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अंग 718

अंग
718
राग टोडी
राग: टोडी · रचयिता: Bhagat Naam Dev Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
टोडी महला 5 ॥
हरि हरि चरन रिदै उर धारे ॥
सिमरि सुआमी सतिगुरु अपुना कारज सफल हमारे ॥1॥ रहाउ ॥
पुंन दान पूजा परमेसुर हरि कीरति ततु बीचारे ॥
गुन गावत अतुल सुखु पाइआ ठाकुर अगम अपारे ॥1॥
जो जन पारब्रहमि अपने कीने तिन का बाहुरि कछु न बीचारे ॥
नाम रतनु सुनि जपि जपि जीवा हरि नानक कंठ मझारे ॥2॥11॥30॥
भगत नामदेव महाराष्ट्र के संत थे, तेरहवीं-चौदहवीं सदी के। पंढरपुर के विट्ठल-मन्दिर से जुड़े, मगर बाद में पंजाब आ कर बसे, और गुरुदासपुर के पास उनकी समाधि है।

हिन्दी अर्थ: टोडी महला 5 ॥ हे भाई ! परमात्मा के चरण सदा अपने हृदय में संभाल के रख। अपने गुरू को।मालिक प्रभू को सिमर के हम जीवों के सारे काम सिरे चढ़ सकते हैं। 1।रहाउ। हे भाई ! सारी विचारों का निचोड़ ये है कि परमात्मा की सिफत सालाह ही परमात्मा की पूजा है।और दान पुंन है। अपहुँच और बेअंत मालिक-प्रभू के गुण गा के बेअंत सुख प्राप्त कर लेने हैं। 1। हे भाई ! जिन मनुष्यों को परमात्मा ने अपने (सेवक) बना लिया उनके कर्मों का फिर लेखा नहीं पूछता। हे नानक ! (कह) मैंने भी परमात्मा के रत्न (जैसे कीमती) नाम को अपने गले से परो लिया है।नाम सुन-सुन के जप-ज पके मैं आत्मिक जीवन प्राप्त कर रहा हूँ। 2। 11। 30।
टोडी महला 9
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
कहउ कहा अपनी अधमाई ॥
उरझिओ कनक कामनी के रस नह कीरति प्रभ गाई ॥1॥ रहाउ ॥
जग झूठे कउ साचु जानि कै ता सिउ रुच उपजाई ॥
दीन बंध सिमरिओ नही कबहू होत जु संगि सहाई ॥1॥
मगन रहिओ माइआ मै निस दिनि छुटी न मन की काई ॥
कहि नानक अब नाहि अनत गति बिनु हरि की सरनाई ॥2॥1॥31॥
नामदेव की वाणी में मराठी और पंजाबी दोनों के असर हैं। आदि ग्रंथ में उनकी छियासठ रचनाएँ हैं, अधिकांश भक्ति-प्रधान।

हिन्दी अर्थ: टोडी महला 9 सतिगुर प्रसादि ॥ हे भाई ! मैं अपनी नीचता कितनी बयान करूँ। मैंने (कभी) परमात्मा की सिफत-सालाह नहीं की।(मेरा मन) धन-पदार्थ और स्त्री के रसों में फसा रहता है। 1।रहाउ। हे भाई ! इस नाशवंत संसार को सदा कायम रहने वाला समझ के मैंने इस संसार से ही प्रीति बनाई हुई है। मैंने उस परमात्मा का नाम कभी नहीं सिमरा जो दीन-बँधु है और जो (सदा हमारे) साथ मददगार है। 1। हे भाई ! मैं रात-दिन माया (के मोह) में मस्त रहा हूँ।(इस तरह मेरे) मन की मैल दूर नहीं हो सकी। हे नानक ! कह, अब (जब मैं गुरू की शरण पड़ा हूँ।तब मुझे समझ आई है कि) प्रभू की शरण पड़े बिना किसी भी और जगह उच्च आत्मिक अवस्था प्राप्त नहीं हो सकती। 2। 1। 31।
टोडी बाणी भगतां की
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
कोई बोलै निरवा कोई बोलै दूरि ॥
जल की माछुली चरै खजूरि ॥1॥
कांइ रे बकबादु लाइओ ॥
जिनि हरि पाइओ तिनहि छपाइओ ॥1॥ रहाउ ॥
पंडितु होइ कै बेदु बखानै ॥
मूरखु नामदेउ रामहि जानै ॥2॥1॥
कउन को कलंकु रहिओ राम नामु लेत ही ॥
पतित पवित भए रामु कहत ही ॥1॥ रहाउ ॥
राम संगि नामदेव जन कउ प्रतगिआ आई ॥
एकादसी ब्रतु रहै काहे कउ तीरथ जाइंी ॥1॥
भनति नामदेउ सुक्रित सुमति भए ॥
गुरमति रामु कहि को को न बैकुंठि गए ॥2॥2॥
भगत नामदेव महाराष्ट्र के संत थे, तेरहवीं-चौदहवीं सदी के। पंढरपुर के विट्ठल-मन्दिर से जुड़े, मगर बाद में पंजाब आ कर बसे, और गुरुदासपुर के पास उनकी समाधि है।

