सांति सहज सूख मनि उपजिओ कोटि सूर नानक परगास ॥2॥5॥24॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: (मेरे) मन में शांति पैदा हो गई है।आत्मिक अडोलता के सुख पैदा हो गए हैं।(मानो) करोड़ों सूरजों का (मेरे अंदर) उजाला पैदा हो गया है। 2। 5। 24।
टोडी महला 5 ॥ हरि हरि पतित पावन ॥ जीअ प्रान मान सुखदाता अंतरजामी मन को भावन ॥ रहाउ ॥ सुंदरु सुघड़ु चतुरु सभ बेता रिद दास निवास भगत गुन गावन ॥ निरमल रूप अनूप सुआमी करम भूमि बीजन सो खावन ॥1॥ बिसमन बिसम भए बिसमादा आन न बीओ दूसर लावन ॥ रसना सिमरि सिमरि जसु जीवा नानक दास सदा बलि जावन ॥2॥6॥25॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: टोडी महला 5 ॥ हे भाई ! परमात्मा विकारियों को पवित्र करने वाला है। वह (सब जीवों के) जिंद-प्राणों का सहारा है।(सब को) सुख देने वाला है।(सबके) दिल की जानने वाला है।(सबके) मन का प्यारा है।रहाउ। हे भाई ! परमात्मा सुंदर है।सुचॅजी घाड़त वाला है।सयाना है।सब कुछ जानने वाला है।अपने दासों के हृदय में निवास रखने वाला है।भगत उसके गुण गाते हैं। वह मालिक पवित्र-स्वरूप है।बेमिसाल है।उसका बनाया ये मानव-शरीर करम बीजने के लिए धरती है।जो कुछ जीव इसमें बीजते हैं।वही खाते हैं। 1। हे नानक ! (कह, हे भाई ! उस परमात्मा के बारे में सोच के) बहुत ही आश्चर्य होता है।कोई भी और दूसरा उसके बराबर का नहीं।उसके सेवक हमेशा उससे सदके जाते हैं। हे भाई ! उसकी सिफत-सालाह (अपनी) जीभ से कर-कर के मैं (भी) आत्मिक जीवन प्राप्त कर रहा हूँ। 2। 6। 25।
टोडी महला 5 ॥ माई माइआ छलु ॥ त्रिण की अगनि मेघ की छाइआ गोबिद भजन बिनु हड़ का जलु ॥ रहाउ ॥ छोडि सिआनप बहु चतुराई दुइ कर जोड़ि साध मगि चलु ॥ सिमरि सुआमी अंतरजामी मानुख देह का इहु ऊतम फलु ॥1॥ बेद बखिआन करत साधू जन भागहीन समझत नही खलु ॥ प्रेम भगति राचे जन नानक हरि सिमरनि दहन भए मल ॥2॥7॥26॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।
हिन्दी अर्थ: टोडी महला 5 ॥ हे माँ ! माया एक छलावा है (जो कोई रूप दिखा के जल्दी ही गुम हो जाता है)। परमात्मा के भजन के बिना (इस माया की पाया इतनी है जैसे) तिनकों की आग है।बादलों की छाया है।(नदी) की बहाड़ का पानी है।रहाउ। हे भाई ! (माया के छलावे के धोखे से बचने के लिए) बहुती चालाकियां-समझदारियां छोड़ के।दोनों हाथ जोड़ के गुरू के (बताए हुए) रास्ते पर चला कर। अंतरजामी प्रभू का नाम सिमरा कर- मानस शरीर के लिए सबसे अच्छा फल यही है। 1। हे भाई ! भले मनुष्य आत्मिक जीवन की सूझ का यह उपदेश करते ही रहते हैं।पर अभागा मूर्ख मनुष्य (इस उपदेश) को नहीं समझता। हे नानक ! प्रभू के दास प्रभू की प्रेमा-भगती में मस्त रहते हैं। परमात्मा के सिमरन की बरकति से (उनके अंदर से कामादिक) पहलवान जल के राख हो जो जाते हैं। 27। 26।
टोडी महला 5 ॥ माई चरन गुर मीठे ॥ वडै भागि देवै परमेसरु कोटि फला दरसन गुर डीठे ॥ रहाउ ॥ गुन गावत अचुत अबिनासी काम क्रोध बिनसे मद ढीठे ॥ असथिर भए साच रंगि राते जनम मरन बाहुरि नही पीठे ॥1॥ बिनु हरि भजन रंग रस जेते संत दइआल जाने सभि झूठे ॥ नाम रतनु पाइओ जन नानक नाम बिहून चले सभि मूठे ॥2॥8॥27॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: टोडी महला 5 ॥ हे माँ ! गुरू के चरण (मुझे) प्यारे लगते हैं। (जिस मनुष्य को) बड़ी किस्मत से परमात्मा (गुरू के चरणों का मिलाप) देता है।गुरू के दर्शन करने से (उस मनुष्य को) करोड़ों (पुन्यों के) फल प्राप्त हो जाते हैं।रहाउ। हे माँ ! (गुरू के चरणों में पड़ कर) अटल अविनाशी परमात्मा के गुण गाते-गाते बार-बार ढीठ बन कर आने वाले काम-क्रोध-अहंकार (आदि विकार) नाश हो जाते हैं। (गुरू के चरणों की बरकति से जो मनुष्य) सदा-स्थिर प्रभू के प्रेम-रंग में रंगे जाते हैं वह (वे विकारों के हमलों के मुकाबले में) अडोल हो जाते हैं।