ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ जैतसरी की वार महला ५ ॥ सलोकु ॥ आदि पूरन मधि पूरन अंति पूरन परमेसुरह ॥ सिमरंति संत सरबत्र रमणं नानक अघणाश तेजसह ॥१॥ मंगलं हरि मंगलं नित मंगलं राज मंगलं ॥ सरब निधान पूरन गुरु जिनहु पुरख कीरतनं ॥२॥
[ इस अंग की गहरी चिंतना ]
“आदि पूरन मधि पूरन अंति पूरन परमेसुरह।” “आदि में पूरन, मध्य में पूरन, अंत में पूरन परमेश्वर।”
गुरु अर्जन का “वार” (epic-poem) opening। यह तीन-step formulation है। time-axis पर भी सब “पूरन” है। अतीत, वर्तमान, भविष्य।
यह सबसे stabilizing statement है। दिल्ली में हम सब time के साथ बहुत anxious हैं, “past mistakes,” “current chaos,” “future uncertainty।” गुरु अर्जन कह रहे हैं, हर तीनों points पर हरि “पूरन” है।
यानी कुछ “अधूरा” नहीं है समय में, हर पल “पूरा” है। यह radical है।
“मंगलं हरि मंगलं नित मंगलं।” “मंगल” शब्द repeat। हर state में मंगल। यह बहुत celebratory line है।
दिल्ली के विवाह-समारोह में “मंगलमय” शब्द बहुत आता है। हर रिवाज “मंगल” से शुरू होता है, “मंगल कलश,” “मंगल गीत,” “मंगल फेरे।” नानक उसी “मंगल” को हरि के साथ associate कर रहे हैं।
हरि से connect करना ही “मंगल” का source है। बाक़ी “मंगल” derivative हैं।
“सिमरंति संत सरबत्र रमणं।” “सिमरण करते संत, सर्वत्र रमणं (बसे)।”
सब जगह संत सिमरण कर रहे हैं। यह global community है।
जैतसरी की वार intense है, यह hub है पूरे राग का। यहाँ सब themes converge करते हैं, विरह, सिमरण, सेवा, मंगल।
“आदि पूरन मधि पूरन अंति पूरन परमेसुरह।” “आदि में पूरन, मध्य में पूरन, अंत में पूरन परमेश्वर।”
गुरु अर्जन का “वार” (epic-poem)। यह तीन-step formulation है।
time-axis पर भी सब “पूरन” है। अतीत, वर्तमान, भविष्य।
यह सबसे stabilizing statement है। दिल्ली में हम सब time के साथ बहुत anxious हैं, “past mistakes,” “current chaos,” “future uncertainty।” गुरु अर्जन कह रहे हैं, हर तीनों points पर हरि “पूरन” है। यानी कुछ “अधूरा” नहीं है समय में, हर पल “पूरा” है।
“सिमरंति संत सरबत्र रमणं।” “सिमरण करते संत, सर्वत्र ‘रमणं’ (बसे)।”
सब जगह संत सिमरण कर रहे हैं।
“नानक अघणाश तेजसह।” “नानक, ‘अघ-नाशक’ (पाप-नाशक) ‘तेजस’ (light)।”
हरि की description: पाप-नाशक तेज।
“मंगलं हरि मंगलं नित मंगलं राज मंगलं।” “मंगल हरि, मंगल नित, मंगल राज।”
“मंगल” शब्द repeat। हर state में मंगल। यह बहुत celebratory line है।
दिल्ली के विवाह-समारोह में “मंगलमय” शब्द बहुत आता है। हर रिवाज “मंगल” से शुरू होता है, “मंगल कलश,” “मंगल गीत,” “मंगल फेरे।” नानक उसी “मंगल” को हरि के साथ associate कर रहे हैं। हरि से connect करना ही “मंगल” का source है।
“सरब निधान पूरन गुरु।” “सर्व निधान पूरण गुरु।”
सब निधि गुरु में।
“जिनहु पुरख कीरतनं।” “जिनहु पुरुष, कीर्तन।”
closing: कीर्तन करने वालों के लिए।