Lulla Family

अंग 710

अंग
710
राग Jaithsree
राग: Jaithsree · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
भाहि बलंदड़ी बुझि गई रखंदड़ो प्रभु आपि ॥
जिनि उपाई मेदनी नानक सो प्रभु जापि ॥2॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: (सिमरन करने से) वह प्रभू खुद जीव का रखवाला बनता है और उसके अंदर जलती हुई (तृष्णा की) आग बुझ जाती है। हे नानक ! जिस प्रभू ने सारी दुनिया रची है उसका सिमरन कर। 2।
पउड़ी ॥
जा प्रभ भए दइआल न बिआपै माइआ ॥
कोटि अघा गए नास हरि इकु धिआइआ ॥
निरमल भए सरीर जन धूरी नाइआ ॥
मन तन भए संतोख पूरन प्रभु पाइआ ॥
तरे कुटंब संगि लोग कुल सबाइआ ॥18॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ जब (जीव पर) प्रभू जी मेहरवान हों तो माया जोर नहीं डाल सकती। एक प्रभू को सिमरने से करोड़ों ही पाप नाश हो जाते हैं। सिमरन करने वाले बँदों की चरण-धूड़ में नहाने से शरीर पवित्र हो जाते हैं। (संतों की संगति में) पूर्ण प्रभू मिल जाता है और मन व तन दोनों को संतोष प्राप्त होता है। ऐसे मनुष्यों की संगति में उनके परिवार के लोग और सारी ही कुलों का उद्धार हो जाता है। 18।
सलोक ॥
गुर गोबिंद गोपाल गुर गुर पूरन नाराइणह ॥
गुर दइआल समरथ गुर गुर नानक पतित उधारणह ॥1॥
भउजलु बिखमु असगाहु गुरि बोहिथै तारिअमु ॥
नानक पूर करंम सतिगुर चरणी लगिआ ॥2॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: श्लोक॥ हे नानक ! गुरू गोबिंद रूप है।गोपाल रूप है।सर्व व्यापक नारायण का रूप है। गुरू दया का घर है।समर्था वाला है और विकारियों का भी तारनहार है। संसार-समुंद्र बड़ा भयानक और अथाह है।पर गुरू जहाज ने मुझे इसमें से बचा लिया है। हे नानक ! जो मनुष्य सतिगुरू के चरणों में लगते हैं।उनके भाग्य अच्छे होते हैं। 2।
पउड़ी ॥
धंनु धंनु गुरदेव जिसु संगि हरि जपे ॥
गुर क्रिपाल जब भए त अवगुण सभि छपे ॥
पारब्रहम गुरदेव नीचहु उच थपे ॥
काटि सिलक दुख माइआ करि लीने अप दसे ॥
गुण गाए बेअंत रसना हरि जसे ॥19॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ सदके हूँ उस गूरू से जिसकी संगति में रहने से प्रभू का भजन किया जा सकता है। जब सतिगुरू मेहरवान होता है तो सारे अवगुण दूर हो जाते हैं। प्रभू का रूप गुरू नीच से उच्च श्रेणी का बना देता है। माया और दुखों की फाही काट के अपने सेवक बना लेता है। (गुरू की संगति में रहने से) जीभ से बेअंत प्रभू के गुण गाए जा सकते हैं।प्रभू की सिफत सालाह की जा सकती है। 19।
सलोक ॥
द्रिसटंत एको सुनीअंत एको वरतंत एको नरहरह ॥
नाम दानु जाचंति नानक दइआल पुरख क्रिपा करह ॥1॥
हिकु सेवी हिकु संमला हरि इकसु पहि अरदासि ॥
नाम वखरु धनु संचिआ नानक सची रासि ॥2॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: श्लोक॥ उन्हें हर जगह वह ख़लकत का मालिक ही दिखता है।सुनाई देता है।व्यापक प्रतीत होता है। हे नानक ! जिन पर दयालु प्रभू मेहर करता है वह उसके पास से बँदगी की ख़ैर माँगते हैं।1। मेरी एक प्रभू के पास ही आरजू है कि मैं प्रभू को ही सिमरूँ और प्रभू को ही हृदय में संभाल कर रखूँ। हे नानक ! जिन लोगों ने नाम-रूप सौदा नाम-रूप् धन जोड़ा है।उनकी ये पूँजी सदा ही कायम रहती है। 2।
