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अंग 711

अंग
711
राग टोडी
राग: टोडी · रचयिता: Guru Raam Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ੴ सति नामु करता पुरखु निरभउ निरवैरु अकाल मूरति अजूनी सैभं गुर प्रसादि ॥
रागु टोडी महला 4 घरु 1 ॥
हरि बिनु रहि न सकै मनु मेरा ॥
मेरे प्रीतम प्रान हरि प्रभु गुरु मेले बहुरि न भवजलि फेरा ॥1॥ रहाउ ॥
मेरै हीअरै लोच लगी प्रभ केरी हरि नैनहु हरि प्रभ हेरा ॥
सतिगुरि दइआलि हरि नामु द्रिड़ाइआ हरि पाधरु हरि प्रभ केरा ॥1॥
हरि रंगी हरि नामु प्रभ पाइआ हरि गोविंद हरि प्रभ केरा ॥
हरि हिरदै मनि तनि मीठा लागा मुखि मसतकि भागु चंगेरा ॥2॥
लोभ विकार जिना मनु लागा हरि विसरिआ पुरखु चंगेरा ॥
ओइ मनमुख मूड़ अगिआनी कहीअहि तिन मसतकि भागु मंदेरा ॥3॥
बिबेक बुधि सतिगुर ते पाई गुर गिआनु गुरू प्रभ केरा ॥
जन नानक नामु गुरू ते पाइआ धुरि मसतकि भागु लिखेरा ॥4॥1॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: परमात्मा एक है, उसका नाम सत्य है। वह सृष्टि का रचयिता सर्वशक्तिमान है। उसमें किसी तरह का भय व्याप्त नहीं,वह कालातीत, अजन्मा एवं स्वयंभू है और गुरु-कृपा से उसे पाया जा सकता है। रागु टोडी महला 4 घरु 1 ॥ हे भाई ! मेरा मन परमात्मा की याद के बिना नहीं रह सकता। गुरू (जिस मनुष्य को) जिंद का प्यारा प्रभू मिला देता है।उसको संसार-समुंद्र में दोबारा नहीं आना पड़ता। 1।रहाउ। हे भाई ! मेरे हृदय में प्रभू (के मिलाप) की तमन्ना लगी हुई थी (मेरा जी करता था कि) मैं (अपनी) आँखों से हरी-प्रभू को देख लूँ। दयालु गुरू ने परमात्मा का नाम मेरे दिल में दृढ़ कर दिया- यही है हरी-प्रभू (को मिलने) का सपाट रास्ता। 1। हे भाई ! अनेकों करिश्मों के मालिक हरी प्रभू गोबिंद का नाम जिस मनुष्य ने प्राप्त कर लिया। उसके हृदय में।उसके मन में शरीर में।परमात्मा प्यारा लगने लग जाता है।उसके माथे पे मुँह पे अच्छे भाग्य जाग पड़ते हैं। 2। पर।हे भाई ! जिन मनुष्यों के मन लोभ आदि विकारों में मस्त रहते हैं।उनको अच्छा अकाल-पुरख भूला रहता है। अपने मन के पीछे चलने वाले वे मनुष्य मूर्ख कहे जाते हैं।आत्मिक जीवन की ओर से बे-समझ कहे जाते हैं।उनके माथे पर बुरी किस्मत (उघड़ी हुई समझ लो)। 3। उन्होंने गुरू से अच्छे-बुरे काम की परख वाली बुद्धि हासिल कर ली।उन्होंने परमात्मा के मिलाप के लिए गुरू से आत्मिक जीवन की सूझ प्राप्त कर ली। हे दास नानक ! जिन मनुष्यों के माथे पर धुर से लिखे अच्छे भाग्य उघड़ आए।उन्होंने गुरू से परमात्मा का नाम प्राप्त कर लिया। 4। 1।
टोडी महला 5 घरु 1 दुपदे
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
संतन अवर न काहू जानी ॥
बेपरवाह सदा रंगि हरि कै जा को पाखु सुआमी ॥ रहाउ ॥
ऊच समाना ठाकुर तेरो अवर न काहू तानी ॥
ऐसो अमरु मिलिओ भगतन कउ राचि रहे रंगि गिआनी ॥1॥
रोग सोग दुख जरा मरा हरि जनहि नही निकटानी ॥
निरभउ होइ रहे लिव एकै नानक हरि मनु मानी ॥2॥1॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।

हिन्दी अर्थ: टोडी महला 5 घरु 1 दुपदे ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। वे संत जन किसी और की (मुथाजी करनी) नहीं जानते। हे भाई ! जिनकी मदद परमात्मा करता है वे परमात्मा के प्यार में (टिक के) सदा बेपरवाह रहते हैं।रहाउ। (हे भाई ! वे संत जन यूँ कहते रहते हैं -) हे मालिक प्रभू ! आपका शामयाना (सब शाहों-बादशाहों के शामयानों से) ऊँचा है।किसी और ने (इतना ऊँचा शामयाना कभी) नहीं ताना। हे भाई ! संत जनों को ऐसा सदा कायम रहने वाला हरी मिला रहता है।आत्मिक जीवन की सूझ वाले वे संत जन (सदा) परमात्मा के प्रेम में ही मस्त रहते हैं। 1। हे नानक ! रोग।चिंता-फिक्र।बुढ़ापा।मौत (इनके सहम) परमात्मा के सेवकों कें नजदीक भी नहीं फटकते। वह एक परमात्मा में ही सुरति जोड़ के (दुनिया के डरों की ओर से) निडर रहते हैं उनका मन प्रभू की याद में पतीजा रहता है। 2। 1।
टोडी महला 5 ॥
हरि बिसरत सदा खुआरी ॥
ता कउ धोखा कहा बिआपै जा कउ ओट तुहारी ॥ रहाउ ॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: टोडी महला 5 ॥ हे भाई ! परमात्मा (के नाम) को भुलाने से सदा (माया के हाथों मनुष्य की) बेइज्जती ही होती है। हे प्रभू ! जिस मनुष्य को आपका आसरा हैं।उसको (माया के किसी भी विकार से) धोखा नहीं लग सकता।रहाउ।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।

गुरु रामदास जी 1574 में गुरु-गद्दी पर बैठे और 1581 तक रहे। उन्हीं ने अमृतसर शहर बसाया, हरमंदिर साहिब की नींव रखी। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य प्रेम की तस्वीरें बार-बार लौटती हैं। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्रीय शब्द-समूह है, उन्हीं की रचना है।

इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “परमात्मा एक है, उसका नाम सत्य है।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।