जनु नानकु तिन कउ वारिआ सदा सदा कुरबाणी ॥10॥
गुरमुखि सखी सहेलीआ से आपि हरि भाईआ ॥
हरि दरगह पैनाईआ हरि आपि गलि लाईआ ॥11॥
जो गुरमुखि नामु धिआइदे तिन दरसनु दीजै ॥
हम तिन के चरण पखालदे धूड़ि घोलि घोलि पीजै ॥12॥
पान सुपारी खातीआ मुखि बीड़ीआ लाईआ ॥
हरि हरि कदे न चेतिओ जमि पकड़ि चलाईआ ॥13॥
जिन हरि नामा हरि चेतिआ हिरदै उरि धारे ॥ तिन जमु नेड़ि न आवई गुरसिख गुर पिआरे ॥14॥
हरि का नामु निधानु है कोई गुरमुखि जाणै ॥
नानक जिन सतिगुरु भेटिआ रंगि रलीआ माणै ॥15॥
सतिगुरु दाता आखीऐ तुसि करे पसाओ ॥
हउ गुर विटहु सद वारिआ जिनि दितड़ा नाओ ॥16॥
सो धंनु गुरू साबासि है हरि देइ सनेहा ॥
हउ वेखि वेखि गुरू विगसिआ गुर सतिगुर देहा ॥17॥
गुर रसना अंम्रितु बोलदी हरि नामि सुहावी ॥
जिन सुणि सिखा गुरु मंनिआ तिना भुख सभ जावी ॥18॥
हरि का मारगु आखीऐ कहु कितु बिधि जाईऐ ॥
हरि हरि तेरा नामु है हरि खरचु लै जाईऐ ॥19॥
जिन गुरमुखि हरि आराधिआ से साह वड दाणे ॥
हउ सतिगुर कउ सद वारिआ गुर बचनि समाणे ॥20॥
तू ठाकुरु तू साहिबो तूहै मेरा मीरा ॥
तुधु भावै तेरी बंदगी तू गुणी गहीरा ॥21॥
आपे हरि इक रंगु है आपे बहु रंगी ॥
जो तिसु भावै नानका साई गल चंगी ॥22॥2॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
चेतना है तउ चेत लै निसि दिनि मै प्रानी ॥
छिनु छिनु अउध बिहातु है फूटै घट जिउ पानी ॥1॥ रहाउ ॥
हरि गुन काहि न गावही मूरख अगिआना ॥
झूठै लालचि लागि कै नहि मरनु पछाना ॥1॥
अजहू कछु बिगरिओ नही जो प्रभ गुन गावै ॥
कहु नानक तिह भजन ते निरभै पदु पावै ॥2॥1॥
जाग लेहु रे मना जाग लेहु कहा गाफल सोइआ ॥
जो तनु उपजिआ संग ही सो भी संगि न होइआ ॥1॥ रहाउ ॥
मात पिता सुत बंध जन हितु जा सिउ कीना ॥
जीउ छूटिओ जब देह ते डारि अगनि मै दीना ॥1॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। सूही, बिलावल, और गोंड राग का क्षेत्र। गुरु राम दास की ‘लावां’ इसी सूही राग में बँधी, सोलहवीं सदी के मध्य की।
रामदास जी का जीवन-व्यवहार और रचना दोनों एक तरह की संगति में रहीं। अमृतसर का चयन, हरमंदिर साहिब का स्थल, और सूही राग की भावुक रचनाएँ, सब एक ही मनोदशा के अलग-अलग पहलू हैं।
इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे भाई ! गुरू के जो सिख गुरू की (बताई) सेवा करते हैं।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।