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अंग 706

अंग
706
राग Jaithsree
राग: Jaithsree · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
पेखन सुनन सुनावनो मन महि द्रिड़ीऐ साचु ॥
पूरि रहिओ सरबत्र मै नानक हरि रंगि राचु ॥2॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: उस सदा-स्थिर रहने वाले प्रभू को मन में अच्छी तरह धारण करना चाहिए जो (हर जगह) खुद ही देखने वाला है। खुद ही सुनने वाला है और खुद ही सुनाने वाला है।हे नानक ! उस हरी की प्यारी याद में लीन हो जा जो सब जगह मौजूद है। 2।
पउड़ी ॥
हरि एकु निरंजनु गाईऐ सभ अंतरि सोई ॥
करण कारण समरथ प्रभु जो करे सु होई ॥
खिन महि थापि उथापदा तिसु बिनु नही कोई ॥
खंड ब्रहमंड पाताल दीप रविआ सभ लोई ॥
जिसु आपि बुझाए सो बुझसी निरमल जनु सोई ॥1॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ जो प्रभू माया से निर्लिप है सिर्फ उसकी ही सिफत सालाह करनी चाहिए।वही सबके अंदर मौजूद है। वह प्रभू सारे जगत का मूल है।सब किस्म की ताकत वाला है।(जगत में) वही कुछ होता है जो वह प्रभू करता है। एक पलक में (जीवों को) पैदा करके नाश कर देता है।उसके बिना (उस जैसा) और कोई नहीं। सब देशों में।सारे ब्रहमण्ड में।जमीन के नीचे।द्वीपों में।सारे जगत में वह प्रभू व्यापक है। जिस मनुष्य को (ये) समझ खुद प्रभू देता है।उसे समझ आ जाता है और वह मनुष्य पवित्र हो जाता है। 1।
सलोक ॥
रचंति जीअ रचना मात गरभ असथापनं ॥
सासि सासि सिमरंति नानक महा अगनि न बिनासनं ॥1॥
मुखु तलै पैर उपरे वसंदो कुहथड़ै थाइ ॥
नानक सो धणी किउ विसारिओ उधरहि जिस दै नाइ ॥2॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: श्लोक ॥ जो परमात्मा जीवों की बनतर बनाता है उनको माँ के पेट में जगह देता है। हे नानक ! जीव उसको हरेक सांस के साथ-साथ याद करते हैं और (माँ के पेट की) बड़ी (भयानक) आग उनका नाश नहीं कर सकती। 1। जब आपका मुँह नीचे को था।पैर ऊपर की तरफ थे।बड़ी मुश्किल जगह में आप बसता था तब जिस प्रभू के नाम की बरकति से आप बचा रहा। हे नानक ! (कह, हे भाई !)अब उस मालिक को तूने क्यों भुला दिया। 2।
पउड़ी ॥
रकतु बिंदु करि निंमिआ अगनि उदर मझारि ॥
उरध मुखु कुचील बिकलु नरकि घोरि गुबारि ॥
हरि सिमरत तू ना जलहि मनि तनि उर धारि ॥
बिखम थानहु जिनि रखिआ तिसु तिलु न विसारि ॥
प्रभ बिसरत सुखु कदे नाहि जासहि जनमु हारि ॥2॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ (हे जीव !) (माँ के) रक्त और (पिता के) वीर्य से (माँ के) पेट की आग में आप उगा। आपका मुँह नीचे को था।गंदा और डरावना था।(जैसे) एक अंधेरे घोर नर्क में पड़ा हुआ था। जिस प्रभू को सिमर के आप जलता नहीं था- उसको (अब भी) मन से तन से हृदय में याद कर। जिस प्रभू ने आपको मुश्किल जगह से बचाया।उसको रक्ती भर भी ना भुला। प्रभू को भुलाने से कभी सुख नहीं मिलता।(अगर भुलाएगा तो) मानस जन्म (की बाजी) हार के जाएगा। 2।
सलोक ॥
मन इछा दान करणं सरबत्र आसा पूरनह ॥
खंडणं कलि कलेसह प्रभ सिमरि नानक नह दूरणह ॥1॥
हभि रंग माणहि जिसु संगि तै सिउ लाईऐ नेहु ॥
सो सहु बिंद न विसरउ नानक जिनि सुंदरु रचिआ देहु ॥2॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: श्लोक ॥ हे नानक ! जो प्रभू हमें मन-मांगी दातें देता है जो सब जगह (सब जीवों की) आशाएं पूरी करता है। जो हमारे झगड़े और कलेश नाश करने वाला है उसको याद कर।वह आपसे दूर नहीं। 1। हे नानक ! जिस प्रभू की बरकति से आप सारी मौजें मनाता है।उससे प्रीत जोड़। जिस प्रभू ने आपका सोहणा शरीर बनाया है।रॅब करके वह आपको कभी भी ना भूले। 2।
