; इसी निराशा में उन्होंने दीर्घ काल कठोर तप किया था, यह संकल्प कर कि राजा या किसी अन्य वर्ग से कभी कुछ दान न लेंगे। वे मन में कहते, “आशा हर मूढ़-बुद्धि को विचलित करती है; मैं आशा को अपने मन से निकाल दूँगा।” यही उनका निश्चय था। विरद्युम्न ने फिर पूछा, “आशा की क्षीणता का माप क्या है? पृथ्वी पर अत्यन्त दुर्लभ क्या है? हे पुण्यपुरुष, बताइए, आप धर्म-अर्थ के ज्ञाता हैं।”

“‘अपने सब पूर्व-अपमान स्मरण कर और राजा को भी उनकी याद दिलाते हुए कृशकाय ऋषि बोले, “हे राजन्, आशा-सा क्षीण कुछ नहीं। मैंने अनेक राजाओं से याचना की और पाया कि आशा मन के सामने जो छवि रखती है, उसकी प्राप्ति-सा दुर्लभ कुछ नहीं।” राजा ने कहा, “आपके वचनों से, हे ब्राह्मण, मैं समझ गया कि क्या क्षीण है और क्या नहीं, और आशा-रचित छवियाँ कितनी दुर्लभ हैं। आपके वचन मैं श्रुति-वाक्य मानता हूँ। पर एक सन्देह उठा है: आपकी देह से अधिक क्षीण क्या है? बताइए, हे पुण्यपुरुष, यदि यह विषय चर्चा-योग्य हो।”

“‘कृशकाय ऋषि ने कहा, “सन्तुष्ट याचक मिलना अत्यन्त कठिन है; शायद संसार में ऐसा कोई नहीं। उससे भी दुर्लभ वह है जो याचक का कभी तिरस्कार न करे। जो अपने वचन देकर भी अपनी सामर्थ्य और याचक की पात्रता के अनुसार दूसरों का भला नहीं करते, उन पर टिकी आशा मेरी देह से भी क्षीण है। कृतघ्न, क्रूर, आलसी या दूसरों को सतानेवाले पर टिकी आशा मेरी देह से भी क्षीण है। एक ही पुत्रवाले पिता की, खोए-गुम पुत्र को फिर देखने की आशा, मेरी देह से भी क्षीण है। बूढ़ी स्त्रियों की पुत्र-प्रसव की आशा, और धनिकों की (जो और-और चाहते हैं) आशा, मेरी देह से भी क्षीण है। बड़ी हुई कन्याओं के मन में विवाह की चर्चा सुनकर उठती आशा मेरी देह से भी क्षीण है।” यह सुनकर राजा विरद्युम्न और उसकी रानियाँ उस ब्राह्मण-श्रेष्ठ के चरणों में झुक गए और सिर से उनके पैर छुए।

“‘राजा ने कहा, “मैं आपकी कृपा चाहता हूँ, हे पुण्यपुरुष! मैं अपने पुत्र से मिलना चाहता हूँ। जो आपने कहा, वह परम सत्य है।” ऋषभ ने कहा, धर्मात्मा तनु ने मुस्कुराते हुए अपनी विद्या और तप से राजा के पुत्र को वहीं बुला लिया। पुत्र को बुलाकर ऋषि ने राजा (पिता) को फटकारा। फिर उन्होंने अपने को धर्म का देवता प्रकट किया; अपना अद्भुत दिव्य रूप दिखाकर, क्रोध और प्रतिशोध से मुक्त-हृदय, वे निकटवर्ती वन में चले गए। यह सब, हे राजन्, मैंने देखा और जो वचन कहे, वे सुने। आप अपनी आशा त्याग दें, जो (उन सब आशाओं से भी) क्षीण है।’

“भीष्म ने कहा, उच्च-आत्मा ऋषभ के इस कथन से राजा सुमित्र ने शीघ्र अपने हृदय की वह आशा त्याग दी, जो (ऋषि-बताई हर आशा से) क्षीण थी। हे कुन्ती-पुत्र, आप भी मेरे इन वचनों को सुनकर हिमवान्-से शान्त और स्थिर हो जाइए। दुःख से व्याकुल आपने मुझसे पूछा, और मेरा उत्तर सुना; अब आपके लिए उचित है कि इन शोकों को दूर करें।”

एक उप-कथा: कृश ऋषि तनु का दुबलापन रूपक है: उनकी देह आशा-सी पतली है। पर अन्त में पता चलता है कि वे स्वयं धर्म-देवता हैं, जो राजा विरद्युम्न और भूरिद्युम्न को आशा की निस्सारता सिखाने आए थे। यह कथा सुमित्र (और परोक्ष में युधिष्ठिर) को दुर्योधन से बँधी टूटी आशा का शोक त्यागने का उपाय है।

सार: आशा आकाश से भी विशाल जान पड़ती है, पर कृपण और कृतघ्न पर टिकी आशा तपस्वी की कृश देह से भी पतली है। युधिष्ठिर हिमवान्-से स्थिर होकर दुर्योधन से बँधी टूटी आशा का शोक त्यागें।

गौतम और यम: माता-पिता के ऋण से मुक्ति

युधिष्ठिर ने कहा, “अमृत-पान करनेवाले की भाँति मैं आपकी वाणी सुनकर कभी तृप्त नहीं होता। जैसे आत्म-ज्ञानी ध्यान से तृप्त नहीं होता, वैसे मैं आपको सुनकर तृप्त नहीं होता। हे पितामह, फिर से धर्म पर उपदेश दीजिए।”

भीष्म ने कहा, “इस सम्बन्ध में गौतम और तेजस्वी यम के पुराने संवाद की कथा कही जाती है। गौतम का पारिपात्र पर्वत पर विशाल आश्रम था; उन्होंने वहाँ साठ सहस्र वर्ष तप किया। एक दिन लोक-नियन्ता यम उस शुद्ध-आत्मा महान् तपस्वी के पास आए। यम को आया जान विद्वान् ऋषि ने शीघ्र अभिवादन कर, हाथ जोड़े, आज्ञा की प्रतीक्षा में बैठे। राज-धर्म यम ने भी उस ब्राह्मण-श्रेष्ठ का अभिवादन कर पूछा कि वे उनके लिए क्या करें।

“गौतम ने कहा, ‘कौन-से कर्मों से मनुष्य माता-पिता के ऋण से मुक्त होता है? और कैसे वह दुर्लभ शुद्ध-आनन्द के लोक जीतता है?’

“यम ने कहा, ‘सत्य के पालन में लगकर, पवित्रता और तप का अभ्यास कर, मनुष्य निरन्तर अपने माता-पिता की उपासना करे; और ब्राह्मणों को विपुल दान-सहित अश्वमेध-यज्ञ करे। ऐसे कर्मों से मनुष्य अद्भुत रूप के अनेक सुख-लोक जीतता है।’”

सार: सत्य, पवित्रता, तप और माता-पिता की निरन्तर सेवा, तथा दान-सहित अश्वमेध, मनुष्य को माता-पिता के ऋण से मुक्त कर शुभ-लोक दिलाते हैं।

साधनहीन राजा का आचरण: सूक्ष्म धर्म का प्रश्न

युधिष्ठिर ने कहा, “हे भरत, उस राजा का आचरण कैसा हो जो मित्रहीन हो, जिसके अनेक शत्रु हों, कोष रिक्त हो और सेना न हो? और तब क्या करे जब वह दुष्ट मन्त्रियों से घिरा हो, उसके मन्त्र फूट जाएँ, मार्ग सूझे नहीं, वह दूसरे राज्य पर चढ़ाई करे, किसी शत्रु-राज्य को पीस रहा हो, और दुर्बल होकर भी बलवान् से युद्ध में उलझा हो? उस राजा का क्या आचरण हो जिसके राज्य के कार्य बिगड़े हों, जो देश-काल की उपेक्षा करे, जो अपने उत्पीड़न के कारण न शान्ति ला सके न शत्रुओं में फूट डाल सके? क्या वह बुरे साधनों से धन कमाए, अथवा बिना धन खोजे प्राण त्याग दे?”

भीष्म ने कहा, “हे भरतश्रेष्ठ, कर्तव्यज्ञ होकर भी आपने (कर्तव्यों से जुड़ा) एक गूढ़ रहस्य का प्रश्न पूछा है। बिना पूछे, हे युधिष्ठिर, मैं इस धर्म पर उपदेश देने का साहस न करता। धर्म अति सूक्ष्म है; उसे, हे भरतश्रेष्ठ, शास्त्र-वचनों की सहायता से ही समझा जाता है। सुने हुए को स्मरण कर और सत्कर्मों का अभ्यास कर, कोई किसी स्थान पर धर्मात्मा बन जाता है।”

समझने की कुंजी (आपद्-धर्म): यह प्रश्न “आपद्-धर्म”, अर्थात् संकट-काल का धर्म, की भूमिका है: साधनहीन, घिरे हुए राजा को किन सीमाओं तक अनुचित साधन क्षम्य हैं। भीष्म इसे “गूढ़ रहस्य” कहकर सावधानी से आरम्भ करते हैं; धर्म इतना सूक्ष्म है कि शास्त्र, स्मृति और सत्कर्म-अभ्यास से ही उसका मार्ग खुलता है। इसका विस्तार आगे के खण्ड में आता है।

सार: संकट में पड़े, साधनहीन राजा का धर्म “सूक्ष्म” है। भीष्म स्वीकारते हैं कि बिना पूछे यह रहस्य कहना उचित न था; धर्म का मार्ग शास्त्र-श्रवण, स्मरण और सत्कर्म-अभ्यास से ही प्रकट होता है।

बिल्ली और चूहे की कथा का अन्त, और भीष्म का सूत्र

शर-शय्या (बाणों की वह सेज जिस पर भीष्म पितामह लेटे थे) से पितामह ने युधिष्ठिर को अभी-अभी पलित नामक चूहे और लोमश नामक बिल्ली की कथा सुनाई थी। वह कथा अपने अन्तिम मोड़ पर थी। बिल्ली जाल में फँसी थी, चूहे ने उसकी डोरियाँ काटीं, और संकट टलते ही दोनों अपनी-अपनी राह चले गए। पेड़ की डाल पर बैठी बिल्ली ने चूहे को मीठे वचनों से फिर बुलाया, पर पलित ने पास नहीं आना स्वीकार किया। उसने कहा कि जिस मित्रता का मूल भय हो, उसे साँप के दाँत से हाथ बचाने जैसी सावधानी से ही निभाना चाहिए।

पलित का तर्क सुनिए, क्योंकि यही आगे के सारे उपदेश का बीज है। उसने कहा, “कोई किसी का मित्र नहीं, कोई किसी का शत्रु नहीं। प्रयोजन (स्वार्थ, मतलब) ही मित्र और शत्रु बनाता है। जैसे पालतू हाथी जंगली हाथियों को फँसा लाते हैं, वैसे ही एक स्वार्थ दूसरे स्वार्थ को खींच लाता है। काम पूरा हो जाने पर करने वाले की कोई गिनती नहीं रहती। इसी कारण हर काम ऐसे करना चाहिए कि कुछ-न-कुछ करना बाकी बचा रहे।” फिर उसने यह भी कहा कि पिता, माता, पुत्र, मामा, बहन का बेटा, सब सम्बन्ध लाभ और प्रयोजन से बँधे हैं। पतित हो जाने पर माता-पिता तक पुत्र को त्याग देते हैं। सब अपने-अपने को ही बचाते हैं।

बिल्ली ने बहुत आरजू-मिन्नत की, पर चूहा अडिग रहा। उसने अन्तिम वचन कहा, “नीति के सब ग्रन्थों का परम सत्य यही है, अविश्वास। दुर्बल भी यदि शत्रु पर अविश्वास बनाए रखे, तो बलवान शत्रु भी उसे वश में नहीं कर पाता। हे बिल्ली, मुझ जैसे को आप जैसों से सदा अपने प्राण बचाने चाहिए। और आप भी उस क्रोधी चाण्डाल (बहेलिये) से अपना जीवन बचाइए।” यह कहते ही शिकारी का नाम सुनकर बिल्ली भयभीत होकर डाल छोड़कर भाग गई, और पलित दूसरे बिल में घुस गया।

भीष्म ने कथा समेटी, “इस प्रकार दुर्बल और अकेला पलित अपनी बुद्धि से अनेक बलवान शत्रुओं को मात देकर बच निकला। जब दो पुराने शत्रु संधि करते हैं, तो प्रत्येक के मन में दूसरे को छलने की इच्छा रहती है। बुद्धिमान अपनी समझ से दूसरे को मात दे देता है, और जो बुद्धिहीन है वह अपनी असावधानी के कारण मात खा जाता है। इसलिए, हे युधिष्ठिर, भय में रहते हुए भी निर्भय दिखना चाहिए, और भीतर अविश्वास रखते हुए भी ऊपर से विश्वासपात्र दिखना चाहिए। भय का कारण आने से पहले ही, मानो भयभीत हो, वैसे सावधान रहना चाहिए, और शत्रु से संधि कर लेनी चाहिए।”

समझने की कुंजी (राज-धर्म): यह “राज-धर्म” का वह भाग है जिसे आपद्-धर्म और नीति कहते हैं, अर्थात् संकट और शत्रुता के बीच राजा कैसे टिके। यहाँ का केन्द्रीय सूत्र है अविश्वास (किसी पर आँख मूँदकर भरोसा न करना), और संधि-विग्रह (समय देखकर संधि, समय देखकर युद्ध)। भीष्म इसे सपाट सदाचार के रूप में नहीं, जीवित बचे रहने की कला के रूप में रख रहे हैं। महाभारत की नैतिक जटिलता यहीं है, धर्म कभी एकरंगा नहीं रहता।

सार: चूहे-बिल्ली की कथा का सबक यह है कि स्वार्थ ही मित्रता और शत्रुता रचता है, और दुर्बल का परम कवच विवेकपूर्ण अविश्वास है। भीष्म इसी से राज-नीति का पहला सूत्र निकालते हैं, भीतर सतर्क, बाहर निर्भय।

युधिष्ठिर की शंका, और पुजनी की कथा का आरम्भ

युधिष्ठिर का मन उलझ गया। उन्होंने पूछा, “हे महाबाहु, आपने कह दिया कि शत्रु पर कभी भरोसा न करें। पर यदि राजा किसी पर विश्वास ही न करे, तो वह अपने को टिकाएगा कैसे? आपने कहा कि विश्वास से राजाओं को बड़ा भय उत्पन्न होता है। पर बिना किसी पर विश्वास किए राजा शत्रुओं को जीतेगा कैसे? हे पितामह, मेरी यह शंका दूर कीजिए। अविश्वास के विषय में आपकी बातें सुनकर मेरा मन भ्रमित हो गया है।”

भीष्म ने उत्तर दिया, “हे राजन, सुनिए, राजा ब्रह्मदत्त के घर क्या हुआ था, अर्थात् पुजनी पक्षी और राजा ब्रह्मदत्त का संवाद। काम्पिल्य नगर के राजमहल के भीतरी कक्षों में पुजनी नाम की एक चिड़िया बहुत समय से राजा ब्रह्मदत्त के साथ रहती थी। जीवजीवक पक्षी की तरह पुजनी सब पशुओं के स्वर की नकल कर सकती थी। जन्म से पक्षी होते हुए भी उसके पास बड़ा ज्ञान था और वह हर सत्य से परिचित थी।”

“वहीं रहते हुए उसने एक तेजस्वी बच्चे को जन्म दिया। उसी समय राजा को भी अपनी रानी से एक पुत्र हुआ। पुजनी राजा की छत के आश्रय के प्रति कृतज्ञ थी, इसलिए वह प्रतिदिन समुद्र के किनारे जाकर दो फल लाती, अपने बच्चे और राजकुमार के पोषण के लिए। एक फल वह अपने बच्चे को देती और दूसरा राजकुमार को। वे फल अमृत जैसे मीठे थे और बल तथा ओज बढ़ाने वाले थे। प्रतिदिन वह लाती और प्रतिदिन वैसे ही बाँट देती। राजकुमार पुजनी के दिए फल खाकर बड़ा बलवान होता गया।”

एक दिन राजकुमार, धाय की गोद में था, उसने पुजनी के छोटे बच्चे को देखा। धाय की बाँहों से उतरकर बालक उस चिड़िया के बच्चे की ओर दौड़ा, और बालसुलभ चपलता से उसके साथ खेलने लगा। खेल में मगन होकर, अन्त में उसने अपने ही समान आयु के उस पक्षी-शिशु को हाथों में उठाया और उसका कोमल प्राण निचोड़ डाला, फिर अपनी धाय के पास लौट आया।

पुजनी, जो रोज़ की भाँति फल खोजने बाहर गई थी, महल लौटी तो अपने बच्चे को राजकुमार के हाथों मरा हुआ ज़मीन पर पड़ा देखा। बेटे को प्राणहीन देखकर पुजनी के गालों पर आँसू बहने लगे और हृदय शोक से जलने लगा। वह फूट-फूटकर रोई और बोली, “किसी को क्षत्रिय के साथ नहीं रहना चाहिए, न उससे मित्रता करनी चाहिए, न उसके किसी संग में सुख मानना चाहिए। जब उन्हें कोई काम सिद्ध करना होता है तब वे शिष्टाचार दिखाते हैं। काम सिद्ध हो जाने पर वे साधन को फेंक देते हैं। क्षत्रिय सबके साथ बुरा करते हैं। उन पर कभी विश्वास नहीं करना चाहिए।”

फिर उसने स्वयं से कहा कि इस कृतघ्न विश्वासघाती से बदला अवश्य लेगी। “इसने तीन पाप एक साथ किए हैं, उसका वध जो इसके साथ एक ही दिन जन्मा, जो इसी स्थान पर साथ पल रहा था, जो इसके साथ खाता था, और जो रक्षा के लिए इसी पर निर्भर था।” यह कहकर पुजनी ने अपने पंजों से राजकुमार की आँखें फोड़ डालीं, और इस प्रतिशोध से कुछ शान्ति पाकर फिर बोली, “सोच-समझकर किया गया पाप करने वाले पर बिना देर लगाए टूट पड़ता है। पर जो अपने अपकार का बदला लेते हैं, उनका पुण्य ऐसे कर्म से नष्ट नहीं होता। यदि पाप का फल करने वाले में न दिखे, तो वह उसके पुत्रों, पौत्रों, या दौहित्रों में अवश्य दिखेगा।”

ब्रह्मदत्त ने अपने पुत्र को पुजनी द्वारा अन्धा हुआ देखा, पर इसे अपने बेटे के कर्म का उचित दण्ड मानकर पुजनी से बोले।

समझने की कुंजी (पात्र और स्थान): पुजनी एक बोलने वाली, ज्ञान-सम्पन्न चिड़िया है, जो दृष्टान्त-कथाओं की प्रथा के अनुसार मनुष्य-नीति की मुखपात्र बनती है। ब्रह्मदत्त काम्पिल्य (पांचाल देश की प्राचीन राजधानी) का राजा है। जीवजीवक एक पक्षी है जो दूसरों के स्वर की नकल करता है। ध्यान दीजिए, यहाँ अन्याय पहले राजकुमार की ओर से होता है (पक्षी-शिशु का वध), और पुजनी का प्रतिशोध (आँखें फोड़ना) भी हिंसा ही है। कथा इसे छिपाती नहीं, यही महाभारत का नैतिक खुरदरापन है।

सार: युधिष्ठिर की शंका यह है कि बिना भरोसे के राज्य चलेगा कैसे। उत्तर में भीष्म पुजनी-ब्रह्मदत्त की कथा छेड़ते हैं, जहाँ राजकुमार चिड़िया के बच्चे को मार देता है और चिड़िया बदले में राजकुमार की आँखें फोड़ देती है, अपकार के बदले अपकार।

पुजनी और ब्रह्मदत्त का संवाद: अपकार के बाद विश्वास क्यों नहीं

The wise bird Pujani perched in the palace speaking gravely to King Brahmadatta on his throne, a nest of fledglings nearby, tension of broken trust between them.

ब्रह्मदत्त ने कहा, “हमने आपका अपकार किया। आपने बदले में अपकार करके उसे चुका दिया। हिसाब बराबर हो गया। अपना यह घर छोड़कर मत जाइए। यहीं रहती रहिए, हे पुजनी।”

पुजनी ने उत्तर दिया, “जिसने किसी का अपकार किया हो और फिर उसी के साथ रहता रहे, विद्वान उसके आचरण की सराहना नहीं करते। ऐसी दशा में अपकार करने वाले के लिए सदा यही उत्तम है कि वह अपना पुराना स्थान छोड़ दे। अपकार सहे हुए पक्ष के दिए सान्त्वना-वचनों पर कभी विश्वास नहीं करना चाहिए। जो मूर्ख ऐसे आश्वासनों पर भरोसा करता है, वह शीघ्र ही नाश को प्राप्त होता है। शत्रुता जल्दी ठण्डी नहीं पड़ती। जिन्होंने परस्पर अपकार किया हो, उनके पुत्र और पौत्र तक उस झगड़े के विरासत-रूप में उतर आने से नष्ट हो जाते हैं।”

पुजनी ने आगे कहा, “जो विश्वास के योग्य नहीं, उस पर विश्वास न कीजिए। और जो विश्वास के योग्य है, उस पर भी अधिक विश्वास न कीजिए। आँख मूँदकर किए विश्वास से जो भय उत्पन्न होता है, वह जड़ से नाश कर देता है। दूसरों के मन में अपने प्रति विश्वास जगाना चाहिए, पर स्वयं किसी पर विश्वास नहीं करना चाहिए। पिता और माता ही परम मित्र हैं। पत्नी केवल बीज धारण करने का पात्र है। पुत्र केवल अपना बीज है। भाई शत्रु है। मित्र वही टिका रहता है जिसकी हथेली पर तेल लगता रहे, अर्थात् जिसका हित सधता रहे। अपना सुख-दुख अपना ही आत्मा भोगता है।”

ब्रह्मदत्त ने जवाब दिया, “जो अपकार के बदले अपकार करता है, वह अपराधी नहीं माना जाता। बदला लेने वाला तो अपना हिसाब बराबर कर लेता है। इसलिए, हे पुजनी, यह स्थान छोड़े बिना यहीं रहती रहिए।”

पुजनी बोली, “अपकार करने वाले और बदले में अपकार करने वाले के बीच फिर से मित्रता नहीं जुड़ सकती। दोनों में से किसी का हृदय यह भूल नहीं सकता कि क्या हुआ था।”

ब्रह्मदत्त ने कहा, “अपकार करने वाले और बदला लेने वाले के बीच पुनर्मिलन आवश्यक है। ऐसे मिलन से परस्पर शत्रुता ठण्डी पड़ती देखी गई है। कोई नया अपकार भी फिर नहीं हुआ।”

पुजनी ने उत्तर दिया, “परस्पर अपकार से उठी शत्रुता कभी मरती नहीं। आहत व्यक्ति को कभी यह सोचकर शत्रु पर विश्वास नहीं करना चाहिए कि मुझे सद्भाव के आश्वासन से मना लिया गया है। इस संसार में मनुष्य प्रायः गलत विश्वास के कारण ही नाश को प्राप्त होते हैं। जो बल और तीखे शस्त्रों से भी वश में नहीं आते, उन्हें झूठी सान्त्वना से वैसे जीता जाता है जैसे जंगली हाथी को पालतू हथिनी से।”

ब्रह्मदत्त ने तर्क दिया, “साथ रहने से, चाहे एक दूसरे को घातक चोट ही क्यों न दे दे, उनमें स्वभावतः प्रेम और परस्पर विश्वास उत्पन्न हो जाता है, जैसे चाण्डाल और कुत्ते के बीच। साथ रहना शत्रुता की धार को कुन्द कर देता है। वह शत्रुता अधिक समय नहीं टिकती, कमल के पत्ते पर पड़े जल की तरह शीघ्र ढुलक जाती है।”

पुजनी ने तब शत्रुता के पाँच मूल बताए, “शत्रुता पाँच कारणों से उठती है, विद्वान इसे जानते हैं, स्त्री, भूमि, कठोर वचन, स्वाभाविक विरोध, और अपकार। शत्रुता की अग्नि लकड़ी में छिपी आग की तरह गुप्त रहती है। समुद्र के जल में छिपी और्व अग्नि की तरह, शत्रुता की आग न धन के दान से, न पराक्रम के प्रदर्शन से, न सान्त्वना से, न शास्त्र-ज्ञान से बुझती है। एक बार अपकार से सुलगी यह आग दोनों पक्षों में से एक को भस्म किए बिना नहीं बुझती।”

समझने की कुंजी (शत्रुता के पाँच मूल): पुजनी की गणना, (1) स्त्री, (2) भूमि (सम्पत्ति-भूमि), (3) कठोर वाणी, (4) स्वाभाविक विरोध (जन्मगत बैर, जैसे साँप-नेवला), और (5) अपकार (किया हुआ नुकसान)। और्व अग्नि वह पौराणिक अग्नि है जो समुद्र की तह में जलती रहती है और जल से बुझती नहीं, यहाँ बैर की अमिट प्रकृति का प्रतीक। ध्यान दीजिए, पुजनी और ब्रह्मदत्त एक ही प्रश्न पर भिड़े हैं, “क्या अपकार के बाद विश्वास लौट सकता है?” राजा “हाँ” चाहता है, चिड़िया “नहीं” पर अड़ी है।

काल का तर्क, और पुजनी का खण्डन

ब्रह्मदत्त ने तब काल (समय) का गूढ़ तर्क रखा, “सब कुछ काल ही करता है। कर्म नाना प्रकार के हैं और सब काल से ही उत्पन्न होते हैं। तो कौन किसका अपकार करता है? जन्म और मृत्यु इसी प्रकार होते हैं। प्राणी काल के कारण ही जन्म लेते और जीते हैं, और काल के कारण ही जीना छोड़ देते हैं। कोई तत्काल मर जाता है, कोई एक-एक करके, कोई दीर्घकाल जीता है। जैसे अग्नि ईंधन को खाती है, वैसे काल सब प्राणियों को खा जाता है। इसलिए, हे भद्रे, न मैं आपके शोक का कारण हूँ, न आप मेरे शोक की। काल ही सदा देहधारियों के सुख-दुख को नियत करता है। जो आपने किया, वह मैंने क्षमा कर दिया। आप भी मुझे क्षमा कीजिए, हे पुजनी।”

पुजनी ने यह काल-वाद नहीं माना। उसने तीखे प्रश्नों से इसे काटा, “यदि आपके अनुसार काल ही सब कर्मों का कारण है, तो फिर पृथ्वी पर कोई किसी से बैर रख ही नहीं सकता। पर मैं पूछती हूँ, फिर मित्र और सम्बन्धी मारे गए की हत्या का बदला क्यों लेना चाहते हैं? पुराने दिनों में देवता और असुर युद्ध में एक दूसरे पर प्रहार क्यों करते थे? यदि काल ही सुख-दुख और जन्म-मरण रचता है, तो वैद्य रोगी को औषधि देने का यत्न क्यों करते हैं? यदि काल ही सब ढाल रहा है, तो औषधि की आवश्यकता ही क्या? यदि आपके अनुसार काल ही कर्मों का कारण है, तो धार्मिक कर्म करने वालों को धर्म-पुण्य कैसे मिलता है?”

