लुल्ला परिवारLulla Family
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सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

राग जैतसरी

राग · M1-M5 + भगत

राग जैतसरी

अपराह्न का राग, दिन से शाम की संधि।

जैतसरी अपराह्न का राग है, दिन से शाम की संधि का। एक तरह की हलकी मिठास इसके स्वर में बैठी है, गर्मी कम होने और ठंडक आने के बीच का स्वर।

नाम के स्रोत के बारे में निश्चय कठिन है, "जैत" शब्द से सम्बन्ध हो सकता है। ग्रंथ में इसकी रचनाएँ कम-ज़्यादा सात-सौ अंगों के आसपास हैं।

"कोई जानै कवनु ईहा जगि मीतु ॥" जैतसरी M5
इस राग के सब अंग

इस राग के शबद

हर शबद अपनी पहली पंक्ति से, वाणी के अनुसार। पंक्ति पर जाने से वह शबद अपने अंग पर खुलता है।

महला 4 (11)
  1. मेरै हीअरै रतनु नामु हरि बसिआ गुरि हाथु धरिओ मेरै माथा ॥अंग 696
  2. हीरा लालु अमोलकु है भारी बिनु गाहक मीका काखा ॥अंग 696
  3. हम बारिक कछूअ न जानह गति मिति तेरे मूरख मुगध इआना ॥अंग 697
  4. सतिगुरु साजनु पुरखु वड पाइआ हरि रसकि रसकि फल लागिबा ॥अंग 697
  5. जिन हरि हिरदै नामु न बसिओ तिन मात कीजै हरि बांझा ॥अंग 697
  6. सतसंगति साध पाई वडभागी मनु चलतौ भइओ अरूड़ा ॥अंग 698
  7. हरि हरि सिमरहु अगम अपारा ॥अंग 698
  8. हरि हरि हरि हरि नामु जपाहा ॥अंग 698
  9. रसि रसि रामु रसालु सलाहा ॥अंग 699
  10. आपे जोगी जुगति जुगाहा ॥अंग 699
  11. मिलि सतसंगति संगि गुराहा ॥अंग 699
महला 5 (64)
  1. कोई जानै कवनु ईहा जगि मीतु ॥अंग 700
  2. देहु संदेसरो कहीअउ प्रिअ कहीअउ ॥अंग 700
  3. धीरउ सुनि धीरउ प्रभ कउ ॥1॥ रहाउ ॥अंग 700
  4. लोड़ीदड़ा साजनु मेरा ॥अंग 700
  5. अब मै सुखु पाइओ गुर आग्यि ॥अंग 701
  6. मन महि सतिगुर धिआनु धरा ॥अंग 701
  7. जा कउ भए गोविंद सहाई ॥अंग 701
  8. गोबिंद जीवन प्रान धन रूप ॥अंग 701
  9. कोई जनु हरि सिउ देवै जोरि ॥अंग 701
  10. चात्रिक चितवत बरसत मेंह ॥अंग 702
  11. मनि तनि बसि रहे मेरे प्रान ॥अंग 702
  12. आए अनिक जनम भ्रमि सरणी ॥अंग 702
  13. हरि जन सिमरहु हिरदै राम ॥अंग 702
  14. दरसन पिआसी दिनसु राति चितवउ अनदिनु नीत ॥अंग 703
  15. सुणि यार हमारे सजण इक करउ बेनंतीआ ॥अंग 703
  16. ऊचा अगम अपार प्रभु कथनु न जाइ अकथु ॥अंग 704
  17. जिउ जानहु तिउ राखु हरि प्रभ तेरिआ ॥अंग 704
  18. निरति न पवै असंख गुण ऊचा प्रभ का नाउ ॥अंग 704
  19. दूसर नाही ठाउ का पहि जाईऐ ॥अंग 704
  20. रे मन ता कउ धिआईऐ सभ बिधि जा कै हाथि ॥अंग 704
  21. साथीअड़ा प्रभु एकु दूसर नाहि कोइ ॥अंग 704
  22. चिति जि चितविआ सो मै पाइआ ॥अंग 705
  23. अब मनु छूटि गइआ साधू संगि मिले ॥अंग 705
