अंग 725, राग तिलंग (M5)

SGGS, Ang
725
राग तिलंग, महला 5
राग: राग तिलंग · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी · महला 5
पढ़ने का समय: लगभग 1 मिनट
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ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ तिलंग महला ५ घरु १ ॥ तू पाई दानु बलिहार बलिहारिआ ॥ तू दात देहि सलाह तू सरबसु करिआ ॥१॥ हउ कुरबाणी जाउ बलिहारी रामु पिआरिआ रामु पिआरे ॥रहाउ॥ हरि के गुण नित गावै आराध सलाहीऐ ॥१॥

गुरु अर्जन (M5) का तिलंग।

“तू पाई दानु बलिहार बलिहारिआ।” “तू ने जो दान दिया, बलिहारी, बलिहारी।”

गुरु अर्जन का distinctive style, “बलिहार” शब्द repeat। “बलिहारी, बलिहारी।” तिलंग में जो expansive feel है, उसमें यह repetition resonate करता है।

दिल्ली के मुग़ल-court culture में, formal gratitude expression में repetition common थी। “जान-निसार, जान-निसार” (life-sacrificing, life-sacrificing)। गुरु अर्जन उसी register को pick up कर रहे हैं हरि के साथ।

“तू दात देहि सलाह।” “तू दान देता है, सलाह देता है।”

दो functions: दान और सलाह। यानी हरि सिर्फ़ giver नहीं, advisor भी है।

दिल्ली में हम सब अलग-अलग लोगों से अलग-अलग चीज़ें expect करते हैं। financial advice के लिए one person, life decisions के लिए दूसरा, professional guidance के लिए तीसरा। नानक कह रहे हैं, एक है जो सब functions perform करता है।

“तू सरबसु करिआ।” “तू सर्वस्व किया।”

“सर्वस्व” यानी “all-things।” गुरु अर्जन यहाँ साफ़ कर रहे हैं कि हरि एक specific function का agent नहीं, वो ही सब कुछ है।

“हउ कुरबाणी जाउ बलिहारी रामु पिआरिआ रामु पिआरे।” “मैं कुर्बानी जाऊँ, बलिहारी, राम-प्यारे पर, राम-प्यारे।”

कुर्बानी, बलिहारी, यह escalating love-language है। गुरु अर्जन ख़ुद को कितनी “small” बना रहे हैं।

दिल्ली में हम सब इतनी “validation” की demand करते हैं। हर रोज़ कुछ achievement, कुछ recognition। गुरु अर्जन की voice, “मैं कुर्बान।” यह reverse है। यह position is हम सबसे rare है। मगर genuine love हमेशा यहाँ ले आती है।

“हरि के गुण नित गावै आराध सलाहीऐ।” “हरि के गुण नित गाओ, ‘आराध’ (अराधना) सलाहो।”

closing: नित practice, रोज़।

देखें: आनंद साहिब, गुरु अर्जन की escalating-love language
ang-725-reflection

[ इस अंग की गहरी चिंतना ]

गुरु अर्जन (M5) का तिलंग। “तू पाई दानु बलिहार बलिहारिआ।” “तू ने जो दान दिया, बलिहारी, बलिहारी।”

गुरु अर्जन का distinctive style, “बलिहार” शब्द repeat। “बलिहारी, बलिहारी।” तिलंग में जो expansive feel है, उसमें यह repetition resonate करता है।

दिल्ली के मुग़ल-court culture में, formal gratitude expression में repetition common थी। “जान-निसार, जान-निसार” (life-sacrificing, life-sacrificing)। गुरु अर्जन उसी register को pick up कर रहे हैं हरि के साथ।

“तू दात देहि सलाह।” “तू दान देता है, सलाह देता है।”

दो functions: दान और सलाह। यानी हरि सिर्फ़ giver नहीं, advisor भी है।

दिल्ली में हम सब अलग-अलग लोगों से अलग-अलग चीज़ें expect करते हैं। financial advice के लिए one person, life decisions के लिए दूसरा, professional guidance के लिए तीसरा। नानक कह रहे हैं, एक है जो सब functions perform करता है।

“तू सरबसु करिआ।” “तू सर्वस्व किया।” “सर्वस्व” यानी “all-things।”

गुरु अर्जन यहाँ साफ़ कर रहे हैं कि हरि एक specific function का agent नहीं, वो ही सब कुछ है।

“हउ कुरबाणी जाउ बलिहारी रामु पिआरिआ रामु पिआरे।” “मैं कुर्बानी जाऊँ, बलिहारी, राम-प्यारे पर, राम-प्यारे।”

कुर्बानी, बलिहारी, यह escalating love-language है। गुरु अर्जन ख़ुद को कितनी “small” बना रहे हैं।

दिल्ली में हम सब इतनी “validation” की demand करते हैं। हर रोज़ कुछ achievement, कुछ recognition। गुरु अर्जन की voice, “मैं कुर्बान।” यह reverse है।