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अंग 704

अंग
704
राग Jaithsree
राग: Jaithsree · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
यार वे तै राविआ लालनु मू दसि दसंदा ॥
लालनु तै पाइआ आपु गवाइआ जै धन भाग मथाणे ॥
बांह पकड़ि ठाकुरि हउ घिधी गुण अवगण न पछाणे ॥
गुण हारु तै पाइआ रंगु लालु बणाइआ तिसु हभो किछु सुहंदा ॥
जन नानक धंनि सुहागणि साई जिसु संगि भतारु वसंदा ॥3॥
यार वे नित सुख सुखेदी सा मै पाई ॥
वरु लोड़ीदा आइआ वजी वाधाई ॥
महा मंगलु रहसु थीआ पिरु दइआलु सद नव रंगीआ ॥
वड भागि पाइआ गुरि मिलाइआ साध कै सतसंगीआ ॥
आसा मनसा सगल पूरी प्रिअ अंकि अंकु मिलाई ॥
बिनवंति नानकु सुख सुखेदी सा मै गुर मिलि पाई ॥4॥1॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: हे सत्संगी सज्जन ! तूने सोहाने प्रभू का मिलाप हासिल कर लिया है।मैं पूछता हूँ।मुझे भी उसके बारे में बता। तूने सोहणे लाल को ढूँढ लिया है।और (अपने अंदर से) स्वै भाव दूर कर लिया है।जिस जीव-स्त्री के माथे के भाग्य जागते हैं (उसे मिलाप होता है)। (हे सखी !) मालिक प्रभू ने (मेरी भी) बाँह पकड़ के मुझे अपनी बना लिया है।मेरा कोई गुण-अवगुण उसने नहीं परखा। हे प्रभु ! जिसे आप गुणों की माला से अलंकृत कर देता है और अपने लाल रंग से रंग देता है, उसे सबकुछ सुन्दर लगता है। हे दास नानक ! (कह) वह जीव-स्त्री भाग्यशाली है।जिसके साथ (जिसके हृदय में) पति-प्रभू बसता है। 3। हे सत्संगी सज्जन ! जो सुख की मन्नतें सदा मैं मनाती रहती थी।वह (सुखना।मुराद) मेरी पूरी हो गई है। जिस प्रभू-पति को मैं (चिरों से) ढूँढती आ रही थी वह (मेरे हृदय में) आ बसा है।अब मेरे अंदर आत्मिक उत्साह के बाजे बज रहे हैं। सदा नए प्रेम-रंग वाला और दया का सोमा प्रभू-पति (मेरे अंदर आ बसा है।अब मेरे अंदर) बड़ा आनंद और उत्साह बन रहा है। हे सत्संगी सज्जन ! बड़ी किस्मत से वह प्रभू-पति मुझे मिला है।गुरू ने मुझे साध-संगति में (उससे) मिला दिया है। (गुरू ने) मेरा स्वै प्यारे के अंक में मिला दिया है।मेरी हरेक आस-मुराद पूरी हो गई है। नानक विनती करता है,जो सुखना (सुख की मन्नत) मैं सुखती रहती थी।गुरू को मिल के वह (मुराद) मैंने हासिल कर ली है। 4।
जैतसरी महला 5 घरु 2 छंत
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सलोकु ॥
ऊचा अगम अपार प्रभु कथनु न जाइ अकथु ॥
नानक प्रभ सरणागती राखन कउ समरथु ॥1॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: जैतसरी महला 5 घरु 2 छंत ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। सलोकु। हे सबसे ऊँचे ! हे अपहुँच ! हे बेअंत ! आप सबका मालिक है।आपका स्वरूप बयान नहीं किया जा सकता।बयान से परे हैं। 1। हे नानक ! (कह) हे प्रभू ! मैं आपकी शरण आया हूँ।आप (शरण आए की) रक्षा करने की ताकत रखता है।
छंतु ॥
जिउ जानहु तिउ राखु हरि प्रभ तेरिआ ॥
केते गनउ असंख अवगण मेरिआ ॥
असंख अवगण खते फेरे नितप्रति सद भूलीऐ ॥
मोह मगन बिकराल माइआ तउ प्रसादी घूलीऐ ॥
लूक करत बिकार बिखड़े प्रभ नेर हू ते नेरिआ ॥
बिनवंति नानक दइआ धारहु काढि भवजल फेरिआ ॥1॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: छंतु। हे हरी ! हे प्रभू ! मैं आपका हूँ।जैसे ठीक समझो वैसे (माया के मोह से) मेरी रक्षा कर। मैं (अपने) कितने अवगुण गिनूँ।मेरे अंदर अनगिनत अवगुण हैं। हे प्रभू ! मेरे अनगिनत ही अवगुण हैं।पापों के चक्करों में फंसा रहता हूँ।नित्य ही हमेशा ही गलतियां करता रहता हँ (मात खा जाता हूँ)। (वैसे तो मनुष्य) भयानक माया के मोह में मस्त रहता है।आपकी कृपा से ही बचा जा सकता है। हम जीव दुखदाई विकार (अपनी ओर से) पर्दे में रह कर करते हैं।पर।हे प्रभू ! आप हमारे नजदीक से नजदीक (हमारे साथ ही) बसता है। नानक विनती करता है हे प्रभू ! हम पर मेहर कर।हम जीवों को संसार-समुंद्र के (विकारों के) चक्करों में से निकाल ले। 1।
