Lulla Family

अंग 722

अंग
722
राग तिलंग
राग: तिलंग · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
मेरै कंत न भावै चोलड़ा पिआरे किउ धन सेजै जाए ॥1॥
हंउ कुरबानै जाउ मिहरवाना हंउ कुरबानै जाउ ॥
हंउ कुरबानै जाउ तिना कै लैनि जो तेरा नाउ ॥
लैनि जो तेरा नाउ तिना कै हंउ सद कुरबानै जाउ ॥1॥ रहाउ ॥
काइआ रंङणि जे थीऐ पिआरे पाईऐ नाउ मजीठ ॥
रंङण वाला जे रंङै साहिबु ऐसा रंगु न डीठ ॥2॥
जिन के चोले रतड़े पिआरे कंतु तिना कै पासि ॥
धूड़ि तिना की जे मिलै जी कहु नानक की अरदासि ॥3॥
आपे साजे आपे रंगे आपे नदरि करेइ ॥
नानक कामणि कंतै भावै आपे ही रावेइ ॥4॥1॥3॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: वह जीव-स्त्री पति-प्रभू के चरणों में नहीं पहुँच सकती।क्योंकि (जिंद का) ये चोला (ये शरीर।ये जीवन) पति-प्रभू को पसंद नहीं आता। 1। हे मेहरवान प्रभू ! मैं कुर्बान जाता हूँ मैं सदके जाता हूँ। मैं वारने जाता हूँ उनसे।जो आपका नाम सिमरते हैं। जो लोग आपका नाम लेते हैं।मैं उनसे सदा कुर्बान जाता हूँ। 1।रहाउ। हाँ !) अगर ये शरीर (लिलारी की) मॅटी बन जाए।और हे सज्जन ! इस में मजीठ जैसे पक्के रंग वाला प्रभू का नाम-रंग पाया जाए। फिर मालिक-प्रभू खुद लिलारी (बन के जीव-स्त्री के मन को) रंग (में डुबो) दे।तो ऐसा रंग चढ़ता है जो कभी पहले देखा ना हो। 2। हे प्यारे (सज्जन !) जिन जीव-सि्त्रयों के (शरीर-) चोले (जीवन नाम-रंग से) रंगे हुए हैं।पति-प्रभू (सदा) उनके पास (बसता) है। हे सज्जन ! नानक की ओर से उनके पास विनती कर।भला नानक को भी उनके चरणों की धूल मिल जाए। 3। हे नानक ! जिस जीव-स्त्री पर प्रभू खुद मेहर की नजर करता है उसको वह आप ही सँवारता है खुद ही (नाम का) रंग चढ़ाता है। वह जीव-स्त्री पति-प्रभू को प्यारी लगती है।उसको प्रभू खुद ही अपने चरणों में जोड़ता है। 4। 1। 3।
तिलंग मः 1 ॥
इआनड़ीए मानड़ा काइ करेहि ॥
आपनड़ै घरि हरि रंगो की न माणेहि ॥
सहु नेड़ै धन कंमलीए बाहरु किआ ढूढेहि ॥
भै कीआ देहि सलाईआ नैणी भाव का करि सीगारो ॥
ता सोहागणि जाणीऐ लागी जा सहु धरे पिआरो ॥1॥
इआणी बाली किआ करे जा धन कंत न भावै ॥
करण पलाह करे बहुतेरे सा धन महलु न पावै ॥
विणु करमा किछु पाईऐ नाही जे बहुतेरा धावै ॥
लब लोभ अहंकार की माती माइआ माहि समाणी ॥
इनी बाती सहु पाईऐ नाही भई कामणि इआणी ॥2॥
जाइ पुछहु सोहागणी वाहै किनी बाती सहु पाईऐ ॥
जो किछु करे सो भला करि मानीऐ हिकमति हुकमु चुकाईऐ ॥
जा कै प्रेमि पदारथु पाईऐ तउ चरणी चितु लाईऐ ॥
सहु कहै सो कीजै तनु मनो दीजै ऐसा परमलु लाईऐ ॥
एव कहहि सोहागणी भैणे इनी बाती सहु पाईऐ ॥3॥
आपु गवाईऐ ता सहु पाईऐ अउरु कैसी चतुराई ॥
सहु नदरि करि देखै सो दिनु लेखै कामणि नउ निधि पाई ॥
आपणे कंत पिआरी सा सोहागणि नानक सा सभराई ॥
ऐसै रंगि राती सहज की माती अहिनिसि भाइ समाणी ॥
सुंदरि साइ सरूप बिचखणि कहीऐ सा सिआणी ॥4॥2॥4॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: तिलंग मः 1 ॥ हे अति अंजान जिंदे ! आप इतना कोझा गुमान क्यों करती है। परमात्मा आपके अपने ही हृदय-घर में है।आप उस (के मिलाप) का आनंद क्यों नहीं लेती। हे भोली जीव-सि्त्री ! पति-प्रभू (आपके अंदर ही आपके) नजदीक बस रहा है।आप (जंगल आदिक) बाहरी संसार क्यों तलाशती फिरती है। (अगर तूने उसका दीदार करना चाहती है।तो अपने ज्ञान की) आँखों में (प्रभू के) डर-अदब (के अंजन) की सलाईयां डाल।प्रभू के प्यार का हार-श्रृंगार कर। जीव-स्त्री तब ही सोहाग-भाग वाली और प्रभू-चरणों में जुड़ी हुई समझी जाती है।जब प्रभू-पति उससे प्यार करे। 1। (पर) नासमझ जीव-स्त्री भी क्या कर सकती है यदि वह जीव-स्त्री प्रभू-पति को अच्छी ना लगे। ऐसी जीव-स्त्री भले कितने ही करुणा प्रलाप करती फिरे।वह प्रभू-पति का महल-गृह नहीं पा सकती। (दरअसल बात ये है कि) जीव-स्त्री भले ही कितनी ही दौड़-भाग करती रहे।