वे जनम-मरन (की चक्की) में बार बार नहीं पीसे जाते। 1। हे माँ ! (जो मनुष्य गुरू के चरणों में लगते हैं।वह) दया के घर गुरू की कृपा से परमात्मा के भजन (के आनंद) के बिना और सारे ही (दुनियावी) स्वादों व तमाशों को झूठे जानते हैं। हे नानक ! (कह,हे माँ !) परमात्मा के सेवक (गुरू की शरण पड़ कर परमात्मा का) रत्न (जैसा कीमती) नाम हासिल करते हैं।हरि नाम से टूटे हुए सारे ही जीव (अपना आत्मिक जीवन) लुटा के (जगत से) जाते हैं। 2। 8। 27।
टोडी महला 5 ॥ साधसंगि हरि हरि नामु चितारा ॥ सहजि अनंदु होवै दिनु राती अंकुरु भलो हमारा ॥ रहाउ ॥ गुरु पूरा भेटिओ बडभागी जा को अंतु न पारावारा ॥ करु गहि काढि लीओ जनु अपुना बिखु सागर संसारा ॥1॥ जनम मरन काटे गुर बचनी बहुड़ि न संकट दुआरा ॥ नानक सरनि गही सुआमी की पुनह पुनह नमसकारा ॥2॥9॥28॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: टोडी महला 5 ॥ हे भाई ! जो मनुष्य गुरू की संगति में टिक के परमात्मा का नाम सिमरता रहता है (उसके अंदर आत्मिक अडोलता पैदा हो जाती है।उस) आत्मिक अडोलता के कारण (उसके अंदर) दिन रात (हर वक्त) आनंद बना रहता है।(हे भाई ! साध-संगति की बरकति से) हम जीवों के पिछले किए कर्मों के भले अंकुर फूट पड़ते हैं।रहाउ। हे भाई ! जिस परमात्मा के गुणों का अंत नहीं पाया जा सकता।जिसकी हस्ती का इस पार उस पार का छोर नहीं मिल सकता। वह परमात्मा अपने उस सेवक को (उसका) हाथ पकड़ के संसार समुंद्र से बाहर निकाल लेता है।(जिस सेवक को) बड़ी किस्मत से पूरा गुरू मिल जाता है। 1। हे भाई ! गुरू के बचनों पर चलने से जनम-मरण में डालने वाली फाहियां कट जाती हैं।कष्टों भरे चौरासी के चक्करों का दरवाजा दोबारा नहीं देखना पड़ता। हे नानक ! (कह, हे भाई ! गुरू की संगति की बरकति से) मैंने भी मालिक-प्रभू का आसरा लिया है।मैं (उसके दर पर) बार बार सिर निवाता हूँ। 2। 9। 27।
टोडी महला 5 ॥ माई मेरे मन को सुखु ॥ कोटि अनंद राज सुखु भुगवै हरि सिमरत बिनसै सभ दुखु ॥1॥ रहाउ ॥ कोटि जनम के किलबिख नासहि सिमरत पावन तन मन सुख ॥ देखि सरूपु पूरनु भई आसा दरसनु भेटत उतरी भुख ॥1॥ चारि पदारथ असट महा सिधि कामधेनु पारजात हरि हरि रुखु ॥ नानक सरनि गही सुख सागर जनम मरन फिरि गरभ न धुखु ॥2॥10॥29॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।
हिन्दी अर्थ: टोडी महला 5 ॥ हे माँ ! (परमात्मा का नाम सिमरते हुए) मेरे मन का सुख (इतना ऊँचा हो जाता है कि ऐसा प्रतीत होता है। जैसे मेरा मन) करोड़ों आनंद भोग रहा है; करोड़ों बादशाहियों का सुख ले रहा है।हे माँ ! परमात्मा का नाम सिमरते हुए सारा दुख नाश हो जाता है। 1।रहाउ। हे माँ ! परमात्मा का नाम सिमरने से तन-मन पवित्र हो जाते हैं।आत्मिक आनंद प्राप्त होता है।करोड़ों जन्मों के (किए हुए) पाप नाश हो जाते हैं। (सिमरन की बरकति से) प्रभू के दीदार करके (मन की हरेक) मुराद पूरी हो जाती है।दर्शन करते हुए (माया की) भूख दूर हो जाती है। 1। हे माँ ! चार पदार्थ (देने वाला)।आठ बड़ी करामाती ताकतें (देने वाला) परमात्मा स्वयं ही है।परमात्मा खुद ही है कामधेनु; परमात्मा स्वयं ही है पारजात वृक्ष। हे नानक ! (कह, हे माँ ! जिस मनुष्य ने) सुखों के समुंद्र परमात्मा का आसरा ले लिया।उसको जनम-मरण के चक्कर का फिक्र।जूनियों में पड़ने की चिंता नहीं रहती। 2। 10। 29।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।
अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।
इस अंग पर 6 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(मेरे) मन में शांति पैदा हो गई है।”
एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।