हिन्दी अर्थ: टोडी बाणी भगतां की सतिगुर प्रसादि ॥ कोई मनुष्य कहता है (परमात्मा हमारे) नजदीक (बसता है)।कोई कहता है (प्रभू हमसे कहीं) दूर (जगह पर है); (पर निरी बहस से निर्णय करना यूँ ही असंभव है जैसे) पानी में रहने वाली मछली खजूर पर चढ़ने का यतन करे (जिस पर आदमी भी बड़ी ही मुश्किल से चढ़ता है)। 1। हे भाई ! (ईश्वर नजदीक है कि दूर जिस बाबत अपनी विद्या का बखान करने के लिए) क्यों व्यर्थ की बहस करते हैं। जिस मनुष्य ने रॅब को पा लिया उसने (अपने आप को) छुपाया है (भाव।वह इन बहसों से अपनी विद्या का ढंढोरा नहीं पीटता फिरता)। 1।रहाउ। विद्या हासिल करके (ब्राहमण आदि तो) वेद (आदि धार्मिक पुस्तकों) की विस्तार से चर्चा करता फिरता है। पर मूर्ख नामदेव सिर्फ परमात्मा को ही पहचानता है (केवल परमात्मा के साथ ही उसके सिमरन के द्वारा सांझ डालता है)। 2। 1। परमात्मा का नाम सिमरने से किसी जीव का कोई (भी) पाप नहीं रह जाता; विकारों में खचित लोग भी प्रभू का भजन करके पवित्र हो जाते हैं। 1।रहाउ। प्रभू के चरणों में जुड़ के दास नामदेव को ये निश्चय आ गया है कि किसी एकादसी (आदि) वर्त की जरूरत नहीं; और मैं तीर्थों पर भी क्यों जाऊँ। 1। नामदेव कहता है, गुरू के बताए हुए राह पर चल के।प्रभू का नाम सिमर के सब जीव प्रभू के देश में पहुँच जाते हैं। (क्योंकि नाम की बरकति से जीव) अच्छी करणी वाले और अच्छी अक्ल वाले हो जाते हैं। 2। 2।
तीनि छंदे खेलु आछै ॥1॥ रहाउ ॥
कुंभार के घर हांडी आछै राजा के घर सांडी गो ॥
बामन के घर रांडी आछै रांडी सांडी हांडी गो ॥1॥
बाणीए के घर हींगु आछै भैसर माथै सींगु गो ॥
देवल मधे लीगु आछै लीगु सीगु हीगु गो ॥2॥
तेली कै घर तेलु आछै जंगल मधे बेल गो ॥
माली के घर केल आछै केल बेल तेल गो ॥3॥
संतां मधे गोबिंदु आछै गोकल मधे सिआम गो ॥
नामे मधे रामु आछै राम सिआम गोबिंद गो ॥4॥3॥
नामदेव की वाणी में मराठी और पंजाबी दोनों के असर हैं। आदि ग्रंथ में उनकी छियासठ रचनाएँ हैं, अधिकांश भक्ति-प्रधान।

हिन्दी अर्थ: (परमात्मा का रचा हुआ ये जगत) त्रै-गुणी स्वाभाव का तमाशा है। 1।रहाउ। (साधारण तौर पर) कुम्हार के घर हांडी (ही मिलती) है।राजा के घर सांढी (आदि ही) है; और ब्राहमण के घर (शगुन।महूरत आदि विचारने के लिए) पत्री (आदि पुस्तकें ही मिलती) हैं। (इन घरों में) पत्री।सांढनी।बर्तन (हांडी) ही (प्रधान हैं)। 1। दुकानदार के घर (भाव।दुकान में) हींग (आदि ही मिलती) है।भैंसे के माथे पर (उसके स्वभाव के मुताबिक) सींग (ही) हैं। और देवालय (देवस्थान) में लिंग (ही गढ़ा हुआ) दिखता है।(इन जगहों पर) हींग।सींग।और लिंग ही (प्रधान) हैं। 2। (यदि) तेली के घर (जाऐ।तो वहाँ अंदर-बाहर) तेल (ही तेल पड़ा) है।जंगलों में बेल (ही बेल) हैं और माली के घर केला (ही लगा मिलता) है।इन स्थानों पर तेल।बेलें और केले ही (प्रधान हैं)। 3। (तो फिर।इस जगत-तमाशे का रचयता कहाँ हुआ।) (जैसे) गोकुल में कृष्ण जी (की ही बात चल रही) है।(वैसे ही इस खेल का मालिक) गोबिंद संतों के हृदय में बस रहा है। (वही) राम नामदेव के (भी) अंदर (प्रत्यक्ष बस रहा) है।(जिन जगहों पर।भाव।संतों के हृदय में।गोकुल में और नामदेव के अंदर) गोबिंद श्याम और राम ही (गरज रहे) हैं। 4। 3।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।

नामदेव के बारे में परम्परा कहती है कि उनके स्पर्श से एक मन्दिर का दरवाज़ा घूम कर उनकी ओर हो गया। आदि ग्रंथ में उनकी कई रचनाएँ हैं, अधिकांश भक्ति-प्रधान।

इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “टोडी महला 5 ॥ हे भाई ! परमात्मा के चरण सदा अपने हृदय में संभाल के रख।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।