कुन्तिभोज के अन्तःपुर का एक कक्ष, और उसमें बैठी एक कन्या सूर्य को उगते देख रही है। उसके पास एक मन्त्र है। क्रोधी दुर्वासा उसके पिता के घर अतिथि रहे थे, और उनके हर अनुचित बर्ताव को अनदेखा करके की गई सेवा से प्रसन्न होकर कह गए थे, “हे सुन्दर मुख वाली भद्रे, आप धर्म की माता होंगी। जिन देवताओं को आप बुलाएँगी, वे आपकी आज्ञा मानेंगे।” आज वह केवल यह देखना चाहती है कि यह मन्त्र सच है या नहीं। सहस्र किरणों वाले देव आ खड़े होते हैं, अपने को दो भागों में बाँटकर, एक से आकाश में, दूसरे से उसके आगे धरती पर। काँपती हुई कन्या उनसे लौट जाने को कहती है, और देव कहते हैं कि वे व्यर्थ आने का विचार सह नहीं सकते; वे उसे और उस ब्राह्मण को भस्म कर देंगे जिसने यह मन्त्र दिया। निर्दोष ब्राह्मण को बचाने के लिए वह कहती है, “हे देव, मुझे आप-सा एक पुत्र हो।” जो पुत्र जन्मता है, वह कुण्डल और कवच पहने आता है, और पिता का मान रखने की इच्छा से माँ उसे जल में डाल देती है। व्यास के महाभारत में यह कथा कुन्ती स्वयं सुनाती हैं, बरसों बाद, वन में, व्यास के सामने, जब उनके सब पुत्र जीत चुके हैं और वह एक पुत्र मर चुका है।
पाँच पुत्र और एक गिनती
पाण्डु अपनी दोनों पत्नियों, कुन्ती और माद्री, को लेकर वन में हैं, और एक शाप ने उनसे सन्तान का मार्ग छीन लिया है। आदि पर्व में वे कुन्ती से कहते हैं कि किसी श्रेष्ठ पुरुष से सन्तान पाइए; कुन्ती पहले संकोच में पड़ती हैं, फिर अपना रहस्य खोलती हैं, कन्यावस्था का वह मन्त्र जिससे वे किसी भी देवता को बुला सकती हैं। सूर्य का नाम वे नहीं लेतीं। यज्ञ करके वे धर्म को बुलाती हैं, और युधिष्ठिर जन्मते हैं। फिर वायु को, और माँगती हैं, “ऐसा पुत्र दीजिए जो महान् बल और विशाल अंगों वाला हो और सबके अहंकार को चूर कर सके”; वह शिशु एक दिन बाघ की आहट पर उठ खड़ी हुई माँ की गोद से शिला पर गिरता है, और शिला सौ टुकड़ों में फटती है। पाण्डु के एक वर्ष के तप के बाद वे इन्द्र को बुलाती हैं, और अर्जुन जन्मते हैं। पाण्डु और सन्तान चाहते हैं, और कुन्ती मना कर देती हैं। माद्री के लिए वे एक बार मन्त्र देती हैं, और माद्री अश्विनीकुमारों से एक साथ दो पुत्र पा लेती हैं; पाण्डु फिर कहते हैं, और कुन्ती फिर मना करती हैं, यह कहकर कि एक ही बार मन्त्र देने पर माद्री ने दो पुत्र पा लिए, और वह कहीं संख्या में मुझसे आगे न निकल जाए। पाण्डु माद्री के साथ एकान्त में शाप भूलकर मरते हैं, और दोनों विधवाएँ चिता का अधिकार बाँटती हैं। कुन्ती कहती हैं कि मैं ज्येष्ठ पत्नी हूँ, अतः धर्म-कर्तव्य मेरा है, मुझे पति के साथ जाने दीजिए; माद्री कहती हैं कि मेरी कामना अधूरी रह गई है और मैं इन पाँचों का समान पालन न कर सकूँगी, इसलिए जीवित रहने का भार आप उठाइए। जीवन भर परिश्रम से अपरिचित कुन्ती को हस्तिनापुर का वह लम्बा मार्ग अब बहुत छोटा लगता है। रंगभूमि में बरसों बाद, जब कर्ण अखाड़े में उतरते हैं, तब भोजराज की पुत्री कुन्ती स्थिति को समझकर मूर्च्छित होकर गिर पड़ती हैं; विदुर उन्हें होश में लाते हैं, और वे किसी से कुछ नहीं कहतीं।
