ੴ सति नामु करता पुरखु निरभउ निरवैरु अकाल मूरति अजूनी सैभं गुर प्रसादि ॥
यक अरज गुफतम पेसि तो दर गोस कुन करतार ॥
हका कबीर करीम तू बेऐब परवदगार ॥1॥
दुनीआ मुकामे फानी तहकीक दिल दानी ॥
मम सर मूइ अजराईल गिरफतह दिल हेचि न दानी ॥1॥ रहाउ ॥
जन पिसर पदर बिरादरां कस नेस दसतंगीर ॥
आखिर बिअफतम कस न दारद चूं सवद तकबीर ॥2॥
सब रोज गसतम दर हवा करदेम बदी खिआल ॥
गाहे न नेकी कार करदम मम इंी चिनी अहवाल ॥3॥
बदबखत हम चु बखील गाफिल बेनजर बेबाक ॥
नानक बुगोयद जनु तुरा तेरे चाकरां पा खाक ॥4॥1॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
भउ तेरा भांग खलड़ी मेरा चीतु ॥
मै देवाना भइआ अतीतु ॥
कर कासा दरसन की भूख ॥
मै दरि मागउ नीता नीत ॥1॥
तउ दरसन की करउ समाइ ॥
मै दरि मागतु भीखिआ पाइ ॥1॥ रहाउ ॥
केसरि कुसम मिरगमै हरणा सरब सरीरी चड़॑णा ॥
चंदन भगता जोति इनेही सरबे परमलु करणा ॥2॥
घिअ पट भांडा कहै न कोइ ॥
ऐसा भगतु वरन महि होइ ॥
तेरै नामि निवे रहे लिव लाइ ॥
नानक तिन दरि भीखिआ पाइ ॥3॥1॥2॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
इहु तनु माइआ पाहिआ पिआरे लीतड़ा लबि रंगाए ॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। सूही, बिलावल, और गोंड राग का क्षेत्र। गुरु राम दास की ‘लावां’ इसी सूही राग में बँधी, सोलहवीं सदी के मध्य की।
नानक की रचनाओं में एक खास तरह की आबजर्वेशनल आँख है। एक पटवारी का पेशा छोड़ कर तीस के बाद के दशकों में वो काबुल, मक्का, अरब, असम, श्रीलंका, और तिब्बत की सरहद तक गए। हर जगह संत-फ़क़ीरों, बादशाहों, और साधारण किसानों से बातचीत की, और उसी बातचीत की पर्तें इन शबदों में बैठी हैं।
इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “रागु तिलंग महला 1 घरु 1 ईश्वर एक है, उसका नाम सत्य है, वह आदिपुरुष संसार का रचनहार है, सर्वशक्तिमान है, अभय है, वैर भावना से रहित होने के कारण प्रेमस्वरूप है, वह कालातीत ब्रह्म-मूर।”
एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।