जन नानक भगवंत भजन बिनु बिरथा जनमु गवाइओ ॥2॥1॥
हरि जू राखि लेहु पति मेरी ॥
जम को त्रास भइओ उर अंतरि सरनि गही किरपा निधि तेरी ॥1॥ रहाउ ॥
महा पतित मुगध लोभी फुनि करत पाप अब हारा ॥
भै मरबे को बिसरत नाहिन तिह चिंता तनु जारा ॥1॥
कीए उपाव मुकति के कारनि दह दिसि कउ उठि धाइआ ॥
घट ही भीतरि बसै निरंजनु ता को मरमु न पाइआ ॥2॥
नाहिन गुनु नाहिन कछु जपु तपु कउनु करमु अब कीजै ॥
नानक हारि परिओ सरनागति अभै दानु प्रभ दीजै ॥3॥2॥
मन रे साचा गहो बिचारा ॥
राम नाम बिनु मिथिआ मानो सगरो इहु संसारा ॥1॥ रहाउ ॥
जा कउ जोगी खोजत हारे पाइओ नाहि तिह पारा ॥
सो सुआमी तुम निकटि पछानो रूप रेख ते निआरा ॥1॥
पावन नामु जगत मै हरि को कबहू नाहि संभारा ॥
नानक सरनि परिओ जग बंदन राखहु बिरदु तुहारा ॥2॥3॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सलोक ॥
दरसन पिआसी दिनसु राति चितवउ अनदिनु नीत ॥
खोलि॑ कपट गुरि मेलीआ नानक हरि संगि मीत ॥1॥
सुणि यार हमारे सजण इक करउ बेनंतीआ ॥
तिसु मोहन लाल पिआरे हउ फिरउ खोजंतीआ ॥
तिसु दसि पिआरे सिरु धरी उतारे इक भोरी दरसनु दीजै ॥
नैन हमारे प्रिअ रंग रंगारे इकु तिलु भी ना धीरीजै ॥
प्रभ सिउ मनु लीना जिउ जल मीना चात्रिक जिवै तिसंतीआ ॥
जन नानक गुरु पूरा पाइआ सगली तिखा बुझंतीआ ॥1॥
यार वे प्रिअ हभे सखीआ मू कही न जेहीआ ॥
यार वे हिक डूं हिक चाड़ै हउ किसु चितेहीआ ॥
हिक दूं हिकि चाड़े अनिक पिआरे नित करदे भोग बिलासा ॥
तिना देखि मनि चाउ उठंदा हउ कदि पाई गुणतासा ॥
जिनी मैडा लालु रीझाइआ हउ तिसु आगै मनु डेंहीआ ॥
नानकु कहै सुणि बिनउ सुहागणि मू दसि डिखा पिरु केहीआ ॥2॥
यार वे पिरु आपण भाणा किछु नीसी छंदा ॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।
गुरु तेग बहादुर जी (1621-1675) की वाणी में वैराग्य और nश्वरता का स्वर लगातार है। उन्होंने जीवन का बड़ा हिस्सा एकांत में बिताया, असम और बिहार की यात्राओं में। 1675 में औरंगज़ेब के हुक्म पर उन्हें दिल्ली के चाँदनी चौक के पास शहीद किया गया, क्योंकि उन्होंने कश्मीरी पंडितों के धर्मांतरण से इनकार किया था। उनकी शहादत के स्थल पर आज सीस-गंज गुरुद्वारा है।
इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे भाई ! रत्न (जैसा कीमती) हरी-नाम हृदय के अंदर ही बसता है (पर भूला हुआ मनुष्य) उससे सांझ नहीं बनाता।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।