तिलंग महला १ ॥ इआनड़ीए मानड़ा काइ करेहि ॥ आपनड़ै घरि हरि रंगो की न माणेहि ॥ सहु नेड़ै धनसँ बहु तू बहु बातीरै आगास माहि ॥१॥ सहु नेड़ै धन कउ है दूरे ॥रहाउ॥ बाबा बोलीऐ पति होइ ॥ ऊतम स्बद कमाईऐ ता हलतु पलतु दुइ बंनि लीसी ॥१॥
[ इस अंग की गहरी चिंतना ]
तिलंग के सबसे famous शबदों में से एक, “बाबा बोलीऐ पति होइ।”
“इआनड़ीए मानड़ा काइ करेहि।” “अनजान लड़की, मानड़ा (अभिमान) क्यों कर रही है?” नानक एक bride को address कर रहे हैं।
“मानड़ा” का diminutive form ध्यान देने योग्य है। यह “मान” नहीं, “छोटा मान” है। यानी जो अहंकार बच्चों जैसा है, immature।
दिल्ली में हम सब किसी न किसी “मान” को carry करते हैं, professional ego, family pride, individual achievement। नानक कह रहे हैं, यह “इआनड़ीए” है, अधूरा है, child-like है।
“आपनड़ै घरि हरि रंगो की न माणेहि।” “अपने घर में हरि का रंग क्यों नहीं माणती?”
क्यों गुरु नानक एक “अनजान लड़की” को scold कर रहे हैं? क्योंकि हम सब वही हैं। हरि अपने घर में है, हमारे ही अंदर, मगर हम बाहर ढूँढ़ रहे हैं।
“सहु नेड़ै धन कउ है दूरे।” “साजन पास है, धन (नायिका, हम) को दूर लगता है।”
यह सबसे beautiful paradox है। हरि पास है, मगर हमें दूर लगता है। दूर वो नहीं, हम हैं अपने ध्यान में।
“बाबा बोलीऐ पति होइ।” “बाबा, बोलने से पति (इज़्ज़त) होती है।”
यह सबसे important teaching है। हरि-नाम बोलने से ही पति-पद होता है।
दिल्ली में हम सब “silent prayer” को superior मानते हैं। नानक का instruction, “बोलो।” loud chanting का value है।
“इआनड़ीए मानड़ा काइ करेहि।” “अनजान लड़की, ‘मानड़ा’ (अभिमान) क्यों कर रही है?”
नानक एक bride को address कर रहे हैं। पंजाबी folk imagery, सब soul को “नायिका” के रूप में देखती है।
“मानड़ा” का diminutive form ध्यान देने योग्य है। यह “मान” नहीं, “छोटा मान” है। यानी जो अहंकार बच्चों जैसा है, immature।
दिल्ली में हम सब किसी न किसी “मान” को carry करते हैं, professional ego, family pride, individual achievement। नानक कह रहे हैं, यह “इआनड़ीए” है, अधूरा है, child-like है।
“आपनड़ै घरि हरि रंगो की न माणेहि।” “अपने घर में हरि का रंग क्यों नहीं माणती (enjoy करती)?”
क्यों गुरु नानक एक “अनजान लड़की” को scold कर रहे हैं? क्योंकि हम सब वही हैं। हरि अपने घर में है, हमारे ही अंदर, मगर हम बाहर ढूँढ़ रहे हैं।
दिल्ली में जब कोई teenager घर के “rebel” बन कर बाहर भागता है, माँ कहती है, “बेटा, घर में जो है, वो ढूँढ़ रहा है।” यह same dynamic है, but cosmic scale पर।
“सहु नेड़ै धन कउ है दूरे।” “साजन (हरि) पास है, धन (नायिका, हम) को दूर लगता है।”
यह सबसे beautiful paradox है। हरि पास है, मगर हमें दूर लगता है। दूर वो नहीं, हम हैं अपने ध्यान में।
दिल्ली में हम सब “दूर” जा कर ढूँढ़ते हैं spirituality, retreats, mountains, gurus, books। नानक कह रहे हैं, अपने घर में देख। वो वहीं बैठा है।
“बाबा बोलीऐ पति होइ।” “बाबा, बोलने से ‘पति’ (इज़्ज़त) होती है।”
और यह famous line। “बाबा” एक intimate address है, “बेटा-बेटी” का opposite। एक elder को address करना।
मगर यहाँ “बाबा” का use complex है। नानक अपने आप को भी “बाबा” कहते थे, उनके followers उनको “बाबा नानक” बुलाते थे। तो यह self-address भी हो सकता है। या यह audience address है।
“बोलीऐ पति होइ।” “बोलने से इज़्ज़त होती है।”
यह सबसे important teaching है। हरि-नाम बोलने से ही पति-पद होता है। silent contemplation भी valid है, मगर बोलना specific role play करता है।
दिल्ली में हम सब “silent prayer” को superior मानते हैं। नानक का instruction, “बोलो।” loud chanting का value है। यह voice को engage करता है, body को engage करता है, और community को engage करता है।
“ऊतम स्बद कमाईऐ।” “उत्तम शबद ‘कमाईऐ’ (कमाओ)।”
commercial language फिर से। उत्तम शबद को “कमाया” जाता है। यह passive recipient नहीं, यह active investment है।
“ता हलतु पलतु दुइ बंनि लीसी।” “तब ‘हलतु पलतु’ (इस लोक, पर लोक) दोनों ‘बँधि’ (बँध) लीसी।”
closing: दोनों लोक secure हो जाते हैं।
दिल्ली में हम सब “इस ज़िंदगी” पर बहुत focus रखते हैं। अगली ज़िंदगी abstract feel होती है। नानक एक practical approach देते हैं, “बोलने” से ही दोनों secure।