करि कीरति जसु अगम अथाहा ॥
खिनु खिनु राम नामु गावाहा ॥
मो कउ धारि क्रिपा मिलीऐ गुर दाते हरि नानक भगति ओुमाहा राम ॥4॥2॥8॥
रसि रसि रामु रसालु सलाहा ॥
मनु राम नामि भीना लै लाहा ॥
खिनु खिनु भगति करह दिनु राती गुरमति भगति ओुमाहा राम ॥1॥
हरि हरि गुण गोविंद जपाहा ॥
मनु तनु जीति सबदु लै लाहा ॥
गुरमति पंच दूत वसि आवहि मनि तनि हरि ओमाहा राम ॥2॥
नामु रतनु हरि नामु जपाहा ॥
हरि गुण गाइ सदा लै लाहा ॥
दीन दइआल क्रिपा करि माधो हरि हरि नामु ओुमाहा राम ॥3॥
जपि जगदीसु जपउ मन माहा ॥
हरि हरि जगंनाथु जगि लाहा ॥
धनु धनु वडे ठाकुर प्रभ मेरे जपि नानक भगति ओमाहा राम ॥4॥3॥9॥
आपे जोगी जुगति जुगाहा ॥
आपे निरभउ ताड़ी लाहा ॥
आपे ही आपि आपि वरतै आपे नामि ओुमाहा राम ॥1॥
आपे दीप लोअ दीपाहा ॥
आपे सतिगुरु समुंदु मथाहा ॥
आपे मथि मथि ततु कढाए जपि नामु रतनु ओुमाहा राम ॥2॥
सखी मिलहु मिलि गुण गावाहा ॥
गुरमुखि नामु जपहु हरि लाहा ॥
हरि हरि भगति द्रिड़ी मनि भाई हरि हरि नामु ओुमाहा राम ॥3॥
आपे वड दाणा वड साहा ॥
गुरमुखि पूंजी नामु विसाहा ॥
हरि हरि दाति करहु प्रभ भावै गुण नानक नामु ओुमाहा राम ॥4॥4॥10॥
मिलि सतसंगति संगि गुराहा ॥
पूंजी नामु गुरमुखि वेसाहा ॥
हरि हरि क्रिपा धारि मधुसूदन मिलि सतसंगि ओुमाहा राम ॥1॥
हरि गुण बाणी स्रवणि सुणाहा ॥
करि किरपा सतिगुरू मिलाहा ॥
गुण गावह गुण बोलह बाणी हरि गुण जपि ओुमाहा राम ॥2॥
सभि तीरथ वरत जग पुंन तोुलाहा ॥
हरि हरि नाम न पुजहि पुजाहा ॥
हरि हरि अतुलु तोलु अति भारी गुरमति जपि ओुमाहा राम ॥3॥
सभि करम धरम हरि नामु जपाहा ॥
किलविख मैलु पाप धोवाहा ॥
दीन दइआल होहु जन ऊपरि देहु नानक नामु ओमाहा राम ॥4॥5॥11॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।
गुरु रामदास जी 1574 में गुरु-गद्दी पर बैठे और 1581 तक रहे। उन्हीं ने अमृतसर शहर बसाया, हरमंदिर साहिब की नींव रखी। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य प्रेम की तस्वीरें बार-बार लौटती हैं। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्रीय शब्द-समूह है, उन्हीं की रचना है।
इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(प्रभू-दर पे अरदास करो-) हे प्रभू ! मेहर कर।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।