लालनु तै पाइआ आपु गवाइआ जै धन भाग मथाणे ॥
बांह पकड़ि ठाकुरि हउ घिधी गुण अवगण न पछाणे ॥
गुण हारु तै पाइआ रंगु लालु बणाइआ तिसु हभो किछु सुहंदा ॥
जन नानक धंनि सुहागणि साई जिसु संगि भतारु वसंदा ॥3॥
यार वे नित सुख सुखेदी सा मै पाई ॥
वरु लोड़ीदा आइआ वजी वाधाई ॥
महा मंगलु रहसु थीआ पिरु दइआलु सद नव रंगीआ ॥
वड भागि पाइआ गुरि मिलाइआ साध कै सतसंगीआ ॥
आसा मनसा सगल पूरी प्रिअ अंकि अंकु मिलाई ॥
बिनवंति नानकु सुख सुखेदी सा मै गुर मिलि पाई ॥4॥1॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सलोकु ॥
ऊचा अगम अपार प्रभु कथनु न जाइ अकथु ॥
नानक प्रभ सरणागती राखन कउ समरथु ॥1॥
जिउ जानहु तिउ राखु हरि प्रभ तेरिआ ॥
केते गनउ असंख अवगण मेरिआ ॥
असंख अवगण खते फेरे नितप्रति सद भूलीऐ ॥
मोह मगन बिकराल माइआ तउ प्रसादी घूलीऐ ॥
लूक करत बिकार बिखड़े प्रभ नेर हू ते नेरिआ ॥
बिनवंति नानक दइआ धारहु काढि भवजल फेरिआ ॥1॥
निरति न पवै असंख गुण ऊचा प्रभ का नाउ ॥
नानक की बेनंतीआ मिलै निथावे थाउ ॥2॥
दूसर नाही ठाउ का पहि जाईऐ ॥
आठ पहर कर जोड़ि सो प्रभु धिआईऐ ॥
धिआइ सो प्रभु सदा अपुना मनहि चिंदिआ पाईऐ ॥
तजि मान मोहु विकारु दूजा एक सिउ लिव लाईऐ ॥
अरपि मनु तनु प्रभू आगै आपु सगल मिटाईऐ ॥
बिनवंति नानकु धारि किरपा साचि नामि समाईऐ ॥2॥
रे मन ता कउ धिआईऐ सभ बिधि जा कै हाथि ॥
राम नाम धनु संचीऐ नानक निबहै साथि ॥3॥
साथीअड़ा प्रभु एकु दूसर नाहि कोइ ॥
थान थनंतरि आपि जलि थलि पूर सोइ ॥
जलि थलि महीअलि पूरि रहिआ सरब दाता प्रभु धनी ॥
गोपाल गोबिंद अंतु नाही बेअंत गुण ता के किआ गनी ॥
भजु सरणि सुआमी सुखह गामी तिसु बिना अन नाहि कोइ ॥
बिनवंति नानक दइआ धारहु तिसु परापति नामु होइ ॥3॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।
गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।
इस अंग पर 7 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे सत्संगी सज्जन ! तूने सोहाने प्रभू का मिलाप हासिल कर लिया है।”
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।