हरि हरि चरन रिदै उर धारे ॥
सिमरि सुआमी सतिगुरु अपुना कारज सफल हमारे ॥1॥ रहाउ ॥
पुंन दान पूजा परमेसुर हरि कीरति ततु बीचारे ॥
गुन गावत अतुल सुखु पाइआ ठाकुर अगम अपारे ॥1॥
जो जन पारब्रहमि अपने कीने तिन का बाहुरि कछु न बीचारे ॥
नाम रतनु सुनि जपि जपि जीवा हरि नानक कंठ मझारे ॥2॥11॥30॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
कहउ कहा अपनी अधमाई ॥
उरझिओ कनक कामनी के रस नह कीरति प्रभ गाई ॥1॥ रहाउ ॥
जग झूठे कउ साचु जानि कै ता सिउ रुच उपजाई ॥
दीन बंध सिमरिओ नही कबहू होत जु संगि सहाई ॥1॥
मगन रहिओ माइआ मै निस दिनि छुटी न मन की काई ॥
कहि नानक अब नाहि अनत गति बिनु हरि की सरनाई ॥2॥1॥31॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
कोई बोलै निरवा कोई बोलै दूरि ॥
जल की माछुली चरै खजूरि ॥1॥
कांइ रे बकबादु लाइओ ॥
जिनि हरि पाइओ तिनहि छपाइओ ॥1॥ रहाउ ॥
पंडितु होइ कै बेदु बखानै ॥
मूरखु नामदेउ रामहि जानै ॥2॥1॥
कउन को कलंकु रहिओ राम नामु लेत ही ॥
पतित पवित भए रामु कहत ही ॥1॥ रहाउ ॥
राम संगि नामदेव जन कउ प्रतगिआ आई ॥
एकादसी ब्रतु रहै काहे कउ तीरथ जाइंी ॥1॥
भनति नामदेउ सुक्रित सुमति भए ॥
गुरमति रामु कहि को को न बैकुंठि गए ॥2॥2॥
कुंभार के घर हांडी आछै राजा के घर सांडी गो ॥
बामन के घर रांडी आछै रांडी सांडी हांडी गो ॥1॥
बाणीए के घर हींगु आछै भैसर माथै सींगु गो ॥
देवल मधे लीगु आछै लीगु सीगु हीगु गो ॥2॥
तेली कै घर तेलु आछै जंगल मधे बेल गो ॥
माली के घर केल आछै केल बेल तेल गो ॥3॥
संतां मधे गोबिंदु आछै गोकल मधे सिआम गो ॥
नामे मधे रामु आछै राम सिआम गोबिंद गो ॥4॥3॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।
नामदेव के बारे में परम्परा कहती है कि उनके स्पर्श से एक मन्दिर का दरवाज़ा घूम कर उनकी ओर हो गया। आदि ग्रंथ में उनकी कई रचनाएँ हैं, अधिकांश भक्ति-प्रधान।
इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “टोडी महला 5 ॥ हे भाई ! परमात्मा के चरण सदा अपने हृदय में संभाल के रख।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।