टोडी महला ५ ॥ पुनहचार कर सरीरै ॥ दीरघ बद्धु आचरण करीअले हम तुधु आगै नीवीरै ॥१॥रहाउ॥ सेवा साधसंगत समिटी ब्रहम हेरीरै ॥१॥
टोडी महला ५ ॥ हरि हरि चरण रिदै ॥ कौनु प्रब के सम साधसंगि चरण रिदै बसाइदै॥रहाउ॥ तीनि लोक कीआ जत कत्र रहिआ हरि अपना सेव कीआ ॥१॥
“हरि हरि चरण रिदै।” “हरि-हरि के चरण ‘रिदै’ (हृदय में)।”
simplest instruction। हरि के चरण कहाँ रखो? हृदय में। बाहर कहीं नहीं।
दिल्ली में हम सब external feet को touch करते हैं, गुरुद्वारे की drhabori, मंदिर की मूर्ति, साधुओं के चरण। यह not bad है। मगर actually चरण हृदय में बसाना है। यह सबसे intimate sthapana है।
image: हृदय एक छोटा कमरा है, और उसमें “चरण” बैठे हैं। ये चरण भारी नहीं हैं, ये light हैं। पूरे कमरे को रोशन करते हैं।
“कौनु प्रब के सम साधसंगि।” “कौन प्रभु के समान, साधसंगति में?”
rhetorical question। साधसंगति में बैठ कर, “कौन” प्रभु के बराबर? यानी साधसंगति में सब brothers हैं, hierarchy dissolve होती है।
“चरण रिदै बसाइदै।” “चरण हृदय में बसाएँ।”
और यह saadhsangat में होता है। अकेले बैठ कर “चरण हृदय में बसाओ” बोलो, यह forced हो जाता है। साधसंगति में यह organic होता है।
“तीनि लोक कीआ जत कत्र रहिआ।” “तीन लोक ‘किआ’ (बनाए), ‘जत-कत्र’ (everywhere) रहा।”
cosmic scope, मगर साथ ही immanent presence। दोनों एक साथ।
“हरि अपना सेव कीआ।” “हरि-अपने की सेवा की।”
closing simple है। उसकी सेवा करो जो तेरा अपना है।
दिल्ली में हम सब “अपना-पराया” का बहुत differentiation करते हैं। नानक कह रहे हैं, हरि सबसे “अपना” है। बाक़ी सब relative रिश्ते हैं, comes and goes।
“पुनहचार कर सरीरै।” “शरीर से ‘पुनश्चार’ (good actions, करनी) कर।”
गुरु अर्जन एक practical instruction दे रहे हैं। शरीर से “अच्छा करना” चाहिए। mental work से अलग, body-level एक कार्य।
दिल्ली में हम सब बहुत “mental spirituality” करते हैं, सोचते हैं, पढ़ते हैं, plan करते हैं। मगर शरीर से क्या? यह question rarely आता है। नानक कह रहे हैं, “पुनहचार” करो, शरीर से एक action ले।
simple example: किसी ज़रूरतमंद को खाना देना, बूढ़े पड़ोसी की मदद करना, गुरुद्वारे या मंदिर में सेवा। यह body-level “पुनहचार।”
“दीरघ बद्धु आचरण करीअले।” “दीर्घ (sustained, long-term) ‘आचरण’ (conduct) कर।”
“दीरघ” शब्द ध्यान देने योग्य है। यह “extended, long-term” है। एक-दिन की conduct नहीं, sustained, हफ़्ते-महीने-साल की।
दिल्ली में New Year resolutions हम सब बनाते हैं। January में intense, फिर March में dilute, फिर July तक gone। गुरु अर्जन कह रहे हैं, यह “दीर्घ” वाली approach चाहिए। एक तरह की “compound interest” thinking, small consistent practice।
“हम तुधु आगै नीवीरै।” “हम तेरे आगे ‘नीवीरै’ (नीचा, झुके)।”
टोडी का mood में रहते, सब conduct के साथ humility। बिना humility, सब conduct ego-feed बन जाती है।
“सेवा साधसंगत समिटी ब्रहम हेरीरै।” “सेवा और साधसंगति ‘समिटी’ (combined), ब्रह्म ‘हेरीरै’ (देखा गया)।”
formula: सेवा + साधसंगति = ब्रह्म-दर्शन।
simple equation, मगर execute करना मुश्किल। दिल्ली में सेवा करने वाले बहुत हैं, साधसंगत में जाने वाले भी हैं, मगर दोनों एक साथ, daily, with depth, यह rare है।
टोडी का यह यंत्र है, exhortation, मगर gently, बिना shouting।