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अंग 707

अंग
707
राग Jaithsree
राग: Jaithsree · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
मनि वसंदड़ो सचु सहु नानक हभे डुखड़े उलाहि ॥2॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: इसी तरह) हे नानक ! अगर मन में सच्चा साई बस जाए तो सारे कोझे दुख उतर जाते हैं। 2।
पउड़ी ॥
कोटि अघा सभि नास होहि सिमरत हरि नाउ ॥
मन चिंदे फल पाईअहि हरि के गुण गाउ ॥
जनम मरण भै कटीअहि निहचल सचु थाउ ॥
पूरबि होवै लिखिआ हरि चरण समाउ ॥
करि किरपा प्रभ राखि लेहु नानक बलि जाउ ॥5॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ प्रभू का नाम सिमरने से करोड़ों पाप सारे के सारे नाश हो जाते हैं। प्रभू की सिफत सालाह करने से मन-इच्छित फल पा लेते हैं। पैदा होने से मरने तक के सारे सहम काटे जाते हैं और अटल सच्ची पदवी मिल जाती है। (पर) प्रभू के चरणों में समाई तब ही होती है अगर धुर से माथे पर भाग्य लिखे हों। (इस वास्ते) हे नानक ! (प्रभू के आगे अरदास कर कि) हे प्रभू ! मेहर कर।मुझे (पापों से) बचा ले।मैं आपसे कुर्बान हूँ। 5।
सलोक ॥
ग्रिह रचना अपारं मनि बिलास सुआदं रसह ॥
कदांच नह सिमरंति नानक ते जंत बिसटा क्रिमह ॥1॥
मुचु अडंबरु हभु किहु मंझि मुहबति नेह ॥
सो सांई जैं विसरै नानक सो तनु खेह ॥2॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: श्लोक॥ घर की बेअंत सजावटें।मन के चाव उद्वेग।स्वादिष्ट पदार्थों के चस्के – (इनमें लग के) हे नानक ! जो मनुष्य कभी परमात्मा को याद नहीं करते।वह (जैसे) विष्टा के कीड़े हैं। 1। बड़ी सज-धज हो।हरेक चीज (मिली हुई) हो।हृदय में (इन दुनियावी पदार्थों की) मुहब्बत और कसक हो- इनके कारण। हे नानक ! जिसको साई (की याद) भूल गई है वह शरीर (जैसे) राख (ही) है। 2।
पउड़ी ॥
सुंदर सेज अनेक सुख रस भोगण पूरे ॥
ग्रिह सोइन चंदन सुगंध लाइ मोती हीरे ॥
मन इछे सुख माणदा किछु नाहि विसूरे ॥
सो प्रभु चिति न आवई विसटा के कीरे ॥
बिनु हरि नाम न सांति होइ कितु बिधि मनु धीरे ॥6॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ अगर सुंदर सेज मिली हो।अनेकों सुख हों।सब किस्म के स्वादिष्ट भोग हों भोगने के लिए। अगर हीरे-मोती से जड़े हुए सोने के घर हों जिनमें चन्दन की सुगन्धि हो। अगर मनुष्य मन-मानी मौजें माणता हैं।और कोई चिंता-झोरा ना हो। (पर ये सब कुछ होते हुए) अगर (ये दातें देने वाला) वह प्रभू मन में याद नहीं है तो (इन भोगों को भोगने वाले को) गंदगी का कीड़ा समझो। क्योकि प्रभू के नाम के बिना शांति नहीं मिलती।किसी और तरह भी मन को धैर्य नहीं मिलता। 6।
सलोक ॥
चरन कमल बिरहं खोजंत बैरागी दह दिसह ॥
तिआगंत कपट रूप माइआ नानक आनंद रूप साध संगमह ॥1॥
मनि सांई मुखि उचरा वता हभे लोअ ॥
नानक हभि अडंबर कूड़िआ सुणि जीवा सची सोइ ॥2॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: श्लोक॥ हे नानक ! प्रभू का प्रेमी प्रभू के सुंदर चरनों से जुड़ने की कसक में दसों दिशाओं में भटकता है। (जब) छल-रूपी माया (को) छोड़ता है तब (ढूँढ-ढूँढ के उसे) आनंद-रूप साध-संगति प्राप्त होती है (जहाँ उसे प्रभू की सिफत सालाह सुनने का अवसर प्राप्त होता है)। 1। हे नानक ! (जगत वाले) सारे दिखावे मुझे नाशवान दिख रहे हैं।मेरे मन में साई (की याद) है। मैं मुँह से उसका नाम उचारता हूँ और सारे जगत में चक्कर लगाता हॅूँ (कि कहीं उसकी सिफत सालाह सुन सकूँ) उसकी सदा-स्थिर रहने वाली शोभा सुन के मैं जी पड़ता हूँ। 2।