फिर पुजनी ने अपनी स्थिति खोली, “आपके पुत्र ने मेरे बच्चे को मारा। मैंने उसके लिए उसका अपकार किया। इस कर्म से, हे राजन, मैं आपके हाथों मारे जाने योग्य हो गई हूँ। पुत्र-शोक से व्याकुल होकर मैंने आपके पुत्र का यह अपकार किया।” फिर उसने दुःख के अनेक रूप गिनाए, “वृद्धावस्था दुःख है। धन का नाश दुःख है। किसी अप्रिय या बुरी वस्तु का पास होना दुःख है। मित्रों और प्रिय वस्तुओं से वियोग दुःख है। मृत्यु और कैद से दुःख होता है। सन्तान की मृत्यु से उठा दुःख सब प्राणियों को घोर रूप से बदल देता और सताता है। कुछ मूर्ख कहते हैं कि दूसरे के दुःख में कोई दुःख नहीं। पर ऐसा वही कह सकता है जिसने स्वयं कभी दुःख न भोगा हो। जिसने हर प्रकार के दुःख का दंश सहा है, वह दूसरे के दुःख को अपना ही समझता है।”

उसने उशना (शुक्राचार्य) का वचन उद्धृत किया जो उन्होंने प्रह्लाद को सुनाया था, “जो शत्रु के वचनों पर, सच्चे हों या झूठे, विश्वास करता है, वह वैसे ही नाश को प्राप्त होता है जैसे सूखी घास से ढके गड्ढे में मधु खोजने वाला। शत्रुता शत्रुओं की मृत्यु को भी जी लेती है, क्योंकि लोग अपने मृत पिताओं के पुराने झगड़े उनकी जीवित सन्तानों के सामने कह सुनाते हैं। राजा सान्त्वना का आश्रय लेकर शत्रुता बुझाते हैं, पर अवसर आने पर अपने शत्रुओं को जल से भरे मिट्टी के घड़े की तरह पत्थर पर पटककर टुकड़े-टुकड़े कर देते हैं।”

समझने की कुंजी (काल-वाद बनाम पुरुषार्थ): ब्रह्मदत्त काल-वाद (नियतिवाद, सब कुछ समय करता है, इसलिए कोई दोषी नहीं) से अपराध-बोध और बैर दोनों को घोलना चाहता है। पुजनी इसका पुरुषार्थ-पक्ष से खण्डन करती है, यदि सब काल ही करता तो वैद्य औषधि क्यों देते, धर्म-कर्म का फल कैसे मिलता, बदला क्यों लिया जाता? उशना = शुक्राचार्य, असुरों के गुरु और नीतिशास्त्र के आचार्य; उनका प्रह्लाद को दिया वचन यहाँ प्रमाण है।

सार: राजा काल-वाद से बैर को धोना चाहता है; चिड़िया इसे काटती है कि यदि सब नियति ही है तो वैद्य, धर्म और प्रतिशोध सब निरर्थक हो जाएँ। उसका निष्कर्ष, अपकार के बाद विश्वास घड़े के टूटे टुकड़ों की तरह फिर नहीं जुड़ता।

पुजनी का प्रस्थान-वचन: देश, राजा और प्रजा-पालन का धर्म

ब्रह्मदत्त ने अन्तिम तर्क दिया, “विश्वास रोककर कोई किसी वस्तु की सिद्धि नहीं पा सकता। भय पालते रहने से मनुष्य को सदा मरे हुए की तरह जीना पड़ता है।”

पुजनी ने उत्तर में जीवन का व्यावहारिक विवेक खोला, “जिसके पाँव में घाव हो, वह चलने को उठे तो कितनी भी सावधानी से चले, गिर ही पड़ता है। जो अपना बल जाने बिना बुरे मार्ग पर पाँव रखता और उस पर अड़ा रहता है, वह शीघ्र ही प्राण गँवा देता है। निष्क्रिय रहकर भाग्य के भरोसे बैठने वाले नपुंसक-समान हैं; उच्च आत्मा वाले तो भाग्य और पुरुषार्थ दोनों को साधते हैं। ज्ञान, साहस, चतुराई, बल और धैर्य, ये पाँच ही मनुष्य के स्वाभाविक मित्र हैं। बुद्धिमान इन पाँचों के सहारे संसार में जीवन काटते हैं। घर, बहुमूल्य धातु, भूमि, पत्नी और मित्र, ये गौण साधन कहे गए हैं; इन्हें तो मनुष्य कहीं भी पा लेता है।”

फिर उसने त्याग देने योग्य छह बुरी वस्तुएँ गिनाईं, “दूर से ही त्याग देना चाहिए, बुरी पत्नी, बुरा पुत्र, बुरा राजा, बुरा मित्र, बुरा सम्बन्ध, और बुरा देश। पत्नी वही है जो प्रिय बोले। पुत्र वही है जो पिता को सुखी करे। मित्र वही है जिस पर विश्वास किया जा सके। देश वही है जहाँ जीविका मिले। राजा वही उत्तम-नियम वाला है जो पीड़ा नहीं देता, जो निर्धनों का पालन करता है, और जिसके राज्य में कोई भय नहीं।”

यहीं से पुजनी का स्वर राज-धर्म के मर्म पर आ जाता है, “पत्नी, देश, मित्र, पुत्र, कुटुम्बी, सम्बन्धी, ये सब तभी मिलते हैं जब राजा गुणवान और धर्म-दृष्टि वाला हो। यदि राजा पापी हो, तो उसके अत्याचारों से प्रजा नष्ट हो जाती है। राजा ही मनुष्य के त्रिवर्ग (धर्म, अर्थ, काम) का मूल है। उसे सावधानी से प्रजा की रक्षा करनी चाहिए। प्रजा से उनके धन का छठा भाग लेकर उसे सबकी रक्षा करनी चाहिए। जो राजा प्रजा की रक्षा नहीं करता, वह सच में चोर है। जो राजा रक्षा का आश्वासन देकर लोभवश उसे पूरा नहीं करता, वह पापी-आत्मा राजा अपनी सारी प्रजा के पाप सिर पर ले लेता है और अन्त में नरक में गिरता है।”

पुजनी ने मनु का वचन सुनाया कि राजा के सात रूप हैं, “सब प्राणियों के स्वामी मनु ने कहा है कि राजा में सात गुण हैं, वह माता है, पिता है, गुरु है, रक्षक है, अग्नि है, वैश्रवण (कुबेर) है, और यम है। प्रजा के प्रति करुणा से व्यवहार करने पर वह उनका पिता कहलाता है। उनका भला करके और निर्धनों का पालन करके वह माता बन जाता है। दुष्टों को झुलसाकर वह अग्नि कहलाता है, और पापियों को रोककर यम कहलाता है। प्रियजनों को धन देकर वह कुबेर, वर देने वाला कहलाता है। धर्म और सद्गुण की शिक्षा देकर गुरु बनता है, और रक्षा का कर्तव्य निभाकर रक्षक।”

उसने राज-धर्म का फल बताया, “जो राजा अपनी प्रजा का आदर करना जानता है, वह न यहाँ दुःख पाता है न परलोक में। जिस राजा की प्रजा सदा चिन्ता से ग्रस्त या करों से दबी और हर प्रकार की विपत्ति से अभिभूत रहती है, वह अपने शत्रुओं के हाथों पराजय पाता है। पर जिस राजा की प्रजा झील में बड़े कमल की तरह फूलती-फलती है, वह यहाँ हर पुरस्कार पाता और अन्त में स्वर्ग में सम्मान पाता है।” अन्त में, “बलवान से शत्रुता, हे राजन, कभी सराही नहीं जाती। जिस राजा ने अपने से अधिक बलवान की शत्रुता मोल ली, वह राज्य और सुख दोनों खो देता है।” इतना कहकर पुजनी ने राजा से विदा ली और अपने चुने हुए प्रदेश को चली गई। भीष्म ने कहा, “हे राजाओं में प्रमुख, मैंने आपको ब्रह्मदत्त और पुजनी का यह संवाद सुना दिया।”

समझने की कुंजी (छठा भाग, और राजा के सात रूप): राजा को प्रजा की उपज का छठा भाग कर के रूप में लेने का विधान है, और बदले में रक्षा का दायित्व, यही कर और रक्षा का परस्पर अनुबन्ध है (आधुनिक समतुल्य, कर के बदले राज्य की सुरक्षा-व्यवस्था)। मनु के अनुसार राजा के सात रूप, माता, पिता, गुरु, रक्षक, अग्नि (दुष्ट-दमन), वैश्रवण/कुबेर (दानशीलता), यम (दण्ड)। ध्यान दीजिए, यह कठोर अविश्वास का उपदेश देने वाली कथा अन्त में प्रजा-पालन के करुण धर्म पर टिकती है, राजा चोर है यदि वह रक्षा न करे।

सार: चिड़िया विदा लेते-लेते राज-धर्म का सार दे जाती है, छह बुरी वस्तुएँ त्याग दें; राजा त्रिवर्ग का मूल है, छठा भाग कर लेकर रक्षा का अनुबन्ध निभाए; मनु के अनुसार वह माता, पिता, गुरु, रक्षक, अग्नि, कुबेर और यम, सातों रूप एक साथ है; और बलवान से बैर सदा विनाश लाता है।

युग के ह्रास और दस्युओं के काल में राजा का धर्म: भरद्वाज और शत्रुंजय

युधिष्ठिर ने अगला प्रश्न रखा, “हे भारत, जब युग के क्रमिक ह्रास से धर्म और मनुष्य दोनों क्षीण होने लगें, और जब संसार दस्युओं (लुटेरों) से पीड़ित हो जाए, तब राजा कैसा आचरण करे?”

भीष्म ने कहा, “हे भारत, मैं आपको बताता हूँ कि ऐसे विकट समय में राजा को कौन-सी नीति अपनानी चाहिए, करुणा को एक ओर रखकर वह कैसे व्यवहार करे। इस सम्बन्ध में भरद्वाज और राजा शत्रुंजय का पुराना संवाद सुनाया जाता है। सौवीर देश में शत्रुंजय नाम का एक राजा था, बड़ा महारथी। भरद्वाज ऋषि के पास जाकर उसने अर्थशास्त्र के सत्य पूछे, अप्राप्त वस्तु कैसे प्राप्त की जाए? प्राप्त होने पर कैसे बढ़ाई जाए? बढ़ने पर कैसे रक्षित की जाए? और रक्षित होने पर कैसे काम में लाई जाए?”

भरद्वाज ऋषि ने उत्तर में दण्ड-नीति का पूरा सूत्र खोला, “राजा को सदा हाथ में दण्ड (चास्ती का सोंटा) उठाए खड़ा रहना चाहिए। उसे सदा अपना पराक्रम प्रकट करना चाहिए। स्वयं निर्दोष रहकर वह शत्रुओं के दोष ताकता रहे, उसकी आँखें सदा इसी काम में लगी रहें। जिस राजा का दण्ड सदा उठा रहता है, उसे देखकर हर कोई भय खाता है। इसी कारण राजा को दण्ड से ही सब प्राणियों पर शासन करना चाहिए। चार उपायों, साम (सान्त्वना), दान, भेद (फूट डालना), और दण्ड में से दण्ड ही परम कहा गया है।”

भरद्वाज ने शत्रु से व्यवहार की गूढ़ बातें बताईं, “जब शत्रु से सम्पर्क का अवसर आए, दूरदर्शी राजा संधि कर ले, पर उस पर आँख मूँदकर विश्वास न करे। काम बन जाने पर वह नए मित्र से शीघ्र मुँह फेर ले। वाणी में राजा नम्रता दिखाए, पर हृदय में उस्तरे की तरह तीखा रहे। समय प्रतिकूल हो तब तक शत्रु को कन्धे पर ढोता रहे; पर अवसर आते ही उसे पत्थर पर मिट्टी के घड़े की तरह चूर-चूर कर दे। राजा को कोयल, सूअर, मेरु पर्वत, खाली कमरे, नट और निष्ठावान मित्र, इन सबका अनुकरण करते हुए अपना हित साधना चाहिए।”

एक उप-कथा: भरद्वाज का “छह का अनुकरण” एक चित्रमय नीति-सूत्र है। राजा कोयल की तरह दूसरों से अपना काम करवाए (कोयल अपने अण्डे दूसरे के घोंसले में पलवाती है)। सूअर की तरह जड़ तक खोदकर निकाले। मेरु पर्वत की तरह अटल रहे। खाली कमरे की तरह अपने मन को अभेद्य, थाह न मिलने देने वाला रखे। नट की तरह अनेक रूप धरे (कभी नम्र, कभी कठोर)। और निष्ठावान मित्र की तरह अपने पक्ष के प्रति सच्चा रहे।

भरद्वाज ने कच्छप और अन्य प्राणियों के दृष्टान्त दिए, “राजा कछुए की तरह अपने अंग समेट ले, अर्थात् अपनी कमज़ोरियाँ (छिद्र) सदा छिपाए। वित्त के सब विषयों पर बगुले की तरह एकाग्र होकर सोचे। सिंह की तरह पराक्रम दिखाए। भेड़िये की तरह घात में बैठे, और बाण की तरह शत्रुओं पर टूटकर बेध दे। मद्य, द्यूत (जुआ), स्त्री, आखेट (शिकार) और संगीत, इन्हें विवेक से ही भोगे, इनकी लत बुरा फल देती है।”

भरद्वाज ने भय और सावधानी का सूत्र दोहराया, “जब तक भय का कारण सचमुच न आ जाए, राजा हर प्रबन्ध ऐसे करे मानो भयभीत हो। पर जब भय सामने आ जाए, तब निर्भय होकर प्रहार करे। बिना संकट उठाए कोई भला नहीं पाता। राजा सब भावी संकटों का पता लगा ले; उपस्थित होने पर उन्हें जीते; और फिर से न उभरें, इसके लिए जीत लेने पर भी उन्हें अजेय मानकर सतर्क रहे।” फिर एक सशक्त उपमा, “जो राजा शत्रु से संधि करके सत्य के भरोसे चैन से सोता है, वह उस मनुष्य जैसा है जो पेड़ की फुनगी पर सोता है और गिरकर ही जागता है।”

समझने की कुंजी (दण्ड-नीति और चार उपाय): दण्ड-नीति = शासन की वह विद्या जिसमें दण्ड (चास्ती की शक्ति) ही व्यवस्था की रीढ़ है। राजनीति के चार उपाय, साम (मीठे वचन/समझाना), दान (देकर वश में करना), भेद (शत्रु-पक्ष में फूट डालना), और दण्ड (बल-प्रयोग)। भरद्वाज इनमें दण्ड को परम मानते हैं, पर साथ ही चेताते हैं कि दण्ड का प्रयोग समय और स्थान देखकर हो; प्रतिकूल समय में पराक्रम व्यर्थ जाता है।

मन्त्र-रक्षा, गुप्तचर और शत्रु-वध की कठोर नीति

भरद्वाज ने राजा को आत्म-गोपन और गुप्तचर-व्यवस्था सिखाई, “राजा ऐसा बरते कि शत्रु उसके छिद्र न पकड़ पाए, पर वह स्वयं शत्रु के छिद्र ताकता रहे। वह अपने शत्रुओं के शत्रुओं का सदा सम्मान करे। अपने गुप्तचरों को शत्रु के यहाँ नियुक्त चर के रूप में बरते, और ध्यान रखे कि उसके अपने गुप्तचर शत्रु द्वारा पहचाने न जाएँ। नास्तिकों और तपस्वियों के वेश में गुप्तचर बनाकर उन्हें शत्रु के प्रदेशों में भेजे।”

उन्होंने अपराधियों के दमन की बात की, “पापी चोर, जो धर्म के नियमों का उल्लंघन करते और हर किसी के पक्ष में काँटे हैं, बगीचों, मनोरंजन-स्थलों, प्याऊ-घरों, सरायों, मधुशालाओं, कुस्थानों, तीर्थों और सार्वजनिक सभाओं में घुसते हैं। इन्हें पहचानकर पकड़ना और दण्डित करना चाहिए।” फिर वही केन्द्रीय सूत्र, “राजा उस पर विश्वास न करे जो विश्वास के योग्य नहीं, और जो योग्य है उस पर भी अधिक विश्वास न करे। भय विश्वास से ही जन्मता है। परीक्षा किए बिना कभी विश्वास न रखे। प्रामाणिक कारणों से शत्रु के मन में विश्वास जगाकर, जब वह एक गलत कदम रखे, तभी राजा उस पर प्रहार करे।”

भरद्वाज ने भय के सूक्ष्म विवेक की बात की, “राजा उससे भी भय रखे जिससे भय का कारण न हो, और उनसे भी भय रखे जिनसे भय रखना ही चाहिए। निर्भय जान पड़ने वाले से जो भय उठता है, वह समूल नाश तक ले जा सकता है।” फिर कठोरतम वचन, “राजा यदि समृद्धि चाहता है, तो पुत्र, भाई, पिता या मित्र को भी मारने में संकोच न करे, यदि इनमें से कोई उसके उद्देश्यों में बाधा डाले। गुरु तक, यदि वह अहंकारी हो, कर्तव्य-अकर्तव्य से अनजान हो, और अधर्म के मार्ग पर चलता हो, तो दण्ड से रोके जाने योग्य है।”

उन्होंने मित्र और शत्रु की क्षणभंगुरता दोहराई, “शत्रु या मित्र नाम की कोई अलग प्रजाति नहीं होती। परिस्थितियों के बल से ही लोग मित्र या शत्रु बनते हैं। राजा शत्रु को उसके करुण विलाप पर भी न बचने दे। उसे इनसे विचलित नहीं होना चाहिए; उल्टे, जिसने अपकार किया उसे नष्ट करना उसका कर्तव्य है।” साथ ही प्रजा के प्रति सद्भाव की बात भी, “समृद्धि चाहने वाला राजा अधिक-से-अधिक मनुष्यों को अपने साथ जोड़े और उनका भला करे। प्रजा के प्रति वह द्वेष-रहित रहे। दुष्ट और असन्तुष्ट जनों को बड़ी सावधानी से रोके और जाँचे।”

भरद्वाज ने तीन अधूरी वस्तुओं का सूत्र दिया, “ऋण का बचा हुआ भाग, अग्नि का न बुझा हुआ अंश, और शत्रुओं का न मारा गया अवशेष, ये बार-बार बढ़ते और फैलते हैं। इसलिए इन तीनों को पूर्णतः बुझा और समूल नष्ट कर देना चाहिए। हर काम पूरी तरह करना चाहिए। काँटे जैसी छोटी वस्तु भी यदि बुरी तरह निकाली जाए, तो हठीला नासूर बना देती है।”

एक उप-कथा: भरद्वाज का “छह पशु-पक्षियों का अनुकरण”, राजा गिद्ध की तरह दूरदर्शी हो (ऊँचे से दूर तक देखे), बगुले की तरह निश्चल (धैर्य से घात लगाए), कुत्ते की तरह सतर्क (सोते में भी चौकन्ना), सिंह की तरह वीर, कौवे की तरह शंकालु (हर ओर भय की कल्पना करे), और साँप की तरह सहजता से बिना घबराए शत्रु के प्रदेश में पैठ जाए। यह वही नीति है जो राजा को एक साथ अनेक स्वभाव धारण करना सिखाती है।

भरद्वाज ने साम और दण्ड का सन्तुलन समझाया, “राजा वीर को हाथ जोड़कर जीते, कायर को भय दिखाकर, और लोभी को धन के दान से; पर बराबरी वाले से युद्ध करे। यदि राजा कोमल हो जाए, प्रजा उसकी अवहेलना करती है; यदि कठोर हो जाए, प्रजा उसे पीड़ा मानती है। नियम यह है कि अवसर कठोरता माँगे तब कठोर हो, और कोमलता माँगे तब कोमल। कोमलता से कोमल को काटा जा सकता है; कोमलता से ही उग्र वस्तु का भी नाश किया जा सकता है। ऐसा कुछ नहीं जो कोमलता न कर सके, इसी से कोमलता उग्रता से भी तीखी कही गई है।”

भरद्वाज ने अन्तिम चेतावनी और सीमा रखी, “ज्ञानी और बुद्धिमान पुरुष से शत्रुता मोल लेकर यह सोचकर निश्चिन्त न हो जाइए कि आप उससे दूर हैं। बुद्धिमान की भुजाएँ बहुत लम्बी होती हैं, जिनसे वह आहत होने पर आहत करता है। जो वस्तु सचमुच पार न की जा सके, उसे पार करने की चेष्टा न कीजिए। जिस वस्तु को शत्रु फिर छीन ले सके, उसे उससे न छीनिए। जहाँ खोदकर जड़ तक न पहुँच सकें, वहाँ खोदिए ही मत। जिसका सिर न काट सकें, उस पर प्रहार ही मत कीजिए।” और फिर वह सीमा-रेखा जो इस सारी कठोर नीति को आपद्-धर्म की कोटि में बाँध देती है, “राजा को सदा इस प्रकार आचरण नहीं करना चाहिए। मैंने जो यह आचरण बताया, वह केवल विपत्ति के समयों में अपनाने योग्य है। आपका भला करने की भावना से ही मैंने यह कहा, ताकि शत्रुओं से घिरने पर आप जान सकें कि कैसे आचरण करें।”

भीष्म ने कथा समेटी, “सौवीर देश के राजा शत्रुंजय ने उस ब्राह्मण के, अपने हित की इच्छा से कहे, इन वचनों को प्रसन्न मन से माना, और अपने कुटुम्बियों तथा मित्रों के साथ देदीप्यमान समृद्धि पाई।”

समझने की कुंजी (आपद्-धर्म की सीमा): यह सारी कठोर नीति, पुत्र-वध तक, गुरु-दण्ड तक, शत्रु पर निर्मम प्रहार तक, आपद्-धर्म है, अर्थात् विपत्ति-काल का धर्म, न कि सामान्य समय का। भरद्वाज स्वयं अन्त में रेखा खींच देते हैं, “राजा को सदा ऐसा आचरण नहीं करना चाहिए।” यहीं महाभारत की नैतिक जटिलता स्पष्ट होती है, यह क्रूर राजनीति को धर्म ठहराकर नहीं छोड़ता; उसे संकट की सीमा में बाँध देता है। तीन अधूरी वस्तुओं (ऋण, अग्नि, शत्रु) को समूल नष्ट करने का सूत्र इसी कठोर तर्क से उपजा है।

सार: भरद्वाज शत्रुंजय को दण्ड-नीति का पूरा शास्त्र देते हैं, दण्ड चार उपायों में परम; मन्त्र (गुप्त-योजना) और छिद्र छिपाना; नास्तिक-तपस्वी वेश में गुप्तचर; परीक्षा बिना कोई विश्वास नहीं; ऋण-अग्नि-शत्रु को समूल मिटाना; साम-दण्ड का सन्तुलन। पर वे यह सब आपद्-धर्म की सीमा में बाँध देते हैं, “राजा को सदा ऐसा आचरण नहीं करना चाहिए।” शत्रुंजय इसे मानकर समृद्ध हुआ।

विश्वामित्र और चाण्डाल: भीषण अकाल में जीवन-रक्षा का धर्म

Famine-stricken sage Vishvamitra creeping into a sleeping chandala's hut to seize a haunch of dog-meat for survival, gaunt and desperate under a barren moonlit sky.

