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अंग 703

अंग
703
राग Jaithsree
राग: Jaithsree · रचयिता: Guru Tegh Bahaadur Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
रतनु रामु घट ही के भीतरि ता को गिआनु न पाइओ ॥
जन नानक भगवंत भजन बिनु बिरथा जनमु गवाइओ ॥2॥1॥
तेग बहादुर जी ने जीवन का बड़ा हिस्सा एकांत में बिताया, असम और बिहार की यात्राओं में। दुनिया की क्षणभंगुरता उनकी वाणी का केन्द्रीय धागा है, और इस शबद में भी वही स्वर सुनाई देता है।

हिन्दी अर्थ: हे भाई ! रत्न (जैसा कीमती) हरी-नाम हृदय के अंदर ही बसता है (पर भूला हुआ मनुष्य) उससे सांझ नहीं बनाता। हे दास नानक ! (कह) परमात्मा के भजन के बिना मनुष्य अपना जीवन व्यर्थ गवा लेता है। 2। 1।
जैतसरी महला 9 ॥
हरि जू राखि लेहु पति मेरी ॥
जम को त्रास भइओ उर अंतरि सरनि गही किरपा निधि तेरी ॥1॥ रहाउ ॥
महा पतित मुगध लोभी फुनि करत पाप अब हारा ॥
भै मरबे को बिसरत नाहिन तिह चिंता तनु जारा ॥1॥
कीए उपाव मुकति के कारनि दह दिसि कउ उठि धाइआ ॥
घट ही भीतरि बसै निरंजनु ता को मरमु न पाइआ ॥2॥
नाहिन गुनु नाहिन कछु जपु तपु कउनु करमु अब कीजै ॥
नानक हारि परिओ सरनागति अभै दानु प्रभ दीजै ॥3॥2॥
गुरु तेग बहादुर जी (1621-1675) की वाणी में वैराग्य और nश्वरता का स्वर लगातार है। उनकी शहादत 1675 में दिल्ली के चाँदनी चौक के पास हुई, औरंगज़ेब के हुक्म पर। उनकी रचनाएँ ग्रंथ के अन्तिम पन्नों पर हैं, गुरु गोबिंद सिंह द्वारा 1706 में जोड़ी गयीं।

हिन्दी अर्थ: जैतसरी महला 9 ॥ हे प्रभू जी ! मेरी इज्जत रख लो। मेरे हृदय में मौत का डर बस रहा है (इससे बचने के लिए) हे कृपा के खजाने प्रभू ! मैंने आपका आसरा लिया है। 1।रहाउ। हे प्रभू ! मैं बड़ा विकारी हूँ।मूर्ख हूँ लालची भी हूँ।पाप करते-करते अब मैं थक गया हूँ। मुझे मरने का डर (किसी भी वक्त) भूलता नहीं।इस (मरने) की चिंता ने मेरा शरीर जला दिया है। 1। हे भाई ! (मौत के इस सहम से) खलासी हासिल करने के लिए मैंने अनेकों प्रयास किए हैं।दसों दिशाओं में उठ-उठ के दौड़ा हूँ। (माया के मोह से) निर्लिप परमात्मा हृदय में ही बसता है।उसका भेद नहीं समझा। हे नानक ! (कह, परमात्मा की शरण पड़े बिना) कोई गुण नहीं कोई जप-तप नहीं (जो मौत के सहम से बचा ले।फिर) अब कौन सा काम किया जाए। हे प्रभू ! (और तरीकों से) हार के मैं आपकी शरण आ पड़ा हूँ।आप मुझे मौत के डर से खलासी का दान दे।
जैतसरी महला 9 ॥
मन रे साचा गहो बिचारा ॥
राम नाम बिनु मिथिआ मानो सगरो इहु संसारा ॥1॥ रहाउ ॥
जा कउ जोगी खोजत हारे पाइओ नाहि तिह पारा ॥
सो सुआमी तुम निकटि पछानो रूप रेख ते निआरा ॥1॥
पावन नामु जगत मै हरि को कबहू नाहि संभारा ॥
नानक सरनि परिओ जग बंदन राखहु बिरदु तुहारा ॥2॥3॥
तेग बहादुर जी ने जीवन का बड़ा हिस्सा एकांत में बिताया, असम और बिहार की यात्राओं में। दुनिया की क्षणभंगुरता उनकी वाणी का केन्द्रीय धागा है, और इस शबद में भी वही स्वर सुनाई देता है।

हिन्दी अर्थ: जैतसरी महला 9 ॥ हे मेरे मन ! ये अटल विचार (अपने अंदर) संभाल के रख- परमात्मा के अलावा बाकी इस सारे संसार को नाशवंत समझ। 1।रहाउ। हे मेरे मन ! जोगी लोग जिस परमात्मा को ढूँढते-ढूँढते थक गए।और उसके स्वरूप का अंत नहीं पा सके। उस मालिक को आप अपने अंग-संग बसता जान।पर उसका कोई रूप उसका कोई चिन्ह बताया नहीं जा सकता। 1। हे मेरे मन ! जगत में परमात्मा का नाम (ही) पवित्र करने वाला है।तूने उस नाम को (अपने अंदर) कभी संभाल के नहीं रखा। हे नानक ! (कह) हे सारे जगत के वंदनीय प्रभू ! मैं आपकी शरण में आया हूँ।मेरी रक्षा कर।ये आपका मूल कुदरती स्वभाव (बिरद) है (कि आप शरण आए की रक्षा करता है)। 2। 3।
जैतसरी महला 5 छंत घरु 1
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सलोक ॥
दरसन पिआसी दिनसु राति चितवउ अनदिनु नीत ॥
खोलि॑ कपट गुरि मेलीआ नानक हरि संगि मीत ॥1॥
गुरु तेग बहादुर जी (1621-1675) की वाणी में वैराग्य और nश्वरता का स्वर लगातार है। उनकी शहादत 1675 में दिल्ली के चाँदनी चौक के पास हुई, औरंगज़ेब के हुक्म पर। उनकी रचनाएँ ग्रंथ के अन्तिम पन्नों पर हैं, गुरु गोबिंद सिंह द्वारा 1706 में जोड़ी गयीं।

