टोडी महला ५ ॥ प्रभ प्रिअ प्रीतमु जनहु धिआइ ॥ रसन रसिक नामि गाइ ॥रहाउ॥ उरंदर बाहरि सरबत्र संगि गाइ हरि निरंजन ॥१॥
टोडी महला ५ ॥ प्रब जी मिले संगि साधा ॥ तेरै नाम पंकज मन भृंगा बसहु अनिक प्रकार ॥१॥रहाउ॥
“प्रब जी मिले संगि साधा।” “प्रभु जी मिले ‘साधा’ (साधुओं) के साथ।”
consistent message। साधुओं के साथ ही प्रभु मिलते हैं। यह नानक की सबसे repeated teaching है पूरे ग्रंथ साहिब में।
दिल्ली में हम सब “association” की बात करते हैं, “बच्चे को अच्छी company में रखो।” गुरु अर्जन वही principle adults पर apply कर रहे हैं, “ख़ुद को अच्छी company में रखो।”
“तेरै नाम पंकज मन भृंगा।” “तेरा नाम ‘पंकज’ (lotus, कमल), मन ‘भृंगा’ (भौंरा)।”
beautiful metaphor। तेरा नाम कमल है, मेरा मन भौंरा। भौंरा कमल पर बैठ कर शहद चूसता है।
यह image bhakti tradition में बहुत popular है। सूरदास, मीराबाई, सबने यह use किया। भौंरा-कमल का रिश्ता intimate है, dependent है, मगर जबरदस्ती का नहीं। भौंरा कमल को choose करता है, और कमल भी aloofly its sweetness offer करता है।
दिल्ली के parks में जब आप lotus pond देखते हो (Lodhi Garden, Sundar Nursery), बहुत बार भौंरे या तितलियाँ कमल पर मिलती हैं। यह relationship visible है। गुरु अर्जन कह रहे हैं, मन-नाम का relationship वैसा ही है।
“बसहु अनिक प्रकार।” “बसो ‘अनेक प्रकार’ से।”
closing: तू अनेक प्रकारों से बसा है। यानी हरि single fixed form में नहीं, anywhere में बसा है, हर मन के style में।
दिल्ली में हम सब अपने unique way से हरि से connect करते हैं। कोई कीर्तन में, कोई silence में, कोई service में, कोई work में। नानक कह रहे हैं, यह सब valid है। हरि “अनिक प्रकार” से बसता है।
[ इस अंग की गहरी चिंतना ]
टोडी की escalating intimacy यहाँ peak पर है। तीन synonyms एक पंक्ति में, “प्रभु, प्रिय, प्रीतम।”
देखिए कैसे escalating हैं: “प्रभु” (lord, formal), “प्रिय” (loved one, semi-formal), “प्रीतम” (beloved, intimate)। यह gradient है।
टोडी का mood यह escalating intimacy को host कर सकती है। यहाँ yearning ही sustained intimacy है। कोई rush नहीं, कोई urgency नहीं, बस एक deepening recognition।
“रसना (जीभ) नाम के रसिक से गाओ।” “रसिक” शब्द ध्यान देने योग्य है। यह “enjoyer of taste, connoisseur” है।
हम सब किसी न किसी के “रसिक” हैं, खाने के, संगीत के, बातचीत के। दिल्ली के foodie culture को सोचो। हम जब असली खाने का “रसिक” बनते हैं, हम जल्दी नहीं खाते। हम चबाते हैं, स्वाद लेते हैं, ध्यान देते हैं।
यह same process है, मगर शब्द के साथ। जीभ का “रसिक” बनना नाम का, यानी हर शब्द-उच्चारण में attention, स्वाद, savor।
“उरंदर बाहरि सरबत्र संगि।” “उर के अंदर, बाहर, सर्वत्र, संग में।” spatial expansion।
हरि कहाँ है? हृदय के अंदर भी, बाहर भी, हर जगह, सब के साथ। यह “panentheism” का beautiful statement है।
“प्रभ प्रिअ प्रीतमु जनहु धिआइ।” “प्रभु, प्रिय, प्रीतम, सब को ध्या।”
तीन synonym words एक पंक्ति में। “प्रभु,” “प्रिय,” “प्रीतम।”
देखिए कैसे escalating हैं: “प्रभु” (lord, formal), “प्रिय” (loved one, semi-formal), “प्रीतम” (beloved, intimate)। यह gradient है।
टोडी का mood यह escalating intimacy को host कर सकती है। यहाँ yearning ही sustained intimacy है। कोई rush नहीं, कोई urgency नहीं, बस एक deepening recognition।
“रसन रसिक नामि गाइ।” “रसना (जीभ) नाम के ‘रसिक’ से गाओ।”
“रसिक” शब्द ध्यान देने योग्य है। यह “enjoyer of taste, connoisseur” है। हम सब किसी न किसी के “रसिक” हैं, खाने के, संगीत के, बातचीत के।
दिल्ली के foodie culture को सोचो। हम जब असली खाने का “रसिक” बनते हैं, हम जल्दी नहीं खाते। हम चबाते हैं, स्वाद लेते हैं, ध्यान देते हैं। यह same process है, मगर शब्द के साथ।
जीभ का “रसिक” बनना नाम का, यानी हर शब्द-उच्चारण में attention, स्वाद, savor। यह fast chanting नहीं, यह mindful repetition है।
“उरंदर बाहरि सरबत्र संगि।” “उर के अंदर, बाहर, सर्वत्र, संग में।”
spatial expansion। हरि कहाँ है? हृदय के अंदर भी, बाहर भी, हर जगह, सब के साथ।
यह “panentheism” का beautiful statement है। दिल्ली में जब हम मंदिर जाते हैं, हम “ऊँचा” feel करते हैं। जब घर आते हैं, “नीचे।” नानक कह रहे हैं, यह distinction है ही नहीं। उरंदर भी वो, बाहर भी वो, सबमें वो।
“गाइ हरि निरंजन।” “हरि-‘निरंजन’ (निर्मल) गाओ।”
closing: निरंजन हरि का गाना। “निरंजन” जैसा पहले देखा (अंग 10), यानी जो किसी “अंजन” (दाग़) से नहीं छुआ।
यह सबसे important quality है। दिल्ली में हम सब किसी न किसी “अंजन” से touched हैं, regrets, ambitions, fears। हरि वो है जो इन सब से untouched है। उसी का गाना।