युधिष्ठिर ने वह प्रश्न पूछा जो हर युग में लौटता है, “जब उत्तम धर्म क्षीण होकर सबके द्वारा लाँघ दिया जाए, जब अधर्म धर्म बन जाए और धर्म अपने उलटे रूप में आ जाए, जब सब अंकुश टूट जाएँ, जब प्रजा राजाओं और लुटेरों से पीड़ित हो, जब कोई किसी पर विश्वास न करे, जब घर जलाए जाएँ और बादल एक बूँद भी न बरसें, ऐसे घोर संकट के काल में वह ब्राह्मण कैसे जीवित रहे जो अपनी करुणा और अपने बच्चों को त्यागना नहीं चाहता? और राजा ऐसे समय में कैसे जिए कि धर्म और अर्थ दोनों से न गिरे?”

भीष्म ने कहा, “हे महाबाहु, प्रजा की शान्ति-समृद्धि, वर्षा की पर्याप्तता और समयानुकूलता, रोग, मृत्यु और अन्य भय, ये सब राजा पर निर्भर हैं, इसमें मुझे सन्देह नहीं। कृत, त्रेता, द्वापर और कलि, इनका आरम्भ भी राजा के आचरण पर निर्भर है। जब ऐसा दुःख-काल आ जाए, तब धर्मात्मा पुरुष को विवेक के सहारे जीवन टिकाना चाहिए। इस सम्बन्ध में विश्वामित्र और एक चाण्डाल का पुराना संवाद सुनाया जाता है।”

“त्रेता के अन्त और द्वापर के आरम्भ में, देवताओं के विधान से बारह वर्ष तक चलने वाला एक भयावह अकाल पड़ा। सहस्र-नेत्र इन्द्र ने एक बूँद भी न बरसाई। बृहस्पति ग्रह उल्टी चाल चलने लगा, और सोम अपनी कक्षा छोड़कर दक्षिण की ओर खिसक गया। बादलों की बात तो दूर, ओस की एक बूँद तक न दिखती थी। नदियाँ सिकुड़कर पतली धाराएँ रह गईं। झीलें, कुएँ और सोते सूख गए। जल दुर्लभ हो जाने से दान की प्याऊएँ उजड़ गईं। ब्राह्मणों ने यज्ञ और वेद-पाठ छोड़ दिए। खेती और पशु-पालन बन्द हो गए। हाट-बाज़ार सूने पड़ गए। चारों ओर हड्डियों के ढेर दिखते और हर स्थान हिंसक जीवों की चीख से गूँजता। नगर और गाँव खाली हो गए। भूख से लोग आपा खोकर एक दूसरे को खाने लगे। ऋषि तक अपने व्रत और अग्नि छोड़कर भोजन की खोज में भटकने लगे।”

“महान ऋषि विश्वामित्र, अपनी पत्नी और पुत्र को किसी आश्रय में छोड़कर, अग्निहीन और गृहहीन होकर, शुद्ध-अशुद्ध भोजन की परवाह छोड़कर भटक रहे थे। एक दिन वे वन के बीच एक ऐसी बस्ती में पहुँचे जहाँ क्रूर बहेलिए, जो जीव-वध के अभ्यस्त थे, रहते थे। वह छोटी बस्ती टूटे घड़ों-मटकों से भरी थी। जगह-जगह कुत्ते की खालें फैली थीं। सूअरों और गधों की हड्डियाँ और खोपड़ियाँ ढेर लगी थीं। मुर्दों से उतारे कपड़े पड़े थे, और झोंपड़ियाँ मुरझाए फूलों की मालाओं से सजी थीं।”

“कुशिक-पुत्र विश्वामित्र भूख से व्याकुल होकर उस बस्ती में घुसे और भोजन ढूँढ़ने का भरसक यत्न किया। बार-बार माँगने पर भी उन्हें न माँस मिला, न चावल, न फल, न कन्द, न कोई और भोजन। तब ‘हाय, मुझ पर घोर विपत्ति आ पड़ी!’ कहते हुए वे दुर्बलता से उसी बस्ती में गिर पड़े। ऋषि सोचने लगे, ‘अब मेरे लिए क्या उचित है?’ उन्होंने एक चाण्डाल की झोंपड़ी के फ़र्श पर शस्त्र से हाल ही में मारे गए कुत्ते का एक बड़ा माँस-खण्ड (जाँघ का टुकड़ा) फैला देखा। ऋषि ने विचार कर निश्चय किया कि वे यह माँस चुराएँगे।”

विश्वामित्र ने स्वयं से तर्क किया, “अब जीवन टिकाने का कोई उपाय नहीं रहा। विपत्ति-काल में चोरी श्रेष्ठ पुरुष के लिए भी विहित है, इससे उसकी कीर्ति घटती नहीं। ब्राह्मण भी प्राण-रक्षा के लिए यह कर सकता है, यह निश्चित है। पहले नीच से चुराना चाहिए; ऐसा न मिले तो समान से; वह भी न हो तो श्रेष्ठ और धर्मात्मा से भी। मेरा जीवन ही ढल रहा है, इस समय मैं यह माँस चुराऊँगा।” यह निश्चय कर वे वहीं सो गए। आधी रात गए, जब सारी बस्ती सो गई, ऋषि चुपके से उठकर उस झोंपड़ी में घुसे। पर उसका स्वामी चाण्डाल, आँखों में कीचड़ लिए, सोता-सा लेटा था, पर जाग रहा था। उसने कर्कश स्वर में पूछा, “कौन है जो साँकल खोल रहा है? सारी चाण्डाल-बस्ती सोई है, पर मैं जाग रहा हूँ। जो भी हो, आप मारे जाएँगे।”

लज्जा से लाल मुख और चोरी के प्रयत्न से व्याकुल हृदय लिए विश्वामित्र ने उत्तर दिया, “हे दीर्घायु, मैं विश्वामित्र हूँ। भूख की पीड़ा से यहाँ आया हूँ। हे धर्मबुद्धि वाले, यदि आपकी दृष्टि स्वच्छ हो, तो मुझे न मारिए।” चाण्डाल भय से उठा, ऋषि के पास आया, और हाथ जोड़कर, आँखों में आँसू भरकर बोला, “रात में आप यहाँ क्या खोज रहे हैं, हे ब्राह्मण?” विश्वामित्र ने कहा, “मैं अत्यन्त भूखा हूँ और भुखमरी से मरने को हूँ। मैं वह कुत्ते की जाँघ का माँस ले जाना चाहता हूँ। भूख ने मुझे पापी बना दिया है। भोजन का अभिलाषी निर्लज्ज हो जाता है। भूख ने मेरा वेद-ज्ञान नष्ट कर दिया है। मैं दुर्बल हूँ, सुध खो बैठा हूँ। शुद्ध-अशुद्ध का अब मुझे कोई विचार नहीं।”

तब उस चाण्डाल और ब्राह्मण के बीच धर्म पर एक विलक्षण विवाद छिड़ा, जहाँ नीच जाति का माना गया चाण्डाल धर्म-रक्षक की भूमिका में आ जाता है और श्रेष्ठ ऋषि नियम-भंग का पक्ष लेते हैं। चाण्डाल ने रोका, “सुनिए। ऐसा कीजिए कि आपका धार्मिक पुण्य नष्ट न हो। बुद्धिमान कहते हैं कि कुत्ता गीदड़ से भी अधिक अशुद्ध है, और कुत्ते की जाँघ उसके शरीर के अन्य भागों से भी बुरी। यह आपने ठीक नहीं सोचा। हे महर्षि, यह कर्म धर्म के विरुद्ध है, यह एक चाण्डाल की वस्तु की चोरी है, और वह भी अशुद्ध भोजन की चोरी। कृपया प्राण-रक्षा का कोई और उपाय खोजिए। कुत्ते के माँस की इस तीव्र इच्छा से अपनी तपस्या नष्ट न होने दीजिए।”

विश्वामित्र ने तर्क रखा, “बहुत समय बीत गया, मैंने कुछ नहीं खाया। प्राण बचाने का और कोई उपाय नहीं दिखता। मरते समय मनुष्य को हर सम्भव उपाय से, उसके भले-बुरे का विचार किए बिना, अपना जीवन बचाना चाहिए। बाद में, समर्थ होने पर, पुण्य की खोज करनी चाहिए। जीवन मृत्यु से श्रेष्ठ है। जीवित रहकर मनुष्य पुण्य कमा सकता है। वेद ही मेरा बल हैं। मैं इस अशुद्ध भोजन को भी भूख शान्त करने के लिए खाऊँगा। बाद में तप और ज्ञान से इस आचरण के दोष को वैसे ही नष्ट कर दूँगा जैसे आकाश के नक्षत्र घोर अन्धकार को।”

चाण्डाल ने अनेक बार रोका, “इस भोजन से न दीर्घ आयु मिलती है, न बल, न वह तृप्ति जो अमृत देता है। कोई और भिक्षा खोजिए। आपका मन कुत्ते का माँस खाने को न झुके। पाँच नखों वाले केवल पाँच प्रकार के पशु ही ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य के लिए शुद्ध भोजन कहे गए हैं, जैसा शास्त्रों में है। जो अशुद्ध है, उस पर मन न लगाइए।” विश्वामित्र ने उत्तर दिया कि महर्षि अगस्त्य ने भूख में वातापि असुर को खा लिया था, और कि वे विपत्ति में पड़े हैं, इसलिए यह माँस खाएँगे।

विवाद तीखा होता गया। चाण्डाल कहता रहा कि अशुद्ध की चोरी और भक्षण से ब्राह्मण अपने उच्च पद से गिर जाता है, और कि वह केवल मित्र-भाव से, उसके हित के लिए यह उपदेश दे रहा है। विश्वामित्र ने अन्ततः अपना अन्तिम तर्क रखा, “स्वीकार करने या खाने में पाप है, यह सच। पर जब किसी का जीवन संकट में हो, तब ऐसा दान लेने या ऐसा भोजन खाने में पाप नहीं। और अशुद्ध भोजन, जब उसमें वध और छल न हो और वह केवल हल्की निन्दा का कारण बने, तब अधिक गम्भीर बात नहीं।” चाण्डाल ने अन्त में कहा, “अपने वर्ण या जाति के कर्तव्यों के पालन में मनुष्य स्वयं ही अपना न्यायाधीश है। आप स्वयं जानते हैं कि इन दोनों में से कौन-सा कर्म पापमय है।” इतना कहकर चाण्डाल मौन हो गया।

“भीष्म ने आगे कहा, कुशिक-पुत्र विश्वामित्र ने तब वह कुत्ते की जाँघ का माँस उठा लिया। प्राण बचाने के लिए उसे लेकर वे वन में गए और पत्नी के साथ खाने का विचार किया। उन्होंने निश्चय किया कि पहले विधिपूर्वक देवताओं को तृप्त करके ही वे उसे खाएँगे। ब्रह्म-विधि से अग्नि प्रज्वलित कर, ऐन्द्राग्नेय नामक रीति से उन्होंने उस माँस को यज्ञ-चरु के रूप में पकाया। उन्होंने उसे शास्त्र के विधान अनुसार कई भागों में बाँटकर इन्द्र-आदि देवताओं और पितरों के सम्मान में आहुति देनी आरम्भ की।”

“इसी बीच, देवराज इन्द्र मूसलधार बरसने लगे। उन वर्षाओं से सब प्राणियों को पुनर्जीवित करते हुए उन्होंने पौधों और जड़ी-बूटियों को फिर उगा दिया। विश्वामित्र, देवताओं और पितरों के लिए विधि पूरी कर और उन्हें तृप्त कर, स्वयं वह माँस खाए। बाद में अपने तप से सब पापों को भस्म कर, बहुत काल पश्चात उस ऋषि ने परम विलक्षण तप-सिद्धि प्राप्त की। भीष्म ने सार दिया, इसी प्रकार, जब उद्देश्य जीवन की रक्षा ही हो, तब विद्या और उपाय जानने वाला उच्च-आत्मा पुरुष अपने को विपत्ति से अपने हर बल से उबार ले। जीवित रहने पर ही मनुष्य धर्म-पुण्य कमाता और सुख-समृद्धि भोगता है। इसी कारण, हे कुन्ती-पुत्र, ज्ञानी और शुद्ध-आत्मा पुरुष धर्म और अधर्म का विवेक करते हुए अपनी ही बुद्धि के सहारे इस संसार में जिए और कर्म करे।”

समझने की कुंजी (आपद्-धर्म और भक्ष्य-अभक्ष्य): यह कथा आपद्-धर्म का चरम उदाहरण है, जो सामान्यतः घोर पाप है (चोरी, और ब्राह्मण के लिए कुत्ते का माँस, परम अशुद्ध भोजन), वह बारह-वर्षीय अकाल जैसी विपत्ति में जीवन-रक्षा हेतु विहित हो जाता है। ध्यान दीजिए, महाभारत यहाँ वर्ण के सरल चित्र को उलट देता है, “नीच” चाण्डाल धर्म का पक्ष लेता है और महर्षि विश्वामित्र नियम तोड़ने का। पाँच-नखी पाँच पशुओं का नियम, और अगस्त्य द्वारा वातापि-भक्षण का दृष्टान्त, सब इसी भक्ष्य-अभक्ष्य के विवाद के अंग हैं। यह नैतिक खुरदरापन ही महाभारत का स्वर है, धर्म एक-रंगा नहीं।

एक उप-कथा: विवाद के बीच विश्वामित्र अगस्त्य और वातापि का दृष्टान्त उठाते हैं। वातापि नामक असुर अपने भाई इल्वल के साथ ब्राह्मणों को छलकर मारता था, इल्वल वातापि को मेढ़े का रूप देकर अतिथि को खिलाता और फिर पुकारता, जिससे वातापि पेट फाड़कर निकल आता। पर अगस्त्य ने भोजन के तुरन्त बाद वातापि को पचा डाला, “जीर्ण हो जाओ”, और वह फिर न उठ सका। विश्वामित्र इसे प्रमाण मानते हैं कि ऋषि का किया कर्म पाप नहीं बनता; चाण्डाल इसका उत्तर देता है कि अगस्त्य ने वह ब्राह्मणों के अनुरोध और धर्म-रक्षा के लिए किया था, इसलिए वह पाप नहीं था।

सार: बारह वर्ष के अकाल में भूख से मरते विश्वामित्र चाण्डाल की झोंपड़ी से कुत्ते का माँस चुराने को विवश होते हैं। चाण्डाल बार-बार रोकता है, ऋषि आपद्-धर्म का तर्क देते हैं। अन्त में वे माँस लेकर पहले देवताओं-पितरों को आहुति देते हैं, और तभी इन्द्र बरस पड़ते हैं और सृष्टि पुनर्जीवित हो जाती है। भीष्म का निष्कर्ष, संकट में जीवन-रक्षा के लिए ज्ञानी अपनी बुद्धि के सहारे धर्म-अधर्म का विवेक करे, क्योंकि जीवित रहकर ही पुण्य कमाया जाता है।

सत्य के तेरह रूप: युधिष्ठिर का प्रश्न और भीष्म का उत्तर

शर-शय्या पर लेटे पितामह भीष्म तप की महिमा कह चुके थे। युधिष्ठिर ने हाथ जोड़कर कहा, “पितामह! ब्राह्मण, ऋषि, पितर और देवता, सभी सत्य के धर्म की प्रशंसा करते हैं। हम सत्य के विषय में सुनना चाहते हैं। उसके लक्षण क्या हैं? वह कैसे प्राप्त होता है? और उसके आचरण से क्या मिलता है? यह सब हमें बताइए।”

भीष्म शरशय्या से उँगली उठाकर उपदेश देते; युधिष्ठिर हाथ जोड़े घुटनों पर बैठे, कृष्ण पीछे खड़े देखते।

भीष्म बोले, “चारों वर्णों के धर्म का घालमेल कभी सराहा नहीं जाता। जिसे सत्य कहते हैं, वह इन चारों वर्णों में से प्रत्येक में शुद्ध और अमिश्रित रूप से सदा विद्यमान रहता है। साधु पुरुषों के लिए सत्य ही सनातन धर्म है। सत्य को नमन करना चाहिए। सत्य परम आश्रय है। सत्य ही धर्म है, सत्य ही तप है, सत्य ही योग है, और सत्य ही सनातन ब्रह्म है। सत्य को उच्च कोटि का यज्ञ कहा गया है। सब कुछ सत्य पर ही टिका है।

“हे भारत! जैसा सत्य इस संसार में रहता है, वह तेरह प्रकार का है। सत्य के जो रूप हैं वे ये हैं: समता (पक्षपात-रहित दृष्टि), आत्म-संयम, क्षमा, विनय (लज्जा), सहनशीलता, भलाई (साधुता), त्याग, चिन्तन (ध्यान), गरिमा, धैर्य, करुणा, और अहिंसा। हे महाराज! ये ही सत्य के तेरह रूप हैं। सत्य अचल है, शाश्वत है, और अपरिवर्तनीय है। इसे ऐसे आचरणों से पाया जा सकता है जो अन्य किसी सद्गुण से टकराते न हों, और योग के द्वारा भी।

“जब राग और द्वेष, तथा काम और क्रोध नष्ट हो जाते हैं, तब जिस गुण के कारण मनुष्य अपने और अपने शत्रु को, अपने भले और बुरे को, एक-सी अविचल दृष्टि से देख पाता है, वह समता कहलाती है। आत्म-संयम वह है जिसमें मनुष्य दूसरे की वस्तुओं की कभी कामना नहीं करता, गम्भीर और धैर्यवान रहता है, और अपने विषय में दूसरों के भय को शान्त कर पाता है। यह ज्ञान से प्राप्त होता है। उदारता के अभ्यास और सब कर्तव्यों के पालन को मनीषी सद्भाव कहते हैं। सत्य में निरन्तर लगे रहने से मनुष्य सर्वजन के प्रति सद्भाव पा लेता है।

“क्षमा वह गुण है जिससे एक श्रेष्ठ और साधु पुरुष प्रिय और अप्रिय, दोनों को सह जाता है। यह सत्य के अभ्यास से ही प्राप्त होती है। विनय वह गुण है जिसके कारण बुद्धिमान मनुष्य मन और वाणी में सन्तुष्ट रहकर अनेक भले काम करता है और दूसरों की निन्दा का पात्र कभी नहीं बनता; यह धर्म की सहायता से मिलता है। सहनशीलता वह है जो धर्म और लाभ के लिए क्षमा करती है; यह धैर्य से प्राप्त होती है और इसका प्रयोजन लोगों को अपने प्रति आकृष्ट करना है। स्नेह तथा सब सांसारिक सम्पत्तियों का परित्याग त्याग कहलाता है; त्याग उसी को मिलता है जो क्रोध और द्वेष से रहित हो।

“वह गुण जिसके कारण मनुष्य सावधानी और चिन्ता के साथ सब प्राणियों का भला करता है, साधुता कहलाता है; इसका कोई विशेष रूप नहीं, यह सब स्वार्थपूर्ण आसक्तियों के त्याग में है। वह गुण जिसके कारण मनुष्य सुख और दुःख में अविचल रहता है, धैर्य कहलाता है। जो बुद्धिमान अपना भला चाहता है वह सदा इस गुण का अभ्यास करता है। हे भारत! मन, वचन और कर्म से सब प्राणियों के प्रति अहिंसा, दया और दान, ये साधु पुरुषों के सनातन कर्तव्य हैं। ये तेरह गुण देखने में भिन्न जान पड़ते हैं, पर इन सबका एक ही रूप है, और वह है सत्य।

“सत्य से बढ़कर कोई धर्म नहीं, और असत्य से बड़ा कोई पाप नहीं। सत्य ही धर्म की नींव है। इसी से ब्राह्मण, पितर और देवता सत्य की प्रशंसा करते हैं। एक समय की बात है, एक हज़ार अश्वमेध यज्ञ और सत्य, इन दोनों को तराज़ू पर तौला गया। सत्य एक हज़ार अश्वमेध यज्ञों से भारी निकला।”

समझने की कुंजी (सत्य के तेरह रूप): भीष्म “सत्य” को केवल वाणी की सच्चाई तक सीमित नहीं रखते। उनके लिए सत्य एक नैतिक धुरी है जिसके तेरह व्यावहारिक रूप हैं: समता, आत्म-संयम, क्षमा, विनय, सहनशीलता, साधुता, त्याग, ध्यान, गरिमा, धैर्य, करुणा, अहिंसा (और मूल सद्भाव)। यानी सत्य = ब्रह्म से जुड़ा एक चरित्र, न कि बस झूठ न बोलना। अश्वमेध = प्राचीन राजसूय-कोटि का घोड़े का यज्ञ, जिसे महान पुण्य का मानक माना जाता था; एक हज़ार ऐसे यज्ञों से भी सत्य को भारी बताना उसकी परम प्रतिष्ठा दर्शाता है।

सार: भीष्म बताते हैं कि सत्य ही धर्म, तप, योग और ब्रह्म है। उसके तेरह रूप हैं, और उसे राग-द्वेष तथा काम-क्रोध के नाश से, सद्गुणों के अभ्यास से और योग से पाया जाता है। तराज़ू पर सत्य हज़ार अश्वमेधों से भारी है।

तेरह दोष: क्रोध, काम और उनके भाई-बन्धु

युधिष्ठिर ने पूछा, “हे महाज्ञानी, भरतश्रेष्ठ! हमें वह सब बताइए जिससे क्रोध और काम उत्पन्न होते हैं, तथा शोक, बुद्धि-नाश, दूसरों का अनिष्ट करने की प्रवृत्ति, ईर्ष्या, द्वेष, अभिमान, डाह, निन्दा, दूसरों का भला न सह पाना, निर्दयता और भय। इन सबके विषय में सच-सच और विस्तार से कहिए।”