हिन्दी अर्थ: जैतसरी महला 5 छंत घरु 1 ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। श्लोक॥ मुझे मित्र प्रभू के दर्शनों की तांघ लगी हुई है।मैं दिन-रात हर वक्त सदा ही (उसके दर्शन ही) चितारती रहती हूँ। हे नानक ! (कह) गुरू ने (मेरे) माया के जाल को काट के मुझे मित्र हरी से मिला दिया है। 1।
छंत ॥
सुणि यार हमारे सजण इक करउ बेनंतीआ ॥
तिसु मोहन लाल पिआरे हउ फिरउ खोजंतीआ ॥
तिसु दसि पिआरे सिरु धरी उतारे इक भोरी दरसनु दीजै ॥
नैन हमारे प्रिअ रंग रंगारे इकु तिलु भी ना धीरीजै ॥
प्रभ सिउ मनु लीना जिउ जल मीना चात्रिक जिवै तिसंतीआ ॥
जन नानक गुरु पूरा पाइआ सगली तिखा बुझंतीआ ॥1॥
यार वे प्रिअ हभे सखीआ मू कही न जेहीआ ॥
यार वे हिक डूं हिक चाड़ै हउ किसु चितेहीआ ॥
हिक दूं हिकि चाड़े अनिक पिआरे नित करदे भोग बिलासा ॥
तिना देखि मनि चाउ उठंदा हउ कदि पाई गुणतासा ॥
जिनी मैडा लालु रीझाइआ हउ तिसु आगै मनु डेंहीआ ॥
नानकु कहै सुणि बिनउ सुहागणि मू दसि डिखा पिरु केहीआ ॥2॥
यार वे पिरु आपण भाणा किछु नीसी छंदा ॥
तेग बहादुर जी ने जीवन का बड़ा हिस्सा एकांत में बिताया, असम और बिहार की यात्राओं में। दुनिया की क्षणभंगुरता उनकी वाणी का केन्द्रीय धागा है, और इस शबद में भी वही स्वर सुनाई देता है।

हिन्दी अर्थ: छंत। हे मेरे सत्संगी मित्र ! हे मेरे सज्जन ! मैं (आपके आगे) एक आरजू करती हूँ ! मैं उस मन को मोह लेने वाले प्यारे लाल को तलाशती फिरती हूँ। (हे मित्र !) मुझे उस प्यारे के बारे में बता।मैं (उसके आगे अपना) सर उतार के रख दूंगी (और कहूँगी – हे प्यारे !) पल भर के लिए हमें भी दर्शन दे (हे गुरू !) मेरी आँखें प्यारे के प्रेम रंग में रंगी गई हैं (उसके दर्शनों के बिना) मुझे रक्ती भर समय के लिए भी चैन नहीं आता। मेरा मन प्रभू के साथ मस्त है जैसे पानी की मछली (पानी में मस्त रहती है)।वैसे ही पपीहें को (बरखा की बूँद की) प्यास लगी रहती है। हे दास नानक ! (कह, जिस भाग्यशाली को) पूरा गुरू मिल जाता है (उसके दर्शनों की) सारी प्यास बुझ जाती है। हे सत्संगी सज्जन ! सारी सहेलियां प्यारे प्रभू की (सि्त्रयां) हैं।मैं (इन में से) किसी जैसी भी नहीं। ये एक से एक सुंदर (सुंदर आत्मिक जीवन वाली) हैं।मैं किस गिनती में हूँ। प्रभू से अनेकों ही प्यार करने वाले हैं।एक-दूसरे से बढ़िया जीवन वाले हैं।सदा प्रभू से आत्मिक मिलाप का आनंद लेते हैं। इनको देख के मेरे मन में भी चाव पैदा होता है कि मैं भी कभी उस गुणों के खजाने प्रभू को मिल सकूँ। (हे गुरू !) जिसने (ही) मेरे प्यारे हरी को प्रसन्न कर लिया है।मैं उसके आगे अपना मन भेटा करने को तैयार हूँ। नानक कहता है, हे सोहागवंती ! मेरी विनती सुन ! मुझे बता।मैं देखूँ।प्रभू-पति कैसा है। 2। हे सत्संगी सज्जन ! (जिस जीव-स्त्री को) अपना प्रभू-पति प्यारा लगने लग जाता है (वहकिसी का) मोहताजनहीं रह जाता ।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।

गुरु तेग बहादुर जी (1621-1675) की वाणी में वैराग्य और nश्वरता का स्वर लगातार है। उन्होंने जीवन का बड़ा हिस्सा एकांत में बिताया, असम और बिहार की यात्राओं में। 1675 में औरंगज़ेब के हुक्म पर उन्हें दिल्ली के चाँदनी चौक के पास शहीद किया गया, क्योंकि उन्होंने कश्मीरी पंडितों के धर्मांतरण से इनकार किया था। उनकी शहादत के स्थल पर आज सीस-गंज गुरुद्वारा है।

इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे भाई ! रत्न (जैसा कीमती) हरी-नाम हृदय के अंदर ही बसता है (पर भूला हुआ मनुष्य) उससे सांझ नहीं बनाता।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।