Lulla Family

अंग 705

अंग
705
राग Jaithsree
राग: Jaithsree · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
सलोकु ॥
चिति जि चितविआ सो मै पाइआ ॥
नानक नामु धिआइ सुख सबाइआ ॥4॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: श्लोक॥ मैंने तो जो भी मांग अपनी चित्त में (उससे) मांगी है।वह मुझे (सदा) मिल गई है। हे नानक ! (कह, हे भाई !) परमात्मा का नाम सिमरा कर।(उसके दर से) सारे सुख (मिल जाते हैं)। 4।
छंतु ॥
अब मनु छूटि गइआ साधू संगि मिले ॥
गुरमुखि नामु लइआ जोती जोति रले ॥
हरि नामु सिमरत मिटे किलबिख बुझी तपति अघानिआ ॥
गहि भुजा लीने दइआ कीने आपने करि मानिआ ॥
लै अंकि लाए हरि मिलाए जनम मरणा दुख जले ॥
बिनवंति नानक दइआ धारी मेलि लीने इक पले ॥4॥2॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: छंतु। हे भाई ! गुरू की संगति में मिल के अब (मेरा) मन (माया के मोह से) स्वतंत्र हासे गया है। (जिन्होंने भी) गुरू की शरण पड़ कर परमात्मा का नाम सिमरा है।उनकी जिंद परमात्मा की ज्योति में लीन रहती है। हे भाई ! परमात्मा का नाम सिमरने से सारे पाप मिट जाते हैं।(विकारों की) जलन समाप्त हो जाती है।(मन माया की ओर से) तृप्त हो जाता है। जिन पर प्रभू दया करता है।जिनकी बाँह पकड़ के अपना बना लेता है। आदर देता है।जिनको अपने चरणों में जोड़ लेता है अपने साथ मिला लेता ळै।उनके जनम-मरन के सारे दुख जल (के राख हो) जाते हैं। नानक विनती करता है दयालु पभुउनको एक पल में अपने साथ मिला लेता है। 4। 2।
जैतसरी छंत मः 5 ॥
पाधाणू संसारु गारबि अटिआ ॥
करते पाप अनेक माइआ रंग रटिआ ॥
लोभि मोहि अभिमानि बूडे मरणु चीति न आवए ॥
पुत्र मित्र बिउहार बनिता एह करत बिहावए ॥
पुजि दिवस आए लिखे माए दुखु धरम दूतह डिठिआ ॥
किरत करम न मिटै नानक हरि नाम धनु नही खटिआ ॥1॥
उदम करहि अनेक हरि नामु न गावही ॥
भरमहि जोनि असंख मरि जनमहि आवही ॥
पसू पंखी सैल तरवर गणत कछू न आवए ॥
बीजु बोवसि भोग भोगहि कीआ अपणा पावए ॥
रतन जनमु हारंत जूऐ प्रभू आपि न भावही ॥
बिनवंति नानक भरमहि भ्रमाए खिनु एकु टिकणु न पावही ॥2॥
जोबनु गइआ बितीति जरु मलि बैठीआ ॥
कर कंपहि सिरु डोल नैण न डीठिआ ॥
नह नैण दीसै बिनु भजन ईसै छोडि माइआ चालिआ ॥
कहिआ न मानहि सिरि खाकु छानहि जिन संगि मनु तनु जालिआ ॥
स्रीराम रंग अपार पूरन नह निमख मन महि वूठिआ ॥
बिनवंति नानक कोटि कागर बिनस बार न झूठिआ ॥3॥
चरन कमल सरणाइ नानकु आइआ ॥
दुतरु भै संसारु प्रभि आपि तराइआ ॥
मिलि साधसंगे भजे स्रीधर करि अंगु प्रभ जी तारिआ ॥
हरि मानि लीए नाम दीए अवरु कछु न बीचारिआ ॥
गुण निधान अपार ठाकुर मनि लोड़ीदा पाइआ ॥
बिनवंति नानकु सदा त्रिपते हरि नामु भोजनु खाइआ ॥4॥2॥3॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: जैतसरी छंत मः 5 ॥ हे भाई ! जगत मुसाफिर है (फिर भी) अहंकार में लिबड़ा रहता है। माया के कौतकों में मस्त जीव अनेकों पाप करते रहते हैं। (जीव) लोभ में।(माया के) मोह में।अहंकार में डूबे रहते हैं (इनको) मौत याद नहीं आती। पुत्र।मित्र।स्त्री (आदि) के मेल-मिलाप- यही करते हुए उम्र गुजर जाती है। हे माँ ! (धुर से) लिखे हुए (उम्र के) दिन जब खत्म हो जाते हैं।तो धर्मराज के दूतों को देख कर बड़ी तकलीफ़ होती है। हे नानक ! (मनुष्य यहाँ) परमात्मा का नाम-धन नहीं कमाता।(अन्य) किए कर्मों (का लेखा) नहीं मिटता। 