पउड़ी ॥
प्रभ दइआल बेअंत पूरन इकु एहु ॥
सभु किछु आपे आपि दूजा कहा केहु ॥
आपि करहु प्रभ दानु आपे आपि लेहु ॥
आवण जाणा हुकमु सभु निहचलु तुधु थेहु ॥
नानकु मंगै दानु करि किरपा नामु देहु ॥20॥1॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ सिर्फ ये दयालु और बेअंत प्रभू ही हर जगह मौजूद है। वह खुद ही खुद सब कुछ है।और दूसरा कौन सा कहूँ। (जो उस जैसा हो) । हे प्रभू ! आप खुद ही दान करने वाला है और खुद ही वह दान लेने वाला है। (जीवों का) पैदा होना और मरना – ये आपका हुकम है (भाव आपकी खेल है)।आपका अपना ठिकाना सदा अटल है। नानक (आपसे) खैर माँगता है।मेहर कर और नाम बख्श। 20। 1।
जैतसरी बाणी भगता की
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
नाथ कछूअ न जानउ ॥
मनु माइआ कै हाथि बिकानउ ॥1॥ रहाउ ॥
तुम कहीअत हौ जगत गुर सुआमी ॥
हम कहीअत कलिजुग के कामी ॥1॥
इन पंचन मेरो मनु जु बिगारिओ ॥
पलु पलु हरि जी ते अंतरु पारिओ ॥2॥
जत देखउ तत दुख की रासी ॥
अजौं न पत्याइ निगम भए साखी ॥3॥
गोतम नारि उमापति स्वामी ॥ सीसु धरनि सहस भग गांमी ॥4॥
इन दूतन खलु बधु करि मारिओ ॥
बडो निलाजु अजहू नही हारिओ ॥5॥
कहि रविदास कहा कैसे कीजै ॥
बिनु रघुनाथ सरनि का की लीजै ॥6॥1॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: जैतसरी बाणी भगता की ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। हे प्रभू !मेरी इसके आगे (अब) कोई पेश नहीं चलती। मैं अपना मन माया के हाथ में बेच चुका हूँ। 1।रहाउ। हे नाथ ! आप जगत का पति कहलवाता है। हम कलियुगी विषई जीव हैं (मेरी सहायता कर)। 1। (कामादिक) इन पाँचों ने ही मेरा मन इतना बिगाड़ दिया है कि हर दम मेरी परमात्मा से दूरियाँ डलवा रहे हैं। 2। (इन्होंने जगत को बहुत दुखी किया हुआ है) मैं जिधर देखता हूँ।उधर दुखों की राशि-पूँजी बनी हुई है। ये देख के भी (कि विकारों का नतीजा है दुख) मेरा मन नहीं माना।वेदादिक धर्म-पुस्तकें भी (कथाओं के माध्यम से) यही गवाही दे रहे हैं। 3। गौतम की पत्नी अहिल्या।पार्वती का पति शिव। ब्रहमा। हजारों भगों वाला इन्द्र – (इन सभी को इन पाँचों ने ही ख्वार किया)। 4। इन दुष्टों ने (विकारों ने) (मेरे) मूर्ख (मन) को बुरी तरह से मार रखा है। पर ये मन बड़ा बेशर्म है।अभी भी विकारों की ओर से नहीं मुड़ा। 5। रविदास कहता है, और कहाँ जाऊँ।और क्या करूँ। (इन विकारों से बचने के लिए) परमात्मा के बिना और किसी का आसरा लिया नहीं जा सकता। 6। 1।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।

गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।

इस अंग पर 7 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(सिमरन करने से) वह प्रभू खुद जीव का रखवाला बनता है और उसके अंदर जलती हुई (तृष्णा की) आग बुझ जाती है।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।