अंग 719, राग बैरारी प्रारम्भ (deepened)

SGGS, Ang
719
राग बैरारी, महला 4 (प्रारम्भ)
राग: राग बैरारी · रचयिता: गुरु राम दास जी · महला 4
पढ़ने का समय: लगभग 4 मिनट
यह राग बैरारी है, पूरे ग्रंथ साहिब में सिर्फ़ 2 अंगों पर। यह सबसे छोटा राग-section है। रात देर का राग, intimate, लगभग एक whisper। भैरों परिवार से जुड़ा, मगर भैरों की grandeur के बिना, ज़्यादा personal। यहाँ सिर्फ़ चौथे गुरु, गुरु राम दास जी बोलते हैं। वो “लावाँ” (सिख विवाह के मंत्र) के रचयिता हैं। उनकी voice intimate है, घर के अंदर की।
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ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ राग बैरारी महला ४ घरु १ दुपदे ॥ सुनि मन हरि की किरपा करै ॥ करि किरपा सतगुर पाईऐ हरि चरण रहसु ॥१॥रहाउ॥ प्रभु पूरन रहिआ भरपूरि सरबसु आपु लीआ ॥ देहु सजण आसीसड़ीआ जिउ रहु बसहु जगहु ॥१॥

बैरारी का पहला शबद, और इसकी रात-गहरी quality पहली पंक्ति में है। “सुनि मन।” बस इतना। कोई preamble नहीं। एक माँ अपने बच्चे को सोते समय कह रही है।

“सुनि मन हरि की किरपा करै।” “सुन, मन, हरि की कृपा कर।” यह वाक्य interesting है। “हरि की कृपा कर” का मतलब “हरि की कृपा हो” नहीं। यह instruction है, हरि की कृपा को suthrai (extend, deliver) कर। जिनके पास कृपा है, वो उसको आगे बढ़ाते हैं।

दिल्ली के context में: हम सब “किसी से कृपा मिले” mode में रहते हैं। नानक एक inversion कर रहे हैं, “तू ख़ुद कृपा कर। तू जिसने सुनी, अब आगे बढ़ा।” यह उल्टा है, मगर यही bhakti chain है।

“करि किरपा सतगुर पाईऐ हरि चरण रहसु।” “कृपा कर के सतगुरु पाते हैं, हरि के चरणों में ‘रहस’ (बसना)।”

“रहस” शब्द ध्यान देने योग्य है। पंजाबी में “रहस” यानी “बसना,” मगर सरल “रहना” से अलग। “रहस” में एक settledness है, एक permanence है। हरि के चरणों में बसना temporary नहीं, यह home है।

“प्रभु पूरन रहिआ भरपूरि।” “प्रभु पूर्ण भरपूर रहा है।” “सरबसु आपु लीआ।” “सर्वस्व अपने आप लिया।”

यानी प्रभु सब जगह “पूरन” है, मगर हम “सब कुछ” (सर्वस्व) उसी का लेते हैं। यह paradox है, omnipresent होते हुए भी, हमें उससे “लेना” पड़ता है।

“देहु सजण आसीसड़ीआ।” “दे, साजन, ‘आशीषड़ी’ (छोटी आशीर्वाद)।”

“आशीषड़ी” शब्द ही प्रेम भरा है। “आशीर्वाद” का छोटा रूप, diminutive। माँ अपने बच्चे को “बेटीड़ी” कहती है। नानक हरि को “साजन” बुला कर “आशीषड़ी” माँग रहे हैं। यह सबसे intimate है।

“जिउ रहु बसहु जगहु।” “जैसे रहो, जग में बसो।”

यह सबसे important line है। बैरारी का असली message है, “जैसे रहो।” कुछ बदलने की ज़रूरत नहीं। इस ज़िंदगी में, इस घर में, इस काम में, बस बसो। हरि का स्मरण साथ रखो।

