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अंग 726

अंग
726
राग तिलंग
राग: तिलंग · रचयिता: Guru Raam Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
जो गुरसिख गुरु सेवदे से पुंन पराणी ॥
जनु नानकु तिन कउ वारिआ सदा सदा कुरबाणी ॥10॥
गुरमुखि सखी सहेलीआ से आपि हरि भाईआ ॥
हरि दरगह पैनाईआ हरि आपि गलि लाईआ ॥11॥
जो गुरमुखि नामु धिआइदे तिन दरसनु दीजै ॥
हम तिन के चरण पखालदे धूड़ि घोलि घोलि पीजै ॥12॥
पान सुपारी खातीआ मुखि बीड़ीआ लाईआ ॥
हरि हरि कदे न चेतिओ जमि पकड़ि चलाईआ ॥13॥
जिन हरि नामा हरि चेतिआ हिरदै उरि धारे ॥ तिन जमु नेड़ि न आवई गुरसिख गुर पिआरे ॥14॥
हरि का नामु निधानु है कोई गुरमुखि जाणै ॥
नानक जिन सतिगुरु भेटिआ रंगि रलीआ माणै ॥15॥
सतिगुरु दाता आखीऐ तुसि करे पसाओ ॥
हउ गुर विटहु सद वारिआ जिनि दितड़ा नाओ ॥16॥
सो धंनु गुरू साबासि है हरि देइ सनेहा ॥
हउ वेखि वेखि गुरू विगसिआ गुर सतिगुर देहा ॥17॥
गुर रसना अंम्रितु बोलदी हरि नामि सुहावी ॥
जिन सुणि सिखा गुरु मंनिआ तिना भुख सभ जावी ॥18॥
हरि का मारगु आखीऐ कहु कितु बिधि जाईऐ ॥
हरि हरि तेरा नामु है हरि खरचु लै जाईऐ ॥19॥
जिन गुरमुखि हरि आराधिआ से साह वड दाणे ॥
हउ सतिगुर कउ सद वारिआ गुर बचनि समाणे ॥20॥
तू ठाकुरु तू साहिबो तूहै मेरा मीरा ॥
तुधु भावै तेरी बंदगी तू गुणी गहीरा ॥21॥
आपे हरि इक रंगु है आपे बहु रंगी ॥
जो तिसु भावै नानका साई गल चंगी ॥22॥2॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।