पउड़ी ॥
जीउ प्रान तनु धनु दीआ दीने रस भोग ॥
ग्रिह मंदर रथ असु दीए रचि भले संजोग ॥
सुत बनिता साजन सेवक दीए प्रभ देवन जोग ॥
हरि सिमरत तनु मनु हरिआ लहि जाहि विजोग ॥
साधसंगि हरि गुण रमहु बिनसे सभि रोग ॥3॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ (प्रभू ने आपको) जिंद।प्राण।शरीर और धन दिया।और स्वादिष्ट पदार्थ भोगने को दिए।आपके अच्छे भाग्य बना के। आपको उसने घर।सुंदर मकान।रथ।घोड़े दिए। सब कुछ देने वाले प्रभू ने आपको पुत्र।पत्नी।मित्र और नौकर दिए। उस प्रभू को सिमर के मन खिला रहता है।सारे दुख मिट जाते हैं। (हे भाई !) सत्संग में उस हरी के गुण चेते किया करो।सारे रोग (उसको सिमरने से) नाश हो जाते हैं। 3।
सलोक ॥
कुटंब जतन करणं माइआ अनेक उदमह ॥
हरि भगति भाव हीणं नानक प्रभ बिसरत ते प्रेततह ॥1॥
तुटड़ीआ सा प्रीति जो लाई बिअंन सिउ ॥
नानक सची रीति सांई सेती रतिआ ॥2॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: श्लोक॥ मनुष्य अपने परिवार के लिए कई कोशिशें करते हैं।माया की खातिर अनेकों उद्यम करते हैं। पर प्रभू की भक्ति की तमन्ना से वंचित रहते हैं।और हे नानक ! जो जीव प्रभू को बिसारते हैं वे (मानो) जिंन भूत हैं। 1। जो प्रीति (प्रभू के बिना) किसी और के साथ लगाई जाती है।वह आखिर में टूट जाती है।पर। हे नानक ! अगर सांई प्रभू में लीन रहें।तो ऐसी जीवन-जुगति सदा कायम रहती है। 2।
पउड़ी ॥
जिसु बिसरत तनु भसम होइ कहते सभि प्रेतु ॥
खिनु ग्रिह महि बसन न देवही जिन सिउ सोई हेतु ॥
करि अनरथ दरबु संचिआ सो कारजि केतु ॥
जैसा बीजै सो लुणै करम इहु खेतु ॥
अकिरतघणा हरि विसरिआ जोनी भरमेतु ॥4॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ जिस जिंद के विछुड़ने से (मनुष्य का) शरीर राख हो जाता है।सारे लोग (उस शरीर) को अपवित्र कहने लग जाते हैं; जिन संबन्धियों से इतना प्यार होता है।वे एक पलक के लिए भी घर में रहने नहीं देते। पाप कर करके धन एकत्र करता रहा।पर उस जिंद के किसी काम में ना आया। ये शरीर (किए) कर्मों की (जैसे) खेती है (इसमें) जैसा (कर्म रूपी बीज कोई) बीजता है है वही काटता है। जो मनुष्य (प्रभू के) किए (उपकारों) को भुलाते हैं वे उसको बिसार देते हैं (आखिर) जूनियों में भटकते हैं। 4।
सलोक ॥
कोटि दान इसनानं अनिक सोधन पवित्रतह ॥
उचरंति नानक हरि हरि रसना सरब पाप बिमुचते ॥1॥
ईधणु कीतोमू घणा भोरी दितीमु भाहि ॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: श्लोक ॥ सो उन्होंने। मानो करोड़ो (रुपए) दान कर लिए।करोड़ों बार तीर्थ स्नान कर लिए हैं और अनेकों स्वच्छता व पवित्रता के साधन कर लिए हैं। हे नानक ! जो मनुष्य जीभ से प्रभू का नाम उचारते हैं।उनके सारे पाप नाश हो जाते हैं। 1। मैंने बहुत सारा ईधन एकत्र कर लिया और उसे थोड़ी सी आग लगा दी (वह सारा ईधन जल के राख हो गया।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।

अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।

इस अंग पर 9 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “उस सदा-स्थिर रहने वाले प्रभू को मन में अच्छी तरह धारण करना चाहिए जो (हर जगह) खुद ही देखने वाला है।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।