पूरि रहिओ सरबत्र मै नानक हरि रंगि राचु ॥2॥
हरि एकु निरंजनु गाईऐ सभ अंतरि सोई ॥
करण कारण समरथ प्रभु जो करे सु होई ॥
खिन महि थापि उथापदा तिसु बिनु नही कोई ॥
खंड ब्रहमंड पाताल दीप रविआ सभ लोई ॥
जिसु आपि बुझाए सो बुझसी निरमल जनु सोई ॥1॥
रचंति जीअ रचना मात गरभ असथापनं ॥
सासि सासि सिमरंति नानक महा अगनि न बिनासनं ॥1॥
मुखु तलै पैर उपरे वसंदो कुहथड़ै थाइ ॥
नानक सो धणी किउ विसारिओ उधरहि जिस दै नाइ ॥2॥
रकतु बिंदु करि निंमिआ अगनि उदर मझारि ॥
उरध मुखु कुचील बिकलु नरकि घोरि गुबारि ॥
हरि सिमरत तू ना जलहि मनि तनि उर धारि ॥
बिखम थानहु जिनि रखिआ तिसु तिलु न विसारि ॥
प्रभ बिसरत सुखु कदे नाहि जासहि जनमु हारि ॥2॥
मन इछा दान करणं सरबत्र आसा पूरनह ॥
खंडणं कलि कलेसह प्रभ सिमरि नानक नह दूरणह ॥1॥
हभि रंग माणहि जिसु संगि तै सिउ लाईऐ नेहु ॥
सो सहु बिंद न विसरउ नानक जिनि सुंदरु रचिआ देहु ॥2॥
जीउ प्रान तनु धनु दीआ दीने रस भोग ॥
ग्रिह मंदर रथ असु दीए रचि भले संजोग ॥
सुत बनिता साजन सेवक दीए प्रभ देवन जोग ॥
हरि सिमरत तनु मनु हरिआ लहि जाहि विजोग ॥
साधसंगि हरि गुण रमहु बिनसे सभि रोग ॥3॥
कुटंब जतन करणं माइआ अनेक उदमह ॥
हरि भगति भाव हीणं नानक प्रभ बिसरत ते प्रेततह ॥1॥
तुटड़ीआ सा प्रीति जो लाई बिअंन सिउ ॥
नानक सची रीति सांई सेती रतिआ ॥2॥
जिसु बिसरत तनु भसम होइ कहते सभि प्रेतु ॥
खिनु ग्रिह महि बसन न देवही जिन सिउ सोई हेतु ॥
करि अनरथ दरबु संचिआ सो कारजि केतु ॥
जैसा बीजै सो लुणै करम इहु खेतु ॥
अकिरतघणा हरि विसरिआ जोनी भरमेतु ॥4॥
कोटि दान इसनानं अनिक सोधन पवित्रतह ॥
उचरंति नानक हरि हरि रसना सरब पाप बिमुचते ॥1॥
ईधणु कीतोमू घणा भोरी दितीमु भाहि ॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।
अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।
इस अंग पर 9 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “उस सदा-स्थिर रहने वाले प्रभू को मन में अच्छी तरह धारण करना चाहिए जो (हर जगह) खुद ही देखने वाला है।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।