दिल्ली में हम सब “ज़िंदगी बदलने” की चाहत carry करते हैं। नई नौकरी, नया शहर, नई relationship। नानक एक radical alternative बता रहे हैं, “बस यहीं बसो। हरि वहीं है।” यह कोई fatalism नहीं, यह acceptance है, साथ-साथ रहने का।

रात के समय जब आदमी सोने जा रहा होता है, उसके पास कुछ “बदलने” के लिए नहीं है उस moment में। बैरारी उसी quality को capture करती है, जो है, उसमें settle हो जाओ, साजन से एक छोटी आशीर्वाद माँग कर।

देखें: अंग 12, सोहिला (रात की बानी, similar evening intimacy) · गीता 6.5, “उद्धरेदात्मनात्मानम्” (अपने आप को अपने से उठाओ)
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बैरारी महला ४ ॥ मन मिलि संत जना जसु गाइओ ॥ हरि हरि रतनु रतनु हरि नीको गुरि सतिगुरि दानु दिवाइओ ॥१॥रहाउ॥ तिन हरि हरि नामु अमोलकु पाइआ अगणत अपार पारब्रहम जोति ॥ तिन देखे मेरा मनु बिगसै हउ तिन कै सद बलि जाइओ ॥१॥

दूसरा शबद। और बैरारी का signature, collective intimacy। अकेले नहीं, “मिल कर।”

“मन मिलि संत जना जसु गाइओ।” “मन, संत जनों मिल कर ‘जस’ (प्रशंसा) गाओ।”

दिल्ली में हम सब “private spirituality” की तरफ़ झुके हुए हैं, एक meditation app, एक quiet corner, एक solo retreat। बैरारी कह रही है, “मिल कर।” satsang का mechanism यही है, अकेले जो नहीं हो सकता, साथ में होता है।

“हरि हरि रतनु रतनु हरि नीको।” “हरि-हरि रतन, रतन हरि, सबसे ‘नीको’ (अच्छा)।”

repetition देखिए। बैरारी में repetition एक melodic technique है। “रतनु रतनु,” जैसे गहराई से दोहरा रहे हैं। एक माँ बच्चे को सुलाते वक़्त lullaby में “सो जा, सो जा” दोहराती है। बैरारी का “रतनु रतनु” वही है, मगर हरि के नाम के लिए।

दिल्ली में हम सब “ratans” (jewels) collect करते हैं, gold, property, watches, gadgets। गुरु राम दास का statement, “रतन एक है, हरि।” बाक़ी सब display, चमकता है, मगर असली नहीं।

“गुरि सतिगुरि दानु दिवाइओ।” “गुरु, सतगुरु ने ‘दान’ दिलवाया।”

access mechanism: गुरु। हरि-नाम direct नहीं मिलता; गुरु एक मध्यस्थ है। यह सबसे humbling realization है, “मैं ख़ुद पा सकता हूँ” नहीं, “मुझे दिलवाया जाता है।”

“तिन हरि हरि नामु अमोलकु पाइआ।” “उन्होंने ‘अमोलक’ (priceless) हरि नाम पाया।”

“अमोलक” शब्द keyword है। मूल्य से बाहर। जो कीमत में नहीं तौला जा सकता, उसकी कीमत नहीं। हम सब चीज़ों की कीमत में compare करते हैं, यह कितने का, वो कितने का। हरि नाम compare-system से बाहर है।

“तिन देखे मेरा मनु बिगसै।” “उनको देख कर मेरा मन ‘बिगसता’ (खिलता) है।”

और यह सबसे beautiful line है। नानक कह रहे हैं, जो लोग genuine हरि-भक्त हैं, उनको देखने भर से मेरा मन खिलता है। यह genuine bhakti की contagious quality है।

दिल्ली में हम सब किसी ख़ास इंसान के पास बैठ कर “energized” feel करते हैं, और किसी के पास “drained।” यह सबको का अनुभव है। नानक same realization को spiritual terms में रख रहे हैं।