सलोकु ॥
निरति न पवै असंख गुण ऊचा प्रभ का नाउ ॥
नानक की बेनंतीआ मिलै निथावे थाउ ॥2॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: श्लोक॥ हे भाई ! परमात्मा के अनगिनत गुणों का निर्णय नहीं हो सकता।उसका बड़प्पन सबसे ऊँचा है। नानक की (उसके दर पर ही) अरदास है कि (मुझ) निआसरे को (उसके चरणों में) जगह मिल जाए। 2।
छंतु ॥
दूसर नाही ठाउ का पहि जाईऐ ॥
आठ पहर कर जोड़ि सो प्रभु धिआईऐ ॥
धिआइ सो प्रभु सदा अपुना मनहि चिंदिआ पाईऐ ॥
तजि मान मोहु विकारु दूजा एक सिउ लिव लाईऐ ॥
अरपि मनु तनु प्रभू आगै आपु सगल मिटाईऐ ॥
बिनवंति नानकु धारि किरपा साचि नामि समाईऐ ॥2॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: छंतु। हे भाई ! हम जीवों के लिए परमात्मा के बिना और कोई जगह नहीं।(परमात्मा का दर छोड़ के) हम और किस के पास जा सकते हैं। दोनों हाथ जोड़ के आठों पहर (हर वक्त) प्रभू का ध्यान धरना चाहिए। हे भाई ! अपने उस प्रभू का ध्यान धर के (उसके दर से) मन मांगी मुरादें हासिल कर ली जाती हैं। (अपने अंदर से) अहंकार।मोह।और कई अन्य आसरे तलाशने की बुराई त्याग के एक परमात्मा के चरणों से ही सुरति जोड़नी चाहिए। हे भाई ! प्रभू की हजूरी में अपना मन अपना शरीर भेटा करके (अपने अंदर से) सारा स्वै भाव मिटा देना चाहिए। नानक (तो प्रभू के दर पर ही) बिनती करता है (और कहता है, हे प्रभू !) मेहर कर (आपकी मेहर से ही आपके) सदा-स्थिर रहने वाले नाम में लीन हुआ जा सकता है। 2।
सलोकु ॥
रे मन ता कउ धिआईऐ सभ बिधि जा कै हाथि ॥
राम नाम धनु संचीऐ नानक निबहै साथि ॥3॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: श्लोक॥ हे (मेरे) मन ! जिस परमात्मा के हाथ में (हमारी) हरेक (जीवन-) जुगति है।उसका नाम सिमरना चाहिए। हे नानक ! परमात्मा का नाम-धन एकत्र करना चाहिए।(यही धन) हमारे साथ साथ निभाता है। 3।
छंतु ॥
साथीअड़ा प्रभु एकु दूसर नाहि कोइ ॥
थान थनंतरि आपि जलि थलि पूर सोइ ॥
जलि थलि महीअलि पूरि रहिआ सरब दाता प्रभु धनी ॥
गोपाल गोबिंद अंतु नाही बेअंत गुण ता के किआ गनी ॥
भजु सरणि सुआमी सुखह गामी तिसु बिना अन नाहि कोइ ॥
बिनवंति नानक दइआ धारहु तिसु परापति नामु होइ ॥3॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: छंतु। हे भाई ! सिर्फ परमात्मा ही (सदा साथ निभने वाला) साथी है।उसके बिना और कोई (साथी) नहीं। वही परमात्मा पानी में।धरती पर।आकाश में बस रहा है। हे भाई ! वह मालिक प्रभू पानी में।धरती पर।आकाश में व्याप रहा है।सब जीवों को दातें देने वाला है। उस गोपाल गोबिंद (के गुणों) का अंत नहीं पाया जा सकता।उसके गुण बेअंत हैं।मैं उसके क्या गुण गिन सकता हूँ। हे भाई ! उस मालिक की शरण पड़ा रह।वह ही सारे सुख पहुँचाने वाला है।उसके बिना (हम जीवों का) और कोई (सहारा) नहीं। नानक विनती करता है, हे प्रभू ! जिस के ऊपर आप मेहर करता है।उसको आपका नाम हासिल हैं जाता है। 3।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।

गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।

इस अंग पर 7 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे सत्संगी सज्जन ! तूने सोहाने प्रभू का मिलाप हासिल कर लिया है।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।