1। हे भाई ! जो मनुष्य और बहुत सारे अनेकों उद्यम करते हैं।पर परमात्मा का नाम नहीं जपते। वे अनगिनत जूनियों में भटकते फिरते हैं।आत्मिक मौत सहेड़ के (बार-बार) पैदा होते हैं (बार-बार जगत में) आते हैं। (वह मनुष्य) पशु-पक्षी।पत्थर।वृक्ष (आदि अनेक जूनियों में पड़ते हैं।जिन की) कोई गिनती नहीं हो सकती। (हे भाई ! चेते रख।जैसा) आप बीज बीजेगा (वैसा ही) फल खाएगा।(हरेक मनुष्य) अपना किया पाता है। जो मनुष्य इस कीमती मानस जन्म को जूए में हार रहे हैं।वे परमात्मा को भी अच्छे नहीं लगते। नानक विनती करता है ऐसे मनुष्य (माया के हाथों) गलत रास्ते पर पड़े हुए (जूनों में) भटकते फिरते हैं।(जूनों के चक्करों में से) एक छिन भर भी टिक नहीं सकते। 2। हे भाई ! आखिर जवानी बीत जाती है।(उसकी जगह) बुढ़ापा आ जाता है। हाथ काँपने लग जाते हैं।सिर कंपन करने लगता है।आँखों से कुछ दिखता नहीं। आँखों से कुछ नहीं दिखता।(जिस माया की खातिर) परमात्मा के भजन से वंचित रहा।(आखिर उस) माया को (भी) छोड़ के चल पड़ता है। जिन (पुत्र आदि संबन्धियों के) साथ (अपना) मन (अपना) शरीर (तृष्णा की आग में) जलता रहा; (बुढ़ापे के वक्त वह भी) कहा नहीं मानते।सिर पर राख ही डालते हैं (बात-बात पर टके सा कोरा जवाब ही देते हैं)। (माया के मोह में फंसे रहने के कारण) बेअंत।सर्व-व्यापक परमात्मा के प्रेम की बातें एक छिन के वास्ते भी मन में ना बसीं। नानक विनती करता है, ये नाशवंत (शरीर के) नाश होने में समय नहीं लगता जैसे करोड़ों (मन) काग़ज (पल में जल के राख हो जाते हैं)। 3। हे भाई ! नानक (तो प्रभू के) कोमल चरणों की शरण आ पड़ा है। ये संसार (समुंद्र) अनेकों डरों से भरपूर है।इससे पार लांघना मुश्किल है।(जो भी मनुष्य प्रभू की शरण आ पड़े उन्हें सदा ही) प्रभू ने खुद (इस संसार-समुंद्र से) पार लंघा लिया। संतों की पावन संगति में भजन करने से प्रभु ने मेरा पक्ष लेकर मुझे भवसागर से पार कर दिया है। प्रभू ने सदा उनको आदर-मान दिया।अपने नाम की दाति दी उनके किसी और गुण-अवगुण की विचार ना की। उन्होंने उस गुणों के खजाने बेअंत मालिक प्रभू को अपने मन में पा लिया।जिसको मिलने की उन्होंने तमन्ना रखी हुई थी। नानक विनती करता है, वे (माया की तृष्णा से) सदा के लिए तृप्त हो गएजिन मनुष्यों ने (आत्मिक जीवन जिंदा रखने के लिए) परमात्मा के नाम का भोजन खाया। 4। 2। 3।
जैतसरी महला 5 वार सलोका नालि
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सलोक ॥
आदि पूरन मधि पूरन अंति पूरन परमेसुरह ॥
सिमरंति संत सरबत्र रमणं नानक अघनासन जगदीसुरह ॥1॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: जैतसरी महला 5 वार सलोका नालि ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। श्लोक ॥ जो जगत के शुरू से हर जगह मौजूद है।अब भी सर्व व्यापक है और आखिर में भी हर जगह हाजर-नाजर रहेगा। हे नानक !संत जन उस सर्व-व्यापक परमेश्वर को सिमरते हैं वह जगत का मालिक प्रभू सब पापों को नाश करने वाला है। 1।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।

अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।

इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “श्लोक॥ मैंने तो जो भी मांग अपनी चित्त में (उससे) मांगी है।”

एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।