भीष्म बोले, “ये तेरह दोष सब प्राणियों के अत्यन्त बलवान शत्रु माने जाते हैं। हे राजन्! ये हर ओर से आकर मनुष्यों को ललचाते हैं। ये असावधान या जड़-बुद्धि मनुष्य पर ऐसे टूट पड़ते हैं जैसे भेड़िये अपने शिकार पर। इन्हीं से सब प्रकार के शोक और सब प्रकार के पाप उपजते हैं। अब हम आपको इनके मूल, इनके आश्रय, और इनके नाश के उपाय बताते हैं।

“क्रोध लोभ से उत्पन्न होता है। दूसरों के दोषों से वह बढ़ता है। क्षमा से सोया रहता है, और क्षमा से ही नष्ट होता है। काम संकल्प से जन्म लेता है; भोग से बढ़ता है; जब बुद्धिमान दृढ़ता से उससे मुँह मोड़ लेता है, तब वह मर जाता है। दूसरों के प्रति डाह क्रोध और लोभ के बीच से उपजता है; करुणा और आत्म-ज्ञान से वह मिट जाता है। बुद्धि-नाश अज्ञान और बुरी आदतों से जन्मता है; जब मनुष्य ज्ञानियों की संगति में आनन्द लेने लगता है, तब यह दोष तुरन्त सिर छिपा लेता है।

“हे कुरुनन्दन! मनुष्य परस्पर-विरोधी शास्त्र देखते हैं, इसी से भाँति-भाँति के कर्मों की इच्छा उपजती है; सच्चा ज्ञान होने पर वह इच्छा शान्त हो जाती है। देहधारी का शोक वियोग से जागे हुए स्नेह से उपजता है; जब मनुष्य जान लेता है कि मरे हुए लौटते नहीं, तब वह शान्त हो जाता है। दूसरों का भला न सह पाना क्रोध और लोभ से उपजता है; सब प्राणियों पर दया और सांसारिक वस्तुओं के प्रति उपेक्षा से वह बुझ जाता है। द्वेष सत्य के त्याग और दुष्टता में रमने से उपजता है; साधु-संगति से वह नष्ट हो जाता है।

“मनुष्यों में अभिमान जन्म, विद्या और सम्पन्नता से उपजता है; जब इन तीनों का सच्चा स्वरूप जान लिया जाता है, तब वह दोष तुरन्त मिट जाता है। डाह काम और नीच लोगों में रुचि से उपजती है; ज्ञान से उसका नाश होता है। निन्दा अनुचित आचरण और द्वेषपूर्ण कटु वचनों से उपजती है; सारे संसार पर दृष्टि डालने से वह मिट जाती है। जब अपकार करने वाला बलवान हो और सताया हुआ बदला लेने में असमर्थ, तब घृणा प्रकट होती है; सौजन्य से वह शान्त होती है। संसार में भरे असहाय और दुखी लोगों को देखकर करुणा उपजती है; और जब मनुष्य धर्म के बल को समझ लेता है, तब वह भाव शान्त हो जाता है। लोभ अज्ञान से उपजता है; सब भोग्य वस्तुओं की अनित्यता देखने से उसका नाश होता है। कहा गया है कि केवल आत्मा की शान्ति ही इन तेरहों दोषों को वश में कर सकती है। ये तेरहों दोष धृतराष्ट्र-पुत्रों को कलंकित करते थे। आप, सदा सत्य के अभिलाषी, बड़ों के प्रति आदर के कारण इन सब दोषों को जीत चुके हैं।”

समझने की कुंजी (दोषों का वंश-वृक्ष): भीष्म दोषों को एक-दूसरे से उपजते दिखाते हैं। क्रोध ← लोभ; काम ← संकल्प; डाह ← क्रोध+लोभ; अभिमान ← जन्म+विद्या+धन। हर दोष की एक “औषधि” भी है (क्षमा, ज्ञान, करुणा, साधु-संगति)। और सबकी जड़ का एक ही इलाज है: आत्मा की शान्ति। यह नीति-शास्त्र का मनोवैज्ञानिक पक्ष है, राजा को पहले अपने भीतर के शत्रु जीतने हैं, तब बाहर के।

सार: क्रोध, काम और उनके ग्यारह संगी मनुष्य के भीतरी शत्रु हैं। प्रत्येक का मूल और उसकी काट जानकर, और अन्ततः आत्म-शान्ति पाकर, इन्हें जीता जाता है। युधिष्ठिर इन्हें पहले ही जीत चुके हैं, यही उनकी पात्रता है।

दुष्ट और कृतघ्न मनुष्य के लक्षण

युधिष्ठिर ने कहा, “हे भारत! साधु पुरुषों को देखकर हम सद्भाव को तो जानते हैं, पर दुष्टों को और उनके कर्मों के स्वरूप को नहीं जानते। लोग ऐसे क्रूरकर्मा दुष्टों से वैसे बचते हैं जैसे काँटों, गड्ढों और आग से। ऐसा मनुष्य निश्चय ही यहाँ और परलोक में दुःख से जलता है। इसलिए, हे कुरुनन्दन! ऐसे मनुष्य के कर्म वस्तुतः कैसे होते हैं, यह हमें बताइए।”

भीष्म बोले, “दुष्ट सदा बुरे कर्म करते हैं और उनके लिए दुर्निवार झुकाव रखते हैं। वे दूसरों की निन्दा करते हैं और स्वयं अपयश पाते हैं। वे सदा अपने को ठगा-सा अनुभव करते हैं। दुष्ट अपने दान-पुण्य की डींग हाँकता है। वह दूसरों को द्वेष-भरी आँखों से देखता है। वह अति नीच, छली और कपटी होता है। वह किसी का हक नहीं देता। वह अहंकारी होता है, बुरी संगति रखता है और सदा आत्म-प्रशंसा में लगा रहता है। जिनसे भी सम्पर्क हो, उन सब से डरता और सबको शक की दृष्टि से देखता है। वह मूढ़-बुद्धि होता है, कंजूसी करता है, अपने साथियों की चापलूसी करता है, और वनवासी संन्यासियों से अकारण द्वेष रखता है।

“वह दूसरों को सताने में आनन्द पाता है। दूसरों के गुण-दोष का विवेक उसमें नहीं। वह झूठ से भरा, असन्तुष्ट, अत्यन्त लोभी और सदा क्रूर रहता है। वह सद्गुणी और सुयोग्य पुरुष को भी कीट समझता है, और सबको अपने ही समान मानकर किसी पर विश्वास नहीं करता। वह दूसरों के दोष, चाहे वे कितने ही अनुमान से परे हों, सर्वत्र प्रकट करता है; पर अपने दोषों के समान दोषों को, अपने लाभ के लिए, छू तक नहीं देता। जो उसका भला करता है, उसे वह भोला समझता है जिसे उसने चतुराई से ठग लिया। वह इस बात के लिए पछताता है कि कभी उसने किसी उपकारी को भी धन दिया।

“उसे दुष्ट और पापी जानिए जो चुपके से, अकेला, उत्तम भोजन और पेय हड़प जाता है, जबकि पास खड़े लोग ललचाई आँखों से ताकते रहते हैं। और वह, जो पहला अंश ब्राह्मणों को अर्पित कर शेष को मित्रों और बन्धुओं में बाँटकर खाता है, परलोक में महान सुख और इस लोक में अनन्त आनन्द पाता है। हे भरतश्रेष्ठ! बुद्धिमान को ऐसे मनुष्य से सदा बचना चाहिए।”

सार: दुष्ट के लक्षण हैं: निन्दा, छल, अविश्वास, आत्म-प्रशंसा, उपकारी के प्रति भी कृतघ्नता, और अकेले भोग। उसकी पहचान कर बुद्धिमान को उससे दूरी रखनी चाहिए, क्योंकि वह यहाँ और परलोक, दोनों में जलता है।

दान, याजन और प्रायश्चित का धर्म

भीष्म ने आगे कहा, “जो ब्राह्मण पवित्र पर निर्धन हों, जिनका धन चोरों ने लूट लिया हो, जो यज्ञ करते हों, वेदों के पारंगत हों, धर्म-पुण्य के अभिलाषी हों, और गुरुजनों तथा पितरों के ऋण चुकाकर शास्त्रों के अध्ययन में दिन बिताना चाहते हों, उन्हें धन और विद्या देनी चाहिए। जो ब्राह्मण निर्धन नहीं, उन्हें केवल दक्षिणा देनी चाहिए। जो अपने पापकर्मों से ब्राह्मणत्व से गिर चुके हों, उन्हें यज्ञ-वेदी की सीमा के बाहर बिना पका अन्न देना चाहिए।

“राजा को चाहिए कि वह ब्राह्मणों को अनेक प्रकार के बहुमूल्य धन का दान करे। जिस ब्राह्मण के पास तीन या अधिक वर्षों तक परिवार के भरण-पोषण की सामग्री हो, वही सोमपान का अधिकारी है। यदि विद्यमान धर्मात्मा राजा के रहते किसी ब्राह्मण का आरम्भ किया यज्ञ केवल चौथाई व्यय के अभाव में पूरा न हो पा रहा हो, तो राजा उस यज्ञ की पूर्ति के लिए किसी ऐसे वैश्य के बन्धुओं से धन ले ले जो विपुल गोधन रखता हो पर यज्ञ-विमुख और सोमपान से विरत हो। शूद्र को यज्ञ का अधिकार नहीं, अतः राजा हमारे किसी शूद्र-गृह से भी ऐसे प्रयोजन के लिए धन ले सकता है। जो सौ गायें रखकर भी यज्ञ न करे, अथवा हज़ार गायें रखकर भी यज्ञ से विरत रहे, राजा उसके बन्धुओं से बेखटके धन ले ले।

“अब फिर सुनिए। जिस ब्राह्मण को अभाव के कारण छह समय (तीन दिन) तक भोजन न मिला हो, वह बिना अनुमति, केवल आज की चिन्ता करने वाले की रीति से, एक बार के भोजन-भर की वस्तु धान कूटने के ओखल से, या खेत से, या बाग से, या किसी नीच पुरुष के स्थान से भी ले सकता है। पर उसे पूछे जाने पर या बिना पूछे, राजा को अपने इस कर्म की सूचना दे देनी चाहिए। यदि राजा धर्मज्ञ हो, तो वह ऐसे ब्राह्मण को दण्ड न दे; उसे स्मरण रहे कि ब्राह्मण भूख से क्षत्रिय (राजा) के दोष से ही पीड़ित होता है। ब्राह्मण की विद्या और आचरण जानकर राजा उसके लिए व्यवस्था करे, और उसे अपने औरस पुत्र की भाँति पाले।

“वेदज्ञ ब्राह्मण को राजा के समक्ष अपने तेज और ज्ञान का बखान कभी नहीं करना चाहिए; राजा का ही कर्तव्य है कि वह स्वयं उसे पहचाने। ब्राह्मण के तेज की तुलना राजा के तेज से करें तो ब्राह्मण ही श्रेष्ठ ठहरता है; इसीलिए राजा से ब्राह्मण का तेज सहा या रोका नहीं जा सकता। ब्राह्मण को सृष्टा, शासक, विधाता और देव कहा गया है। उसे कोई गाली या रूखी बात न कहे। क्षत्रिय अपने बाहुबल से अपनी कठिनाइयाँ पार करे; वैश्य और शूद्र धन से; और ब्राह्मण मन्त्र और होम से।

“इसके पश्चात भीष्म ने अनेक प्रायश्चितों का वर्णन किया। उन्होंने कहा, हँसी में बोला झूठ, स्त्री से कहा गया, विवाह के अवसर पर, गुरु के हित में, या अपने प्राण बचाने के लिए कहा गया झूठ, ये पाँच प्रकार के झूठ पाप नहीं माने जाते। नीच पुरुष से भी भक्ति और आदर के साथ उपयोगी ज्ञान लिया जा सकता है। अशुद्ध स्थान से भी बेखटके सोना उठाया जा सकता है। नीच कुल से भी स्त्री-रत्न ग्रहण की जा सकती है। विष से निकाला अमृत पिया जा सकता है; शास्त्र के अनुसार स्त्री, रत्न और जल कभी अशुद्ध नहीं होते।

“मद्यपान, ब्रह्म-हत्या, और गुरु-शय्या का दूषण, ये जान-बूझकर किए जाएँ तो इनका कोई प्रायश्चित नहीं; इनके लिए मृत्यु ही एकमात्र प्रायश्चित कही गई है। यही बात सोना चुराने और ब्राह्मण का धन चुराने के विषय में है। इन पाँच महापापों को छोड़कर शेष सब पापों के प्रायश्चित हैं। प्रायश्चित कर लेने पर मनुष्य को उन पापों में फिर नहीं पड़ना चाहिए। किसी चोर को चोर कहने से चोरी का पाप लगता है; और जो चोर नहीं उसे चोर कहने से चोरी का दुगुना पाप। ब्राह्मण की निन्दा या उस पर प्रहार करने वाला सौ वर्ष अपयश में डूबता है; ब्राह्मण-हत्या करने वाला हज़ार वर्ष नरक में गिरता है।

“फिर उन्होंने भिन्न-भिन्न पापों के लिए ब्रह्मचर्य-व्रत, चान्द्रायण, गो-दान, यज्ञ और कठोर तप के रूप में अनेक प्रायश्चित बताए। एक वर्ष के भीतर प्रायश्चित न करने वाला मूल पाप का दुगुना दोष पाता है। ये सब सनातन विधान उस ब्राह्मण के लिए हैं जिसने ये पाप अज्ञान और विवेक के अभाव से किए हों।”

समझने की कुंजी (आपद्धर्म और कोष-नीति): यह खण्ड आपद्धर्म (संकट-काल का धर्म) के पास है। राजा का कोष-धर्म यहाँ कठोर वर्ण-व्यवस्था से जुड़ा है: यज्ञ-विमुख धनिकों से बलपूर्वक धन लेकर भी राजा को याज्ञिक ब्राह्मण का अधूरा यज्ञ पूरा कराना है। दक्षिणा = यज्ञ/दान के अन्त में दी जाने वाली भेंट। सोमपान = सोम-यज्ञ का अधिकार, जो अन्न-संग्रह की एक न्यूनतम स्थिति पर निर्भर है। आधुनिक समतुल्य: “छह समय बिना भोजन” यानी लगभग तीन दिन का उपवास, जिसके बाद जीवन-रक्षा हेतु अन्न लेना अपवाद-धर्म बनता है। ध्यान दें: यह वर्णन अपने युग की सामाजिक संरचना को ज्यों-का-त्यों दर्ज करता है, उसके कठोर भेद और दण्ड समेत; महाभारत इसे न छिपाता है, न सरल बनाता है।

सार: राजा का धर्म है पात्र ब्राह्मणों को धन-विद्या देना और यज्ञ-धर्म की रक्षा करना, चाहे इसके लिए यज्ञ-विमुख धनिकों से कोष भरना पड़े। साथ ही भीष्म पाँच क्षम्य झूठ, पाँच अप्रायश्चित्य महापाप, और शेष पापों के प्रायश्चितों का विस्तृत विधान गिनाते हैं।

नकुल का प्रश्न: तलवार की उत्पत्ति और असि का आख्यान

Nakula kneeling at the arrow-bed asking Bhishma the origin of the sword, with a vision of the first blazing sword arising from sacrificial fire as a fierce being.

इस उपदेश के पूरा होने पर, खड्ग-विद्या में निपुण नकुल ने शर-शय्या पर लेटे कुरु-पितामह से पूछा, “पितामह! इस संसार में धनुष ही श्रेष्ठ शस्त्र माना जाता है। पर हमारा मन तलवार की ओर झुकता है, क्योंकि धनुष कट या टूट जाने पर, घोड़े मर या थक जाने पर, खड्ग में निपुण योद्धा अपनी तलवार से अपनी रक्षा कर सकता है। तलवारधारी वीर अकेला अनेक धनुर्धरों और गदा-शूल-धारियों का सामना कर सकता है। हमें यह संशय है: सब युद्धों में वस्तुतः श्रेष्ठ शस्त्र कौन है? तलवार पहले कैसे और किसलिए बनी? और इस शस्त्र का प्रथम आचार्य कौन था? यह सब बताइए।”

माद्री-पुत्र के ये वचन सुनकर, धनुर्विद्या के पूर्ण ज्ञाता भीष्म ने मधुर और कुशल वचनों में उत्तर दिया, “हे माद्री-पुत्र! जो आपने पूछा है उसका सत्य सुनिए। आदि-काल में यह विश्व जल का एक विशाल विस्तार था, गतिहीन और आकाश-रहित, अन्धकार में ढका, अमाप्य। अपने यथोचित समय में विश्व-पितामह (ब्रह्मा) ने जन्म लिया। उन्होंने वायु, अग्नि, तेजस्वी सूर्य, आकाश, स्वर्ग, पाताल, पृथ्वी, दिशाएँ, चन्द्र-तारों सहित आकाश-मण्डल, नक्षत्र, ग्रह, वर्ष, ऋतुएँ, मास और काल के सूक्ष्म विभाग रचे।

“फिर उन्होंने अपनी इच्छा-शक्ति से कुछ महातेजस्वी पुत्र उत्पन्न किए, ऋषि मरीचि, अत्रि, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, वसिष्ठ, अंगिरा, महान रुद्र, और प्रचेता। प्रचेता ने दक्ष को उत्पन्न किया, और दक्ष ने साठ कन्याएँ। उनसे देव, पितर, गन्धर्व, अप्सरा, राक्षस, पक्षी, पशु, मत्स्य, वानर, महासर्प, और सब प्रकार के प्राणी उपजे। इस प्रकार चराचर विश्व उत्पन्न हुआ। तब विश्व-पितामह ने वेदों में निहित सनातन धर्म का प्रवर्तन किया, जिसे देवताओं और महर्षियों ने स्वीकार किया।

“किन्तु दानवों में अग्रणी, पितामह की आज्ञा को रात्रि में ठुकराकर, क्रोध और लोभ के वश, धर्म का नाश करने लगे। ये थे हिरण्यकशिपु, हिरण्याक्ष, विरोचन, सम्बर, विप्रचित्ति, प्रह्लाद, नमुचि और बलि। ये और अनेक दैत्य-दानव सब प्रकार के दुष्कर्मों में रमने लगे, स्वयं को देवताओं के समान मानकर उन्हें ललकारने लगे, और साम-दान-भेद, इन तीन ज्ञात उपायों की उपेक्षा कर केवल दण्ड के बल से सब प्राणियों को सताने लगे।

“तब ब्रह्मा महर्षियों सहित हिमवान के एक रमणीय शिखर पर गए और वहाँ शास्त्रोक्त विधि से एक महान यज्ञ का आयोजन किया। उस यज्ञ में कुछ अति भयानक घटा। यज्ञ-अग्नि से एक प्राणी प्रकट हुआ, जिसका तेज चन्द्रमा-सा था, वर्ण नील-कमल-सा श्याम, दाँत तीक्ष्ण, उदर कृश, और रूप दुर्निवार। उसके प्रकट होते ही पृथ्वी काँपी, समुद्र क्षुब्ध हुआ, उल्काएँ गिरीं, वृक्षों की शाखाएँ टूटीं, और अमंगल वायु बहने लगी। यह देखकर पितामह ने ऋषियों, देवों और गन्धर्वों से कहा, ‘यह प्राणी मेरे संकल्प से उपजा है। महातेजस्वी, इसका नाम है असि (तलवार)। संसार की रक्षा और देव-शत्रुओं के नाश के लिए मैंने इसे रचा है।’

“तब वह प्राणी अपना पहला रूप त्यागकर एक तेजस्वी, तीक्ष्ण-धार तलवार बन गया। ब्रह्मा ने वह तीक्ष्ण शस्त्र नीलकण्ठ रुद्र को सौंपा, ताकि वे अधर्म और पाप का दमन करें। रुद्र ने चार भुजाएँ धारण कर ऐसा विकराल रूप लिया कि पृथ्वी पर खड़े होकर भी उनका मस्तक सूर्य को छूता था। उन्होंने वह असि और तीन ऊँचे उभारों वाली विशाल ढाल लेकर आकाश में अनेक प्रकार के युद्ध-कौशल दिखाए। यह देख दानव हर्षित होकर शिलाएँ, जलती लकड़ियाँ और छुरे-सी तीक्ष्ण लोहे की शस्त्र-वर्षा करते उन पर टूट पड़े।

“अकेले होते हुए भी रुद्र इतनी तीव्रता से युद्ध-भूमि में घूमे कि असुरों को सहस्र रुद्र दिखाई दिए। शुष्क घास के ढेरों में दावानल की भाँति वे शत्रु-समूहों में घूमते रहे, काटते, बेधते और पीसते। दानव कटे अंगों के साथ धरती पर गिरे; शेष भागकर पृथ्वी के गर्भ में, पर्वतों की ओट में और समुद्र की गहराई में छिप गए। पृथ्वी रक्त-मांस से लथपथ हो गई। धर्म को पुनः स्थापित कर रुद्र ने अपना भयंकर रूप त्याग दिया, और सब ऋषि-देवों ने उनकी जय-जयकार की।

“रुद्र ने वह धर्म-रक्षक असि विष्णु को दी, विष्णु ने मरीचि को, मरीचि ने महर्षियों को, उन्होंने वासव (इन्द्र) को, इन्द्र ने लोकपालों को, और लोकपालों ने सूर्य-पुत्र मनु को। उसे देते समय उन्होंने कहा, ‘आप सब मनुष्यों के स्वामी हैं। इस धर्म-गर्भित असि से सब प्राणियों की रक्षा कीजिए। जो धर्म की सीमा लाँघें, उन्हें विधिपूर्वक दण्ड दीजिए, मनमानी से नहीं। किसी को वचन से, किसी को अर्थ-दण्ड से दण्डित कीजिए। तुच्छ कारणों से अंग-भंग या मृत्यु का दण्ड कभी न दीजिए। ये दण्ड, जिनमें पहला है शब्द-भर्त्सना, असि के ही रूप हैं।’

“तब मनु ने यह असि अपने पुत्र क्षुप को सौंपी, क्षुप से इक्ष्वाकु ने, इक्ष्वाकु से पुरूरवा ने, पुरूरवा से आयु ने, आयु से नहुष ने, नहुष से ययाति ने, ययाति से पुरु ने, पुरु से अमूर्तरय ने, उससे भूमिषय ने, भूमिषय से दुष्यन्त-पुत्र भरत ने, भरत से ऐलविल ने, उससे राजा धुन्धुमार ने, उससे कम्बोज ने, कम्बोज से मुचुकुन्द ने, उससे मरुत्त ने, मरुत्त से रैवत ने, रैवत से युवनाश्व ने, उससे रघु ने, रघु से वीर हरिनाश्व ने, उससे शुनक ने, शुनक से उशीनर ने, उससे भोजों और यादवों ने, यदुओं से शिवि ने, शिवि से प्रतर्दन ने, उससे अष्टक ने, अष्टक से पृषदश्व ने, उससे भरद्वाज ने, भरद्वाज से द्रोण ने, और द्रोण के पश्चात कृप ने। कृप से वह श्रेष्ठ खड्ग आपको और आपके भाइयों को प्राप्त हुआ।

“असि का नक्षत्र कृत्तिका है, देवता अग्नि, गोत्र रोहिणी, और परम आचार्य रुद्र। इसके आठ नाम हैं जो प्रायः अज्ञात रहते हैं: असि, वैशसन, खड्ग, तीक्ष्ण-धार, दुर्लभ, श्रीगर्भ, विजय, और धर्म-रक्षक। इन्हें जो कहता है, वह सदा विजय पाता है। सब शस्त्रों में, हे माद्रवती-पुत्र, तलवार ही श्रेष्ठ है; पुराण कहते हैं कि इसे पहले महादेव ने धारण किया। रही धनुष की बात, उसे पहले पृथु ने रचा; उसी से वेन-पुत्र पृथु ने धरती को दुहकर अन्न-धान्य की वृद्धि की। यह सुनकर मनुष्य इस लोक में यश और परलोक में आनन्द पाता है।”