जो माँ अपने पुत्र को राक्षस के सामने भेजती है
लाक्षागृह से वे विदुर की भेजी नाव से गंगा पार करती हैं, और अँधेरे वन में भीम उन्हें कन्धे पर उठाकर चलते हैं। एकचक्रा में, जिस ब्राह्मण के घर वे छिपी हैं, उसकी बारी आती है कि राक्षस बक को भोजन के साथ एक मनुष्य भेजे। कुन्ती ब्राह्मण को साथ लेकर भीम के पास जाती हैं। भीम “ऐसा ही होगा” कहते हैं, और लौटे हुए युधिष्ठिर माँ से एकान्त में पूछते हैं कि जिसकी भुजाओं के भरोसे हम रात को निश्चिन्त सोते हैं, उसे आपने किस काम में भेज दिया; क्या विवेक खो गया है? कुन्ती का उत्तर इस पात्र का सबसे साफ़ चित्र है: “युधिष्ठिर, भीम के लिए चिन्ता मत कीजिए। बुद्धि दुर्बल होने से यह निश्चय नहीं किया।” इस ब्राह्मण ने हमें ऐसा आश्रय दिया जहाँ धृतराष्ट्र के पुत्र हमें ढूँढ़ न सके; “सच्चा मनुष्य उपकार भूलता नहीं; उससे बढ़कर लौटाता है।” उन्होंने हिडिम्ब का वध देखा है, और उस शिला को याद रखा है जो उनकी गोद से गिरे शिशु के भार से टूट गई थी। पाञ्चाल में एक दिन पुत्र देर से लौटते हैं और भीतर के कक्ष में बैठी माँ से कहते हैं कि आज की भिक्षा लाए हैं, और वे बिना देखे कहती हैं, “जो आपने प्राप्त किया है, आप सब मिलकर उसका उपभोग कीजिए।” उसी क्षण वे द्रौपदी को देखती हैं, “ओह, मैंने यह क्या कह दिया,” और अपना वचन असत्य न होने देने के लिए द्रौपदी का हाथ थामकर युधिष्ठिर के सामने खड़ी हो जाती हैं। द्यूत के बाद विदुर कहते हैं कि पृथा जन्म से राजकुमारी हैं, वन उन्हें शोभा नहीं देता, वे मेरे घर रहेंगी; और वन को जाती द्रौपदी से कुन्ती रुँधे कण्ठ से कहती हैं, “वन में रहते हुए मेरे पुत्र सहदेव पर दृष्टि रखिए, देखिए कि इस महाविपत्ति में उसका हृदय न डूबे।” फिर वे रोती हुई बहू के पीछे स्वयं हो लेती हैं।
क्षत्राणी का सन्देश
उद्योग पर्व में शान्ति-दूत बनकर आए कृष्ण तीसरे पहर अपनी बुआ के घर जाते हैं, और द्वार पर उन्हें देखते ही कुन्ती दोनों बाँहें उनके गले में डालकर चौदह बरस का रुका हुआ रोना रो लेती हैं। वे एक-एक बेटे का नाम लेकर हाल पूछती हैं, और फिर अपने दुखों की जड़ बताती हैं, जो न दुर्योधन में है, न अपने में: “हे केशव, हम बच्ची थीं, हाथ में गेंद लिए खेल रही थीं, जब आपके पितामह ने हमें अपने मित्र यशस्वी कुन्तिभोज को दे दिया।” पिता से त्यागी गईं, फिर ससुर से। “हे जनार्दन, हमारे बच्चे हमारे लिए मरे हुए जैसे हैं, और हम उनके लिए।” और तब उनका स्वर बदलता है; जो माँ का विलाप था, वह क्षत्राणी का सन्देश बन जाता है। वे विदुला की कथा सुनाती हैं, उस माँ की जो हारे हुए पुत्र को उठाती है, और फिर एक-एक पुत्र के नाम से कहलवाती हैं: अर्जुन को उनके जन्म की रात की आकाशवाणी, और भीम को, “वह समय आ गया है जिसके लिए क्षत्राणी पुत्र को जन्म देती है।” अन्त में वह, जो इतने वर्षों में उन्हें सबसे अधिक चुभा है: “राज्य का छिनना हमें दुखी नहीं करता। द्यूत में उनकी हार हमें दुखी नहीं करती। पर वह कुलीन और सुन्दर द्रौपदी सभा के बीच रोते हुए वे क्रूर और अपमान भरे शब्द सुनने को विवश हुई, यही हमें सबसे अधिक दुख देता है।”
