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अंग 715

अंग
715
राग टोडी
राग: टोडी · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
चरन कमल संगि प्रीति मनि लागी सुरि जन मिले पिआरे ॥
नानक अनद करे हरि जपि जपि सगले रोग निवारे ॥2॥10॥15॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: हे नानक ! जिस मनुष्य को प्यारे गुरसिख सज्जन मिल जाते हैं उसके मन में परमात्मा के कोमल चरणों का प्यार पैदा हो जाता है। वह मनुष्य परमात्मा का नाम जप-जप के आत्मिक आनंद लेता है और वह (अपने अंदर से) सारे रोग दूर कर लेता है। 2। 10। 15।
टोडी महला 5 घरु 3 चउपदे
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
हां हां लपटिओ रे मूड़॑े कछू न थोरी ॥
तेरो नही सु जानी मोरी ॥ रहाउ ॥
आपन रामु न चीनो खिनूआ ॥
जो पराई सु अपनी मनूआ ॥1॥
नामु संगी सो मनि न बसाइओ ॥
छोडि जाहि वाहू चितु लाइओ ॥2॥
सो संचिओ जितु भूख तिसाइओ ॥
अंम्रित नामु तोसा नही पाइओ ॥3॥
काम क्रोधि मोह कूपि परिआ ॥
गुर प्रसादि नानक को तरिआ ॥4॥1॥16॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: टोडी महला 5 घरु 3 चउपदे ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। हे मूर्ख (मन) ! मैंने समझ लिया है कि आप (माया के साथ) चिपका हुआ है।(आपकी उसके साथ प्रीति भी) कुछ थोड़ी सी नहीं। (जो माया सदा) आपकी नहीं बनी रहनी।उसको आप अपनी समझ रहा है।रहाउ। हे भाई ! परमात्मा (ही) अपना (असल साथी है उससे तूने) एक छिन के लिए भी जान-पहचान नहीं बनाई। जो (माया) बेगानी (बन जानी) है उसको तूने अपनी मान लिया है। 1। हे भाई ! परमात्मा का नाम (असल) साथी है।उसको तूने अपने मन में (कभी) नहीं बसाया। (जो पदार्थ आखिर) छूट जाएंगे।उनसे तूने चित्त जोड़ा हुआ है। 2। हे भाई ! आप उस धन-पदार्थ को इकट्ठा कर रहा है।जिससे (माया की) भूख-प्यास (बनी रहेगी)। परमात्मा का आत्मिक जीवन देने वाला नाम जीवन-सफर का खर्च है।तूने वह हासिल नहीं किया। 3। हे नानक ! (कह, हे भाई !) आप काम-क्रोध में आप मोह के कूएं में पड़ा हुआ है।(पर।आपके भी क्या वश।) कोई विरला मनुष्य ही गुरू की कृपा से (इस कूएं में से) पार लांघता है। 4। 1। 16।
टोडी महला 5 ॥
हमारै एकै हरी हरी ॥
आन अवर सिञाणि न करी ॥ रहाउ ॥
वडै भागि गुरु अपुना पाइओ ॥
गुरि मो कउ हरि नामु द्रिड़ाइओ ॥1॥
हरि हरि जाप ताप ब्रत नेमा ॥
हरि हरि धिआइ कुसल सभि खेमा ॥2॥
आचार बिउहार जाति हरि गुनीआ ॥
महा अनंद कीरतन हरि सुनीआ ॥3॥
कहु नानक जिनि ठाकुरु पाइआ ॥ सभु किछु तिस के ग्रिह महि आइआ ॥4॥2॥17॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: टोडी महला 5 ॥ हे भाई ! मैंने अपने दिल में एक परमात्मा का ही आसरा रखा हुआ है। (परमात्मा के बिना) मैं कोई और आसरा नहीं पहचानता।रहाउ। हे भाई ! बड़ी किस्मत से मुझे अपना गुरू मिला। गुरू ने मुझे परमात्मा का नाम (दे के) मेरे हृदय में पक्का कर दिया। 1। अब। हे भाई ! परमात्मा का नाम ही (मेरे लिए) जप-तप है।वर्त है।धार्मिक नियम है। परमात्मा का नाम सिमर-सिमर के मुझे सारे सुख-आनंद प्राप्त हो रहे हैं। 2। हे भाई ! परमात्मा के गुण गाने (अब मेरे लिए) धार्मिक रस्में और (उच्च) जाति है। परमात्मा की सिफत सालाह सुन-सुन के (मेरे अंदर) बड़ा आनंद पैदा होता है। 3। हे नानक ! कह, जिस मनुष्य ने (अपने हृदय में बसता) परमात्मा पा लिया। उसके हृदय घर में हरेक चीज आ गई। 4। 2। 17।
