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अंग 697

अंग
697
राग Jaithsree
राग: Jaithsree · रचयिता: Guru Raam Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
जैतसरी मः 4 ॥
हम बारिक कछूअ न जानह गति मिति तेरे मूरख मुगध इआना ॥
हरि किरपा धारि दीजै मति ऊतम करि लीजै मुगधु सिआना ॥1॥
मेरा मनु आलसीआ उघलाना ॥
हरि हरि आनि मिलाइओ गुरु साधू मिलि साधू कपट खुलाना ॥ रहाउ ॥
गुर खिनु खिनु प्रीति लगावहु मेरै हीअरै मेरे प्रीतम नामु पराना ॥
बिनु नावै मरि जाईऐ मेरे ठाकुर जिउ अमली अमलि लुभाना ॥2॥
जिन मनि प्रीति लगी हरि केरी तिन धुरि भाग पुराना ॥
तिन हम चरण सरेवह खिनु खिनु जिन हरि मीठ लगाना ॥3॥
हरि हरि क्रिपा धारी मेरै ठाकुरि जनु बिछुरिआ चिरी मिलाना ॥
धनु धनु सतिगुरु जिनि नामु द्रिड़ाइआ जनु नानकु तिसु कुरबाना ॥4॥3॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: जैतसरी मः 4 ॥ हे भाई ! हम आपके अंजान मूर्ख बच्चे हैं।हम नहीं जान सकते कि आप कैसा है।और कितना बड़ा है। हे हरी ! मेहर करके मुझे अच्छी अक्ल दे।मुझ मूर्ख को समझदार बना ले। 1। हे भाई ! मेरा सुस्त मन (माया की नींद में) सो गया था। परमात्मा ने मुझे गुरू ला के मिला दिया।गुरू को मिल के (मेरे मन के) किवाड़ खुल गए हैं।रहाउ। हे गुरू ! मेरे हृदय में प्रभू के लिए हर वक्त की प्रीति पैदा कर दे।मेरे प्रीतम-प्रभू का नाम मेरे प्राण बन जाएं। हे मेरे मालिक प्रभू ! जैसे नशई मनुष्य नशे में खुश रहता है (और नशे के बिना घबराया फिरता है।वैसे ही) आपके नाम के बिना जीवात्मा व्याकुल हैं जाती है। 2। हे भाई ! जिन मनुष्यों के मन में परमात्मा की प्रीति पैदा हो जाती है।उनके धुर-दरगाह से मिले चिरों के भाग्य जाग जाते हैं। हे भाई ! जिन मनुष्यों को परमात्मा प्यारा लगने लग जाता है।हम हर वक्त उनके चरणों की सेवा करते हैं। 3। हे भाई ! मेरे मालिक प्रभू ने जिस मनुष्य पर मेहर की निगाह की।उसको चिरों से विछुड़े हुए को उसने अपने साथ मिला लिया। धंन है गुरू।धंन है गुरू।जिसने उसके हृदय में परमात्मा का नाम पक्का कर दिया।दास नानक उस गुरू से (सदा) सदके जाता है। 4। 3।
जैतसरी महला 4 ॥
सतिगुरु साजनु पुरखु वड पाइआ हरि रसकि रसकि फल लागिबा ॥
माइआ भुइअंग ग्रसिओ है प्राणी गुर बचनी बिसु हरि काढिबा ॥1॥
मेरा मनु राम नाम रसि लागिबा ॥
हरि कीए पतित पवित्र मिलि साध गुर हरि नामै हरि रसु चाखिबा ॥ रहाउ ॥
धनु धनु वडभाग मिलिओ गुरु साधू मिलि साधू लिव उनमनि लागिबा ॥
त्रिसना अगनि बुझी सांति पाई हरि निरमल निरमल गुन गाइबा ॥2॥
तिन के भाग खीन धुरि पाए जिन सतिगुर दरसु न पाइबा ॥
ते दूजै भाइ पवहि ग्रभ जोनी सभु बिरथा जनमु तिन जाइबा ॥3॥
हरि देहु बिमल मति गुर साध पग सेवह हम हरि मीठ लगाइबा ॥
जनु नानकु रेण साध पग मागै हरि होइ दइआलु दिवाइबा ॥4॥4॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।