“हउ तिन कै सद बलि जाइओ।” “मैं उन पर सदा ‘बलि’ (कुर्बान) जाऊँ।”

closing सबसे tender है। genuine भक्तों पर कुर्बान।

देखें: कबीर सलोक (सत्संगति का foundational importance) · गीता 10.9, “मच्चित्ता मद्गत-प्राणा” (मुझ में बसा हुआ चित्त)
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बैरारी महला ४ ॥ हरि जनु राम नाम गुन गावै ॥ जे कोई निंद करे हरि जन की अपणा गुनु न गवावै ॥१॥रहाउ॥ जो किछु करे सोई भल मानै हरि आपणी क्रिपा करावै ॥ हरि के लोग एक स्वामी जानहि अवरु न काहू बिआवै ॥१॥

और बैरारी का तीसरा शबद। बहुत compressed मगर बहुत साफ़।

“हरि जनु राम नाम गुन गावै।” “हरि-जन राम-नाम के गुण गाता है।” यह उसका natural state है। कोई effort नहीं, कोई discipline नहीं। यह आदत बन गई है।

दिल्ली में हम सब “discipline” से spirituality को treat करते हैं, “रोज़ 20 minute meditation,” “हफ़्ते में दो बार satsang।” यह fine है starting point के तौर पर। मगर असली target यह है, यह आदत बन जाए। “हरि-जन” वो जिसको इसकी “practice” नहीं करनी पड़ती, यह breathing जैसा है।

“जे कोई निंद करे हरि जन की।” “अगर कोई हरि-जन की निंदा करे।” “अपणा गुनु न गवावै।” “अपना गुण नहीं गँवाता।”

यह सबसे precise psychological observation है। genuine हरि-जन को कोई कितनी भी critique करे, वो react नहीं करता, अपना तरीक़ा नहीं बदलता। यह passive submission नहीं है; यह rooted-ness है।

दिल्ली में हम सब बहुत reactive हैं। कोई एक comment करता है social media पर, हम पूरा दिन परेशान। गुरु राम दास की teaching, “अपना गुण मत गँवाओ” no matter क्या होता है। यह सबसे difficult है, मगर सबसे liberating।

और यह “लावाँ” वाले गुरु बोल रहे हैं। उनकी पूरी intimacy यहाँ है, साथ ही एक underlying steadiness। शादी के मंत्रों के पीछे यही quality है, “जो भी आए, हम साथ रहें।” यहाँ वो relationship हरि के साथ है।

“जो किछु करे सोई भल मानै।” “जो कुछ करे, उसे ‘भला’ मानता है।”

यह acceptance का सबसे clear definition है। हर event, हर turn, “भला” मान। यह denial नहीं, यह perspective है। events बदल नहीं रहे, उनके बारे में हमारा view बदल रहा है।

“हरि आपणी क्रिपा करावै।” “हरि अपनी कृपा करवाता है।”

subtle point: हरि-जन की “कृपा” भी हरि ख़ुद “करवाता” है। यानी genuine acceptance भी कोई achievement नहीं, कृपा है।

“हरि के लोग एक स्वामी जानहि अवरु न काहू बिआवै।” “हरि के लोग एक स्वामी जानते हैं, और किसी की पकड़ में नहीं आते।”

इस line में बहुत independence है। genuine हरि-जन सिर्फ़ एक मालिक मानता है। बाक़ी सब masters (society, opinion, fashion, ideology) उसको नहीं पकड़ सकते।

closing thought: बैरारी 2 अंगों का सबसे छोटा section है ग्रंथ साहिब में। मगर यहाँ एक complete teaching है, satsang में मिल कर हरि-नाम सुनो, ख़ुद अपनी consistency बनाए रखो, बाक़ी सब accept करो। यह सब रात के समय का instruction है, जब दिन का शोर बैठ गया है।

देखें: गीता 2.56, “दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः” (दुख में अविचलित)