ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ राग टोडी बाणी भगत नामदेव जी की ॥ कउन को कलंकु रहिओ राम नामु लेत ही ॥ पतित पवित भए राम कहत ही ॥१॥रहाउ॥ राम संगि नामदेव जन कउ प्रतगिआ आई ॥ एकादसी ब्रत रहै कांइ बिखै कमारी ॥१॥
[ इस अंग की गहरी चिंतना ]
टोडी का closing अंग। नामदेव का स्वर इस “yearning” राग में clean precision जोड़ता है।
“कउन को कलंकु रहिओ राम नामु लेत ही।” यह सवाल नहीं, declaration है।
नामदेव छीपी (कपड़ा छापने वाले) परिवार से थे। समाज ने उनको “नीच जाति” का बना दिया था। मगर उन्होंने इस “कलंक” को कभी अपनी identity का part नहीं माना।
उनका answer specific है: “राम-नाम।”
यह सबसे radical statement है। “जाति-कलंक” social construct है। नामदेव कह रहे हैं, “राम-नाम” लेते ही यह construct dissolve होता है। इसका authority external society से नहीं, internal practice से आती है।
“पतित पवित भए राम कहत ही।” “पतित (fallen) पवित्र हुए राम कहते ही।”
यह नामदेव की पूरी ज़िंदगी का summary है। उन्होंने प्रमाण दिया, “जाति” से नहीं, “नाम लेने” से पवित्रता आती है।
दिल्ली में आज भी “purity” की बहुत बातें होती हैं। कौन छू सकता है, कौन नहीं। कौन accept है, कौन नहीं। यह invisible boundaries हर जगह हैं। नामदेव 700 साल पहले यह बोल गए थे, “राम-नाम से सब equal हो जाते हैं।”
और बहुत significant: नामदेव यहाँ टोडी राग में बोल रहे हैं। टोडी का stillness, यह introspective afternoon, में नामदेव की directness fit होती है।
राग आदमी को “अंदर” ले जाता है, और जो लोग ख़ुद से honest हो सकते हैं, वो ही जाति-कलंक-religious-ritual को question कर सकते हैं।
नामदेव जी का यह shabad टोडी के 8-ang section का closing है। और यह उनकी सबसे memorable पंक्तियों में से एक है।
“कउन को कलंकु रहिओ राम नामु लेत ही।” “किसका ‘कलंक’ (stigma) रहता है राम-नाम लेते ही?”
भगत नामदेव की voice characteristic है। बहुत direct, बहुत confident, सवाल के रूप में statement।
नामदेव छीपी (कपड़ा छापने वाले) परिवार से थे। समाज ने उनको “नीच जाति” का बना दिया था। मगर उन्होंने इस “कलंक” को कभी अपनी identity का part नहीं माना। उनका answer, “राम-नाम।”
यह सबसे radical statement है। “जाति-कलंक” social construct है। नामदेव कह रहे हैं, “राम-नाम” लेते ही यह construct dissolve होता है। इसका authority external society से नहीं, internal practice से आती है।
“पतित पवित भए राम कहत ही।” “पतित (fallen) पवित्र हुए राम कहते ही।”
यह नामदेव की पूरी ज़िंदगी का summary है। उन्होंने प्रमाण दिया, “जाति” से नहीं, “नाम लेने” से पवित्रता आती है।
दिल्ली में आज भी “purity” की बहुत बातें होती हैं। कौन छू सकता है, कौन नहीं। कौन accept है, कौन नहीं। यह invisible boundaries हर जगह हैं। नामदेव 700 साल पहले यह बोल गए थे, “राम-नाम से सब equal हो जाते हैं।” यह radical equality है।
“राम संगि नामदेव जन कउ प्रतगिआ आई।” “राम के साथ नामदेव-जन को ‘प्रतिज्ञा’ (vow) आई।”
नामदेव कहते हैं, राम के साथ रहने से उनको एक vow मिली। यह commitment की language है। relationship-based commitment।
दिल्ली में हम सब किसी न किसी “प्रतिज्ञा” को carry करते हैं, family commitment, professional vows, personal pledges। नामदेव की प्रतिज्ञा अलग है, यह राम-के-साथ का commitment है।
“एकादसी ब्रत रहै कांइ बिखै कमारी।” “‘एकादशी’ का व्रत क्या, ‘बिखै’ (विषयों) में रहा?”
critical question। एक तरफ़ आप एकादशी का व्रत रख रहे हो, दूसरी तरफ़ “विषयों” (sense pleasures) में रहे हो? यह hypocrisy है।
दिल्ली में बहुत लोग religious rituals follow करते हैं, fasting, vrat, puja, मगर बाक़ी life में same patterns. नामदेव की sharp observation है, यह combination meaningless है।
महाराष्ट्र की वारकरी tradition में नामदेव central figure हैं। उनकी बानी पंजाब में आ कर गुरु नानक से ले कर पाँचवें गुरु तक सबने respect के साथ ली। यह पंजाब-महाराष्ट्र, north-south, कोई divide नहीं।
दिल्ली में हम सब “regional identity” को बहुत carry करते हैं। नामदेव और गुरु नानक की बाणी same volume में पड़ोसी है, यह reminder है, “सच की कोई region नहीं।”
और बहुत significant: नामदेव यहाँ टोडी राग में बोल रहे हैं। टोडी का stillness, यह introspective afternoon, में नामदेव की directness fit होती है। राग आदमी को “अंदर” ले जाता है, और जो लोग ख़ुद से honest हो सकते हैं, वो ही जाति-कलंक-religious-ritual को question कर सकते हैं।