ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ जैतसरी बाणी भगताँ की ॥ रवीदास ॥ नाथ कछूअ न जानउ ॥ मनु मायआ कै हाथु बिकानउ ॥१॥रहाउ॥ तुम कहीअत हौ जगत गुर सुआमी ॥ हम कहीअत कलिजुग के कामी ॥१॥
इह संसार बिखै सम बूडत कतही न होवै पारु ॥ हरि चरण कमल आराधहु जन हरि सजन हरि नाम ॥२॥ ज्ञान दान दीजै मेरे सजना मानवा जनम है धारु ॥३॥ राम राम राम राम रामा रामा रामा रामा ॥ रवीदास तू सोचना सहि सहि बंधे बंधन छुटायीअले ॥४॥१॥
सलोक continue।
“इह संसार बिखै सम बूडत।” “यह संसार ‘विषै’ (विषय, sense pleasures) के ‘सम’ (समान, equally) ‘बूडत’ (डूब रहा)।”
simple observation। पूरा संसार sense pleasures में डूब रहा है। कोई exception नहीं।
“कतही न होवै पारु।” “कहीं ‘पार’ नहीं होता।”
और इसी “विषै” में जो डूबे हैं, वो “पार” नहीं होते। यानी salvation impossible है, इस mode में।
दिल्ली में हम सब “विषै” में डूबे हैं किसी न किसी sense में। खाना, screen-time, shopping, relationships, ambition। यह सब “विषै” है, sense pleasures। और इन में डूबे रहते हुए, “पार” possible नहीं है।
“हरि चरण कमल आराधहु जन हरि सजन हरि नाम।” “हरि के चरण-कमल आराधो जन, हरि-साजन हरि-नाम।”
solution: हरि के चरणों की आराधना।
“ज्ञान दान दीजै मेरे सजना।” “ज्ञान-दान दीजै, मेरे साजन।”
request: ज्ञान दे। यह specific है। पैसे नहीं, status नहीं, बस ज्ञान।
“मानवा जनम है धारु।” “मानव-जन्म ‘धार’ (हाथ में) है।”
और यह key acknowledgment है। यह manushya-janam precious है। यह opportunity है। इसको waste मत कर।
दिल्ली में हम सब अपनी ज़िंदगी को “given” मानते हैं। यह तो है, मिल गई। रविदास एक different perspective देते हैं, यह precious है, opportunity है, इसका use करो।
“राम राम राम राम रामा रामा रामा रामा।” “राम-राम-राम-राम, रामा-रामा-रामा-रामा।”
eight repetitions of “राम।” यह incantatory है। यह thought-pattern को override करता है। रविदास genuine practice demonstrate कर रहे हैं।
दिल्ली में जब आप genuine chanting सुनो (किसी गुरुद्वारे में, या किसी मंदिर में), यह same effect होता है। शब्द अपने आप मन में run करते रहते हैं, बाद में भी। रविदास उसी quality को paper पर लाने की कोशिश कर रहे हैं।
“रवीदास तू सोचना सहि सहि बंधे बंधन छुटायीअले।” “रविदास, तू ‘सोचना’ (worry) सह-सह, बँधन ‘छुटाईअले’ (release)।”
closing: रविदास, तू अपनी worry सह कर, बँधन से release हो।
यह सबसे honest position है। पूरी ज़िंदगी का struggle, अंत में acceptance, और release।
रविदास का यह closing पूरे जैतसरी section को tone-down करता है। पूरे section में विरह, यहाँ release। पूरे section में craving, यहाँ acknowledgment। पूरे section में distance, यहाँ acceptance।
यह जैतसरी का perfect closing है। एक तरफ़ चमार-संत, समाज का सबसे “नीच।” दूसरी तरफ़ ग्रंथ साहिब का closing voice इस section के लिए। यह उल्टा hierarchy है। नानक के design में, यह intentional है।
और भगत रविदास जी का यह सलोक। उनकी सबसे famous रचना में से एक। और जैतसरी का closing।
“नाथ कछूअ न जानउ।” “नाथ, कुछ नहीं जानता।”
रविदास opening declaration। कोई pretence नहीं। honest, raw।
पहली पंक्ति से ही रविदास की voice अलग है। कोई preamble नहीं, कोई polish नहीं। बस उठ कर खड़े हो जाते हैं, “मैं कुछ नहीं जानता।”
दिल्ली में हम सब हमेशा कुछ “जानने” का दिखावा करते हैं। एक meeting में, कोई sensitive topic आ जाए, हम opinion express करते हैं, चाहे genuine knowledge हो या न हो। रविदास opposite कर रहे हैं, “मैं कुछ नहीं जानता।” यह सबसे radical opening है।
“मनु मायआ कै हाथु बिकानउ।” “मन माया के हाथ ‘बिकाना’ (बिक चुका)।”
self-diagnosis। बहुत direct।
“बिकाना” शब्द commercial है। पंजाबी-हिन्दी में, “बिकना” यानी sell हो जाना। रविदास कह रहे हैं, मेरा मन “बिक” गया है माया के पास। यह temporary lease नहीं, यह permanent transfer है।
दिल्ली में हम सब किसी न किसी को “बिक” चुके हैं, salary के लिए company को, status के लिए society को, comfort के लिए relationships को। रविदास honest acknowledgment कर रहे हैं।
फिर contrast: “तुम कहीअत हौ जगत गुर सुआमी।” “तुम कहलाते हो जगत-गुरु, स्वामी।” “हम कहीअत कलिजुग के कामी।” “हम कहलाते हैं कलियुग के ‘कामी’ (lustful)।”
यह बहुत powerful है। एक side पर हरि “जगत-गुरु,” दूसरी side पर रविदास “कलियुग का कामी।” यह comparison ridiculous है। मगर रविदास इसी से अपना point बना रहे हैं।
रविदास चमार थे। समाज ने उनको “अछूत” बना दिया था। मगर वो ख़ुद को भगवान के सामने as-is पेश कर रहे हैं। “हाँ, मैं कलियुग का कामी हूँ। तू जगत-गुरु। यह transaction चाहिए तो कर।”
यह सबसे radical bhakti है। दिखावा नहीं, perfection नहीं। as-is offering।
दिल्ली में हम सब अपनी “image” बहुत maintain करते हैं spiritual circles में। हम मंदिर जाते हैं अच्छे कपड़ों में, अच्छी attitude के साथ, अच्छे intentions लेकर। रविदास का instruction, “वैसे ही जाओ। तू कौन है।”
और रविदास के लिए “जाति” शर्म नहीं थी, ज़मीन थी। वो अपने leather-working हाथों से ही ब्रह्म-पूजा करते थे। यह सबसे inverted teaching है, समाज में जो “lowest” है, वो ही “highest” बन सकता है।
क्यों? क्योंकि “lowest” position में आदमी के पास कुछ “खोने” को नहीं। उसकी position already at the bottom है। तो वो genuinely honest हो सकता है, बिना कुछ protect करने की ज़रूरत के।
higher class आदमी अपनी status protect करने में busy है। उसके पास “image” है maintain करने को। रविदास के पास कुछ नहीं था। यह उनकी सबसे बड़ी रोशनी थी।