अंग 721, राग तिलंग प्रारम्भ (यक अरज, deepened)

SGGS, Ang
721
राग तिलंग, महला 1 (प्रारम्भ – यक अरज)
राग: राग तिलंग · रचयिता: गुरु नानक देव जी · महला 1
पढ़ने का समय: लगभग 4 मिनट
यह राग तिलंग है, शाम का राग। नाम तेलंगाना (दक्षिण भारत) से आया, मगर ग्रंथ साहिब में इसका रंग बहुत persianate है, फ़ारसी-अरबी शब्दों के साथ। यह वो register है जिसमें आदमी हरि से ऐसे बात करता है जैसे अपने beloved से, या अपने सुलतान से।

यहाँ गुरु नानक देव जी, गुरु राम दास जी, गुरु अर्जन देव जी, और भगत कबीर – चारों बोलते हैं। नानक का famous “यक अरज गुफ्तम पेसि तो” इसी राग में है। तिलंग सूफ़ी रंग नहीं, मगर सूफ़ी traditions के emotional territory को share करता है।
ang-721-yak-arz

ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ राग तिलंग महला १ घरु १ ॥ यक अरज गुफ्तम पेसि तो दर कुन कुनिंदा या ॥ हका कबीर करीम तू बेऐब परवरदिगारा ॥१॥ दुनीआ मुकामे फानी तहकीक दिल दानी ॥ ममि किरम जिमि बुम बासिर सरतसरि सरबासरी ॥१॥रहाउ॥ जेहि बीसि दुस्तर अबियासि कीहु तेजरै सरीरा ॥ हम चु करम बंदा बि करार जिमि अरूज दिल फरीदी ॥२॥ दे सलाही कउनु करै काइस की दिलि लाई ॥ पंजि नमाजां वकत पंजि पंजा पंजे नाउ ॥ पहिला सचु हलाल दुइ तीजा खैर खुदाई ॥ चउथी नीअति राऽसि मनु पंजवी सिफति सनाइ ॥ करणी कलमा आखि कै ता मुसलमाणु सदाइ ॥ नानक जेते कूड़िआर कूड़ै कूड़ी पाइ ॥३॥१॥

और यह वो शबद। ग्रंथ साहिब का सबसे persianate verse। गुरु नानक का सबसे multilingual moment।

historical context: 16वीं सदी का north India। मुग़ल/लोदी सल्तनत के तहत। फ़ारसी court language थी, मुग़ल हुकूमत की। अरबी धार्मिक भाषा थी, मुस्लिम community की। हिन्दू-मुस्लिम communities अक्सर अपनी अलग spaces में रहती थीं।

नानक एक radical act कर रहे हैं, एक सिख गुरु, हरि की प्रार्थना फ़ारसी में लिख रहे हैं। यह boundary-crossing है, conscious choice है, और invitation है।

“यक अरज गुफ्तम पेसि तो।” “एक अर्ज़ कह रहा हूँ तेरे सामने।”

यह pure फ़ारसी है। “यक” (एक), “अरज़” (request, petition), “गुफ्तम” (मैं कहता हूँ), “पेसि तो” (तेरे सामने)। हर शब्द फ़ारसी, कोई हिन्दी नहीं, कोई पंजाबी नहीं।

दिल्ली के मुग़ल court में जब कोई fariyaad लेने आता था, वो “अर्ज़” करता था। यानी formal request। नानक उसी court language को use कर रहे हैं हरि के सामने। हरि “the highest court” है।

“दर कुन कुनिंदा या।” “द्वार खोल, ए ‘कुनिंदा’ (doer, creator)।”

“कुनिंदा” फ़ारसी का beautiful शब्द है। “कुन” (do) + “अंदा” (one who does) = doer, maker, creator। दर्शन-शास्त्र की language में, यह “first cause” का equivalent है।

“हका कबीर करीम तू।” “तू हक़ है, कबीर है, करीम है।”

तीन attributes of god, सब फ़ारसी-अरबी roots से। “हक़” (truth), “कबीर” (great), “करीम” (generous)। यह वही attributes हैं जो सूफ़ी traditions में हरि के लिए use होते हैं।

मगर ध्यान दीजिए, “कबीर” शब्द को नानक यहाँ अरबी sense में use कर रहे हैं (“the great”)। साथ ही “कबीर” भगत हरि-भक्त भी हैं, जिनकी रचनाएँ ग्रंथ साहिब में हैं। यह double-meaning intentional हो सकती है।

“बेऐब परवरदिगारा।” “बे-ऐब (निर्दोष), परवरदिगार।”

“बेऐब” फ़ारसी, “बे” (without) + “ऐब” (defect) = flawless। “परवरदिगार” यानी “sustainer, the one who nourishes।”

दिल्ली के context में: यह सलोक 500 साल पहले लिखा गया था, मगर आज भी आप अगर किसी मुस्लिम friend के घर जाते हो, और दुआ सुनते हो, यह same vocabulary है। नानक यह boundary पार कर के बता रहे हैं, “हम सब उसी एक से connect करते हैं।”

“दुनीआ मुकामे फानी।” “दुनिया एक ‘मक़ाम-ए-फ़ानी’ (transient resting place)।”

सूफ़ी philosophy का essential statement। दुनिया एक permanent home नहीं, एक temporary inn है। यह concept “मंज़िल-ए-फ़ानी” बहुत आता है फ़ारसी कविता में।

