नानक अनद करे हरि जपि जपि सगले रोग निवारे ॥2॥10॥15॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
हां हां लपटिओ रे मूड़॑े कछू न थोरी ॥
तेरो नही सु जानी मोरी ॥ रहाउ ॥
आपन रामु न चीनो खिनूआ ॥
जो पराई सु अपनी मनूआ ॥1॥
नामु संगी सो मनि न बसाइओ ॥
छोडि जाहि वाहू चितु लाइओ ॥2॥
सो संचिओ जितु भूख तिसाइओ ॥
अंम्रित नामु तोसा नही पाइओ ॥3॥
काम क्रोधि मोह कूपि परिआ ॥
गुर प्रसादि नानक को तरिआ ॥4॥1॥16॥
हमारै एकै हरी हरी ॥
आन अवर सिञाणि न करी ॥ रहाउ ॥
वडै भागि गुरु अपुना पाइओ ॥
गुरि मो कउ हरि नामु द्रिड़ाइओ ॥1॥
हरि हरि जाप ताप ब्रत नेमा ॥
हरि हरि धिआइ कुसल सभि खेमा ॥2॥
आचार बिउहार जाति हरि गुनीआ ॥
महा अनंद कीरतन हरि सुनीआ ॥3॥
कहु नानक जिनि ठाकुरु पाइआ ॥ सभु किछु तिस के ग्रिह महि आइआ ॥4॥2॥17॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
रूड़ो मनु हरि रंगो लोड़ै ॥
गाली हरि नीहु न होइ ॥ रहाउ ॥
हउ ढूढेदी दरसन कारणि बीथी बीथी पेखा ॥
गुर मिलि भरमु गवाइआ हे ॥1॥
इह बुधि पाई मै साधू कंनहु लेखु लिखिओ धुरि माथै ॥
इह बिधि नानक हरि नैण अलोइ ॥2॥1॥18॥
गरबि गहिलड़ो मूड़ड़ो हीओ रे ॥
हीओ महराज री माइओ ॥ डीहर निआई मोहि फाकिओ रे ॥ रहाउ ॥
घणो घणो घणो सद लोड़ै बिनु लहणे कैठै पाइओ रे ॥
महराज रो गाथु वाहू सिउ लुभड़िओ निहभागड़ो भाहि संजोइओ रे ॥1॥
सुणि मन सीख साधू जन सगलो थारे सगले प्राछत मिटिओ रे ॥
जा को लहणो महराज री गाठड़ीओ जन नानक गरभासि न पउड़िओ रे ॥2॥2॥19॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।
अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।
इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे नानक ! जिस मनुष्य को प्यारे गुरसिख सज्जन मिल जाते हैं उसके मन में परमात्मा के कोमल चरणों का प्यार पैदा हो जाता है।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।