एक उप-कथा: ध्यान दीजिए कि “असि” की वंशावली केवल पौराणिक नाम-गणना नहीं, यह एक सूक्ष्म राज-धर्म-शिक्षा है। जब मनु को असि सौंपी जाती है, साथ में चेतावनी भी दी जाती है: तलवार का अर्थ केवल वध नहीं। दण्ड के अनेक रूप हैं, और इनमें पहला है केवल कठोर शब्द। अंग-भंग और मृत्यु अन्तिम उपाय हैं, तुच्छ कारणों के लिए नहीं। इस प्रकार शस्त्र की कथा वस्तुतः दण्ड-नीति (न्यायपूर्ण दण्ड का विज्ञान) की कथा बन जाती है, राजा के हाथ में तलवार धर्म से बँधी है।

सार: ब्रह्मा के यज्ञ से धर्म-रक्षा हेतु असि का जन्म हुआ, रुद्र ने उससे दानवों का संहार किया, और वह विष्णु से होते हुए मनु और फिर राजवंशों की लम्बी परम्परा से अब पाण्डवों तक पहुँची। तलवार को दण्ड-नीति का प्रतीक बताया गया है, जो धर्म से बँधी है, मनमानी से नहीं।

धर्म, अर्थ और काम: भाइयों का वाद-विवाद

इतना कहकर भीष्म मौन हो गए, और युधिष्ठिर सब के साथ घर लौटे। वहाँ विदुर को पाँचवाँ बनाकर राजा ने भाइयों से कहा, “संसार की गति धर्म, अर्थ और काम पर टिकी है। इन तीनों में कौन प्रथम, कौन द्वितीय, और कौन अन्तिम महत्व का है? काम-क्रोध-लोभ, इस त्रिपुटी को जीतने के लिए मन को इन तीनों में से किस पर टिकाना चाहिए? आप सब सच-सच उत्तर दीजिए।”

अर्थ-शास्त्र, लोक-व्यवहार और सत्य के ज्ञाता, प्रखर-बुद्धि विदुर पहले बोले, “विविध शास्त्रों का अध्ययन, तप, दान, श्रद्धा, यज्ञ, क्षमा, सरलता, करुणा, सत्य और आत्म-संयम, ये धर्म की सम्पत्तियाँ हैं। आप धर्म को अपनाइए, आपका हृदय उससे कभी विमुख न हो। धर्म और अर्थ, दोनों की जड़ इन्हीं में है। ऋषि धर्म से ही संसार पार कर गए। सब लोक धर्म पर टिके हैं। देवता धर्म से ही श्रेष्ठ-पद को पहुँचे। अर्थ भी धर्म पर टिका है। धर्म पुण्य में सर्वोपरि है, अर्थ मध्यम है, और काम मनीषियों के मत में निम्न। इसलिए मनुष्य संयत-चित्त होकर धर्म पर सर्वाधिक ध्यान दे, और सब प्राणियों के साथ वैसा ही व्यवहार करे जैसा अपने साथ।”

तब अर्थ-शास्त्र में निपुण अर्जुन बोले, “हे राजन्! यह संसार कर्म की भूमि है, इसलिए यहाँ कर्म ही सराहा जाता है। कृषि, व्यापार, गो-पालन और विविध कलाएँ, इन्हें अर्थ कहते हैं, और अर्थ इन सब कर्मों का लक्ष्य है। अर्थ बिना न धर्म सिद्ध होता है, न काम। श्रुति यही कहती है। मलिन-चित्त मनुष्य भी, यदि धनवान हो, तो उच्च धर्म-कर्म कर सकता है और दुर्लभ कामनाओं को तृप्त कर सकता है। धर्म और काम, अर्थ के अंग हैं। यहाँ तक कि मृगचर्म धारी, जटाधारी, संयमी ब्रह्मचारी भी मन में धन की इच्छा रखते हैं। आस्तिक, नास्तिक और कठोर योगी, सभी धन की श्रेष्ठता प्रमाणित करते हैं। वही सच्चा धनवान है जो आश्रितों को भोग देता है और शत्रुओं को दण्ड। अब इन दोनों (नकुल-सहदेव) को सुनिए।”

नकुल और सहदेव बोले, “बैठते-लेटते, चलते-खड़े, मनुष्य को अति-प्रयत्न से धन का अर्जन करना चाहिए। दुर्लभ और प्रिय धन यदि कमाया जाए, तो कमाने वाला सब कामनाएँ पा लेता है। धर्म से जुड़ा अर्थ, और अर्थ से जुड़ा धर्म, अमृत-समान है। धनहीन कोई कामना तृप्त नहीं कर सकता; वैसे ही धर्महीन के पास धन नहीं ठहरता। जो धर्म और अर्थ, दोनों से बाहर हो, वह संसार के लिए भय का कारण है। इसलिए धर्म की उपेक्षा किए बिना, समर्पित मन से धन का अर्जन करना चाहिए। पहले धर्म का पालन करे, फिर धर्म-रहित हुए बिना अर्थ कमाए, और तब अन्त में काम की तृप्ति चाहे।”

अश्विनी-कुमारों के दोनों पुत्र मौन हुए, तब भीमसेन बोले, “जो कामना-रहित है, वह न धन चाहता है न धर्म। कामना-रहित कोई इच्छा ही नहीं कर सकता। इसलिए काम ही तीनों में प्रथम है। काम के ही वश ऋषि तप करते हैं, फल-मूल या वायु पर जीते हैं। व्यापारी, कृषक, गोपालक, कलाकार, सब काम से ही कर्म करते हैं। समुद्र की गहराई में डुबकी लगाने वाले भी काम से प्रेरित हैं। सब कुछ काम के सिद्धान्त से व्याप्त है। कामना-रहित मनुष्य न कभी हुआ, न है, न होगा। जैसे दही का सार मक्खन है, वैसे ही अर्थ और धर्म का सार काम है। तेल, बीजों से उत्तम है; घी, खट्टे दूध से; पुष्प-फल, काठ से। वैसे ही काम, धर्म और अर्थ से उत्तम है। काम ही धर्म और अर्थ का जनक और आत्मा है। काम बिना ब्राह्मण भी ब्राह्मणों को मिष्टान्न या धन न देते।

“फिर भी, हे धर्मनन्दन, धर्म, अर्थ और काम, तीनों का समान रूप से सेवन करना चाहिए। जो केवल एक का सेवन करता है वह श्रेष्ठ पुरुष नहीं; जो दो का, वह मध्यम; और जो तीनों का सेवन करता है, वही अपनी जाति में श्रेष्ठ है।” इतना कहकर, चन्दन-लेपित और मालाओं से सजे भीम मौन हो गए।

सबके वचन सुनकर, और उन सबको झूठा दर्शन मानकर, धर्मराज युधिष्ठिर ने कहा, “निःसन्देह आप सब शास्त्रों के निश्चित मत रखते हैं और प्रमाणों के ज्ञाता हैं। आपके ये निश्चयपूर्ण वचन हमने सुने। अब एकाग्र मन से वह सुनिए जो हम कहते हैं। जो न पुण्य में लगा हो न पाप में, जो अर्थ, धर्म या काम पर ध्यान न दे, जो सब दोषों से परे हो, जो सोने और ईंट को समान दृष्टि से देखे, वह सुख-दुःख और प्रयोजन-पूर्ति की विवशता से मुक्त हो जाता है। सब प्राणी जन्म-मृत्यु के अधीन हैं, सब क्षय और परिवर्तन के पात्र हैं। जीवन के सुख-दुःखों से बार-बार जगाए गए सब, मुक्ति की प्रशंसा करते हैं। पर मुक्ति क्या है, यह हम नहीं जानते।

“स्वयम्भू ब्रह्मा ने कहा है कि आसक्ति और स्नेह के बन्धन में बँधे के लिए मुक्ति नहीं। विद्वान निर्वाण को खोजते हैं। इसलिए किसी वस्तु को न प्रिय मानना चाहिए न अप्रिय। इस संसार में कोई अपनी इच्छानुसार कर्म नहीं कर सकता। मैं ठीक वैसे ही करता हूँ जैसे (किसी श्रेष्ठ शक्ति द्वारा) कराया जाता हूँ। विधाता परम है। जो होना है वह होता है। जो त्रिपुटी से अलग हो गया, वही मुक्ति पा सकता है, और इसी से मुक्ति परम कल्याणकारी जान पड़ती है।” यह सुनकर भीम आदि हर्षित होकर हाथ जोड़कर कुरुनन्दन को नमन कर, उनकी प्रशंसा करने लगे।

समझने की कुंजी (त्रिवर्ग और चतुर्थ पुरुषार्थ): धर्म (नैतिक-धार्मिक कर्तव्य), अर्थ (धन-सम्पदा), और काम (इच्छा-भोग), ये तीन मिलकर त्रिवर्ग कहलाते हैं। विदुर धर्म को, अर्जुन-नकुल-सहदेव अर्थ को, और भीम काम को प्रथम बताते हैं, पर युधिष्ठिर इन तीनों को ही झूठा दर्शन कहकर चौथे पुरुषार्थ मोक्ष (मुक्ति) की ओर इशारा करते हैं। यह संवाद महाभारत की नैतिक जटिलता दिखाता है: हर भाई का पक्ष भीतर से सही है, पर युधिष्ठिर उन सब से ऊपर उठ जाते हैं।

सार: पाँचों ने धर्म-अर्थ-काम की श्रेष्ठता पर अलग-अलग पक्ष रखे, भीम ने तीनों के समान सेवन का सन्तुलित मत दिया। पर युधिष्ठिर ने इन सब से ऊपर मोक्ष को परम कल्याण बताया, यह मानते हुए कि सब विधाता के अधीन है।

मित्रता का धर्म: किससे मैत्री हो, किससे नहीं

युधिष्ठिर ने फिर पूछा, “हे महाज्ञानी पितामह! किन मनुष्यों को सौम्य-स्वभाव कहा जाता है? किनके साथ परम सुखद मैत्री हो सकती है? हमारा मत है कि न बढ़ता धन, न सम्बन्धी, न बन्धु वह स्थान पाते हैं जो हितैषी मित्र पाते हैं। हितकर सलाह सुनने वाला और भला करने वाला मित्र अत्यन्त दुर्लभ है। इन विषयों पर विस्तार से कहिए।”

भीष्म बोले, “सुनिए, मैं आपको उन मनुष्यों के विषय में बताता हूँ जिनसे मैत्री करनी चाहिए और जिनसे नहीं। जो लोभी हो, निर्दय हो, अपने वर्ण-धर्म से च्युत हो, बेईमान, धूर्त, नीच, पापाचारी, सब पर सन्देह करने वाला, आलसी, टालमटोल करने वाला, टेढ़े स्वभाव का, सर्व-निन्दित, गुरु-द्रोही, सात कुख्यात व्यसनों में लिप्त, दुखी मित्रों को त्यागने वाला, निर्लज्ज, नास्तिक, वेद-निन्दक, असंयमी, झूठा, छली, ईर्ष्यालु, क्रूर, जुआरी, मित्र-द्रोही, और दूसरों का धन हड़पने वाला हो, ऐसे मनुष्य से बचना चाहिए। जो अपने दिए से कभी सन्तुष्ट न हो, अकारण क्रोध करे, अकारण झगड़े, और जो मित्र के अनजाने छोटे-से अपकार पर भी झगड़ा ठान ले, जो मित्र-सा बोले पर शत्रु-सा बरते, ऐसे से दूरी रखिए। मद्यप, द्वेषी, क्रोधी, करुणा-हीन, दूसरों के सुख से जलने वाला, मित्र-द्रोही, हिंसक और कृतघ्न, इन सब से मैत्री कभी न हो।

“अब उन्हें सुनिए जिनसे मैत्री हो सकती है। जो सुकुल में जन्मे हों, वाणी में मधुर और शिष्ट हों, ज्ञान-विज्ञान से युक्त, गुणवान, लोभ-रहित, परिश्रम से न थकने वाले, मित्रों के प्रति भले, कृतज्ञ, बहुश्रुत, अलोभी, प्रिय गुणों वाले, सत्य में दृढ़, जितेन्द्रिय, सुकुलीन, और निर्दोष हों, ऐसों से राजा मैत्री करे। जो थोड़े-से व्यवहार से सन्तुष्ट हो जाएँ, अकारण क्रोध न करें, अर्थ-शास्त्र के ज्ञाता हों, और रुष्ट होने पर भी मन शान्त रखें, जो आत्म-त्याग से भी मित्र की सेवा करें, जो लाल कम्बल की भाँति अपना रंग न बदलें, जो निर्धन मित्रों को क्रोधवश तिरस्कृत न करें, जो मित्रों को कुमार्ग न दिखाएँ, जो विश्वसनीय हों, धर्म-परायण हों, और सोने-ईंट को समान दृष्टि से देखें, ऐसों से मैत्री करनी चाहिए। ऐसे श्रेष्ठ पुरुषों से मैत्री करने वाले राजा का राज्य चन्द्रमा के प्रकाश की भाँति हर दिशा में फैलता है।

“उन सब दुष्टों में, हे निष्पाप, नीचतम वे हैं जो कृतघ्न हैं और मित्रों को क्षति पहुँचाते हैं। ऐसे दुराचारी परम त्याज्य हैं, यही निश्चित मत है।”

युधिष्ठिर ने कहा, “हम विस्तार से सुनना चाहते हैं। बताइए, कौन मित्र-द्रोही और कृतघ्न कहलाते हैं।”

सार: भीष्म मैत्री के दो पक्ष गिनाते हैं, किससे बचें (लोभी, कृतघ्न, मित्र-द्रोही, छली) और किनसे मैत्री करें (सुकुलीन, कृतज्ञ, अलोभी, सत्य-निष्ठ, समदर्शी)। परम त्याज्य कृतघ्न और मित्र-द्रोही हैं। युधिष्ठिर इन्हीं के विषय में विस्तार माँगते हैं, जिससे एक लम्बा आख्यान आरम्भ होता है।

गौतम और राजधर्म की कथा: कृतघ्नता का दृष्टान्त (आरम्भ)

भीष्म बोले, “मैं आपको एक पुरानी कथा सुनाता हूँ, जिसकी घटनाएँ उत्तर के म्लेच्छ-देश में घटीं। मध्य-देश का एक ब्राह्मण था, वेद-विद्या से रहित। एक सम्पन्न ग्राम देखकर वह दान की इच्छा से उसमें घुसा। उस ग्राम में एक धनवान डाकू रहता था, जो सब वर्णों के लक्षण जानता था, ब्राह्मणों का भक्त, सत्य में दृढ़, और सदा दान में लगा रहता था। उसके घर जाकर ब्राह्मण ने भिक्षा माँगी, रहने को घर और एक वर्ष की जीवन-सामग्री।

“डाकू ने उसे छोरों समेत नया वस्त्र और एक युवा विधवा स्त्री दे दी। यह सब पाकर ब्राह्मण, जिसका नाम गौतम था, हर्षित होकर उस सुविधाजनक घर में सुख से रहने लगा। वह धनुर्विद्या का अभ्यास करने लगा और प्रतिदिन, वहाँ के अन्य डाकुओं की भाँति, वन में जाकर जंगली सारसों का वध करने लगा। प्राणि-वध में निपुण होकर उसने करुणा को सदा के लिए विदा कर दिया, और डाकुओं की संगति से वह उन्हीं जैसा हो गया।

“उस डाकू-ग्राम में सुख से अनेक मास बिताते हुए उसने असंख्य सारस मारे। एक दिन एक दूसरा ब्राह्मण उस ग्राम में आया। वह चीथड़ों और मृगचर्म से ढका, जटाधारी, अति पवित्र-आचरण, वेदों का अध्येता, विनम्र, मिताहारी, ब्राह्मण-भक्त और ब्रह्मचर्य-व्रत का पालक था। वह उसी प्रदेश का था जहाँ से गौतम आया था, और गौतम का प्रिय मित्र रह चुका था। शूद्र का दिया अन्न वह कभी न लेता था, अतः वह उस डाकू-ग्राम में किसी ब्राह्मण का घर ढूँढ़ने लगा, और अन्ततः गौतम के घर पहुँचा।

“उसी समय गौतम भी वन से लौटकर अपने घर में प्रवेश कर रहा था। दोनों मित्र मिले। धनुष-तलवार से सज्जित गौतम के कन्धे पर मारे हुए सारसों का बोझ था, और उसका शरीर उस थैले से टपकते रक्त से सना था। नर-भक्षी-से दिखते, अपने वर्ण-धर्म से च्युत उस मनुष्य को घर में घुसते देख, नवागत अतिथि ने उसे पहचानकर कहा, ‘यह आप मूढ़ता से क्या कर रहे हैं? आप ब्राह्मण हैं, ब्राह्मण-कुल के वाहक। मध्य-देश के सम्मानित कुल में जन्मे होकर डाकू-से आचरण कैसे करने लगे? अपने पूर्व-कालीन प्रसिद्ध वेदज्ञ बन्धुओं को स्मरण कीजिए। उनके वंश में जन्मे होकर, हाय, आप उसके कलंक बन गए। अपने प्रयत्न से जागिए। हे द्विज! अपने जन्म से प्राप्त तेज, आचरण, विद्या, संयम और करुणा को स्मरण कर इस निवास को छोड़िए।’

“यह सुनकर गौतम ने अत्यन्त दुखी होकर उत्तर दिया, ‘हे श्रेष्ठ द्विज! मैं निर्धन हूँ, वेद-ज्ञान से भी हीन। जान लीजिए, मैं केवल धन के लिए यहाँ रहता हूँ। पर आज आपके दर्शन से मैं धन्य हूँ। हम कल साथ ही यहाँ से प्रस्थान करेंगे। आज की रात आप मेरे साथ बिताइए।’ किन्तु करुणाशील नवागत ब्राह्मण भूखा होकर भी, बार-बार आग्रह किए जाने पर भी, उस घर में कुछ छूने से बचता रहा और रात बिता दी।”

समझने की कुंजी (म्लेच्छ, मध्य-देश): म्लेच्छ-देश = वैदिक संस्कृति की सीमा के बाहर का क्षेत्र, यहाँ “उत्तर का” कहा गया है। मध्य-देश = आर्यावर्त का केन्द्रीय, सांस्कृतिक रूप से प्रतिष्ठित प्रदेश। गौतम का मध्य-देश से म्लेच्छ-डाकू-ग्राम में आकर बसना, और सारस-वध में रम जाना, उसके नैतिक पतन का संकेत है। यह कथा बताती है कि वातावरण और संगति मनुष्य के चरित्र को कैसे ढाल देती है, गौतम धीरे-धीरे डाकुओं जैसा हो जाता है।

सार: मध्य-देश का ब्राह्मण गौतम धन के लोभ में म्लेच्छ-डाकू-ग्राम में बस जाता है, करुणा छोड़कर सारस-वध करने लगता है। उसका पुराना धर्मनिष्ठ मित्र उसे चेताता है, पर उस अशुद्ध घर में अन्न तक नहीं छूता।

सारस राजधर्म से भेंट और विरूपाक्ष से धन

भीष्म बोले, “रात बीतने और श्रेष्ठ ब्राह्मण के चले जाने पर, गौतम भी अपने घर से निकलकर समुद्र की ओर चला। मार्ग में उसे कुछ समुद्र-यात्री व्यापारी मिले; उनके दल के साथ वह समुद्र की ओर बढ़ा। पर एक घाटी से गुज़रते समय एक मतवाला हाथी उस बड़े दल पर टूट पड़ा, और प्रायः सब मारे गए। किसी प्रकार बचकर गौतम उत्तर की ओर भागा, यह न जानते हुए कि कहाँ जा रहा है। दल से बिछुड़कर वह एक वन में किम्पुरुष की भाँति अकेला भटकने लगा।

“अन्त में समुद्र की ओर जाने वाले एक मार्ग पर पहुँचकर वह एक रमणीय, स्वर्गोपम वन में पहुँचा, जो वर्ष-भर फूलने-फलने वाले आम के वृक्षों, चन्दन, ताल, तमाल और अगुरु से सुशोभित था। वहाँ भारुण्ड नामक मनुष्य-मुख पक्षी और अन्य पक्षी मधुर स्वर में गाते थे। उस वन में सुनहली रेत वाले एक रमणीय समतल स्थल पर एक विशाल वट-वृक्ष खड़ा था, जिसकी गोल चोटी छाते-सी थी। उसके नीचे की भूमि सुगन्धित चन्दन-जल से सिंची, फूलों से भरी, मानो स्वयं ब्रह्मा का प्रांगण थी।

“उस मनोहर स्थल को देख गौतम प्रसन्न हुआ और प्रसन्न-चित्त बैठ गया। एक सुगन्धित मन्द वायु बहने लगी, जिससे उसकी थकान दूर हुई और वह सो गया। सूर्य अस्ताचल के पीछे छिप गया और सन्ध्या आई। तब उस स्थान को, जो उसका घर था, ब्रह्मा के लोक से लौटता एक श्रेष्ठ पक्षी आया। उसका नाम था नाडीजंघ; वह ब्रह्मा का प्रिय मित्र, सारसों का राजकुमार, महाज्ञानी, और कश्यप का पुत्र था। पृथ्वी पर वह राजधर्म नाम से प्रसिद्ध था। एक देव-कन्या का पुत्र, अति सुन्दर और विद्वान, वह अपने आभूषणों से सूर्य-सा देदीप्यमान था।

“उस पक्षी को देख गौतम विस्मित हुआ। भूख-प्यास से व्याकुल वह ब्राह्मण उसे मारने की इच्छा से ताकने लगा। राजधर्म बोला, ‘स्वागत है, हे ब्राह्मण! सौभाग्य से आज आप मेरे निवास पर आए। सूर्य अस्त हो चुका, सन्ध्या आ गई। मेरे घर आए आप आज मेरे प्रिय और श्रेष्ठ अतिथि हैं। शास्त्रोक्त विधि से मेरा सत्कार पाकर, कल प्रातः जहाँ चाहें वहाँ जा सकते हैं।’

“ये मधुर वचन सुनकर गौतम विस्मित और कौतूहल से भर गया। राजधर्म ने कहा, ‘मैं कश्यप का पुत्र हूँ, दक्ष की एक कन्या से उत्पन्न। आप आज मेरे अतिथि हैं, स्वागत है।’ फिर उसने शास्त्रोक्त विधि से उसका आतिथ्य किया, साल के फूलों की उत्तम शय्या बनाई, और भागीरथी के गहरे जल से पकड़ी बड़ी मछलियाँ तथा जलती अग्नि अतिथि को अर्पित कीं। भोजन से तृप्त गौतम को उस तपस्वी पक्षी ने अपने पंखों से पंखा झलकर थकान दूर की।

“फिर उसने अतिथि के कुल आदि का परिचय पूछा। गौतम ने केवल इतना कहा कि ‘मैं गौतम नामक ब्राह्मण हूँ’, और मौन हो गया। राजधर्म ने उसे फूलों से सुगन्धित पत्तों की कोमल शय्या दी। जब गौतम लेट गया, तो यम-समान धर्मज्ञ कश्यप-पुत्र ने उसके आगमन का कारण पूछा। गौतम बोला, ‘मैं अति निर्धन हूँ; धन कमाने के लिए समुद्र की ओर जाना चाहता हूँ।’ कश्यप-पुत्र ने प्रसन्न होकर कहा, ‘चिन्ता न कीजिए। आप सफल होंगे और धन लेकर घर लौटेंगे। बृहस्पति ने धन-अर्जन के चार उपाय बताए हैं: उत्तराधिकार, भाग्य या देव-कृपा से अकस्मात प्राप्ति, परिश्रम से अर्जन, और मित्रों की सहायता से अर्जन। मैं आपका मित्र बन गया हूँ; मैं ऐसा प्रयत्न करूँगा कि आप धन पा सकें।’

“प्रातः होते ही पक्षी बोला, ‘इसी मार्ग से जाइए, सफल होंगे। यहाँ से लगभग तीन योजन दूर विरूपाक्ष नामक एक महाबली राक्षस-राज है, मेरा मित्र। उसके पास जाइए; मेरे अनुरोध से वह आपको मनचाहा धन देगा।’ गौतम मार्ग के अमृत-तुल्य मीठे फल खाता, चन्दन-वृक्षों की शीतल छाया में, शीघ्र चलता हुआ मेरुव्रज नगर पहुँचा, जो पत्थर के विशाल द्वारों, ऊँची दीवारों और परिखा से घिरा था। राजधर्म के मित्र द्वारा भेजे प्रिय अतिथि के रूप में वह राक्षस-राज को ज्ञात हुआ।