हिन्दी अर्थ: जैतसरी महला 4 ॥ हे भाई ! गुरू (सब का) सज्जन है।गुरू महापुरख है।जिस मनुष्य को गुरू मिल जाता है।वह मनुष्य बड़े चाव से परमात्मा की सिफत-सलाह के फल खाने लग जाता है। हे भाई ! मनुष्य को माया-सपनी ग्रसे रखती है।पर गुरू के बचनों पर चलने की बरकति से परमात्मा (उसके अंदर से) वह जहर निकाल देता है। 1। (हे भाई ! गुरू की कृपा से) मेरा मन परमात्मा के नाम के स्वाद में मगन हो गया है। साधू गुरू को मिल के (जो मनुष्य) परमात्मा के नाम में (जुड़ते हैं)।परमात्मा का नाम-रस चखते हैं उन विकारियों को भी परमात्मा स्वच्छ जीवन वाले बना लेता है।रहाउ। हे भाई ! वह मनुष्य सराहनीय हो जाता है।बड़ी किस्मत वाला हो जाता है जिसको गुरू मिल जाता है।गुरू को मिल के उसकी सुरति ऊँची आत्मिक अवस्था में टिक जाती है। (ज्यों-ज्यों) वह परमात्मा के पवित्र करने वाले गुण गाता है (त्यों-त्यों उसके अंदर से) तृष्णा की आग बुझ जाती है।उसको आत्मिक शांति प्राप्त होती है। 2। हे भाई ! जिन मनुष्यों ने (कभी) गुरू के दर्शन नहीं किए वे भाग्यहीन हो गए।धुर दरगाह से ही उनको ये भाग्य-हीनता मिल गई। माया के मोह के कारण वे मनुष्य जनम-मरण के चक्कर में पड़े रहते हैं उनकी सारी जिंदगी व्यर्थ चली जाती है। 3। हे प्रभू ! हमें स्वच्छ बुद्धि दे।हम गुरू के चरणों में लगे रहें।और हे हरी ! आप हमें प्यारा लगता रहे। हे भाई ! दास नानक (तो प्रभू के दर से) गुरू के चरणों की धूड़ मांगता है।जिस पर प्रभू दयावान होता है उसे गुरू के चरणों की धूड़ बख्शता है। 4। 4।
जैतसरी महला 4 ॥
जिन हरि हिरदै नामु न बसिओ तिन मात कीजै हरि बांझा ॥
तिन सुंञी देह फिरहि बिनु नावै ओइ खपि खपि मुए करांझा ॥1॥
मेरे मन जपि राम नामु हरि माझा ॥
हरि हरि क्रिपालि क्रिपा प्रभि धारी गुरि गिआनु दीओ मनु समझा ॥ रहाउ ॥
हरि कीरति कलजुगि पदु ऊतमु हरि पाईऐ सतिगुर माझा ॥
हउ बलिहारी सतिगुर अपुने जिनि गुपतु नामु परगाझा ॥2॥
दरसनु साध मिलिओ वडभागी सभि किलबिख गए गवाझा ॥
सतिगुरु साहु पाइआ वड दाणा हरि कीए बहु गुण साझा ॥3॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: जैतसरी महला 4 ॥ हे भाई ! जिन मनुष्यों के हृदय में परमात्मा का नाम नहीं बसता।उनकी माँ को हरी बाँझ ही कर दिया करे (तो ठीक है। क्योंकि) उनका शरीर हरी-नाम से सूना रहता है।वे नाम से वंचित ही घूमते फिरते हैं।वे चिंताओं।कुड़न में दुखी हो-हो के आत्मिक मौत सहेड़ते रहते हैं। 1। हे मेरे मन ! उस परमात्मा का नाम जपा कर।जो आपके अंदर ही बस रहा है। हे भाई ! कृपालु प्रभू ने (जिस मनुष्य पर) कृपा की उसको गुरू ने आत्मिक जीवन की सूझ बख्शी उसका मन (नाम जपने की महत्वता को) समझ गया।रहाउ। हे भाई ! जगत में परमात्मा की सिफत-सालाह ही सबसे ऊँचा दर्जा है।(पर) परमात्मा गुरू के द्वारा (ही) मिलता है। हे भाई ! मैं अपने गुरू से कुर्बान जाता हूँ जिसने मेरे अंदर ही छुपे हुए बसते परमात्मा का नाम प्रगट कर दिया। 2। हे भाई ! जिस मनुष्य को बड़े भाग्यों से गुरू के दर्शन प्राप्त होते हैं।उसके सारे पाप दूर हो जाते हैं। जिसे बड़ा समझदार और शाह गुरू मिल गया।गुरू ने परमात्मा के बहुत सारे गुणों से उसको सांझीवाल बना दिया। 3।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।

गुरु रामदास जी 1574 में गुरु-गद्दी पर बैठे और 1581 तक रहे। उन्हीं ने अमृतसर शहर बसाया, हरमंदिर साहिब की नींव रखी। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य प्रेम की तस्वीरें बार-बार लौटती हैं। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्रीय शब्द-समूह है, उन्हीं की रचना है।

इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “जैतसरी मः 4 ॥ हे भाई ! हम आपके अंजान मूर्ख बच्चे हैं।”

एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।