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अंग 723

अंग
723
राग तिलंग
राग: तिलंग · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
खून के सोहिले गावीअहि नानक रतु का कुंगू पाइ वे लालो ॥1॥
साहिब के गुण नानकु गावै मास पुरी विचि आखु मसोला ॥
जिनि उपाई रंगि रवाई बैठा वेखै वखि इकेला ॥
सचा सो साहिबु सचु तपावसु सचड़ा निआउ करेगु मसोला ॥
काइआ कपड़ु टुकु टुकु होसी हिदुसतानु समालसी बोला ॥
आवनि अठतरै जानि सतानवै होरु भी उठसी मरद का चेला ॥
सच की बाणी नानकु आखै सचु सुणाइसी सच की बेला ॥2॥3॥5॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: हे नानक ! (इस ख़ूनी विवाह में सैदपुर नगर के अंदर चारों तरफ) विरलाप हो रहे हैं और लहू का केसर छिड़का जा रहा है। 1। (सैदपुर के कत्लेआम की ये दुर्घटना बहुत ही भयानक है।पर ये भी ठीक है कि जगत में ये सब कुछ मालिक-प्रभू की रजा में हो रहा है।इस वास्ते) लाशों भरे शहर में बैठ के भी नानक उस मालिक-प्रभू के गुण गाता है। (हे भाई लालो ! आप भी इस) अटॅल नियम को उचार (याद रख कि) जिस मालिक प्रभू ने (ये सृष्टि) पैदा की है।उसी ने ही इसे माया के मोह में प्रवृति किया हुआ है।वह स्वयं ही निर्लिप रहके (उन दुर्घटनाओं को) देख रहा है (जो माया के मोह के कारण घटित होती हैं)। वह मालिक-प्रभू अॅटल नियमों वाला है।उसका न्याय (अब तक) अॅटल है।वह (भविष्य में भी) अॅटल नियम को जारी रखेगा वही न्याय करेगा जो अटॅल है। (उस अॅटल नियम के मुताबिक ही इस वक्त सैदपुर में हर तरफ़) मानव-शरीर- रूपी कपड़े टुकड़े-टुकड़े हो रहे हैं।ये एक ऐसी भयानक घटना हुई है जिसको हिन्दुस्तान भुला नहीं सकेगा।(पर।हे भाई लालो ! जब तक मनुष्य माया के मोह में प्रवृति हैं।ऐसे कत्लेआम होते रहेंगे। मुग़ल आज) संवत् अठक्तर में आए हैं।ये संवत् सक्तानबे में चले जाएंगे।कोई और सूरमा भी उठ खड़ा होंगे। (जीव माया के रंग में मस्त हो के उम्र व्यर्थ गवा रहे हैं) नानक तो (इस वक्त भी) सदा कायम रहने वाले प्रभू की सिफत सालाह करता है।(सारी उम्र ही) ये सिफत सालाह करता रहेगा।क्योंकि मनुष्य को जीवन का ये समय ईश्वर की सिफत सालाह करने के लिए मिला है। 2। 3। 5।
तिलंग महला 4 घरु 2
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सभि आए हुकमि खसमाहु हुकमि सभ वरतनी ॥
सचु साहिबु साचा खेलु सभु हरि धनी ॥1॥
सालाहिहु सचु सभ ऊपरि हरि धनी ॥
जिसु नाही कोइ सरीकु किसु लेखै हउ गनी ॥ रहाउ ॥
पउण पाणी धरती आकासु घर मंदर हरि बनी ॥
विचि वरतै नानक आपि झूठु कहु किआ गनी ॥2॥1॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: तिलंग महला 4 घरु 2 सतिगुर प्रसादि ॥ हे भाई ! सारे जीव हुकम अनुसार पति-प्रभू से ही जगत में आए हैं।सारी दुनिया उसके हुकम में (ही) काम कर रही है। वह मालिक सदा कायम रहने वाला है।उसका (रचा हुआ जगत-) तमाशा अॅटल (नियमों वाला है)।हर जगह वह मालिक खुद मौजूद है। 1। हे भाई ! सदा-स्थिर हरी की सिफत-सालाह किया करो।वह हरी सब के ऊपर है और मालिक है। जिस हरी के बराबर का और कोई नहीं।मैं (तो) किस गिनती में हूँ कि उसके गुण बयान कर सकूँ।रहाउ। हे भाई ! हवा।पानी।धरती।आकाश- ये सारे परमात्मा के (रहने के वास्ते) घर-मंदिर बने हुए हैं। हे नानक ! इन सभी में परमात्मा खुद बस रहा है।बताओ।इनमें से किसको मैं असत्य कहूँ। 2। 1।
तिलंग महला 4 ॥
नित निहफल करम कमाइ बफावै दुरमतीआ ॥
जब आणै वलवंच करि झूठु तब जाणै जगु जितीआ ॥1॥
ऐसा बाजी सैसारु न चेतै हरि नामा ॥
खिन महि बिनसै सभु झूठु मेरे मन धिआइ रामा ॥ रहाउ ॥
सा वेला चिति न आवै जितु आइ कंटकु कालु ग्रसै ॥
