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अंग 719

अंग
719
राग Baihaaree
राग: Baihaaree · रचयिता: Guru Raam Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
रागु बैराड़ी महला 4 घरु 1 दुपदे
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सुनि मन अकथ कथा हरि नाम ॥
रिधि बुधि सिधि सुख पावहि भजु गुरमति हरि राम राम ॥1॥ रहाउ ॥
नाना खिआन पुरान जसु ऊतम खट दरसन गावहि राम ॥
संकर क्रोड़ि तेतीस धिआइओ नही जानिओ हरि मरमाम ॥1॥
सुरि नर गण गंध्रब जसु गावहि सभ गावत जेत उपाम ॥
नानक क्रिपा करी हरि जिन कउ ते संत भले हरि राम ॥2॥1॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: रागु बैराड़ी महला 4 घरु 1 दुपदे ऑकार वही एक है, जिसे सच्चे गुरु की कृपा से पाया जा सकता है। हे (मेरे) मन ! उस परमात्मा के नाम की सिफत सालाह सुना कर जिसका सही स्वरूप बयान नहीं किया जा सकता। हे मन ! गुरू की मति पर चल के परमात्मा का भजन किया कर।आप धन-पदार्थ।ऊँची अक्ल।करामाती ताकतें।सारे सुख (हरी-नाम में ही) प्राप्त कर लेगा। 1।रहाउ। हे मन ! (उस अकथ परमात्मा का सिमरन किया कर जिसका) उक्तम यश (महाभारत आदि) अनेकों प्रसंग।पुराण और छे शास्त्र गाते हैं (पर उसका अंत नहीं पा सके)। शिव जी और तैंतिस करोड़ देवताओं ने भी उसका ध्यान धरा।पर उस हरी का भेद नहीं पाया। 1। (हे मन ! उस परमात्मा की कथा सुना कर जिसका) यश देवतागण।मनुष्य व गंधर्व गाते आ रहे हैं।जितनी भी पैदा की हुई सृष्टि है।सारी जिसके गुण गाती है। हे नानक ! (कह,हे मन !) परमात्मा जिन मनुष्यों पर कृपा करता है।वह मनुष्य उच्च जीवन वाले संत बन जाते हैं (वैसे उसका कोई भेद नहीं पाया जा सकता)। 2। 1।
बैराड़ी महला 4 ॥
मन मिलि संत जना जसु गाइओ ॥
हरि हरि रतनु रतनु हरि नीको गुरि सतिगुरि दानु दिवाइओ ॥1॥ रहाउ ॥
तिसु जन कउ मनु तनु सभु देवउ जिनि हरि हरि नामु सुनाइओ ॥
धनु माइआ संपै तिसु देवउ जिनि हरि मीतु मिलाइओ ॥1॥
खिनु किंचित क्रिपा करी जगदीसरि तब हरि हरि हरि जसु धिआइओ ॥
जन नानक कउ हरि भेटे सुआमी दुखु हउमै रोगु गवाइओ ॥2॥2॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।

हिन्दी अर्थ: बैराड़ी महला 4 ॥ हे मन !उसने संत जनों के साथ मिल के परमात्मा की सिफत सालाह करनी शुरू कर दी। x गुरू ने सतिगुरू ने (जिस मनुष्य को परमात्मा से) परमात्मा का नाम-रत्न कीमती नाम बख्शिश के तौर पर दिलवा दिया।हे मन ! हे मन ! मैं उस मनुष्य को अपना मन तन सब कुछ भेटा करता हूँ।जिसने (मुझे) परमात्मा का नाम सुनाया है। धन-पदार्थ-माया उसके हवाले करता हूँ।जिसने (मुझे) मित्र प्रभू मिलाया है। 1। हे मन ! जगत के मालिक प्रभू ने जब (किसी सेवक पर) एक पल भर के लिए थोड़ी जितनी भी मेहर कर दी।उसने तब परमात्मा की सिफत सालाह करनी शुरू कर दी। हे नानक ! जिस मनुष्य को मालिक प्रभू जी मिल गए।उसका हरेक दुख (और) अहम् अहंकार का रोग दूर हो गया। 2। 2।
बैराड़ी महला 4 ॥
हरि जनु राम नाम गुन गावै ॥
जे कोई निंद करे हरि जन की अपुना गुनु न गवावै ॥1॥ रहाउ ॥
जो किछु करे सु आपे सुआमी हरि आपे कार कमावै ॥
हरि आपे ही मति देवै सुआमी हरि आपे बोलि बुलावै ॥1॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: बैराड़ी महला 4 ॥ हे भाई ! परमात्मा का भक्त सदा परमात्मा के गुण गाता रहता है। अगर कोई मनुष्य उस भगत की निंदा (भी) करता है तो वह भगत अपना स्वभाव नहीं त्यागता। 1।रहाउ। हे भाई ! (भक्त अपनी निंदा सुन के भी अपना स्वभाव नहीं त्यागता।क्योंकि वह जानता है कि) जो कुछ कर रहा है मालिक-प्रभू खुद ही (जीवों में बैठ के) कर रहा है।वह खुद ही हरेक कार कर रहा है। मालिक-प्रभू खुद ही (हरेक जीव को) मति देता है।खुद ही (हरेक में बैठा) बोल रहा है।खुद ही (हरेक जीव को) बोलने की प्रेरणा कर रहा है। 1।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।

गुरु रामदास जी 1574 में गुरु-गद्दी पर बैठे और 1581 तक रहे। उन्हीं ने अमृतसर शहर बसाया, हरमंदिर साहिब की नींव रखी। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य प्रेम की तस्वीरें बार-बार लौटती हैं। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्रीय शब्द-समूह है, उन्हीं की रचना है।

इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “रागु बैराड़ी महला 4 घरु 1 दुपदे ऑकार वही एक है, जिसे सच्चे गुरु की कृपा से पाया जा सकता है।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।