प्रभू की मेहर के बिना कुछ भी हासिल नहीं होता। यदि जीव-स्त्री जीभ के चस्के लालच और अहंकार (आदि) में ही मस्त रहे।और सदा माया (के मोह) में डूबी रहे। तो इन बातों से पति-प्रभू नहीं मिलता।वह जीव-स्त्री बेसमझ ही रही (जो विकारों में मस्त रहके और फिर भी समझे कि वह पति-प्रभू को प्रसन्न कर सकती है)। 2। (जिनको पति-प्रभू मिल गया है।बेशक) उन सोहाग-भाग वालियों को जा के पूछ के देखो कि किन बातों से पति-प्रभू मिलता है। (वे यही उक्तर देती हैं कि) चालाकी और जबरदस्ती त्याग दो।जो कुछ प्रभू करता है उसको अच्छा समझ के (सिर माथे पर) मानो। जिस प्रभू के प्रेम के सदका नाम-वस्तु मिलती है उसके चरणों में मन जोड़ो। पति-प्रभू जो हुकम करता है वह करो।अपना शरीर और मन उसके हवाले करो।बस ! ये सुगंधि (जिंद के लिए) बरतो। सोहाग-भाग वाली सही कहतीं हैं कि हे बहन ! इन बातों से ही पति-प्रभू मिलता है। 3। पति-प्रभू तब ही मिलता है जब स्वै भाव दूर करें।इसके बिना किया गया और कोई उद्यम व्यर्थ है।चालाकी है। (जिंदगी का) वह दिन सफल जानो जब पति-प्रभू मेहर की निगाह से देखे।(जिस) जीव-स्त्री (की ओर मेहर की) निगाह करता है वह मानो नौ खजाने पा लेती है। हे नानक ! जो जीव-स्त्री पति-प्रभू को प्यारी है वह सोहाग-भाग वाली है वह (जगत-) परिवार में आदर पाती है। जो प्रभू के प्यार-रंग में रंगी रहती है।जो अडोलता में मस्त रहती है।जो दिन-रात प्रभू के प्रेम-रंग में मगन रहती है। वही सोहानी है सुंदर रूप वाली है तीक्ष्ण बुद्धि वाली है और समझदार कही जाती है। 4। 2। 4।
तिलंग महला 1 ॥
जैसी मै आवै खसम की बाणी तैसड़ा करी गिआनु वे लालो ॥
पाप की जंञ लै काबलहु धाइआ जोरी मंगै दानु वे लालो ॥
सरमु धरमु दुइ छपि खलोए कूड़ु फिरै परधानु वे लालो ॥
काजीआ बामणा की गल थकी अगदु पड़ै सैतानु वे लालो ॥
मुसलमानीआ पड़हि कतेबा कसट महि करहि खुदाइ वे लालो ॥
जाति सनाती होरि हिदवाणीआ एहि भी लेखै लाइ वे लालो ॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: तिलंग महला 1 ॥ हे (भाई) लालो ! मुझे जैसी प्रभू-पति से प्रेरणा आई है उसी अनुसार मैं आपको (उस दुघर्टना के) बारे में बता देता हूँ (जो इस शहर सैदपुर में घटित हुई है)। (बाबर) काबुल से (फौज।जो मानो) पाप-जुल्म की बारात (है) इकट्ठी करके आ चढ़ा है।और जोर-जबरदस्ती से हिन्द की हकूमत रूपी कन्या का दान माँग रहा है। (सैदपुर में से) हया और शर्म दोनों अलोप हो चुके हैं।झूठ ही झूठ चौधरी बना फिरता है। (बाबर के सिपाहियों द्वारा सैदपुर की सि्त्रयों पर इतने अत्याचार हो रहे हैं कि।जैसे) शैतान (इस शहर में) विवाह पढ़ा रहा है और काज़ियों व ब्राहमणों की (शिष्टाचार वाली) मर्यादा समाप्त हो चुकी है। मुसलमान औरतें (भी इस जुल्म का शिकार हो रही हैं जो) इस बिपता में (अपनी धर्म-पुस्तक) कुरान (की आयतें) पढ़ रही है।और ख़ुदा के आगे अरदास कर रही हैं। उच्च जातियों की।नीच जातियों की और भी सारी हिन्दू सि्त्रयाँ – इन सभी पर अत्याचार हो रहे हैं।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। सूही, बिलावल, और गोंड राग का क्षेत्र। गुरु राम दास की ‘लावां’ इसी सूही राग में बँधी, सोलहवीं सदी के मध्य की।

गुरु नानक की वाणी का अपना मिज़ाज है, सीधा-सादा, बिना अलंकार के, मगर हर पंक्ति में एक ठहराव। 1469 में तलवण्डी में जन्म, सुलतानपुर के बहीखाते में कुछ साल काम, फिर तीस की उम्र के क़रीब वो लम्बी पैदल यात्रा जो काबुल, बग़दाद, मक्का, जगन्नाथ-पुरी, तिब्बत की सरहद तक उन्हें ले गयी। उनके शबद इन्हीं यात्राओं की वाणी हैं।

इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “वह जीव-स्त्री पति-प्रभू के चरणों में नहीं पहुँच सकती।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।