दिल्ली में हम सब घर खरीदते हैं, उसको decorate करते हैं, उसमें settle होते हैं। यह “permanent” लगता है। मगर असली में यह “मक़ाम-ए-फ़ानी” है। यह acknowledgment ज़रूरी है।

“तहकीक दिल दानी।” “‘तहक़ीक’ (verify) कर, दिल जानता है।”

instruction: अपने दिल से verify कर। बाहर की evidence नहीं चाहिए। तेरा दिल यह सच जानता है।

यह सबसे intimate moment है। नानक कह रहे हैं, यह बात तू अपने दिल में feel कर सकता है। external proof की ज़रूरत नहीं।

“ममि किरम जिमि बुम बासिर सरतसरि सरबासरी।” “ममि (मैं), किरम (कीड़ा), जिमि (ज़मीन), बुम (मूल, foundation), बासिर (बासी, dweller), सरतसरि (sarwar से, head), सरबासरी (सर्वासरी, all-headed)।”

यह दिलचस्प line है। नानक list कर रहे हैं, मैं “कीड़ा” हूँ, ज़मीन, मूल, dweller। फिर final, “सरतसरि सरबासरी,” यानी “सब का सर।”

paradox: एक तरफ़ नानक ख़ुद को कीड़ा कह रहे हैं, दूसरी तरफ़ “सरबासरी।” यह advaita का statement है। मैं सबसे कमतर हूँ, और एक sense में सब का head भी हूँ। दोनों simultaneously।

“जेहि बीसि दुस्तर अबियासि कीहु तेजरै सरीरा।” “जो ‘बीस-दुस्तर’ (बहुत कठिन) ‘अभ्यास’ किया, तेरा शरीर है।”

मेरा शरीर तू ही ने बहुत कठिन practice से बनाया है।

“हम चु करम बंदा।” “हम कैसा कर्म-बँधा?”

“बि करार जिमि अरूज दिल फरीदी।” “बिना ‘क़रार’ (peace) जैसे फ़रीद का दिल ‘अरूज’ (rise) नहीं।”

यह बहुत significant cross-reference है। नानक यहाँ शेख़ फ़रीद का नाम ले रहे हैं। फ़रीद 12th century के थे, नानक 15th-16th century के। नानक उन्हें honour कर रहे हैं। और later, गुरु अर्जन ने ग्रंथ साहिब में फ़रीद की 130+ सलोक शामिल कीं।

“पंजि नमाजां वकत पंजि।” “पाँच नमाज़ें ‘वक़्त’ पाँच।”

इस्लामी practice का acknowledgment। पाँच वक़्त की नमाज़, पाँच विशेष timings।

“पहिला सचु हलाल दुइ।” “पहली सच, दूसरी ‘हलाल’ (honest livelihood)।”

और यहाँ नानक एक radical reinterpretation करते हैं। “नमाज़” को redefine कर रहे हैं। नमाज़ ritual नहीं, यह internal qualities हैं।

“तीजा खैर खुदाई।” “तीसरी ‘ख़ैर’ (welfare, charity)।”

“चउथी नीअति राऽसि मनु।” “चौथी ‘नीयत’ (intention) सीधी, मन।”

“पंजवी सिफति सनाइ।” “पाँचवीं ‘सिफ़त’ (praise), ‘सनाइ’ (eulogy)।”

पाँच नमाज़ें: 1. सच, 2. हलाल कमाई, 3. ख़ैर/दान, 4. सीधी नीयत, 5. हरि की सिफ़त।

यह सबसे beautiful reinterpretation है। “पाँच नमाज़” external ritual से internal practice बन गई।

“करणी कलमा आखि कै ता मुसलमाणु सदाइ।” “‘करनी’ का ‘कलमा’ कह कर, तब ‘मुसलमान’ कहलाओ।”

final radical statement। एक “मुसलमान” वो जो ये पाँच क़ुर्बानियाँ अपने जीवन में execute करता है। बस “मुसलमान” पैदा होने से नहीं।

“नानक जेते कूड़िआर कूड़ै कूड़ी पाइ।” “नानक कहते हैं, जितने ‘कूड़िआर’ (झूठे), ‘कूड़े’ (झूठ में) ही पाते हैं।”

closing: जो लोग ritual में फँसे हैं, हलाल-व्यापार से दूर हैं, ख़ैर नहीं देते, नीयत साफ़ नहीं रखते, सिफ़त नहीं गाते, वो सब “कूड़े” में पाते हैं।

दिल्ली के context में: यह सलोक हिन्दू-मुस्लिम divide को directly address करता है। आज भी relevant। हम सब अपने-अपने rituals में फँसे हैं, चाहे temple की पूजा हो, मस्जिद की नमाज़ हो, gurdwara का path हो। नानक 500 साल पहले बता गए, ritual की substance “करनी” है, बाहर का form नहीं।

और यह सलोक आज भी सिख schools में बच्चे पढ़ते हैं, मगर “पंजि नमाजां” वाली पंक्तियाँ अक्सर overlooked हो जाती हैं। यहाँ नानक का message radical interfaith respect है, पाँच नमाज़ की reverence के साथ साथ उसको elevated definition।

देखें: जपजी साहिब, हरि के many names · अंग 1378, “फ़रीदा बुरे दा भला कर” (नानक के द्वारा referenced फ़रीद) · वाणी: शेख़ फ़रीद जी