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अंग 713

अंग
713
राग टोडी
राग: टोडी · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
आगिआ तुमरी मीठी लागउ कीओ तुहारो भावउ ॥
जो तू देहि तही इहु त्रिपतै आन न कतहू धावउ ॥2॥
सद ही निकटि जानउ प्रभ सुआमी सगल रेण होइ रहीऐ ॥
साधू संगति होइ परापति ता प्रभु अपुना लहीऐ ॥3॥
सदा सदा हम छोहरे तुमरे तू प्रभ हमरो मीरा ॥
नानक बारिक तुम मात पिता मुखि नामु तुमारो खीरा ॥4॥3॥5॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: (हे प्रभू ! मेहर कर) मुझे आपकी रजा मीठी लगती रहे।मुझे आपका किया अच्छा लगता रहे। जो कुछ आप मुझे देता है।उसी में ही (मेरा) ये मन संतुष्ट रहे।मैं किसी भी ओर दिशा में भटकता ना फिरूँ। 2। हे मेरे मालिक-प्रभू ! मैं आपको सदा अपने नजदीक (बसता) जानता रहूँ।हे भाई ! सभी की चरणों की धूल बन के रहना चाहिए। जब गुरू की संगति हासिल होती है।तब अपने प्रभू को पा लिया जाता है। 3। हे नानक ! (कह) हे प्रभू ! हम जीव सदा ही आपके अंजान बच्चे हैं। आप हमारी माँ है हमारा पिता है (मेहर कर) आपका नाम हमारे मुँह पर रहे (जैसे) माता-पिता अपने बच्चे के मुँह में दूध (डालते रहते हैं)। 4। 3। 5।
टोडी महला 5 घरु 2 दुपदे
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
मागउ दानु ठाकुर नाम ॥
अवरु कछू मेरै संगि न चालै मिलै क्रिपा गुण गाम ॥1॥ रहाउ ॥
राजु मालु अनेक भोग रस सगल तरवर की छाम ॥
धाइ धाइ बहु बिधि कउ धावै सगल निरारथ काम ॥1॥
बिनु गोविंद अवरु जे चाहउ दीसै सगल बात है खाम ॥
कहु नानक संत रेन मागउ मेरो मनु पावै बिस्राम ॥2॥1॥6॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: टोडी महला 5 घरु 2 दुपदे ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। हे मालिक प्रभू ! मैं (आपके पास से आपके) नाम का दान माँगता हूँ। कोई भी और चीज आपके साथ नहीं जा सकती।अगर आपकी कृपा हैं।तो मुझे आपकी सिफत सालाह मिल जाए। 1।रहाउ। हे भाई ! हकूमत।धन और अनेकों पदार्थों के स्वाद – ये सारे वृक्ष की छाया समान हैं (सदा एक जगह टिके नहीं रह सकते)। मनुष्य (इनकी खातिर) सदा ही कई तरीकों से दौड़-भाग करता रहता है।पर उसके सारे काम व्यर्थ चले जाते हैं। 1। अगर मैं परमात्मा के नाम के बिना कुछ और ही माँगता रहूँ।तो यही सारी बात कच्ची है। हे नानक ! कह, (हे भाई !) मैं तो संतजनों के चरणों की धूल माँगता हूँ।(ता कि) मेरा मन (दुनियावी दौड़-भाग से) ठिकाना हासिल कर सके। 2। 1। 9।
टोडी महला 5 ॥
प्रभ जी को नामु मनहि साधारै ॥
जीअ प्रान सूख इसु मन कउ बरतनि एह हमारै ॥1॥ रहाउ ॥
नामु जाति नामु मेरी पति है नामु मेरै परवारै ॥
नामु सखाई सदा मेरै संगि हरि नामु मो कउ निसतारै ॥1॥
बिखै बिलास कहीअत बहुतेरे चलत न कछू संगारै ॥
इसटु मीतु नामु नानक को हरि नामु मेरै भंडारै ॥2॥2॥7॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: टोडी महला 5 ॥ हे भाई ! प्रभू जी का नाम (ही) मन को आसरा देता है। नाम ही इस मन के वास्ते जान है।और सुख है।मेरे वास्ते तो हरी-नाम ही हर वक्त काम आने वाली चीज है। 1।रहाउ। हे भाई ! प्रभू का नाम (ही मेरे वास्ते ऊँची) जाति है।हरी नाम ही मेरी इज्जत है।हरी नाम ही मेरा परिवार है। प्रभू का नाम (ही मेरा) मित्र है (जो) सदा मेरे साथ रहता है।परमात्मा का नाम (ही) मुझे संसार समुंद्र से पार लंघाने वाला है। 1। हे भाई ! विषियों के बहुत सारे भोग बताए जाते हैं।पर कोई भी चीज मनुष्य के साथ नहीं जाती। (इस वास्ते) नानक का सबसे प्यारा मित्र प्रभू का नाम ही है।प्रभू का नाम ही मेरे खजाने में (धन) है। 2। 2। 7।
