राग जैतसरी
अपराह्न का राग, दिन से शाम की संधि।
जैतसरी अपराह्न का राग है, दिन से शाम की संधि का। एक तरह की हलकी मिठास इसके स्वर में बैठी है, गर्मी कम होने और ठंडक आने के बीच का स्वर।
नाम के स्रोत के बारे में निश्चय कठिन है, "जैत" शब्द से सम्बन्ध हो सकता है। ग्रंथ में इसकी रचनाएँ कम-ज़्यादा सात-सौ अंगों के आसपास हैं।
"कोई जानै कवनु ईहा जगि मीतु ॥" जैतसरी M5
इस राग के सब अंग
इस राग के शबद
हर शबद अपनी पहली पंक्ति से, वाणी के अनुसार। पंक्ति पर जाने से वह शबद अपने अंग पर खुलता है।
महला 4 (11)
- मेरै हीअरै रतनु नामु हरि बसिआ गुरि हाथु धरिओ मेरै माथा ॥अंग 696
- हीरा लालु अमोलकु है भारी बिनु गाहक मीका काखा ॥अंग 696
- हम बारिक कछूअ न जानह गति मिति तेरे मूरख मुगध इआना ॥अंग 697
- सतिगुरु साजनु पुरखु वड पाइआ हरि रसकि रसकि फल लागिबा ॥अंग 697
- जिन हरि हिरदै नामु न बसिओ तिन मात कीजै हरि बांझा ॥अंग 697
- सतसंगति साध पाई वडभागी मनु चलतौ भइओ अरूड़ा ॥अंग 698
- हरि हरि सिमरहु अगम अपारा ॥अंग 698
- हरि हरि हरि हरि नामु जपाहा ॥अंग 698
- रसि रसि रामु रसालु सलाहा ॥अंग 699
- आपे जोगी जुगति जुगाहा ॥अंग 699
- मिलि सतसंगति संगि गुराहा ॥अंग 699
महला 5 (64)
- कोई जानै कवनु ईहा जगि मीतु ॥अंग 700
- देहु संदेसरो कहीअउ प्रिअ कहीअउ ॥अंग 700
- धीरउ सुनि धीरउ प्रभ कउ ॥1॥ रहाउ ॥अंग 700
- लोड़ीदड़ा साजनु मेरा ॥अंग 700
- अब मै सुखु पाइओ गुर आग्यि ॥अंग 701
- मन महि सतिगुर धिआनु धरा ॥अंग 701
- जा कउ भए गोविंद सहाई ॥अंग 701
- गोबिंद जीवन प्रान धन रूप ॥अंग 701
- कोई जनु हरि सिउ देवै जोरि ॥अंग 701
- चात्रिक चितवत बरसत मेंह ॥अंग 702
- मनि तनि बसि रहे मेरे प्रान ॥अंग 702
- आए अनिक जनम भ्रमि सरणी ॥अंग 702
- हरि जन सिमरहु हिरदै राम ॥अंग 702
- दरसन पिआसी दिनसु राति चितवउ अनदिनु नीत ॥अंग 703
- सुणि यार हमारे सजण इक करउ बेनंतीआ ॥अंग 703
- ऊचा अगम अपार प्रभु कथनु न जाइ अकथु ॥अंग 704
- जिउ जानहु तिउ राखु हरि प्रभ तेरिआ ॥अंग 704
- निरति न पवै असंख गुण ऊचा प्रभ का नाउ ॥अंग 704
- दूसर नाही ठाउ का पहि जाईऐ ॥अंग 704
- रे मन ता कउ धिआईऐ सभ बिधि जा कै हाथि ॥अंग 704
- साथीअड़ा प्रभु एकु दूसर नाहि कोइ ॥अंग 704
- चिति जि चितविआ सो मै पाइआ ॥अंग 705
- अब मनु छूटि गइआ साधू संगि मिले ॥अंग 705
- पाधाणू संसारु गारबि अटिआ ॥अंग 705