टोडी महला 5 घरु 4 दुपदे
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
रूड़ो मनु हरि रंगो लोड़ै ॥
गाली हरि नीहु न होइ ॥ रहाउ ॥
हउ ढूढेदी दरसन कारणि बीथी बीथी पेखा ॥
गुर मिलि भरमु गवाइआ हे ॥1॥
इह बुधि पाई मै साधू कंनहु लेखु लिखिओ धुरि माथै ॥
इह बिधि नानक हरि नैण अलोइ ॥2॥1॥18॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: टोडी महला 5 घरु 4 दुपदे ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। (हे भाई ! वैसे तो ये) मन परमात्मा के सुदर प्रेम-रंग को (प्राप्त करना) चाहता ही रहता है। पर केवल बातों से प्रेम नहीं मिलता।रहाउ। हे भाई ! परमात्मा के दर्शन करने के लिए मैं (जाप-ताप-कर्मकाण्ड आदि की) गली-गली ढूँढती रही।देखती रही। (आखिर) गुरू को मिल के (अपने मन की) भटकना दूर की है। 1। (हे भाई ! मन की भटकना दूर करने की) ये बुद्धि मैंने गुरू से हासिल की।मेरे माथे पर (गुरू के मिलाप का) लेख धुर-दरगाह से लिखा हुआ था। हे नानक ! (कह) इस तरह मैंने परमात्मा को (हर जगह बसता) अपनी आँखों से देख लिया। 2। 1। 18।
टोडी महला 5 ॥
गरबि गहिलड़ो मूड़ड़ो हीओ रे ॥
हीओ महराज री माइओ ॥ डीहर निआई मोहि फाकिओ रे ॥ रहाउ ॥
घणो घणो घणो सद लोड़ै बिनु लहणे कैठै पाइओ रे ॥
महराज रो गाथु वाहू सिउ लुभड़िओ निहभागड़ो भाहि संजोइओ रे ॥1॥
सुणि मन सीख साधू जन सगलो थारे सगले प्राछत मिटिओ रे ॥
जा को लहणो महराज री गाठड़ीओ जन नानक गरभासि न पउड़िओ रे ॥2॥2॥19॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: टोडी महला 5 ॥ हे भाई ! मूर्ख हृदय अहंकार में झल्ला हुआ रहता है। इस दिल को महाराज (प्रभू) की माया ने मछली की तरह मोह में फसा रखा है (जैसे मछली को कुण्डी में)।रहाउ। हे भाई ! (मोह में फंसा हुआ हृदय) सदा बहुत (माया) मांगता रहता है।पर बिना भाग्यों के कहाँ मिलती है। हे भाई ! महाराज का (दिया हुआ) ये शरीर है।इसी के साथ (मूर्ख जीव) मोह करता रहता है।भाग्यहीन मनुष्य (अपने मन को तृष्णा की) आग से जोड़े रखता है। 1। हे मन ! सारे साधु-जनों की शिक्षा को सुना कर।(इसकी बरकति से) आपके सारे पाप मिट जाएंगे। हे दास नानक ! (कह) महाराज के खजाने में से जिसके भाग्यों में कुछ प्राप्ति लिखी हुई है।वह जूनियों में नहीं पड़ता। 2। 2। 19।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।

अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।

इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे नानक ! जिस मनुष्य को प्यारे गुरसिख सज्जन मिल जाते हैं उसके मन में परमात्मा के कोमल चरणों का प्यार पैदा हो जाता है।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।