पउड़ी ॥
बसता तूटी झुंपड़ी चीर सभि छिंना ॥
जाति न पति न आदरो उदिआन भ्रमिंना ॥
मित्र न इठ धन रूपहीण किछु साकु न सिंना ॥
राजा सगली स्रिसटि का हरि नामि मनु भिंना ॥
तिस की धूड़ि मनु उधरै प्रभु होइ सुप्रसंना ॥7॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ अगर कोई मनुष्य टूटी हुई कुल्ली में रहता हैं।उसके सारे कपड़े फटे हुए हों। ना उसकी ऊँची जाति हो।ना कोई इज्जत आदर करता हैं।और वह उजाड़ में भटकता हैं (भाव।कहीं मान-सम्मान ना होने के कारण उसकी बाबत तो हर तरफ उजाड़ ही हुआ)। कोई उसका मित्र-प्यारा ना हो।ना धन ही हो।ना रूप ही हो।और कोई साक-संबंधी भी ना हों। (ऐसा निथावां होते हुए भी) अगर उसका मन प्रभू के नाम में भीगा हुआ है तो उसे सारी धरती का राजा समझो। उस मनुष्य के चरणों की धूड़ी ले के मन विकारों से बचता है और परमात्मा प्रसन्न होता है। 7।
सलोक ॥
अनिक लीला राज रस रूपं छत्र चमर तखत आसनं ॥
रचंति मूड़ अगिआन अंधह नानक सुपन मनोरथ माइआ ॥1॥
सुपनै हभि रंग माणिआ मिठा लगड़ा मोहु ॥
नानक नाम विहूणीआ सुंदरि माइआ ध्रोहु ॥2॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: श्लोक॥ अनेकों चोज तमाशे।राज की मौजें।सुंदरता।(सिर पर) छत्र-चउर।और बैठने के लिए शाही तख़्त- इन पदार्थों में। हे नानक ! अंधे मूर्ख अज्ञानी बंदे ही मस्त होते हैं।माया के ये करिश्में तो स्वप्न की चीजों (के समान) हैं। 1। (ये ऐसे हैं जैसे) सपने में सारी मौजें लीं।उनके मोह की कसक डाल ली (पर जाग खुली तो पल्ले कुछ भी ना रहा)। 2। हे नानक ! अगर प्रभू के नाम से वंचित रहे तो सुंदर माया धोखा ही है
पउड़ी ॥
सुपने सेती चितु मूरखि लाइआ ॥
बिसरे राज रस भोग जागत भखलाइआ ॥
आरजा गई विहाइ धंधै धाइआ ॥
पूरन भए न काम मोहिआ माइआ ॥
किआ वेचारा जंतु जा आपि भुलाइआ ॥8॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ मूर्ख मनुष्य ने सपने से प्यार डाला हुआ है। इस राज व रसों के भोगों में प्रभू को विसार के जागते हुए ही बड़ बड़ाता है। दुनिया के धंधों में भटकते की सारी उम्र बीत जाती है। पर माया में मोहे हुए के काम खत्म होने में नहीं आते। विचारे जीव के भी क्या वश।उस प्रभू ने खुद ही इसको भुलेखे में डाला हुआ है। 8।
सलोक ॥
बसंति स्वरग लोकह जितते प्रिथवी नव खंडणह ॥
बिसरंत हरि गोपालह नानक ते प्राणी उदिआन भरमणह ॥1॥
कउतक कोड तमासिआ चिति न आवसु नाउ ॥
नानक कोड़ी नरक बराबरे उजड़ु सोई थाउ ॥2॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: श्लोक॥ अगर स्वर्ग जैसे देश में बसते हों।अगर सारी धरती को जीत लें।पर। हे नानक ! अगर जगत के रखवाले प्रभू को बिसार दे।तो वे मनुष्य (मानो) जंगल में भटक रहे हैं। 1। जगत के करोड़ों चोज-तमाशों के कारण अगर प्रभू का नाम चित्त में (याद) ना रहे। तो हे नानक ! वह जगह तो उजाड़ ही समझो।वह जगह भयानक नर्क के बराबर है। 2।
पउड़ी ॥
महा भइआन उदिआन नगर करि मानिआ ॥
झूठ समग्री पेखि सचु करि जानिआ ॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ बड़े डरावने जंगल को जीवों ने शहर समझ लिया है। इन नाशवान पदार्थों को देख के सदा टिके रहने वाले समझ लिया है।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।

गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।

इस अंग पर 10 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “इसी तरह) हे नानक ! अगर मन में सच्चा साई बस जाए तो सारे कोझे दुख उतर जाते हैं।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।