नामदेव की वाणी में मराठी और पंजाबी दोनों के असर हैं। आदि ग्रंथ में उनकी छियासठ रचनाएँ हैं, अधिकांश भक्ति-प्रधान।
हिन्दी अर्थ: हे नानक ! (कह, हे मन !) जगत को आप ऐसा ही समझ (कि यहाँ) जिंदगी तक ही बर्ताव-व्यवहार रहता है। वैसे भी। ये सारा सपने की तरह ही है।(इस वास्ते जब तक जीता है) परमात्मा के गुण गाता रह। 2। 2।
तिलंग महला 9 ॥ हरि जसु रे मना गाइ लै जो संगी है तेरो ॥ अउसरु बीतिओ जातु है कहिओ मान लै मेरो ॥1॥ रहाउ ॥ संपति रथ धन राज सिउ अति नेहु लगाइओ ॥ काल फास जब गलि परी सभ भइओ पराइओ ॥1॥ जानि बूझ कै बावरे तै काजु बिगारिओ ॥ पाप करत सुकचिओ नही नह गरबु निवारिओ ॥2॥ जिह बिधि गुर उपदेसिआ सो सुनु रे भाई ॥ नानक कहत पुकारि कै गहु प्रभ सरनाई ॥3॥3॥
भगत नामदेव महाराष्ट्र के संत थे, तेरहवीं-चौदहवीं सदी के। पंढरपुर के विट्ठल-मन्दिर से जुड़े, मगर बाद में पंजाब आ कर बसे, और गुरुदासपुर के पास उनकी समाधि है।
हिन्दी अर्थ: तिलंग महला 9 ॥ हे मन ! परमात्मा के सिफत सालाह के गीत गाया कर।ये सिफत सालाह ही आपका असल साथी है। मेरे वचन मान ले।उम्र का समय बीतता जा रहा है। 1।रहाउ। हे मन ! मनुष्य धन-पदार्थ।रथ।माल।राज माल से बड़ा मोह करता है। पर जब मौत की फाही (उसके) गले में पड़ती है।हरेक चीज बेगानी हो जाती है। 1। हे झल्ले मनुष्य ! ये सब कुछ जानते हुए समझते हुए भी आप अपना काम बिगाड़ रहा है। आप पाप करते हुए (कभी) संकोचित नहीं होता।आप (इस धन-पदार्थ का) अहंकार भी दूर नहीं करता। 2। नानक (आपको) पुकार के कहता है,हे भाई ! गुरू ने (मुझे) जिस तरह उपदेश किया है। वह (आप भी) सुन ले (कि) प्रभू की शरण पड़ा रह (सदा प्रभू का नाम जपा कर)। 3। 3।
तिलंग बाणी भगता की कबीर जी ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ बेद कतेब इफतरा भाई दिल का फिकरु न जाइ ॥ टुकु दमु करारी जउ करहु हाजिर हजूरि खुदाइ ॥1॥ बंदे खोजु दिल हर रोज ना फिरु परेसानी माहि ॥ इह जु दुनीआ सिहरु मेला दसतगीरी नाहि ॥1॥ रहाउ ॥ दरोगु पड़ि पड़ि खुसी होइ बेखबर बादु बकाहि ॥ हकु सचु खालकु खलक मिआने सिआम मूरति नाहि ॥2॥ असमान म्यिाने लहंग दरीआ गुसल करदन बूद ॥ करि फकरु दाइम लाइ चसमे जह तहा मउजूदु ॥3॥ अलाह पाकं पाक है सक करउ जे दूसर होइ ॥ कबीर करमु करीम का उहु करै जानै सोइ ॥4॥1॥
नामदेव की वाणी में मराठी और पंजाबी दोनों के असर हैं। आदि ग्रंथ में उनकी छियासठ रचनाएँ हैं, अधिकांश भक्ति-प्रधान।
हिन्दी अर्थ: तिलंग बाणी भगता की कबीर जी सतिगुर प्रसादि ॥ हे भाई ! (वाद-विवाद की खातिर) वेदों-कतेबों के हवाले दे-दे कर ज्यादा बातें करने से (मनुष्य के अपने) दिल का सहम दूर नहीं होता। (हे भाई !) अगर आप अपने मन को पलक भर के लिए ही टिकाओ।तो आपको सब में ही बसता ईश्वर दिखेगा (किसी के विरुद्ध तर्क करने की आवश्यक्ता नहीं पड़ेगी)। 1। हे भाई ! (अपने ही) दिल को हर वक्त खोज।(बहस मुबाहसे की) घबराहट में ना भटक। ये जगत एक जादू सा है।एक तमाशे जैसा है।(इसमें से इस व्यर्थ के वाद-विवाद से) हाथ-पल्ले पड़ने वाली कोई चीज़ नहीं। 1।रहाउ। बेसमझ लोग (दूसरे मतों की धर्म-पुस्तकों के बारे में ये) पढ़-पढ़ के (कि इनमें जो लिखा है) झूठ (है)।खुश हो-हो के बहस करते हैं। (पर।वे ये नहीं जानते कि) सदा कायम रहने वाला ईश्वर ख़लकत में (भी) बसता है।(ना वह अलग सातवें आसमान पर बैठा है और) ना ही वह परमात्मा कृष्ण की मूर्ति है। 2। (सातवें आसमान में बैठा समझने की जगह।हे भाई !) वह प्रभू-रूप दरिया व अंतहकर्ण में लहरें मार रहा है। तूने उसमें स्नान करना था।सो।हमेशा उसकी बँदगी कर।(ये भक्ति की) ऐनक लगा (के देख)।वह हर जगह मौजूद है। 3। ईश्वर सब से पवित्र (हस्ती) है (उससे पवित्र और कोई नहीं है)।इस बात पर मैं तब ही शक करूँ।अगर उस ईश्वर जैसा दूसरा और कोई हो। हे कबीर ! (इस भेद को) वह मनुष्य ही समझ सकता है जिसको वह समझने के काबिल बनाए।और।ये बख्शिश उस बख्शिश करने वाले के अपने हाथ में है। 4। 1।