“विरूपाक्ष ने उसका सहर्ष स्वागत किया, और कुल-आचार आदि पूछे। ब्राह्मण ने अन्य प्रश्नों का उत्तर न देकर केवल अपना नाम और वंश बताया। राक्षस ने उसे ब्राह्मण-तेज और वेद-अध्ययन से हीन देखकर निवास-स्थान पूछा। तब उसने पूछा, ‘आपका निवास कहाँ है, और आपकी पत्नी किस कुल की है? बिना भय के सच बताइए।’ गौतम बोला, ‘मैं जन्म से मध्य-देश का हूँ, पर शिकारियों के ग्राम में रहता हूँ। मैंने एक विधवा शूद्रा से विवाह किया है। यह सब सच है।’

“राक्षस-राज सोचने लगा, ‘यह जन्म से ब्राह्मण है, और मेरे महान मित्र राजधर्म का मित्र भी। उसी कश्यप-पुत्र ने इसे मेरे पास भेजा है। मुझे अपने मित्र को प्रिय लगने वाला कर्म करना चाहिए। आज कार्तिक के इस पुण्य-दिन पर मेरे घर एक हज़ार श्रेष्ठ ब्राह्मणों का सत्कार होना है। इस गौतम का भी उन्हीं के साथ सत्कार होगा और मैं इसे भी धन दूँगा।’

“तभी स्नान कर, चन्दन-पुष्प से सज्जित, लम्बे वस्त्र पहने एक हज़ार विद्वान ब्राह्मण आए। विरूपाक्ष ने विधिपूर्वक उनका सत्कार किया, उनके लिए मृगचर्म और कुश के आसन बिछवाए, और तिल, हरी दूब और जल से उनकी पूजा की। कुछ को विश्वेदेव, पितर और अग्नि-देवों का प्रतिनिधि चुना गया। फिर घी-शहद से बने उत्तम भोजन से भरे सुनहले पात्र दिए गए। प्रति वर्ष आषाढ़ और माघ की पूर्णिमा को, और विशेषतः कार्तिक की पूर्णिमा को, वह राक्षस-राज ब्राह्मणों को सोना, चाँदी, रत्न, मणि, मोती, हीरे, मृगचर्म आदि विपुल धन दान करता था।

“विरूपाक्ष ने ब्राह्मणों से कहा, ‘इन रत्नों-मणियों में से जितना चाहें और ले जा सकें, ले लीजिए। और जिन सुनहले पात्रों में भोजन किया है, उन्हें भी ले जाइए।’ सब ब्राह्मणों ने अपनी-अपनी इच्छा-भर धन लिया। फिर राक्षस-राज ने अपने राक्षसों को रोककर कहा, ‘आज एक दिन, हे द्विजगण, आपको यहाँ राक्षसों से कोई भय नहीं। इच्छानुसार विहार कर, फिर शीघ्र चले जाइए।’ सब ब्राह्मण तेज़ी से चारों दिशाओं में चले गए। गौतम भी बहुत-सा सोना उठाकर चल पड़ा।”

समझने की कुंजी (राजधर्म नाम, योजन): सारस-राज का नाम ही “राजधर्म” है, जो इस पूरे प्रसंग की गूँज है: राज-धर्म के उपदेश के बीच एक ऐसा पात्र जो आतिथ्य और मैत्री के राजधर्म का साकार रूप है। एक राक्षस (विरूपाक्ष) भी इस कथा में ब्राह्मणों का सत्कार करने वाला, मित्र-वचन का मान रखने वाला धर्मात्मा है, जबकि ब्राह्मण गौतम कृतघ्न। महाभारत यहाँ जाति या योनि से नहीं, आचरण से धर्म आँकता है। योजन = प्राचीन दूरी-माप, मोटे तौर पर 8 से 13 किलोमीटर के बीच; “तीन योजन” यानी लगभग 25 से 40 किलोमीटर।

सार: सारस-राज राजधर्म गौतम का अतिथि-सत्कार कर उसे धन-अर्जन का मार्ग बताता है और अपने राक्षस-मित्र विरूपाक्ष के पास भेजता है। विरूपाक्ष कार्तिक-पूर्णिमा के दान-उत्सव में गौतम को विपुल सोना देता है, और वह उसे लेकर लौट पड़ता है।

कृतघ्नता का घोर पाप: गौतम राजधर्म को मारता है

The treacherous Gautama beneath a great banyan tree striking down the kindly crane-king Rajadharma who had sheltered him, gold scattered at his feet.

भीष्म बोले, “सोना लेकर गौतम उसी वट-वृक्ष तक पहुँचा जहाँ उसने सारस से भेंट की थी। थका, श्रान्त और भूखा वह वहीं बैठ गया। तभी मित्र-प्रेमी राजधर्म आया, ‘स्वागत है’ कहकर गौतम को प्रसन्न किया, पंखों से पंखा झलकर उसकी थकान दूर की, उसका सत्कार किया और भोजन की व्यवस्था की। भोजन कर तृप्त होकर गौतम सोचने लगा, ‘यह चमकीले सोने का भारी बोझ मैंने लोभ और मूढ़ता से उठा लिया है। मार्ग लम्बा है, और रास्ते के लिए मेरे पास भोजन नहीं। प्राण-रक्षा कैसे होगी?’

“बहुत सोचने पर भी उसे मार्ग के लिए कोई भोजन न सूझा। तब उस कृतघ्न मनुष्य के मन में यह विचार उठा, ‘यह सारस-राज, इतना बड़ा और मांस से भरा, मेरे पास ही ठहरा है। इसे मारकर थैले में बाँध, मैं यहाँ से शीघ्र निकल जाऊँगा।’

“उस वट के नीचे, अतिथि की रक्षा के लिए, पक्षी-राज ने ऊँची-धधकती ज्वालाओं वाली अग्नि जलाकर रखी थी। आग के एक ओर वह विश्वासपूर्वक सो गया। उस कृतघ्न, दुष्टात्मा नीच ने सोते हुए अपने यजमान को मारने की तैयारी की। उस धधकती अग्नि की सहायता से उसने विश्वासी पक्षी को मार डाला, और मारकर हर्षित हुआ; उसे यह न सूझा कि उसके किए में कोई पाप है। पंख और रोएँ नोचकर, उसने उस आग पर मांस भूना, और सोने समेत उसे लेकर वहाँ से तेज़ी से भागा।

“अगले दिन राक्षस-राज विरूपाक्ष ने अपने पुत्र से कहा, ‘हाय पुत्र! आज मुझे श्रेष्ठ पक्षी राजधर्म दिखाई नहीं दे रहा। प्रति प्रातः वह ब्रह्म-लोक जाकर पितामह की वन्दना करता है, और लौटते समय मुझसे भेंट किए बिना घर नहीं जाता। दो प्रातः और दो रातें बीत गईं, पर वह नहीं आया; मेरा मन अशान्त है। वह गौतम, जो यहाँ आया था, वेद-हीन और ब्राह्मण-तेज से रहित है। वह मेरे मित्र के निवास पर गया था। मुझे भारी भय है कि उस नीच ब्राह्मण ने राजधर्म को मार डाला। उसके लक्षणों से मैंने उसे पहचान लिया था, करुणा-हीन, क्रूर-मुख, और डाकू-सा दुष्ट। शीघ्र जाकर पता लगाओ कि वह पवित्रात्मा पक्षी जीवित है या नहीं।’

“पिता के आदेश से राजकुमार अन्य राक्षसों सहित तीव्र गति से उस वट के नीचे पहुँचा, और वहाँ राजधर्म के अवशेष देखे, पंख, हड्डियाँ और पैरों से रहित कटा शरीर। शोक से रोते हुए राक्षस गौतम को पकड़ने दौड़े, और शीघ्र ही उसे पकड़ लिया। उसे बन्दी बनाकर वे मेरुव्रज लौटे, और राजा को राजधर्म का विकृत शव तथा वह कृतघ्न नीच गौतम दिखाया।

“मित्र के अवशेष देख राजा अपने मन्त्रियों और पुरोहित सहित ज़ोर-ज़ोर से रोने लगा। राक्षस-राज के समस्त नगर में, स्त्री-पुरुष-बालक सब शोक में डूब गए। तब राजा ने अपने पुत्र से कहा, ‘इस पापी को मारो। ये राक्षस इसके मांस से तृप्त हों।’ किन्तु भयानक पराक्रमी अनेक राक्षसों ने उस पापी का मांस खाने में अनिच्छा प्रकट की। उन रात्रिचरों ने सिर झुकाकर कहा, ‘इस नीचतम मनुष्य को डाकुओं को दे दीजिए। आप हमें यह पापी भोजन के लिए न दें।’ राजा ने कहा, ‘ऐसा ही हो। इस कृतघ्न को बिना देर डाकुओं को दे दीजिए।’

“तब लांस और फरसों से सज्जित राक्षसों ने उस नीच को टुकड़े-टुकड़े कर डाकुओं को दे दिया। पर वे डाकू भी उसका मांस खाने से इनकार कर गए। नर-भक्षी होते हुए भी वे कृतघ्न को न खाएँगे। ब्रह्म-हत्यारे, मद्यप, चोर, व्रत-भ्रष्ट, सबके लिए प्रायश्चित है, पर कृतघ्न के लिए कोई प्रायश्चित नहीं। जो मित्र को क्षति पहुँचाता और कृतघ्न होता है, उस क्रूर नीच को नर-भक्षी तक नहीं खाते, न मुर्दा-खोर कीड़े।”

सार: थका-भूखा गौतम, मार्ग के भोजन के लोभ में, अपने ही मित्र और मेज़बान सारस-राज राजधर्म को सोते में मारकर भून लेता है। विरूपाक्ष राजधर्म के न लौटने पर शंकित होता है, गौतम पकड़ा जाता है। राक्षस तक और डाकू तक उस कृतघ्न का मांस खाने से इनकार कर देते हैं, क्योंकि कृतघ्नता का कोई प्रायश्चित नहीं।

सुरभि का अमृत, राजधर्म का पुनर्जीवन और कथा का मर्म

भीष्म बोले, “राक्षस-राज ने उस सारस-राज के लिए रत्न, गन्ध और बहुमूल्य वस्त्रों से सजी चिता बनवाई। पक्षी-राज के शव के साथ उसमें आग लगाकर उसने विधिपूर्वक मित्र की अन्त्येष्टि की। उसी समय, दक्ष-पुत्री शुभ देवी सुरभि (कामधेनु) उस चिता के ऊपर आकाश में प्रकट हुई। उसके स्तन दूध से भरे थे। उसके मुख से दूध-मिश्रित फेन राजधर्म की चिता पर गिरा, और सारस-राज पुनर्जीवित हो उठा। उठकर वह अपने मित्र विरूपाक्ष के पास गया।

“उसी समय देवराज इन्द्र विरूपाक्ष के नगर में आए और बोले, ‘सौभाग्य से आपने सारस-राज को पुनर्जीवित कर दिया।’ फिर इन्द्र ने पितामह द्वारा इस पक्षी पर दिए पुराने शाप की कथा सुनाई, ‘एक बार यह सारस-राज ब्रह्म-लोक में, जब इसकी उपस्थिति अपेक्षित थी, अनुपस्थित रहा। क्रुद्ध होकर पितामह ने कहा, चूँकि यह नीच सारस आज मेरी सभा में उपस्थित नहीं हुआ, अतः यह दुष्टात्मा शीघ्र (पृथ्वी छोड़ने योग्य) मरेगा नहीं। इसी वचन के कारण, गौतम द्वारा मारा जाकर भी, अमृत-सिंचन से यह पुनः जीवित हुआ है।’

“इन्द्र के मौन होने पर राजधर्म ने उन्हें नमन कर कहा, ‘हे देवश्रेष्ठ! यदि आपका हृदय मुझ पर कृपालु है, तो मेरे प्रिय मित्र गौतम को भी पुनर्जीवित कीजिए।’ यह सुनकर वासव (इन्द्र) ने ब्राह्मण गौतम पर अमृत छिड़ककर उसे जीवित कर दिया। सारस-राज ने अपने मित्र गौतम के पास जाकर, जो अब भी कन्धे पर सोने का बोझ लिए था, उसे गले लगाया और हर्षित हुआ। फिर वह कृतघ्न-कर्मा गौतम को उसके धन समेत विदा कर अपने निवास लौट गया, और यथासमय ब्रह्म-लोक गया, जहाँ पितामह ने अतिथि-सा उसका सत्कार किया।

“गौतम भी शिकारियों के ग्राम में लौटकर अपनी शूद्रा पत्नी से अनेक पापी सन्तानें उत्पन्न करता रहा। देवताओं ने उस पर भारी शाप दिया कि कुछ वर्षों में अनेक सन्तानें उत्पन्न कर वह कृतघ्न पापी अनेक वर्षों तक घोर नरक में गिरेगा। यह सब, हे भारत, मुझे पूर्व में नारद ने सुनाया था। इसी से, हे भरतश्रेष्ठ, मैंने आपको यह सम्पूर्ण कथा सुनाई।

“कृतघ्न को यश कहाँ? उसका स्थान कहाँ? सुख कहाँ? कृतघ्न विश्वास के योग्य नहीं। कृतघ्न कभी (दण्ड से) बच नहीं सकता। किसी को मित्र की क्षति नहीं करनी चाहिए; जो मित्र को क्षति पहुँचाता है, वह घोर और शाश्वत नरक में गिरता है। सबको कृतज्ञ होना चाहिए और मित्रों का हित चाहना चाहिए। मित्र से सब कुछ पाया जा सकता है, सम्मान, भोग, और संकट से उद्धार। बुद्धिमान अपने मित्र का सर्वोत्तम आदर से सत्कार करे। कृतघ्न, निर्लज्ज, पापी मनुष्य का त्याग करे। मित्र-द्रोही अपने वंश का कलंक और मनुष्यों में नीचतम है। यही उस पापी के लक्षण हैं जो कृतघ्नता से कलंकित और मित्र-द्रोही है। और क्या सुनना चाहते हैं?” यह सुनकर युधिष्ठिर अति प्रसन्न हुए।

एक उप-कथा: इस आख्यान की नैतिक जटिलता पर रुकिए। राजधर्म, जिसकी हत्या स्वयं हुई, इन्द्र से अपने हत्यारे मित्र गौतम के पुनर्जीवन की भीख माँगता है, यह मैत्री-धर्म की पराकाष्ठा है। पर कथा गौतम को आसान क्षमा नहीं देती: पुनर्जीवित होकर भी वह सुधरता नहीं, अनेक पापी सन्तानें उत्पन्न करता है, और देव-शाप से अन्ततः नरक में गिरता है। महाभारत यहाँ दो सत्य साथ रखता है, मित्र की उदारता असीम हो सकती है, पर कृतघ्न का अपना कर्म-फल उसे नहीं छोड़ता।

समझने की कुंजी (सुरभि, कृतज्ञता): सुरभि = दक्ष-पुत्री कामधेनु, इच्छाएँ पूर्ण करने वाली दिव्य गौ; उसके मुख का दूध-फेन अमृत-तुल्य है। पितामह के शाप का अर्थ था कि राजधर्म तुरन्त “मुक्त” न हो, इसी से वह मारा जाकर भी फिर जी उठता है। कथा का मूल सन्देश: कृतज्ञता परम धर्म है, और मित्र-द्रोह व कृतघ्नता ऐसा पाप जिसका कोई प्रायश्चित नहीं।

सार: देवी सुरभि के अमृत-फेन से राजधर्म पुनर्जीवित होता है, और वह इन्द्र से माँगकर अपने हत्यारे मित्र गौतम को भी जीवित करा देता है। फिर भी गौतम कृतघ्न ही रहता है और अन्ततः नरकगामी होता है। भीष्म का निष्कर्ष: कृतघ्नता और मित्र-द्रोह परम अक्षम्य पाप हैं।

मोक्ष-धर्म पर्व का आरम्भ: शोक की औषधि और सेनजित की कथा

युधिष्ठिर ने कहा, “हे पितामह! आपने संकट में पड़े मनुष्य के धर्म और राज-धर्म पर उपदेश दिया। अब उन श्रेष्ठ धर्मों को बताइए जो चारों आश्रमों में रहने वालों के हैं।”

भीष्म बोले, “धर्म के अनेक द्वार हैं; उसका पालन कभी निष्फल नहीं जाता। हर आश्रम के लिए कर्तव्य निर्धारित हैं। उनके फल अदृश्य हैं, परलोक में मिलते हैं; पर आत्मा की ओर निर्दिष्ट तप का फल इसी लोक में मिलता है। जब मनुष्य ठीक से विचार करता है, तब वह जान लेता है कि संसार की वस्तुएँ तृण-तुल्य मूल्यहीन हैं, और उनसे विरक्त हो जाता है। दोष-भरे इस संसार में हर बुद्धिमान को आत्मा की मुक्ति के लिए यत्न करना चाहिए।”

युधिष्ठिर ने पूछा, “हे पितामह! धन के नाश पर, या पत्नी, पुत्र, पिता की मृत्यु पर, मनुष्य किस मनोभाव से अपना शोक मारे?”

भीष्म बोले, “इस सम्बन्ध में सेनजित के दरबार में आए एक ब्राह्मण-मित्र की पुरानी कथा है। पुत्र-शोक से सन्तप्त राजा सेनजित को देखकर ब्राह्मण ने कहा, ‘आप क्यों मोहित हैं? आप स्वयं शोक के पात्र हैं, फिर दूसरों के लिए क्यों शोक करते हैं? कुछ दिन बाद दूसरे आपके लिए शोक करेंगे, और उनके लिए और दूसरे। आप, मैं, और आपके सेवक, सब उसी स्थान को जाएँगे जहाँ से आए हैं।’

“सेनजित ने पूछा, ‘हे विद्वान ब्राह्मण! वह कौन-सी बुद्धि, तप, समाधि, ज्ञान या विद्या है, जिसे पाकर आप शोक के वश नहीं होते?’ ब्राह्मण बोला, ‘देखिए, सब प्राणी, श्रेष्ठ, मध्यम और निम्न, अपने-अपने कर्मों से शोक में बँधे हैं। मैं अपने को भी अपना नहीं मानता; पूरे संसार को अपना मानता हूँ, और यह सब जितना मेरा है उतना ही दूसरों का। इस विचार के कारण शोक मुझ तक नहीं पहुँचता। समुद्र पर तैरते दो काठ के टुकड़े जैसे कभी मिलते कभी बिछुड़ते हैं, वैसा ही प्राणियों का मिलन है। पुत्र, पौत्र, बन्धु, सब ऐसे ही हैं; इनसे स्नेह व्यर्थ है, क्योंकि वियोग निश्चित है।

“‘आपका पुत्र एक अदृश्य लोक से आया था और अदृश्य होकर चला गया। न उसने आपको जाना, न आपने उसे। आप कौन हैं, और किसके लिए शोक करते हैं? शोक इच्छा-रूपी रोग से उपजता है, और सुख उस रोग के मिटने से। सुख-दुःख मनुष्यों के लिए चक्र पर घूमते हैं; कोई सदा दुःख नहीं भोगता, कोई सदा सुख नहीं। शरीर ही दोनों का आश्रय है। सब सुख-दुःख भाग्य पर निर्भर हैं, न मित्र सुख के कारण हैं, न शत्रु दुःख के; सुख उसी को मिलता है जिसके लिए वह नियत है। सुख हो या दुःख, प्रिय हो या अप्रिय, जो आ पड़े उसे अविचल हृदय से भोगना चाहिए।

“‘जिस वस्तु में “यह मेरा” का भाव होता है, वही शोक का स्रोत बनती है; और जो त्याग दी जाती हैं, वे सुख का स्रोत बनती हैं। इन्द्रिय-सुख या स्वर्ग-सुख, उस सुख के सोलहवें भाग को भी नहीं छूते जो सब कामनाओं के नाश से उपजता है। जो उस परम आत्मा को जानता है जिससे सब उपजता और जिसमें सब लीन होता है, उसे शोक छू नहीं सकता। जब मनुष्य किसी से भय नहीं पाता और किसी को भयभीत नहीं करता, जब उसमें न इच्छा रहती है न द्वेष, तब वह ब्रह्म-अवस्था को पाता है।’

“इसी प्रसंग में, हे राजन्, पिंगला के वे श्लोक सुने जाते हैं जिनसे उसने एक अति प्रतिकूल समय में भी शाश्वत पुण्य पाया। पिंगला नामक एक गणिका, संकेत-स्थल पर पहुँचकर, एक संयोगवश अपने प्रेमी की संगति से वंचित रह गई। उस घोर दुःख के क्षण में उसने आत्मा की शान्ति पा ली।

“पिंगला बोली, ‘हाय! मैं अनेक वर्ष उन्माद में डूबी, उस प्रिय आत्मा की उपेक्षा करती रही जिसमें केवल शान्ति है। मृत्यु मेरे द्वार पर है, पर मैंने पहले उस पवित्र सार के पास नहीं गई। अब मैं जाग गई हूँ, अज्ञान की नींद से उठ गई हूँ। मैं अब इच्छा के वश नहीं। मानव प्रेमी, जो वस्तुतः नरक के मूर्त रूप हैं, अब मुझे काम से नहीं ठग सकेंगे। आशा और इच्छा से मुक्त होकर मनुष्य सुख से सोता है। पिंगला, हर आशा-इच्छा को विदा कर, अब सुख से सोती है।’ इन वचनों से प्रबुद्ध होकर राजा सेनजित ने शोक त्यागकर परम आनन्द पाया।”

समझने की कुंजी (मोक्ष-धर्म पर्व, पिंगला का दृष्टान्त): यहाँ से शान्ति पर्व का तीसरा भाग, मोक्ष-धर्म पर्व, आरम्भ होता है, जहाँ बल राज-नीति से हटकर मुक्ति, वैराग्य और आत्म-ज्ञान पर आ जाता है। पिंगला का दृष्टान्त (जो भागवत में भी आता है) सिखाता है कि घोर निराशा भी वैराग्य का द्वार बन सकती है, गणिका जब बाहरी प्रेमी से वंचित होती है, तब “भीतर के प्रिय” यानी आत्मा की ओर मुड़ती है। “एक खम्भे और नौ द्वारों वाला घर” शरीर का रूपक है (नौ इन्द्रिय-द्वार)।

सार: शोक की औषधि है यह बोध कि मिलन-वियोग, सुख-दुःख चक्र पर घूमते हैं और सब भाग्य व कर्म के अधीन है; “मेरा” का भाव ही शोक का मूल है। सेनजित और पिंगला, दोनों इसी ज्ञान से वैराग्य पाकर शान्त होते हैं।

पिता-पुत्र संवाद: मृत्यु का पीछा और सत्य से अमरत्व

युधिष्ठिर ने कहा, “हे पितामह! काल, जो हर रचित वस्तु का नाशक है, बीतता जा रहा है। बताइए, वह कौन-सा कल्याण है जिसे खोजना चाहिए?”

भीष्म बोले, “इस सम्बन्ध में पिता-पुत्र के संवाद की पुरानी कथा है। वेदों के अध्ययन में लीन एक ब्राह्मण को एक अति बुद्धिमान पुत्र हुआ, जो इसी से मेधावी कहलाया। मुक्ति के धर्म और लोक-व्यवहार, दोनों का ज्ञाता वह पुत्र एक दिन अपने वेदाध्ययनी पिता से बोला, ‘पिताजी! जब मनुष्य का आयु-काल इतनी शीघ्रता से बीत रहा है, तब बुद्धिमान को क्या करना चाहिए? कर्तव्यों का वह क्रम बताइए जिसका मैं पालन करूँ।’

“पिता बोले, ‘हे पुत्र! ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए पहले वेदों का अध्ययन करे। फिर पितरों के उद्धार के लिए सन्तान चाहे। फिर अग्नि स्थापित कर विधिपूर्वक यज्ञ करे। और अन्त में चिन्तन के लिए वन में प्रवेश करे।’

“पुत्र बोला, ‘जब संसार चारों ओर से घिरा और प्रहार-ग्रस्त है, जब उस पर ऐसी अनिवार्य और घातक वस्तुएँ टूटती हैं, तब आप इतने शान्त भाव से ये बातें कैसे कहते हैं?’ पिता ने पूछा, ‘संसार पर कौन-सी घातक वस्तुएँ टूटती हैं? आप मुझे क्यों डराते हैं?’ पुत्र बोला, ‘मृत्यु वह है जो संसार पर प्रहार करती है। जरा (बुढ़ापा) इसे घेरती है। और वे अनिवार्य वस्तुएँ जो आती-जाती रहती हैं, वे रातें हैं, जो निरन्तर आयु को घटाती हैं। जब मैं जानता हूँ कि मृत्यु किसी की प्रतीक्षा नहीं करती, तब मैं ज्ञान का कवच ओढ़े बिना समय कैसे बिताऊँ?

