जो मागहि सोई सोई पावहि सेवि हरि के चरण रसाइण ॥ जनम मरण दुहहू ते छूटहि भवजलु जगतु तराइण ॥1॥ खोजत खोजत ततु बीचारिओ दास गोविंद पराइण ॥ अबिनासी खेम चाहहि जे नानक सदा सिमरि नाराइण ॥2॥5॥10॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: हे भाई ! प्रभू सारे रसों का घर है उसके चरनों की सेवा करके (मनुष्य) जो कुछ (उसके दर से) माँगते हैं।वही कुछ प्राप्त कर लेते हैं। (निरा यही नहीं।प्रभू की सेवा-भक्ति करने वाले मनुष्य) जन्म और मौत दोनों से बच जाते हैं।संसार-समुंद्र से पार लांघ जाते हैं। 1। हे भाई ! खोज करते-करते प्रभू के दास असल तत्व को समझ लेते हैं।और प्रभू के ही आसरे रहते हैं। हे नानक ! (कह, हे भाई !) अगर आप कभी ना खत्म होने वाला सुख चाहता है।तो सदा परमात्मा का सिमरन किया कर। 2। 5। 10।
टोडी महला 5 ॥ निंदकु गुर किरपा ते हाटिओ ॥ पारब्रहम प्रभ भए दइआला सिव कै बाणि सिरु काटिओ ॥1॥ रहाउ ॥ कालु जालु जमु जोहि न साकै सच का पंथा थाटिओ ॥ खात खरचत किछु निखुटत नाही राम रतनु धनु खाटिओ ॥1॥ भसमा भूत होआ खिन भीतरि अपना कीआ पाइआ ॥ आगम निगमु कहै जनु नानकु सभु देखै लोकु सबाइआ ॥2॥6॥11॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: टोडी महला 5 ॥ हे भाई ! जब गुरू कृपा करता है तो निंदा के स्वभाव वाला मनुष्य (निंदा करने से) हट जाता है। (जिस निंदक पर) प्रभू परमात्मा जी दयावान हो जाते हैं।कल्याण-रूवरूप हरी के नाम-तीर से (गुरू उसका) सिर काट देता है (उसका अहंकार नाश कर देता है)। 1।रहाउ। (हे भाई ! जिस मनुष्य पर गुरू प्रभू दयावान होते हैं) उस मनुष्य को आत्मिक मौत।माया का जाल।मौत का डर (कोई भी) देख नहीं सकता।(क्योंकि गुरू की कृपा से वह मनुष्य) सदा-स्थिर हरी-नाम सिमरन वाले रास्ते पर कब्जा कर लेता है। वह मनुष्य परमात्मा का रत्न (जैसा कीमती) नाम-धन कमा लेता है।खुद बरत के।औरों को बाँट के ये धन रक्ती भर भी नहीं खत्म होता। 1। हे भाई ! (जिस निंदा स्वभाव के कारण।जिस स्वै भाव के कारण।निंदक सदा) दुखी होता रहता था।(प्रभू के दयाल होने से।गुरू की कृपा से) एक छिन में ही उस स्वभाव का नामो-निशान मिट जाता है। (इस आश्चर्यजनक तब्दीली को) सारा जगत हैरान हो-हो के देखता है।दास नानक ये अगंमी-रॅबी खेल बयान करता है। 2। 6। 11।
टोडी मः 5 ॥ किरपन तन मन किलविख भरे ॥ साधसंगि भजनु करि सुआमी ढाकन कउ इकु हरे ॥1॥ रहाउ ॥ अनिक छिद्र बोहिथ के छुटकत थाम न जाही करे ॥ जिस का बोहिथु तिसु आराधे खोटे संगि खरे ॥1॥ गली सैल उठावत चाहै ओइ ऊहा ही है धरे ॥ जोरु सकति नानक किछु नाही प्रभ राखहु सरणि परे ॥2॥7॥12॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।
हिन्दी अर्थ: टोडी मः 5 ॥ हे कंजूस ! (स्वासों की पूँजी सिमरन में ना खर्च करने के कारण आपका) मन और शरीर पापों से भरे पड़े हैं। हे कंजूस ! साध-संगति में टिक के मालिक प्रभू का भजन किया कर।सिर्फ वह प्रभू ही इन पापों पर पर्दा डालने में समर्थ है। 1।रहाउ। हे कंजूस ! (सिमरन से सूना रहने के कारण आपके शरीर-) जहाज में अनेकों छेद हैं गए हैं।(सिमरन के बिना किसी भी और तरीके से) ये छेद बंद नहीं किए जा सकते। जिस परमात्मा का दिया हुआ ये (शरीर) जहाज है।उसकी आराधना किया कर।उसकी संगति में खोटी (हो चुकी ज्ञानेन्द्रियां) खरी हो जाएंगी। 1। पर मनुष्य निरी बातों से ही पहाड़ उठाना चाहता है (सिर्फ बातों से) वह पहाड़ वहीं के वहीं धरे रह जाते हैं। हे नानक ! (कह) हे प्रभू ! (इन छेदों से बचने के लिए हम जीवों में) कोई जोर कोई ताकत नहीं।हम आपकी शरण आ पड़े हैं।हमें आप खुद ही बचा ले। 2। 7। 12।