नामदेव जी ॥ मै अंधुले की टेक तेरा नामु खुंदकारा ॥ मै गरीब मै मसकीन तेरा नामु है अधारा ॥1॥ रहाउ ॥ करीमां रहीमां अलाह तू गनंी ॥ हाजरा हजूरि दरि पेसि तूं मनंी ॥1॥ दरीआउ तू दिहंद तू बिसीआर तू धनी ॥ देहि लेहि एकु तूं दिगर को नही ॥2॥ तूं दानां तूं बीनां मै बीचारु किआ करी ॥ नामे चे सुआमी बखसंद तूं हरी ॥3॥1॥2॥
भगत नामदेव महाराष्ट्र के संत थे, तेरहवीं-चौदहवीं सदी के। पंढरपुर के विट्ठल-मन्दिर से जुड़े, मगर बाद में पंजाब आ कर बसे, और गुरुदासपुर के पास उनकी समाधि है।
हिन्दी अर्थ: नामदेव जी ॥ हे मेरे पातशाह ! आपका नाम मुझ अंधे की डंगोरी है। सहारा है; मैं कंगाल हूँ।मैं मसकीन हूँ।आपका नाम (ही) मेरा आसरा है। 1।रहाउ। हे अल्लाह ! हे करीम ! हे रहीम ! आप (ही) अमीर है। आप हर वक्त मेरे सामने है (फिर।मुझे किसी और की क्या मुथाजी।)। 1। आप (रहमत का) दरिया है।आप दाता है। आप बहुत ही धन वाला है; एक आप ही (जीवों को पदार्थ) देता है।और मोड़ लेता है।कोई और ऐसा नहीं (जो ये समर्था रखता हो)। 2। आप (सबके दिल की) जानने वाला है और (सबके काम) देखने वाला है; हे हरी ! मैं आपके कौन-कौन से गुण बखान करूँ। हे नामदेव के पति-परमेश्वर ! हे हरी ! आप सब बख्शिशें करने वाला है।3। 1। 2।
हले यारां हले यारां खुसिखबरी ॥ बलि बलि जांउ हउ बलि बलि जांउ ॥ नीकी तेरी बिगारी आले तेरा नाउ ॥1॥ रहाउ ॥ कुजा आमद कुजा रफती कुजा मे रवी ॥ द्वारिका नगरी रासि बुगोई ॥1॥ खूबु तेरी पगरी मीठे तेरे बोल ॥ द्वारिका नगरी काहे के मगोल ॥2॥ चंदंी हजार आलम एकल खानां ॥ हम चिनी पातिसाह सांवले बरनां ॥3॥ असपति गजपति नरह नरिंद ॥ नामे के स्वामी मीर मुकंद ॥4॥2॥3॥
नामदेव की वाणी में मराठी और पंजाबी दोनों के असर हैं। आदि ग्रंथ में उनकी छियासठ रचनाएँ हैं, अधिकांश भक्ति-प्रधान।
हिन्दी अर्थ: हे सज्जन ! हे प्यारे ! आपकी खबर ठंडक देने वाली है (भाव। आपकी कथा-कहानियाँ सुन के मुझे सकून मिलता है); मैं सदा आपसे सदके जाता हूँ।कुर्बान हूँ। (हे मित्र !) आपका नाम (मुझे) सबसे ज्यादा प्यारा (लगता) है।(इस नाम की बरकति से ही।दुनिया की किरत वाली) आपकी दी हुई वेगार भी (मुझे) मीठी लगती है। 1।रहाउ। (हे सज्जन !) ना आप कहीं से आया।ना आप कभी कहीं गया और ना ही आप कहीं जा रहा है (भाव। आप सदा अटल है) द्वारिका नगरी में रास भी आप स्वयं ही डालता है (भाव।कृष्ण भी आप खुद ही है)। 1। हे यार ! सुंदर सी आपकी पगड़ी है (भाव।आपका स्वरूप सुंदर है) और प्यारे आपके वचन हैं। ना आप सिर्फ द्वारिका में है और आप सिर्फ इस्लामी धर्म केन्द्र मक्के में है (बल्कि।आप हर जगह है)। 2। (सृष्टि के) कई हजार मण्डलों का आप इकलौता (खद ही) मालिक है। हे पातशाह ! ऐसा ही साँवले रंग वाला कृष्ण है (भाव।कृष्ण भी आप स्वयं ही है)। 3। आप स्वयं ही सूर्य देवता है।आप खुद ही इन्द्र है।और आप खुद ही ब्रहमा है। हे नामदेव के पति-प्रभू ! आप स्वयं ही मीर है आप खुद ही कृष्ण है। 4। 2। 3।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। सूही, बिलावल, और गोंड राग का क्षेत्र। गुरु राम दास की ‘लावां’ इसी सूही राग में बँधी, सोलहवीं सदी के मध्य की।
भगत नामदेव महाराष्ट्र के संत थे, तेरहवीं-चौदहवीं सदी के। पंढरपुर के विट्ठल-मन्दिर से जुड़े, मगर बाद में पंजाब आ कर बसे। उनकी वाणी में मराठी और पंजाबी दोनों के असर हैं।
इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे नानक ! (कह, हे मन !) जगत को आप ऐसा ही समझ (कि यहाँ) जिंदगी तक ही बर्ताव-व्यवहार रहता है।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।