तिसु नानक लए छडाइ जिसु किरपा करि हिरदै वसै ॥2॥2॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: तिलंग महला 4 ॥ हे मेरे मन ! दुर्मति वाला मनुष्य सदा वह काम करता रहता है जिनका कोई लाभ नहीं होता।(फिर भी ऐसे व्यर्थ कर्म करके) फुकरियाँ मारता रहता है (बड़े-बड़े बोल बोलता फिरता है)। जब कोई ठॅगी करके।कोई झूठ बोल के (कुछ धन-माल) ले आता है।तब समझता है कि मैंने दुनिया को जीत लिया है। 1। हे मेरे मन ! जगत ऐसा है जैसे एक खेल।एक छिन में नाश हो जाता है (पर खोटी बुद्धि वाला मनुष्य फिर भी) परमात्मा का नाम नहीं सिमरता। ये सारा नाशवंत है।हे मेरे मन ! आप तो परमात्मा का ध्यान धरता रह।रहाउ। हे मेरे मन ! खोटी मति वाले मनुष्य को वह वक्त (कभी) याद नहीं आता।जब दुखदाई काल आ के पकड़ लेता है। हे नानक ! जिस मनुष्य के हृदय में परमात्मा मेहर करके आ बसता है।उस को (मौत के डर से) छुड़ा लेता है। 2। 2। 7।
तिलंग महला 5 घरु 1
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
खाक नूर करदं आलम दुनीआइ ॥
असमान जिमी दरखत आब पैदाइसि खुदाइ ॥1॥
बंदे चसम दीदं फनाइ ॥
दुनंीआ मुरदार खुरदनी गाफल हवाइ ॥ रहाउ ॥
गैबान हैवान हराम कुसतनी मुरदार बखोराइ ॥
दिल कबज कबजा कादरो दोजक सजाइ ॥2॥
वली निआमति बिरादरा दरबार मिलक खानाइ ॥
जब अजराईलु बसतनी तब चि कारे बिदाइ ॥3॥
हवाल मालूमु करदं पाक अलाह ॥
बुगो नानक अरदासि पेसि दरवेस बंदाह ॥4॥1॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: तिलंग महला 5 घरु 1 सतिगुर प्रसादि ॥ हे भाई ! चेतन ज्योति और अचेतन मिट्टी मिला के परमात्मा ने ये जगत ये जहान बना दिया है। आसमान।धरती।वृक्ष। पानी (आदि ये सब कुछ) परमात्मा की ही रचना है। 1। हे मनुष्य ! जो कुछ आँखों से देखता है नाशवंत है। पर दुनिया (माया के) लालच में (परमात्मा को) भूली हुई है।हराम खाती रहती है (पराया हक खोती रहती है)।रहाउ। हे भाई ! ग़ाफ़ल मनुष्य भूतों।प्रेतों।पशुओं की तरह हराम मार के हराम खाता है। इसके दिल पर (माया का) पूरी तरह से कब्ज़ा हुआ रहता है।परमात्मा इसको दोजक की सजा देता है। 2। तब पालने वाला पिता।भाई।दरबार।जायदाद।घर- हे भाई ! ये सारे (जगत से) विदा होने के वक्त किस काम आएंगे।जब मौत का फरिश्ता (आ के) बाँध लेता है। 3। हे भाई ! पवित्र परमात्मा (आपके दिल का) सारा हाल जानता है। हे नानक ! संत जनों की संगति में रह के (परमात्मा के दर पे) अरदास किया कर (कि आपको माया की हवस में ना फसने दे)। 4। 1।
तिलंग घरु 2 महला 5 ॥
तुधु बिनु दूजा नाही कोइ ॥
तू करतारु करहि सो होइ ॥
तेरा जोरु तेरी मनि टेक ॥
सदा सदा जपि नानक एक ॥1॥
सभ ऊपरि पारब्रहमु दातारु ॥
तेरी टेक तेरा आधारु ॥ रहाउ ॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: तिलंग घरु 2 महला 5 ॥ हे प्रभू ! आप सारे जगत को पैदा करने वाला है। आपके बिना और कोई दूसरा कुछ करने के काबिल नहीं। जो कुछ आप करता है।वही होता है। (हम जीवों को) आपका ही ताण है।(हमारे) मन में आपका ही सहारा है। हे नानक ! सदा उस एक परमात्मा का नाम जपता रह। 1। हे भाई ! सब जीवों को दातें देने वाला परमात्मा सब जीवों के सर पर रखवाला है। हे प्रभू ! (हम जीवों को) आपका ही आसरा है।आपका ही सहारा है।रहाउ।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। सूही, बिलावल, और गोंड राग का क्षेत्र। गुरु राम दास की ‘लावां’ इसी सूही राग में बँधी, सोलहवीं सदी के मध्य की।

अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।

इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे नानक ! (इस ख़ूनी विवाह में सैदपुर नगर के अंदर चारों तरफ) विरलाप हो रहे हैं और लहू का केसर छिड़का जा रहा है।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।