- आदि पूरन मधि पूरन अंति पूरन परमेसुरह ॥अंग 705
- हरि एकु निरंजनु गाईऐ सभ अंतरि सोई ॥अंग 706
- रचंति जीअ रचना मात गरभ असथापनं ॥अंग 706
- रकतु बिंदु करि निंमिआ अगनि उदर मझारि ॥अंग 706
- मन इछा दान करणं सरबत्र आसा पूरनह ॥अंग 706
- ग्रिह मंदर रथ असु दीए रचि भले संजोग ॥अंग 706
- कुटंब जतन करणं माइआ अनेक उदमह ॥अंग 706
- जिसु बिसरत तनु भसम होइ कहते सभि प्रेतु ॥अंग 706
- कोटि दान इसनानं अनिक सोधन पवित्रतह ॥अंग 706
- कोटि अघा सभि नास होहि सिमरत हरि नाउ ॥अंग 707
- ग्रिह रचना अपारं मनि बिलास सुआदं रसह ॥अंग 707
- सुंदर सेज अनेक सुख रस भोगण पूरे ॥अंग 707
- चरन कमल बिरहं खोजंत बैरागी दह दिसह ॥अंग 707
- बसता तूटी झुंपड़ी चीर सभि छिंना ॥अंग 707
- अनिक लीला राज रस रूपं छत्र चमर तखत आसनं ॥अंग 707
- सुपने सेती चितु मूरखि लाइआ ॥अंग 707
- बसंति स्वरग लोकह जितते प्रिथवी नव खंडणह ॥अंग 707
- महा भइआन उदिआन नगर करि मानिआ ॥अंग 707
- राज कपटं रूप कपटं धन कपटं कुल गरबतह ॥अंग 708
- चलदिआ नालि न चलै सो किउ संजीऐ ॥अंग 708
- नच राज सुख मिसटं नच भोग रस मिसटं नच मिसटं सुख माइआ ॥अंग 708
- हरि बिनु कछू न लागई भगतन कउ मीठा ॥अंग 708
- तिअकत जलं नह जीव मीनं नह तिआगि चात्रिक मेघ मंडलह ॥अंग 708
- जिउ मछुली बिनु पाणीऐ किउ जीवणु पावै ॥अंग 708
- चितवंति चरन कमलं सासि सासि अराधनह ॥अंग 708
- आसावंती आस गुसाई पूरीऐ ॥अंग 708
- रसना उचरंति नामं स्रवणं सुनंति सबद अंम्रितह ॥अंग 709
- सद बलिहारी तिना जि सुनते हरि कथा ॥अंग 709
- भावी उदोत करणं हरि रमणं संजोग पूरनह ॥अंग 709
- सा वेला कहु कउणु है जितु प्रभ कउ पाई ॥अंग 709
- पतित पुनीत गोबिंदह सरब दोख निवारणह ॥अंग 709
- मेलि लैहु दइआल ढहि पए दुआरिआ ॥अंग 709
- संत उधरण दइआलं आसरं गोपाल कीरतनह ॥अंग 709
- चरन कमल की ओट उधरे सगल जन ॥अंग 709
- दइआ करणं दुख हरणं उचरणं नाम कीरतनह ॥अंग 709
- जा प्रभ भए दइआल न बिआपै माइआ ॥अंग 710
- गुर गोबिंद गोपाल गुर गुर पूरन नाराइणह ॥अंग 710
- धंनु धंनु गुरदेव जिसु संगि हरि जपे ॥अंग 710
- द्रिसटंत एको सुनीअंत एको वरतंत एको नरहरह ॥अंग 710
- प्रभ दइआल बेअंत पूरन इकु एहु ॥अंग 710
महला 9 (3)
- भूलिओ मनु माइआ उरझाइओ ॥अंग 702
- हरि जू राखि लेहु पति मेरी ॥अंग 703
- मन रे साचा गहो बिचारा ॥अंग 703
भगत रविदास जी (1)
- नाथ कछूअ न जानउ ॥अंग 710