जो तू देहि तही इहु त्रिपतै आन न कतहू धावउ ॥2॥
सद ही निकटि जानउ प्रभ सुआमी सगल रेण होइ रहीऐ ॥
साधू संगति होइ परापति ता प्रभु अपुना लहीऐ ॥3॥
सदा सदा हम छोहरे तुमरे तू प्रभ हमरो मीरा ॥
नानक बारिक तुम मात पिता मुखि नामु तुमारो खीरा ॥4॥3॥5॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
मागउ दानु ठाकुर नाम ॥
अवरु कछू मेरै संगि न चालै मिलै क्रिपा गुण गाम ॥1॥ रहाउ ॥
राजु मालु अनेक भोग रस सगल तरवर की छाम ॥
धाइ धाइ बहु बिधि कउ धावै सगल निरारथ काम ॥1॥
बिनु गोविंद अवरु जे चाहउ दीसै सगल बात है खाम ॥
कहु नानक संत रेन मागउ मेरो मनु पावै बिस्राम ॥2॥1॥6॥
प्रभ जी को नामु मनहि साधारै ॥
जीअ प्रान सूख इसु मन कउ बरतनि एह हमारै ॥1॥ रहाउ ॥
नामु जाति नामु मेरी पति है नामु मेरै परवारै ॥
नामु सखाई सदा मेरै संगि हरि नामु मो कउ निसतारै ॥1॥
बिखै बिलास कहीअत बहुतेरे चलत न कछू संगारै ॥
इसटु मीतु नामु नानक को हरि नामु मेरै भंडारै ॥2॥2॥7॥
नीके गुण गाउ मिटही रोग ॥
मुख ऊजल मनु निरमल होई है तेरो रहै ईहा ऊहा लोगु ॥1॥ रहाउ ॥
चरन पखारि करउ गुर सेवा मनहि चरावउ भोग ॥
छोडि आपतु बादु अहंकारा मानु सोई जो होगु ॥1॥
संत टहल सोई है लागा जिसु मसतकि लिखिआ लिखोगु ॥
कहु नानक एक बिनु दूजा अवरु न करणै जोगु ॥2॥3॥8॥
सतिगुर आइओ सरणि तुहारी ॥
मिलै सूखु नामु हरि सोभा चिंता लाहि हमारी ॥1॥ रहाउ ॥
अवर न सूझै दूजी ठाहर हारि परिओ तउ दुआरी ॥
लेखा छोडि अलेखै छूटह हम निरगुन लेहु उबारी ॥1॥
सद बखसिंदु सदा मिहरवाना सभना देइ अधारी ॥
नानक दास संत पाछै परिओ राखि लेहु इह बारी ॥2॥4॥9॥
रसना गुण गोपाल निधि गाइण ॥
सांति सहजु रहसु मनि उपजिओ सगले दूख पलाइण ॥1॥ रहाउ ॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।
गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।
इस अंग पर 6 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(हे प्रभू ! मेहर कर) मुझे आपकी रजा मीठी लगती रहे।”
एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।