“‘हर बीतती रात आयु का अंश घटाती है, इसलिए बुद्धिमान दिन को निष्फल माने। मृत्यु मनुष्य को तब उठा ले जाती है जब वह फूल चुन रहा होता है और मन कहीं और लगा होता है, जैसे बाघिन भेड़ को उठा ले जाती है। इसी आज अपना कल्याण-कर्म पूरा करूँ। कल के कर्म आज करूँ, दोपहर के पूर्वाह्न में। मृत्यु यह नहीं देखती कि उसके शिकार के कर्म पूरे हुए या नहीं। कौन जानता है कि मृत्यु आज ही न आ जाए?

“‘गाँव और नगर में (मनुष्यों के बीच) बसने की आसक्ति को मृत्यु का मुख कहा गया है; वन इन्द्रियों को बाँधने का बाड़ा है, ऐसा श्रुति कहती है। जो मन-वचन-कर्म से किसी प्राणी की हिंसा नहीं करता, उसे जीवन और सम्पत्ति के नाशक भी हानि नहीं पहुँचाते। मृत्यु के दूतों (रोग और जरा) को सत्य के सिवा कोई नहीं रोक सकता, जो असत्य को निगल जाता है। सत्य में ही अमरत्व है। इसलिए सत्य का व्रत धारण करूँ, सत्य को ही अपना वेद बनाऊँ, और इन्द्रियों को रोककर सत्य से मृत्यु को जीतूँ।

“‘अमरत्व और मृत्यु, दोनों शरीर में ही रोपे हैं। अज्ञान और विवेक-नाश से मृत्यु आती है, सत्य से अमरत्व। इसलिए मैं हिंसा से विरत होकर सत्य साधूँगा, काम-क्रोध को लाँघकर सुख-दुःख को समान दृष्टि से देखूँगा, और शान्ति पाकर अमर की भाँति मृत्यु से बचूँगा। मैं ब्रह्म से, ब्रह्म के द्वारा उपजा हूँ; निःसन्तान होते हुए भी ब्रह्म को समर्पित होकर ब्रह्म में लौटूँगा। मुझे उद्धार के लिए पुत्र की आवश्यकता नहीं। ज्ञान-समान कोई नेत्र नहीं, सत्य-समान कोई तप नहीं, आसक्ति-समान कोई शोक नहीं, और त्याग-समान कोई सुख नहीं।’ भीष्म ने कहा, “हे राजन्! आप भी उसी पिता की भाँति आचरण कीजिए जो पुत्र के वचन सुनकर सत्य-धर्म में लीन हो गया।”

सार: मेधावी पुत्र अपने पिता को विधिवत आश्रम-क्रम पर रुकने नहीं देता, मृत्यु निरन्तर पास आ रही है, इसलिए कल्याण-कर्म आज ही करना चाहिए। उसका मार्ग: हिंसा-त्याग, सत्य-व्रत और इन्द्रिय-निग्रह, क्योंकि सत्य में ही अमरत्व है। भीष्म युधिष्ठिर को यही अपनाने को कहते हैं।

सम्पाक और मंकि: निर्धनता और त्याग का सुख

युधिष्ठिर ने पूछा, “हे पितामह! धनी और निर्धन, जो भिन्न-भिन्न आचरण में रहते हैं, उन्हें सुख-दुःख कहाँ से और कैसे आता है?”

भीष्म बोले, “इस सम्बन्ध में सम्पाक के गाए वचन उद्धृत हैं, जिसने शान्ति और मुक्ति पा ली थी। पूर्व-काल में एक ब्राह्मण, कुलक्षणा पत्नी, फटे वस्त्र और भूख से दुखी, त्याग-व्रत में रहता हुआ, मुझसे ये वचन कह गया, ‘जन्म के दिन से ही नाना सुख-दुःख मनुष्य पर आते हैं। यदि वह दोनों को भाग्य का कर्म मान ले, तो न सुख आने पर हर्षित हो, न दुःख आने पर खिन्न। यदि घर और प्रिय वस्तुएँ त्यागकर आप विचरें, तो सच्चा सुख चखेंगे। सब कुछ त्यागा हुआ मनुष्य सुख से सोता और सुख से जागता है। इस संसार में पूर्ण निर्धनता ही सुख है, यह कल्याण का स्रोत है, भय से मुक्ति है।

“‘तीनों लोकों पर दृष्टि डालने पर भी मुझे ऐसा कोई नहीं दिखता जो शुद्ध-आचरण, आसक्ति-रहित निर्धन के समान हो। मैंने निर्धनता और राज्य को तराज़ू पर तौला, निर्धनता राज्य से भारी निकली। राजा, सम्पन्न होकर भी, चिन्ता से व्याकुल और मृत्यु के मुख में रहता है; पर निर्धन, सब आशाओं से मुक्त, न आग से, न शत्रु से, न मृत्यु से, न चोरों से डरता। देवता भी ऐसे को सराहते हैं जो अपनी इच्छानुसार विचरता, भुजा को तकिया बना धरती पर सोता, और शान्ति से युक्त है। त्याग के बिना न सुख मिलता है, न परम कल्याण, न सुख की नींद। इसलिए सब त्यागकर सुख अपना बनाइए।’ इसी से, हे राजन्, मैं त्याग को परम मानता हूँ।”

युधिष्ठिर ने पूछा, “यदि कोई दान-यज्ञ करना चाहे पर धन न पाए और धन की तृष्णा उसे घेर ले, तो वह सुख के लिए क्या करे?” भीष्म बोले, “जो सुख-दुःख, मान-अपमान को समान दृष्टि से देखता है, जो सांसारिक भोग के लिए यत्न नहीं करता, सत्यभाषी है, सब आसक्ति से मुक्त है, और कर्म की इच्छा नहीं रखता, वही सुखी है। ये पाँच ही पूर्ण शान्ति या मुक्ति के साधन हैं, इन्हें ही स्वर्ग, धर्म और परम सुख कहा गया है।

“इस सम्बन्ध में मंकि का गाया वचन सुनिए। धन का इच्छुक मंकि बार-बार निराश हुआ। अन्त में बची-खुची सम्पत्ति से उसने हल के लिए दो बछड़े खरीदे। एक दिन जुए में जुते वे बछड़े, मार्ग पर बैठे एक ऊँट को देखकर बिदककर उसकी गर्दन पर जा गिरे। क्रुद्ध ऊँट तेज़ी से उठ खड़ा हुआ और दोनों असहाय बछड़ों को गर्दन के दोनों ओर लटकाए दौड़ पड़ा। उन्हें मृत्यु के मुख में देख मंकि बोला, ‘यदि धन भाग्य से नियत न हो, तो कुशल मनुष्य भी पूरे यत्न से उसे नहीं पा सकता। मैंने कितने ही उपायों से धन कमाना चाहा। देखो, मेरी सम्पत्ति पर यह विपत्ति! मेरे प्रिय बछड़े ऊँट की गर्दन पर रत्नों-से लटक रहे हैं! यह केवल भाग्य का फल है। प्रयत्न व्यर्थ है जहाँ संयोग है; और यदि प्रयत्न को कारण माना भी जाए, तो गहराई से खोजने पर भाग्य ही तल में मिलता है।

“‘इसलिए सुख चाहने वाला सब आसक्ति त्यागे। हे मेरी लोभ-ग्रस्त आत्मा! बार-बार ठगी जाकर भी आप आसक्ति से क्यों मुक्त नहीं होतीं? आपने बार-बार संचित धन खोया है। शर्म है मेरी मूढ़ता पर, मैं आपका खिलौना बन गया! हे इच्छा! मैं आपकी जड़ जानता हूँ, आप संकल्प से उपजती हैं। इसलिए मैं संकल्प को त्यागूँगा, और आप जड़ समेत नष्ट हो जाएँगी। धन की इच्छा कभी सुखकर नहीं, मिल जाए तो चिन्ता, खो जाए तो मृत्यु-सी पीड़ा। गंगा के मीठे जल की भाँति धन केवल तृष्णा बढ़ाता है। हे इच्छा, मुझे छोड़! मैं अब सत्त्व-गुण का आश्रय लूँगा, और ब्रह्म में प्रवेश कर राजा-सा सुख से रहूँगा!’ ऐसी बुद्धि से मंकि ने सब इच्छाएँ त्यागकर परम कल्याण-धाम ब्रह्म को पाया। दो बछड़ों के नाश ने ही उसे अमरत्व तक पहुँचा दिया, क्योंकि उसने इच्छा की जड़ ही काट दी।”

एक उप-कथा: मंकि की कथा भाग्य और पुरुषार्थ के सनातन प्रश्न को छूती है। बछड़ों का ऊँट की गर्दन पर लटकना एक विचित्र, लगभग हास्यपूर्ण दुर्घटना है, पर मंकि इसे प्रयत्न की सीमा के प्रतीक के रूप में पढ़ता है। ध्यान दीजिए कि वह “इच्छा” को सम्बोधित करके आत्म-संवाद करता है, मानो इच्छा कोई बाहरी शत्रु हो; और निष्कर्ष यह कि इच्छा की जड़ “संकल्प” (मन का निश्चय) है। जड़ काटो, तो इच्छा-रूपी वृक्ष स्वयं गिर जाता है।

सार: सम्पाक निर्धनता को राज्य से श्रेष्ठ बताता है, क्योंकि निर्धन भय-मुक्त है। मंकि अपने दो बछड़ों के अद्भुत नाश से सीखता है कि धन भाग्याधीन है और इच्छा की जड़ संकल्प है; उसे काटकर वह ब्रह्म-सुख पाता है। भीष्म त्याग और समदर्शिता को परम सुख का साधन बताते हैं।

जनक, वोध्य और प्रह्लाद-अजगर: आसक्ति-मुक्ति के छह गुरु

भीष्म बोले, “इसी सम्बन्ध में विदेह-राज जनक के वचन उद्धृत हैं, जिन्होंने आत्म-शान्ति पाई थी, ‘मेरा धन असीम है, और साथ ही मेरे पास कुछ नहीं। यदि मेरी समस्त मिथिला आग में जल जाए, तो मेरी कोई हानि नहीं।’ इसी विषय पर, आसक्ति से मुक्ति पर, वोध्य के वचन भी सुनिए। एक बार नहुष-पुत्र ययाति ने ऋषि वोध्य से, जिसने इच्छा-त्याग से शान्ति पाई थी, पूछा, ‘हे महाज्ञानी! मुझे शान्ति का उपदेश दीजिए। वह कौन-सी बुद्धि है जिसके बल पर आप सब कर्मों से विलग, शान्त-चित्त संसार में विचरते हैं?’

“वोध्य बोला, ‘मैं दूसरों के उपदेशों के अनुसार आचरण करता हूँ, पर स्वयं किसी को उपदेश नहीं देता। फिर भी जिन संकेतों से मेरा आचरण ढला है, उन्हें बताता हूँ; आप मनन से उनका मर्म पकड़िए। मेरे छह गुरु हैं, पिंगला, ओस्प्रे (मत्स्य-भक्षी पक्षी), सर्प, वन की मधुमक्खी, बाण बनाने वाला, और कन्या।’ भीष्म ने आगे बताया, ‘आशा हृदय को अति विचलित करती है; आशा-त्याग परम सुख है। आशा को अपेक्षा-शून्यता में बदलकर पिंगला शान्ति से सोई। चोंच में मांस लिए ओस्प्रे को, जिन्हें मांस नहीं मिला, वे अन्य पक्षी सताते और मारते हैं; एक ओस्प्रे ने मांस का सर्वथा त्याग कर सुख पाया। अपने लिए घर बनाना दुःख का कारण है; सर्प दूसरे के बनाए बिल में रहकर सुख से जीता है। तपस्वी, वन की मधुमक्खियों की भाँति किसी को कष्ट दिए बिना भिक्षा से सुख से जीते हैं।

“‘एक बाण-निर्माता अपने काम में इतना तल्लीन था कि पास से गुज़रते राजा को भी न देखा, यह एकाग्रता का गुरु है। जब बहुत-से साथ हों, विवाद होता है; जब दो भी साथ रहें, बातचीत होती ही है। इसलिए मैं उस कन्या की कथा की भाँति अकेला विचरता हूँ, जिसकी कलाई में समुद्र-शंखों के कंगन थे, और दो कंगन परस्पर टकराकर शब्द करते, अतः उसने एक-एक कर सब उतार दिए, केवल एक ही रहने दिया, जो शब्द नहीं करता था।’”

युधिष्ठिर ने पूछा, “हे मानव-आचरण के ज्ञाता! किस आचरण से मनुष्य इस संसार में शोक-मुक्त होकर सफल होता है, और उत्तम गति पाता है?” भीष्म बोले, “इस सम्बन्ध में प्रह्लाद और ऋषि अजगर के संवाद की कथा है। एक बार महाज्ञानी राजा प्रह्लाद ने एक शान्त, संयमी ब्राह्मण से पूछा, ‘इच्छा-रहित, शुद्ध-आत्मा, विनम्र, संयमी, कर्म की इच्छा से रहित, मधुर-भाषी, गरिमामय, आप बालक-से सरल जीते हैं। न किसी लाभ की कामना करते, न हानि पर शोक करते। आप सदा सन्तुष्ट हैं और संसार की किसी वस्तु की परवाह नहीं करते। जब सब प्राणी इच्छा और राग के प्रवाह में बहे जा रहे हैं, आप धर्म, अर्थ और काम के सब कर्मों के प्रति उदासीन हैं। आप मुक्त आत्मा-से, सब कुछ केवल साक्षी-भाव से देखते हैं। आपकी यह बुद्धि, विद्या और आचरण क्या है?’

“उस ब्राह्मण ने मधुर, गम्भीर वचनों में उत्तर दिया, ‘हे प्रह्लाद! प्राणियों की उत्पत्ति, वृद्धि, क्षय और मृत्यु, किसी समझ में आने वाले कारण से बँधे नहीं; इसी से मैं न हर्ष करता हूँ न शोक। सब प्रवृत्तियाँ प्राणियों के अपने स्वभाव से बहती हैं; सब वस्तुएँ अपने-अपने स्वभाव पर निर्भर हैं, इसलिए मैं किसी से प्रसन्न नहीं होता। हर मिलन में बिछुड़ने की प्रवृत्ति है, हर प्राप्ति का अन्त नाश में है; इसलिए मैं किसी वस्तु की प्राप्ति पर हृदय नहीं टिकाता। जल, थल और आकाश के सब प्राणियों का अन्त मैं देखता हूँ; अतः सब को एक-समान स्वभाव वाला मानकर मैं निश्चिन्त, शान्ति से सोता हूँ।

“‘यदि बिना श्रम भरपूर भोजन मिले, तो भोग लेता हूँ; न मिले, तो अनेक दिन बिना खाए रहता हूँ। कभी लोग बहुमूल्य व्यंजन खिलाते हैं, कभी थोड़ा, कभी कुछ भी नहीं। कभी ऊँचे पलंग पर सोता हूँ, कभी खुली भूमि पर। कभी चीथड़े पहनता हूँ, कभी मृगचर्म, कभी बहुमूल्य वस्त्र। बिना प्रयत्न मिले और धर्म-संगत भोग को मैं नहीं ठुकराता, पर दुर्लभ वस्तु के लिए यत्न नहीं करता। मेरा यह कठोर व्रत अजगर कहलाता है। यह व्रत अमरत्व देता है, शुभ और शोक-रहित है, ज्ञानियों के मत से युक्त, और मूढ़ों द्वारा अपालित। शुद्ध हृदय से मैं इसका पालन करता हूँ, और सब दोष जीतकर, तृष्णा से मुक्त होकर मनुष्यों के बीच विचरता हूँ।’ भीष्म बोले, “जो आसक्ति, भय, लोभ, मूढ़ता और क्रोध से मुक्त होकर इस अजगर-व्रत का पालन करता है, वह सुख से दिन बिताता है।”

समझने की कुंजी (अजगर-व्रत, छह गुरु): अजगर-व्रत = अजगर-सर्प की भाँति आचरण, जो हिले-डुले बिना, जो स्वयं सामने आ जाए उसी से तृप्त रहता है; यानी प्रयत्न-रहित सन्तोष। जनक (“विदेह”) राज्य के स्वामी होकर भी पूर्ण अनासक्त हैं, “मिथिला जले तो मेरी हानि नहीं” इसी अनासक्ति का प्रसिद्ध वाक्य है। वोध्य के “छह गुरु” प्रकृति और जीवन से सीखी शिक्षाएँ हैं (बाद के अवधूत-गीता के चौबीस गुरुओं की यह छोटी पूर्व-छाया है): आशा-त्याग, अपरिग्रह, अनासक्त-निवास, अहिंसक भिक्षा, एकाग्रता, और एकाकीपन।

सार: जनक राज्य में रहकर भी अनासक्त हैं; वोध्य प्रकृति के छह गुरुओं से अनासक्ति सीखते हैं; और अजगर-व्रती ब्राह्मण प्रह्लाद को प्रयत्न-रहित सन्तोष का धर्म बताता है, जो सुख-दुःख, भोग-अभाव को समान भाव से स्वीकारता है।

इन्द्र और कश्यप: सियार के रूप में सन्तोष का उपदेश

युधिष्ठिर ने पूछा, “हे पितामह! बन्धु, कर्म, धन या बुद्धि, इनमें से किसे मनुष्य का आश्रय मानें?” भीष्म बोले, “बुद्धि ही प्राणियों का आश्रय है, परम सम्पत्ति, परम सुख और साधु-जनों के मत में स्वर्ग। बुद्धि से ही बलि, प्रह्लाद, नमुचि और मंकि ने सांसारिक सम्पन्नता खोकर भी कल्याण पाया। इस सम्बन्ध में इन्द्र और कश्यप के संवाद की कथा है।

“एक बार एक सम्पन्न वैश्य, अपने ऐश्वर्य के मद में, असावधानी से रथ हाँकते हुए, कठोर-व्रती तपस्वी ऋषि-पुत्र कश्यप को गिरा गया। भूमि पर पड़ा वह युवक, घोर पीड़ा में, क्रोध और निराशा से बोला, ‘मैं प्राण त्याग दूँगा। निर्धन को इस संसार में जीवन की क्या आवश्यकता?’ जब वह मौन, व्याकुल, तेज-हीन, मृत्यु के निकट पड़ा था, तब इन्द्र सियार के रूप में आकर बोले, ‘सब निम्न प्राणी मनुष्य-जन्म चाहते हैं; मनुष्यों में ब्राह्मणत्व अति वांछित। आप मनुष्य हैं, ब्राह्मण हैं, और वेदज्ञ ब्राह्मण भी। अति दुर्लभ को पाकर भी मूढ़ता से प्राण त्यागना आपको शोभा नहीं देता!

“‘हाय, वे धन्य हैं जिनके हाथ हैं! मैं हाथ वालों के पद की उत्कट इच्छा करता हूँ। हम हाथों के लिए वैसे ही लालायित हैं जैसे आप धन के लिए। हाथ से बड़ी कोई सम्पत्ति नहीं। देखिए, मैं अपने शरीर में घुसा यह काँटा नहीं निकाल सकता, न मुझे काटते कीड़े मसल सकता हूँ! दस अँगुलियों वाले दो हाथ जिनके हैं, वे काँटे-कीड़े हटा सकते हैं, वर्षा-शीत-ताप से आश्रय बना सकते हैं, उत्तम वस्त्र-अन्न-शय्या भोग सकते हैं, और गायों आदि पशुओं से बोझ ढुलवा सकते हैं। जो जीभ-रहित, असहाय, अल्प-बल और हाथ-रहित हैं, वे ये सब दुःख सहते हैं। सौभाग्य से, हे तपस्वी, आप उनके समान नहीं, न सियार, न कीड़ा, न चूहा, न मेंढक। इतने लाभ से आपको सन्तुष्ट होना चाहिए! और आप तो श्रेष्ठ ब्राह्मण हैं, यह सोचकर कितने सुखी होने चाहिए!

