अंग 727, राग तिलंग (कबीर)

SGGS, Ang
727
राग तिलंग (समाप्ति), भगत कबीर जी
राग: राग तिलंग · रचयिता: भगत कबीर जी
पढ़ने का समय: लगभग 2 मिनट
यह तिलंग का closing अंग। यहाँ भगत कबीर जी बोल रहे हैं। तिलंग की persianate-mood में कबीर का sharpness मिल कर एक नया रंग देता है। कबीर का स्वर हमेशा direct है, चाहे राग कोई भी हो।

अगले अंग पर राग सूही शुरू होगा, और रंग एक बार फिर बदलेगा।
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ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ तिलंग बाणी भगत कबीर जी की ॥ बेद कतेब इफतरा भाई दिल का फिकरु न जाइ ॥ टुकु दमु करारी जउ करहु हाजिर हजूरि खुदाइ ॥१॥ बंदे खोजु दिल हर रोज ना फिरु परेसानी माहि ॥ इह जु दुनीआ सिहर मेला दसतगीरी नाहि ॥१॥रहाउ॥

कबीर तिलंग में, और उनकी voice persianate words use कर रही है, यह adaptation है। कबीर भोजपुरी folk register से उठ कर, persianate court register में बैठ रहे हैं, बिना अपनी substance खोए।

“बेद कतेब इफतरा भाई।” “वेद और ‘कतेब’ (किताबें, यानी Quran/Bible) ‘इफ़्तरा’ (mere talk)।”

कबीर हिन्दू और मुस्लिम scriptures दोनों को same way critique कर रहे हैं। “इफ़्तरा” फ़ारसी-अरबी शब्द है, “बकवास, baseless talk।”

यह radical statement है। दोनों major religious communities की foundational texts को “इफ़्तरा” कहना। नानक भी similar critique करते हैं (बेद पुराण का), मगर कबीर more direct हैं।

“दिल का फिकरु न जाइ।” “दिल का ‘फ़िक्र’ (anxiety) नहीं जाता।”

observation: scripture-reading से अकेली, दिल का “फ़िक्र” नहीं जाता। यह practical है।

दिल्ली में हम सब बहुत self-help books पढ़ते हैं, BSc, MBA, PhD करते हैं। “knowledge” accumulate करते हैं। मगर अंदर का “फ़िक्र” वही रहता है। कबीर 500 साल पहले यही बोल गए, “इफ़्तरा।”

“टुकु दमु करारी जउ करहु।” “एक पल भी ‘क़रार’ (peace) करें।”

“हाजिर हजूरि खुदाइ।” “‘हाजिर हुज़ूरि ख़ुदा’ (हरि सामने प्रकट)।”

एक पल का genuine रुकना, और हरि “हाज़िर हुज़ूर।”

“हाजिर हुज़ूर” फ़ारसी-अरबी “जैसे court में Emperor present है” feel देता है। कबीर कह रहे हैं, हरि भी same way present होते हैं, उस moment जब आदमी genuinely रुकता है।

दिल्ली में हम सब हमेशा कुछ कर रहे हैं। एक पल “क़रार” से नहीं बैठते। कबीर का instruction simple है, “एक पल रुक। हरि वहीं है।”

“बंदे खोजु दिल हर रोज।” “बंदे, दिल को हर रोज़ खोज।”

“बंदे” address। फ़ारसी-अरबी, “ओ servant।” कबीर audience को directly address कर रहे हैं।

“दिल को हर रोज़ खोज।” यह daily practice है। मन की external focusing से अलग, अंदर का खोजना।

“ना फिरु परेसानी माहि।” “परेशानी में मत भटक।”

simple instruction। अगर दिल को रोज़ खोजते रहो, परेशानी में नहीं रहोगे।

दिल्ली के mental health crisis को सोचो। anxiety, depression, burnout, सब बढ़ रहा है। कबीर 500 साल पहले एक specific prescription दे रहे हैं, दिल को रोज़ खोजो। यह simple है, और profoundly effective।

“इह जु दुनीआ सिहर मेला।” “यह जो दुनिया, एक ‘सिहर-मेला’ (magic show)।”

“सिहर” फ़ारसी-अरबी, “magic।” “मेला” हिन्दी, “fair।” “magic fair।” दुनिया एक magic show है।

“दसतगीरी नाहि।” “‘दस्तगीरी’ (hand-hold) नहीं।”

यह magic show में कोई “हाथ-पकड़” नहीं। यानी कुछ stable नहीं, सब illusion है।

पूरा कबीर का sharpest critique। और यह तिलंग के persianate register में sit करता है। कबीर ने अपनी ज़बान adapt की राग के साथ, मगर substance पूरी रखी।

दिल्ली में हम सब बहुत scriptures पढ़ते हैं, religious books, self-help, philosophy। कबीर कह रहे हैं, “इफ़्तरा” (mere talk)। दिल को खोजो रोज़। यह सबसे direct, सबसे practical, सबसे demanding instruction है।

और तिलंग का यह perfect closing है। राग जो interfaith register में बैठा था, वो कबीर के लिए perfect home है। कबीर भी interfaith के बीच में पैदा हुए, उन्होंने भी दोनों sides को critique किया। यहाँ राग और कवि match करते हैं।