हिन्दी अर्थ: हे भाई ! गुरू के जो सिख गुरू की (बताई) सेवा करते हैं।वे भाग्यशाली हो गए हैं। दास नानक उनसे सदके जाता है।सदा ही कुर्बान जाता है। 10। हे भाई ! गुरू की शरण पड़ कर (परस्पर प्रेम से रहने वाली सत्संगी) सहेलियाँ (ऐसी हो जाती हैं कि) वह अपने आप प्रभू को प्यारी लगने लगती हैं। परमात्मा की हजूरी में उन्हें आदर मिलता है।परमात्मा ने उन्हें स्वयं अपने गले से (सदा के लिए) लगा लिया है। 11। हे प्रभू ! जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ कर (आपका) नाम सिमरते हैं।उनके दर्शन मुझे बख्श। मैं उनके चरण धोता रहूँ।और।उनके चरणों की धूल घोल-घोल के पीता रहूँ। 12। हे भाई ! जो जीव-सि्त्रयाँ पान-सुपारी आदि खाती रहती हैं।मुँह में पान चबाती रहती हैं (भाव।सदा पदार्थों के भोग में मस्त हैं)। और जिन्होंने परमात्मा का नाम कभी नहीं सिमरा।उनको मौत (के चक्कर) ने पकड़ के (सदा के लिए) आगे लगा लिया (अर्थात।वे चौरासी के चक्करों में पड़ गई)। 13। हे भाई ! जिन्होंने अपने मन में हृदय में टिका के परमात्मा का नाम सिमरा। उन गुरू के प्यारे गुरसिखों के नजदीक मौत (का डर) नहीं आता। 14। हे भाई ! परमात्मा का नाम खजाना है।कोई विरला मनुष्य गुरू की शरण पड़ कर (नाम से) सांझ डालता है। हे नानक ! (कह) जिन मनुष्यों को गुरू मिल जाता है।वह (हरेक मनुष्य) हरी-नाम के प्रेम में जुड़ के आत्मिक आनंद का सुख लेता है। 15। हे भाई ! गुरू को (ही नाम की दाति) देने वाला कहना चाहिए।गुरू प्रसन्न हो के (नाम देने की) कृपा करता है। मैं (तो) सदा गुरू से (ही) कुर्बान जाता हूँ।जिसने (मुझे) परमात्मा का नाम दिया है। 16। हे भाई ! वह गुरू सराहनीय है।उस गुरू की प्रशन्सा करनी चाहिए।जो परमात्मा का नाम जपने का उपदेश देता है। मैं (तो) गुरू को देख-देख के गुरू का (सुंदर) शरीर देख के खिल रहा हूँ। 17। हे भाई ! गुरू की जीभ आत्मिक जीवन देने वाली हरी-नाम उचारती है।हरी-नाम (उच्चारण के कारण) सुंदर लगती है। जिन सिखों ने (गुरू का उपदेश) सुन के गुरू पर यकीन किया है।उनकी (माया की) सारी भूख दूर हो गई है। 18। हे भाई ! (हरी-नाम सिमरन ही) परमात्मा (के मिलाप) का रास्ता कहा जाता है।हे भाई ! बताओ।किस ढंग से (इस रास्ते पर) चला जा सकता है। हे प्रभू ! आपका नाम ही (रास्ते का) खर्च है।ये खर्च ही पल्ले बाँध के (इस रास्ते पर) चलना चाहिए। 19। हे भाई ! जिन मनुष्यों ने गुरू की शरण पड़ कर परमात्मा का नाम जपा है वे बड़े समझदार शाह बन गए हैं। मैं सदा गुरू से कुर्बान जाता हूँ।गुरू के बचनों के द्वारा (परमात्मा के नाम में) लीन हुआ जा सकता है। 20। हे प्रभू ! आप मेरा मालिक है।आप मेरा साहिब है।आप ही मेरा पातशाह है। अगर आप पसंद आए।तो ही आपकी भक्ति की जा सकती है।आप गुणों का खजाना है।आप गहरे जिगरे वाला है। 21। हे नानक ! (कह, हे भाई !) परमात्मा आप ही (निर्गुण स्वरूप में) एक मात्र हस्ती है।और।आप ही (सर्गुण स्वरूप में) अनेकों रूपों वाला है। जो बात उसे अच्छी लगती है।वही बात जीवों के भले के लिए होती है। 22। 2।
तिलंग महला 9 काफी
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
चेतना है तउ चेत लै निसि दिनि मै प्रानी ॥
छिनु छिनु अउध बिहातु है फूटै घट जिउ पानी ॥1॥ रहाउ ॥
हरि गुन काहि न गावही मूरख अगिआना ॥
झूठै लालचि लागि कै नहि मरनु पछाना ॥1॥
अजहू कछु बिगरिओ नही जो प्रभ गुन गावै ॥
कहु नानक तिह भजन ते निरभै पदु पावै ॥2॥1॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: तिलंग महला 9 काफी सतिगुर प्रसादि ॥ हे मनुष्य ! अगर तूने परमात्मा का नाम सिमरना है।तो दिन-रात एक करके सिमरना शुरू कर दे। (क्योंकि) जैसे चटके हुए घड़े में से पानी (सहजे-सहजे निकलता रहता है।वैसे ही) एक-एक छिन करके उम्र बीतती जा रही है। 1।रहाउ। हे मूर्ख ! हे बेसमझ ! आप झूठे लालच में लगकर तूने अपनी मृत्यु को भी नहीं पहचाना॥ 1॥ परमात्मा की सिफत सालाह के गीत गाने आरम्भ कर दे (भले ही सिमरन के बग़ैर कितनी ही उम्र बीत चुकी हो) फिर भी कोई नुकसान नहीं होता। (क्योंकि) उस परमात्मा के भजन की बरकति से मनुष्य वह आत्मिक दर्जा प्राप्त कर लेता है।जहाँ कोई डर छू नहीं सकता। 2। 1।
तिलंग महला 9 ॥
जाग लेहु रे मना जाग लेहु कहा गाफल सोइआ ॥
जो तनु उपजिआ संग ही सो भी संगि न होइआ ॥1॥ रहाउ ॥
मात पिता सुत बंध जन हितु जा सिउ कीना ॥
जीउ छूटिओ जब देह ते डारि अगनि मै दीना ॥1॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।

हिन्दी अर्थ: तिलंग महला 9 ॥ हे मन ! होश कर।होश कर ! आप क्यों (माया के मोह में) बेपरवाह हैं के सो रहा है। (देख) जो (ये) शरीर (मनुष्य के साथ) ही पैदा होता है; ये भी (आखिर) साथ नहीं जाता। 1।रहाउ। हे मन ! (देख।) माता।पिता।पुत्र।रिश्तेदार- जिनसे मनुष्य (सारी उम्र) प्यार करता रहता है। जब जीवात्मा शरीर से अलग होती है।तब (वह सारे रिश्तेदार।उसके शरीर को) आग में डाल देते हैं। 1।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। सूही, बिलावल, और गोंड राग का क्षेत्र। गुरु राम दास की ‘लावां’ इसी सूही राग में बँधी, सोलहवीं सदी के मध्य की।

रामदास जी का जीवन-व्यवहार और रचना दोनों एक तरह की संगति में रहीं। अमृतसर का चयन, हरमंदिर साहिब का स्थल, और सूही राग की भावुक रचनाएँ, सब एक ही मनोदशा के अलग-अलग पहलू हैं।

इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे भाई ! गुरू के जो सिख गुरू की (बताई) सेवा करते हैं।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।