“‘ये कीड़े मुझे काट रहे हैं, हाथ न होने से मैं इन्हें हटा नहीं सकता, यह मेरी दुर्दशा देखिए! फिर भी मैं प्राण नहीं त्यागता, क्योंकि ऐसा करना घोर पाप है और मुझे और भी निम्न योनि में डाल देगा। सियार की यह योनि दुखी होते हुए भी सहनीय है; इससे नीची अनेक योनियाँ और दुखी हैं। मनुष्य धन पाकर राज्य चाहता है, राज्य पाकर देवत्व, देवत्व पाकर देवराज-पद; किसी अवस्था में सन्तोष नहीं। सन्तोष इच्छित वस्तु पाने से नहीं आता। जल की प्रचुरता पर भी प्यास नहीं बुझती; नया धन पाते ही तृष्णा की आग नई लकड़ी पाकर और भड़कती है।

“‘आपमें शोक है, पर आनन्द भी; सुख-दुःख दोनों आपमें बसते हैं, फिर शोक को क्यों झुकते हैं? सब इच्छाओं और कर्मों के मूल, यानी बुद्धि और इन्द्रियों को, पिंजरे में बन्द पक्षियों की भाँति रोक लेना चाहिए। दूसरा सिर या तीसरा हाथ नहीं काटा जा सकता; जो वस्तु है ही नहीं, उससे भय नहीं। जिसने किसी सुख का अनुभव नहीं किया, वह उसकी इच्छा नहीं करता; इच्छाएँ तो स्पर्श, दृष्टि और श्रवण के अनुभव से उपजती हैं।

“‘मेरे पूर्व-जन्म में मेरे पास बहुत-सी व्यर्थ विद्या थी। मैं तर्क खोजता, श्रद्धा कम रखता, वेदों का निन्दक था, सभाओं में केवल तर्क बोलता, श्रुति-वचनों का अनादर करता, और ब्राह्मणों से दर्प-भरे स्वर में बोलता। मैं नास्तिक, सर्व-संशयी, अज्ञानी होते हुए भी अपनी विद्या पर अभिमानी था। इसी पाप का फल यह सियार-योनि है। यदि सैकड़ों दिन-रात बाद भी मैं फिर मनुष्य-योनि पाऊँ, तो सन्तोष से, यज्ञ-दान में लगकर, जानने योग्य को जानूँगा और त्यागने योग्य को त्यागूँगा।’

“यह सुनकर कश्यप उठ खड़े हुए, बोले, ‘अरे! आप तो ज्ञान और बुद्धि से सम्पन्न हैं! मैं विस्मित हूँ!’ तब ज्ञान से विस्तृत दृष्टि वाले ब्राह्मण ने जाना कि वह सियार-वेश में स्वयं इन्द्र है। कश्यप ने उस देवराज की पूजा की, और उनकी अनुमति लेकर अपने आश्रम लौटे।”

एक उप-कथा: सियार-वेशधारी इन्द्र की यह उलटी शिक्षा-विधि मार्मिक है, देवराज स्वयं को एक हीन प्राणी बताकर ब्राह्मण को उसके अनमोल मनुष्य-जन्म की याद दिलाते हैं। सियार बार-बार कहता है, “हाथ वाले धन्य हैं”, यानी जो हम सहज पाए हुए मानकर तुच्छ समझते हैं (हाथ, मनुष्य-तन, ब्राह्मण-जन्म), वही दूसरों के लिए परम दुर्लभ है। और सियार का अपना अतीत, तर्क-घमंडी, श्रद्धा-हीन, वेद-निन्दक, इस बात की चेतावनी है कि कोरी बुद्धि बिना श्रद्धा के पतन की ओर ले जाती है।

सार: आत्म-हत्या को उद्यत निर्धन ब्राह्मण कश्यप को इन्द्र सियार-रूप में सन्तोष का पाठ पढ़ाते हैं, मनुष्य-जन्म दुर्लभ है, तृष्णा कभी तृप्त नहीं होती, और बुद्धि (श्रद्धा-सहित) ही परम आश्रय है। सियार का अपना सियार-जन्म उसके पूर्व-जन्म के तर्क-अभिमान का फल है।

कर्म-फल की अनिवार्यता: छाया-सा पीछा करता पूर्व-कर्म

युधिष्ठिर ने पूछा, “हे पितामह! क्या दान, यज्ञ, तप और गुरु-सेवा बुद्धि और परम कल्याण देते हैं?” भीष्म बोले, “यदि मन काम-क्रोध आदि से ग्रस्त हो, तो वह पाप की ओर दौड़ता है; और पाप-कर्म से मनुष्य को पीड़ादायी लोकों में रहना पड़ता है। पापी दरिद्र-घरों में जन्म लेते और बार-बार भूख, शोक, भय और मृत्यु की पीड़ा सहते हैं। जो सत्कर्मी, श्रद्धालु और जितेन्द्रिय हैं, वे सम्पन्न होकर बार-बार उत्सव, स्वर्ग और सुख में रमते हैं।

“जो पूर्व-कर्म से नियत है, वह कर्ता का पीछा करता है, चाहे वह उसे पीछे छोड़ने का कितना ही यत्न करे। वह उसके सोने पर सोता है, उसके सब कर्मों के साथ चलता है। छाया की भाँति वह विश्राम पर विश्राम करता, गति पर गति करता, और कर्म पर कर्म करता है। जो कर्म मनुष्य करता है, उसका फल उसे अवश्य भोगना पड़ता है। पूर्व-जन्म के कर्म अपने उचित समय पर फल देते हैं, जैसे फूल-फल बिना किसी बाहरी प्रयत्न के अपने ऋतु में आते हैं।

“जीव माता के गर्भ में ही अपने कर्मानुसार सुख-दुःख भोगने लगता है। बचपन, यौवन या वृद्धावस्था, जीवन के जिस काल में जो शुभ-अशुभ कर्म किया जाता है, उसका फल अगले जन्म में ठीक उसी काल में मिलता है। जैसे बछड़ा हज़ार गायों के बीच भी अपनी माता को पहचानकर उसके पास जाता है, वैसे ही पूर्व-कर्म नए जन्म में अपने कर्ता को पहचानकर उस तक पहुँचता है। जल में धोने से मैला वस्त्र स्वच्छ होता है; वैसे ही पश्चात्ताप में जलते मनुष्य उचित तप से अनन्त सुख पाते हैं। जैसे आकाश में पक्षियों या जल में मछलियों का मार्ग चिह्नित नहीं होता, वैसे ही जिनकी आत्मा ज्ञान से शुद्ध हो गई, उनका मार्ग किसी से अंकित नहीं होता। उचित विवेक से मनुष्य वही करे जो उसके लिए श्रेयस्कर हो; यही बुद्धि और परम कल्याण का साधन है।”

सार: पूर्व-कर्म छाया की भाँति मनुष्य का पीछा करता और अपने नियत समय पर अवश्य फल देता है, गर्भ से ही और अगले जन्म में भी उसी काल में। पश्चात्ताप और उचित तप पापों को धो सकते हैं, और ज्ञान से शुद्ध आत्मा का मार्ग अंकित नहीं होता।

भृगु-भरद्वाज संवाद: सृष्टि की उत्पत्ति और पंचभूत

युधिष्ठिर ने पूछा, “हे पितामह! यह चराचर विश्व किससे रचा गया? प्रलय में किसमें लीन होता है? समुद्र, आकाश, पर्वत, मेघ, भूमि, अग्नि और वायु सहित यह विश्व किसने रचा? वर्णों का यह विभाजन कहाँ से आया? जीवों का जीवन कैसा है? मरे हुए कहाँ जाते हैं?”

भीष्म बोले, “इस सम्बन्ध में भृगु के भरद्वाज को दिए उत्तर की कथा है। कैलास-शिखर पर तेज से देदीप्यमान महर्षि भृगु को देख भरद्वाज ने यही प्रश्न पूछे। भृगु ने कहा, ‘एक आदि-पुरुष हैं, जिन्हें महर्षि मानस कहते हैं, अनादि, अनन्त, अव्यय, अमर, अव्यक्त, शाश्वत और अपरिवर्तनीय। उन्हीं से प्राणी जन्मते और उन्हीं में लीन होते हैं। उन्होंने पहले महत् नामक दिव्य तत्त्व रचा, महत् ने अहंकार (चेतना), उसने आकाश। आकाश से जल, जल से अग्नि और वायु, और अग्नि-वायु के मिलन से पृथ्वी उपजी। स्वयम्भू मानस ने तब ऊर्जा से भरा एक दिव्य कमल रचा; उस कमल से वेदों के सागर ब्रह्मा प्रकट हुए।

“‘ये पाँच भूत ही महान ब्रह्म हैं। पर्वत उसकी हड्डियाँ, पृथ्वी मांस-मेद, समुद्र रक्त, आकाश उदर, वायु श्वास, अग्नि तेज, नदियाँ नस-नाड़ियाँ, और सूर्य-चन्द्र उसके दो नेत्र हैं। ऊपर का आकाश उसका शिर, पृथ्वी दो पैर, और दिशाएँ भुजाएँ हैं। वह अनन्त नाम से भी जाना जाता है।’

“भरद्वाज ने आकाश, दिशाओं, पृथ्वी और वायु का विस्तार पूछा। भृगु ने कहा, ‘जो आकाश आप देखते हैं वह अनन्त है; सूर्य-चन्द्र अपनी किरणों से परे नहीं देख सकते। जहाँ उनकी किरणें नहीं पहुँचतीं, वहाँ स्वयं-प्रकाशित ज्योतियाँ हैं। भूमि के परे जल के सागर हैं, जल के परे अन्धकार, अन्धकार के परे फिर जल, और उसके परे अग्नि। नीचे पाताल के परे जल, जल के परे महासर्पों का लोक, फिर आकाश, फिर जल, इस प्रकार जल और आकाश अनन्त रूप से बारी-बारी फैले हैं। कमल वस्तुतः पृथ्वी है, जो ब्रह्मा-रूपी मानस को आसन देने रची गई; सुमेरु उस कमल की कर्णिका बना, और उसी में रहकर ब्रह्मा ने सब लोक रचे।’

“भरद्वाज ने पूछा, ‘जल, अग्नि, वायु और पृथ्वी कैसे उपजे?’ भृगु ने ब्रह्म-कल्प की वह आकाशवाणी सुनाई जो ध्यानस्थ ऋषियों ने सुनी थी, ‘पहले केवल अनन्त, निश्चल आकाश था। फिर अन्धकार के भीतर अन्धकार-सा जल उपजा। जल के दाब से वायु उठी, बड़े शब्द के साथ। वायु और जल के घर्षण से, ऊपर की ओर ज्वाला वाली महाबली अग्नि प्रकट हुई, जिसने अन्धकार को मिटाया। वायु की सहायता से अग्नि ने आकाश और जल को मिलाया, ठोस हुई, और गिरते समय अग्नि का द्रव-अंश जमकर पृथ्वी बना। यह पृथ्वी ही सब रस, गन्ध, द्रव और प्राणियों का मूल है।’

“भरद्वाज ने पूछा कि जब ब्रह्मा ने हज़ारों प्राणी रचे, तो केवल इन पाँच भूतों को ही ‘महाभूत’ (महान प्राणी) क्यों कहा गया? भृगु ने उत्तर दिया, ‘जो अनन्त या विशाल की कोटि में हों, वे ही “महान” कहलाते हैं, इसी से ये पाँच महाभूत कहे जाते हैं। गति वायु है; जो शब्द सुना जाता है वह आकाश; भीतरी ताप अग्नि; द्रव-रस जल; और ठोस मांस-हड्डी पृथ्वी। प्राणियों के शरीर इन्हीं पाँच भूतों से बने हैं, और पाँच इन्द्रियाँ भी इन्हीं के अंश हैं, कान आकाश का, नाक पृथ्वी का, जिह्वा जल का, त्वचा वायु का, और नेत्र अग्नि (प्रकाश) का।’

“भरद्वाज ने शंका की कि यदि स्थावर (वृक्ष आदि) भी पंचभूत के बने हैं, तो उनमें ताप, गति या इन्द्रियाँ क्यों नहीं दिखतीं? भृगु ने सिद्ध किया कि वृक्षों में भी पाँचों भूत हैं, घनी होते हुए भी उनमें आकाश है (इसी से वे फूलते-फलते हैं); ताप है (इसी से पत्ते सूखकर झड़ते हैं); स्पर्श-बोध है; ध्वनि सुनते हैं (इसी से वायु-गर्जन से फल झड़ते हैं); लता पेड़ पर चढ़ती है, अतः दृष्टि है; सुगन्ध-दुर्गन्ध से प्रभावित होते हैं, अतः घ्राण है; जड़ों से जल पीते और रोग पाते-मिटाते हैं, अतः रस-बोध है। इसलिए वृक्ष सजीव हैं, निर्जीव नहीं।

“भृगु ने आगे शरीर में पंचभूत और गन्ध-रस-रूप-स्पर्श-शब्द के भेद, तथा प्राण, अपान, समान, उदान और व्यान, इन पाँच वायुओं का विस्तृत वर्णन किया, जो जीव को जीवित रखती और उसके भीतर भोजन-पाचन, गति और वाणी का संचालन करती हैं।”

समझने की कुंजी (पंचभूत, पंच-प्राण): पंचभूत = पाँच मूल तत्त्व, आकाश, वायु, अग्नि (तेज), जल, पृथ्वी, जिनसे सारा भौतिक जगत और शरीर बना है; पाँच इन्द्रियाँ इन्हीं से जुड़ी हैं। पंच-प्राण = शरीर की पाँच जीवन-वायुएँ: प्राण (श्वास/मस्तिष्क), अपान (मल-मूत्र-निष्कासन, अधोगामी), समान (पाचन, मध्य), उदान (वाणी-डकार, ऊर्ध्वगामी), व्यान (सब सन्धियों में, क्रिया-बल)। यह भृगु-संवाद महाभारत का सांख्य-शैली का सृष्टि-विज्ञान है, अव्यक्त “मानस” से क्रमशः महत् → अहंकार → पंचभूत का प्रकटीकरण।

सार: भृगु बताते हैं कि अव्यक्त “मानस” से महत्, अहंकार और फिर आकाश-वायु-अग्नि-जल-पृथ्वी क्रमशः उपजे; कमल पर ब्रह्मा प्रकट हुए। पाँच महाभूत ही ब्रह्म का शरीर हैं, और वृक्षों समेत सब प्राणी इन्हीं से बने व सजीव हैं, पाँच इन्द्रियों और पाँच प्राण-वायुओं सहित।

जीव और देह: मृत्यु के पार आत्मा का स्वरूप

भरद्वाज ने गहरी शंका उठाई, “यदि वायु हमें जिलाती और चलाती है, और अग्नि भोजन पचाती है, तो जीवन तुच्छ-सा जान पड़ता है। प्राणी के मरते समय जिसे ‘जीव’ कहते हैं, वह निकलता दिखाई नहीं देता; केवल श्वास रुकता है और भीतरी ताप बुझ जाता है। यदि जीवन केवल वायु होता, तो निकलकर वह बाहरी वायु-सागर में मिल जाता, जैसे जल कुएँ में या दीप की लौ अग्नि में मिलकर अपना अलग अस्तित्व खो देती है। पंचभूत से बने इस शरीर में ‘जीवन’ है, यह हम कैसे कहें? जो मर गया, पक्षियों ने खा लिया, या पर्वत से गिरकर चूर हो गया, या अग्नि में जल गया, वह फिर कैसे जीवित होगा? कटे वृक्ष की जड़ नहीं उगती, केवल बीज अंकुरित होते हैं। तो जो मर गया, वह फिर कहाँ आता है? जो मरते हैं, वे मरकर नष्ट होते हैं; केवल बीज से बीज चलता है।”

भृगु ने उत्तर दिया, “जीव का, दान का, या हमारे किसी कर्म का नाश नहीं होता। मरने वाला प्राणी केवल दूसरे रूप में चला जाता है। केवल शरीर घुलता है; देह पर आश्रित होकर भी जीव शरीर के नष्ट होने पर नष्ट नहीं होता। जैसे ईंधन जल जाने पर अग्नि दिखाई नहीं देती, वैसे ही शरीर-नाश के बाद जीव दिखाई नहीं देता।” भरद्वाज ने तर्क किया कि ईंधन समाप्त होने पर अग्नि तो वस्तुतः बुझ जाती है, मानो नष्ट हो जाती है। भृगु बोले, “अग्नि नष्ट नहीं होती; आश्रय न रहने पर वह आकाश में मिल जाती है और सूक्ष्म होने से दिखाई नहीं देती। वैसे ही जीव, शरीर छोड़कर, अपनी अति-सूक्ष्मता के कारण आकाश में रहता है, दिखाई नहीं देता। अग्नि (ताप) ही प्राण आदि वायुओं को धारण करती है; उसी ताप को जीवन या जीव-कर्ता जानिए। श्वास रुकने पर वह ताप बुझता है, शरीर निश्चेष्ट होकर गिरता और पृथ्वी में मिल जाता है।

“शरीर में जो श्वास है वह आकाश में, और ताप उस श्वास के साथ मिल जाता है। ये तीन (आकाश, वायु, अग्नि) मिल जाते हैं; शेष दो (जल, पृथ्वी) पृथ्वी-रूप में साथ रहते हैं।” भरद्वाज ने फिर पूछा कि जीव के लक्षण क्या हैं, क्योंकि शरीर के टूटने पर वह दिखता नहीं; और जब मन कहीं और लगा हो तो कान सुनते हुए भी नहीं सुनते, नेत्र देखते हुए भी नहीं देखते, तो फिर वह कौन है जो सुख-दुःख भोगता, क्रोध करता, सोचता और बोलता है?

“भृगु बोले, ‘मन भी पंचभूत से ही बना है, अतः इन कर्मों का मूल वह नहीं। केवल एक भीतरी आत्मा ही शरीर को धारण करती है। वही गन्ध, रस, शब्द, स्पर्श और रूप का अनुभव करती है। वह आत्मा सब अंगों में व्याप्त रहकर, पाँच गुणों वाले मन की और पंचभूत-शरीर की साक्षी है। वही सुख-दुःख अनुभव करती है, और उसके अलग होने पर शरीर इन्हें नहीं अनुभव करता। समस्त विश्व जल से बना है, जल सब देहधारियों का रूप है, और उस जल में वह आत्मा है जो मन में प्रकट होती है। जब आत्मा सामान्य गुणों से युक्त होती है, वह क्षेत्रज्ञ कहलाती है; जब उन गुणों से मुक्त होती है, परमात्मा। वही सृष्टा ब्रह्म है, जो सब में बसता है, कमल पर जल-बिन्दु की भाँति शरीर में रहता है।

“‘सत्त्व, रज और तम जीव-कर्ता के गुण हैं। आत्मा में चेतना है और वह जीवन-गुणों सहित रहती है। आत्मा भिन्न-भिन्न रूपों में लिपटकर एक देह से दूसरी देह में जाती है, अदृश्य, अनलक्षित। जिसे मूढ़ “मृत्यु” कहते हैं, वह केवल देह का घुलना है; जीव-कर्ता का नाश नहीं। ज्ञानी अपनी सूक्ष्म बुद्धि से उस आत्मा को देखते हैं। मिताहारी, पाप-रहित, योग-निष्ठ मनुष्य हर रात, निद्रा से पूर्व और पश्चात, अपनी आत्मा से अपनी आत्मा को देख लेता है। सन्तुष्ट हृदय से, सब शुभ-अशुभ कर्म त्यागकर, अपनी आत्मा पर टिककर अनन्त सुख पाया जा सकता है।’”

समझने की कुंजी (क्षेत्रज्ञ और परमात्मा): क्षेत्रज्ञ = “क्षेत्र (शरीर) को जानने वाला”, यानी देह-मन के साथ जुड़ी, गुण-युक्त आत्मा (व्यष्टि चेतना)। परमात्मा = उन्हीं गुणों से मुक्त, शुद्ध सर्वव्यापी आत्मा (समष्टि चेतना)। भृगु का तर्क भौतिकवादी आपत्ति का उत्तर है: अग्नि के रूपक से वे दिखाते हैं कि अदृश्य हो जाना नाश नहीं है। आत्मा देह की साक्षी है, कर्ता या भोक्ता “मन” नहीं, और मृत्यु केवल देह-वस्त्र बदलना है, यह गीता के देहान्तर-प्राप्ति वाले तर्क की प्रतिध्वनि है।

सार: भरद्वाज की भौतिकवादी शंका, कि देह-नाश ही सब कुछ का अन्त है, का उत्तर भृगु अग्नि के रूपक से देते हैं: जीव नष्ट नहीं होता, सूक्ष्म होकर अदृश्य हो जाता और नई देह धारण करता है। अनुभोक्ता मन नहीं, साक्षी आत्मा है, जो गुण-युक्त हो तो क्षेत्रज्ञ, गुण-मुक्त हो तो परमात्मा कहलाती है।

वर्णों की उत्पत्ति: रंग से नहीं, कर्म और गुण से

भृगु बोले, “ब्रह्मा ने पहले कुछ ब्राह्मण रचे, जो प्रजापति कहलाए, सूर्य-अग्नि-से तेजस्वी, उस आदि-पुरुष की ऊर्जा से उपजे। फिर उन्होंने सत्य, धर्म, तप, सनातन वेद, सब पुण्य-कर्म और पवित्रता रची, ताकि प्राणी इन्हें साधकर स्वर्ग पाएँ। इसके बाद देव, दानव, गन्धर्व, दैत्य, असुर, यक्ष, राक्षस, सर्प, पिशाच, और चारों वर्णों, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, सहित मनुष्य रचे। ब्राह्मणों का वर्ण श्वेत, क्षत्रियों का रक्त, वैश्यों का पीत, और शूद्रों का कृष्ण हुआ।”

भरद्वाज ने आपत्ति की, “यदि चारों वर्णों का भेद केवल रंग (गुण) से है, तो सब वर्ण तो आपस में घुले-मिले जान पड़ते हैं। काम, क्रोध, भय, लोभ, शोक, चिन्ता, भूख और थकान सब मनुष्यों पर समान रूप से छाते हैं। सब के शरीर पसीना, मल-मूत्र, कफ, पित्त और रक्त निकालते हैं। फिर मनुष्य गुणों से कैसे बाँटे जाएँ?”

भृगु ने उत्तर दिया, “वस्तुतः वर्णों में कोई मूल भेद नहीं। आरम्भ में सारा संसार ब्राह्मण ही था। ब्रह्मा ने सबको समान रचा; मनुष्य अपने कर्मों से भिन्न वर्णों में बँटे। जो काम-भोग में रमे, कठोरता और क्रोध से युक्त, साहसी पर धर्म-कर्म से उदासीन हुए, ये रजोगुणी ब्राह्मण क्षत्रिय बने। जो अपने कर्तव्य की उपेक्षा कर सत्त्व और रज, दोनों गुणों से युक्त होकर गो-पालन और कृषि में लगे, वे वैश्य बने। जो असत्य और हिंसा में रमे, लोभी, आजीविका के लिए सब कर्म करने वाले, शुद्ध-आचरण से गिरकर तमोगुणी हुए, वे शूद्र बने। इस प्रकार अपने-अपने कर्मों से अलग होकर ब्राह्मण अपने वर्ण से च्युत होकर अन्य तीन वर्णों के सदस्य बने।

“इसलिए चारों वर्णों को सदा सब पुण्य-कर्म और यज्ञ करने का अधिकार है। ब्रह्मा ने आरम्भ में सबको समान ही रचा था। केवल लोभ से अनेक च्युत होकर अज्ञान में पड़े। जो हर रचित वस्तु को परम ब्रह्म जानने में असमर्थ हैं, वे (वास्तव में) ब्राह्मण नहीं; च्युत होकर वे भिन्न (हीन) कोटियों के सदस्य बन गए, और ज्ञान की ज्योति खोकर पिशाच, राक्षस, प्रेत और नाना म्लेच्छ-योनियों में जन्म लेते हैं।”

भरद्वाज ने पूछा, “किन कर्मों से मनुष्य ब्राह्मण होता है, किनसे क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र?” भृगु बोले, “वह ब्राह्मण है जो जात आदि संस्कारों से शुद्ध हो, शुद्ध-आचरण हो, वेदाध्ययन में लगा हो, छह नित्य-कर्मों (दोनों सन्ध्या-स्नान, मन्त्र-जप, हवन, देव-पूजन, अतिथि-सत्कार और विश्वेदेवों को अन्न-अर्पण) में निरत हो, गुरु-भक्त हो, और सत्य व व्रत में लगा हो। जिसमें सत्य, दान, अहिंसा, करुणा, लज्जा, उदारता और तप हो, वही ब्राह्मण है। जो युद्ध-कर्म करे, वेद पढ़े, दान दे और (प्रजा से) धन ले, वह क्षत्रिय है। जो गो-पालन, कृषि और धन-अर्जन में लगे, शुद्ध-आचरण हो और वेद पढ़े, वह वैश्य है। जो हर प्रकार का भोजन खाने में रुचि रखे, हर कर्म करे, अशुद्ध-आचरण हो, और वेद न पढ़े, वह शूद्र है।

“यदि ये लक्षण शूद्र में दिखें और ब्राह्मण में न दिखें, तो वह शूद्र, शूद्र नहीं, और वह ब्राह्मण, ब्राह्मण नहीं। लोभ और क्रोध को पूरे हृदय से रोकना चाहिए, यही ज्ञान का परम फल है। मनुष्य अपनी सम्पन्नता को क्रोध से, तप को अभिमान से, ज्ञान को मान-अपमान से, और आत्मा को भ्रम से बचाए। जो बुद्धिमान फल की इच्छा बिना कर्म करे, जिसका सारा धन दान के लिए हो, और जो नित्य हवन करे, वही सच्चा संन्यासी है। सब प्राणियों का मित्र बने, हिंसा से बचे, सब परिग्रह त्यागकर अपनी बुद्धि से इन्द्रियों का स्वामी बने। ऐसा मनुष्य यहाँ निर्भय रहता और परलोक में निर्भय-धाम पाता है।”

एक उप-कथा: यह भृगु-संवाद का परम क्रान्तिकारी अंश है। पहले भृगु वर्णों को रंग (श्वेत-रक्त-पीत-कृष्ण) से बँटा बताते हैं, पर भरद्वाज की पैनी आपत्ति, “सबका रक्त, पसीना, भूख तो एक-से हैं” के बाद भृगु स्वयं पलटकर कहते हैं: “वस्तुतः वर्णों में कोई भेद नहीं; आरम्भ में सब ब्राह्मण ही थे।” यानी वर्ण जन्म से नहीं, कर्म और गुण से बनता है, यदि शूद्र-लक्षण ब्राह्मण में दिखें तो वह ब्राह्मण नहीं, और इसका उलटा भी सच है। महाभारत यहाँ अपने ही पूर्व-कथित कठोर वर्ण-विधान के भीतर एक गहरा प्रश्न-चिह्न रख देता है, और इस तनाव को छिपाता नहीं।

सार: भृगु पहले वर्णों को रंग से बँटा बताते हैं, पर भरद्वाज के तर्क पर मानते हैं कि मूल भेद नहीं, आरम्भ में सब ब्राह्मण थे, और कर्म-गुण से ही वर्ण बने। वर्ण की कसौटी आचरण है, जन्म नहीं; सच्चा ब्राह्मण वह है जिसमें सत्य, दान, अहिंसा, करुणा और तप हो।

मूल: महाभारत (कृष्णद्वैपायन व्यास), शान्ति पर्व; गीता प्रेस गोरखपुर परम्परा।