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अंग 698

अंग
698
राग Jaithsree
राग: Jaithsree · रचयिता: Guru Raam Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
जिन कउ क्रिपा करी जगजीवनि हरि उरि धारिओ मन माझा ॥
धरम राइ दरि कागद फारे जन नानक लेखा समझा ॥4॥5॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।

हिन्दी अर्थ: हे भाई ! जगत के जीवन प्रभू ने जिन मनुष्यों पर कृपा की।उन्होंने अपने मन में हृदय में परमात्मा का नाम टिका लिया। हे नानक ! (कह, हे भाई !) धर्मराज के दर पर उन मनुष्यों के (किए कर्मों के लेखे के सारे) कागज फाड़ दिए गए।उन दासों का लेखा निपट गया। 4। 5।
जैतसरी महला 4 ॥
सतसंगति साध पाई वडभागी मनु चलतौ भइओ अरूड़ा ॥
अनहत धुनि वाजहि नित वाजे हरि अंम्रित धार रसि लीड़ा ॥1॥
मेरे मन जपि राम नामु हरि रूड़ा ॥
मेरै मनि तनि प्रीति लगाई सतिगुरि हरि मिलिओ लाइ झपीड़ा ॥ रहाउ ॥
साकत बंध भए है माइआ बिखु संचहि लाइ जकीड़ा ॥
हरि कै अरथि खरचि नह साकहि जमकालु सहहि सिरि पीड़ा ॥2॥
जिन हरि अरथि सरीरु लगाइआ गुर साधू बहु सरधा लाइ मुखि धूड़ा ॥
हलति पलति हरि सोभा पावहि हरि रंगु लगा मनि गूड़ा ॥3॥
हरि हरि मेलि मेलि जन साधू हम साध जना का कीड़ा ॥
जन नानक प्रीति लगी पग साध गुर मिलि साधू पाखाणु हरिओ मनु मूड़ा ॥4॥6॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: जैतसरी महला 4 ॥ हे भाई ! जिस मनुष्य ने बड़े भाग्यों से गुरू की साध-संगति प्राप्त कर ली।उसका भटकता मन टिक गया। उसके अंदर एक-रस रौंअ से (जैसे) सदा बाजे बजते रहते हैं।आत्मिक जीवन देने वाले नाम-जल की धारा प्रेम से (पी-पी के) वह तृप्त हो जाता है। 1। हे मेरे मन ! सुंदर परमात्मा का नाम (सदा) जपा कर। हे भाई ! गुरू ने मेरे मन में।मेरे हृदय में परमात्मा का प्यार पैदा कर दिया है।अब परमात्मा मुझे जप्फी डाल के मिल गया है।रहाउ। हे भाई ! परमात्मा से टूटे हुए मनुष्य माया के मोह में बँधे रहते हैं।वह जोर लगा के (आत्मिक मौत लाने वाली माया) जहर ही इकट्ठी करते रहते हैं। वह मनुष्य उस माया को परमात्मा की राह पर खर्च नहीं कर सकते।(इस वास्ते वे) आत्मिक मौत का दुख अपने सिर पर सहते रहते हैं। 2। हे भाई ! जिन मनुष्यों ने बड़ी श्रद्धा से गुरू के चरणों की धूड़ अपने माथे पर लगा के अपना शरीर परमात्मा को अर्पित कर दिया। वे मनुष्य इस लोक में परलोक में शोभा कमाते हैं।उनके मन में परमात्मा से गूढ़ा प्यार बन जाता है। 3। हे हरी ! हे प्रभू ! मुझे गुरू मिला।मैं गुरू के सेवकों का निमाणा दास हूँ। हे दास नानक ! (कह) जिस मनुष्य के अंदर गुरू के चरणों का प्यार बन जाता है।गुरू को मिल के उसका मूर्ख पत्थर (की तरह कठोर) मन हरा हो जाता है। 4। 6।
जैतसरी महला 4 घरु 2
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
हरि हरि सिमरहु अगम अपारा ॥
जिसु सिमरत दुखु मिटै हमारा ॥
हरि हरि सतिगुरु पुरखु मिलावहु गुरि मिलिऐ सुखु होई राम ॥1॥
हरि गुण गावहु मीत हमारे ॥
हरि हरि नामु रखहु उर धारे ॥
हरि हरि अंम्रित बचन सुणावहु गुर मिलिऐ परगटु होई राम ॥2॥
मधुसूदन हरि माधो प्राना ॥
मेरै मनि तनि अंम्रित मीठ लगाना ॥
हरि हरि दइआ करहु गुरु मेलहु पुरखु निरंजनु सोई राम ॥3॥
हरि हरि नामु सदा सुखदाता ॥
हरि कै रंगि मेरा मनु राता ॥
हरि हरि महा पुरखु गुरु मेलहु गुर नानक नामि सुखु होई राम ॥4॥1॥7॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।