  24. पाधाणू संसारु गारबि अटिआ ॥अंग 705
  25. आदि पूरन मधि पूरन अंति पूरन परमेसुरह ॥अंग 705
  26. हरि एकु निरंजनु गाईऐ सभ अंतरि सोई ॥अंग 706
  27. रचंति जीअ रचना मात गरभ असथापनं ॥अंग 706
  28. रकतु बिंदु करि निंमिआ अगनि उदर मझारि ॥अंग 706
  29. मन इछा दान करणं सरबत्र आसा पूरनह ॥अंग 706
  30. ग्रिह मंदर रथ असु दीए रचि भले संजोग ॥अंग 706
  31. कुटंब जतन करणं माइआ अनेक उदमह ॥अंग 706
  32. जिसु बिसरत तनु भसम होइ कहते सभि प्रेतु ॥अंग 706
  33. कोटि दान इसनानं अनिक सोधन पवित्रतह ॥अंग 706
  34. कोटि अघा सभि नास होहि सिमरत हरि नाउ ॥अंग 707
  35. ग्रिह रचना अपारं मनि बिलास सुआदं रसह ॥अंग 707
  36. सुंदर सेज अनेक सुख रस भोगण पूरे ॥अंग 707
  37. चरन कमल बिरहं खोजंत बैरागी दह दिसह ॥अंग 707
  38. बसता तूटी झुंपड़ी चीर सभि छिंना ॥अंग 707
  39. अनिक लीला राज रस रूपं छत्र चमर तखत आसनं ॥अंग 707
  40. सुपने सेती चितु मूरखि लाइआ ॥अंग 707
  41. बसंति स्वरग लोकह जितते प्रिथवी नव खंडणह ॥अंग 707
  42. महा भइआन उदिआन नगर करि मानिआ ॥अंग 707
  43. राज कपटं रूप कपटं धन कपटं कुल गरबतह ॥अंग 708
  44. चलदिआ नालि न चलै सो किउ संजीऐ ॥अंग 708
  45. नच राज सुख मिसटं नच भोग रस मिसटं नच मिसटं सुख माइआ ॥अंग 708
  46. हरि बिनु कछू न लागई भगतन कउ मीठा ॥अंग 708
  47. तिअकत जलं नह जीव मीनं नह तिआगि चात्रिक मेघ मंडलह ॥अंग 708
  48. जिउ मछुली बिनु पाणीऐ किउ जीवणु पावै ॥अंग 708
  49. चितवंति चरन कमलं सासि सासि अराधनह ॥अंग 708
  50. आसावंती आस गुसाई पूरीऐ ॥अंग 708
  51. रसना उचरंति नामं स्रवणं सुनंति सबद अंम्रितह ॥अंग 709
  52. सद बलिहारी तिना जि सुनते हरि कथा ॥अंग 709
  53. भावी उदोत करणं हरि रमणं संजोग पूरनह ॥अंग 709
  54. सा वेला कहु कउणु है जितु प्रभ कउ पाई ॥अंग 709
  55. पतित पुनीत गोबिंदह सरब दोख निवारणह ॥अंग 709
  56. मेलि लैहु दइआल ढहि पए दुआरिआ ॥अंग 709
  57. संत उधरण दइआलं आसरं गोपाल कीरतनह ॥अंग 709
  58. चरन कमल की ओट उधरे सगल जन ॥अंग 709
  59. दइआ करणं दुख हरणं उचरणं नाम कीरतनह ॥अंग 709
  60. जा प्रभ भए दइआल न बिआपै माइआ ॥अंग 710
  61. गुर गोबिंद गोपाल गुर गुर पूरन नाराइणह ॥अंग 710
  62. धंनु धंनु गुरदेव जिसु संगि हरि जपे ॥अंग 710
  63. द्रिसटंत एको सुनीअंत एको वरतंत एको नरहरह ॥अंग 710
  64. प्रभ दइआल बेअंत पूरन इकु एहु ॥अंग 710
महला 9 (3)
  1. भूलिओ मनु माइआ उरझाइओ ॥अंग 702
  2. हरि जू राखि लेहु पति मेरी ॥अंग 703
  3. मन रे साचा गहो बिचारा ॥अंग 703
भगत रविदास जी (1)
  1. नाथ कछूअ न जानउ ॥अंग 710

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