गंगा-तट पर छाया में खड़ी एक माँ
कृष्ण की सन्धि विफल होती है, और विदुर कुन्ती से कहते हैं कि दुर्योधन किसी की नहीं सुनता। तब कुन्ती को अपना वह मन्त्र याद आता है और एक संकल्प बनता है। गंगा के तट पर कर्ण पूर्व की ओर मुख किए सूर्य की उपासना में खड़े हैं, और उनके पीछे एक वृद्धा धूप में प्रतीक्षा करती है, जब तक कि वह कुम्हलाई कमल-माला-सी नहीं हो जाती; अन्त में वह पुत्र के उत्तरीय की छाया में आ खड़ी होती है। कर्ण मुड़ते हैं, “मैं कर्ण हूँ, राधा और अधिरथ का पुत्र। हे देवी, आप यहाँ किसलिए आई हैं?” और उत्तर आता है, “आप कुन्ती के पुत्र हैं, राधा के नहीं।” वे कहती हैं कि मैंने कुँवारी अवस्था में आपको जना, सूर्य ने आपको मुझ पर उत्पन्न किया; “आप पार्थ हैं।” सूर्य-मण्डल से एक वाणी कहती है कि पृथा ने जो कहा, वह सत्य है, अपनी माता के वचनों के अनुसार आचरण कीजिए। कर्ण का हृदय नहीं डिगता। “हे माता, जन्मते ही आपने मुझे त्याग दिया।” आपने पहले कभी माता के समान मेरा हित नहीं चाहा, और आज आप मुझसे बात कर रही हैं, अपना ही हित चाहते हुए। फिर भी याचना व्यर्थ नहीं जाती: अर्जुन को छोड़कर शेष चार पुत्र उनके हाथों नहीं मारे जाएँगे। “हे यशस्विनी, आपके पुत्रों की संख्या कभी पाँच से कम न होगी। वह पाँच ही रहेगी: अर्जुन मारे गए तो मेरे सहित, और मैं मारा गया तो अर्जुन सहित।” शोक से काँपती कुन्ती उस अविचल पुत्र को गले लगाती हैं और कहती हैं कि सब कुछ नियति है। युद्ध के बाद गंगा के उसी तट पर, जलांजलि के समय, वे अचानक पुत्रों से कहती हैं, “उसी ज्येष्ठ भ्राता को जलांजलि दीजिए, जो मुझसे सूर्य-देव द्वारा उत्पन्न हुआ था।” युधिष्ठिर सर्प-सी आहें भरकर पूछते हैं, “हे माता, आपने उसे अपने वस्त्र की तह में अग्नि छिपाने वाले की भाँति कैसे छिपा रखा?” और कर्ण के परिवार को बुलाकर बड़े भाई का जल-कर्म करते हैं। भागवत इसी घड़ी को अपनी तरह से देखता है: जब कृष्ण द्वारका लौटने को रथ पर पाँव रखते हैं, तब कुन्ती हाथ जोड़कर उन्हें रोकती हैं और वह माँगती हैं जो कोई नहीं माँगता, “हमारे जीवन में पद-पद पर विपत्तियाँ आती रहें, और आती ही रहें,” क्योंकि विपत्ति में ही आपके दर्शन निश्चित हैं। वह प्रार्थना भागवत की अपनी कथा में है, और यहाँ केवल नामित है।
गान्धारी का हाथ कन्धे पर