हिन्दी अर्थ: जैतसरी महला 4 घरु 2 ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। हे भाई ! उस अपहुँच और बेअंत परमात्मा का नाम सिमरा करो। जिसको सिमरने से हम जीवों का हरेक दुख दूर हो सकता है। हे हरी ! हे प्रभू ! हमें गुरू महांपुरुष मिला दे।अगर गुरू मिल जाए।तो आत्मिक आनंद प्राप्त हो जाता है। 1। हे मेरे मित्रो ! परमात्मा की सिफत सालाह के गीत गाया करो। परमात्मा का नाम अपने हृदय में टिकाए रखो। परमात्मा की सिफत सालाह के आत्मिक जीवन देने वाले बोल (मुझे भी) सुनाया करो।(हे मित्रो ! गुरू की शरण पड़े रहो)।अगर गुरू मिल जाए।तो परमात्मा हृदय में प्रगट हो जाता है। 2। हे दूतों के नाश करने वाले ! हे माया के पति ! हे मेरी जिंद (के सहारे) ! मेरे मन में। मेरे हृदय में।आत्मिक जीवन देने वाला आपका नाम मीठा लग रहा है। हे हरी ! हे प्रभू ! (मेरे पर) मेहर कर।मुझे वह महापुरुष गुरू मिला जो माया के प्रभाव से ऊपर है। 3। हे भाई ! परमात्मा का नाम सदा सुख देने वाला है। मेरा मन उस परमात्मा के प्यार में मस्त रहता है। हे नानक ! (कह) हे हरी ! मुझे गुरू महापुरुख मिला।हे गुरू ! (आपके बख्शे) हरी-नाम में जुड़ने से आत्मिक आनंद मिलता है। 4। 1। 7।
जैतसरी मः 4 ॥
हरि हरि हरि हरि नामु जपाहा ॥
गुरमुखि नामु सदा लै लाहा ॥
हरि हरि हरि हरि भगति द्रिड़ावहु हरि हरि नामु ओुमाहा राम ॥1॥
हरि हरि नामु दइआलु धिआहा ॥
हरि कै रंगि सदा गुण गाहा ॥
हरि हरि हरि जसु घूमरि पावहु मिलि सतसंगि ओुमाहा राम ॥2॥
आउ सखी हरि मेलि मिलाहा ॥
सुणि हरि कथा नामु लै लाहा ॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: जैतसरी मः 4 ॥ हे भाई ! सदा ही परमात्मा का नाम जपा करो। गुरू की शरण पड़ कर सदा परमात्मा के नाम की कमाई करते रहो। हे भाई ! परमात्मा की भक्ति अपने हृदय में पक्की करके टिका लो।परमात्मा का नाम (मनुष्य के मन में) आनंद पैदा करता है। 1। हे भाई ! परमात्मा दया का श्रोत है।उसका नाम सदा सिमरते रहो। परमात्मा के प्रेम-रंग में टिक के उसके गुण गाते रहो। हे भाई ! सदा परमात्मा की सिफत सालाह करते रहो (सिफत सालाह मन को मस्त करने वाला नृत्य है।ये) नाच नाचो।हे भाई ! साध-संगति में मिल के आत्मिक आनंद लिया करो। 2। हे संत सगियो ! आएँ।मिल के प्रभू के चरणों में जुड़ें। हे सत्संगियो ! परमात्मा के सिफत सालाह की बातें सुन के परमात्मा के नाम-सिमरन की कमाई करते रहो।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।

रामदास जी का जीवन-व्यवहार और रचना दोनों एक तरह की संगति में रहीं। अमृतसर का चयन, हरमंदिर साहिब का स्थल, और सूही राग की भावुक रचनाएँ, सब एक ही मनोदशा के अलग-अलग पहलू हैं।

इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे भाई ! जगत के जीवन प्रभू ने जिन मनुष्यों पर कृपा की।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।