राग जैतसरी
अपराह्न का राग, दिन से शाम की संधि।
जैतसरी अपराह्न का राग है, दिन से शाम की संधि का। एक तरह की हलकी मिठास इसके स्वर में बैठी है, गर्मी कम होने और ठंडक आने के बीच का स्वर।
नाम के स्रोत के बारे में निश्चय कठिन है, “जैत” शब्द से सम्बन्ध हो सकता है। ग्रंथ में इसकी रचनाएँ कम-ज़्यादा सात-सौ अंगों के आसपास हैं।
“हरि बिनु आपके को न सहाई ।” जैतसरी M5