पन्द्रह वर्ष बाद धृतराष्ट्र वन को चलते हैं, और विदा के दिन कुन्ती आगे-आगे चलती हैं, बँधी आँखों वाली गान्धारी का हाथ अपने कन्धे पर लिए। युधिष्ठिर कहते हैं कि माता, आप लौटिए, और कुन्ती बिना उत्तर दिए चलती रहती हैं। जब बोलती हैं, तो आज्ञाएँ देती हैं: सहदेव की कभी उपेक्षा न करना; “उस कर्ण को सदा स्मरण रखना जो युद्ध से कभी पीछे न हटा; मेरी मूर्खता से वह मारा गया।” भीम पूछते हैं कि जब राज्य जीता जा चुका और भोगने का समय आया, तब यह इच्छा कहाँ से आई, और माँ उत्तर में अपना पूरा हिसाब रखती है: जूए में हारे हुए पुत्रों में उन्होंने इसलिए साहस भरा कि पाण्डु का यश नष्ट न हो, कि भीम का बल व्यर्थ न जाए, कि द्रौपदी का अपमान बिना बदले न रह जाए; “मैंने वासुदेव से विदुला के वे प्रेरक वचन अपने लिए नहीं, आपके लिए कहलवाए थे। मेरी सन्तान ने जो राज्य जीता, उसके फल मैं नहीं चाहती; मैं अपने तप से उसी लोक को पाना चाहती हूँ जो मेरे पति ने अर्जित किया।” पाण्डव लज्जित होकर रुक जाते हैं। वन में निर्दोष पृथा गान्धारी की आँख बनती हैं। एक दिन व्यास आते हैं, और उन्हीं के सामने कुन्ती वह कथा सुनाती हैं जो इस परिचय के पहले दृश्य में है, और कहती हैं, “मूर्ख मैं, यद्यपि बड़ा होने पर वह मुझे अपनी माता जानता था, फिर भी मैंने उसे अपनाने का कोई यत्न न किया। यह मुझे जलाता है, हे ऋषि,” और माँगती हैं कि उस पुत्र को देखने की लालसा पूरी हो। व्यास कहते हैं कि कर्ण के जन्म में आपका कोई दोष नहीं, और एक रात के लिए मरे हुए वीरों को नदी से ऊपर लाते हैं। दो वर्ष बाद नारद हस्तिनापुर आकर सुनाते हैं: गंगा के तट पर वन में आग भड़की, और आहार-त्याग से कृश राजा और दोनों रानियाँ चलने में असमर्थ थे। धृतराष्ट्र ने सञ्जय को दूर भेज दिया, और पूर्व की ओर मुख करके गान्धारी और कुन्ती के साथ बैठ गए; तीनों ने इन्द्रियों को रोककर काठ के खम्भे-सा निश्चल रहकर अग्नि को आने दिया। युधिष्ठिर विलाप में सोचते हैं कि कृश देह वाली पृथा भय से काँपकर “हे पुत्र युधिष्ठिर” पुकारी होंगी, “हे भीम, मुझे इस संकट से बचाइए।” नारद उन्हें रोकते हैं कि वह आग किसी अपवित्र अग्नि की नहीं, राजा की अपनी छोड़ी हुई यज्ञाग्नि की थी, और कुन्ती ने सेवा से सिद्धि पाई।
उनकी राह
तीन ठहराव, तीन प्रश्न
नीचे तीन प्रसंग हैं जहाँ कुन्ती कुछ भेजती हैं, कुछ माँगती हैं, या कुछ कहने से रुकी रहती हैं। ये हमारे पढ़ने के प्रश्न हैं।
- जिसे राक्षस के सामने भेजा। बक का वध पढ़िए, वह एकान्त जहाँ युधिष्ठिर पूछते हैं कि क्या विवेक खो गया है। पूछिए: जो माँ उपकार का बदला अपने पुत्र के प्राणों से चुकाने को तैयार है, वह किस धर्म पर खड़ी है, और युधिष्ठिर उसे क्यों मान लेते हैं?
- उत्तरीय की छाया। कर्ण-कुन्ती-संवाद पढ़िए, धूप में प्रतीक्षा से “पाँच ही रहेगी” तक। पूछिए: कर्ण का यह कहना कि आप आज अपना ही हित चाहते हुए बोल रही हैं, कितना सच है, और कुन्ती उसका उत्तर क्यों नहीं देतीं?
- जो हिसाब वन की राह पर दिया गया। वनगमन पढ़िए, और उसे विदुला की कथा के साथ रखिए। पूछिए: जिसने पुत्रों को युद्ध में भेजा, वह जीते हुए राज्य का फल क्यों नहीं लेती?
अन्त में पहले दृश्य पर लौटिए, जहाँ एक कन्या केवल यह देखना चाहती है कि मन्त्र सच है या नहीं। उस कौतूहल का मोल इस कथा में कौन-कौन चुकाता है?