टोडी महला 5 ॥ हरि के चरन कमल मनि धिआउ ॥ काढि कुठारु पित बात हंता अउखधु हरि को नाउ ॥1॥ रहाउ ॥ तीने ताप निवारणहारा दुख हंता सुख रासि ॥ ता कउ बिघनु न कोऊ लागै जा की प्रभ आगै अरदासि ॥1॥ संत प्रसादि बैद नाराइण करण कारण प्रभ एक ॥ बाल बुधि पूरन सुखदाता नानक हरि हरि टेक ॥2॥8॥13॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: टोडी महला 5 ॥ हे भाई ! मैं तो अपने मन में परमात्मा के कोमल चरणों का ध्यान धरता हूँ। परमात्मा का नाम (एक ऐसी) दवाई है जो (मनुष्य के अंदर से) क्रोध और अहंकार (आदि रोगों को) पूरी तरह से निकाल देती है (जैसे।दवा शरीर में से गर्मी और वाई के रोग दूर करती है)। 1।रहाउ। हे भाई ! परमात्मा (का नाम मनुष्य के अंदर से आधि।व्याधि व उपाधि) तीनों ही ताप दूर करने वाला है।सारे दुखों का नाश करने वाला है।और सारे सुखों की राशि है। जिस मनुष्य की अरदास सदा प्रभू के दर पे जारी रहती है।उसके जीवन के रास्ते में कोई रुकावट नहीं आती। 1। हे भाई ! एक परमात्मा ही जगत का मूल है।(जीवों के रोग दूर करने वाला) हकीम है।ये प्रभू गुरू की कृपा से मिलता है। हे नानक ! जो मनुष्य अपने अंदर से चतुराई दूर कर देते हैं।सारे सुख देने वाला परमात्मा उन्हें मिल जाता है।उन (की जिंदगी) का सहारा बन जाता है। 2। 8। 13।
टोडी महला 5 ॥ हरि हरि नामु सदा सद जापि ॥ धारि अनुग्रहु पारब्रहम सुआमी वसदी कीनी आपि ॥1॥ रहाउ ॥ जिस के से फिरि तिन ही सम॑ाले बिनसे सोग संताप ॥ हाथ देइ राखे जन अपने हरि होए माई बाप ॥1॥ जीअ जंत होए मिहरवाना दया धारी हरि नाथ ॥ नानक सरनि परे दुख भंजन जा का बड परताप ॥2॥9॥14॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: टोडी महला 5 ॥ हे भाई ! सदा ही परमात्मा का नाम जपा कर। (जिस भी मनुष्य ने परमात्मा का नाम जपा है) मालिक प्रभू ने अपनी मेहर कर के (उसकी सूनी पड़ी हृदय-नगरी को सुंदर आत्मिक गुणों से) खुद बसा दिया। 1।रहाउ। हे भाई ! जिस प्रभू के हम पैदा किए हुए हैं।वह प्रभू (उन मनुष्यों की) खुद संभाल करता है (जो उसका नाम जपते हैं।उनके सारे) चिंता-फिक्र।दुख-कलेश नाश हो जाते हैं। परमात्मा अपना हाथ दे के अपने सेवकों को (चिंता-फिक्र।दुख-कलेशों से) आप बचाता है।उनका माँ-बाप बना रहता है। 1। हे भाई ! परमात्मा सारे ही जीवों पर मेहर करने वाला है।वह पति प्रभू सब पे दया करता है। हे नानक ! (कह) मैं उस प्रभू की शरण पड़ा हूँ।जो सारे दुखों का नाश करने वाला है।और।जिसका तेज-प्रताप बहुत है। 2। 9। 14।
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।
हिन्दी अर्थ: टोडी महला 5 ॥ हे मालिक प्रभू ! मैं आपकी शरण आ पड़ा हूँ।मैं आपके दर पर (आ गिरा हूँ)। हे करोड़ों भूलें नाश करने के समर्थ दातार ! आपके बिना और कौन मुझे भूलों से बचा सकता है। 1।रहाउ। हे भाई ! कई ढंगों से खोज कर करके मैंने सारी बातें विचारी हैं (और इस नतीजे पर पहुँचा हूँ। कि) गुरू की संगति में टिकने से सबसे ऊँची आत्मिक अवस्था प्राप्त कर ली जाती है।और माया के (मोह के) बँधनों में फंस के (मानस जन्म की बाजी) हार जाते हैं। 1।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।
अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।
इस अंग पर 6 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे भाई ! प्रभू सारे रसों का घर है उसके चरनों की सेवा करके (मनुष्य) जो कुछ (उसके दर से) माँगते हैं।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।