कोटि अघा सभि नास होहि सिमरत हरि नाउ ॥
मन चिंदे फल पाईअहि हरि के गुण गाउ ॥
जनम मरण भै कटीअहि निहचल सचु थाउ ॥
पूरबि होवै लिखिआ हरि चरण समाउ ॥
करि किरपा प्रभ राखि लेहु नानक बलि जाउ ॥5॥
ग्रिह रचना अपारं मनि बिलास सुआदं रसह ॥
कदांच नह सिमरंति नानक ते जंत बिसटा क्रिमह ॥1॥
मुचु अडंबरु हभु किहु मंझि मुहबति नेह ॥
सो सांई जैं विसरै नानक सो तनु खेह ॥2॥
सुंदर सेज अनेक सुख रस भोगण पूरे ॥
ग्रिह सोइन चंदन सुगंध लाइ मोती हीरे ॥
मन इछे सुख माणदा किछु नाहि विसूरे ॥
सो प्रभु चिति न आवई विसटा के कीरे ॥
बिनु हरि नाम न सांति होइ कितु बिधि मनु धीरे ॥6॥
चरन कमल बिरहं खोजंत बैरागी दह दिसह ॥
तिआगंत कपट रूप माइआ नानक आनंद रूप साध संगमह ॥1॥
मनि सांई मुखि उचरा वता हभे लोअ ॥
नानक हभि अडंबर कूड़िआ सुणि जीवा सची सोइ ॥2॥
बसता तूटी झुंपड़ी चीर सभि छिंना ॥
जाति न पति न आदरो उदिआन भ्रमिंना ॥
मित्र न इठ धन रूपहीण किछु साकु न सिंना ॥
राजा सगली स्रिसटि का हरि नामि मनु भिंना ॥
तिस की धूड़ि मनु उधरै प्रभु होइ सुप्रसंना ॥7॥
अनिक लीला राज रस रूपं छत्र चमर तखत आसनं ॥
रचंति मूड़ अगिआन अंधह नानक सुपन मनोरथ माइआ ॥1॥
सुपनै हभि रंग माणिआ मिठा लगड़ा मोहु ॥
नानक नाम विहूणीआ सुंदरि माइआ ध्रोहु ॥2॥
सुपने सेती चितु मूरखि लाइआ ॥
बिसरे राज रस भोग जागत भखलाइआ ॥
आरजा गई विहाइ धंधै धाइआ ॥
पूरन भए न काम मोहिआ माइआ ॥
किआ वेचारा जंतु जा आपि भुलाइआ ॥8॥
बसंति स्वरग लोकह जितते प्रिथवी नव खंडणह ॥
बिसरंत हरि गोपालह नानक ते प्राणी उदिआन भरमणह ॥1॥
कउतक कोड तमासिआ चिति न आवसु नाउ ॥
नानक कोड़ी नरक बराबरे उजड़ु सोई थाउ ॥2॥
महा भइआन उदिआन नगर करि मानिआ ॥
झूठ समग्री पेखि सचु करि जानिआ ॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।
गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।
इस अंग पर 10 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “इसी तरह) हे नानक ! अगर मन में सच्चा साई बस जाए तो सारे कोझे दुख उतर जाते हैं।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।