टोडी मः 5 ॥
नीके गुण गाउ मिटही रोग ॥
मुख ऊजल मनु निरमल होई है तेरो रहै ईहा ऊहा लोगु ॥1॥ रहाउ ॥
चरन पखारि करउ गुर सेवा मनहि चरावउ भोग ॥
छोडि आपतु बादु अहंकारा मानु सोई जो होगु ॥1॥
संत टहल सोई है लागा जिसु मसतकि लिखिआ लिखोगु ॥
कहु नानक एक बिनु दूजा अवरु न करणै जोगु ॥2॥3॥8॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: टोडी मः 5 ॥ हे भाई ! परमात्मा के सुंदर गुण गाता रहा कर।(सिफत सालाह की बरकति से) सारे रोग मिट जाते हैं। (इस तरह) आपका ये लोक और परलोक संवर जाएंगे।मन पवित्र हैं जाएगा।(लोक परलोक में) मुँह भी रौशन रहेगा। 1।रहाउ। हे भाई ! मैं (तो) गुरू के चरण धो के गुरू की सेवा करता हूँ।अपना मन गुरू के आगे भेटा करता हूँ (क्योंकि गुरू की कृपा से ही प्रभू की सिफत सालाह की जा सकती है)। हे भाई ! आप भी (गुरू की शरण पड़ कर) स्वै भाव।(माया वाला) झगड़ा और अहंकार त्याग।जो कुछ प्रभू की रजा में होता है उस को (मीठा करके) मान। 1। (पर) हे नानक ! कह, गुरू की सेवा में वही मनुष्य लगता है जिसके माथे पर (धुर से यह) लेख लिखा होता है। उस एक परमात्मा के बिना कोई और (ये मेहर) करने के काबिल नहीं। 2। 3। 8।
टोडी महला 5 ॥
सतिगुर आइओ सरणि तुहारी ॥
मिलै सूखु नामु हरि सोभा चिंता लाहि हमारी ॥1॥ रहाउ ॥
अवर न सूझै दूजी ठाहर हारि परिओ तउ दुआरी ॥
लेखा छोडि अलेखै छूटह हम निरगुन लेहु उबारी ॥1॥
सद बखसिंदु सदा मिहरवाना सभना देइ अधारी ॥
नानक दास संत पाछै परिओ राखि लेहु इह बारी ॥2॥4॥9॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: टोडी महला 5 ॥ हे गुरू ! मैं आपकी शरण आया हूँ। मेरी चिंता दूर कर (मेहर कर।आपके दर से मुझे) परमात्मा का नाम मिल जाए।(यही मेरे वास्ते) सुख (है।यही मेरे वास्ते) शोभा (है)। 1।रहाउ। हे प्रभू ! (मैं अन्य आसरों की तरफ से) हार के आपके दर पर आ पड़ा हूँ।अब मुझे और कोई आसरा नहीं सूझता। हे प्रभू ! हम जीवों के कर्मों का लेखा ना कर।हम तभी सुर्खरू हो सकते हैं।अगर हमारे कर्मों का लेखा ना किया जाए।हे प्रभू ! हम गुणहीन जीवों को (विकारों से आप खुद) बचा ले। 1। हे भाई ! परमात्मा सदा बख्शिशें करने वाला है।सदा मेहर करने वाला है।वह सब जीवों को आसरा देता है। हे दास नानक ! (आप भी आरजू कर और कह) मैं गुरू की शरण आ पड़ा हूँ।मुझे इस जनम में (विकारों से) बचाए रख। 2। 4। 9।
टोडी महला 5 ॥
रसना गुण गोपाल निधि गाइण ॥
सांति सहजु रहसु मनि उपजिओ सगले दूख पलाइण ॥1॥ रहाउ ॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: टोडी महला 5 ॥ हे भाई ! (सारे सुखों के) खजाने गोपाल प्रभू के गुण जीभ से गाते हुए मन में शांति पैदा हो जाती है। आत्मिक अडोलता पैदा होती है।सुख पैदा होता है।सारे दुख दूर हो जाते हैं। 1।रहाउ।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।

गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।

इस अंग पर 6 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(हे प्रभू ! मेहर कर) मुझे आपकी रजा मीठी लगती रहे।”

एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।