द्रौपदी-स्वयंवर · भीतर के कक्ष से बिना देखे कहा गया एक वाक्य, और उसे असत्य न होने देने की चिन्ता।
कुन्ती का सन्देश · एक हारे हुए पुत्र की माँ की कथा, और “समय आ गया है” का वह सन्देश जो भीम के लिए भेजा गया।
भागवत में कुन्ती की प्रार्थना · रथ की पायदान पर रखा कृष्ण का पाँव, और विपत्ति की वह माँग जो कोई नहीं माँगता।
जो छिपाया, और जो माँगा
कुन्ती के जीवन में हर मोड़ पर एक माँग है, और उसके साथ एक चुप्पी। वे वायु से बल माँगती हैं, इन्द्र से विश्व-विख्यात पुत्र, पाण्डु से और सन्तान न जनने का अधिकार; एक ब्राह्मण के उपकार के बदले भीम को भेज देती हैं और युधिष्ठिर को समझा देती हैं; कृष्ण से विदुला की कथा कहलवाती हैं और कर्ण से चार भाइयों का अभय ले आती हैं। और इन सबके नीचे एक गिनती चलती है, पाँच पुत्र, जो कभी छह नहीं कहे गए, रंगभूमि की मूर्च्छा से लेकर गंगा-तट की जलांजलि तक। काव्य इस चुप्पी को उन्हीं के मुख से तीन बार खुलवाता है, पहले कर्ण के सामने, फिर पुत्रों के सामने, और अन्त में व्यास के सामने, जहाँ वे इसे अपना दोष कहती हैं और उस पुत्र को एक रात देखने की लालसा माँगती हैं। जीता हुआ राज्य वे नहीं लेतीं; गान्धारी का हाथ कन्धे पर लेकर वन चली जाती हैं, और जो अग्नि उन्हें लेती है, उसके बारे में नारद कहते हैं कि वह पवित्र थी। जिस कन्या ने एक सुबह केवल यह देखना चाहा था कि मन्त्र सच है या नहीं, उसकी कथा इसी माप पर चलती है: जो माँगा, वह सब मिला, और जो छिपाया, उसका मोल अन्त तक वही चुकाती रहीं।
आधार-संस्करण और पाठ
आधार-संस्करण: गीताप्रेस का संस्कृत-हिन्दी पाठ।
इस कथा का पाठ: पृथा का कुन्तिभोज को दिया जाना: गांगुली आदि 67 और सम्भव उपपर्व; दुर्वासा का मन्त्र और पाँच पुत्र: आदि पर्व, सम्भव उपपर्व; कर्ण का जन्म कुन्ती के अपने मुख से: आश्रमवासिक पर्व, गांगुली 30। रंगभूमि: गीताप्रेस आदि 135 से 138। लाक्षागृह और बक-वध: आदि पर्व, जतुगृह और बकवध उपपर्व। स्वयंवर का वचन: गांगुली आदि 193। द्यूत के बाद विदाई: गांगुली सभा 77। कृष्ण का कुन्ती के घर जाना: गांगुली उद्योग 90; विदुला की कथा: गांगुली उद्योग 133 से आगे। कर्ण-कुन्ती-संवाद: उद्योग पर्व, गांगुली 144 से 146। जलांजलि पर रहस्य: स्त्री पर्व। वनगमन और वन की अग्नि: आश्रमवासिक पर्व, गांगुली 39 तक। भागवत की प्रार्थना: स्कन्ध 1.8, इस पुस्तकालय की भागवत की कथा से, केवल नामित।
इस प्रस्तुति का दायरा: चुने हुए पात्र-प्रसंग और अलग चिह्नित पाठकीय प्रश्न।
सीमाएँ और पाठ-भेद: यह पात्र-परिचय कथा-सार और संपादकीय मनन को साथ रखता है। प्रसंगों के आधार इस पुस्तकालय की महाभारत की कड़ियाँ हैं; कुछ कड़ियाँ गांगुली के खण्ड-क्रम पर चलती हैं, इसलिए वहाँ गीताप्रेस की अध्याय-संख्या अलग हो सकती है। उद्धरण-चिह्नों के वाक्य इन्हीं कड़ियों के हिन्दी पाठ से हैं। भागवत की कुन्ती महाभारत की कुन्ती से अलग ग्रन्थ में है; उसकी प्रार्थना यहाँ मिलाई नहीं गई, केवल नामित है।